सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 1 मेरी सारी जिन्दगी घूमने में ही बीती है। इस घुमक्कड़ जीवन के तीसरे पहर में खड़े होकर, उसके एक अध्याापक को सुनाते हुए, आज मुझे न जाने कितनी बातें याद आ रही हैं। यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल 'छि:-छि:' सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी 'छि:-छि:' के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका। किन्तु बहुत काल के बाद जब आज मैं कुछ याद और कुछ भूली हुई कहानी की माला गूँथने बैठा हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के उस प्रभात में ही क्यों उस सुदीर्घ 'छि:-छि:' की भूमिका अंकित हो गयी थी, तब हठात् यह सन्देह होने लगता है कि सब लोग इस 'छि: छि:' को जितनी बड़ी बनाकर देखते थे उतनी बड़ी शायद वह नहीं थी। जान पड़ता है, भगवान जिसे अपनी सृष्टि के ठीक बीच में जबरन धकेल देते हैं शायद उसे भला लड़का कहलाकर एग्जाम पास करने की सुविधा नहीं देते; और न वे उसे गाड़ी-घोड़े पालकी पर लाव-लश्कर के साथ भ्रमण करके 'कहानी' नाम देकर छपाने की ही अभिरुचि देते हैं। उसे बुद्धि तो शायद, वे कुछ दे देते हैं, परन्तु दुनियादार लोग उसे 'सु-बुद्धि' नहीं कहते। इसी कारण उसकी प्रवृत्ति ऐसी असंगत, ऐसी निराली होती है, और उसके देखने की चीजें, और जानने की तृष्णा, स्वभावत: ऐसी बेजोड़ होती हैं कि यदि उसका वर्णन किया जाए तो, शायद, 'सु-बुद्धि' वाले हँसते-हँसते मर जाँय। उसके बाद वह मन्द बालक; न जाने किस तरह, अनादर और अवहेलना के कारण, बुरों के आकर्षण से और भी बुरा होकर, धक्के और ठोकरें खाता हुआ, अज्ञात-रूप से अन्त में किसी दिन अपयश की झोली कन्धों पर रखकर कहीं चल देता है, और बहुत समय तक उसका कोई पता नहीं लगता।अतएव इन सब बातों को रहने देता हूँ। जो कुछ कहने बैठा हूँ वही कहता हूँ। परन्तु कहने से ही तो कहना नहीं हो जाता। भ्रमण करना एक बात है और उसका वर्णन करना दूसरी बात। जिसके भी दो पैर हैं, वह भ्रमण कर सकता है किन्तु दो हाथ होने से ही तो किसी से लिखा नहीं जा सकता। लिखना तो बड़ा कठिन है। सिवाय इसके, बड़ी भारी मुश्किल यह है कि भगवान ने मेरे भीतर कल्पना-कवित्व की एक बूँद भी नहीं डाली। इन अभागिनी आँखों से जो कुछ दीखता है, ठीक वही देखता हूँ। वृक्ष को ठीक वृक्ष ही देखता हूँ और पहाड़-पर्वतों को पहाड़-पर्वत। जल की ओर देखने से वह जल के सिवाय और कुछ नहीं जान पड़ता। आकाश में बादलों की तरफ आँखें फाड़कर देखते-देखते मेरी गर्दन अवश्य दु:खने लगी है, बादल बादल ही नजर आए हैं, उनमें किसी की निबिड़ केश-राशि तो क्या दीखेगी, कभी बाल का टुकड़ा भी खोजे नहीं मिला। चन्द्रमा की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गयी हैं; परन्तु उसमें भी कभी किसी का मुख-उख नजर न आया। इस प्रकार भगवान ने ही जिसकी विडम्बना की हो उसके द्वारा कवित्व-सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि हो सकती है तो केवल यही कि वह सच-सच बात सीधी तरह से कह दे। इसलिए मैं यही करूँगा।किन्तु मैं घुमक्कड़ क्यों हो गया, यह बताने के पहले उस व्यक्ति का कुछ परिचय देना आवश्यक है जिसने जीवन के प्रभात में ही मुझे इस नशे में मत्त कर दिया था। उसका नाम था इन्द्रनाथ। हम दोनों का प्रथम परिचय एक फुटबाल-मैच में हुआ। जानता नहीं कि वह आज जीवित है या नहीं। क्योंकि, बरसों पहले एक दिन वह बड़े सुबह उठकर, घर-बार, जमीन-जायदाद और अपने कुटुम्ब को छोड़कर केवल एक धोती लेकर चला गया और फिर लौटकर नहीं आया। ओह, वह दिन आज किस तरह याद है।स्कूल के मैदान में बंगाली और मुसलमान छात्रों में फुटबाल-मैच था। संध्याख हो रही थी। मगन होकर देख रहा था। आनन्द की सीमा न थी। हठात्-अरे यह क्या! तड़ातड़-तड़ातड़ शब्द और 'मारो साले को, पकड़ो साले को' की पुकार मच गयी। मैं विह्वल-सा हो गया। दो-तीन मिनट,- बस इतने में कहाँ कौन गायब हो गया, निश्चय ही न कर पाया। ठीक तौर से पता लगा तब, जब कि मेरी पीठ पर आकर एक छतरी का पूरा बेंट तड़ाक से टूट गया तथा और भी दो-तीन बेंट सिर और भी दो-तीन बेंट सिर और पीठ पर पड़ने को उद्यत दीखे। देखा, पाँच-सात मुसलमान छोकरों ने मेरे चारों ओर व्यूह-रचना कर ली है और भाग जाने को जरा-सा भी रास्ता नहीं छोड़ा है। और भी एक बेंट,- और भी एक। ठीक इसी समय जो मनुष्य बिजली के वेग से उस व्यूह को भेदता हुआ मेरे आगे आकर खड़ा हो गया, वह था इन्द्रनाथ। रंग उसका काला था। नाक वंशी के समान, कपाल प्रशस्त और सुडौल, मुख पर दो-चार चेचक के दाग। ऊँचाई मेरे बराबर ही थी, किन्तु उम्र मुझसे कुछ अधिक थी। कहने लगा, “कोई डर नहीं है, तुम मेरे पीछे-पीछे बाहर निकल आओ।”उस लड़के की छाती में जो साहस और करुणा थी, वह दुर्लभ होते हुए भी शायद असाधारण नहीं थी। परन्तु इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि उसके दोनों हाथ असाधारण थे। यही नहीं कि वे बहुत बलिष्ठ थे, वरन् लम्बाई में भी घुटनों तक पहुँचते थे। सिवाय इसके, उसे एक सुविधा यह भी थी कि जो उसे जानता नहीं था उसके मन में यह आशंका भी न हो सकती थी कि विवाद के समय यह भला आदमी अकस्मात् अपना तीन हाथ लम्बा हाथ बाहर निकालकर मेरी नाक पर एकाएक इस अन्दाज का घूँसा मार सकेगा। वह घूँसा क्या था, उसे बाघ का पंजा कहना ही अधिक उपयुक्त होगा।दो ही मिनट के भीतर मैं उसकी पीठ से सटा हुआ बाहर आ गया; और तब, इन्द्र ने बिना किसी आडम्बर के कहा, “भागो।”भागना शुरू करके मैंने पूछा, “और तुम?” उसने रूखाई से जवाब दिया, “अरे तू तो भाग-गधे कहीं के।”गधा होऊँ- या चाहे जो होऊँ, मुझे खूब याद है, मैंने हठात् लौटकर और खड़े होकर कहा, “नहीं, मैं नहीं भागूँगा।”बचपन में मार-पीट किसने न की होगी? किन्तु, मैं था गाँव का लड़का- दो-तीन महीने पहले ही लिखने-पढ़ने के लिए शहर में बुआजी के यहाँ आया था। इसके पहले, इस प्रकार दल बाँधकर, न तो मैंने मार-पीट ही की थी, और न किसी दिन इस तरह दो पूरे छतरी के बेंट ही मेरी पीठ के ऊपर टूटे थे। फिर भी मैं अकेला भाग न सका। इन्द्र ने एक बार मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, “नहीं भागेगा, तो क्या खड़े-खड़े मार खाएगा? देख, उस तरफ से वे लोग आ रहे हैं-अच्छा, तो चल, खूब कसकर दौड़ें।”यह काम तो मैं खूब कर सकता था। दौड़ते-दौड़ते जब हम लोग बड़ी सड़क पर पहुँचे, तब शाम हो गयी थी। दुकानों में रोशनी हो गयी थी और रास्ते पर म्युनिसिपल के केरॉसिन के लैम्प, लोहे के खम्भों पर, एक यहाँ और दूसरा वहाँ, जल रहे थे। आँखों में जोर होने पर, ऐसा नहीं है कि एक के पास खड़े होने पर दूसरा दिखाई न पड़ता। आततायियों की अब कोई आशंका नहीं थी। इन्द्र अत्यन्त स्वाभाविक सहज स्वर से बात कर रहा था। मेरा गला सूख रहा था, परन्तु आश्चर्य है कि इन्द्र रत्ती-भर भी नहीं हाँफा था। मानो कुछ हुआ ही न हो- न मारा हो, न मार खाई हो और न दौड़ा ही हो। जैसे कुछ हुआ ही न हो, ऐसे भाव से उसने पूछा, “तेरा नाम क्या है रे?”“श्रीकांत।”“श्रीकांत? अच्छा।” कहकर उसने अपनी जेब से मुट्ठी-भर सूखी पत्ती बाहर निकाली। उसमें से कुछ तो उसने खा ली और कुछ मेरे हाथ में देकर कहा, “आज खूब ठोका सालों को, ले खा।”“क्या है यह?”“बूटी।”मैंने अत्यन्त विस्मित होकर कहा, “भाँग? यह तो मैं नहीं खाता।”उसने मुझसे भी अधिक विस्मित होकर कहा, “खाता नहीं? कहाँ का गधा है रे। खूब नशा होगा- खा, चबाकर लील जा।”नशे की चीज का मजा उस समय ज्ञात नहीं था; इसलिए सिर हिलाकर मैंने उसे वापस कर दिया। वह उसे भी चबाकर निगल गया।“अच्छा, तो फिर सिगरेट पी।” यह कहकर उसने जेब से दो सिगरेट और दियासलाई बाहर निकाली। एक तो उसने मेरे हाथ में दे दी और दूसरी अपने हाथ में रखी। इसके बाद, वह अपनी दोनों हथेलियों को एक विचित्र प्रकार से जुटाकर, उस सिगरेट को चिलम बनाकर जोर से खींचने लगा। बाप रे,- कैसे जोर से दम खींचा कि एक ही दम में सिगरेट की आग सिरे से चलकर नीचे उतर आई! लोग चारों तरफ खड़े थे- मैं बहुत ही डर गया। मैंने डरते हुए पूछा, “पीते हुए यदि कोई देख ले तो?”“देख ले तो क्या? सभी जानते हैं।” यह कहकर स्वच्छन्दता से सिगरेट पीता हुआ वह चौराहे पर मुड़ा और मेरे मन पर एक गहरी छाप लगाकर, एक ओर को चल दिया।आज उस दिन की बहुत-सी बातें याद आती हैं। सिर्फ इतना ही याद नहीं आता, कि उस अद्भुत बालक के प्रति, उस दिन मुझे प्रेम उत्पन्न हुआ था, अथवा यों खुले आम भाँग और तमाखू पीने के कारण, मन ही मन घृणा। इस घटना के बाद करीब एक महीना बीत गया। एक दिन रात्रि जितनी उष्ण थी उतनी ही अंधेरी। कहीं वृक्ष की एक पत्ती तक न हिलती थी। सब छत पर सोए हुए थे। बारह बज चुके थे, परन्तु किसी की भी आँखों में नींद का नाम न था। एकाएक बाँसुरी का बहुत मधुर स्वर कानों में आने लगा। साधारण 'रामप्रसादी' सुर था। कितनी ही दफे तो सुन चुका था, किन्तु बाँसुरी इस प्रकार मुग्ध कर सकती है, यह मैं न जानता था। हमारे मकान के दक्षिण-पूर्व के कोने में एक बड़ा भारी आम और कटहल का बाग था। कई हिस्सेदारों की सम्पत्ति होने के कारण कोई उसकी खोज-खबर नहीं लेता था, इसलिए पूरा बाग निबिड़ जंगल के रूप में परिणत हो गया था। गाय-बैलों के आने-जाने से उस बाग के बीच में से केवल एक पतली-सी पगडंडी बन गयी थी। ऐसा मालूम हुआ कि मानो उसी वन-पथ से बाँसुरी का सुर क्रमश: निकटवर्ती होता हुआ आ रहा है। बुआ उठकर बैठ गयीं और अपने बड़े लड़के को उद्देश्य कर बोलीं, “हाँ रे नवीन, यह बाँसुरी राय-परिवार का इन्द्र ही बजा रहा है न?” तब मैंने समझा कि इस बंसीधारी को ये सभी चीन्हते हैं। बड़े भइया ने कहा, “उस हतभागे को छोड़कर ऐसी दूसरा कौन बजायेगा और उस जंगल में ऐसा कौन है जो ढूँकेगा?”“बोलता क्या है रे? वह क्या गुसाईं के बगीचे से आ रहा है?”बड़े भइया बोले, “हाँ।”ऐसे भयंकर अन्धकार में उस अदूरवर्ती गहरे जंगल का खयाल करके बुआ मन ही मन सिहर उठीं और डर भरे कण्ठ से प्रश्न कर उठीं, “अच्छा, उसकी माँ भी क्या उसे नहीं रोकती? गुसाईं के बाग में तो न जाने कितने लोग साँप के काटने से मर गये हैं- उस जंगल में इतनी रात को वह लड़का आया ही क्यों?”बड़े भइया कुछ हँसकर बोले, “इसलिए कि उस मुहल्ले से इस मुहल्ले तक आने का वही सीधा रास्ता है। जिसे भय नहीं है, प्राणों की परवाह नहीं है, वह क्यों बड़े रास्ते से चक्कर काटकर आएगा माँ? उसे तो जल्दी आने से मतलब, फिर चाहे उस रास्ते में नदी-नाले हों- चाहे साँप-बिच्छू और बाघ-भालू हों!”“धन्य है रे लड़के, तुझे!” कहकर बुआ एक नि:श्वास डालकर चुप हो रहीं। वंशी की ध्वानि क्रमश: सुस्पष्ट होती गयीं और फिर धीरे-धीरे अस्पष्ट होती हुई दूर जाकर विलीन हो गयी।यही था वह इन्द्रनाथ। उस दिन तो मैं यह सोचता रहा था कि क्या ही अच्छा होता, यदि इतना अधिक बल मुझमें भी होता और मैं भी इसी तरह मार-पीट कर सकता और आज रात्रि को जब तक, सो न गया, तब तक यही कामना करता रहा कि यदि किसी तरह ऐसी वंशी बजा सकता!परन्तु उससे सद्भाव किस तरह पैदा करूँ? वह तो मुझसे बहुत ऊँचे पर है। उस समय वह स्कूल में भी न पढ़ता था। सुना था कि हेडमास्टर साहब ने अन्याय करके उसके सिर पर ज्यों ही गधे की टोपी लगाने का आयोजन किया, त्यों ही वह मर्माहत हो, अकस्मात् हेडमास्टर की पीठ पर एक धौल जमाकर, घृणा भाव से स्कूल की रेलिंग फाँदता हुआ घर भाग आया और फिर गया ही नहीं। बहुत दिनों बाद उसी के मुँह से सुना था कि वह एक न कुछ अपराध था। हिंदुस्तानी पंडितजी को क्लास के समय में ही नींद आने लगती थी, सो एक बार जब वे नींद ले रहे थे तब, उनकी गाँठ बँधी चोटी को उसने कैंची से काटकर जरा छोटा भर कर दिया था! और उससे उनकी विशेष कुछ हानि भी नहीं हुई, क्योंकि पण्डितजी जब घर पहुँचे तब अपनी चोटी अपनी चपकन की जेब में ही पड़ी हुई मिल गयी! वह कहीं खोई नहीं गयी, फिर भी पंडितजी का गुस्सा शान्त क्यों न हुआ और क्यों वे हेडमास्टर साहब के पास नालिश करने गये- यह बात आज तक भी इन्द्र की समझ में नहीं आई। परन्तु फिर भी यह बात वह ठीक समझ गया था कि स्कूल से रेलिंग फाँदकर घर आने का रास्ता तैयार हो जाने पर फिर फाटक में से वापिस लौटकर जाने का रास्ता प्राय: खुला नहीं रह जाता। और फाटक का रास्ता खुला रहा या नहीं रहा, यह देखने की उत्सुकता भी, उसे बिल्कुलल नहीं हुई। यहाँ तक कि सिर पर 10-20 अभिभावकों के होने पर भी, उनमें से कोई भी, उसका मुँह किसी भी तरह फिर विद्यालय की ओर नहीं फेर सका।इन्द्र ने कलम फेंककर नाव का डाँड़ हाथ में ले लिया। तब से वह सारे दिन गंगा में नाव के ऊपर रहने लगा। उसकी अपनी एक छोटी-सी डोंगी थी। चाहे आँधी हो चाहे पानी, चाहे दिन हो चाहे रात, वह अकेला उसी पर बना रहता। कभी-कभी एकाएक ऐसा होता कि वह पश्चिम की गंगा के इकतरफा बहाव में अपनी डोंगी को छोड़ देता, डाँड़ पकड़े चुपचाप बैठा रहता और दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक फिर उसका कुछ भी पता न लगता।एक दिन इसी प्रकार जब वह बिना किसी उद्देश्य के अपनी डोंगी बहाए जा रहा था, तब उसके साथ मिलन की गाँठ को सुदृढ़ करने का मुझे मौका मिला। उस समय मेरी यह एकमात्र कामना थी कि उससे किसी न किसी प्रकार मित्रता का सम्बन्ध दृढ़ किया जाए, और यही बतलाने के लिए मैंने इतना कहा है।किन्तु जो लोग मुझे जानते हैं वे तो कहेंगे कि यह तो तुम्हें नहीं सोहता भैया, तुम ठहरे गरीब के लड़के और फिर लिखना-पढ़ना सीखने के लिए अपना गाँव छोड़कर पराए घर आकर रहे हो, फिर तुम उससे मिले ही क्यों और मिलने के लिए इतने व्याकुल ही क्यों हुए? यदि ऐसा न किया होता, तो आज तुम-ठहरो, ठहरो, अधिक कहने की जरूरत नहीं है। यह बात हजारों लोगों ने लाखों ही बार मुझसे कही है; स्वयं खुद मैंने ही यह प्रश्न अपने आपसे करोड़ों बार पूछा है, परन्तु सब व्यर्थ। वह कौन था? इसका जवाब तुममें से कोई भी नहीं दे सकता और फिर, “यदि ऐसा न हुआ होता तो मैं क्या हो जाता?” इस प्रश्न का समाधन भी तुममें से कोई कैसे कर सकता है? जो सब कुछ जानते हैं, केवल वे (भगवान) ही बता सकते हैं कि क्यों इतने आदमियों को छोड़कर एकमात्र उसी हतभागे के प्रति मेरा सारा हृदय आकृष्ट हुआ और क्यों उस मन्द से मिलने के लिए मेरे शरीर का प्रत्येक कण उन्मुख हो उठा।वह दिन मुझे खूब याद है। सारे दिन लगातार गिरते रहने पर भी मेह बन्द नहीं हुआ था। सावन का आकाश घने बादलों से घिरा हुआ था। शाम होते-न-होते चारों ओर अन्धकार छा गया। जल्दी-जल्दी खाकर, हम कई भाई रोज की तरह बाहर बैठकखाने में बिछे हुए बिस्तर पर रेड़ी के तेल का दीपक जलाकर, पुस्तक खोलकर, बैठ गये थे। बाहर के बरामदे में एक तरफ फूफाजी केन्वास की खाट पर लेटे हुए अपनी सांध्यी तन्द्रा का उपभोग कर रहे थे और दूसरी ओर बूढ़े रामकमल भट्टाचार्य अफीम खाकर अन्धकार में आँखें मींचे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। डयोढ़ी पर हिंदुस्तानी दरबान का 'तुलसीदास स्वर' सुन पड़ रहा था और भीतर हम तीनों भाई मँझले भइया की कड़ी देख-रेख में चुपचाप विद्याभ्यास कर रहे थे। छोटे भइया, जतीन और मैं तीसरी और चौथी कक्षा में पढ़ते थे और गम्भीर स्वभाव के मँझले भइया दो दफे एण्ट्रेस फेल होकर तीसरी दफे की तैयारी कर रहे थे। उनके प्रचण्ड शासन में किसी को एक मिनट भी नष्ट करने का साहस न होता था। हम लोगों का पढ़ने का समय था। 7.30 से 9 बजे तक। उस समय बातचीत करके हम उनकी 'पास होने' की पढ़ाई में विघ्न न डाल सकें, इसके लिए वे रोज कैंची से काट-काटकर कागज के 25-30 टिकट जैसे टुकड़े रख छोड़ते। उनमें से किसी में लिखा होता, 'बाहर जाना है', किसी में 'थूकना है', किसी में 'नाक साफ करना है', किसी में 'पानी पीना है' आदि। जतीन भइया ने नाक साफ करने का एक टिकट मँझले भइया के सामने पेश किया। मँझले भइया ने उस पर अपने हाथ से लिख दिया, '8 बजकर 33 मिनट से लेकर 8 बजकर 33.30 मिनट तक।' अर्थात् इतने समय के लिए नाक साफ करने जा सकते हैं। छुट्टी पाकर जतीन भइया टिकट हाथ में लेकर गये ही थे कि छोटे भइया ने थूकने जाने का टिकट पेश कर दिया। मँझले भइया ने उस पर 'नहीं' लिख दिया। इस पर दो मिनट तक छोटे भइया मुँह फुलाए बैठे रहे और उसके बाद उन्होंने पानी पीने की अर्जी दाखिल कर दी। इस बार वह मंजूर हो गयी। मँझले भइया ने इसके लिए लिख दिया, “हाँ, 8 बजकर 41 मिनट से लेकर 8 बजकर 47 मिनट तक।” परवाना लेकर छोटे भइया हँसते हुए ज्यों ही बाहर गये त्यों ही जतीन भइया ने लौटकर हाथ का टिकट वापस दे दिया। मँझले भइया ने घड़ी देखकर और समय मिलाकर एक रजिस्टर बाहर निकाला और उसमें वह टिकट गोंद से चिपका दिया। यह सब सामान उनकी हाथ की पहुँच के भीतर ही रक्खा रहता था। सप्ताह सप्ताह होने पर इन सब टिकटों को सामने रखकर कैफियत तलब की जाती थी कि क्यों अमुक दिन तुमने इजाजत से अधिक समय लगा दिया।इस प्रकार मँझले भइया की अत्यन्त सतर्कता और श्रृंखलाबद्धता से- हमारा और उनका खुद का-किसी का जरा-सा भी समय नष्ट न होने पाता था। इस तरह प्रतिदिन, डेढ़ घण्टा, खूब पढ़ लेने के उपरान्त, जब हम लोग रात के 9 बजे घर में सोने को आते थे तब निश्चय ही माता सरस्वती हमें घर की चौखट तक पहुँचा जाती थीं; और दूसरे दिन स्कूल की कक्षा से जो सब सम्मान सौभाग्य प्राप्त करके हम घर लौटते थे वह तो आप समझ ही गये होंगे। परन्तु मँझले भइया का दुर्भाग्य कि उनके बेवकूफ परीक्षक उन्हें कभी न चीह्न सके! वे निज की तथा पराई शिक्षा-दीक्षा के प्रति इतना प्रबल अनुराग तथा समय के मूल्य के सम्बन्ध में अपने उत्तरदायित्व का इतना सूक्ष्म खयाल रखते थे फिर भी, वे उन्हें बराबर फेल ही करते गये। इसे ही कहते हैं अदृष्ट का अन्धा न्याय-विचार। खैर, जाने दो-अब उसके लिए दुखी होने से क्या लाभ?उस रात्रि को भी घर के बाहर वही घना अन्धकार, बरामदे में तन्द्राभिभूत वे दोनों बुङ्ढे और भीतर दीपक के मन्द प्रकाश के सम्मुख गम्भीर अध्यघयन में लगे हुए हम चार प्राणी थे।छोटे भइया के लौट आते ही प्यास के मारे मेरी छाती एकबारगी फटने लगी। इसीलिए टिकट पेश करके मैं हुक्म की राह देखने लगा। मँझले भइया उसी टिकटों वाले रजिस्टर के ऊपर झुककर परीक्षा करने लगे कि मेरा पानी पीने के लिए जाना नियम-संगत है या नहीं- अर्थात् कल परसों किस परिमाण में पानी पिया था।अकस्मात् मेरे ठीक पीछे से एक 'हुम्' शब्द और साथ ही साथ छोटे भइया और जतीन भइया का आर्तकण्ठ से निकला हुआ, “अरे बाप रे! मार डाला रे' का गगनभेदी चीत्कार सुन पड़ा। उन्हें किसने मार डाला, सिर घुमाकर यह देखने के पहले ही, मँझले भइया ने सिर उठाकर विकट शब्द किया और बिजली की तेजी से सामने पैर फैला दिए, जिससे दीवट उलट गया। तब उस अन्धकार में 'दक्ष-यज्ञ' मच गया। मँझले भइया को थी मिर्गी की बीमारी, इसलिऐ वे 'ओं-ओं' करके दीवट उलटाकर जो चित्त गिरे सो फिर न उठे।ठेलठाल करके मैं बाहर निकला तो देखा कि फूफाजी अपने दोनों लड़कों को बगल में दबाए हुए, उनसे भी अधिक तीव्र स्वर में चिल्लाकर छप्पर फाड़े डाल रहे हैं। ऐसा लगता था मानो उन तीनों बाप-बेटों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना गला फाड़ सकता है।इसी अवसर पर एक चोर जी छोड़कर भागा जा रहा था और डयोढ़ी के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया था। फूफाजी प्रचण्ड चीत्कार करके हुक्म दे रहे थे, “और मारो, साले को, मार डालो।” इत्यादि।दम भर में रोशनी हो गयी, नौकर-चाकरों और पास-पड़ोसियों से आँगन खचाखच भर गया। दरबानों ने चोर को मारते-मारते अधमरा कर दिया और प्रकाश के सम्मुख खींच लाकर, धक्का देकर गिरा दिया। पर चोर का मुँह देखकर घर-भर के लोगों का मुँह सूख गया-अरे, ये तो भट्टाचार्य महाशय हैं!तब कोई तो जल ले आया, कोई पंखे से हवा करने लगा, और कोई उनकी आँखों और मुँह पर हाथ फेरने लगा। उधर घर के भीतर मँझले भइया के साथ भी यही हो रहा था।पंखे की हवा और जल के छींटे खाकर रामकमल होश में आकर लगे फफक-फफक कर रोने। सभी लोग पूछने लगे, “आप इस तरह भागे क्यों जा रहे थे?” भट्टाचार्य महाशय रोते-रोते बोले, “बाबा, बाघ नहीं, वह एक तगड़ा भालू था- छलाँग मारकर बैठकखाने में से बाहर आ गया।”छोटे भइया और जतीन भइया बारम्बार कहने लगे, “भालू नहीं बाबा, एक भेड़िया था, पूँछ समेटे पायन्दाज के ऊपर बैठा गुर्रा रहा था।”मँझले भइया, होश में आते ही अधमिची आँखों से दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए संक्षेप में बोले, “दी रॉयल बंगाल टाइगर।”परन्तु वह है कहाँ? चाहे मँझले भइया का 'दी रॉयल बंगाल' हो, चाहे रामकमल का 'तगड़ा भालू' हो, परन्तु वह यहाँ आया ही किस तरह और चला ही कहाँ गया? जब इतने लोगों ने उसे देखा है तब वह होगा तो कुछ न कुछ अवश्य ही।तब किसी ने विश्वास किया और किसी ने नहीं किया। किन्तु सभी भय-चकित नेत्रों से लालटेन लेकर चारों तरफ खोजने लगे।अकस्मात् पहलवान किशोरसिंह 'वह बैठा है' कहकर एक छलाँग में बरामदे में ऊपर चढ़ गया। उसके बाद वहाँ भी ठेला-ठेली मच गयी। उतने सब लोग बरामदे पर एक साथ चढ़ना चाहते थे, किसी से भी क्षण-भर की देर न सही जाती थी। आँगन के एक तरफ अनार का दरख्त था। मालूम पड़ा कि उसी की घनी डालियों में एक बड़ा जानवर बैठा है। वह बाघ के समान ही मालूम होता था। पलक मारते न मारते सारा बरामदा खाली हो गया और बैठकखाना खचाखच भर गया। बरामदे में एक भी आदमी न रहा। घर की उस भीड़ में से फूफाजी का उत्तेजित कण्ठ स्वर सुन पड़ने लगा, “बरछी लाओ-बन्दूक लाओ।” हमारे मकान के पास के मकान में गगन बाबू के पास एक मुंगेरी बन्दूक थी। उनका लक्ष्य उसी अस्त्र पर था।'लाओ' तो ठीक, किन्तु लाए कौन? अनार का झाड़ था दरवाजे के ही निकट और फिर उस पर बैठा था भेड़िया। हिंदुस्तानी सिटपिटाए तक नहीं और जो लोग तमाशा देखने आए थे वे भी सनाका खींचकर रह गये।ऐसी विपत्ति के समय न जाने कहाँ से इन्द्र आकर उपस्थित हो गया। शायद वह सामने के रास्ते से कहीं जा रहा था और शोरगुल सुनकर अन्दर घुस आया था। पल-भर में सौ कण्ठ एक साथ चीत्कार कर उठे, “ओ रे, बाघ है बाघ! भाग जा रे लड़के, भाग जा!”पहले तो वह हड़बड़ाकर भीतर दौड़ आया किन्तु पलभर बाद ही, सब हाल सुनकर, निर्भय हो, आँगन में उतर लालटेन उठाकर देखने लगा।दुमंजिले की खिड़कियों में से औरतें साँस रोककर इस साहसी लड़के की ओर देख-देखकर 'दुर्गा' नाम जपने लगीं। नीचे भीड़ में खड़े हुए हिंदुस्तानी सिपाही उसे हिम्मत बँधाने लगे और आभास देने लगे कि एकाध हथियार मिलने पर वे भी वहाँ आने को तैयार हैं!अच्छी तरह देखकर इन्द्र ने कहा, “द्वारिका बाबू, यह तो बाघ नहीं मालूम होता।” उसकी बात समाप्त होते न होते वह 'रॉयल बंगाल टाइगर' दोनों हाथ जोड़कर मनुष्य के ही स्वर में रो पड़ा और बोला, “नहीं, बाबूजी, नहीं, मैं बाघ-भालू नहीं, श्रीनाथ बहुरूपिया हूँ।” इन्द्र ठठाकर हँस पड़ा। भट्टाचार्य महाशय खड़ाऊँ हाथ में लिये सबसे आगे दौड़ पड़े-“हरामजादे, तुझे डराने के लिए और कोई जगह नहीं मिली?” फूफाजी ने महाक्रोध से हुक्म दिया, “साले को कान पकड़कर लाओ।”किशोरी सिंह ने उसे सबसे पहले देखा था, इसलिए उसका दावा सबसे प्रबल था। वह गया और उसके कान पकड़कर घसीटता हुआ ले आया। भट्टाचार्य महाशय उसकी पीठ पर जोर-जोर से खड़ाऊँ मारने लगे और गुस्से के मारे दनादन हिंदी बोलने लगे-“इसी हरामजादे बदजात के कारण मेरी हड्डी-पसली चूर हो गयी है। साले पछहियों ने घूँसे मार-मारकर कचूमर निकाल दिया।”श्रीनाथ का मकान बारासत में था। वह हर साल इसी समय एक बार रोजगार करने आता था। कल भी वह इस घर में नारद बनकर गाना सुना गया था। वह कभी भट्टाचार्य महाशय के और कभी फूफाजी के पैर पकड़ने लगा। बोला, “लड़कों ने इतना अधिक भयभीत होकर, और दीवट लुढ़काकर, ऐसा भीषण काण्ड मचा दिया कि मैं स्वयं भी मारे डर के उस वृक्ष की आड़ में जाकर छिप गया। सोचता था कि कुछ शान्ति होने पर, बाहर आकर, अपना स्वाँग दिखाकर जाऊँगा। किन्तु मामला उत्तरोत्तर ऐसा होता गया कि मेरी फिर हिम्मत ही नहीं हुई।”श्रीनाथ आरजू-मिन्नत करने लगा; किन्तु फूफाजी का क्रोध कम हुआ ही नहीं। बुआजी स्वयं ऊपर से बोलीं, “तुम्हारे भाग्य भले थे जो सचमुच का बाघ-भालू नहीं निकला, नहीं, तो जैसे बहादुर तुम और तुम्हारे दरबान हैं- छोड़ दो बेचारे को, और दूर कर दो डयोढ़ी के इन पछहियाँ दरबानों को। एक जरा से लड़के में जो साहस है उतना घर-भर के सब आदमियों में मिलकर भी नहीं है।” फूफाजी ने कोई बात ही न सुनी; वरन् उन्होंने बुआजी के इस अभियोग पर आँखें घुमाकर ऐसा भाव धारण किया कि मानो इच्छा करते ही वे इन सब बातों का काफी और माकूल जवाब दे सकते हैं, परन्तु चूँकि औरतों की बातों का उत्तर देने की कोशिश करना भी पुरुष जाति के लिए अपमानकारक है इसलिए, और भी गरम होकर हुक्म दिया, “इसकी पूँछ काट डालो।” तब उसकी रंगीन कपड़े से लिपटी हुई घास की बनी लम्बी पूँछ काट डाली गयी, और उसे भगा दिया गया। बुआजी ऊपर से गुस्से में बोलीं, “पूँछ को सँभालकर रख छोड़ो, किसी समय काम आएगी!”इन्द्र ने मेरी ओर देखकर कहा, “मालूम पड़ता है, तुम इसी मकान में रहते हो, श्रीकांत!”मैंने कहा, “हाँ, तुम, इतनी रात को कहाँ जाते थे?”इन्द्र हँसकर बोला, “रात कहाँ है रे, अभी तो संध्यास हुई है। मैं जाता हूँ अपनी डोंगी पर मछली पकड़ने। चलता है?”मैंने डरकर पूछा, “इतने अन्धकार में डोंगी पर चढ़ोगे?”वह फिर हँसा, बोला, “डर क्या है रे? इसी में तो मजा है। सिवाय इसके क्या अंधेरा हुए बगैर मछलियाँ पाई जा सकती हैं? तैरना जानता है?”“खूब जानता हूँ।”“तो फिर चल भाई।” यह कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। कहा, “मैं अकेला इतने बहाव में उस तरफ को नाव नहीं ले सकता, ऐसे ही किसी की खोज में था जो डरे नहीं।”मैंने फिर कुछ न कहा। उसका हाथ पकड़े हुए चुपचाप रास्ते पर आ पहुँचा। पहले तो मानो मुझे अपने आप पर ही विश्वास न हुआ कि सचमुच ही उस रात्रि को मैं नाव चलाने जा रहा हूँ, क्योंकि जिस आह्नान के आकर्षण से उस स्तब्ध निबिड़ निशा में, घर के समस्त शासन-पाश को तुच्छ समझकर, अकेला बाहर चला आया था वह कितना बड़ा आकर्षण था, यह उस समय विचारकर देख सकना मेरे लिए साध्यु ही नहीं था। अधिक समय बीतने के पूर्व ही गोसाईं बाग के उस भयंकर वन-पथ के सामने आ उपस्थित हुआ और इन्द्र का अनुसरण करता हुआ स्वप्नाविष्ट पुरुष की भाँति उसे पारकर गंगा के किनारे जा पहुँचा।कंकड़-पत्थरों का खड़ा किनारा है। सिर के ऊपर एक बहुत प्राचीन बरगद का वृक्ष मूर्तिमान अन्धकार के समान चुपचाप खड़ा है और उसी के करीब तीस हाथ नीचे सूचीभेद्य अन्धकार के तल में, पूरी बरसात का गम्भीर जल-स्रोत चट्टानों से टकराकर, भँवरों की रचना करता हुआ, उद्दाम वेग से दौड़ रहा है। देखा कि, उसी स्थान पर इन्द्र की छोटी-सी नाव बँधी हुई है। ऊपर से देखने पर ऐसा मालूम हुआ मानो उस खूब तेज जल-धारा के मुख पर केले के फूल का एक छोटा-सा छिलका लगातार टकरा-टकराकर मर रहा है।मैं स्वयं भी बिल्कुरल डरपोक नहीं था। किन्तु जब इन्द्र ने ऊपर से नीचे तक लटकती हुई एक रस्सी दिखलाकर कहा, “डोंगी की इस रस्सी को पकड़कर चुपचाप नीचे उतर जा; सावधानी से उतरना, फिसल गया तो फिर खोजने से भी तेरा पता नहीं लगेगा।” तब दरअसल मेरी छाती धड़क उठी। जान पड़ा कि यह असम्भव है, फिर भी मेरे लिए तो रस्सी का सहारा है-”किन्तु तुम क्या करोगे?”उसने कहा, “तेरे नीचे जाते ही मैं रस्सी खोल दूँगा और फिर नीचे उतरूँगा। डर की बात नहीं है, मेरे नीचे उतरने के लिए बहुत-सी घास की जड़ें झूल रही हैं।”और कुछ न कहकर मैं रस्सी के सहारे बड़ी सावधानी से बमुश्किल नीचे उतरकर नाव पर बैठ गया। इसके बाद उसने रस्सी खोल दी और वह झूल गया। वह किस चीज के सहारे नीचे उतरने लगा सो मैं आज भी नहीं जानता हूँ! डर के मारे मेरी छाती इतने जोर से धड़कने लगी कि उसकी और मैं देख भी न सका। दो-तीन मिनट तक विपुल जल-धारा के उन्मत्त गर्जन के सिवाय कहीं से कोई शब्द भी नहीं सुनाई दिया। एकाएक एक हलकी-सी हँसी के शब्द से चौंककर मुँह फिराया तो देखता हूँ कि इन्द्र ने दोनों हाथों से डोंगी को जोर से धक्का देकर ठेल दिया है और आप कूदकर उस पर चढ़ बैठा है। क्षुद्र तरी एक चक्कर-सा खाकर नक्षत्र-वेग से बहने लगी।कुछ ही देर में सामने और पीछे सब कुछ सघन अन्धकार से लिप-पुतकर एकाकार हो गया। रह गयी दाहिनी ओर बाईं ओर दोनों सीमाओं तक फैली हुई विपुल उद्दाम जल की धारा, और उसके ऊपर खूब तेजी से चलने वाली वह छोटी-सी नाव और उस पर किशोरवय के दो बालक। यद्यपि प्रकृति देवी के अपरिमेय गम्भीर रूप को समझने की उम्र वह नहीं थी, किन्तु उसे मैं आज भी नहीं भूल सका हूँ। वायुहीन, निष्कम्प, निस्तब्ध, नि:संग, निशीथनी की मानो वह एक विराट काली मूर्ति थी। उसके निबिड़ काले बालों से आकाश और पृथ्वी ढँक गयी थी और उस सूची-भेद्य अन्धकार को विदीर्ण करके, कराल दाढ़ों की रेखा के समान, उस दिगन्त-विस्तृत तीव्र जलधारा से मानो एक तरह की अद्भुत निश्चल द्युति, निष्ठुर दबी हुई हँसी के समान, बिखर रही थी। आसपास और सामने, कहीं तो जल की उन्मत्त धारा तल देश में जाकर तथा ऊपर को उठकर फट पड़ती थी, कहीं परस्पर के प्रतिकूल गति संघात से आवर्तों की रचना करती हुई चक्कर खाती थी, और कहीं अप्रतिहित जल-प्रवाह पागल की तरह दौड़ा जा रहा था।हमारी डोंगी एक कोने से दूसरे कोने की ओर जा रही है, बस इतना ही मालूम हो रहा था। किन्तु उस पार के उस दुर्भेद्य अन्धकार में, किस जगह लक्ष्य स्थिर करके, इन्द्र हाल को पकड़े चुपचाप बैठा है, यह मैं कुछ न जानता था। इस उम्र में वह कितना पक्का माझी बन गया था, इसकी मुझे उस समय कल्पना भी न थी। एकाएक वह बोला-“क्यों रे श्रीकांत, डर लगता है क्या?”मैं बोला, “नहीं।”इन्द्र खुश होकर बोला, “यही तो चाहिए। जब तैरना आता है तब फिर डर किस बात का?” प्रत्युत्तर में मैंने एक छोटे-से नि:श्वास को दबा दिया कि कहीं वह सुन न ले। किन्तु, ऐसी गहरी अंधेरी रात में, ऐसी जल-राशि और ऐसे दुर्जय प्रवाह में, तैरना जानने और न जानने में क्या अन्तर है, सो मेरी समझ में न आ सका। उसने भी और कोई बात नहीं कही। बहुत देर तक इसी तरह चलते रहने के बाद कहीं से कुछ आवाज-सी आई, जो कि अस्फुट और क्षीण थी, किन्तु नौका जैसे-जैसे अग्रसर होने लगी वैसे ही वैसे वह आवाज भी स्पष्ट और प्रबल होने लगी। मानो लोगों का बहुत दूर से आता हुआ क्रुद्ध आह्नान हो- मानो कितने ही बाधा-विघ्नों को लाँघकर, हटाकर, वह आह्नान हमारे कानों तक आ पहुँचा हो। वह आह्नान थका हुआ-सा था, फिर भी न उसमें विराम था और न विच्छेद ही- मानो उनका क्रोध न कम होता था न बढ़ता ही था और न थमना ही चाहता था। बीच-बीच में एकाध दफा 'भप्-भप् शब्द भी होता थ। मैंने पूछा, “इन्द्र यह काहे की आवाज सुन पड़ती है?” उसने नौका का मुँह कुछ और सीधा करके कहा, “जल के प्रवाह से उस पार के कगारे, टूट-टूटकर गिर रहे हैं, उसी का यह शब्द है।”मैंने पूछा, “कितने बड़े कगारे हैं? और कैसा प्रवाह है?”“बड़ा भयानक प्रवाह है। ओह! तभी तो- कल पानी बरस गया है,- आज उसके तले से न गया जाएेगा। कहीं एक भी कगारा गिर पड़ा तो नाव और हम सभी पिस जाँयगे। अच्छा, तू तो डाँड़ चला सकता है न?”“चला सकता हूँ।”“तो चला।”मैंने डाँड़ चलाना शुरू कर दिया। इन्द्र ने कहा, “वही, वही जो बायीं ओर काला-काला दीख पड़ता है, वह चड़ा¹ है। उसके बीच में से एक नहर-सी गयी है, उसी में से होकर निकल जाना होगा- परन्तु बहुत आहिस्ते। अगर कहीं धीवरों को जरा भी पता लग गया, तो फिर लौटना न हो सकेगा। वे लग्गी की मार से सिर फोड़कर इसी कीचड़ में गाड़ देंगे।”यह क्या? मैंने डरते हुए कहा, “तो फिर उस नहर में होकर मत चलो।” इन्द्र ने शायद कुछ हँसकर कहा, “और तो कोई रास्ता ही नहीं है। उसके भीतर होकर तो जाना ही होगा। द्वीप के बायीं ओर की रेहं को ठेलकर तो जहाज भी नहीं जा सकता- फिर हम कैसे जाँयगे? लौटती में वापिस आ सकते हैं किन्तु जा नहीं सकते।”“तो फिर मछलियों के चुराने की जरूरत नहीं है भइया।” कहकर मैंने डाँड़ ऊपर उठा लिया। पलक मारते ही नाव चक्कर खाकर लौट चली। इन्द्र खीझ उठा। उसने आहिस्ते से झिड़कते हुए कहा, “तो फिर आया क्यों? चल-तुझे वापिस पहुँचा आऊँ। कायर कहीं का!” उस समय मैंने चौदह पूरे करके पन्द्रहवें में पैर रक्खा था। मैं कायर? झट से डाँड़ को पानी में फेंककर प्राणप्रण से खेने लगा। इन्द्र खुश होकर बोला, “यही तो चाहिए, किन्तु भाई धीरे-धीरे चलाओ- साले बहुत पाजी हैं। मैं झाऊ के वन के पास से, मकई के खेतों के भीतर होकर, इस तरह बचाकर ले चलूँगा कि सालों को जरा भी पता न पड़ेगा!” फिर कुछ हँसकर बोला, “और यदि सालों को पता लग भी गया तो क्या? पकड़ लेना क्या इतना सहज है? देख श्रीकांत, कुछ भी डर नहीं है- यह ठीक है कि उन सालों की चार नावें हैं- किन्तु यदि देखो कि घिर ही गये हैं, और भाग जाने की कोई जुगत नहीं है, तो चट से कूदकर डुबकी लगा जाना और जितनी दूर तक हो सके उतनी दूर जाकर निकलना, बस काम बन जाएेगा। इस अन्धकार में देख सकने का तो कोई उपाय ही नहीं है- उसके बाद मजे से सतूया के टीले पर चढ़कर भोर के समय तैरकर इस पार आ जाँयगे और गंगा के किनारे-किनारे घर पहुँच जाँयगे- बस, फिर क्या कर लेंगे साले हमारा?”यह नाम मैंने सुना था; कहा, “सतूया का टीला तो 'घोर' नाले के सामने है, वह तो बहुत दूर है।”इन्द्र ने उपेक्षा के भाव से कहा, “कहाँ, बहुत दूर है? छ:-सात कोस भी तो न होगा! तैरते-तैरते यदि हाथ भर आवें तो चित्त होकर सुस्ता लेना; इसके सिवाय, मुर्दे जलाने के काम आए हुए बहुत-से बड़े-बड़े लक्कड़ भी तो बहते मिल जाँयगे।”आत्म-रक्षा का जो सरल रास्ता था सो उसने दिखा दिया, उसमें प्रतिवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। उस अंधेरी रात में, जिसमें दिशाओं का कोई चिह्न नजर न आता था, और उस तेज जल-प्रवाह में, जिसमें जगह-जगह भयानक आवत्त पड़ रहे थे, सात कोस तक तैरकर जाना और फिर भोर होने की प्रतीक्षा करते रहना! सवेरे से पहले इस तरफ के किनारे पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं। दस-पन्द्रह हाथ ऊँचा खड़ा हुआ बालू का कगारा है, जो टूटकर सिर पर आ सकता है,- और इसी तरफ गंगा का प्रवाह भीषण टक्करें लेता हुआ अर्ध्दवृत्ताकार दौड़ा जा रहा है।वस्तुस्थिति का अस्पष्ट आभास पाकर ही मेरा विस्तृत वीर-हृदय सिकुड़कर बिन्दु जैसा रह गया। कुछ देर तक डाँड़ चलाकर मैं बोला, “किन्तु हमारी नाव का क्या होगा?”इन्द्र बोला, “उस दिन भी मैं ठीक इसी तरह भागा था, और उसके दूसरे ही दिन आकर नाव निकाल ले गया था- कह दिया था कि घाट पर से डोंगी चोरी करके कोई और ले आया होगा- मैं नहीं लाया।”तो यह सब इसकी कल्पना ही नहीं है- बिल्कुयल परीक्षा किया हुआ प्रत्यक्ष सत्य है! क्रमश: नौका खाड़ी के सामने आ पहुँची। देख पड़ा कि मछुओं की नावें कतार बाँधकर खाड़ी के मुहाने पर खड़ी हैं और उनमें दीए भी टिमटिमा रहे हैं। दो टीलों के बीच का वह जल-प्रवाह नहर की तरह मालूम होता था। घूमकर हम लोग उस नहर के दूसरे किनारे पर जाकर उपस्थित हो गये। उस जगह जल के वेग से अनेक मुहाने से बन गये हैं और जंगली झाऊ के पेड़ों ने परस्पर एक-दूसरे को ओट में कर रक्खा है। उनमें से एक के भीतर होकर कुछ दूर जाने से ही हम नहर के भीतर जा पहुँचे। धीवरों की नावें वहाँ से दूर पर खड़ी हुई काली-काली झाड़ियों की तरह दिखाई पड़ती थीं। और भी कुछ दूर जाने पर हम उद्दिष्ट स्थान पर पहुँच गये।धीवर देवताओं ने, नहर का सिंहद्वार सुरक्षित है-यह समझकर इस स्थान पर पहरा नहीं रक्खा था। इसे 'माया-जाल' कहते हैं। नहर में जब पानी रहता है तब इस किनारे से लेकर उस किनारे तक ऊँचे-ऊँचे लट्ठ मजबूती से गाड़ दिए जाते हैं और उनके बाहरी ओर जाल टाँग दिया जाता है। बाद में वर्षा के समय, जब जल के प्रवाह में बड़े-बड़े रोहू, कातला आदि मच्छ बह कर आते हैं, तब इन लट्ठों से बाधा पाकर वे कूदकर इस बाजू आ जाना चाहते हैं और डोरी के जाल में फँस जाते हैं।दस-पन्द्रह बीस सेर के पाँच-छह रोहू-कातला मच्छ दम-भर में पकड़कर इन्द्र ने नाव पर रख लिये। विराटकाय मच्छराज अपनी पूँछों की फटकार से हमारी उस छोटी-सी नौका को चूर्ण-विचूर्ण कर डालने का उपक्रम करने लगे और उनका शब्द भी कुछ कम नहीं हुआ।“इतनी मछलियों का क्या होगा, भाई?”“जरूरत है। बस, अब और नहीं, चलो भाग चलें।” कहकर उसने जाल छोड़ दिया। अब डाँड़ चलाने की जरूरत नहीं रही। मैं चुपचाप बैठ रहा। उसी प्रकार छिपे-छिपे उसी रास्ते से बाहर जाना था। अनुकूल बहाव में दो-तीन मिनट प्रखर गति से बहने के उपरान्त, एकाएक एक स्थान पर मानो जरा धक्का खाकर, हमारी वह छोटी डोंगी पास के मकई के खेत में प्रवेश कर गयी। उसके इस आकस्मिक गति-परिवर्तन से मैंने चकित होकर पूछा, “क्यों? क्या हुआ?”इन्द्र ने एक ओर धक्का देकर, उसे कुछ और भी अन्दर ले जाते हुए कहा, “चुप, सालों को मालूम हो गया है- चार नावों को खोलकर साले यहीं आ रहे हैं-वह देखो।” इन्द्र ठीक कह रहा था। जोर के साथ जल को काटती और 'छप-छप्' शब्द करती हुई तीन नौकाएँ हमें निगल जाने के लिए कृष्णकाय दैत्यों के समान दौड़ी आ रही थीं। उस तरफ तो जाल से रास्ता बन्द था; और इस तरफ से ये लोग आ रहे थे- भागकर छुटकारा पाने का जरा-सा भी अवकाश नहीं था। इस मकई के खेत के बीच अपने आपको छिपाया जा सकेगा, यह भी मुझे सम्भव नहीं जान पड़ा।“अब क्या होगा भाई।” कहते-कहते ही अदम्य वाष्पोच्छवास से मेरा कण्ठ रुद्ध हो गया। इस अन्धकार में, इस पिंजरे के भीतर, अगर ये लोग हमारा खून करके भी इस खेत में गाड़ दें, तो इन्हें कौन रोकेगा?”इसके पहले पाँच-छह बार इन्द्र 'चोरी की विद्या बड़ी विद्या है', इस बात को सप्रमाण सिद्ध करके निर्विघ्न निकल गया था; इतने दिन, पीछा किये जाने पर भी हाथ न आया था, किन्तु आज?उसने मुख से कहा कि, “डर की कोई बात नहीं है।” किन्तु मानो गला उसका काँप गया। किन्तु वह रुका नहीं, प्राण-प्रण से लग्गी ठेलकर धीरे-धीरे भीतर छिपने की चेष्टा करने लगा। समस्त टीका जलमय हो गया था। उसके ऊपर आठ-आठ, दस-दस हाथ लम्बे मकई और ज्वार के पेड़ थे और भीतर हम दोनों चोर। कहीं तो पानी छाती तक था, कहीं कमर तक और कहीं घुटनों से अधिक नहीं। ऊपर निबिड़ अन्धकार और आगे-पीछे दायें-बायें निर्भेद्य जंगल। लग्गी कीचड़ में धाँसने लगी और डोंगी अब एक हाथ भी आगे नहीं बढ़ती। पीछे से धीवरों की अस्पष्ट बातचीत कानों में आने लगी। इस बात में अब जरा भी संशय नहीं रहा कि कुछ संदेह करके ही वे लोग चले हैं और अब भी खोजते फिर रहे हैं।सहसा डोंगी एक ओर कुछ झुककर सीधी हो गयी। आँख उठाकर देखा कि मैं अकेला ही रह गया हूँ, दूसरा व्यक्ति नहीं है। डरते हुए मैंने आवाज दी, “इन्द्र।” पाँच-छह हाथ दूर वन के बीच से आवाज आई, “मैं नीचे हूँ।”“नीचे क्यों?”“डोंगी खींचकर निकालनी होगी। मेरी कमर से रस्सी बँधी है।”“खींचकर कहाँ ले जाओगे?”“उस गंगा में। थोड़ी ही दूर ले जाने पर बड़ी धारा मिल जाएेगी।”सुनकर मैं चुप हो गया और क्रम-क्रम से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। अकस्मात् कुछ दूर पर वन के बीच कनस्तर पीटने और फटे बाँसों के फटाफट शब्द से मैं चौंक उठा। डरते हुए मैंने पूछा, “वह क्या है भाई?” उसने उत्तर दिया, “खेतिहर लोग मचान पर बैठे हुए जंगली सूअरों को भगा रहे हैं।”“जंगली सूअर! कहाँ हैं वे?” इन्द्र नाव खींचते-खींचते लापरवाही से बोला, “मुझे क्या दीख पड़ते हैं, जो बताऊँ? होंगे यहीं कहीं।” जवाब सुनकर मैं स्तब्ध हो रहा। सोचा, किसका मुँह देखा था आज सुबह! सरेशाम ही तो आज घर के भीतर बाघ के हाथ पड़ गया था, अब यदि इस जंगल में बनैले सूअरों के हाथ पड़ जाऊँ, तो इसमें विचित्र ही क्या है? फिर भी मैं तो नाव में बैठा हूँ, किन्तु, यह आदमी, छाती तक कीचड़ और जल में, इस जंगल के भीतर खड़ा है! एक कदम हिलने-डुलने का उपाय भी तो इसके पास नहीं है! कोई पन्द्रह मिनट इसी तरह सोच-विचार में निकल गये। और भी एक वस्तु पर मैं ध्यायन दे रहा था। अक्सर देखता था कि पास ही किसी न किसी ज्वार या मकई के पेड़ का अगला हिस्सा एकाएक हिलने लगता था और 'छप-छप' शब्द होता था। एक दफे तो मेरे हाथ के पास ही हरकत हुई। सशंक होकर उस तरफ मैंने इन्द्र का ध्या न आकर्षित किया कि “बड़ा सूअर न सही, कोई बच्चा-कच्चा हो नहीं है?”इन्द्र ने अत्यन्त सहज भाव से उत्तर दिया, “वह, कुछ नहीं-साँप लिपटे हैं; आहट पाकर जल में कूद पड़ते हैं।”“कुछ नहीं, साँप!” काँपकर मैं नाव के बीच सिकुड़कर बैठ गया। अस्फुट स्वर में पूछा, “कैसे साँप भाई?”इन्द्र ने कहा, “सब किस्म के साँप हैं!-टोंडा, बोंडा, कौंडियाल, काले आदि। पानी में बहते-बहते आए और झाड़ों में लिपट रहे- कहीं भी तो सूखी जमीन नहीं है, देखते नहीं हो?”“सो तो देखता हूँ।” भय के मारे मेरे तो पैरों के नख से लेकर सिर के बाल तक खड़े हो गये। परन्तु उस भले मानुस ने भूरक्षेप तक न किया, अपना काम करते-करते ही वह कहने लगा, “किन्तु ये काटते नहीं है। ये खुद ही बेचारे डर के मारे मरे जा रहे हैं, दो-तीन तो मेरे ही शरीर को छूते हुए भाग गये हैं। कई एक तो खूब मोटे हैं, मालूम पड़ता है कि वे टोंडा, बोंडा होंगे। और यदि कदाचित् काट ही खायँ, तो क्या किया जाए, मरना तो एक दिन होगा ही भाई! इसी प्रकार वह और भी कुछ अपने मृदु स्वाभाविक कण्ठ से बोलता रहा, मेरे कानों तक कुछ तो पहुँचा और कुछ नहीं पहुँचा। मैं निर्वाक्, निष्पन्द काठ के समान जड़ होकर एक ही स्थान पर एक ही भाव से बैठा रहा। श्वास छोड़ने में भी मानो भय मालूम होने लगा- 'छप' से कहीं कोई मेरी नाव में ही न आ गिरे।और चाहे जो हो, किन्तु वह क्या आदमी है?, मनुष्य देवता, पिशाच-वह क्या है? किसके साथ मैं इस जंगल में घूम रहा हूँ? यदि मनुष्य है तो क्या वह नहीं जानता कि इस विश्व-संसार में भय नाम की भी कोई चीज होती है? हृदय क्या उसका पत्थर से बना है? क्या वह हमारी ही तरह सिकुड़ता-फैलता नहीं है? तो फिर उस दिन, खेल के मैदान में, सबके भाग जाने पर, बिल्कुशल अपरिचित होते हुए भी, मुझे अकेले को निर्विघ्न बाहर निकाल देने के लिए जो वह शत्रुओं के मध्यद में घुस आया था, सो क्या वह दया-माया भी इस पत्थर में ही विनिहित थी? और आज विपत्ति का सब हाल राई-राई, तिल-तिल, जानते-सुनते हुए भी चुपचाप अकुंठित चित्त से वह इस भयावह और अति भीषण मृत्यु के मुख में उतरकर खड़ा है। एक बार मुँह से यह भी नहीं कहता कि “श्रीकांत भाई, एक बार तू नीचे उतर आ।” वह तो मुझे जबरन नीचे उतारकर नौका खिंचवा सकता था। यह केवल खेल तो है नहीं! जीवन और मृत्यु के आमने-सामने खड़े होकर इस उम्र में, ऐसा स्वार्थ-त्याग कितने आदमियों ने किया है? बिना आडम्बर के कितने सहज भाव से उसने कह दिया कि, 'मरना तो एक दिन होगा ही भाई।' कितने लोग ऐसी सच बात कहते दिखाई देते हैं? यह सच है कि इस विपत्ति में वही मुझे खींच लाया है, फिर भी उसके इतने बड़े स्वार्थ-त्याग को मनुष्य की देह धारण करते हुए मैं किस तरह भूल जाऊँ भला? किस तरह भूलूँ उसे,- जिसके हृदय के भीतर से इतना बड़ा अयाचित दान इतनी सरलता से बाहर आ गया? उस हृदय को किसने किस चीज से गढ़ा होगा? उसके बाद कितने काल और कितने सुख-दु:खों में से होकर मैं आज इस बुढ़ापे को प्राप्त हुआ हूँ। कितने देश, कितने प्रान्त, कितने नद-नदी, पहाड़-पर्वत, वन-जंगल, घूमा फिरा हूँ-कितने प्रकार के मनुष्य इन दो आँखों के सामने से गुजर गये हैं- किन्तु इतना बड़ा महाप्राण व्यक्ति तो और कभी देखने को नहीं मिला! परन्तु वह अब नहीं रहा, अकस्मात् एक दिन मानो बुद्बु की तरह शून्य में मिल गया। आज उसकी याद आते ही दोनों सूखी आँखें जल से भर आती हैं, केवल एक निष्फल अभिमान हृदय के तल-देश को आलोड़ित करके ऊपर की ओर फेन के माफिक तैर आता है। हे सृष्टिकर्ता! क्यों तूने उस अद्भुत, अपार्थिव वस्तु को सृष्ट करके भेजा था और इस प्रकार व्यर्थ करके क्यों उसे वापिस बुला लिया? बड़ी ही व्यथा से मेरा यह असहिष्णु मन आज बारम्बार यही प्रश्न करता है- भगवान! तुम्हें रुपया-पैसा, धन-दौलत, विद्या-बुद्धि तो अपने अखूट, भंडार से ढेर की ढेर देते हुए देखता हूँ किन्तु इतने बड़े महाप्राण व्यक्ति आज तक तुम कितने दे सके हो? खैर, जाने दो इस बात को। घोर जल-कल्लोल क्रमश: पास में आता-जाता है, इस बात को मैं जान रहा था; इसलिए और कोई सवाल किये बगैर मैंने समझ लिया कि इस जंगल के बीच में ही वह भीषण प्रवाह प्रवाहि‍त हो रहा है जिसको स्टीमर भी पार नहीं कर पाते। मैं खूब अनुभव कर रहा था कि पानी का वेग बढ़ रहा है और धूसर वर्ण का फेन का पुंज विस्तृत रेत-राशि का भ्रम उत्पन्न कर रहा है। इन्द्र नौका पर चढ़ आया और डाँड़ को हाथ में लेकर सामने के उद्दाम स्रोत का सामना करने को तैयार हो बैठा। वह बोला, “अब कोई डर नहीं है, हम बड़ी गंगा में आ पहुँचे हैं।” मैंने मन ही मन कहा- अब, डर नहीं है तो अच्छा है। किन्तु डर तुम्हें काहे का है सो तो मैं समझा ही नहीं। क्षण-भर बाद ही नौका एक बार मानो सिर से पैर तक काँप उठी और पलक मारने के पहले ही मैंने देखा कि वह बड़ी गंगा के स्रोत में पड़कर उल्का के वेग से दौड़ी जा रही है।उस समय छिन्न बादलों की आड़ में मालूम हुआ, मानो चन्द्रमा उदय हो रहा है क्योंकि जैसे अन्धकार में हम अभी तक यात्रा करते आ रहे थे वैसा अन्धकार अब नहीं रहा था। अब बहुत दूर तक, चाहे साफ भले ही न हो, दिखाई देने लगा था। मैंने देखा जंगली झाऊ और मकई-जुआरवाला टीला दाहिनी ओर छोड़कर हमारी नाव सीधी चली जा रही है।♦♦ • ♦♦“बहुत जोर से नींद आ रही है इन्द्र, अब घर लौट चलो भाई!” इन्द्र ने कुछ हँसकर ठीक स्त्री-सुलभ स्नेहार्द्र कोमल स्वर में कहा, “नींद आने की तो बात ही है भइया, पर क्या किया जाए श्रीकांत आज तो कुछ देर होगी ही- अभी बहुत-सा काम पड़ा है। अच्छा एक काम करो न, इसी जगह थोड़ा-सा लेट लो।”दुबारा अनुरोध की जरूरत ही नहीं हुई, मैं गुड़मुड़ होकर उसी स्थान पर लेट गया। परन्तु नींद नहीं आई। अधामुँदी आँखों से मैं चुपचाप आकाश में बादलों और चाँद की आँख-मिचौनी देखने लगा। यह डूबा, वह निकला, फिर डूबा, हँसा। और कान में आने लगी जल-प्रवाह की, वही सतत हुंकार। यह एक ही बात प्राय: मेरे मन में आया करती है कि मैं उस दिन इस प्रकार सब कुछ भूल-भालकर बादलों और चन्द्रमा के बीच कैसे डूब गया था? तन्मय होकर चाँद देखने की अवस्था तो मेरी उस समय थी नहीं। किन्तु बड़े-बूढ़े लोग पृथ्वी के अनेक व्यापार देख-सुनकर कहा करते हैं कि यह बाहरी चाँद कुछ नहीं है, बादल भी कुछ नहीं है- सब माया है, मिथ्या है, दरअसल कुछ चीज है तो यह अपना मन है। वह जब जिसे जो दिखता है विभोर होकर तब वह केवल वही देखता है। मेरी भी यही दशा थी। इतने प्रकार की भयंकर घटनाओं में से, इस प्रकार सही-सलामत बाहर निकल आने के उपरान्त, मेरा निर्जीव मन, उस समय, शायद, ऐसी ही किसी एक शान्त तसवीर के भीतर विश्राम लेना चाहता था।इतने में घण्टे-दो घण्टे निकल गये, जिनकी मुझे खबर ही नहीं हुई। एकाएक मुझे मालूम हुआ कि मानो चाँद बादलों के बीच एक लम्बी डुबकी लगा गया है, और एकाएक दाहिनी ओर से बाईं ओर जाकर अपना मुँह बाहर निकाल रहा है। गर्दन कुछ ऊपर उठाकर देखा, नौका अब उस पार जाने की तैयारी में है। प्रश्न करने अथवा कुछ कहने का उद्यम भी, शायद उस समय मुझमें शेष नहीं था; इसलिए मैं फिर उसी तरह लेट गया। फिर वही आँखें भरकर प्रवाह का गर्जन-तर्जन देखने-सुनने लगा। शायद इस तरह एक घण्टा और भी बीत गया।खस्-से-रेत के टीले पर नौका टकराई। व्यस्त होकर मैं उठकर बैठ गया। अरे, यह तो इस पार आ पहुँचे। परन्तु यह जगह कौन-सी है? घर मेरा कितनी दूर है? रेत के ढेर के सिवाय और तो कहीं कुछ दीख ही नहीं रहा है? सवाल करने के पहले ही एकाएक कहीं पास ही कुत्तों का भूँकना सुनकर मैं और भी सीधा होकर बैठ गया। निश्चय ही कहीं पास में बस्ती है।इन्द्र बोला, “तनिक ठहर श्रीकांत, मैं थोड़ा-सा घूमकर अभी लौट आऊँगा- तुझे अब कुछ डर नहीं है। इस कगारे के उस पार ही धीवरों के मकान हैं।”साहस की इतनी परीक्षाएँ पास करने के उपरान्त अन्त में यहाँ आकर फेल हो जाने की मेरी बिल्कुनल इच्छा नहीं थी; और खास करके मनुष्य की इस किशोर अवस्था में, जिसके समान महा-विस्मयकारी वस्तु संसार में शायद और कोई नहीं है। एक तो वैसे ही मनुष्य की मानसिक गतिविधि बहुत ही दुर्जेय होती है; और फिर किशोर-किशोरी के मन का भाव तो, मैं समझता हूँ, बिल्कुनल ही अज्ञेय है। इसीलिए शायद, श्रीवृन्दावन के उन किशोर-किशोरी की किशोरलीला चिरकाल से ऐसे रहस्य से आच्छादित चली आती है। बुद्धि के द्वारा ग्राह्य न कर सकने के कारण किसी ने उसे कहा, 'अच्छी' किसी ने कहा, 'बुरी'-किसी ने 'नीति' की दुहाई दी, किसी ने 'रुचि' की और किसी ने कोई भी बात न सुनी-वे तर्क-वितर्क के समस्त घेरों का उल्लघंन कर बाहर हो गये। जो बाहर हो गये, वे डूब गये, पागल हो गये; और नाचकर, रोकर, गाकर-एकाकार करके संसार को उन्होंने मानो एक पागलखाना बना छोड़ा। तब, जिन लोगों ने 'बुरी' कहकर गालियाँ दी थीं उन्होंने भी कहा कि- और चाहे जो हो किन्तु, ऐसा रस का झरना और कहीं नहीं है। जिनकी 'रुचि' के साथ इस लीला का मेल नहीं मिलता था उन्होंने भी स्वीकार किया- इस पागलों के दल को छोड़कर हमने ऐसा गान और कहीं नहीं सुना। किन्तु यह घटना जिस आश्रय को लेकर घटित हुई, जो सदा पुरातन है, और साथ ही चिर-नूतन भी- वृन्दावन के वन-वन में होने वाली किशोर-किशोरी की उस सुन्दरतम लीला का अन्त किसने कब खोज पाया है, जिसके निकट वेदान्त तुच्छ है और मुक्ति-फल जिसकी तुलना में बारिश के आगे वारि-बिन्दु के समान क्षुद्र है! न किसी ने खोज पाया है और न कोई कभी खोज पायेगा। इसीलिए तो मैंने कहा कि उस समय मेरी वही किशोर अवस्था थी। भले ही उस समय यौवन का तेज और दृढ़ता न आई हो, परन्तु फिर भी उसका दम्भ तो आकर हाजिर हो गया था! आत्मसम्मान की आकांक्षा तो हृदय में सजग हो गयी थी! उस समय अपने सखा के निकट अपने को कौन डरपोक सिद्ध करना चाहेगा? इसलिए मैंने उसी दम जवाब दिया, “मैं डरूँगा क्यों? अच्छा तो है, जाओ।” इन्द्र ने और दूसरा वाक्य खर्च न किया और वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अदृश्य हो गया।ऊपर सिर पर अन्धकार-प्रकाश की वह आँख-मिचौनी हो रही थी, पीछे बहुत दूर तक अविश्रान्त सतत गर्जन-तर्जन हो रहा था और सामने वही रेती का किनारा था। यह कौन स्थान है, सोच ही रहा था कि इन्द्र दौड़ता हुआ आकर खड़ा हो गया। बोला, “श्रीकांत, तुझसे एक बात कहने को लौट आया हूँ। यदि कोई मच्छ माँगने आवे तो खबरदार देना नहीं- कहे देता हूँ, खबरदार, हरगिज न देना। ठीक मेरे समान रूप बनाकर यदि कोई आवे, तो भी मत देना। कहना, तेरे मुँह पर धूल, इच्छा हो तो तू खुद ही उठा ले जा, खबरदार! हाथ से किसी को उठाकर न देना, भले ही मैं ही क्यों न होऊँ- खबरदार!”“क्यों भाई?”“लौटने पर बताऊँगा- किन्तु खबरदार।” यह कहते-कहते वह जैसे आया था वैसे ही दौड़ता हुआ चला गया।इस दफे नख से शिख तक मेरे सब रोंगटे खड़े हो गये। जान पड़ा कि मानो शरीर की प्रत्येक शिरा उपशिरा में से बरफ का गला हुआ पानी बह चला है। मैं बिल्कुयल बच्चा तो था नहीं, जो उसके इशारे का मतलब बिल्कुंल न भाँप सकता! मेरे जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं जिनकी तुलना में यह घटना समुद्र के आगे गौ के खुर के गढ़े में भरे हुए पानी के समान थी। किन्तु फिर भी इस रात्रि की यात्रा में जो भय मैंने अनुभव किया, उसे भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मालूम होता था कि भय के मारे होश-हवास गुम करने की अन्तिम सीढ़ी पर आकर ही मैंने पैर रख दिया है। प्रतिक्षण जान पड़ता था कि कगार के उस तरफ से मानो कोई झाँक-झाँककर देख रहा है। जैसे ही मैं तिरछी दृष्टि से देखता हूँ, वैसे ही मानो वह सिर नीचा करके छिप जाता है।समय कटता नहीं था। मानो इन्द्र ने जाने कितने युग हुए चला गया है- और लौट नहीं रहा है।ऐसा मालूम हुआ मानो किसी मनुष्य की आवाज सुनी हो। जनेऊ को अंगूठे में सैकड़ों बार लपेटकर मुख नीचा करके कान खड़े करके सुनने लगा। गले की आवाज क्रमश: अधिक साफ होने लगी, अच्छी तरह मालूम पड़ने लगा कि दो-तीन आदमी बातचीत करते हुए इसी तरह आ रहे हैं। उनमें से एक तो इन्द्र है और बाकी दो हिंदुस्तानी। वे हों चाहे जो, किन्तु उनके मुख की ओर देखने के पूर्व मैंने यह अच्छी तरह देख लिया कि चाँदनी में उनकी छाया जमीन पर पड़ी है या नहीं! क्योंकि इस अवि-संवादी सत्य को मैं छुटपन से ही अच्छी तरह जानता था कि 'उन लोगों' (भूतों) की छाया नहीं पड़ती!”आ:, यह तो छाया है! उतनी ही साफ, फिर भी छाया है! संसार में उस दिन किसी भी आदमी ने और किसी वस्तु को देखकर, क्या मेरे जैसी तृप्ति पाई होगी? पाई हो या न पाई हो, परन्तु यह बात तो मैं बाजी लगाकर कह सकता हूँ कि दृष्टि का चरम आनन्द जिसे कहते हैं, वह यही था। जो लोग आए उन्होंने असाधारण तेजी से उन बड़े-बड़े मच्छों को नाव में से उठाकर एक जाल जैसे वस्त्र के टुकड़े में बाँध लिया, और उसके बदले में उन्होंने इन्द्र की मुट्ठी में जो कुछ थमा दिया उसने 'खन्' से एक मृदु-मधुर शब्द करके अपना परिचय भी मेरे आगे पूर्णत: गुप्त न रहने दिया।इन्द्र ने नाव खोल दी; परन्तु बहाव में नहीं छोड़ी। धार के पास-पास, प्रवाह के प्रतिकूल, लग्गी से ठेलते हुए वह धीरे-धीरे अग्रसर होने लगा।मैंने कोई बात नहीं कही, क्योंकि मेरा मन उस समय उसके विरुद्ध घृणा के भाव से और एक प्रकार के क्षोभ से लबालब भर गया था। किन्तु यह क्या! अभी-अभी ही तो उसे चन्द्रमा के प्रकाश में छाया डालते हुए, लौटते देखकर अधीर आनन्द से दौड़कर छाती से लगा लेने के लिए उन्मुख हो उठा था!हाँ, सो मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। तनिक-सा दोष देखते ही, कुछ क्षणपूर्व की सभी बातें भूलते उसे कितनी-सी देर लगती है! राम! राम! राम! उसने इस तरह रुपये प्राप्त किये! अब तक मछली चुराने का यह व्यापार मेरे मन में, बहुत स्पष्ट तौर से, चोरी के रूप में शायद स्थान न पा सका था! क्योंकि लड़कपन से ही, रुपये पैसों की चोरी ही मानो वास्तविक चोरी है-और सब, अनीती भले ही हो किन्तु, न जाने क्यों ठीक-ठीक चोरी नहीं है- इस तरह की अद्भुत धारणा प्राय: सभी लड़कों की होती है। मेरी भी यही धारणा थी। ऐसा न होता तो इस 'खन्' शब्द के कान में जाते ही इतने समय का इतना वीरत्व, इतना पौरुष, सब कुछ क्षण-भर में इस प्रकार शुष्क तृण के समान न झड़ जाता। यदि उन मच्छों को गंगा में फेंक दिया जाता- अथवा और कुछ किया जाता- केवल रुपयों के साथ उनका संसर्ग घटित न होता, फिर भी हमारी उस मत्स्य-संग्रह-यात्रा को कोई 'चोरी' कहकर पुकारता, तो शायद गुस्से में आकर मैं उसका सिर फोड़ देता और समझता कि उसने वास्तव में जो सजा मिलनी चाहिए वही पाई है- किन्तु राम! राम! यह क्या! यह काम तो जेलखाने के कैदी किया करते हैं!इन्द्र ने बात शुरू की पूछा, “तुझे दूसरा भी डर न लगा, क्यों रे श्रीकांत?”मैंने संक्षेप में जवाब दिया, “नहीं!”इन्द्र बोला, “किन्तु तेरे सिवा वहाँ और कोई बैठा न रह सकता, यह जानता है तू? तुझे मैं खूब प्यार करता हूँ- मेरा ऐसा दोस्त और कोई नहीं है। मैं अब जब आऊँगा, सिर्फ तुझे ही लाऊँगा। क्यों?”मैंने जवाब नहीं दिया। किन्तु इसी समय उसके मुख पर तुरंत के मेघ मुक्त चन्द्रमा का जो प्रकाश पड़ा, उससे मुख पर जो कुछ दिखाई दिया उससे एकाएक मैं अपना इतनी देर का सब क्रोध, क्षोभ भूल गया। मैंने पूछा, “अच्छा इन्द्र, तुमने कभी 'उन सब को1 देखा है?”“किन सबको?”“वही जो मच्छ माँगने आते हैं?”“नहीं भाई, देखा तो नहीं है, लेकिन लोग जो कहते हैं वह सुना है।”“अच्छा तुम यहाँ अकेले आ सकते हो?”इन्द्र हँसा, बोला, “मैं तो अकेला ही आया करता हूँ।”“डर नहीं लगता?”“नहीं राम का नाम लेता हूँ, फिर वे किसी तरह नहीं आ सकते।”कुछ देर रुककर फिर कहना शुरू किया, “राम-नाम क्या कोई साधारण चीज है रे? यदि तू राम का नाम लेते-लेते साँप के मुँह में चला जाए, तो तेरा कुछ न बिगडेग़ा। देखेगा, कि मारे डर के सभी रास्ता छोड़कर भागने लगे हैं। किन्तु डरने से काम नहीं चलता। तब तो वे जान जाते हैं कि, यह सिर्फ चालाकी कर रहा है-वे सब अन्तर्यामी जो हैं!”रेती का किनारा खत्म होते ही कंकड़ों का किनारा शुरू हो गया। उस पार की अपेक्षा इस पार पानी का बहाव बहुत कम था। बल्कि यहाँ तो मालूम हुआ मानो बहाव उलटी तरफ जा रहा है। इन्द्र ने लग्गी उठाकर कर्ण (पतवार) हाथ में लेते हुए कहा, “वह जो सामने वन सरीखा दीख पड़ता है, उसी में से होकर हमें जाना है। यहाँ जरा मैं उतरूँगा। जाऊँगा और आ जाऊँगा। देर न लगेगी। क्यों उतर जाऊँ?”1. 'उन सब' से तात्पर्य भूतों का है। बंगाल में प्रवाद है कि अकेले में भूत मछली माँगने आते हैं।इच्छा ने रहते भी मैंने कहा, 'अच्छा' क्योंकि 'नहीं' कहने का रास्ता तो मैं एक प्रकार से आप ही बन्द कर चुका था। और अब इन्द्र भी मेरी निर्भीकता के सम्बन्ध में शायद निश्चिन्त हो गया था। परन्तु बात मुझे अच्छी न लगी। यहाँ से वह जगह ऐसी जंगल सरीखी अंधेरी दीख पड़ती थी कि अभी-अभी राम-नाम का असाधारण माहात्म्य श्रवण करके भी, उस अंधकार में, प्राचीन वट-वृक्ष के नीचे, डोंगी के ऊपर अकेले बैठे रहकर, इतनी रात को राम-नाम का शक्ति-सामर्थ्य जाँच करने की मेरी जरा भी प्रवृत्ति नहीं हुई और शरीर में कँपकँपी होने लगी। यह ठीक है कि मछलियाँ और नहीं थीं, इसलिए मछली लेने वालों का शुभागमन न हो सकेगा, किन्तु उन सबका लोभ मछलियों के ऊपर ही है, यह भी कौन कह सकता है? मनुष्य की गर्दन मरोड़ कर गुनगुना रक्त पीने और मांस खाने का इतिहास भी तो सुना गया है!बहाव की अनुकूलता और डाँड़ की ताड़ना से डोंगी सर्राटे से आगे बढ़ने लगी। और भी कुछ देर जाते ही, दाहिनी बाजू का गर्दन तक डूबा हुआ जंगली झाऊ और काँस का वन माथा उठाकर हम दोनों असीम-साहसी मानव-शिशुओं की तरफ विस्मय से स्तब्ध हो देखता रहा और उसमें से कोई-कोई झाड़ तो सिर हिलाकर मानो अपना निषेध जताने लगा! बाईं ओर भी उन्हीं के आत्मीय परिजन खूब ऊँचे कंकरीले किनारों पर फैले हुए थे; वे भी उसी भाव से देखते रहे और उसी तरह मना करने लगे। मैं अगर अकेला होता तो निश्चय से उनका यह संकेत अमान्य नहीं करता; परन्तु मेरा कर्णधार जो था, उसके निकट ऐसा मालूम हुआ कि मानो एक राम-नाम के जोर से उनके समस्त आवेदन-निवेदन एक बार ही व्यर्थ हो गये। उसने किसी तरफ भौंहें तक न फिराईं। दाहिनी ओर के टीले के अधिक विस्तार के कारण यह जगह एक छोटी-मोटी झील के समान हो गयी थी- सिर्फ उत्तर की ओर का मुँह खुला हुआ था। मैंने पूछा, “अच्छा, नाव को बाँधकर ऊपर जाने का घाट तो है नहीं, तुम जाओगे किस तरह?”इन्द्र बोला, “यह जो बड़का वृक्ष है, उसके पास में ही एक छोटा-सा घाटहै।”कुछ देर से न जाने कैसी दुर्गन्ध बीच-बीच में हवा के साथ नाक तक आ रही थी। एकाएक एक हवा के झोंके के साथ वह दुर्गन्ध इतनी निकट होकर नाक में लगी कि असह्य हो गयी। जितना ही आगे बढ़ते थे, उतनी ही वह बढ़ती थी। नाक पर कपड़ा दबाते हुए मैं बोला, “निश्चय से कुछ सड़ गया है, इन्द्र।”इन्द्र बोला, “मुर्दे सड़ गये हैं। आजकल भयानक कालरा जो फैल रहा है। सभी तो लाशों को जला पाते नहीं, मुँह पर जरा आग छुआकर छोड़कर चले जाते हैं। सियार और कुत्ते उन्हें खाते हैं- और वे सड़ती हैं। उन्हीं की तो यह इतनी गन्ध है।”“लाशों को किस जगह फेंक जाते हैं, भइया?”“वहाँ से लेकर यहाँ तक- सब ही तो श्मशान हैं। जहाँ चाहें फेंक देते हैं और इस बड़के नीचे के घाट पर स्नान करके घर चले जाते हैं। अरे दुर! डर क्या है रे! वे सियार-सियार आपस में लड़ रहे हैं। अच्छा, आ-आ, मेरे पास आकर बैठ।”“मेरे गले से आवाज न निकलती थी- किसी तरह मैं घिसटकर उसकी गोद के निकट जाकर बैठ गया। पल-भर के लिए मुझे स्पर्श करके और हँसकर वह बोला, “डर क्या है श्रीकांत, कितनी दफे रात को मैं इस रास्ते आया-गया हूँ। तीन बार राम का नाम लेने से फिर किसकी ताकत है जो पास में फटके?”उसे स्पर्श करके मानो मेरी देह में जरा चेतना आई। मैंने अस्फुट स्वर में कहा, “नहीं भाई, तुम्हारे दोनों पैर पड़ता हूँ, यहाँ पर कहीं मत उतरो- सीधे ही चले चलो।”उसने फिर मेरे कन्धों पर हाथ रखकर कहा, “नहीं श्रीकांत, एक दफे जाना ही पड़ेगा। यह रुपये दिए बिना काम न चलेगा- वे बैठे राह देख रहे होंगे- मैं तीन दिन से नहीं आ पाया।”“रुपये कल न दे देना भाई!”“नहीं भाई, ऐसी बात न कर। मेरे साथ तू भी चल- किन्तु किसी से यह बात कहना मत।”मैं धीरे से 'ना' कहकर उसे उसी तरह स्पर्श किये हुए, पत्थर की नाईं बैठा रहा। गला सूखकर काठ हो गया था। किन्तु हाथ बढ़ाकर पानी पी लूँ, या हिलने-डोलने की कोई चेष्टा करूँ, यह शक्ति ही नहीं रही थी।पेड़ों की छाया के बीच में आ पड़ने से पास ही वह घाट दीख पड़ा। जहाँ हमें नीचे उतरना था वह स्थान, ऊपर पेड़ वगैरह न होने से, म्लान ज्योत्सरना के प्रकाश में भी खूब प्रकाशमान हो रहा था- यह देखकर इतने दु:ख में भी मुझे आराम मिला। घाट के कंकड़ों में जाकर डोंगी धक्का न खा जाए, इसलिए इन्द्र पहले से ही उतरने के लिए प्रस्तुत होकर डोंगी के मुँह के पास तक खिसक आया था। किनारे लगते न लगते वह उस पर से फाँद पड़ा; पर फाँदते ही भयभीत स्वर से 'उफ' कर उठा। मैं उसके पीछे ही था, इसलिए दोनों की नजर उस वस्तु पर प्राय: एक ही साथ पड़ी। उस समय वह नीचे था और मैं नौका के ऊपर।शायद मेरे जीवन में 'अकाल-मृत्यु' कभी उतने करुणा रूप में नजर नहीं आई थी। वह कितनी बड़ी व्यथा का कारण होती है, यह बात, उस तरह न देखी जाए तो, शायद और तरह से जानी ही नहीं जा सकती। गम्भीर रात्रि में चारों दिशाएँ निबिड़ स्तब्धता से परिपूर्ण थीं। सिर्फ बीच-बीच में झाड़-झंखाड़ों में से कहीं श्मशानचारी सियारों का क्षुधार्त कलह-चीत्कार, कहीं वृक्षों पर सोते हुए अर्धसुप्त बृहत्काय पक्षियों के पंखों की फड़फड़ाहट और बहुत दूर से आया हुआ तीव्र जल प्रवाह का 'हू-हू' आर्त्तनाद सुन पड़ता था। हम दोनों, इन सबके बीच, निर्वाक् निस्तब्ध होकर उस महा करुण दृश्य की ओर देखते रहे। एक छह-सात वर्ष का गौरवर्ण हृष्ट-पुष्ट बालक पड़ा हुआ दिखाई दिया, जिसका सर्वाक्ष पानी में डूबा हुआ था और सिर्फ सिर घाट के ऊपर था। शायद सियार हाल में ही उसे पानी से बाहर निकाल रहे थे, और अब केवल हमारे आकस्मिक आगमन के कारण, कहीं पास ही खड़े हुए हमारे जाने की राह देख रहे हैं। बहुत करके उसे मरे हुए तीन-चार घण्टे से अधिक नहीं हुए थे। मानो वह बेचारा विसूचिका (हैजा) की दारुण यातना भोगकर माता गंगा की गोद में ही सो गया था, और माँ मानो बड़ी सावधानी से उसकी सुकुमार सुन्दर देह को अभी-अभी अपनी गोद से उतारकर बिछौने पर सुला रही थी। इस तरह कुछ जल और कुछ स्थल पर पड़ी हुई उस सोते हुए शिशु की देह पर हमारी आँखें जा पड़ीं।मुँह ऊपर उठाया तो देखा कि इन्द्र की दोनों आँखों से आँसुओं के बड़े-बड़े बिन्दु झर रहे हैं। वह बोला, “तू जरा हटकर खड़ा हो जा श्रीकांत, मैं इस बेचार को, नौका में रखकर टीले के उस झाऊ-वन के भीतर रखे आता हूँ।”यह सत्य है कि उसकी आँखों में आँसू देखते ही मेरी आँखों में भी आँसू आ गये, किन्तु इस छूने-ऊने के प्रस्ताव में मैं एकबारगी संकुचित हो उठा। इस बात को मैं अस्वीकार नहीं करता कि दूसरे के दु:ख में दु:खी होकर आँखों से आँसू बहाना सहज नहीं है, किन्तु इसी कारण, उस दु:ख के बीच अपने दोनों हाथ बढ़ाकर जुट जाना- यह बहुत अधिक कठिन काम है। उस समय छोटी-बड़ी न जाने कितनी जगहों से खिंचाव पड़ता है। अव्वल तो मैं इस पृथ्वी के शिरोभूत हिन्दू-घर में वशिष्ठ इत्यादि के पवित्र पूज्य रक्त का वंशधर होकर जन्मा, इसलिए, जन्मगत संस्कारों के वश मैंने सीख रक्खा था कि मृत देह को स्पर्श करना भी एक भीषण कठिन व्यापार है। दूसरे इसमें न जाने कितने शास्त्रीय विधि-निषेधों की बाधाएँ हैं और कितने तरह-तरह के कर्म-काण्डों का घटाटोप है। इसके सिवा यह किस रोग से मरा है, किसका लड़का है, किस जाति का है- आदि कुछ न जानते हुए और मरने के बाद यह ठीक तौर से प्रायश्चित करके घर से बाहर हुआ था या नहीं, इसका पता लगाए बिना ही इसे स्पर्श किस तरह किया जा सकता है?कुण्ठित होकर जैसे ही मैंने पूछा, “किस जाति का मुर्दा है और क्या तुम इसे छुओगे?” कि इन्द्र ने आगे बढ़कर एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे और दूसरा हाथ घुटनों के नीचे देकर उसे सूखे तिनकों के समान उठा लिया और कहा, “नहीं तो बेचारे को सियार नोच-नोचकर न खा जाँयगे? अहा, इसके मुँह से तो अभी तक औषधियों की गन्ध आ रही है रे!” यह कहते-कहते उसने नौका के उसी तख्त पर, जिस पर कि पहले मैं सोया था, उसे सुला दिया और नाव को ठेलकर स्वयं भी चढ़ गया। बोला, “मुर्दे की क्या जात होती है रे?” मैंने तर्क किया, “क्यों नहीं होती?”इन्द्र बोला, “अरे यह तो मुर्दा है! मरे हुए की जात क्या? यह तो वैसा ही है जैसे हमारी यह डोंगी- इसकी भला क्या जात है? आम या जामुन जिस कभी भी काठ की बनी हो- अब तो इसे 'डोंगी' छोड़ कोई भी नहीं कहेगा कि यह आम है या जामुन। समझा कि नहीं? यह भी उसी तरह है।”अब मालूम होता है कि यह दृष्टान्त निरे बच्चों का सा था- किन्तु अन्तर में यह भी तो अस्वीकार करते नहीं बनता कि यहीं कहीं, इसी के बीच, एक अति तीक्ष्ण सत्य अपने आपको छुपाए हुए बैठा है। बीच-बीच में ऐसी ही खरी बातें वह कह जाएा करता था। इसीलिए, मैंने अनेक दफे सोचा है कि इस उम्र में, किसी के पास कुछ भी शिक्षा पाए बगैर, बल्कि प्रचलित शिक्षा-संस्कारों को अतिक्रम करके- इन सब तत्वों को उसने पाया कहाँ? किन्तु अब ऐसा जान पड़ता है कि उम्र बढ़ने के साथ मानो मैंने इसका उत्तर भी पा लिया है। कपट तो मानो इन्द्र में था ही नहीं। उद्देश्य को गुप्त रखकर तो वह कोई काम करना जानता ही न था। इसलिए मैं समझता हूँ, उसके हृदय का वह व्यक्तिगत विच्छिन्न सत्य किसी अज्ञात नियम के वंशवर्ती होकर, उस विश्वव्यापी अविच्छिन्न निखिल सत्य का साक्षात् करके, अनायास ही, बहुत ही, सहज में, उसे अपने आप में आकर्षित कर आत्मसात् कर सकता था। उसकी शुद्ध सरल बुद्धि, पक्के उस्ताद की उम्मैदवारी किये बगैर ही, समस्त व्यापार को ठीक-ठीक अच्छी तरह जान लेती थी। वास्तविक, अकपट सहज बुद्धि ही तो संसार में परम और चरम बुद्धि है। इसके ऊपर और कुछ भी नहीं है। अच्छी तरह से देखने पर 'मिथ्या' नाम की किसी भी वस्तु का अस्तित्व इस विश्व-ब्रह्माण्ड में नजर नहीं पड़ता। 'मिथ्या' तो सिर्फ मनुष्य के मानने का और एक फलमात्र है। सोने को पीतल मानना भी मिथ्या है और मनाना भी- यह मैं जानता हूँ। परन्तु इससे सोने का अथवा पीतल का क्या आता-जाता है। तुम्हारी जो इच्छा हो सो उसे मानो, वह तो जो कुछ है, सो ही रहेगा। सोना समझकर उसे सन्दूक में बन्द करके रखने से उसके वास्तविक मूल्य में वृद्धि नहीं होती, और पीतल कहकर बाहर फेंक देने से उसका मूल्य नहीं घटता। उस दिन भी वह पीतल था और आज भी पीतल है। तुम्हारे 'मिथ्या' के लिए तुम्हें छोड़कर न और कोई उत्तरदायी है; और न कोई भ्रूक्षेप ही करता है। इस विश्व-ब्रह्माण्ड का समस्त ही परिपूर्ण सत्य है। मिथ्या का अस्तित्व यदि कहीं है तो वह मनुष्य के मन को छोड़कर और कहीं नहीं है। इसलिए इन्द्र ने इस असत्य को, अपने अन्तर में जाने या अनजाने में, किसी दिन जब स्थान नहीं दिया तब यदि उसकी विशुद्ध बुद्धि मंगल और सत्य को ही प्राप्त करती है, तो इसमें विचित्र ही क्या हुआ?किन्तु यह बात उसके लिए विचित्र न होने पर भी, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि किसी के लिए भी विचित्र नहीं है। ठीक इसी बहाने, मैंने अपने जीवन में ही जो इसका प्रमाण पाया है, उसे कह देने का लोभ मैं यहाँ संवरण नहीं कर सकता।उक्त घटना के 10-11 वर्ष बाद एकाएक एक दिन शाम के वक्त यह संवाद मिला कि एक वृद्धा ब्राह्मणी उस मुहल्ले में सुबह से मरी पड़ी है- किसी तरह भी उसके क्रिया-कर्म के लिए लोग नहीं जुटते। न जुटने का हेतु यह है कि वह काशी-यात्रा से लौटते समय रास्ते में रोग-ग्रस्त हो गयी, और उस शहर में, रेल पर से उतरकर सामान्य परिचय के सहारे जिनके घर आकर, उसने आश्रय ग्रहण किया, और दो रात रहकर आज सुबह प्राण-त्याग किया, वे महाशय विलायत से लौटे हुए थे और बिरादरी से अलग थे। वृद्धा का यही अपराध था कि उसे नितान्त निरुपाय अवस्था में इस 'बिरादरी से खारिज' घर में मरना पड़ा।खैर, अग्नि-संस्कार करके दूसरे दिन सुबह वापस आकर मैंने देखा कि हर एक घर के किवाड़ बन्द हो गये हैं। सुनने में आया कि गत रात को, ग्यारह बजे तक, हरिकेन लालटेन हाथ में लिये हुए, पंच लोगों ने घर-घर फिरकर स्थिर कर दिया है कि इस अत्यन्त शास्त्र-विरुद्ध अपकर्म (दाह) करने के कारण इन कुलांगारों को सिर मुँड़ाना होगा, अपराध स्वीकार करना होगा और एक ऐसी वस्तु (गोबर) खानी पड़ेगी जो कि सुपवित्र होते हुए भी खाद्य नहीं है। उन्होंने घर-घर जाकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि इसमें उनका कोई भी हाथ नहीं है; क्योंकि अपने जीते-जी, वे समाज में किसी भी तरह यह अशास्त्रीय काम नहीं होने दे सकते। हम लोग, और कोई उपाय न रहने पर डॉक्टर साहब के शरण में गये। वे ही उस शहर में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक थे और बिना दक्षिणा के ही बंगालियों की चिकित्सा किया करते थे। हमारी कहानी सुनकर डॉक्टर महाशय क्रोध से सुलग उठे और बोले, “जो लोग इस तरह लोगों को सताते हैं, उनके घरों में यदि कोई मेरी आँखों के सामने बिना चिकित्सा के मरता होगा, तो भी मैं उस ओर आँख उठाकर नहीं देखूँगा।” न मालूम, किसने यह बात पंचों के कानों तक पहुँचा दी। बस, शाम होते न होते मैंने सुना कि सिर मुँड़ाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपराध स्वीकार करके उस सुपवित्र पदार्थ को खा लेने मात्र से काम चल जाएेगा! हमारे स्वीकार न करने पर दूसरे दिन सुबह सुना गया, अपराध स्वीकार कर लेने से ही काम हो जाएेगा- वह पदार्थ न खाना हो तो न सही! इसे भी न स्वीकार करने पर सुना गया कि चूँकि यह हम लोगों का प्रथम अपराध है, इसलिए, उन्होंने उसे यों ही माफ कर दिया है, प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं है! किन्तु, डॉक्टर साहब बोले, “ठीक है कि प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं परन्तु दो दिन तक इन्हें जो क्लेश दिया गया है, उसके लिए यदि प्रत्येक आदमी आकर क्षमा प्रार्थना न करेगा, तो फिर, जैसा कि वे पहले कह चुके हैं, वैसा ही करेंगे, अर्थात् किसी के भी घर न जाँयगे।” इसके बाद उसी दिन संध्यान के समय से डॉक्टर साहब के घर एक-एक करके सभी वृद्ध पंचों का शुभागमन होना शुरू हो गया। आशीर्वाद दे-देकर उन्होंने क्या-क्या कहा, उसे तो अवश्य ही मैं नहीं सुन पाया, किन्तु दूसरे दिन देखा कि डॉक्टर साहब का क्रोध ठण्डा हो गया है और हम लोगों को भी प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं रही है।जाने दो, क्या कह रहा था और क्या बात बीच में आ पड़ी। किन्तु, वह चाहे जो हो मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि जो लोग जानते हैं वे, इस नाम-धाम-हीन विवरण में से, पूरा सत्य प्राप्त कर लेंगे। मेरे कहने का मूल विषय यह है कि इन्द्र ने इस उम्र में अपने अन्तर के मध्यव में जिस सत्य का साक्षात् कर लिया था, इतने बड़े-बड़े पंच सरदार, इतनी बड़ी उम्र तक भी, उसका कोई तत्व न पा सके थे; और डॉक्टर साहब यदि उस दिन इस प्रकार उनके शास्त्र-ज्ञान की चिकित्सा न कर देते, तो कभी उनकी यह व्याधि अच्छी होती या नहीं, सो जगदीश्वर ही जाने।टीले पर आकर, आधे डूबे जंगली झाऊ के अन्धकार में, जल के ऊपर, उस अपरिचित शिशु की देह को, इन्द्र ने जब अपूर्व ममता के साथ रख दिया तब रात्रि अधिक नहीं थी। कुछ देर तक वह उस शव की ओर माथा झुकाए रहा और अन्त में जब उसने मुँह उठाकर देखा, तब धुँधली चाँदनी में उसका मुख जितना कुछ दिखाई दिया वह मलिन था और उसके सूखे मुँह पर ठीक वैसा ही भाव प्रकट हो रहा था जैसे कि कोई कान उठाकर किसी की राह देख रहा हो।मैं बोला, “इन्द्र, अब चलो।”इन्द्र अन्यमनस्क भाव से बोला, “कहाँ?”“अभी जहाँ चलने के लिए तुमने कहा था।”“रहने दो, आज नहीं जाऊँगा।”मैं खुश होकर बोला, “ठीक, यही अच्छा है भाई-चलो, घर चलें।”प्रत्युत्तर में इन्द्र मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, “हाँ रे श्रीकांत, मरने पर मनुष्य का क्या होता है, जानता है?”मैंने तुरन्त ही जवाब दिया, “नहीं भाई, नहीं जानता; अब तो तुम घर चलो। वे सब स्वर्ग चले जाते हैं, भइया, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ, तुम मुझे मेरे घर पहुँचा आओ।”इन्द्र ने मानो सुना ही नहीं, और कहा, “सभी लोग तो स्वर्ग जा नहीं सकते। इसके सिवाय, कुछ समय तक तो सभी को यहाँ रहना पड़ता है। देखो, मैंने जब उसको जल के ऊपर सुला दिया था, तब उसने धीरे से साफ-साफ कहा था, 'भइया'।” मैं काँपते हुए स्वर से रोते हुए बोल उठा, “क्यों मुझे डराते हो भाई, मैं बेहोश हो जाऊँगा।” इन्द्र ने न तो कुछ कहा और न अभय ही दिया- धीरे से डाँड़ को हाथ में लेकर उसने नाव को झाऊ-वन में से बाहर कर लिया और फिर सीधा चलाने लगा। मिनट-दो मिनट चुप रहकर उसने गम्भीर मृदु स्वर से कहा, “श्रीकांत मन ही मन 'राम' का नाम ले, 'वह' नौका छोड़कर नहीं गया है- हमारे पीछे ही बैठा है!”उसके बाद मैं उसी जगह मुँह ढँककर औंधा हो गया था। फिर मुझे कुछ सुध नहीं रही। जब आँखें खोलीं तब अन्धकार नहीं था- नाव किनारे लगी हुई थी। इन्द्र मेरे पैरों के पास बैठा था; बोला, “अब थोड़ा चलना होगा, श्रीकांत"

❤️,श्रीकांत"❤️

,अध्याय 1

मेरी सारी जिन्दगी घूमने में ही बीती है। इस घुमक्कड़ जीवन के तीसरे पहर में खड़े होकर, उसके एक अध्याापक को सुनाते हुए, आज मुझे न जाने कितनी बातें याद आ रही हैं। यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल 'छि:-छि:' सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी 'छि:-छि:' के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका। किन्तु बहुत काल के बाद जब आज मैं कुछ याद और कुछ भूली हुई कहानी की माला गूँथने बैठा हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के उस प्रभात में ही क्यों उस सुदीर्घ 'छि:-छि:' की भूमिका अंकित हो गयी थी, तब हठात् यह सन्देह होने लगता है कि सब लोग इस 'छि: छि:' को जितनी बड़ी बनाकर देखते थे उतनी बड़ी शायद वह नहीं थी। जान पड़ता है, भगवान जिसे अपनी सृष्टि के ठीक बीच में जबरन धकेल देते हैं शायद उसे भला लड़का कहलाकर एग्जाम पास करने की सुविधा नहीं देते; और न वे उसे गाड़ी-घोड़े पालकी पर लाव-लश्कर के साथ भ्रमण करके 'कहानी' नाम देकर छपाने की ही अभिरुचि देते हैं। उसे बुद्धि तो शायद, वे कुछ दे देते हैं, परन्तु दुनियादार लोग उसे 'सु-बुद्धि' नहीं कहते। इसी कारण उसकी प्रवृत्ति ऐसी असंगत, ऐसी निराली होती है, और उसके देखने की चीजें, और जानने की तृष्णा, स्वभावत: ऐसी बेजोड़ होती हैं कि यदि उसका वर्णन किया जाए तो, शायद, 'सु-बुद्धि' वाले हँसते-हँसते मर जाँय। उसके बाद वह मन्द बालक; न जाने किस तरह, अनादर और अवहेलना के कारण, बुरों के आकर्षण से और भी बुरा होकर, धक्के और ठोकरें खाता हुआ, अज्ञात-रूप से अन्त में किसी दिन अपयश की झोली कन्धों पर रखकर कहीं चल देता है, और बहुत समय तक उसका कोई पता नहीं लगता।

अतएव इन सब बातों को रहने देता हूँ। जो कुछ कहने बैठा हूँ वही कहता हूँ। परन्तु कहने से ही तो कहना नहीं हो जाता। भ्रमण करना एक बात है और उसका वर्णन करना दूसरी बात। जिसके भी दो पैर हैं, वह भ्रमण कर सकता है किन्तु दो हाथ होने से ही तो किसी से लिखा नहीं जा सकता। लिखना तो बड़ा कठिन है। सिवाय इसके, बड़ी भारी मुश्किल यह है कि भगवान ने मेरे भीतर कल्पना-कवित्व की एक बूँद भी नहीं डाली। इन अभागिनी आँखों से जो कुछ दीखता है, ठीक वही देखता हूँ। वृक्ष को ठीक वृक्ष ही देखता हूँ और पहाड़-पर्वतों को पहाड़-पर्वत। जल की ओर देखने से वह जल के सिवाय और कुछ नहीं जान पड़ता। आकाश में बादलों की तरफ आँखें फाड़कर देखते-देखते मेरी गर्दन अवश्य दु:खने लगी है, बादल बादल ही नजर आए हैं, उनमें किसी की निबिड़ केश-राशि तो क्या दीखेगी, कभी बाल का टुकड़ा भी खोजे नहीं मिला। चन्द्रमा की ओर देखते-देखते आँखें पथरा गयी हैं; परन्तु उसमें भी कभी किसी का मुख-उख नजर न आया। इस प्रकार भगवान ने ही जिसकी विडम्बना की हो उसके द्वारा कवित्व-सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि हो सकती है तो केवल यही कि वह सच-सच बात सीधी तरह से कह दे। इसलिए मैं यही करूँगा।

किन्तु मैं घुमक्कड़ क्यों हो गया, यह बताने के पहले उस व्यक्ति का कुछ परिचय देना आवश्यक है जिसने जीवन के प्रभात में ही मुझे इस नशे में मत्त कर दिया था। उसका नाम था इन्द्रनाथ। हम दोनों का प्रथम परिचय एक फुटबाल-मैच में हुआ। जानता नहीं कि वह आज जीवित है या नहीं। क्योंकि, बरसों पहले एक दिन वह बड़े सुबह उठकर, घर-बार, जमीन-जायदाद और अपने कुटुम्ब को छोड़कर केवल एक धोती लेकर चला गया और फिर लौटकर नहीं आया। ओह, वह दिन आज किस तरह याद है।

स्कूल के मैदान में बंगाली और मुसलमान छात्रों में फुटबाल-मैच था। संध्याख हो रही थी। मगन होकर देख रहा था। आनन्द की सीमा न थी। हठात्-अरे यह क्या! तड़ातड़-तड़ातड़ शब्द और 'मारो साले को, पकड़ो साले को' की पुकार मच गयी। मैं विह्वल-सा हो गया। दो-तीन मिनट,- बस इतने में कहाँ कौन गायब हो गया, निश्चय ही न कर पाया। ठीक तौर से पता लगा तब, जब कि मेरी पीठ पर आकर एक छतरी का पूरा बेंट तड़ाक से टूट गया तथा और भी दो-तीन बेंट सिर और भी दो-तीन बेंट सिर और पीठ पर पड़ने को उद्यत दीखे। देखा, पाँच-सात मुसलमान छोकरों ने मेरे चारों ओर व्यूह-रचना कर ली है और भाग जाने को जरा-सा भी रास्ता नहीं छोड़ा है। और भी एक बेंट,- और भी एक। ठीक इसी समय जो मनुष्य बिजली के वेग से उस व्यूह को भेदता हुआ मेरे आगे आकर खड़ा हो गया, वह था इन्द्रनाथ। रंग उसका काला था। नाक वंशी के समान, कपाल प्रशस्त और सुडौल, मुख पर दो-चार चेचक के दाग। ऊँचाई मेरे बराबर ही थी, किन्तु उम्र मुझसे कुछ अधिक थी। कहने लगा, “कोई डर नहीं है, तुम मेरे पीछे-पीछे बाहर निकल आओ।”

उस लड़के की छाती में जो साहस और करुणा थी, वह दुर्लभ होते हुए भी शायद असाधारण नहीं थी। परन्तु इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि उसके दोनों हाथ असाधारण थे। यही नहीं कि वे बहुत बलिष्ठ थे, वरन् लम्बाई में भी घुटनों तक पहुँचते थे। सिवाय इसके, उसे एक सुविधा यह भी थी कि जो उसे जानता नहीं था उसके मन में यह आशंका भी न हो सकती थी कि विवाद के समय यह भला आदमी अकस्मात् अपना तीन हाथ लम्बा हाथ बाहर निकालकर मेरी नाक पर एकाएक इस अन्दाज का घूँसा मार सकेगा। वह घूँसा क्या था, उसे बाघ का पंजा कहना ही अधिक उपयुक्त होगा।

दो ही मिनट के भीतर मैं उसकी पीठ से सटा हुआ बाहर आ गया; और तब, इन्द्र ने बिना किसी आडम्बर के कहा, “भागो।”

भागना शुरू करके मैंने पूछा, “और तुम?” उसने रूखाई से जवाब दिया, “अरे तू तो भाग-गधे कहीं के।”

गधा होऊँ- या चाहे जो होऊँ, मुझे खूब याद है, मैंने हठात् लौटकर और खड़े होकर कहा, “नहीं, मैं नहीं भागूँगा।”

बचपन में मार-पीट किसने न की होगी? किन्तु, मैं था गाँव का लड़का- दो-तीन महीने पहले ही लिखने-पढ़ने के लिए शहर में बुआजी के यहाँ आया था। इसके पहले, इस प्रकार दल बाँधकर, न तो मैंने मार-पीट ही की थी, और न किसी दिन इस तरह दो पूरे छतरी के बेंट ही मेरी पीठ के ऊपर टूटे थे। फिर भी मैं अकेला भाग न सका। इन्द्र ने एक बार मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, “नहीं भागेगा, तो क्या खड़े-खड़े मार खाएगा? देख, उस तरफ से वे लोग आ रहे हैं-अच्छा, तो चल, खूब कसकर दौड़ें।”

यह काम तो मैं खूब कर सकता था। दौड़ते-दौड़ते जब हम लोग बड़ी सड़क पर पहुँचे, तब शाम हो गयी थी। दुकानों में रोशनी हो गयी थी और रास्ते पर म्युनिसिपल के केरॉसिन के लैम्प, लोहे के खम्भों पर, एक यहाँ और दूसरा वहाँ, जल रहे थे। आँखों में जोर होने पर, ऐसा नहीं है कि एक के पास खड़े होने पर दूसरा दिखाई न पड़ता। आततायियों की अब कोई आशंका नहीं थी। इन्द्र अत्यन्त स्वाभाविक सहज स्वर से बात कर रहा था। मेरा गला सूख रहा था, परन्तु आश्चर्य है कि इन्द्र रत्ती-भर भी नहीं हाँफा था। मानो कुछ हुआ ही न हो- न मारा हो, न मार खाई हो और न दौड़ा ही हो। जैसे कुछ हुआ ही न हो, ऐसे भाव से उसने पूछा, “तेरा नाम क्या है रे?”

“श्रीकांत।”

“श्रीकांत? अच्छा।” कहकर उसने अपनी जेब से मुट्ठी-भर सूखी पत्ती बाहर निकाली। उसमें से कुछ तो उसने खा ली और कुछ मेरे हाथ में देकर कहा, “आज खूब ठोका सालों को, ले खा।”

“क्या है यह?”

“बूटी।”

मैंने अत्यन्त विस्मित होकर कहा, “भाँग? यह तो मैं नहीं खाता।”

उसने मुझसे भी अधिक विस्मित होकर कहा, “खाता नहीं? कहाँ का गधा है रे। खूब नशा होगा- खा, चबाकर लील जा।”

नशे की चीज का मजा उस समय ज्ञात नहीं था; इसलिए सिर हिलाकर मैंने उसे वापस कर दिया। वह उसे भी चबाकर निगल गया।

“अच्छा, तो फिर सिगरेट पी।” यह कहकर उसने जेब से दो सिगरेट और दियासलाई बाहर निकाली। एक तो उसने मेरे हाथ में दे दी और दूसरी अपने हाथ में रखी। इसके बाद, वह अपनी दोनों हथेलियों को एक विचित्र प्रकार से जुटाकर, उस सिगरेट को चिलम बनाकर जोर से खींचने लगा। बाप रे,- कैसे जोर से दम खींचा कि एक ही दम में सिगरेट की आग सिरे से चलकर नीचे उतर आई! लोग चारों तरफ खड़े थे- मैं बहुत ही डर गया। मैंने डरते हुए पूछा, “पीते हुए यदि कोई देख ले तो?”

“देख ले तो क्या? सभी जानते हैं।” यह कहकर स्वच्छन्दता से सिगरेट पीता हुआ वह चौराहे पर मुड़ा और मेरे मन पर एक गहरी छाप लगाकर, एक ओर को चल दिया।

आज उस दिन की बहुत-सी बातें याद आती हैं। सिर्फ इतना ही याद नहीं आता, कि उस अद्भुत बालक के प्रति, उस दिन मुझे प्रेम उत्पन्न हुआ था, अथवा यों खुले आम भाँग और तमाखू पीने के कारण, मन ही मन घृणा। इस घटना के बाद करीब एक महीना बीत गया। एक दिन रात्रि जितनी उष्ण थी उतनी ही अंधेरी। कहीं वृक्ष की एक पत्ती तक न हिलती थी। सब छत पर सोए हुए थे। बारह बज चुके थे, परन्तु किसी की भी आँखों में नींद का नाम न था। एकाएक बाँसुरी का बहुत मधुर स्वर कानों में आने लगा। साधारण 'रामप्रसादी' सुर था। कितनी ही दफे तो सुन चुका था, किन्तु बाँसुरी इस प्रकार मुग्ध कर सकती है, यह मैं न जानता था। हमारे मकान के दक्षिण-पूर्व के कोने में एक बड़ा भारी आम और कटहल का बाग था। कई हिस्सेदारों की सम्पत्ति होने के कारण कोई उसकी खोज-खबर नहीं लेता था, इसलिए पूरा बाग निबिड़ जंगल के रूप में परिणत हो गया था। गाय-बैलों के आने-जाने से उस बाग के बीच में से केवल एक पतली-सी पगडंडी बन गयी थी। ऐसा मालूम हुआ कि मानो उसी वन-पथ से बाँसुरी का सुर क्रमश: निकटवर्ती होता हुआ आ रहा है। बुआ उठकर बैठ गयीं और अपने बड़े लड़के को उद्देश्य कर बोलीं, “हाँ रे नवीन, यह बाँसुरी राय-परिवार का इन्द्र ही बजा रहा है न?” तब मैंने समझा कि इस बंसीधारी को ये सभी चीन्हते हैं। बड़े भइया ने कहा, “उस हतभागे को छोड़कर ऐसी दूसरा कौन बजायेगा और उस जंगल में ऐसा कौन है जो ढूँकेगा?”

“बोलता क्या है रे? वह क्या गुसाईं के बगीचे से आ रहा है?”

बड़े भइया बोले, “हाँ।”

ऐसे भयंकर अन्धकार में उस अदूरवर्ती गहरे जंगल का खयाल करके बुआ मन ही मन सिहर उठीं और डर भरे कण्ठ से प्रश्न कर उठीं, “अच्छा, उसकी माँ भी क्या उसे नहीं रोकती? गुसाईं के बाग में तो न जाने कितने लोग साँप के काटने से मर गये हैं- उस जंगल में इतनी रात को वह लड़का आया ही क्यों?”

बड़े भइया कुछ हँसकर बोले, “इसलिए कि उस मुहल्ले से इस मुहल्ले तक आने का वही सीधा रास्ता है। जिसे भय नहीं है, प्राणों की परवाह नहीं है, वह क्यों बड़े रास्ते से चक्कर काटकर आएगा माँ? उसे तो जल्दी आने से मतलब, फिर चाहे उस रास्ते में नदी-नाले हों- चाहे साँप-बिच्छू और बाघ-भालू हों!”

“धन्य है रे लड़के, तुझे!” कहकर बुआ एक नि:श्वास डालकर चुप हो रहीं। वंशी की ध्वानि क्रमश: सुस्पष्ट होती गयीं और फिर धीरे-धीरे अस्पष्ट होती हुई दूर जाकर विलीन हो गयी।

यही था वह इन्द्रनाथ। उस दिन तो मैं यह सोचता रहा था कि क्या ही अच्छा होता, यदि इतना अधिक बल मुझमें भी होता और मैं भी इसी तरह मार-पीट कर सकता और आज रात्रि को जब तक, सो न गया, तब तक यही कामना करता रहा कि यदि किसी तरह ऐसी वंशी बजा सकता!

परन्तु उससे सद्भाव किस तरह पैदा करूँ? वह तो मुझसे बहुत ऊँचे पर है। उस समय वह स्कूल में भी न पढ़ता था। सुना था कि हेडमास्टर साहब ने अन्याय करके उसके सिर पर ज्यों ही गधे की टोपी लगाने का आयोजन किया, त्यों ही वह मर्माहत हो, अकस्मात् हेडमास्टर की पीठ पर एक धौल जमाकर, घृणा भाव से स्कूल की रेलिंग फाँदता हुआ घर भाग आया और फिर गया ही नहीं। बहुत दिनों बाद उसी के मुँह से सुना था कि वह एक न कुछ अपराध था। हिंदुस्तानी पंडितजी को क्लास के समय में ही नींद आने लगती थी, सो एक बार जब वे नींद ले रहे थे तब, उनकी गाँठ बँधी चोटी को उसने कैंची से काटकर जरा छोटा भर कर दिया था! और उससे उनकी विशेष कुछ हानि भी नहीं हुई, क्योंकि पण्डितजी जब घर पहुँचे तब अपनी चोटी अपनी चपकन की जेब में ही पड़ी हुई मिल गयी! वह कहीं खोई नहीं गयी, फिर भी पंडितजी का गुस्सा शान्त क्यों न हुआ और क्यों वे हेडमास्टर साहब के पास नालिश करने गये- यह बात आज तक भी इन्द्र की समझ में नहीं आई। परन्तु फिर भी यह बात वह ठीक समझ गया था कि स्कूल से रेलिंग फाँदकर घर आने का रास्ता तैयार हो जाने पर फिर फाटक में से वापिस लौटकर जाने का रास्ता प्राय: खुला नहीं रह जाता। और फाटक का रास्ता खुला रहा या नहीं रहा, यह देखने की उत्सुकता भी, उसे बिल्कुलल नहीं हुई। यहाँ तक कि सिर पर 10-20 अभिभावकों के होने पर भी, उनमें से कोई भी, उसका मुँह किसी भी तरह फिर विद्यालय की ओर नहीं फेर सका।

इन्द्र ने कलम फेंककर नाव का डाँड़ हाथ में ले लिया। तब से वह सारे दिन गंगा में नाव के ऊपर रहने लगा। उसकी अपनी एक छोटी-सी डोंगी थी। चाहे आँधी हो चाहे पानी, चाहे दिन हो चाहे रात, वह अकेला उसी पर बना रहता। कभी-कभी एकाएक ऐसा होता कि वह पश्चिम की गंगा के इकतरफा बहाव में अपनी डोंगी को छोड़ देता, डाँड़ पकड़े चुपचाप बैठा रहता और दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक फिर उसका कुछ भी पता न लगता।

एक दिन इसी प्रकार जब वह बिना किसी उद्देश्य के अपनी डोंगी बहाए जा रहा था, तब उसके साथ मिलन की गाँठ को सुदृढ़ करने का मुझे मौका मिला। उस समय मेरी यह एकमात्र कामना थी कि उससे किसी न किसी प्रकार मित्रता का सम्बन्ध दृढ़ किया जाए, और यही बतलाने के लिए मैंने इतना कहा है।

किन्तु जो लोग मुझे जानते हैं वे तो कहेंगे कि यह तो तुम्हें नहीं सोहता भैया, तुम ठहरे गरीब के लड़के और फिर लिखना-पढ़ना सीखने के लिए अपना गाँव छोड़कर पराए घर आकर रहे हो, फिर तुम उससे मिले ही क्यों और मिलने के लिए इतने व्याकुल ही क्यों हुए? यदि ऐसा न किया होता, तो आज तुम-

ठहरो, ठहरो, अधिक कहने की जरूरत नहीं है। यह बात हजारों लोगों ने लाखों ही बार मुझसे कही है; स्वयं खुद मैंने ही यह प्रश्न अपने आपसे करोड़ों बार पूछा है, परन्तु सब व्यर्थ। वह कौन था? इसका जवाब तुममें से कोई भी नहीं दे सकता और फिर, “यदि ऐसा न हुआ होता तो मैं क्या हो जाता?” इस प्रश्न का समाधन भी तुममें से कोई कैसे कर सकता है? जो सब कुछ जानते हैं, केवल वे (भगवान) ही बता सकते हैं कि क्यों इतने आदमियों को छोड़कर एकमात्र उसी हतभागे के प्रति मेरा सारा हृदय आकृष्ट हुआ और क्यों उस मन्द से मिलने के लिए मेरे शरीर का प्रत्येक कण उन्मुख हो उठा।

वह दिन मुझे खूब याद है। सारे दिन लगातार गिरते रहने पर भी मेह बन्द नहीं हुआ था। सावन का आकाश घने बादलों से घिरा हुआ था। शाम होते-न-होते चारों ओर अन्धकार छा गया। जल्दी-जल्दी खाकर, हम कई भाई रोज की तरह बाहर बैठकखाने में बिछे हुए बिस्तर पर रेड़ी के तेल का दीपक जलाकर, पुस्तक खोलकर, बैठ गये थे। बाहर के बरामदे में एक तरफ फूफाजी केन्वास की खाट पर लेटे हुए अपनी सांध्यी तन्द्रा का उपभोग कर रहे थे और दूसरी ओर बूढ़े रामकमल भट्टाचार्य अफीम खाकर अन्धकार में आँखें मींचे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। डयोढ़ी पर हिंदुस्तानी दरबान का 'तुलसीदास स्वर' सुन पड़ रहा था और भीतर हम तीनों भाई मँझले भइया की कड़ी देख-रेख में चुपचाप विद्याभ्यास कर रहे थे। छोटे भइया, जतीन और मैं तीसरी और चौथी कक्षा में पढ़ते थे और गम्भीर स्वभाव के मँझले भइया दो दफे एण्ट्रेस फेल होकर तीसरी दफे की तैयारी कर रहे थे। उनके प्रचण्ड शासन में किसी को एक मिनट भी नष्ट करने का साहस न होता था। हम लोगों का पढ़ने का समय था। 7.30 से 9 बजे तक। उस समय बातचीत करके हम उनकी 'पास होने' की पढ़ाई में विघ्न न डाल सकें, इसके लिए वे रोज कैंची से काट-काटकर कागज के 25-30 टिकट जैसे टुकड़े रख छोड़ते। उनमें से किसी में लिखा होता, 'बाहर जाना है', किसी में 'थूकना है', किसी में 'नाक साफ करना है', किसी में 'पानी पीना है' आदि। जतीन भइया ने नाक साफ करने का एक टिकट मँझले भइया के सामने पेश किया। मँझले भइया ने उस पर अपने हाथ से लिख दिया, '8 बजकर 33 मिनट से लेकर 8 बजकर 33.30 मिनट तक।' अर्थात् इतने समय के लिए नाक साफ करने जा सकते हैं। छुट्टी पाकर जतीन भइया टिकट हाथ में लेकर गये ही थे कि छोटे भइया ने थूकने जाने का टिकट पेश कर दिया। मँझले भइया ने उस पर 'नहीं' लिख दिया। इस पर दो मिनट तक छोटे भइया मुँह फुलाए बैठे रहे और उसके बाद उन्होंने पानी पीने की अर्जी दाखिल कर दी। इस बार वह मंजूर हो गयी। मँझले भइया ने इसके लिए लिख दिया, “हाँ, 8 बजकर 41 मिनट से लेकर 8 बजकर 47 मिनट तक।” परवाना लेकर छोटे भइया हँसते हुए ज्यों ही बाहर गये त्यों ही जतीन भइया ने लौटकर हाथ का टिकट वापस दे दिया। मँझले भइया ने घड़ी देखकर और समय मिलाकर एक रजिस्टर बाहर निकाला और उसमें वह टिकट गोंद से चिपका दिया। यह सब सामान उनकी हाथ की पहुँच के भीतर ही रक्खा रहता था। सप्ताह सप्ताह होने पर इन सब टिकटों को सामने रखकर कैफियत तलब की जाती थी कि क्यों अमुक दिन तुमने इजाजत से अधिक समय लगा दिया।

इस प्रकार मँझले भइया की अत्यन्त सतर्कता और श्रृंखलाबद्धता से- हमारा और उनका खुद का-किसी का जरा-सा भी समय नष्ट न होने पाता था। इस तरह प्रतिदिन, डेढ़ घण्टा, खूब पढ़ लेने के उपरान्त, जब हम लोग रात के 9 बजे घर में सोने को आते थे तब निश्चय ही माता सरस्वती हमें घर की चौखट तक पहुँचा जाती थीं; और दूसरे दिन स्कूल की कक्षा से जो सब सम्मान सौभाग्य प्राप्त करके हम घर लौटते थे वह तो आप समझ ही गये होंगे। परन्तु मँझले भइया का दुर्भाग्य कि उनके बेवकूफ परीक्षक उन्हें कभी न चीह्न सके! वे निज की तथा पराई शिक्षा-दीक्षा के प्रति इतना प्रबल अनुराग तथा समय के मूल्य के सम्बन्ध में अपने उत्तरदायित्व का इतना सूक्ष्म खयाल रखते थे फिर भी, वे उन्हें बराबर फेल ही करते गये। इसे ही कहते हैं अदृष्ट का अन्धा न्याय-विचार। खैर, जाने दो-अब उसके लिए दुखी होने से क्या लाभ?

उस रात्रि को भी घर के बाहर वही घना अन्धकार, बरामदे में तन्द्राभिभूत वे दोनों बुङ्ढे और भीतर दीपक के मन्द प्रकाश के सम्मुख गम्भीर अध्यघयन में लगे हुए हम चार प्राणी थे।

छोटे भइया के लौट आते ही प्यास के मारे मेरी छाती एकबारगी फटने लगी। इसीलिए टिकट पेश करके मैं हुक्म की राह देखने लगा। मँझले भइया उसी टिकटों वाले रजिस्टर के ऊपर झुककर परीक्षा करने लगे कि मेरा पानी पीने के लिए जाना नियम-संगत है या नहीं- अर्थात् कल परसों किस परिमाण में पानी पिया था।

अकस्मात् मेरे ठीक पीछे से एक 'हुम्' शब्द और साथ ही साथ छोटे भइया और जतीन भइया का आर्तकण्ठ से निकला हुआ, “अरे बाप रे! मार डाला रे' का गगनभेदी चीत्कार सुन पड़ा। उन्हें किसने मार डाला, सिर घुमाकर यह देखने के पहले ही, मँझले भइया ने सिर उठाकर विकट शब्द किया और बिजली की तेजी से सामने पैर फैला दिए, जिससे दीवट उलट गया। तब उस अन्धकार में 'दक्ष-यज्ञ' मच गया। मँझले भइया को थी मिर्गी की बीमारी, इसलिऐ वे 'ओं-ओं' करके दीवट उलटाकर जो चित्त गिरे सो फिर न उठे।

ठेलठाल करके मैं बाहर निकला तो देखा कि फूफाजी अपने दोनों लड़कों को बगल में दबाए हुए, उनसे भी अधिक तीव्र स्वर में चिल्लाकर छप्पर फाड़े डाल रहे हैं। ऐसा लगता था मानो उन तीनों बाप-बेटों में इस बात की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना गला फाड़ सकता है।

इसी अवसर पर एक चोर जी छोड़कर भागा जा रहा था और डयोढ़ी के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया था। फूफाजी प्रचण्ड चीत्कार करके हुक्म दे रहे थे, “और मारो, साले को, मार डालो।” इत्यादि।

दम भर में रोशनी हो गयी, नौकर-चाकरों और पास-पड़ोसियों से आँगन खचाखच भर गया। दरबानों ने चोर को मारते-मारते अधमरा कर दिया और प्रकाश के सम्मुख खींच लाकर, धक्का देकर गिरा दिया। पर चोर का मुँह देखकर घर-भर के लोगों का मुँह सूख गया-अरे, ये तो भट्टाचार्य महाशय हैं!

तब कोई तो जल ले आया, कोई पंखे से हवा करने लगा, और कोई उनकी आँखों और मुँह पर हाथ फेरने लगा। उधर घर के भीतर मँझले भइया के साथ भी यही हो रहा था।

पंखे की हवा और जल के छींटे खाकर रामकमल होश में आकर लगे फफक-फफक कर रोने। सभी लोग पूछने लगे, “आप इस तरह भागे क्यों जा रहे थे?” भट्टाचार्य महाशय रोते-रोते बोले, “बाबा, बाघ नहीं, वह एक तगड़ा भालू था- छलाँग मारकर बैठकखाने में से बाहर आ गया।”

छोटे भइया और जतीन भइया बारम्बार कहने लगे, “भालू नहीं बाबा, एक भेड़िया था, पूँछ समेटे पायन्दाज के ऊपर बैठा गुर्रा रहा था।”

मँझले भइया, होश में आते ही अधमिची आँखों से दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए संक्षेप में बोले, “दी रॉयल बंगाल टाइगर।”

परन्तु वह है कहाँ? चाहे मँझले भइया का 'दी रॉयल बंगाल' हो, चाहे रामकमल का 'तगड़ा भालू' हो, परन्तु वह यहाँ आया ही किस तरह और चला ही कहाँ गया? जब इतने लोगों ने उसे देखा है तब वह होगा तो कुछ न कुछ अवश्य ही।

तब किसी ने विश्वास किया और किसी ने नहीं किया। किन्तु सभी भय-चकित नेत्रों से लालटेन लेकर चारों तरफ खोजने लगे।

अकस्मात् पहलवान किशोरसिंह 'वह बैठा है' कहकर एक छलाँग में बरामदे में ऊपर चढ़ गया। उसके बाद वहाँ भी ठेला-ठेली मच गयी। उतने सब लोग बरामदे पर एक साथ चढ़ना चाहते थे, किसी से भी क्षण-भर की देर न सही जाती थी। आँगन के एक तरफ अनार का दरख्त था। मालूम पड़ा कि उसी की घनी डालियों में एक बड़ा जानवर बैठा है। वह बाघ के समान ही मालूम होता था। पलक मारते न मारते सारा बरामदा खाली हो गया और बैठकखाना खचाखच भर गया। बरामदे में एक भी आदमी न रहा। घर की उस भीड़ में से फूफाजी का उत्तेजित कण्ठ स्वर सुन पड़ने लगा, “बरछी लाओ-बन्दूक लाओ।” हमारे मकान के पास के मकान में गगन बाबू के पास एक मुंगेरी बन्दूक थी। उनका लक्ष्य उसी अस्त्र पर था।

'लाओ' तो ठीक, किन्तु लाए कौन? अनार का झाड़ था दरवाजे के ही निकट और फिर उस पर बैठा था भेड़िया। हिंदुस्तानी सिटपिटाए तक नहीं और जो लोग तमाशा देखने आए थे वे भी सनाका खींचकर रह गये।

ऐसी विपत्ति के समय न जाने कहाँ से इन्द्र आकर उपस्थित हो गया। शायद वह सामने के रास्ते से कहीं जा रहा था और शोरगुल सुनकर अन्दर घुस आया था। पल-भर में सौ कण्ठ एक साथ चीत्कार कर उठे, “ओ रे, बाघ है बाघ! भाग जा रे लड़के, भाग जा!”

पहले तो वह हड़बड़ाकर भीतर दौड़ आया किन्तु पलभर बाद ही, सब हाल सुनकर, निर्भय हो, आँगन में उतर लालटेन उठाकर देखने लगा।

दुमंजिले की खिड़कियों में से औरतें साँस रोककर इस साहसी लड़के की ओर देख-देखकर 'दुर्गा' नाम जपने लगीं। नीचे भीड़ में खड़े हुए हिंदुस्तानी सिपाही उसे हिम्मत बँधाने लगे और आभास देने लगे कि एकाध हथियार मिलने पर वे भी वहाँ आने को तैयार हैं!

अच्छी तरह देखकर इन्द्र ने कहा, “द्वारिका बाबू, यह तो बाघ नहीं मालूम होता।” उसकी बात समाप्त होते न होते वह 'रॉयल बंगाल टाइगर' दोनों हाथ जोड़कर मनुष्य के ही स्वर में रो पड़ा और बोला, “नहीं, बाबूजी, नहीं, मैं बाघ-भालू नहीं, श्रीनाथ बहुरूपिया हूँ।” इन्द्र ठठाकर हँस पड़ा। भट्टाचार्य महाशय खड़ाऊँ हाथ में लिये सबसे आगे दौड़ पड़े-

“हरामजादे, तुझे डराने के लिए और कोई जगह नहीं मिली?” फूफाजी ने महाक्रोध से हुक्म दिया, “साले को कान पकड़कर लाओ।”

किशोरी सिंह ने उसे सबसे पहले देखा था, इसलिए उसका दावा सबसे प्रबल था। वह गया और उसके कान पकड़कर घसीटता हुआ ले आया। भट्टाचार्य महाशय उसकी पीठ पर जोर-जोर से खड़ाऊँ मारने लगे और गुस्से के मारे दनादन हिंदी बोलने लगे-

“इसी हरामजादे बदजात के कारण मेरी हड्डी-पसली चूर हो गयी है। साले पछहियों ने घूँसे मार-मारकर कचूमर निकाल दिया।”

श्रीनाथ का मकान बारासत में था। वह हर साल इसी समय एक बार रोजगार करने आता था। कल भी वह इस घर में नारद बनकर गाना सुना गया था। वह कभी भट्टाचार्य महाशय के और कभी फूफाजी के पैर पकड़ने लगा। बोला, “लड़कों ने इतना अधिक भयभीत होकर, और दीवट लुढ़काकर, ऐसा भीषण काण्ड मचा दिया कि मैं स्वयं भी मारे डर के उस वृक्ष की आड़ में जाकर छिप गया। सोचता था कि कुछ शान्ति होने पर, बाहर आकर, अपना स्वाँग दिखाकर जाऊँगा। किन्तु मामला उत्तरोत्तर ऐसा होता गया कि मेरी फिर हिम्मत ही नहीं हुई।”

श्रीनाथ आरजू-मिन्नत करने लगा; किन्तु फूफाजी का क्रोध कम हुआ ही नहीं। बुआजी स्वयं ऊपर से बोलीं, “तुम्हारे भाग्य भले थे जो सचमुच का बाघ-भालू नहीं निकला, नहीं, तो जैसे बहादुर तुम और तुम्हारे दरबान हैं- छोड़ दो बेचारे को, और दूर कर दो डयोढ़ी के इन पछहियाँ दरबानों को। एक जरा से लड़के में जो साहस है उतना घर-भर के सब आदमियों में मिलकर भी नहीं है।” फूफाजी ने कोई बात ही न सुनी; वरन् उन्होंने बुआजी के इस अभियोग पर आँखें घुमाकर ऐसा भाव धारण किया कि मानो इच्छा करते ही वे इन सब बातों का काफी और माकूल जवाब दे सकते हैं, परन्तु चूँकि औरतों की बातों का उत्तर देने की कोशिश करना भी पुरुष जाति के लिए अपमानकारक है इसलिए, और भी गरम होकर हुक्म दिया, “इसकी पूँछ काट डालो।” तब उसकी रंगीन कपड़े से लिपटी हुई घास की बनी लम्बी पूँछ काट डाली गयी, और उसे भगा दिया गया। बुआजी ऊपर से गुस्से में बोलीं, “पूँछ को सँभालकर रख छोड़ो, किसी समय काम आएगी!”

इन्द्र ने मेरी ओर देखकर कहा, “मालूम पड़ता है, तुम इसी मकान में रहते हो, श्रीकांत!”

मैंने कहा, “हाँ, तुम, इतनी रात को कहाँ जाते थे?”

इन्द्र हँसकर बोला, “रात कहाँ है रे, अभी तो संध्यास हुई है। मैं जाता हूँ अपनी डोंगी पर मछली पकड़ने। चलता है?”

मैंने डरकर पूछा, “इतने अन्धकार में डोंगी पर चढ़ोगे?”

वह फिर हँसा, बोला, “डर क्या है रे? इसी में तो मजा है। सिवाय इसके क्या अंधेरा हुए बगैर मछलियाँ पाई जा सकती हैं? तैरना जानता है?”

“खूब जानता हूँ।”

“तो फिर चल भाई।” यह कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। कहा, “मैं अकेला इतने बहाव में उस तरफ को नाव नहीं ले सकता, ऐसे ही किसी की खोज में था जो डरे नहीं।”

मैंने फिर कुछ न कहा। उसका हाथ पकड़े हुए चुपचाप रास्ते पर आ पहुँचा। पहले तो मानो मुझे अपने आप पर ही विश्वास न हुआ कि सचमुच ही उस रात्रि को मैं नाव चलाने जा रहा हूँ, क्योंकि जिस आह्नान के आकर्षण से उस स्तब्ध निबिड़ निशा में, घर के समस्त शासन-पाश को तुच्छ समझकर, अकेला बाहर चला आया था वह कितना बड़ा आकर्षण था, यह उस समय विचारकर देख सकना मेरे लिए साध्यु ही नहीं था। अधिक समय बीतने के पूर्व ही गोसाईं बाग के उस भयंकर वन-पथ के सामने आ उपस्थित हुआ और इन्द्र का अनुसरण करता हुआ स्वप्नाविष्ट पुरुष की भाँति उसे पारकर गंगा के किनारे जा पहुँचा।

कंकड़-पत्थरों का खड़ा किनारा है। सिर के ऊपर एक बहुत प्राचीन बरगद का वृक्ष मूर्तिमान अन्धकार के समान चुपचाप खड़ा है और उसी के करीब तीस हाथ नीचे सूचीभेद्य अन्धकार के तल में, पूरी बरसात का गम्भीर जल-स्रोत चट्टानों से टकराकर, भँवरों की रचना करता हुआ, उद्दाम वेग से दौड़ रहा है। देखा कि, उसी स्थान पर इन्द्र की छोटी-सी नाव बँधी हुई है। ऊपर से देखने पर ऐसा मालूम हुआ मानो उस खूब तेज जल-धारा के मुख पर केले के फूल का एक छोटा-सा छिलका लगातार टकरा-टकराकर मर रहा है।

मैं स्वयं भी बिल्कुरल डरपोक नहीं था। किन्तु जब इन्द्र ने ऊपर से नीचे तक लटकती हुई एक रस्सी दिखलाकर कहा, “डोंगी की इस रस्सी को पकड़कर चुपचाप नीचे उतर जा; सावधानी से उतरना, फिसल गया तो फिर खोजने से भी तेरा पता नहीं लगेगा।” तब दरअसल मेरी छाती धड़क उठी। जान पड़ा कि यह असम्भव है, फिर भी मेरे लिए तो रस्सी का सहारा है-”किन्तु तुम क्या करोगे?”

उसने कहा, “तेरे नीचे जाते ही मैं रस्सी खोल दूँगा और फिर नीचे उतरूँगा। डर की बात नहीं है, मेरे नीचे उतरने के लिए बहुत-सी घास की जड़ें झूल रही हैं।”

और कुछ न कहकर मैं रस्सी के सहारे बड़ी सावधानी से बमुश्किल नीचे उतरकर नाव पर बैठ गया। इसके बाद उसने रस्सी खोल दी और वह झूल गया। वह किस चीज के सहारे नीचे उतरने लगा सो मैं आज भी नहीं जानता हूँ! डर के मारे मेरी छाती इतने जोर से धड़कने लगी कि उसकी और मैं देख भी न सका। दो-तीन मिनट तक विपुल जल-धारा के उन्मत्त गर्जन के सिवाय कहीं से कोई शब्द भी नहीं सुनाई दिया। एकाएक एक हलकी-सी हँसी के शब्द से चौंककर मुँह फिराया तो देखता हूँ कि इन्द्र ने दोनों हाथों से डोंगी को जोर से धक्का देकर ठेल दिया है और आप कूदकर उस पर चढ़ बैठा है। क्षुद्र तरी एक चक्कर-सा खाकर नक्षत्र-वेग से बहने लगी।

कुछ ही देर में सामने और पीछे सब कुछ सघन अन्धकार से लिप-पुतकर एकाकार हो गया। रह गयी दाहिनी ओर बाईं ओर दोनों सीमाओं तक फैली हुई विपुल उद्दाम जल की धारा, और उसके ऊपर खूब तेजी से चलने वाली वह छोटी-सी नाव और उस पर किशोरवय के दो बालक। यद्यपि प्रकृति देवी के अपरिमेय गम्भीर रूप को समझने की उम्र वह नहीं थी, किन्तु उसे मैं आज भी नहीं भूल सका हूँ। वायुहीन, निष्कम्प, निस्तब्ध, नि:संग, निशीथनी की मानो वह एक विराट काली मूर्ति थी। उसके निबिड़ काले बालों से आकाश और पृथ्वी ढँक गयी थी और उस सूची-भेद्य अन्धकार को विदीर्ण करके, कराल दाढ़ों की रेखा के समान, उस दिगन्त-विस्तृत तीव्र जलधारा से मानो एक तरह की अद्भुत निश्चल द्युति, निष्ठुर दबी हुई हँसी के समान, बिखर रही थी। आसपास और सामने, कहीं तो जल की उन्मत्त धारा तल देश में जाकर तथा ऊपर को उठकर फट पड़ती थी, कहीं परस्पर के प्रतिकूल गति संघात से आवर्तों की रचना करती हुई चक्कर खाती थी, और कहीं अप्रतिहित जल-प्रवाह पागल की तरह दौड़ा जा रहा था।

हमारी डोंगी एक कोने से दूसरे कोने की ओर जा रही है, बस इतना ही मालूम हो रहा था। किन्तु उस पार के उस दुर्भेद्य अन्धकार में, किस जगह लक्ष्य स्थिर करके, इन्द्र हाल को पकड़े चुपचाप बैठा है, यह मैं कुछ न जानता था। इस उम्र में वह कितना पक्का माझी बन गया था, इसकी मुझे उस समय कल्पना भी न थी। एकाएक वह बोला-

“क्यों रे श्रीकांत, डर लगता है क्या?”

मैं बोला, “नहीं।”

इन्द्र खुश होकर बोला, “यही तो चाहिए। जब तैरना आता है तब फिर डर किस बात का?” प्रत्युत्तर में मैंने एक छोटे-से नि:श्वास को दबा दिया कि कहीं वह सुन न ले। किन्तु, ऐसी गहरी अंधेरी रात में, ऐसी जल-राशि और ऐसे दुर्जय प्रवाह में, तैरना जानने और न जानने में क्या अन्तर है, सो मेरी समझ में न आ सका। उसने भी और कोई बात नहीं कही। बहुत देर तक इसी तरह चलते रहने के बाद कहीं से कुछ आवाज-सी आई, जो कि अस्फुट और क्षीण थी, किन्तु नौका जैसे-जैसे अग्रसर होने लगी वैसे ही वैसे वह आवाज भी स्पष्ट और प्रबल होने लगी। मानो लोगों का बहुत दूर से आता हुआ क्रुद्ध आह्नान हो- मानो कितने ही बाधा-विघ्नों को लाँघकर, हटाकर, वह आह्नान हमारे कानों तक आ पहुँचा हो। वह आह्नान थका हुआ-सा था, फिर भी न उसमें विराम था और न विच्छेद ही- मानो उनका क्रोध न कम होता था न बढ़ता ही था और न थमना ही चाहता था। बीच-बीच में एकाध दफा 'भप्-भप् शब्द भी होता थ। मैंने पूछा, “इन्द्र यह काहे की आवाज सुन पड़ती है?” उसने नौका का मुँह कुछ और सीधा करके कहा, “जल के प्रवाह से उस पार के कगारे, टूट-टूटकर गिर रहे हैं, उसी का यह शब्द है।”

मैंने पूछा, “कितने बड़े कगारे हैं? और कैसा प्रवाह है?”

“बड़ा भयानक प्रवाह है। ओह! तभी तो- कल पानी बरस गया है,- आज उसके तले से न गया जाएेगा। कहीं एक भी कगारा गिर पड़ा तो नाव और हम सभी पिस जाँयगे। अच्छा, तू तो डाँड़ चला सकता है न?”

“चला सकता हूँ।”

“तो चला।”

मैंने डाँड़ चलाना शुरू कर दिया। इन्द्र ने कहा, “वही, वही जो बायीं ओर काला-काला दीख पड़ता है, वह चड़ा¹ है। उसके बीच में से एक नहर-सी गयी है, उसी में से होकर निकल जाना होगा- परन्तु बहुत आहिस्ते। अगर कहीं धीवरों को जरा भी पता लग गया, तो फिर लौटना न हो सकेगा। वे लग्गी की मार से सिर फोड़कर इसी कीचड़ में गाड़ देंगे।”

यह क्या? मैंने डरते हुए कहा, “तो फिर उस नहर में होकर मत चलो।” इन्द्र ने शायद कुछ हँसकर कहा, “और तो कोई रास्ता ही नहीं है। उसके भीतर होकर तो जाना ही होगा। द्वीप के बायीं ओर की रेहं को ठेलकर तो जहाज भी नहीं जा सकता- फिर हम कैसे जाँयगे? लौटती में वापिस आ सकते हैं किन्तु जा नहीं सकते।”

“तो फिर मछलियों के चुराने की जरूरत नहीं है भइया।” कहकर मैंने डाँड़ ऊपर उठा लिया। पलक मारते ही नाव चक्कर खाकर लौट चली। इन्द्र खीझ उठा। उसने आहिस्ते से झिड़कते हुए कहा, “तो फिर आया क्यों? चल-तुझे वापिस पहुँचा आऊँ। कायर कहीं का!” उस समय मैंने चौदह पूरे करके पन्द्रहवें में पैर रक्खा था। मैं कायर? झट से डाँड़ को पानी में फेंककर प्राणप्रण से खेने लगा। इन्द्र खुश होकर बोला, “यही तो चाहिए, किन्तु भाई धीरे-धीरे चलाओ- साले बहुत पाजी हैं। मैं झाऊ के वन के पास से, मकई के खेतों के भीतर होकर, इस तरह बचाकर ले चलूँगा कि सालों को जरा भी पता न पड़ेगा!” फिर कुछ हँसकर बोला, “और यदि सालों को पता लग भी गया तो क्या? पकड़ लेना क्या इतना सहज है? देख श्रीकांत, कुछ भी डर नहीं है- यह ठीक है कि उन सालों की चार नावें हैं- किन्तु यदि देखो कि घिर ही गये हैं, और भाग जाने की कोई जुगत नहीं है, तो चट से कूदकर डुबकी लगा जाना और जितनी दूर तक हो सके उतनी दूर जाकर निकलना, बस काम बन जाएेगा। इस अन्धकार में देख सकने का तो कोई उपाय ही नहीं है- उसके बाद मजे से सतूया के टीले पर चढ़कर भोर के समय तैरकर इस पार आ जाँयगे और गंगा के किनारे-किनारे घर पहुँच जाँयगे- बस, फिर क्या कर लेंगे साले हमारा?”

यह नाम मैंने सुना था; कहा, “सतूया का टीला तो 'घोर' नाले के सामने है, वह तो बहुत दूर है।”

इन्द्र ने उपेक्षा के भाव से कहा, “कहाँ, बहुत दूर है? छ:-सात कोस भी तो न होगा! तैरते-तैरते यदि हाथ भर आवें तो चित्त होकर सुस्ता लेना; इसके सिवाय, मुर्दे जलाने के काम आए हुए बहुत-से बड़े-बड़े लक्कड़ भी तो बहते मिल जाँयगे।”

आत्म-रक्षा का जो सरल रास्ता था सो उसने दिखा दिया, उसमें प्रतिवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। उस अंधेरी रात में, जिसमें दिशाओं का कोई चिह्न नजर न आता था, और उस तेज जल-प्रवाह में, जिसमें जगह-जगह भयानक आवत्त पड़ रहे थे, सात कोस तक तैरकर जाना और फिर भोर होने की प्रतीक्षा करते रहना! सवेरे से पहले इस तरफ के किनारे पर चढ़ने का कोई उपाय नहीं। दस-पन्द्रह हाथ ऊँचा खड़ा हुआ बालू का कगारा है, जो टूटकर सिर पर आ सकता है,- और इसी तरफ गंगा का प्रवाह भीषण टक्करें लेता हुआ अर्ध्दवृत्ताकार दौड़ा जा रहा है।

वस्तुस्थिति का अस्पष्ट आभास पाकर ही मेरा विस्तृत वीर-हृदय सिकुड़कर बिन्दु जैसा रह गया। कुछ देर तक डाँड़ चलाकर मैं बोला, “किन्तु हमारी नाव का क्या होगा?”

इन्द्र बोला, “उस दिन भी मैं ठीक इसी तरह भागा था, और उसके दूसरे ही दिन आकर नाव निकाल ले गया था- कह दिया था कि घाट पर से डोंगी चोरी करके कोई और ले आया होगा- मैं नहीं लाया।”

तो यह सब इसकी कल्पना ही नहीं है- बिल्कुयल परीक्षा किया हुआ प्रत्यक्ष सत्य है! क्रमश: नौका खाड़ी के सामने आ पहुँची। देख पड़ा कि मछुओं की नावें कतार बाँधकर खाड़ी के मुहाने पर खड़ी हैं और उनमें दीए भी टिमटिमा रहे हैं। दो टीलों के बीच का वह जल-प्रवाह नहर की तरह मालूम होता था। घूमकर हम लोग उस नहर के दूसरे किनारे पर जाकर उपस्थित हो गये। उस जगह जल के वेग से अनेक मुहाने से बन गये हैं और जंगली झाऊ के पेड़ों ने परस्पर एक-दूसरे को ओट में कर रक्खा है। उनमें से एक के भीतर होकर कुछ दूर जाने से ही हम नहर के भीतर जा पहुँचे। धीवरों की नावें वहाँ से दूर पर खड़ी हुई काली-काली झाड़ियों की तरह दिखाई पड़ती थीं। और भी कुछ दूर जाने पर हम उद्दिष्ट स्थान पर पहुँच गये।

धीवर देवताओं ने, नहर का सिंहद्वार सुरक्षित है-यह समझकर इस स्थान पर पहरा नहीं रक्खा था। इसे 'माया-जाल' कहते हैं। नहर में जब पानी रहता है तब इस किनारे से लेकर उस किनारे तक ऊँचे-ऊँचे लट्ठ मजबूती से गाड़ दिए जाते हैं और उनके बाहरी ओर जाल टाँग दिया जाता है। बाद में वर्षा के समय, जब जल के प्रवाह में बड़े-बड़े रोहू, कातला आदि मच्छ बह कर आते हैं, तब इन लट्ठों से बाधा पाकर वे कूदकर इस बाजू आ जाना चाहते हैं और डोरी के जाल में फँस जाते हैं।

दस-पन्द्रह बीस सेर के पाँच-छह रोहू-कातला मच्छ दम-भर में पकड़कर इन्द्र ने नाव पर रख लिये। विराटकाय मच्छराज अपनी पूँछों की फटकार से हमारी उस छोटी-सी नौका को चूर्ण-विचूर्ण कर डालने का उपक्रम करने लगे और उनका शब्द भी कुछ कम नहीं हुआ।

“इतनी मछलियों का क्या होगा, भाई?”

“जरूरत है। बस, अब और नहीं, चलो भाग चलें।” कहकर उसने जाल छोड़ दिया। अब डाँड़ चलाने की जरूरत नहीं रही। मैं चुपचाप बैठ रहा। उसी प्रकार छिपे-छिपे उसी रास्ते से बाहर जाना था। अनुकूल बहाव में दो-तीन मिनट प्रखर गति से बहने के उपरान्त, एकाएक एक स्थान पर मानो जरा धक्का खाकर, हमारी वह छोटी डोंगी पास के मकई के खेत में प्रवेश कर गयी। उसके इस आकस्मिक गति-परिवर्तन से मैंने चकित होकर पूछा, “क्यों? क्या हुआ?”

इन्द्र ने एक ओर धक्का देकर, उसे कुछ और भी अन्दर ले जाते हुए कहा, “चुप, सालों को मालूम हो गया है- चार नावों को खोलकर साले यहीं आ रहे हैं-वह देखो।” इन्द्र ठीक कह रहा था। जोर के साथ जल को काटती और 'छप-छप्' शब्द करती हुई तीन नौकाएँ हमें निगल जाने के लिए कृष्णकाय दैत्यों के समान दौड़ी आ रही थीं। उस तरफ तो जाल से रास्ता बन्द था; और इस तरफ से ये लोग आ रहे थे- भागकर छुटकारा पाने का जरा-सा भी अवकाश नहीं था। इस मकई के खेत के बीच अपने आपको छिपाया जा सकेगा, यह भी मुझे सम्भव नहीं जान पड़ा।

“अब क्या होगा भाई।” कहते-कहते ही अदम्य वाष्पोच्छवास से मेरा कण्ठ रुद्ध हो गया। इस अन्धकार में, इस पिंजरे के भीतर, अगर ये लोग हमारा खून करके भी इस खेत में गाड़ दें, तो इन्हें कौन रोकेगा?”

इसके पहले पाँच-छह बार इन्द्र 'चोरी की विद्या बड़ी विद्या है', इस बात को सप्रमाण सिद्ध करके निर्विघ्न निकल गया था; इतने दिन, पीछा किये जाने पर भी हाथ न आया था, किन्तु आज?

उसने मुख से कहा कि, “डर की कोई बात नहीं है।” किन्तु मानो गला उसका काँप गया। किन्तु वह रुका नहीं, प्राण-प्रण से लग्गी ठेलकर धीरे-धीरे भीतर छिपने की चेष्टा करने लगा। समस्त टीका जलमय हो गया था। उसके ऊपर आठ-आठ, दस-दस हाथ लम्बे मकई और ज्वार के पेड़ थे और भीतर हम दोनों चोर। कहीं तो पानी छाती तक था, कहीं कमर तक और कहीं घुटनों से अधिक नहीं। ऊपर निबिड़ अन्धकार और आगे-पीछे दायें-बायें निर्भेद्य जंगल। लग्गी कीचड़ में धाँसने लगी और डोंगी अब एक हाथ भी आगे नहीं बढ़ती। पीछे से धीवरों की अस्पष्ट बातचीत कानों में आने लगी। इस बात में अब जरा भी संशय नहीं रहा कि कुछ संदेह करके ही वे लोग चले हैं और अब भी खोजते फिर रहे हैं।

सहसा डोंगी एक ओर कुछ झुककर सीधी हो गयी। आँख उठाकर देखा कि मैं अकेला ही रह गया हूँ, दूसरा व्यक्ति नहीं है। डरते हुए मैंने आवाज दी, “इन्द्र।” पाँच-छह हाथ दूर वन के बीच से आवाज आई, “मैं नीचे हूँ।”

“नीचे क्यों?”

“डोंगी खींचकर निकालनी होगी। मेरी कमर से रस्सी बँधी है।”

“खींचकर कहाँ ले जाओगे?”

“उस गंगा में। थोड़ी ही दूर ले जाने पर बड़ी धारा मिल जाएेगी।”

सुनकर मैं चुप हो गया और क्रम-क्रम से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। अकस्मात् कुछ दूर पर वन के बीच कनस्तर पीटने और फटे बाँसों के फटाफट शब्द से मैं चौंक उठा। डरते हुए मैंने पूछा, “वह क्या है भाई?” उसने उत्तर दिया, “खेतिहर लोग मचान पर बैठे हुए जंगली सूअरों को भगा रहे हैं।”

“जंगली सूअर! कहाँ हैं वे?” इन्द्र नाव खींचते-खींचते लापरवाही से बोला, “मुझे क्या दीख पड़ते हैं, जो बताऊँ? होंगे यहीं कहीं।” जवाब सुनकर मैं स्तब्ध हो रहा। सोचा, किसका मुँह देखा था आज सुबह! सरेशाम ही तो आज घर के भीतर बाघ के हाथ पड़ गया था, अब यदि इस जंगल में बनैले सूअरों के हाथ पड़ जाऊँ, तो इसमें विचित्र ही क्या है? फिर भी मैं तो नाव में बैठा हूँ, किन्तु, यह आदमी, छाती तक कीचड़ और जल में, इस जंगल के भीतर खड़ा है! एक कदम हिलने-डुलने का उपाय भी तो इसके पास नहीं है! कोई पन्द्रह मिनट इसी तरह सोच-विचार में निकल गये। और भी एक वस्तु पर मैं ध्यायन दे रहा था। अक्सर देखता था कि पास ही किसी न किसी ज्वार या मकई के पेड़ का अगला हिस्सा एकाएक हिलने लगता था और 'छप-छप' शब्द होता था। एक दफे तो मेरे हाथ के पास ही हरकत हुई। सशंक होकर उस तरफ मैंने इन्द्र का ध्या न आकर्षित किया कि “बड़ा सूअर न सही, कोई बच्चा-कच्चा हो नहीं है?”

इन्द्र ने अत्यन्त सहज भाव से उत्तर दिया, “वह, कुछ नहीं-साँप लिपटे हैं; आहट पाकर जल में कूद पड़ते हैं।”

“कुछ नहीं, साँप!” काँपकर मैं नाव के बीच सिकुड़कर बैठ गया। अस्फुट स्वर में पूछा, “कैसे साँप भाई?”

इन्द्र ने कहा, “सब किस्म के साँप हैं!-टोंडा, बोंडा, कौंडियाल, काले आदि। पानी में बहते-बहते आए और झाड़ों में लिपट रहे- कहीं भी तो सूखी जमीन नहीं है, देखते नहीं हो?”

“सो तो देखता हूँ।” भय के मारे मेरे तो पैरों के नख से लेकर सिर के बाल तक खड़े हो गये। परन्तु उस भले मानुस ने भूरक्षेप तक न किया, अपना काम करते-करते ही वह कहने लगा, “किन्तु ये काटते नहीं है। ये खुद ही बेचारे डर के मारे मरे जा रहे हैं, दो-तीन तो मेरे ही शरीर को छूते हुए भाग गये हैं। कई एक तो खूब मोटे हैं, मालूम पड़ता है कि वे टोंडा, बोंडा होंगे। और यदि कदाचित् काट ही खायँ, तो क्या किया जाए, मरना तो एक दिन होगा ही भाई! इसी प्रकार वह और भी कुछ अपने मृदु स्वाभाविक कण्ठ से बोलता रहा, मेरे कानों तक कुछ तो पहुँचा और कुछ नहीं पहुँचा। मैं निर्वाक्, निष्पन्द काठ के समान जड़ होकर एक ही स्थान पर एक ही भाव से बैठा रहा। श्वास छोड़ने में भी मानो भय मालूम होने लगा- 'छप' से कहीं कोई मेरी नाव में ही न आ गिरे।

और चाहे जो हो, किन्तु वह क्या आदमी है?, मनुष्य देवता, पिशाच-वह क्या है? किसके साथ मैं इस जंगल में घूम रहा हूँ? यदि मनुष्य है तो क्या वह नहीं जानता कि इस विश्व-संसार में भय नाम की भी कोई चीज होती है? हृदय क्या उसका पत्थर से बना है? क्या वह हमारी ही तरह सिकुड़ता-फैलता नहीं है? तो फिर उस दिन, खेल के मैदान में, सबके भाग जाने पर, बिल्कुशल अपरिचित होते हुए भी, मुझे अकेले को निर्विघ्न बाहर निकाल देने के लिए जो वह शत्रुओं के मध्यद में घुस आया था, सो क्या वह दया-माया भी इस पत्थर में ही विनिहित थी? और आज विपत्ति का सब हाल राई-राई, तिल-तिल, जानते-सुनते हुए भी चुपचाप अकुंठित चित्त से वह इस भयावह और अति भीषण मृत्यु के मुख में उतरकर खड़ा है। एक बार मुँह से यह भी नहीं कहता कि “श्रीकांत भाई, एक बार तू नीचे उतर आ।” वह तो मुझे जबरन नीचे उतारकर नौका खिंचवा सकता था। यह केवल खेल तो है नहीं! जीवन और मृत्यु के आमने-सामने खड़े होकर इस उम्र में, ऐसा स्वार्थ-त्याग कितने आदमियों ने किया है? बिना आडम्बर के कितने सहज भाव से उसने कह दिया कि, 'मरना तो एक दिन होगा ही भाई।' कितने लोग ऐसी सच बात कहते दिखाई देते हैं? यह सच है कि इस विपत्ति में वही मुझे खींच लाया है, फिर भी उसके इतने बड़े स्वार्थ-त्याग को मनुष्य की देह धारण करते हुए मैं किस तरह भूल जाऊँ भला? किस तरह भूलूँ उसे,- जिसके हृदय के भीतर से इतना बड़ा अयाचित दान इतनी सरलता से बाहर आ गया? उस हृदय को किसने किस चीज से गढ़ा होगा? उसके बाद कितने काल और कितने सुख-दु:खों में से होकर मैं आज इस बुढ़ापे को प्राप्त हुआ हूँ। कितने देश, कितने प्रान्त, कितने नद-नदी, पहाड़-पर्वत, वन-जंगल, घूमा फिरा हूँ-कितने प्रकार के मनुष्य इन दो आँखों के सामने से गुजर गये हैं- किन्तु इतना बड़ा महाप्राण व्यक्ति तो और कभी देखने को नहीं मिला! परन्तु वह अब नहीं रहा, अकस्मात् एक दिन मानो बुद्बु की तरह शून्य में मिल गया। आज उसकी याद आते ही दोनों सूखी आँखें जल से भर आती हैं, केवल एक निष्फल अभिमान हृदय के तल-देश को आलोड़ित करके ऊपर की ओर फेन के माफिक तैर आता है। हे सृष्टिकर्ता! क्यों तूने उस अद्भुत, अपार्थिव वस्तु को सृष्ट करके भेजा था और इस प्रकार व्यर्थ करके क्यों उसे वापिस बुला लिया? बड़ी ही व्यथा से मेरा यह असहिष्णु मन आज बारम्बार यही प्रश्न करता है- भगवान! तुम्हें रुपया-पैसा, धन-दौलत, विद्या-बुद्धि तो अपने अखूट, भंडार से ढेर की ढेर देते हुए देखता हूँ किन्तु इतने बड़े महाप्राण व्यक्ति आज तक तुम कितने दे सके हो? खैर, जाने दो इस बात को। घोर जल-कल्लोल क्रमश: पास में आता-जाता है, इस बात को मैं जान रहा था; इसलिए और कोई सवाल किये बगैर मैंने समझ लिया कि इस जंगल के बीच में ही वह भीषण प्रवाह प्रवाहि‍त हो रहा है जिसको स्टीमर भी पार नहीं कर पाते। मैं खूब अनुभव कर रहा था कि पानी का वेग बढ़ रहा है और धूसर वर्ण का फेन का पुंज विस्तृत रेत-राशि का भ्रम उत्पन्न कर रहा है। इन्द्र नौका पर चढ़ आया और डाँड़ को हाथ में लेकर सामने के उद्दाम स्रोत का सामना करने को तैयार हो बैठा। वह बोला, “अब कोई डर नहीं है, हम बड़ी गंगा में आ पहुँचे हैं।” मैंने मन ही मन कहा- अब, डर नहीं है तो अच्छा है। किन्तु डर तुम्हें काहे का है सो तो मैं समझा ही नहीं। क्षण-भर बाद ही नौका एक बार मानो सिर से पैर तक काँप उठी और पलक मारने के पहले ही मैंने देखा कि वह बड़ी गंगा के स्रोत में पड़कर उल्का के वेग से दौड़ी जा रही है।

उस समय छिन्न बादलों की आड़ में मालूम हुआ, मानो चन्द्रमा उदय हो रहा है क्योंकि जैसे अन्धकार में हम अभी तक यात्रा करते आ रहे थे वैसा अन्धकार अब नहीं रहा था। अब बहुत दूर तक, चाहे साफ भले ही न हो, दिखाई देने लगा था। मैंने देखा जंगली झाऊ और मकई-जुआरवाला टीला दाहिनी ओर छोड़कर हमारी नाव सीधी चली जा रही है।
♦♦ • ♦♦

“बहुत जोर से नींद आ रही है इन्द्र, अब घर लौट चलो भाई!” इन्द्र ने कुछ हँसकर ठीक स्त्री-सुलभ स्नेहार्द्र कोमल स्वर में कहा, “नींद आने की तो बात ही है भइया, पर क्या किया जाए श्रीकांत आज तो कुछ देर होगी ही- अभी बहुत-सा काम पड़ा है। अच्छा एक काम करो न, इसी जगह थोड़ा-सा लेट लो।”

दुबारा अनुरोध की जरूरत ही नहीं हुई, मैं गुड़मुड़ होकर उसी स्थान पर लेट गया। परन्तु नींद नहीं आई। अधामुँदी आँखों से मैं चुपचाप आकाश में बादलों और चाँद की आँख-मिचौनी देखने लगा। यह डूबा, वह निकला, फिर डूबा, हँसा। और कान में आने लगी जल-प्रवाह की, वही सतत हुंकार। यह एक ही बात प्राय: मेरे मन में आया करती है कि मैं उस दिन इस प्रकार सब कुछ भूल-भालकर बादलों और चन्द्रमा के बीच कैसे डूब गया था? तन्मय होकर चाँद देखने की अवस्था तो मेरी उस समय थी नहीं। किन्तु बड़े-बूढ़े लोग पृथ्वी के अनेक व्यापार देख-सुनकर कहा करते हैं कि यह बाहरी चाँद कुछ नहीं है, बादल भी कुछ नहीं है- सब माया है, मिथ्या है, दरअसल कुछ चीज है तो यह अपना मन है। वह जब जिसे जो दिखता है विभोर होकर तब वह केवल वही देखता है। मेरी भी यही दशा थी। इतने प्रकार की भयंकर घटनाओं में से, इस प्रकार सही-सलामत बाहर निकल आने के उपरान्त, मेरा निर्जीव मन, उस समय, शायद, ऐसी ही किसी एक शान्त तसवीर के भीतर विश्राम लेना चाहता था।

इतने में घण्टे-दो घण्टे निकल गये, जिनकी मुझे खबर ही नहीं हुई। एकाएक मुझे मालूम हुआ कि मानो चाँद बादलों के बीच एक लम्बी डुबकी लगा गया है, और एकाएक दाहिनी ओर से बाईं ओर जाकर अपना मुँह बाहर निकाल रहा है। गर्दन कुछ ऊपर उठाकर देखा, नौका अब उस पार जाने की तैयारी में है। प्रश्न करने अथवा कुछ कहने का उद्यम भी, शायद उस समय मुझमें शेष नहीं था; इसलिए मैं फिर उसी तरह लेट गया। फिर वही आँखें भरकर प्रवाह का गर्जन-तर्जन देखने-सुनने लगा। शायद इस तरह एक घण्टा और भी बीत गया।

खस्-से-रेत के टीले पर नौका टकराई। व्यस्त होकर मैं उठकर बैठ गया। अरे, यह तो इस पार आ पहुँचे। परन्तु यह जगह कौन-सी है? घर मेरा कितनी दूर है? रेत के ढेर के सिवाय और तो कहीं कुछ दीख ही नहीं रहा है? सवाल करने के पहले ही एकाएक कहीं पास ही कुत्तों का भूँकना सुनकर मैं और भी सीधा होकर बैठ गया। निश्चय ही कहीं पास में बस्ती है।

इन्द्र बोला, “तनिक ठहर श्रीकांत, मैं थोड़ा-सा घूमकर अभी लौट आऊँगा- तुझे अब कुछ डर नहीं है। इस कगारे के उस पार ही धीवरों के मकान हैं।”

साहस की इतनी परीक्षाएँ पास करने के उपरान्त अन्त में यहाँ आकर फेल हो जाने की मेरी बिल्कुनल इच्छा नहीं थी; और खास करके मनुष्य की इस किशोर अवस्था में, जिसके समान महा-विस्मयकारी वस्तु संसार में शायद और कोई नहीं है। एक तो वैसे ही मनुष्य की मानसिक गतिविधि बहुत ही दुर्जेय होती है; और फिर किशोर-किशोरी के मन का भाव तो, मैं समझता हूँ, बिल्कुनल ही अज्ञेय है। इसीलिए शायद, श्रीवृन्दावन के उन किशोर-किशोरी की किशोरलीला चिरकाल से ऐसे रहस्य से आच्छादित चली आती है। बुद्धि के द्वारा ग्राह्य न कर सकने के कारण किसी ने उसे कहा, 'अच्छी' किसी ने कहा, 'बुरी'-किसी ने 'नीति' की दुहाई दी, किसी ने 'रुचि' की और किसी ने कोई भी बात न सुनी-वे तर्क-वितर्क के समस्त घेरों का उल्लघंन कर बाहर हो गये। जो बाहर हो गये, वे डूब गये, पागल हो गये; और नाचकर, रोकर, गाकर-एकाकार करके संसार को उन्होंने मानो एक पागलखाना बना छोड़ा। तब, जिन लोगों ने 'बुरी' कहकर गालियाँ दी थीं उन्होंने भी कहा कि- और चाहे जो हो किन्तु, ऐसा रस का झरना और कहीं नहीं है। जिनकी 'रुचि' के साथ इस लीला का मेल नहीं मिलता था उन्होंने भी स्वीकार किया- इस पागलों के दल को छोड़कर हमने ऐसा गान और कहीं नहीं सुना। किन्तु यह घटना जिस आश्रय को लेकर घटित हुई, जो सदा पुरातन है, और साथ ही चिर-नूतन भी- वृन्दावन के वन-वन में होने वाली किशोर-किशोरी की उस सुन्दरतम लीला का अन्त किसने कब खोज पाया है, जिसके निकट वेदान्त तुच्छ है और मुक्ति-फल जिसकी तुलना में बारिश के आगे वारि-बिन्दु के समान क्षुद्र है! न किसी ने खोज पाया है और न कोई कभी खोज पायेगा। इसीलिए तो मैंने कहा कि उस समय मेरी वही किशोर अवस्था थी। भले ही उस समय यौवन का तेज और दृढ़ता न आई हो, परन्तु फिर भी उसका दम्भ तो आकर हाजिर हो गया था! आत्मसम्मान की आकांक्षा तो हृदय में सजग हो गयी थी! उस समय अपने सखा के निकट अपने को कौन डरपोक सिद्ध करना चाहेगा? इसलिए मैंने उसी दम जवाब दिया, “मैं डरूँगा क्यों? अच्छा तो है, जाओ।” इन्द्र ने और दूसरा वाक्य खर्च न किया और वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ अदृश्य हो गया।

ऊपर सिर पर अन्धकार-प्रकाश की वह आँख-मिचौनी हो रही थी, पीछे बहुत दूर तक अविश्रान्त सतत गर्जन-तर्जन हो रहा था और सामने वही रेती का किनारा था। यह कौन स्थान है, सोच ही रहा था कि इन्द्र दौड़ता हुआ आकर खड़ा हो गया। बोला, “श्रीकांत, तुझसे एक बात कहने को लौट आया हूँ। यदि कोई मच्छ माँगने आवे तो खबरदार देना नहीं- कहे देता हूँ, खबरदार, हरगिज न देना। ठीक मेरे समान रूप बनाकर यदि कोई आवे, तो भी मत देना। कहना, तेरे मुँह पर धूल, इच्छा हो तो तू खुद ही उठा ले जा, खबरदार! हाथ से किसी को उठाकर न देना, भले ही मैं ही क्यों न होऊँ- खबरदार!”

“क्यों भाई?”

“लौटने पर बताऊँगा- किन्तु खबरदार।” यह कहते-कहते वह जैसे आया था वैसे ही दौड़ता हुआ चला गया।

इस दफे नख से शिख तक मेरे सब रोंगटे खड़े हो गये। जान पड़ा कि मानो शरीर की प्रत्येक शिरा उपशिरा में से बरफ का गला हुआ पानी बह चला है। मैं बिल्कुयल बच्चा तो था नहीं, जो उसके इशारे का मतलब बिल्कुंल न भाँप सकता! मेरे जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ घट चुकी हैं जिनकी तुलना में यह घटना समुद्र के आगे गौ के खुर के गढ़े में भरे हुए पानी के समान थी। किन्तु फिर भी इस रात्रि की यात्रा में जो भय मैंने अनुभव किया, उसे भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मालूम होता था कि भय के मारे होश-हवास गुम करने की अन्तिम सीढ़ी पर आकर ही मैंने पैर रख दिया है। प्रतिक्षण जान पड़ता था कि कगार के उस तरफ से मानो कोई झाँक-झाँककर देख रहा है। जैसे ही मैं तिरछी दृष्टि से देखता हूँ, वैसे ही मानो वह सिर नीचा करके छिप जाता है।

समय कटता नहीं था। मानो इन्द्र ने जाने कितने युग हुए चला गया है- और लौट नहीं रहा है।

ऐसा मालूम हुआ मानो किसी मनुष्य की आवाज सुनी हो। जनेऊ को अंगूठे में सैकड़ों बार लपेटकर मुख नीचा करके कान खड़े करके सुनने लगा। गले की आवाज क्रमश: अधिक साफ होने लगी, अच्छी तरह मालूम पड़ने लगा कि दो-तीन आदमी बातचीत करते हुए इसी तरह आ रहे हैं। उनमें से एक तो इन्द्र है और बाकी दो हिंदुस्तानी। वे हों चाहे जो, किन्तु उनके मुख की ओर देखने के पूर्व मैंने यह अच्छी तरह देख लिया कि चाँदनी में उनकी छाया जमीन पर पड़ी है या नहीं! क्योंकि इस अवि-संवादी सत्य को मैं छुटपन से ही अच्छी तरह जानता था कि 'उन लोगों' (भूतों) की छाया नहीं पड़ती!”

आ:, यह तो छाया है! उतनी ही साफ, फिर भी छाया है! संसार में उस दिन किसी भी आदमी ने और किसी वस्तु को देखकर, क्या मेरे जैसी तृप्ति पाई होगी? पाई हो या न पाई हो, परन्तु यह बात तो मैं बाजी लगाकर कह सकता हूँ कि दृष्टि का चरम आनन्द जिसे कहते हैं, वह यही था। जो लोग आए उन्होंने असाधारण तेजी से उन बड़े-बड़े मच्छों को नाव में से उठाकर एक जाल जैसे वस्त्र के टुकड़े में बाँध लिया, और उसके बदले में उन्होंने इन्द्र की मुट्ठी में जो कुछ थमा दिया उसने 'खन्' से एक मृदु-मधुर शब्द करके अपना परिचय भी मेरे आगे पूर्णत: गुप्त न रहने दिया।

इन्द्र ने नाव खोल दी; परन्तु बहाव में नहीं छोड़ी। धार के पास-पास, प्रवाह के प्रतिकूल, लग्गी से ठेलते हुए वह धीरे-धीरे अग्रसर होने लगा।

मैंने कोई बात नहीं कही, क्योंकि मेरा मन उस समय उसके विरुद्ध घृणा के भाव से और एक प्रकार के क्षोभ से लबालब भर गया था। किन्तु यह क्या! अभी-अभी ही तो उसे चन्द्रमा के प्रकाश में छाया डालते हुए, लौटते देखकर अधीर आनन्द से दौड़कर छाती से लगा लेने के लिए उन्मुख हो उठा था!

हाँ, सो मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। तनिक-सा दोष देखते ही, कुछ क्षणपूर्व की सभी बातें भूलते उसे कितनी-सी देर लगती है! राम! राम! राम! उसने इस तरह रुपये प्राप्त किये! अब तक मछली चुराने का यह व्यापार मेरे मन में, बहुत स्पष्ट तौर से, चोरी के रूप में शायद स्थान न पा सका था! क्योंकि लड़कपन से ही, रुपये पैसों की चोरी ही मानो वास्तविक चोरी है-और सब, अनीती भले ही हो किन्तु, न जाने क्यों ठीक-ठीक चोरी नहीं है- इस तरह की अद्भुत धारणा प्राय: सभी लड़कों की होती है। मेरी भी यही धारणा थी। ऐसा न होता तो इस 'खन्' शब्द के कान में जाते ही इतने समय का इतना वीरत्व, इतना पौरुष, सब कुछ क्षण-भर में इस प्रकार शुष्क तृण के समान न झड़ जाता। यदि उन मच्छों को गंगा में फेंक दिया जाता- अथवा और कुछ किया जाता- केवल रुपयों के साथ उनका संसर्ग घटित न होता, फिर भी हमारी उस मत्स्य-संग्रह-यात्रा को कोई 'चोरी' कहकर पुकारता, तो शायद गुस्से में आकर मैं उसका सिर फोड़ देता और समझता कि उसने वास्तव में जो सजा मिलनी चाहिए वही पाई है- किन्तु राम! राम! यह क्या! यह काम तो जेलखाने के कैदी किया करते हैं!

इन्द्र ने बात शुरू की पूछा, “तुझे दूसरा भी डर न लगा, क्यों रे श्रीकांत?”

मैंने संक्षेप में जवाब दिया, “नहीं!”

इन्द्र बोला, “किन्तु तेरे सिवा वहाँ और कोई बैठा न रह सकता, यह जानता है तू? तुझे मैं खूब प्यार करता हूँ- मेरा ऐसा दोस्त और कोई नहीं है। मैं अब जब आऊँगा, सिर्फ तुझे ही लाऊँगा। क्यों?”

मैंने जवाब नहीं दिया। किन्तु इसी समय उसके मुख पर तुरंत के मेघ मुक्त चन्द्रमा का जो प्रकाश पड़ा, उससे मुख पर जो कुछ दिखाई दिया उससे एकाएक मैं अपना इतनी देर का सब क्रोध, क्षोभ भूल गया। मैंने पूछा, “अच्छा इन्द्र, तुमने कभी 'उन सब को1 देखा है?”

“किन सबको?”

“वही जो मच्छ माँगने आते हैं?”

“नहीं भाई, देखा तो नहीं है, लेकिन लोग जो कहते हैं वह सुना है।”

“अच्छा तुम यहाँ अकेले आ सकते हो?”

इन्द्र हँसा, बोला, “मैं तो अकेला ही आया करता हूँ।”

“डर नहीं लगता?”

“नहीं राम का नाम लेता हूँ, फिर वे किसी तरह नहीं आ सकते।”

कुछ देर रुककर फिर कहना शुरू किया, “राम-नाम क्या कोई साधारण चीज है रे? यदि तू राम का नाम लेते-लेते साँप के मुँह में चला जाए, तो तेरा कुछ न बिगडेग़ा। देखेगा, कि मारे डर के सभी रास्ता छोड़कर भागने लगे हैं। किन्तु डरने से काम नहीं चलता। तब तो वे जान जाते हैं कि, यह सिर्फ चालाकी कर रहा है-वे सब अन्तर्यामी जो हैं!”

रेती का किनारा खत्म होते ही कंकड़ों का किनारा शुरू हो गया। उस पार की अपेक्षा इस पार पानी का बहाव बहुत कम था। बल्कि यहाँ तो मालूम हुआ मानो बहाव उलटी तरफ जा रहा है। इन्द्र ने लग्गी उठाकर कर्ण (पतवार) हाथ में लेते हुए कहा, “वह जो सामने वन सरीखा दीख पड़ता है, उसी में से होकर हमें जाना है। यहाँ जरा मैं उतरूँगा। जाऊँगा और आ जाऊँगा। देर न लगेगी। क्यों उतर जाऊँ?”

1. 'उन सब' से तात्पर्य भूतों का है। बंगाल में प्रवाद है कि अकेले में भूत मछली माँगने आते हैं।

इच्छा ने रहते भी मैंने कहा, 'अच्छा' क्योंकि 'नहीं' कहने का रास्ता तो मैं एक प्रकार से आप ही बन्द कर चुका था। और अब इन्द्र भी मेरी निर्भीकता के सम्बन्ध में शायद निश्चिन्त हो गया था। परन्तु बात मुझे अच्छी न लगी। यहाँ से वह जगह ऐसी जंगल सरीखी अंधेरी दीख पड़ती थी कि अभी-अभी राम-नाम का असाधारण माहात्म्य श्रवण करके भी, उस अंधकार में, प्राचीन वट-वृक्ष के नीचे, डोंगी के ऊपर अकेले बैठे रहकर, इतनी रात को राम-नाम का शक्ति-सामर्थ्य जाँच करने की मेरी जरा भी प्रवृत्ति नहीं हुई और शरीर में कँपकँपी होने लगी। यह ठीक है कि मछलियाँ और नहीं थीं, इसलिए मछली लेने वालों का शुभागमन न हो सकेगा, किन्तु उन सबका लोभ मछलियों के ऊपर ही है, यह भी कौन कह सकता है? मनुष्य की गर्दन मरोड़ कर गुनगुना रक्त पीने और मांस खाने का इतिहास भी तो सुना गया है!

बहाव की अनुकूलता और डाँड़ की ताड़ना से डोंगी सर्राटे से आगे बढ़ने लगी। और भी कुछ देर जाते ही, दाहिनी बाजू का गर्दन तक डूबा हुआ जंगली झाऊ और काँस का वन माथा उठाकर हम दोनों असीम-साहसी मानव-शिशुओं की तरफ विस्मय से स्तब्ध हो देखता रहा और उसमें से कोई-कोई झाड़ तो सिर हिलाकर मानो अपना निषेध जताने लगा! बाईं ओर भी उन्हीं के आत्मीय परिजन खूब ऊँचे कंकरीले किनारों पर फैले हुए थे; वे भी उसी भाव से देखते रहे और उसी तरह मना करने लगे। मैं अगर अकेला होता तो निश्चय से उनका यह संकेत अमान्य नहीं करता; परन्तु मेरा कर्णधार जो था, उसके निकट ऐसा मालूम हुआ कि मानो एक राम-नाम के जोर से उनके समस्त आवेदन-निवेदन एक बार ही व्यर्थ हो गये। उसने किसी तरफ भौंहें तक न फिराईं। दाहिनी ओर के टीले के अधिक विस्तार के कारण यह जगह एक छोटी-मोटी झील के समान हो गयी थी- सिर्फ उत्तर की ओर का मुँह खुला हुआ था। मैंने पूछा, “अच्छा, नाव को बाँधकर ऊपर जाने का घाट तो है नहीं, तुम जाओगे किस तरह?”

इन्द्र बोला, “यह जो बड़का वृक्ष है, उसके पास में ही एक छोटा-सा घाटहै।”

कुछ देर से न जाने कैसी दुर्गन्ध बीच-बीच में हवा के साथ नाक तक आ रही थी। एकाएक एक हवा के झोंके के साथ वह दुर्गन्ध इतनी निकट होकर नाक में लगी कि असह्य हो गयी। जितना ही आगे बढ़ते थे, उतनी ही वह बढ़ती थी। नाक पर कपड़ा दबाते हुए मैं बोला, “निश्चय से कुछ सड़ गया है, इन्द्र।”

इन्द्र बोला, “मुर्दे सड़ गये हैं। आजकल भयानक कालरा जो फैल रहा है। सभी तो लाशों को जला पाते नहीं, मुँह पर जरा आग छुआकर छोड़कर चले जाते हैं। सियार और कुत्ते उन्हें खाते हैं- और वे सड़ती हैं। उन्हीं की तो यह इतनी गन्ध है।”

“लाशों को किस जगह फेंक जाते हैं, भइया?”

“वहाँ से लेकर यहाँ तक- सब ही तो श्मशान हैं। जहाँ चाहें फेंक देते हैं और इस बड़के नीचे के घाट पर स्नान करके घर चले जाते हैं। अरे दुर! डर क्या है रे! वे सियार-सियार आपस में लड़ रहे हैं। अच्छा, आ-आ, मेरे पास आकर बैठ।”

“मेरे गले से आवाज न निकलती थी- किसी तरह मैं घिसटकर उसकी गोद के निकट जाकर बैठ गया। पल-भर के लिए मुझे स्पर्श करके और हँसकर वह बोला, “डर क्या है श्रीकांत, कितनी दफे रात को मैं इस रास्ते आया-गया हूँ। तीन बार राम का नाम लेने से फिर किसकी ताकत है जो पास में फटके?”

उसे स्पर्श करके मानो मेरी देह में जरा चेतना आई। मैंने अस्फुट स्वर में कहा, “नहीं भाई, तुम्हारे दोनों पैर पड़ता हूँ, यहाँ पर कहीं मत उतरो- सीधे ही चले चलो।”

उसने फिर मेरे कन्धों पर हाथ रखकर कहा, “नहीं श्रीकांत, एक दफे जाना ही पड़ेगा। यह रुपये दिए बिना काम न चलेगा- वे बैठे राह देख रहे होंगे- मैं तीन दिन से नहीं आ पाया।”

“रुपये कल न दे देना भाई!”

“नहीं भाई, ऐसी बात न कर। मेरे साथ तू भी चल- किन्तु किसी से यह बात कहना मत।”

मैं धीरे से 'ना' कहकर उसे उसी तरह स्पर्श किये हुए, पत्थर की नाईं बैठा रहा। गला सूखकर काठ हो गया था। किन्तु हाथ बढ़ाकर पानी पी लूँ, या हिलने-डोलने की कोई चेष्टा करूँ, यह शक्ति ही नहीं रही थी।

पेड़ों की छाया के बीच में आ पड़ने से पास ही वह घाट दीख पड़ा। जहाँ हमें नीचे उतरना था वह स्थान, ऊपर पेड़ वगैरह न होने से, म्लान ज्योत्सरना के प्रकाश में भी खूब प्रकाशमान हो रहा था- यह देखकर इतने दु:ख में भी मुझे आराम मिला। घाट के कंकड़ों में जाकर डोंगी धक्का न खा जाए, इसलिए इन्द्र पहले से ही उतरने के लिए प्रस्तुत होकर डोंगी के मुँह के पास तक खिसक आया था। किनारे लगते न लगते वह उस पर से फाँद पड़ा; पर फाँदते ही भयभीत स्वर से 'उफ' कर उठा। मैं उसके पीछे ही था, इसलिए दोनों की नजर उस वस्तु पर प्राय: एक ही साथ पड़ी। उस समय वह नीचे था और मैं नौका के ऊपर।

शायद मेरे जीवन में 'अकाल-मृत्यु' कभी उतने करुणा रूप में नजर नहीं आई थी। वह कितनी बड़ी व्यथा का कारण होती है, यह बात, उस तरह न देखी जाए तो, शायद और तरह से जानी ही नहीं जा सकती। गम्भीर रात्रि में चारों दिशाएँ निबिड़ स्तब्धता से परिपूर्ण थीं। सिर्फ बीच-बीच में झाड़-झंखाड़ों में से कहीं श्मशानचारी सियारों का क्षुधार्त कलह-चीत्कार, कहीं वृक्षों पर सोते हुए अर्धसुप्त बृहत्काय पक्षियों के पंखों की फड़फड़ाहट और बहुत दूर से आया हुआ तीव्र जल प्रवाह का 'हू-हू' आर्त्तनाद सुन पड़ता था। हम दोनों, इन सबके बीच, निर्वाक् निस्तब्ध होकर उस महा करुण दृश्य की ओर देखते रहे। एक छह-सात वर्ष का गौरवर्ण हृष्ट-पुष्ट बालक पड़ा हुआ दिखाई दिया, जिसका सर्वाक्ष पानी में डूबा हुआ था और सिर्फ सिर घाट के ऊपर था। शायद सियार हाल में ही उसे पानी से बाहर निकाल रहे थे, और अब केवल हमारे आकस्मिक आगमन के कारण, कहीं पास ही खड़े हुए हमारे जाने की राह देख रहे हैं। बहुत करके उसे मरे हुए तीन-चार घण्टे से अधिक नहीं हुए थे। मानो वह बेचारा विसूचिका (हैजा) की दारुण यातना भोगकर माता गंगा की गोद में ही सो गया था, और माँ मानो बड़ी सावधानी से उसकी सुकुमार सुन्दर देह को अभी-अभी अपनी गोद से उतारकर बिछौने पर सुला रही थी। इस तरह कुछ जल और कुछ स्थल पर पड़ी हुई उस सोते हुए शिशु की देह पर हमारी आँखें जा पड़ीं।

मुँह ऊपर उठाया तो देखा कि इन्द्र की दोनों आँखों से आँसुओं के बड़े-बड़े बिन्दु झर रहे हैं। वह बोला, “तू जरा हटकर खड़ा हो जा श्रीकांत, मैं इस बेचार को, नौका में रखकर टीले के उस झाऊ-वन के भीतर रखे आता हूँ।”

यह सत्य है कि उसकी आँखों में आँसू देखते ही मेरी आँखों में भी आँसू आ गये, किन्तु इस छूने-ऊने के प्रस्ताव में मैं एकबारगी संकुचित हो उठा। इस बात को मैं अस्वीकार नहीं करता कि दूसरे के दु:ख में दु:खी होकर आँखों से आँसू बहाना सहज नहीं है, किन्तु इसी कारण, उस दु:ख के बीच अपने दोनों हाथ बढ़ाकर जुट जाना- यह बहुत अधिक कठिन काम है। उस समय छोटी-बड़ी न जाने कितनी जगहों से खिंचाव पड़ता है। अव्वल तो मैं इस पृथ्वी के शिरोभूत हिन्दू-घर में वशिष्ठ इत्यादि के पवित्र पूज्य रक्त का वंशधर होकर जन्मा, इसलिए, जन्मगत संस्कारों के वश मैंने सीख रक्खा था कि मृत देह को स्पर्श करना भी एक भीषण कठिन व्यापार है। दूसरे इसमें न जाने कितने शास्त्रीय विधि-निषेधों की बाधाएँ हैं और कितने तरह-तरह के कर्म-काण्डों का घटाटोप है। इसके सिवा यह किस रोग से मरा है, किसका लड़का है, किस जाति का है- आदि कुछ न जानते हुए और मरने के बाद यह ठीक तौर से प्रायश्चित करके घर से बाहर हुआ था या नहीं, इसका पता लगाए बिना ही इसे स्पर्श किस तरह किया जा सकता है?

कुण्ठित होकर जैसे ही मैंने पूछा, “किस जाति का मुर्दा है और क्या तुम इसे छुओगे?” कि इन्द्र ने आगे बढ़कर एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे और दूसरा हाथ घुटनों के नीचे देकर उसे सूखे तिनकों के समान उठा लिया और कहा, “नहीं तो बेचारे को सियार नोच-नोचकर न खा जाँयगे? अहा, इसके मुँह से तो अभी तक औषधियों की गन्ध आ रही है रे!” यह कहते-कहते उसने नौका के उसी तख्त पर, जिस पर कि पहले मैं सोया था, उसे सुला दिया और नाव को ठेलकर स्वयं भी चढ़ गया। बोला, “मुर्दे की क्या जात होती है रे?” मैंने तर्क किया, “क्यों नहीं होती?”

इन्द्र बोला, “अरे यह तो मुर्दा है! मरे हुए की जात क्या? यह तो वैसा ही है जैसे हमारी यह डोंगी- इसकी भला क्या जात है? आम या जामुन जिस कभी भी काठ की बनी हो- अब तो इसे 'डोंगी' छोड़ कोई भी नहीं कहेगा कि यह आम है या जामुन। समझा कि नहीं? यह भी उसी तरह है।”

अब मालूम होता है कि यह दृष्टान्त निरे बच्चों का सा था- किन्तु अन्तर में यह भी तो अस्वीकार करते नहीं बनता कि यहीं कहीं, इसी के बीच, एक अति तीक्ष्ण सत्य अपने आपको छुपाए हुए बैठा है। बीच-बीच में ऐसी ही खरी बातें वह कह जाएा करता था। इसीलिए, मैंने अनेक दफे सोचा है कि इस उम्र में, किसी के पास कुछ भी शिक्षा पाए बगैर, बल्कि प्रचलित शिक्षा-संस्कारों को अतिक्रम करके- इन सब तत्वों को उसने पाया कहाँ? किन्तु अब ऐसा जान पड़ता है कि उम्र बढ़ने के साथ मानो मैंने इसका उत्तर भी पा लिया है। कपट तो मानो इन्द्र में था ही नहीं। उद्देश्य को गुप्त रखकर तो वह कोई काम करना जानता ही न था। इसलिए मैं समझता हूँ, उसके हृदय का वह व्यक्तिगत विच्छिन्न सत्य किसी अज्ञात नियम के वंशवर्ती होकर, उस विश्वव्यापी अविच्छिन्न निखिल सत्य का साक्षात् करके, अनायास ही, बहुत ही, सहज में, उसे अपने आप में आकर्षित कर आत्मसात् कर सकता था। उसकी शुद्ध सरल बुद्धि, पक्के उस्ताद की उम्मैदवारी किये बगैर ही, समस्त व्यापार को ठीक-ठीक अच्छी तरह जान लेती थी। वास्तविक, अकपट सहज बुद्धि ही तो संसार में परम और चरम बुद्धि है। इसके ऊपर और कुछ भी नहीं है। अच्छी तरह से देखने पर 'मिथ्या' नाम की किसी भी वस्तु का अस्तित्व इस विश्व-ब्रह्माण्ड में नजर नहीं पड़ता। 'मिथ्या' तो सिर्फ मनुष्य के मानने का और एक फलमात्र है। सोने को पीतल मानना भी मिथ्या है और मनाना भी- यह मैं जानता हूँ। परन्तु इससे सोने का अथवा पीतल का क्या आता-जाता है। तुम्हारी जो इच्छा हो सो उसे मानो, वह तो जो कुछ है, सो ही रहेगा। सोना समझकर उसे सन्दूक में बन्द करके रखने से उसके वास्तविक मूल्य में वृद्धि नहीं होती, और पीतल कहकर बाहर फेंक देने से उसका मूल्य नहीं घटता। उस दिन भी वह पीतल था और आज भी पीतल है। तुम्हारे 'मिथ्या' के लिए तुम्हें छोड़कर न और कोई उत्तरदायी है; और न कोई भ्रूक्षेप ही करता है। इस विश्व-ब्रह्माण्ड का समस्त ही परिपूर्ण सत्य है। मिथ्या का अस्तित्व यदि कहीं है तो वह मनुष्य के मन को छोड़कर और कहीं नहीं है। इसलिए इन्द्र ने इस असत्य को, अपने अन्तर में जाने या अनजाने में, किसी दिन जब स्थान नहीं दिया तब यदि उसकी विशुद्ध बुद्धि मंगल और सत्य को ही प्राप्त करती है, तो इसमें विचित्र ही क्या हुआ?

किन्तु यह बात उसके लिए विचित्र न होने पर भी, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि किसी के लिए भी विचित्र नहीं है। ठीक इसी बहाने, मैंने अपने जीवन में ही जो इसका प्रमाण पाया है, उसे कह देने का लोभ मैं यहाँ संवरण नहीं कर सकता।

उक्त घटना के 10-11 वर्ष बाद एकाएक एक दिन शाम के वक्त यह संवाद मिला कि एक वृद्धा ब्राह्मणी उस मुहल्ले में सुबह से मरी पड़ी है- किसी तरह भी उसके क्रिया-कर्म के लिए लोग नहीं जुटते। न जुटने का हेतु यह है कि वह काशी-यात्रा से लौटते समय रास्ते में रोग-ग्रस्त हो गयी, और उस शहर में, रेल पर से उतरकर सामान्य परिचय के सहारे जिनके घर आकर, उसने आश्रय ग्रहण किया, और दो रात रहकर आज सुबह प्राण-त्याग किया, वे महाशय विलायत से लौटे हुए थे और बिरादरी से अलग थे। वृद्धा का यही अपराध था कि उसे नितान्त निरुपाय अवस्था में इस 'बिरादरी से खारिज' घर में मरना पड़ा।

खैर, अग्नि-संस्कार करके दूसरे दिन सुबह वापस आकर मैंने देखा कि हर एक घर के किवाड़ बन्द हो गये हैं। सुनने में आया कि गत रात को, ग्यारह बजे तक, हरिकेन लालटेन हाथ में लिये हुए, पंच लोगों ने घर-घर फिरकर स्थिर कर दिया है कि इस अत्यन्त शास्त्र-विरुद्ध अपकर्म (दाह) करने के कारण इन कुलांगारों को सिर मुँड़ाना होगा, अपराध स्वीकार करना होगा और एक ऐसी वस्तु (गोबर) खानी पड़ेगी जो कि सुपवित्र होते हुए भी खाद्य नहीं है। उन्होंने घर-घर जाकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि इसमें उनका कोई भी हाथ नहीं है; क्योंकि अपने जीते-जी, वे समाज में किसी भी तरह यह अशास्त्रीय काम नहीं होने दे सकते। हम लोग, और कोई उपाय न रहने पर डॉक्टर साहब के शरण में गये। वे ही उस शहर में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक थे और बिना दक्षिणा के ही बंगालियों की चिकित्सा किया करते थे। हमारी कहानी सुनकर डॉक्टर महाशय क्रोध से सुलग उठे और बोले, “जो लोग इस तरह लोगों को सताते हैं, उनके घरों में यदि कोई मेरी आँखों के सामने बिना चिकित्सा के मरता होगा, तो भी मैं उस ओर आँख उठाकर नहीं देखूँगा।” न मालूम, किसने यह बात पंचों के कानों तक पहुँचा दी। बस, शाम होते न होते मैंने सुना कि सिर मुँड़ाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ अपराध स्वीकार करके उस सुपवित्र पदार्थ को खा लेने मात्र से काम चल जाएेगा! हमारे स्वीकार न करने पर दूसरे दिन सुबह सुना गया, अपराध स्वीकार कर लेने से ही काम हो जाएेगा- वह पदार्थ न खाना हो तो न सही! इसे भी न स्वीकार करने पर सुना गया कि चूँकि यह हम लोगों का प्रथम अपराध है, इसलिए, उन्होंने उसे यों ही माफ कर दिया है, प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं है! किन्तु, डॉक्टर साहब बोले, “ठीक है कि प्रायश्चित की कोई जरूरत नहीं परन्तु दो दिन तक इन्हें जो क्लेश दिया गया है, उसके लिए यदि प्रत्येक आदमी आकर क्षमा प्रार्थना न करेगा, तो फिर, जैसा कि वे पहले कह चुके हैं, वैसा ही करेंगे, अर्थात् किसी के भी घर न जाँयगे।” इसके बाद उसी दिन संध्यान के समय से डॉक्टर साहब के घर एक-एक करके सभी वृद्ध पंचों का शुभागमन होना शुरू हो गया। आशीर्वाद दे-देकर उन्होंने क्या-क्या कहा, उसे तो अवश्य ही मैं नहीं सुन पाया, किन्तु दूसरे दिन देखा कि डॉक्टर साहब का क्रोध ठण्डा हो गया है और हम लोगों को भी प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं रही है।

जाने दो, क्या कह रहा था और क्या बात बीच में आ पड़ी। किन्तु, वह चाहे जो हो मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि जो लोग जानते हैं वे, इस नाम-धाम-हीन विवरण में से, पूरा सत्य प्राप्त कर लेंगे। मेरे कहने का मूल विषय यह है कि इन्द्र ने इस उम्र में अपने अन्तर के मध्यव में जिस सत्य का साक्षात् कर लिया था, इतने बड़े-बड़े पंच सरदार, इतनी बड़ी उम्र तक भी, उसका कोई तत्व न पा सके थे; और डॉक्टर साहब यदि उस दिन इस प्रकार उनके शास्त्र-ज्ञान की चिकित्सा न कर देते, तो कभी उनकी यह व्याधि अच्छी होती या नहीं, सो जगदीश्वर ही जाने।

टीले पर आकर, आधे डूबे जंगली झाऊ के अन्धकार में, जल के ऊपर, उस अपरिचित शिशु की देह को, इन्द्र ने जब अपूर्व ममता के साथ रख दिया तब रात्रि अधिक नहीं थी। कुछ देर तक वह उस शव की ओर माथा झुकाए रहा और अन्त में जब उसने मुँह उठाकर देखा, तब धुँधली चाँदनी में उसका मुख जितना कुछ दिखाई दिया वह मलिन था और उसके सूखे मुँह पर ठीक वैसा ही भाव प्रकट हो रहा था जैसे कि कोई कान उठाकर किसी की राह देख रहा हो।

मैं बोला, “इन्द्र, अब चलो।”

इन्द्र अन्यमनस्क भाव से बोला, “कहाँ?”

“अभी जहाँ चलने के लिए तुमने कहा था।”

“रहने दो, आज नहीं जाऊँगा।”

मैं खुश होकर बोला, “ठीक, यही अच्छा है भाई-चलो, घर चलें।”

प्रत्युत्तर में इन्द्र मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, “हाँ रे श्रीकांत, मरने पर मनुष्य का क्या होता है, जानता है?”

मैंने तुरन्त ही जवाब दिया, “नहीं भाई, नहीं जानता; अब तो तुम घर चलो। वे सब स्वर्ग चले जाते हैं, भइया, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ, तुम मुझे मेरे घर पहुँचा आओ।”

इन्द्र ने मानो सुना ही नहीं, और कहा, “सभी लोग तो स्वर्ग जा नहीं सकते। इसके सिवाय, कुछ समय तक तो सभी को यहाँ रहना पड़ता है। देखो, मैंने जब उसको जल के ऊपर सुला दिया था, तब उसने धीरे से साफ-साफ कहा था, 'भइया'।” मैं काँपते हुए स्वर से रोते हुए बोल उठा, “क्यों मुझे डराते हो भाई, मैं बेहोश हो जाऊँगा।” इन्द्र ने न तो कुछ कहा और न अभय ही दिया- धीरे से डाँड़ को हाथ में लेकर उसने नाव को झाऊ-वन में से बाहर कर लिया और फिर सीधा चलाने लगा। मिनट-दो मिनट चुप रहकर उसने गम्भीर मृदु स्वर से कहा, “श्रीकांत मन ही मन 'राम' का नाम ले, 'वह' नौका छोड़कर नहीं गया है- हमारे पीछे ही बैठा है!”

उसके बाद मैं उसी जगह मुँह ढँककर औंधा हो गया था। फिर मुझे कुछ सुध नहीं रही। जब आँखें खोलीं तब अन्धकार नहीं था- नाव किनारे लगी हुई थी। इन्द्र मेरे पैरों के पास बैठा था; बोला, “अब थोड़ा चलना होगा, श्रीकांत"
Shrikant"


Chapter 1


All my life has been spent traveling. Standing in the third watch of this wandering life, telling one of his teachers, today I am reminded of so many things. wandering around 
Shrikant"


Chapter 1


All my life has been spent traveling. Standing in the third watch of this wandering life, telling one of his teachers, today I am reminded of so many things. wandering around 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴By वनिता कासनियां पंजाब अध्याय 1अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?”अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।”मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।”अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।”अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...