सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

#राष्ट्र_हिंदी राष्ट्रवाद/ #साम्राज्यवाद जैसे मुहावरे ‘खरहे के सींग’ की तरह लगते हैं। हिंदी आधुनिकता के गर्भ से जन्मी स्वाधीनता हिन्दुस्तान संग्राम की बेटी है- उसके संस्कार #जनतांत्रिक हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसने तत्सम-तद्भव-देशज की ही पंक्ति में विदेशज को भी बिठाया है और वह हमेशा यह मानकर चली है कि जैसे हर व्यक्ति अपने ढंग से अनूठा है, हर भाषा भी।ठीक है, कुछ भाषाओं के पास अधिक समृद्ध साहित्य की विरासत है पर जनतंत्र में ‘विरासत’ शब्द भी मूंछ पर ताव देने का माध्यम नहीं बनना चाहिए! कोई अनामगोत्र है, उसके पीछे विरासत की गठरी नहीं तो भी वह इतना ही अनूठा है, उसमें भी उतनी ही सम्भावनाएं अंतर्भुक्त हैं जिन्हें सामने लाने का हरसम्भव प्रयास न सिर्फ सरकारी समितियों बल्कि भगिनी भाषाओं को भी करना चाहिए- उससे बोलकर, उसका संकोच तोड़कर, सुन्दर अनुवादों द्वारा उसमें नई त्वरा, नई बिजली भरकर।राष्ट्र हिंदी खुली बांहों वाली भाषा है और इसकी समृद्धि में कहीं कोई कमी नहीं। जितने अनुवाद विदेशी और भारतीय भाषाओं से हिंदी में हुए हैं, उतने किसी और भाषा में नहीं हुए। हिंदी ने सबको ही प्यार से अंकवारा है! महादेवी वर्मा ने जिन दिनों ‘चांद’ के अंक निकाले थे, उन्होंने अनूठा काम किया! #हिन्दुस्तानी-हिंदी, मराठी-हिंदी, मलयाली-हिंदी, पंजाबी-हिंदी, बांग्ला-हिंदी के कई मनहर आलेख उन्होंने छापे। वहां की प्रबुद्ध लेखिकाओं से हिंदी में लेख लिखवाए या उनके लेखों के ऐसे अनुवाद सम्भव किए, जिनमें उनकी मातृभाषा की छांह थी।इस एक कदम से राष्ट्र हिंदी-पट्टी के कई विवाद एकदम से सुलझ गए- हिंदी का भगिनी भाषा उर्दू और अपनी ही पितामही-मातामही भाषाओं यानी बोलियों से जो रगड़ा सुलगाया जा रहा था, उसका प्रत्यक्ष समाधान भगिनी भाषाओं की यह होली है, जिसमें सब पर सबका रंग हो- वह भी प्रीत का गाढ़ा, चटक रंग- ऐसा कि ‘धोबिनिया धोए आधी रात! हिंदी की भारतीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है इसकी सर्वग्राहकता! भारत की कोई गली, कोई सड़क ऐसी नहीं जहां हिंदी बोलने वाला व्यक्ति अपने आधारभूत वाक्य/मंतव्य सामने वाले को समझा न सके।टीवी-सिनेमा, #वीडियो, #विज्ञापन, नेताओं के राष्ट्रीय प्रसारण हिंदी के सरल-सरस मुहावरे जनमानस में ऐसे छिड़क देते हैं, जैसे अक्षत-रोली देव-मूर्तियों पर छिड़की जाती है! तो कुंचम-कुंचम, एकटू-एकटू, थोड़ा-थोड़ा समावेशन हर भारतीय भाषा में हिंदी का हो ही चुका है। मुहल्ले की सबसे छोटी बच्ची की तरह हिंदी भारत के हर भाषा-घर में निर्द्वंद्व घूमी-फिरी है, सबकी गोद चढ़ी है!स्वाधीनता आंदोलन की भाषा राष्ट्र हिंदी बनी तो सबकी सहमति से ही- गांधी-पटेल की मातृभाषा गुजराती थी, राजगोपालाचारी तमिल भाषी थे, टैगोर, राजेंद्र मित्र और सुनीति चन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला भाषी थे, अम्बेडकर मराठी भाषी, लाला लाजपत राय पंजाबी भाषी थे। थोड़े फर्क के साथ #हिंदू-#मुसलमान दोनों इसे बोलते हैं। भाषा-परिवार की सबसे छोटी, सबसे मिठबोलवा बेटी के रूप में विकसित हुआ है इसका नागर स्वरूप- खड़ी बोली से उभरी है पर सरोकारों में जनतांत्रिक है- तत्सम-तद्भव-देशज-विदेशज सब तरह के शब्दों को एक पांत में बिठाने का जनतांत्रिक संस्कार इसमें है।राष्ट्र हिंदी भारत के लिए सेतु-भाषा है- जैसे अंग्रेजी विश्व के लिए! आसन्न परिवेश से, आमजन से गहनतम संवाद के लिए स्थानीय भाषा के साथ एक सूत्रधार भाषा या सेतु भाषा तो ठीक से जाननी ही चाहिए। और भाषा जानने का सबसे कारगर माध्यम साहित्य है क्योंकि भाषा के सबसे सरस, बंकिम, स्मरणीय प्रयोगों का खजाना है वह!कोई भाषा ठीक तरह से जाननी हो तो उस भाषा-भाषी से प्रेम करिए और अंतरंग बातचीत, उसका साहित्य पढ़िए, उस भाषा की फिल्में देखिए। जो अच्छा लगे, उसका अनुवाद करके #बच्चों को सुनाइए। सम्भव हो तो चुने हुए अंशों का मंचन भी कराइए। इतनी प्रतिश्रुति तो हर नागरिक से भाषा मांगती है। यह भी एक तरह का #मातृऋण है जो हमें चुकाना ही चाहिए!#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वाराराष्ट्र हिंदी हंसमुख #दोस्त भाषा है- सड़क और गलियों की भाषा, पंचायत, कहवाघर, चाय-ढाबों और विचार-विमर्श की भाषा भी। भाषा हो या व्यक्ति- बढ़ता वही है जो सबको प्यार करता है, सबको लेकर चलता है।Idioms like #nation_hindi nationalism / #imperialism sound like 'horns of rabbits'. Freedom born out of the womb of Hindi modernity is the daughter of Hindustan struggle - her sanskars are democratic. its


#राष्ट्र_हिंदी राष्ट्रवाद/ #साम्राज्यवाद जैसे मुहावरे ‘खरहे के सींग’ की तरह लगते हैं। हिंदी आधुनिकता के गर्भ से जन्मी स्वाधीनता हिन्दुस्तान संग्राम की बेटी है- उसके संस्कार #जनतांत्रिक हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसने तत्सम-तद्भव-देशज की ही पंक्ति में विदेशज को भी बिठाया है और वह हमेशा यह मानकर चली है कि जैसे हर व्यक्ति अपने ढंग से अनूठा है, हर भाषा भी।

ठीक है, कुछ भाषाओं के पास अधिक समृद्ध साहित्य की विरासत है पर जनतंत्र में ‘विरासत’ शब्द भी मूंछ पर ताव देने का माध्यम नहीं बनना चाहिए! कोई अनामगोत्र है, उसके पीछे विरासत की गठरी नहीं तो भी वह इतना ही अनूठा है, उसमें भी उतनी ही सम्भावनाएं अंतर्भुक्त हैं जिन्हें सामने लाने का हरसम्भव प्रयास न सिर्फ सरकारी समितियों बल्कि भगिनी भाषाओं को भी करना चाहिए- उससे बोलकर, उसका संकोच तोड़कर, सुन्दर अनुवादों द्वारा उसमें नई त्वरा, नई बिजली भरकर।

राष्ट्र हिंदी खुली बांहों वाली भाषा है और इसकी समृद्धि में कहीं कोई कमी नहीं। जितने अनुवाद विदेशी और भारतीय भाषाओं से हिंदी में हुए हैं, उतने किसी और भाषा में नहीं हुए। हिंदी ने सबको ही प्यार से अंकवारा है! महादेवी वर्मा ने जिन दिनों ‘चांद’ के अंक निकाले थे, उन्होंने अनूठा काम किया! #हिन्दुस्तानी-हिंदी, मराठी-हिंदी, मलयाली-हिंदी, पंजाबी-हिंदी, बांग्ला-हिंदी के कई मनहर आलेख उन्होंने छापे। वहां की प्रबुद्ध लेखिकाओं से हिंदी में लेख लिखवाए या उनके लेखों के ऐसे अनुवाद सम्भव किए, जिनमें उनकी मातृभाषा की छांह थी।

इस एक कदम से राष्ट्र हिंदी-पट्टी के कई विवाद एकदम से सुलझ गए- हिंदी का भगिनी भाषा उर्दू और अपनी ही पितामही-मातामही भाषाओं यानी बोलियों से जो रगड़ा सुलगाया जा रहा था, उसका प्रत्यक्ष समाधान भगिनी भाषाओं की यह होली है, जिसमें सब पर सबका रंग हो- वह भी प्रीत का गाढ़ा, चटक रंग- ऐसा कि ‘धोबिनिया धोए आधी रात! हिंदी की भारतीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है इसकी सर्वग्राहकता! भारत की कोई गली, कोई सड़क ऐसी नहीं जहां हिंदी बोलने वाला व्यक्ति अपने आधारभूत वाक्य/मंतव्य सामने वाले को समझा न सके।

टीवी-सिनेमा, #वीडियो, #विज्ञापन, नेताओं के राष्ट्रीय प्रसारण हिंदी के सरल-सरस मुहावरे जनमानस में ऐसे छिड़क देते हैं, जैसे अक्षत-रोली देव-मूर्तियों पर छिड़की जाती है! तो कुंचम-कुंचम, एकटू-एकटू, थोड़ा-थोड़ा समावेशन हर भारतीय भाषा में हिंदी का हो ही चुका है। मुहल्ले की सबसे छोटी बच्ची की तरह हिंदी भारत के हर भाषा-घर में निर्द्वंद्व घूमी-फिरी है, सबकी गोद चढ़ी है!

स्वाधीनता आंदोलन की भाषा राष्ट्र हिंदी बनी तो सबकी सहमति से ही- गांधी-पटेल की मातृभाषा गुजराती थी, राजगोपालाचारी तमिल भाषी थे, टैगोर, राजेंद्र मित्र और सुनीति चन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला भाषी थे, अम्बेडकर मराठी भाषी, लाला लाजपत राय पंजाबी भाषी थे। थोड़े फर्क के साथ #हिंदू-#मुसलमान दोनों इसे बोलते हैं। भाषा-परिवार की सबसे छोटी, सबसे मिठबोलवा बेटी के रूप में विकसित हुआ है इसका नागर स्वरूप- खड़ी बोली से उभरी है पर सरोकारों में जनतांत्रिक है- तत्सम-तद्भव-देशज-विदेशज सब तरह के शब्दों को एक पांत में बिठाने का जनतांत्रिक संस्कार इसमें है।

राष्ट्र हिंदी भारत के लिए सेतु-भाषा है- जैसे अंग्रेजी विश्व के लिए! आसन्न परिवेश से, आमजन से गहनतम संवाद के लिए स्थानीय भाषा के साथ एक सूत्रधार भाषा या सेतु भाषा तो ठीक से जाननी ही चाहिए। और भाषा जानने का सबसे कारगर माध्यम साहित्य है क्योंकि भाषा के सबसे सरस, बंकिम, स्मरणीय प्रयोगों का खजाना है वह!

कोई भाषा ठीक तरह से जाननी हो तो उस भाषा-भाषी से प्रेम करिए और अंतरंग बातचीत, उसका साहित्य पढ़िए, उस भाषा की फिल्में देखिए। जो अच्छा लगे, उसका अनुवाद करके #बच्चों को सुनाइए। सम्भव हो तो चुने हुए अंशों का मंचन भी कराइए। इतनी प्रतिश्रुति तो हर नागरिक से भाषा मांगती है। यह भी एक तरह का #मातृऋण है जो हमें चुकाना ही चाहिए!

#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा

राष्ट्र हिंदी हंसमुख #दोस्त भाषा है- सड़क और गलियों की भाषा, पंचायत, कहवाघर, चाय-ढाबों और विचार-विमर्श की भाषा भी। भाषा हो या व्यक्ति- बढ़ता वही है जो सबको प्यार करता है, सबको लेकर चलता है।



Idioms like #nation_hindi nationalism / #imperialism sound like 'horns of rabbits'. Freedom born out of the womb of Hindi modernity is the daughter of Hindustan struggle - her sanskars are democratic. its

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!!अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी।अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी।युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी।राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा।रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी। यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा।वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे।कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया। प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी। रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया।जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये। यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की।राजा दशरथ के पास गया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी। बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी। इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए।तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता। कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे।ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और खूबसूरत सी कहानीया से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ ...

कलयुग में रामनाम की महिमा!!!!!*नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥कहते हैं कि कलियुग ने आने के लिए राजा परीक्षित से बहुत अनुनय-विनय की। कहा कि घबराइए नहीं महाराज, हम किसी को तंग नहीं करेंगे, बस 'स्वर्ण' में घर बसाएंगे। हमारे साथ दो-चार संगी, साथी होंगे- राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम-वासना आदि। अपने गुण बताते हुए कलियुग ने कहा- सुनो हमारी महिमा! हमारे राज में जो प्रभु का 'केवल' नाम ले लेगा, उसकी मुक्ति निश्चित है। और तो और, मन से सोचे गए पाप की हम सजा नहीं देंगे, पर मन से सोचे गए पुण्य का फल जरूर देंगे। राजा परीक्षित ने कलियुग को आने दिया तो सबसे पहले वह राजा के सोने के मुकुट में ही विराजमान हुआ और सबसे पहले उन्हें ही मृत्यु की ओर धकेल दिया।कलियुग को सभी कोसते हैं, सभी क्रोध, राग, द्वेष और वासना से ग्रस्त हैं। कोई कहता है काश, हम सतयुग में पैदा हुए होते। कोई त्रेता और द्वापर युग के गुण गाता है। तुलसीदास ने जन-मानस की हालत देखकर समझाया कि कलियुग में बेशक बहुत सी गड़बडि़याँ हैं, मगर उन सबसे बचने का उपाय जितनी सरलता से कलियुग में मिल सकता है, उतनी सरलता से किसी और काल में नहीं मिला। पहले प्रभु को पाने के लिए ध्यान करना पड़ता था। त्रेता में योग से प्रभु मिलते थे, द्वापर में कर्मकांड का मार्ग था। ये सभी मार्ग नितांत कठिन और घोर तपस्या के बाद ही फलीभूत होते हैं, पर कलियुग में ईश्वर को प्राप्त करना पहले के मुकाबले बड़ा ही सरल हो गया है।कैसे भाई? हर मत और संप्रदाय ने गुण गाया है 'नाम' का। यह वह मार्ग है जहाँ विविध संप्रदाय एकमत हो जाते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास ने कहा:कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।नाम जप में किसी विधिविधान, देश, काल, अवस्था की कोई बाधा नहीं है। किसी प्रकार से, कैसी भी अवस्था में, किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी, कैसे भी नाम जप किया जा सकता है। इस नाम जप से हर युग में भक्तों का भला हुआ। श्रीभद् भागवत में कथा आती है अजामिल ब्राह्माण की, जिसने सतयुग में घोर पाप किया। पत्नी के होते हुए वेश्या के पास रहा। वेश्या के पुत्र का नाम नारायण रख दिया। मरते समय पुत्र को पुकारा, 'नारायण!' तो स्वयं नारायण आ गए। ऐसी ही एक और कथा है गज ग्राह युद्ध की। गज ने अपनी सूंड तक अपने को डूबते पाया तो पुकारा 'रा!' इतनी भी शक्ति नहीं थी कि पूरा 'राम' कह दे। पर प्रभु ने भाव समझ लिया और गज के प्राण बचा लिए। त्रेता में वाल्मीकि ने नाम जप किया तो उल्टा। 'राम' कह न सके, डाकू थे, मांसाहारी थे, सो 'मरा' कहना सरल लगा, तोते की तरह रटते रहे तो स्वयं श्री राम पधारे कुटिया में। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्मा समाना।' द्वापर युग में दौपदी ने भरी सभा में रोते हुए हाथ खड़े कर दिए। सभी का सहारा छोड़ दिया तो कृष्ण की याद आई। श्रीकृष्ण चीर रूप में प्रकट हुए।कलियुग में तो नाम जप के भक्तों की भरमार है। कबीर, मीरा, रैदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान, नानक, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि आदि। राजा परीक्षित के वैद्य धन्वन्तरि तो कहते थे कि 'नाम जप' औषधि है, जिससे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। इस औषधि का लाभ गांधीजी ने भी तो उठाया। हर अवस्था में, चिंता में, रोग में उन्होंने 'राम नाम' का आश्रय लिया।लेकिन नाम जप का यह अर्थ नहीं कि पाप करने की छूट मिल गई। नाम से पापों का विनाश होता तो है, पर तभी जब व्यक्ति के हृदय में पिछले पापों के प्रति प्रायश्चित और उन्हें दोबारा न करने का संकल्प हो। नाम जप की औषधि के साथ परहेज भी आवश्यक है। नाम जपते रहो, क्रोध स्वत: दूर हो जाएगा। जप में बुरी प्रवृत्तियां पीछे हटती जाती हैं। उन्हें जबरन हटाने का प्रयास न करो, बस नाम जपो, प्रेम से।रामचरितमानस में भी बाबा तुलसी ने लिखा है,,,,सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥ द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥* कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥ वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥* कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥By वनिता कासनियां पंजाबभावार्थ:-यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे।।जय हो!!!! जय सिया राम🚩🚩🚩🚩

कलयुग में रामनाम की महिमा!!!!! *नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥ कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥ कहते हैं कि कलियुग ने आने के लिए राजा परीक्षित से बहुत अनुनय-विनय की। कहा कि घबराइए नहीं महाराज, हम किसी को तंग नहीं करेंगे, बस 'स्वर्ण' में घर बसाएंगे। हमारे साथ दो-चार संगी, साथी होंगे- राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम-वासना आदि। अपने गुण बताते हुए कलियुग ने कहा- सुनो हमारी महिमा! हमारे राज में जो प्रभु का 'केवल' नाम ले लेगा, उसकी मुक्ति निश्चित है।  और तो और, मन से सोचे गए पाप की हम सजा नहीं देंगे, पर मन से सोचे गए पुण्य का फल जरूर देंगे। राजा परीक्षित ने कलियुग को आने दिया तो सबसे पहले वह राजा के सोने के मुकुट में ही विराजमान हुआ और सबसे पहले उन्हें ही मृत्यु की ओर धकेल दिया। कलियुग को सभी कोसते हैं, सभी क्रोध, राग, द्वेष और वासना से ग्रस्त हैं। कोई कहता है काश, हम ...