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❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 7 रास्ते में जिन लोगों के सुख-दु:ख में हिस्सा बँटाता हुआ मैं इस परदेश में आकर उपस्थित हुआ था, घटना-चक्र से वे तो रह गये शहर के एक छोर पर और मुझे आश्रय मिला शहर के दूसरे छोर पर। इसलिए, इन पन्द्रह-सोलह दिनों के बीच उस ओर जा न सका। इसके सिवाय, सारे दिन नौकरी की उम्मीदवारी में घूमते इतना थक जाता था कि शाम के कुछ पहले वास-स्थान पर लौटने पर इतनी शक्ति ही नहीं बचती थी कि मैं कहीं भी बाहर जाऊँ। क्रम-से-क्रम जैसे-जैसे दिन बीतने लगे मेरे मन में यह धारणा होने लगी कि इस सुदूर परदेश में आने पर भी नौकरी प्राप्त करना मेरे लिए ठीक उतना ही कठिन है जितना कि देश में था।अभया की बात याद आई। जिस आदमी पर भरोसा करके वह घर छोड़कर अपना पति खोजने आई है, पता न लगने पर उस आदमी का क्या हाल होगा। घर छोड़कर बाहर आने का मार्ग काफी खुला होने पर भी लौटने का मार्ग ठीक उतना ही प्रशस्त बना रहेगा, इतनी बड़ी आशा की कल्पना करने का साहस बंगाल देश की आबो-हवा में पले होने के कारण मुझमें नहीं है। उन्होंने अधिक दिनों तक अपना निर्वाह कर सकने लायक धन-बल संग्रह करके पैर नहीं बढ़ाया है, इसका अनुमान करना भी मेरे लिए कठिन नहीं है। बाकी बचा केवल एक रास्ता जो कि पन्द्रह आने बंगालियों का एकमात्र सहारा है-अर्थात् महीने-पन्द्रह दिन के बाद पराई नौकरी करके मरण-पर्यन्त किसी तरह शरीर में हाड़-मांस बनाए रहकर जीते रहना। यह कहने की जरूरत नहीं कि रोहिणी बाबू के लिए भी इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं था, किन्तु, रंगून के इस बाजार में केवल अपना ही पेट भरने लायक नौकरी जुटाने में जब मेरा यह हाल है तब एक स्त्री को अपने कन्धों पर लादे हुए अभया के उस बेचारे बिना ढंग-ढौल के गुमसुम 'भइया' का क्या हाल होगा इसकी कल्पना करके मैं भयभीत हो उठा। मैंने स्थिर किया कि जैसे बने, कल एक दफे जाकर उनकी खबर जरूर लूँगा।दूसरे दिन शाम के समय करीब दो कोस जमीन खोदकर उनके वास-स्थान पर पहुँचा और देखा कि बाहर के बरामदे में एक छोटे-से मोढ़े पर रोहिणी भइया बैठे हुए हैं। उनका मुख-मण्डल बादल छाए हुए 'आषाढस्य प्रथम दिवसे' की तरह गुरु-गम्भीर हो रहा है। बोले, “ओह श्रीकान्त बाबू! आप अच्छे तो हैं?”मैं बोला, “जी, अच्छा ही हूँ।”“जाइए, भीतर जाकर बैठिए।”मैंने डरते हुए पूछा, “आप लोग तो सब अच्छे हैं?”“हूँ- भीतर जाइए न, वे घर में ही हैं।”“अच्छा जाता हूँ- आप भी आइए न?”“नहीं, मैं यहीं पर कुछ देर आराम करूँगा। परिश्रम करते-करते एक तरह से मेरी हत्या ही हुई जाती है- दो घड़ी पैर फैलाकर कुछ बैठ ही लूँ।” वे परिश्रम की अधिकता से मरे हुए से हो गये हैं उनके चेहरे पर से यह प्रकाशित न होते हुए भी मैं मन ही मन कुछ उद्विग्न हो उठा। रोहिणी भइया के भीतर भी इतनी गम्भीरता इतने दिन से प्रच्छन्न रूप में वास कर रही है, अपनी ऑंखों देखे बिना यह विश्वास करना कठिन था। किन्तु मामला क्या है? मैं खुद भी तो रास्ते-रास्ते की धूल छानकर ऊब उठा हूँ। मेरे यह रोहिणी भइया भी क्या-किवाड़ों की आड़ में से अभया ने अपना हँसता हुआ चेहरा बाहर निकालकर गुपचुप इशारा करके मुझे भीतर बुलाया। दुविधा में पड़कर मैंने कहा, “चलिए न रोहिणी भइया, भीतर चलकर गप-शप करें।”रोहिणी भइया ने जवाब दिया, “गप-शप! इस समय मर जाऊँ तो जान बचे, यह जानते हो श्रीकान्त बाबू?”“नहीं जानता”, यह मुझे स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने जवाब में केवल एक प्रचण्ड उसास छोड़ी और कहा, “दो दिन बाद ही मालूम हो जायेगा।”अभया के दुबारा गुप-चुप बुलाने पर बाहर अधिक देर बहस न करके मैंने अन्दर प्रवेश किया। भीतर रसोई-घर के सिवाय दो और कमरे सोने के हैं। सामने का कमरा ही बड़ा है और उसी में रोहिणी बाबू सोते हैं। एक ओर रस्सी की खाट पर उनके बिस्तर हैं। अन्दर घुसते ही देखा फर्श के ऊपर आसन बिछा है, एक ओर रकाबी में पूरी-तरकारी, थोड़ा-सा हलुआ और एक गिलास जल रखा हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि ज्योतिष से पता लगाकर यह आयोजन दोपहर से ही कुछ मेरे लिए तैयार नहीं किया गया है, इसलिए क्षणभर में ही मैं समझ गया कि कुछ लड़ाई-झगड़ा चल रहा था। इसीलिए रोहिणी भइया का मुँह बादलों से ढँका हुआ है, इसीलिए वे मर जाऊँ तो जान बचने की बात कर रहे हैं। मैं चुपचाप खाट पर जाकर बैठ गया। अभया ने थोड़ी-सी दूर खड़े होकर पूछा, “आप अच्छे तो हैं? इतने दिनों बाद शायद गरीबों का खयाल आया है?”भोजन के थाल को दिखाकर मैंने कहा, “मेरी बात पीछे होगी। किन्तु यह क्या है?”अभया हँसी और कुछ देर चुप रहकर बोली, “यह कुछ नहीं है, आप कैसे हैं सो कहिए।”“कैसा हूँ सो मैं खुद नहीं जानता, दूसरे को किस तरह बताऊँ?” फिर कुछ सोचकर बोला, “जब तक कोई नौकरी न मिल जाय तब तक इस प्रश्न का जवाब देना कठिन है। रोहिणी बाबू कहते थे-” मेरे मुँह की बात मुँह में ही रह गयी। रोहिणी भइया अपनी फटी चिट्ठियों से अस्वाभाविक फटर-फटर शब्द करते हुए भीतर घुस आए और किसी की ओर भी दृष्टिपात किये बगैर उन्होंने पानी का गिलास उठा लिया। एक ही साँस में उन्होंने उसे आधा खाली कर दिया। बाकी दो-तीन घूँट में जबर्दस्ती पीकर शून्य गिलास काठ की मेज पर रख दिया, और वे यह कहते-कहते बाहर चल दिए, “जाने दो खाली पानी पीकर ही पेट भर लूँ। मेरा यहाँ पर और कौन बैठा है जो भूख लगने पर खाने को देगा!”मैंने अवाक् होकर अभया की ओर ताका। पल-भर के लिए उसका मुँह सुर्ख हो गया; किन्तु, उसी क्षण उसने अपने आपको सँभाल लिया और पहले दीखता है!”रोहिणी ने यह बात कानों पर ही नहीं दी, और वे बाहर चल दिए, किन्तु, आधा मिनट खत्म होने के पहले ही वापिस लौट आए और किवाड़ें के सामने खड़े होकर मुझे सम्बोधन कर बोले, “सारे दिन ऑफिस में मेहनत करने के बाद भूख के मारे सिर चक्कर खा रहा था श्रीकान्त बाबू, इसीलिए उस समय आपसे बात न कर सका, कुछ खयाल न करिएगा।”मैंने कहा, “नहीं।”“उन्होंने फिर कहा, “आप जहाँ ठहरे हैं वहाँ मेरे लिए भी जरा-सा बन्दोबस्त कर सकते हैं?”उनके मुँह की भाव-भंगी को देखकर मैं हँस पड़ा! बोला, किन्तु वहाँ पर पूडियों और मोहन-भोग का डौल नहीं है।”रोहिणी भइया बोले, “जरूरत ही क्या है! भूख के समय कोई यदि जरा-सा गुड़ और जल देवे तो वह अमृत है। यहाँ तो वह भी कौन देता है?”मैंने जानने की इच्छा से अभया की ओर दृष्टि डाली। तुरन्त ही वह धीरे से बोली, “सिर दर्द करता था। इसलिए बेवक्त सो गयी थी, और इसी कारण भोजन बनाने में आज जरा-सी देर हो गयी श्रीकान्त बाबू।”मैंने आश्चर्य के साथ कहा, “बस, यही अपराध है?”अभया ने उसी तरह शान्त-भाव से कहा, “यह क्या कोई तुच्छ अपराध है श्रीकान्त बाबू?”“तुच्छ नहीं तो और क्या है?”अभया बोली, “आपके समीप तुच्छ हो सकता है, किन्तु जो महाशय अपनी इस फिजूल की गले-पडूको खाने देते हैं वे कैसे माफ करेंगे? मेरा सिर दर्द करे तो उनका काम कैसे चल सकता है?”रोहिणी बाबू एकदम तड़क कर गर्ज उठे और बोले, “तुम गले-पड़ू हो, मैंने यह कब कहा?”अभया बोली, “कहोगे क्यों, हजार तरह से दिखा तो रहे हो?”रोहिणी भइया बोले, “दिखा रहा हूँ! ओह, तुम्हारे मन में जलेबी जैसा पेंच है! यह तुमने मुझसे कब कहा था कि सिर दर्द कर रहा है?”अभया ने कहा, “कहने से लाभ ही क्या था? क्या तुम विश्वास करते?”रोहिणी भइया मेरी ओर पलटकर ऊँचे कण्ठ से बोल उठे, “सुनिये श्रीकान्त बाबू, ये सब बातें सुन रखिए। इन्हीं के लिए मैंने देश का त्याग किया- घर लौटने का रास्ता बन्द हो गया- अब इनके मुँह की बात सुनिये। ओह-”अभया ने भी इस दफे गुस्स् से जवाब दिया, “मेरा जो होना होगा हो जाएगा, तुम्हारी जब इच्छा हो देश लौट आओ! मेरे लिए तुम क्यों इतना कष्ट सहोगे? तुम्हारी कौन होती हूँ मैं? इस तरह ताना कसने की अपेक्षा...”उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि रोहिणी भइया करीब-करीब चीत्कार कर उठे, “सुनिए श्रीकान्त बाबू, दो रोटी पका देने के लिए- ये बातें आप जरा सुन रखिए। अच्छा, आज से कभी तुमने यदि मेरे लिए रसोईघर में पैर रखा तो तुम्हें बहुत ही बड़ी- बल्कि मैं होटल में-” कहते-कहते उनका गला रुलाई से भर आया, वे धोती का छोर मुँह पर लगाकर तेजी से कदम रखते हुए मकान के बाहर हो गये। अभया ने अपना उतरा हुआ चेहरा नीचे झुका लिया- न जाने ऑंखों के ऑंसू छिपाने के लिए या यों ही; किन्तु मैं तो एकदम काठ हो गया। कुछ दिनों से दोनों के बीच अनबन हो रही है, यह तो ऑंखों से ही देख लिया; किन्तु, इसका गहरा हेतु दृष्टि से बिल्कु'ल परे होने पर भी वह क्षुधा और भोजन बनाने की त्रुटि से बहुत-बहुत दूर है, यह समझने में मुझे जरा-सा भी विलम्ब नहीं लगा। तो फिर, क्या पति खोजने की बात भी-मैं उठकर खड़ा हो गया। इस नीरवता को भंग करने में मुझे खुद भी जैसे संकोच होने लगा। कुछ इधर-उधर करके अन्त में मैंने कहा, “मुझे बहुत दूर जाना है- इस समय तो अब चलता हूँ।”अभया ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, “अब कब आइएगा?”“बहुत दूर!”“तो फिर जरा ठहर जाइए” कहकर अभया बाहर चली गयी। पाँच-छह मिनट बाद लौटकर आई और मेरे हाथ में एक टुकड़ा कागज देकर बोली, “जिस काम के लिए मैं आई हूँ वह सब इसमें लिख दिया है। पढ़कर जो नीक जँचे सो कीजिएगा। मैं आपसे कुछ अधिक कहना नहीं चाहती।” इतना कहकर गले में ऑंचल डालकर आज उसने मुझे प्रणाम किया और फिर उठकर पूछा, “आपका ठिकाना क्या है?”सवाल का जवाब देकर मैं उस छोटे से कागज को मुट्ठी में छिपाकर धीरे-धीरे निकल आया। बरामदे के बाहर का वह मोढ़ा इस समय शून्य था। रोहिणी भइया को भी मैं आसपास कहीं न देख सका। डेरे पर पहुँचने तक मैं अपना कुतूहल दमन न कर सका! पास में ही रास्ते के बगल में एक छोटी-सी चाय की दुकान देखकर उसमें घुस गया और लैम्प के उजाले में मैंने उस पत्र को अपनी ऑंखों के सम्मुख खोलकर रख लिया। पेंन्सिल की लिखावट थी किन्तु ठीक पुरुष के से हस्ताक्षर थे। सबसे पहले उसने अपने पति का नाम और उसका पुराना ठिकाना देकर नीचे लिखा था, “आज आप जो अपने मन में धारणा लिये जा रहे हैं सो मैं जानती हूँ; और विपत्ति के समय मुझे आपका कितना भरोसा है सो भी आप जानते हैं। इसीलिए मैंने आपका ठिकाना पूछ लिया है।”अभया के इस लेख को मैंने बार-बार पढ़ा परन्तु उसमें इन कुछ थोड़ी-सी बातों के सिवाय और किसी भी अतिरिक्त बात का अन्दाजा नहीं लग सका। आज इन लोगों का परस्पर व्यवहार अपनी नजर से देखकर कोई बाहरी आदमी जो भी सोच सकता है उसका अनुमान करना अभया सरीखी बुद्धिमती रमणी के लिए बिल्कुाल ही कठिन नहीं है। किन्तु फिर भी वह अन्दाज सही है या गलत, इस सम्बन्ध में बिन्दु-मात्र भी उसने इशारा नहीं किया। उसके पति का नाम और ठिकाना तो मैंने पहले ही सुना है, पर विपत्ति के समय वह उसकी खोज करना चाहती है या नहीं, अथवा और कौन-सी विपत्ति अवश्यम्भावी समझकर उसने मेरा पता ले लिया है- आदि किसी बात का आभास तक भी मैं उस लेख में खोजकर बाहर न निकाल सका। बातचीत से अनुमान होता है कि रोहिणी किसी दफ्तर में नौकरी पा गया है। किस तरह पा गया है सो भी मुझे मालूम नहीं हुआ। पर हाँ खाने-पीने की दुश्चिन्ता कम से कम मेरी तरह उन्हें नहीं है- पूड़ियाँ भी खाने को मिल जाती हैं। फिर भी, अभया ने किस किस्म की विपत्ति की सम्भावना के लिए मुझे तैयार कर रक्खा है और ऐसा करने से उसने क्या लाभ सोच रक्खा है, सो अभया ही जाने।बाहर निकलकर रास्ते-भर मैं केवल इन्हीं लोगों के विषय में सोचता सोचता डेरे पर पहुँचा। कुछ भी स्थिर नहीं कर सका। लेकिन यही निश्चय किया कि अभया का पति कोई भी क्यों न हो और चाहे जहाँ, चाहे जिस तरह क्यों न हो, स्त्री की विशेष अनुमति बगैर उसे खोज निकालने का कुतूहल मुझे रोक ही रखना होगा।दूसरे दिन से मैं फिर अपनी नौकरी की उम्मीदवारी में लग गया; किन्तु हजारों चिन्ताओं में भी अभया की चिन्ता को मन के भीतर से झाड़कर नहीं फेंक सका।किन्तु, चिन्ता चाहे जितनी ही क्यों न करूँ, दिन के बाद दिन समान-भाव से लुढ़कने लगे। इधर भाग्यवादी दादा ठाकुर का प्रफुल्ल चेहरा धीरे-धीरे मेघाच्छन्न होने लगा। भोजन में तरकारियाँ भी पहले परिमाण में और फिर संख्या में धीरे-धीरे विरल होने लगीं। किन्तु, नौकरी ने मेरे सम्बन्ध में जरा भी अपना मत-परिवर्तन नहीं किया। जैसी नजर से उसने पहिले दिन देखा था महीने भर से अधिक बीतने के बाद भी ठीक उसी नजर से वह देखती रही। तब न जाने किसके ऊपर मैं क्रमश: उत्कण्ठित और विरक्त होने लगा। किन्तु, उस समय तक मैं यह नहीं जानता था कि जब तक नौकरी करने की पूरी जरूरत न हो तब तक वह दर्शन नहीं देती। यह ज्ञान एक दिन एकाएक रास्ते में रोहिणी बाबू को देखकर प्राप्त हुआ। वे बाजार में रास्ते के किनारे शाक-सब्जी खरीद रहे थे। मैं चुपचाप उनके निकट खड़ा होकर देखता रहा। यद्यपि उनके शरीर पर के कपड़े, जूते आदि जीर्णता की प्राय: चरम सीमा को पहुँच चुके हैं- भयंकर कड़ी धूप में सिर पर एक छतरी तक नहीं है, किन्तु, खाद्य पदार्थ वे बड़े आदमियों की तरह खरीद रहे हैं। इस कार्य में ढूँढ़-खोज और जाँच-परख की भी कोई हद नहीं है। झंझट और जहमत चाहे जितनी क्यों न उठानी पड़े अच्छी चीज खरीदने की ओर उनके प्राण लगे हुए हैं। पलक मारते सारा व्यापार मेरी नजर के सामने तैर आया। इस खरीद-बिक्री के भीतर से उनका व्यग्र व्याकुल प्रेम कहाँ जाकर पहुँच रहा है, यह मानो मैं सूर्य के प्रकाश के समान सुस्पष्ट देख सका। क्यों यह सब लेकर उन्हें अपने मकान पर पहुँचना ही चाहिए और क्यों उन्हें इन सब चीजों का मूल्य देने के लिए नौकरी खोजनी ही पड़ी, इस समस्या की मीमांसा करने में जरा-सी देर न लगी। आज मैं साफ-साफ समझ गया कि क्यों इन मनुष्यों के जंगल में उन्होंने अपना रास्ता पा लिया है और क्यों में अभी तक असफल रहा हूँ।यह दुबला-पतला आदमी रंगून के राजमार्ग पर एक बड़ी-सी गठरी हाथ में लिये हुए सैकड़ों जगह फटे हुए मैले कपड़े पहने घर की ओर जा रहा है, आड़ में से मैंने उसके परितृप्त मुख की ओर नजर की। अपनी ओर नजर करने का मानो उसे अवकाश ही नहीं है। जिस वस्तु से उसका हृदय परिपूर्ण हो रहा है उससे उसके निकट कपड़े-लत्तों का दैन्य मानो एक बारगी अकिंचित्कर हो गया है। और मैं अपने कपड़ों के साधारण से मैलेपन के ही कारण मानो प्रत्येक कदम पर शर्म के मारे सिकुड़कर जड़ हुआ जाता हूँ। रास्ते पर से चलने वाले बिल्कुखल अपरिचित व्यक्ति की भी अपने ऊपर नजर पड़ते देख शर्म के मारे मरा जाता हूँ!रोहिणी भइया चले गये। मैंने उन्हें नहीं पुकारा और दूसरे क्षण ही वे लोगों के बीच अदृश्य हो गये। क्यों, सो मुझे मालूम नहीं, पर इस बार ऑंसुओं के मारे मेरी दोनों ऑंखें धुँधली हो गयीं। चादर के छोर से उन्हें पोंछते हुए रास्ते के किनारे धीरे-धीरे मैं अपने डेरे पर लौट आया और बार-बार मन ही मन कहने लगा, इस प्रेम से बढ़कर शक्ति, इस प्रेम से बढ़कर शिक्षक संसार में शायद और कोई नहीं। ऐसी कोई बड़ी बात नहीं जिसे यह न कर सके।फिर भी, बहुत युगों का संचित अन्ध संस्कार मेरे कानों में चुपचाप कहने लगा- यह शुभ नहीं है, यह पवित्र नहीं है- अन्त तक इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।डेरे पर पहुँचते ही एक बड़ा लिफाफा मिला। खोलकर देखा, नौकरी की दरख्वास्त मंजूर हो गयी है। सागौन की लकड़ी का एक बड़ा भारी व्यापारी अनेक लोगों के आवेदन-पत्र होते हुए भी मुझ गरीब पर ही प्रसन्न हुआ है। भगवान उसका भला करें।नौकरी नामक वस्तु से पुराना परिचय न था इसलिए, उसे पाकर भी मन में सन्देह बना रहा कि बहुत दिनों तक बनी रहेगी या नहीं। मेरे जो साहब हुए थे वे सच्चे साहब (अंगरेज) होकर भी, देखा कि बंगला भाषा खूब जानते हैं, क्योंकि, कलकत्ते के ऑफिस से बदलकर बर्मा आए थे।दो हफ्ते की नौकरी के उपरान्त ही उन्होंने बुलाकर कहा, “श्रीकान्त बाबू, तुम इस टेबल पर आकर काम करो, तनख्वाह भी इससे करीब ढाई गुनी पाओगे।”मैंने प्रकट रूप से तथा मन ही मन भी साहब को लाखों आशीर्वाद देते हुए उस हड्डी-पसली निकली हुई टेबल को छोड़कर एकदम हरी बनात मढ़ी हुई टेबल पर दखल जमा लिया। मनुष्य का जब भला होना होता है तब इसी तरह होता है- हम लोगों के होटल के दादा ठाकुर ने बिल्कुयल ही मिथ्या नहीं कहा है।किराये की गाड़ी पर चढ़कर यह खुशखबरी अभया को देने गया। रोहिणी भइया ऑफिस से लौटकर जलपान करने बैठे थे; किन्तु, आज उन्हें केवल पानी पीकर अपनी भूख मिटाते हुए नहीं देखा। बल्कि, आज जिस तरह वे अपनी भूख पूरी कर रहे थे, उस तरह पूरी करते संसार में और चाहे जिसे आपत्ति हो, मुझे तो नहीं थी। अतएव यह कहना फिजूल है कि अभया के भोजन के प्रस्ताव पर मैंने अपनी असम्मति नहीं प्रकट की। खाना-पीना शेष होते ही रोहिणी भइया कोट पहिरने लगे। अभया ने खिन्न कण्ठ से कहा, “तुमसे मैं बराबर कहती आती हूँ रोहिणी भइया, कि यह शरीर लेकर इतना परिश्रम मत किया करो, क्या तुम किसी तरह भी न सुनोगे? अच्छा हम लोग क्या करेंगे अधिक रुपयों का? दिन तो हमारे अच्छी तरह कट ही रहे हैं।”रोहिणी भइया के चक्षुओं से मानो स्नेह झरने लगा। वे हँसकर बोले, “अच्छा, अच्छा, सो ठीक। एक रसोइया तक तो रख नहीं सकता, चूल्हे के नजदीक दोनों वेला पचते-पचते तुम्हारी तो देह सूख गयी है।” वे इतना कहकर पान खाकर, जल्दी-जल्दी कदम रखते हुए बाहर चल दिए।अभया एक छोटी साँस दबाकर, जबरन जरा हँसकर बोली, “देखिए तो श्रीकान्त बाबू, इनका अन्याय! सारे दिन जी-तोड़ मेहनत करने के बाद घर आकर कुछ आराम करें, सो तो नहीं, अब रात को भी नौ बजे तक लड़कों को पढ़ाने बाहर चले गये हैं। मैं इतना कहती हूँ, पर किसी तरह सुनते ही नहीं। दो आदमियों की रसोई के लिए रसोइया रखने की, कहो तो, जरूरत ही क्या है? है न यह सब इनकी ज्यादती?” इतना कहकर उसने एक ओर को ऑंखें फेर लीं।मैं धीरे से कुछ हँस दिया। 'ना' या 'हाँ' जवाब देना मेरे लिए सम्भव नहीं था- मेरे विधाता के लिए भी सम्भव था या नहीं, इसमें भी सन्देह है।अभया उठकर गयी और एक पत्र लाकर उसने मेरे हाथ पर रख दिया। कुछ दिन हुए वह बर्मा रेलवे कम्पनी के ऑफिस से आया था। बड़े साहब ने दु:ख प्रकाशित करते हुए लिखा था कि अभया का पति करीब दो वर्ष पहले किसी बहुत बड़े अपराध के कारण कम्पनी की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है, तब से वह कहाँ चला गया सो वे नहीं जानते।हम दोनों ही बहुत देर तक सन्न होकर बैठे रहे। अन्त में अभया ने ही मौन तोड़ा, “अब आप क्या सलाह देते हैं?”मैंने धीरे से कहा, “मैं क्या सलाह दूँ?”अभया सिर हिलाकर बोली, “नहीं, सो नहीं हो सकता। ऐसी परिस्थिति में आपको ही कर्तव्य स्थिर कर देना होगा। इस पत्र के मिलने के बाद से ही मैं बड़ी आशा से आपकी राह देख रही हूँ।”मैंने मन ही मन कहा, बहुत खूब! मेरी राय लेकर ही घर से बाहर निकली थीं न, जो मेरी सलाह के लिए राह जोह रही हो!बहुत देर तक चुप रहकर पूछा, “घर लौट जाने के सम्बन्ध में आपका क्या मत है?”अभया बोली, “कुछ भी नहीं। आप कहें तो जा सकती हूँ, किन्तु मेरे तो वहाँ कोई है नहीं।”“रोहिणी बाबू क्या कहते हैं?”“वे कहते हैं कि नहीं लौटेंगे। कम से कम दस बरस तक तो वे उस ओर मुँह भी नहीं फिराएँगे।”बहुत देर तक चुप रहकर मैंने कहा, “वे क्या आपका बोझा बराबर सँभाले रह सकेंगे?”अभया बोली, “पराये मन की बात, कहिए किस तरह जानूँ? इसके सिवाय वे खुद भी किस तरह जान सकते हैं?” इतना कहकर क्षण-भर वह चुप रही, फिर बोली, “एक बात और है। मेरे लिए वे जरा भी जिम्मेदार नहीं हैं। दोष कहो, भूल कहो, जो कुछ है सो मेरी है।”गाड़ीवान ने बाहर से पुकारा, “बाबू, और कितनी देर लगेगी?”जैसे मेरी जान बच गयी। इस अवस्था-संकट के भीतर से सहसा परित्राण पाने का कोई उपाय मुझे खोजे नहीं मिल रहा था। यह सच है कि विश्वास करने को मेरा दिल नहीं चाहता था कि अभया वास्तव में ही अपार सागर में गिरकर गोते खा रही है, किन्तु मैंने स्त्रियों की इतने तरह की उलटी-सुलटी अवस्थाएँ देखी हैं कि बाहर से इन ऑंखों पर विश्वास कर लेना कितना बड़ा अन्याय है, सो मैं नि:संशय रूप से समझता था।गाड़ीवान का एक दफे और बुलाना था कि मैं क्षण-भर भी विलम्ब किये बगैर उठ खड़ा हुआ और बोला, “मैं शीघ्र ही और एक दिन आऊँगा।” इतना कहकर मैं तेजी से बाहर हो गया। अभया और कुछ न बोली। निश्चल मूर्ति की तरह जमीन की ओर देखती रह गयी।♦♦ • ♦♦गाड़ी में बैठते ही गाड़ी चल दी; दस हाथ भी नहीं गया था कि याद आया, छड़ी तो कहीं भूल आया हूँ। तुरन्त गाड़ी खड़ी की और मकान में प्रवेश करते ही देखा कि ठीक दरवाजे के सामने अभया उलटी पड़ी है और बाण से विधे हुए पशु की तरह अव्यक्त वेदना से पछाड़ खाकर मानो प्राण विसर्जन कर रही है।क्या कहकर उसे सांत्वना दूँ, सो मेरी बुद्धि के परे की वस्तु थी। वज्राहत की तरह कुछ देर सन्न रहकर उसी तरह चुपचाप लौट आया! अभया जिस तरह रो रही थी उसी तरह रोती रही। उसे यह मालूम ही न हो सका कि उसकी इस निगूढ़ असीम वेदना का एक मौन साक्षी भी इस जगत में विद्यमान है।राजलक्ष्मी का अनुरोध मैं भूला नहीं था। पटने को पत्र लिखने की बात, जब आया था तभी से, मेरे मन में थी। किन्तु, पहली बात तो यह कि संसार में जितने भी कठिन काम हैं, उनमें चिट्ठी लिखने को मैं किसी से भी कम नहीं समझता। इसके सिवाय, फिर लिखूँ भी क्या? किन्तु, अभया का रोना मेरे दिल में इस तरह भारी हो उठा कि उसमें का कुछ अंश बाहर निकाल दिये बगैर मेरी गति ही नहीं है, ऐसा मालूम होने लगा। इसीलिए, डेरे पर पहुँचते ही कागज-कलम जुटाकर बाईजी को पत्र लिखने बैठ गया। और उसको छोड़कर मेरे दु:ख का अंश बँटाने वाला था ही कौन? दो-तीन घण्टे बाद इस 'साहित्य-चर्चा' को समाप्त करके जब मैंने कलम रखी तब रात के बारह बज गये थे। किन्तु, कहीं सुबह दिन के उजालें में उस चिट्ठी को भेजने में लज्जा न आने लगे, इसलिए, मिजाज गर्म रहते-रहते ही मैं उसे उसी समय डाक-बॉक्स में छोड़ आया।मुझे सन्देह था कि एक भले घर की स्त्री की निदारुण वेदना का गुप्त इतिहास और किसी दूसरी स्त्री पर प्रकट करना चाहिए या नहीं; किन्तु अभया के इस परम और चरम संकट के समय वह राजलक्ष्मी, जिसने कि एक दिन प्यारी बाई की मर्मान्तिक तृष्णा दमन की थी, उसके लिए क्या नेक सलाह देती है, यह जानने की आकांक्षा ने मुझे एकदम बेकाबू कर दिया। किन्तु अचरज की बात यह है कि इस सवाल को उलट-पलटकर मैंने एक बार भी नहीं सोचा। अभया के पति का पता न लगने की समस्या भी बार-बार मन में आ रही थी, किन्तु पता लगने पर यह समस्या और भी अधिक जटिल हो सकती है, यह चिन्ता एक दफे भी उदित नहीं हुई। और इस गोरखधन्धे को सुलझाने का भार भी विधाता ने मेरे ही ऊपर निर्दिष्ट कर रक्खा है सो भी किसने सोचा था?तीन-चार दिन के बाद मेरा एक बर्मी क्लर्क टेबल पर एक फाइल रख गया। उस पर नीली पेन्सिल से लिखा हुआ बड़े साहब का मन्तव्य था। उन्होंने मुझे 'केस' का फैसला करने का हुक्म दिया था। मामले को शुरू से आखीर तक पढ़कर कुछ मिनट के लिए मैं सन्न होकर रह गया। घटना संक्षेप में यह थी कि हमारे प्रोम ऑफिस के एक क्लर्क को वहाँ के अंगरेज मनेजर ने लकड़ी चुराने के सन्देह में सस्पेण्ड करके रिपोर्ट की है। क्लर्क का नाम देखकर ही मुझे मालूम हो गया कि यही हमारी अभया का पति है। इसकी भी चार-पाँच पेज की कैफियत थी। बर्मा रेलवे में भी किसी गम्भीर अपराध के कारण यह नौकरी से बरखास्ते हुआ होगा, यह अनुमान करने में भी मुझे देर नहीं लगी।थोड़ी ही देर बाद उस क्लर्क ने आकर कहा कि एक भले आदमी आपसे मिलना चाहते हैं। इसके लिए मैं तैयार ही था और मैं निश्चय से जानता था कि प्रोम से वह स्वयं केस की पैरवी करने आवेगा। इसलिए, जब कुछ ही मिनट बाद उसने सशरीर आकर दर्शन दिए तब अनायास ही मैंने पहिचान लिया कि यही अभया का पति है। उसकी ओर देखते ही सारा शरीर मानो घृणा से कण्टकित हो गया। पहिने था वह हैट-कोट, किन्तु जितने ही पुराने उतने ही गन्दे। काला मुँह सारा बड़ी-बड़ी मूँछों और दाढ़ी से ढँका हुआ था। नीचे का होठ शायद डेढ़ इंच मोटा था। और पान उसने इतने अधिक खाए थे कि उनका रस दोनों ओर जम गया था- उसके बात करते समय डर लगता था कि कहीं छिटककर अंग पर न आ पड़े।यह मैं जानता हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है-वही उसका इहलोक और परलोक है, किन्तु, इस मूर्तिमान नीचता के निकट अभया की कल्पना करते हुए मेरा शरीर और मन संकुचित हो उठा। अभया और चाहे जो हो फिर भी सुन्दर देह वाली सुरुचि सम्पन्न कुलीन महिला है, किन्तु, यह भैंसा बर्मा के किस घने जंगल में से एकाएक बाहर निकल आया है सो जिन ब्रह्मदेव ने इसे बनाया है वे ही बता सकते हैं।बैठने का इशारा करके मैंने पूछा कि तुम्हारे विरुद्ध जो इलजाम लगाया गया है वह क्या सत्य है? इसके जवाब में वह दस मिनट तक अनर्गल बकता रहा। भावार्थ यह था कि मैं बिल्कुदल ही निर्दोष हूँ; और मेरे रहते प्रोम ऑफिस का साहब दोनों हाथों लूट नहीं कर सकता था, यही उसके क्रोध का कारण है। जिस तरह भी हो, मुझे अलग करके एक अपने ही आदमी को भरती कर लेने के लिए उसकी यह चाल है। मुझे उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ। मैंने कहा, “यह नौकरी चली जाय तो भी आपके समान होशियार व्यक्ति के लिए बर्मा में चिन्ता ही किस बात की है? रेलवे की नौकरी छूट जाने पर कितने-से दिन आपको खाली बैठना पड़ा था?”वह मनुष्य पहले तो अकचकाया, फिर बोला, “आप कहते हैं सो बिल्कुतल झूठ नहीं है। किन्तु आप जानते हैं महाशय, फैमिली-मैन हूँ, बहुत-से बच्चे कच्चे...”“आपने क्या किसी बर्मी स्त्री से विवाह कर लिया है?”वह एकाएक बोल उठा, “साहब-साले ने रिपोर्ट में लिख दिया दिखता है। इसी से आपको उसकी नाराजगी मालूम हो सकती है!” यह कहकर वह मेरे मुँह की ओर ताककर और कुछ नरम होकर बोला, “आप क्या इस पर विश्वास करते हैं?”मैंने गर्दन हिलाकर कहा, “इसमें बुराई ही क्या है?”वह उत्साहित होकर बोला, “ठीक कहते हैं महाशय, मैं तो यह सबसे कहता हूँ कि जो करूँगा सो 'बोल्डली' स्वीकार करूँगा। मैं ऐसा नहीं हूँ कि अन्दर कुछ और बाहर कुछ। और फिर मैं ठहरा मर्द- आप जानते ही हैं। जो कहूँगा सो साफ-साफ कहूँगा महाशय, लुकाने-छुपाने की बात नहीं। और फिर देश में तो मेरा कहीं कोई है नहीं- और जब यहाँ ही रहकर चिरकाल तक नौकरी करके पेट भरना है तब- आप समझते ही हैं महाशय।' मैंने सिर हिलाकर बताया कि मैं सब समझता हूँ। फिर पूछा, “आपका देश में क्या कोई भी नहीं है?”वह मनुष्य चेहरे पर जरा भी मैल लाए बगैर बोला, “जी नहीं, कहीं कोई नहीं है- काकस्य परिवेदना।' यदि कोई होता तो फिर मैं इस सूर्य मामा के देश में आ पाता! महाशय, आप विश्वास न करेंगे, मैं ऐसे-वैसे घर का लड़का नहीं हूँ, कभी हम लोग भी जमींदार थे! आज भी यदि आप देश के हमारे मकान को देखें तो आपकी ऑंखें चकरा जाँय। किन्तु, छोटी उम्र में ही सब मर-खप गये। मैंने कहा, जाने भी दो; घर-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद यह सब है किसके लिए? सब कुछ जात-बिरादरी वालों को बाँटकर मैं बर्मा चला आया।”जरा स्थिर होकर पूछा, “आप अभया को जानते हैं?”वह चौंक उठा। कुछ देर मौन रहकर बोला, “आपने उसे कैसे जाना?”मैंने कहा, “ऐसा भी तो हो सकता है कि आपका पता लगाकर उसने अपने भरण-पोषण के लिए इस ऑफिस में दरख्वास्त दी हो?” वह कुछ अधिक प्रसन्न स्वर से बोला, “ओ:, यही कहिए न! सो मैं स्वीकार करताहूँ, एक समय वह मेरी स्त्री थी...”“और अब?”“कोई नहीं। मैं उसे त्यागकर चला आया हूँ।”“उसका अपराध?”वह मनुष्य चेहरे पर बनावटी दु:ख लाकर बोला, “आप जानते हैं महाशय, फैमिली सिक्रेट' कहना उचित नहीं। किन्तु, इस समय आप मेरे आत्मीयों की तरह हैं, इसलिए कहने में कुछ लज्जा नहीं है कि वह एक दुश्चरित्र औरत है। इसी मानसिक घृणा के कारण ही तो मुझे देश छोड़ना पड़ा। नहीं तो क्या कोई शौक से इस देश में कदम रख सकता है? आप ही कहिए न, कि यह क्या कोई ऐसी-वैसी घृणा की बात है।”जवाब क्या दूँ? लाज के मारे मेरा मुँह नीचा हो गया। शुरू से ही मैंने इस घोर मिथ्यावादी की एक बात पर भी विश्वास नहीं किया था; किन्तु अब मुझे नि:सन्दिग्ध रूप से मालूम हो गया कि यह जितना नीच है उतना ही क्रूर भी है।अभया के सम्बन्ध में मैं कुछ अधिक नहीं जानता हूँ, किन्तु फिर भी शपथ खाकर कह सकता हूँ कि जो अपवाद पति होकर इस पाखण्डी ने उसके सिर बिना किसी संकोच के लगा दिया, गैर होकर भी मैं उसे मुँह से नहीं निकाल सकता। कुछ देर बाद मुँह उठाकर मैंने कहा, “उसके इस अपराध की बात आपने आते समय तो उससे कही नहीं थी। और जब यहाँ आकर भी कुछ दिनों तक आप चिट्ठी पत्री और रुपया-पैसा भेजते रहे, तब भी पत्र के द्वारा उस पर यह बात प्रकट नहीं की।”वह महापापी स्वच्छन्दता से अपने विराट स्थूल होठों को फाड़कर हँसता हुआ बोला, “यही तो बात है। आप जानते ही हैं महाशय, कि हम शरीफ आदमी हैं। हम लोग चुपचाप सब कुछ सहन कर लेते हैं, परन्तु हलके लोगों की तरह अपनी स्त्री के कलंक का नगाड़ा नहीं पीट सकते। खैर, ये सब दु:ख की बातें छोड़ दीजिए महाशय, ऐसी स्त्रियों का नाम मुँह पर लाने से भी पाप होता है। तो फिर, 'केस' तो आप ही 'डिस्पोज' (निर्णय) करेंगे न? मेरी जान बची, खैरियत हुई; किन्तु फिर भी कहे देता हूँ कि साहब बच्चू को यों ही न छोड़ दिया जाय। अच्छी तरह ऐसा सबक दिया जाय कि जिससे फिर कभी मेरे पीछे न लगें। वे भी समझ जाय कि मेरे भी मुरब्बी का कुछ जोर है। समझे न आप? अच्छा, मैं कहता हूँ क्या हरामजादे को हेड ऑफिस में नहीं खींचा जा सकता?”मैंने कहा, “नहीं।”उसने हँसी की छटा से फाइल को कुछ आगे सरकाते हुए कहा, “लीजिए, मजाक छोड़िए। क्या यह खबर लिये बगैर ही मैं आपके पास आया हूँ कि बड़े साहब बिल्कुेल आपकी मुट्ठी में है? खैर मरने दीजिए इसे, और भी एक दफे वह मेरे पीछे लगकर देख ले। अच्छा, क्या बड़े साहब का 'ऑर्डर' निकालकर आज ही मेरे हाथ नहीं दिया जा सकता? रात के नौ बजे ही मैं चला जाता, रात को कष्ट न उठाना पड़ता। क्या कहते हैं आप?”मैं एकाएक जवाब न दे सका। क्योंकि, खुशामद चीज ही ऐसी है कि सारी दुरभिसन्धि जान-बूझकर भी क्षुण्ण करते श्लेश का अनुभव होता है। विरुद्ध बात मुँह पर लाते संकोच-सा होने लगा; किन्तु इस बाधा को मैंने नहीं माना। अपने आपको कठोर करके कह ही दिया, “बड़े साहब का हुक्म हाथ में कर लेने से आपको लाभ नहीं होगा। आप और कहीं नौकरी की तलाश कीजिए।”एक मुहूर्त में ही वह जैसे काठ हो गया और कुछ देर बाद बोला, “इसके मानी?”“इसके मानी यह कि आपको 'डिसमिस' करने का 'नोट', ही मैं दूँगा। मेरे द्वारा आपको किसी तरह सुविधा न होगी।”वह उठकर खड़ा हो गया था- एकदम बैठ गया। उसकी दोनों ऑंखें छलछला आईं। हाथ जोड़कर बोला, “बंगाली होकर बंगाली को मत मारिए बाबू, मैं बच्चों कच्चों वाला आदमी मर जाऊँगा।”“यह देखने का भार मेरे ऊपर नहीं है। इसके सिवाय, मैं आपको जानता नहीं, आपके साहब के विरुद्ध भी मैं नहीं जा सकता।”उसने एक नजर मेरे मुँह पर डालकर शायद समझ लिया कि मैं दिल्लगी नहीं कर रहा हूँ। और कुछ देर वह चुपचाप बैठा रहा। इसके बाद ही अकस्मात् वह जोर से रो पड़ा। क्लर्क, दरबान, पियून जो जहाँ थे सब इस अचिन्तनीय घटना से दंग हो गये। मैं भी मानो लज्जित-सा हो गया। उसे रोकने के इरादे से मैंने कहा, “अभया आपके लिए बर्मा आई है, अवश्य ही दुश्चरित्रा स्त्री को ग्रहण करने के लिए मैं नहीं कहता। किन्तु, आपकी सब बातें सुनकर भी यदि वह माफ कर सके-आप उसके पास से चिट्ठी ला सकें तो आपकी नौकरी बजा रखने की मैं कोशिश कर देखूँगा। नहीं तो दुबारा मिलकर मुझे लज्जित न करना- मैं मिथ्या बात नहीं कहता।”मैं जानता था कि ये नीच प्रकृति के लोग अत्यन्त डरपोक होते हैं, उसने ऑंखें पोंछकर कहा, “वह कहाँ पर है?”“कल इसी समय आओगे तो उसका ठिकाना बता दूँगा।”वह और कुछ न कहकर लम्बी सलाम करके चला गया।संध्याि के समय अभया मेरे मुँह से चुपचाप नीचा मुँह किये सारा हाल सुनती रही। उसने ऑंचल से केवल अपनी ऑंखें पोंछ डाली- कुछ कहा नहीं। मेरे क्रोध का भी उसने कुछ जवाब नहीं दिया। बहुत देर बाद मैंने ही पूछा, “आप उसे माफ कर सकेंगी?”अभया ने केवल गर्दन हिलाकर अपनी सम्मति जाहिर की।“तुम्हें वह अपने साथ ले जाना चाहे, तो जाओगी?”उसने उसी तरह सिर हिलाकर जवाब दिया।“बर्मा की स्त्रियों का स्वभाव कैसा होता है, सो तो तुमने पहले ही दिन खूब जान लिया है, फिर भी वहाँ जाने का तुम्हारा साहस होगा?”इस दफे अभया ने अपना मुँह ऊपर उठाया, मैंने देखा कि उसकी दोनों ऑंखों से ऑंसुओं की धारा बह रही है। उसने कुछ कहने की कोशिश की परन्तु कह न सकी। इसके बाद बार-बार ऑंचल से अपनी ऑंखों को पोंछती हुई रुद्ध कण्ठ से बोली, “नहीं जाऊँ तो मेरे लिए और उपाय ही क्या है, बताइए?”उसकी बात सुनकर मैं यह न सोच सका कि मैं खुश होऊँ या ऑंखों से नीर बहाऊँ; किन्तु मुझसे कुछ उत्तर देते नहीं बन पड़ा।उस दिन और कोई बात नहीं हुई। डेरे को लौटते हुए रास्ते-भर यही एक बात मैं बार-बार अपने आपसे पूछता रहा, किन्तु, इस प्रश्न का किसी ओर से कोई भी उत्तर नहीं मिल सका। केवल हृदय के भीतर का 'वह' न जाने किस पर एक ओर जिस तरह निष्फल क्रोध से जल-जल उठने लगा, उसी तरह दूसरी ओर एक निराश्रया रमणी के उससे भी अधिक निरुपाय प्रश्न से व्यथित और भाराकान्त हो उठा। दूसरे दिन, अभया का ठिकाना पूछने के लिए जब वह मनुष्य सामने आकर खड़ा हो गया तब, मारे घृणा के, मैं उसकी ओर देख भी नहीं सका। मेरे मन का भाव समझकर आज वह अधिक बात किये बगैर ही केवल ठिकाना लेकर नम्रता के साथ चला गया, किन्तु, उसके बाद के दिन जब वह मिलने आया तब उसकी ऑं:खों और मुँह का भाव पूरी तरह बदल गया था। प्रणाम करके उसने अभया के हाथ की एक सतर लिखी हुई मेरी टेबल पर रख दी और कहा, आपने मेरा जो उपकार किया है उसे मुँह से क्या कहूँ- जितने दिन जीऊँगा आपका गुलाम होकर रहूँगा।”अभया की लिखी पंक्ति पर दृष्टि जमाए हुए ही मैंने कहा, “जाइए, आप अपना काम कीजिए, बड़े साहब ने इस बार माफ कर दिया है।”उसने हँसकर कहा, “बड़े साहब की चिन्ता मैं नहीं करता, केवल आप क्षमा कर दें तो मैं जी जाऊँ। आपके श्रीचरणों में मैंने बहुत से अपराध किये हैं।” इतना कहकर उसने फिर बकना शुरू कर दिया, उसी किस्म की वैसी ही कोरी मिथ्या खुशामद की बातें। और बीच-बीच में वह रूमाल से ऑंखें भी पोंछने लगा। इतनी बातें सुनने का धीरज और किसी को नहीं हो सकता, इसलिए यह दण्ड मैं आपको नहीं दूँगा। मैं केवल उसका विस्तृत वक्तव्य संक्षेप में कहे देता हूँ। वह यह है कि उसने अपनी स्त्री के ऊपर जो अपवाद लगाया था सो बिल्कुरल ही झूठ है। उसने लज्जा के फेर में पड़कर ही वैसा किया था, नहीं तो ऐसी सती लक्ष्मी क्या कहीं और है! और मन ही मन चिरकाल से वह अभया को प्राणों से भी अधिक चाहता रहा है। तब, यहाँ जो एक और उपसर्ग आ जुटा है उसे जुटाने की उसकी जरा भी इच्छा नहीं थी, केवल बर्मियों के हाथ से अपने प्राण बचाने के लिए ही उसने यह किया है। (कुछ सत्य हो भी सकता है।) किन्तु, आज रात को जब वह अपने घर की लक्ष्मी को ले जा रहा है तब उस बर्मी- बच्ची को दूर करते कितनी देर लगती है? रहे लड़के-बच्चे-ओहो! सालों की जैसी सूरत है वैसा ही स्वभाव है- हैं वे किस काम के? बुढ़ापे में न तो उनसे खाने-पहिनने को ही मिलेगा और न मरने पर एक चुल्लू पानी की ही उनसे आशा है! जाते ही सबको एक साथ झाड़ू मारकर बिदा कर देगा तब उसका नाम- इत्यादि-इत्यादि।मैंने पूछा, “अभया को क्या आज ही रात को ले जाँयगे आप?” वह विस्मय से अवाक् होकर बोला, “खूब! जितने दिन ऑंखों नहीं देखा था उतने दिन खैर किसी तरह रहा आया; किन्तु, ऑंखों देखकर फिर क्या उसे ऑंखों की ओट कर सकता हूँ? अकेली, इतनी दूर, इतना कष्ट उठाकर, केवल मेरे लिए ही तो आई है! एक दफे सोच तो देखिए जरा इस बात को!”मैंने पूछा, “क्या उसे एक साथ ही घर में रक्खेंगे?”“जी नहीं, इस समय तो प्रोम के पोस्ट मास्टर महाशय के यहाँ ही रखूँगा। उनकी स्त्री के साथ मजे में रहेगी। किन्तु, दो-एक दिन में ही- अधिक नहीं- उसके लिए मकान का प्रबन्ध करूँगा और फिर घर की लक्ष्मी को घर ले आऊँगा।”अभया के स्वामी ने प्रस्थान किया। मैंने भी दैनिक कार्य में मन लगाने के लिए सामने की फाइल को खींच लिया।उसके नीचे अभया की उस लिखावट पर फिर मेरी नजर जा पड़ी। इसके बाद कितनी दफे उन दो सतरों को मैंने पढ़ा और न जाने कितनी दफे और पढ़ता सो कह नहीं सकता। इतने में ही 'पियून' ने कहा, “बाबूजी, आपके घर क्या कुछ कागज-पत्र पहुँचाने होंगे?” चौंककर मैंने सिर उठाया तो देखा, उस समय सामने की घड़ी में साढ़े चार बज गये हैं, और क्लर्क लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अपने घर चले गये हैं।♦♦ • ♦♦अब मुझे अभया के पति का एक पत्र मिला। पहले के ही समान कृतज्ञता सारी चिट्ठी में बिखेर देकर इस बात का बड़े ही अदब और विस्तार के साथ निवेदन करके कि इस समय वह कैसे संकट में पड़ा है, उसने मुझसे उपदेश चाहा है। बात संक्षेप में यह थी कि उसने अपनी शक्ति से अधिक खर्च करके भी एक बड़ा मकान किराये पर ले लिया है; और उसमें एक ओर अपने बर्मी स्त्री-पुत्रादि को रखकर दूसरी ओर अभया को लाकर रखने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु किसी तरह भी उसे सम्मत नहीं कर पाता है। सहधर्मिणी की इस तरह की हठ से वह अतिशय मर्म-पीड़ा अनुभव कर रहा है। यह केवल 'कलि-काल' का फल है, 'सतजुग' में ऐसा नहीं हो सकता था- बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तक भी। अनेक दृष्टान्तों समेत उनका बार-बार उल्लेख करके उसने लिखा है कि हाय! कहाँ है वे आर्यललनाएँ? वे सीता-सावित्री कहाँ गईं? जो आर्य-नारियाँ पति की चरण-युगलों को हृदय में धारण करके हँसती-हँसती चिता में प्राण विसर्जन कर देती थीं और पति सहित अक्षय स्वर्ग-लाभ करती थीं वे अब कहाँ है? जो हिन्दू महिला हँसते हुए चेहरे से अपने कुष्ठग्रसित पति-देवता को कन्धों पर लादकर वेश्या के घर तक पहुँचा आई थीं, कहाँ है उस जैसी पतिव्रता रमणी? कहाँ है वह पति-भक्ति? हाय भारतवर्ष! क्या एकदम ही तेरा अध:पतन हो गया। वह सब क्या अब हम लोग एक दफे भी अपनी ऑंखों न देखेंगे। और क्या हम लोग-इत्यादि इत्यादि, करीब दो पन्ने विलाप से भर दिए हैं। किन्तु अभया पति-देवता को यहाँ तक ही मानसिक कष्ट देकर शान्त नहीं हुई। और भी सुनिए। उसने लिखा है कि इतना ही नहीं कि उसकी अध्र्दांगिनी अब भी दूसरे के घर में रह रही है, बल्कि उसे आज अपने परम मित्र पोस्ट मास्टर से मालूम हुआ कि रोहिणी नामक किसी व्यक्ति ने उसकी स्त्री को पत्र लिखा है और कुछ पैसे भेजे हैं। इससे इस हतभागे की इज्जत को कितना धक्का लगा है सो लिखकर बताया नहीं जा सकता।चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते मैं अपनी हँसी न रोक सका। फिर भी रोहिणी के व्यवहार पर भी कुछ कम क्रोध नहीं आया। अब उसे चिट्ठी लिखने और रुपये भेजने की जरूरत ही क्या थी? जिसने पति के घर को प्राप्त करने के लिए इतना कष्ट सहन करना स्वीकार किया, उसके चित्त को, जान-बूझकर या बिना जाने-बूझे, उचाट करने की जरूरत ही क्या थी? और अभया ने भी इस तरह का व्यवहार किसलिए शुरू किया? वह क्या चाहती है? उसके पति ने जिसे स्त्री की तरह ग्रहण किया है, लड़के-बच्चे पैदा किये हैं- उन सबको त्याग कर क्या केवल उसी को लेकर वह गृहस्थी चलावे? क्यों, बर्मी स्त्रियाँ क्या स्त्रियाँ नहीं हैं? उन्हें क्या सुख-दु:ख, मान-अपमान का बोध नहीं है? न्याय-अन्याय का कानून क्या उनके लिए ताक पर रख देना चाहिए? और यदि ऐसा ही है तो वहाँ उसे जाने की जरूरत ही क्या थी? सब झंझट यहाँ से ही स्पष्ट करके निबटा देने से ही तो हो जाता।तब तक मैं रोहिणी से मिलने नहीं गया था। वह झूठमूठ ही क्लेश पा रहा है, यह मन ही मन समझकर ही शायद मेरी उस तरफ पैर बढ़ाने की प्रवृत्ति नहीं हुई थी। आज छुट्टी होने के पहले ही गाड़ी बुलाने के लिए आदमी भेजकर मैं उठने की तैयारी कर रहा था कि उसी समय अभया का पत्र आ पड़ा। खोलकर देखा कि सारा पत्र आदि से अन्त तक रोहिणी के ही सम्बन्ध की बातों से भरा हुआ है। मैं सदा ही उसके ऊपर नजर रक्खूँ- वह कितना दुर्बल, कितना अपटु, कितना असहाय है- यही एक बात पंक्ति-पंक्ति अक्षर-अक्षर में से ऐसी मर्मान्तिक व्यथा के साथ फूटी पड़ती थी कि कोई अत्यन्त सरल-चित्त मनुष्य भी इस आवेदन के तात्पर्य को समझने में भूल करेगा, ऐसा नहीं जान पड़ा। अपने सुख-दुख की बात उसमें प्राय: कुछ भी नहीं थी! फिर पत्र के अन्त में उसने बताया था कि अनेक कारणों से अब भी वह उसी जगह रह रही है जहाँ कि पहले पहल आकर ठहरी थी।पति सती स्त्री का एकमात्र देवता हो सकता है कि नहीं, इस विषय में अपना मतामत छापे के अक्षरों में प्रकट करने का दु:साहस मुझमें नहीं है और न मुझे इसकी कोई जरूरत ही दिखती है। किन्तु सर्वांगीण सती-धर्म की एक अपूर्वता-दु:सह-दु:ख और सर्वथा अन्याय के बीच में भी उसकी आकाशभेदी विराट महिमा जो मेरी अन्नदा जीजी की स्मृति के साथ चिरकाल के लिए मन की गहराई में खुदकर अंकित हो गयी है, जिसका असह्य सौन्दर्य ऑंखों से देखे बिना अवधारण भी नहीं किया जा सकता, और जिसने एक ही साथ नारी को अति क्षुद्र और अति बृहत् बना दिया है- मेरी वह अव्यक्त उपलब्धि, आज अभया की इस चिट्ठी से आन्दोलित हो उठी।जानता हूँ कि सब अन्नदा जीजी नहीं है- उस कल्पनातीत निष्ठुरता को छाती फैलाकर धीरज से ग्रहण करने जैसी बड़ी छाती भी सब स्त्रियों की नहीं होती; और जो नहीं है उसके लिए रोज शोक करना ग्रन्थकार मात्र का एकान्त कर्तव्य है या नहीं, सो मैंने विचार कर स्थिर नहीं कर रक्खा है, किन्तु फिर भी सारा चित्त वेदना से भर गया। गुस्से में भरा हुआ मैं गाड़ी पर जा बैठा और उस निकम्मे पर स्त्री-आसक्त रोहिणी को जो कड़ी-कड़ी बातें अच्छी तरह सुनाने जा रहा था उन्हें मन ही मन दुहराता हुआ उसके घर की ओर रवाना हो गया। गाड़ी से उतरकर, किवाड़ खोलकर जब मैंने उसके मकान में प्रवेश किया तब दिया-बत्ती की बेला हो गयी थी, अर्थात् दिन का प्रकाश खत्म होकर रात का अंधेरा अभी-अभी उतर रहा था।वह भर भादों भी नहीं था और न उस समय भरे बादल ही थे; किन्तु, शून्य घर-बार की भी यदि कोई सूरत-शक्ल होती है तो उस दिन उस प्रकाश और अन्धकार के बीच जो मेरी नजर में पड़ी, उसे छोड़कर और क्या हो सकती है, सो तो मैं आज भी नहीं जानता। घर के सभी दरवाजे भाँय-भाँय कर रहे थे, केवल रसोईघर की एक खिड़की में से धुऑं निकल रहा था। दाहिनी तरफ कुछ आगे बढ़कर झाँककर देखा कि चूल्हा जलकर प्राय: बुझ रहा है और पास में ही जमीन पर रोहिणी बाबू हँसिये से एक बैंगन के दो टुकड़े करके गुमसुम बैठे हुए हैं। मेरे पैरों की आहट उनके कानों तक नहीं गयी, क्योंकि कर्णेन्द्रिय का जो मालिक था वह उस समय और चाहे जहाँ हो किन्तु बैंगन के ऊपर एकाग्र नहीं था, यह मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ। किन्तु चुपचाप लौटकर जब उन दो कमरों के बीच आ खड़ा हुआ तब मुझे साफ-साफ दिखाई दिया कि एक उत्कट वेदना से भरा हुआ रोदन सारे घर को भरकर दँतौरी बाँधे हुए अडिग रूप से वहाँ स्थिर हो रहा है और वह सम्पूर्ण समाज धर्माधर्म और समस्त पाप-पुण्य से भी परे की, अतीत की, वस्तु है।बाहर आकर मैं बरामदे में एक मोढ़े पर बैठ गया। कितनी ही देर बाद, शायद, दीपक जलाने के लिए रोहिणी बाबू बाहर आए और भयभीत हो उन्होंने पूछा, “कौन है?”मैंने आवाज देकर कहा, “मैं हूँ श्रीकान्त।”“श्रीकान्त बाबू? ओह...” इतना कहकर वह तेज चाल से नजदीक आए, भीतर जाकर उन्होंने दीया-बत्ती की और फिर मुझे भीतर ले जाकर बिठाया। इसके बाद किसी के भी मुँह से कोई बात न निकली- दोनों ही चुपचाप बैठे रहे। सबसे पहले मैंने ही मुँह खोला। कहा, “रोहिणी भइया, यहाँ अब क्यों रहते हो? चलो मेरे साथ।”रोहिणी ने पूछा, “क्यों?”मैंने कहा, “यहाँ आपको कष्ट होता है इसलिए।”रोहिणी कुछ देर ठहरकर बोला, “कष्ट अब मुझे क्या है!”ठीक है! किन्तु, ऐसी अवस्था में तो आलोचना की नहीं जा सकती मैं उसका किस प्रकार तिरस्कार करूँगा, क्या सत्परामर्श दूँगा आदि सब सोचता-सोचता घर से चला था, किन्तु, यहाँ वे सब विचार बह गये। नीतिशास्त्र की पोथी इतनी अधिक नहीं पढ़ी थी कि इतने बड़े प्रेम का अपमान कर सकूँ। कहाँ गया मेरा क्रोध, कहाँ गया मेरा विद्वेष! समस्त साधु-संकल्प अपना सिर नीचा करके कहाँ छिप रहे, पता भी न चला।रोहिणी बोला कि उसने वह प्राइवेट टयूशन छोड़ दी है क्योंकि उससे तन्दुरुस्ती बिगड़ती है। उसका दफ्तर भी अच्छा नहीं है, बड़ी कड़ी मेहनत पड़ती है। नहीं तो अब कष्ट क्या है।मैं चुप हो रहा। क्योंकि इसी रोहिणी के मुँह से कुछ दिन पहिले इससे ठीक उलटी बात सुनी थी। वह कुछ देर चुप रहकर फिर कहने लगा, “ऑफिस से थके-माँदे लौटने पर यह राँधना-रूँधना तो बड़ी झुँझलाहट पैदा करता है, क्यों न श्रीकान्त बाबू?”मैं और क्या कहता? आग बुझ जाने पर केवल जल से ही तो इंजन चलता नहीं, यह तो जानी हुई बात है।फिर भी, वह यह स्थान छोड़कर दूसरी जगह जाने को राजी नहीं हुआ। कल्पना की तो कोई सीमा निर्दिष्ट कर नहीं सकता, इसलिए उस बात को नहीं छोड़ता, किन्तु, किसी असम्भव आशा ने उसके मन के भीतर भी किसी तरह आश्रय नहीं पाया था सो मैं उसकी कुछ बातों से ही जान गया था। फिर भी क्यों वह इस दु:ख के आगार को छोड़ना नहीं चाहता, यह अवश्य ही मैं नहीं सोच सका। किन्तु, उसके अन्तर्यामी के अगोचर नहीं था कि जिस हतभागी के घर का रास्ता रुद्ध हो गया है, उसे इस शून्य घर की पूँजीभूत वेदना यदि खड़ा न रख सके तो उसे मिट्टी में मिलने से रोकना इस दुनिया में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।अपने डेरे पर पहुँचते-पहुँचते कुछ रात हो गयी। घर में घुसकर देखा कि एक कोने में बिस्तर लगाकर एक आदमी सिर से पैर तक कपड़ा ओढ़े सो रहा है। नौकरानी से पूछने पर उसने कहा, “शरीफ आदमी हैं।”“इसलिए मेरे कमरे में!”भोजनादि के उपरान्त उन महाशय से बातचीत हुई। उनका मकान चटगाँव जिले में है। करीब चार वर्ष के बाद उनके लापता छोटे भाई का पता मिला है और उसे वापिस घर ले जाने के लिए वे आए हैं। वे बोले, “महाशय, कहानियों में सुना था कि पुराने समय में कामरूप की स्त्रियाँ विदेशी पुरुषों को- भेड़ बनाकर बाँध रखती थीं। न जाने उस समय वे क्या करती होंगी; किन्तु इस जमाने में बर्मा की स्त्रियों की क्षमता उनसे तिल-भर भी कम नहीं है, सो मैं नस नस से अनुभव कर रहा हूँ।”और भी बहुत-सी बातें करने के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई के उद्धार करने के लिए मेरी सहायता की भिक्षा माँगी। मैंने बचन दिया कि उनके इस साधु उद्देश्य को सफल करने में मैं कमर बाँधकर लग जाऊँगा। क्यों, सो कहने की जरूरत नहीं है। दूसरे दिन सुबह ढूँढ़-खोज करके उनके छोटे भाई की बर्मी ससुराल में जा पहुँचा। बड़े भाई आड़ में रास्ते के ऊपर चहल कदमी करने लगे।छोटे भाई उपस्थित नहीं थे, साइकिल लेकर सुबह घूमने के लिए बाहर गये थे। मकान में सास-ससुर नहीं थे, केवल स्त्री अपनी एक छोटी बहिन को लेकर एक-दो दासियों सहित वहाँ रहती है। इन लोगों की जीविका बर्मा-चुरुट बनाना था। उस समय सब इसी काम में लगे हुए थे। मुझे बंगाली देखकर और सम्भवत: अपने पति का मित्र समझकर, उन्होंने मेरा आदर के साथ स्वागत किया। बर्मी स्त्रियाँ अत्यन्त परिश्रमी होती हैं, परन्तु पुरुष बहुत ही आलसी होते हैं। वहाँ घर के छोटे-मोटे काम-काज से लेकर व्यवसाय वाणिज्य तक सब कुछ प्राय: स्त्रियों के हाथ में है। इसलिए, लिखना-पढ़ना सीखे बिना उनका काम नहीं चलता, परन्तु पुरुषों की बात अलहदा है। पढ़ना-लिखना सीखा हो तो भला, न सीखा हो तो लज्जा के मारे मरना नहीं होता। निष्कर्मा पुरुष स्त्री का उपार्जित अन्न नष्ट करके बाहर उसी पैसे से बाबूगीरी करता फिरता है और उससे लोगों को कोई अचरज नहीं होता। स्त्रियों भी छि:-छि:, मिनमिन, पिनपिन करके उसकी नाकोंदम कर देना आवश्यक नहीं समझतीं। बल्कि, यही किसी परिणाम में उनके समाज को स्वाभाविक आचार में शामिल हो गया है।दस-पन्द्रह मिनट के बीच ही बाबू साहब 'द्वि-वक्र-यान' में लौट आए। सारी देह पर अंगरेजी पोशाक, हाथ में दो-तीन अंगूठियाँ, घड़ी, चैन आदि। काम-काज कुछ भी नहीं करना पड़ता, फिर भी देखा, हालत खूब अच्छी है। उनकी बर्मी पत्नी अपने हाथ का काम छोड़कर उठ खड़ी हुई और उनके हाथ से टोपी तथा छड़ी लेकर उसने रख दी। छोटी बहिन ने चुरुट दियासलाई आदि ला दिये, एक दासी ने चाय का सरंजाम और दूसरी ने पान का डब्बा ला दिया। वाह, इस मनुष्य को तो सबने मिलकर एकदम राजा की तरह रख छोड़ा है! नाम मैं भूल गया हूँ। शायद चारु-वारु ऐसा ही कुछ होगा। जाने दो, हम लोग न होगा तो केवल 'बाबू' कहकर पुकार लेंगे।बाबू ने प्रश्न किया कि आप कौन हैं? मैंने कहा, मैं आपके भाई का मित्र हूँ। उन्होंने विश्वास नहीं किया। बोले, “आप तो कलकतिया हैं; मेरे भाई तो कभी वहाँ गये भी नहीं, मित्रता किस तरह हुई?”किस तरह मित्रता हुई, कहाँ हुई, इस समय वे कहाँ हैं, इत्यादि संक्षेप से वर्णन करके उनके आने का उद्देश्य भी मैंने बता दिया और यह भी निवेदन कर दिया कि वे अपने भ्रातृ-रत्न के दर्शनों की अभिलाषा से उत्कण्ठित हैं।दूसरे दिन सुबह ही हमारी होटल में बाबू की चरण-धूलि आ पड़ी और दोनों भाइयों की बड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने बिदा ग्रहण की। तब से दोनों भाइयों का कुछ ऐसा हेल-मेल हों गया, कि-सुबह नहीं, संध्याट, नहीं-बाबू साहब 'भइया, भइया' कहकर पुकारते हुए लगे जब तब आ उपस्थित होने और फुसफुस खुसखुस सलाह-संलाप करने और खाने-पीने की तो कोई सीमा ही नहीं रही। एक दिन संध्यास को वे अपने भइया को और मुझे भी चाय-बिस्कुट का निमन्त्रण दे गये।उसी दिन उनकी बर्मी स्त्री से मेरी अच्छी तरह बातचीत हुई। वह अतिशय सरल, विनयी और भली है। प्यार करके स्वेच्छा से ही उसने विवाह किया है और तब से शायद एक दिन के लिए भी इन्हें कोई दु:ख नहीं दिया। कोई चार-पाँच दिन बाद बड़े भइया ने मुसकराते हुए कान में कहा, कि परसों सवेरे के जहाज से हम लोग घर जा रहे हैं। सुनकर मुझे कुछ डर-सा लगा; पूछा, “आपके भाई यहाँ फिर लौटकर तो आयँगे?बड़े भइया बोले, “अब? राम-राम करके किसी तरह एक दफे जहाज पर चढ़ तो पावें!”मैंने पूछा, “यह स्त्री को जता दिया है?”बड़े भइया बोले, “बाप रे! तब क्या हम बच सकेंगे? साली जो जहाँ होंगी रक्त-बीज की तरह आकर घेर लेंगी।” यह कहकर और फिर दोनों ऑंखें मिचकाकर हँसते हुए बोले, “फ्रेंच लीव्ह महाशय, फ्रेच लीव्ह- आप समझे या नहीं?”मुझे अत्यन्त क्लेश मालूम हुआ, बोला “ऐसा हुआ तब तो स्त्री को अत्यन्त कष्ट होगा।”मेरी बात सुनकर बड़े भइया तो हँसी से लोट-पोट हो गये। किसी तरह हँसना बन्द करके बोले, “वाह, आपने भी खूब कहा! इन बर्मी औरतों को कष्ट? इन सालियों की जात के लोग खाकर कुल्ला तक नहीं करते, न इनके यहाँ जूठे-मीठे का विचार है, और न जात-पाँत का। साली सब नेप्पी (एक तरह की सड़ाई हुई मछलियाँ) खाती हैं महाशय, जिसकी दुर्गन्ध के मारे भूतनी-पिशाचियाँ तक भाग जावें। इन सालियों को और कष्ट! एक चला जायेगा तो दूसरे को पकड़ लेंगी-छोटी जात की हैं सालीं-“ठहरिए महाशय, ठहरिए। आपके भाई को उसने जो इन चार वर्षों तक राजा की तरह खिलाया-पिलाया है, और कुछ न हो, इसके लिए भी तो उसका कुछ कृतज्ञ होना चाहिए।”बड़े भाई का मुँह गम्भीर हो गया। वे कुछ देर चुप रहकर बोले, “आपने तो मुझे अवाक् कर दिया महाशय। मर्द-बच्चे हैं, विदेश की धारती पर आकर यदि उम्र के दोष से कुछ शौक कर ही डाला तो क्या हुआ? और फिर कौन है जो ऐसा नहीं करता, कहिए न? मुझसे तो कुछ छुपा है नहीं- इसका कुछ खुल पड़ा है- सब लोग जान गये हैं, बस-सो इसीलिए क्या चिरकाल तक इसे इसी तरह फिरते रहना होगा? भला बनकर, गृहस्थ-धर्म चलाकर, फिर से पाँच पंचों में अपना स्थान ग्रहण न करना होगा? महाशय, यह तो कुछ बात ही नहीं है, कच्ची उम्र में तो कितने ही लोग होटल में जाकर मुर्गी तक खा आते हैं। किन्तु उम्र पकने पर क्या ऐसा करते हैं? आप ही विचार कीजिए न, मैं कहता हूँ सो सच है कि झूठ?”वास्तव में यह विचार करने जैसी बुद्धि भगवान ने मुझे नहीं दी, इसलिए मैं चुप रह गया और ऑफिस का समय हो रहा था इसलिए, नहा-खाकर चल दिया।किन्तु, ऑफिस से लौटते ही वे फिर एकाएक बोल उठे, “मैंने सोच देखा, आपकी सलाह ही ठीक है महाशय! इस जात का कुछ भरोसा नहीं, क्या जाने जाते-जाते अन्त में क्या फसाद खड़ा कर दे। कहकर जाना ही ठीक है। साली जो न करें सो थोड़ा। न लाज है न शरम, और न कुछ धर्म का ज्ञान। इन्हें यदि जानवर कहा जाय तो भी कुछ बेजा नहीं है।”मैंने कहा, “हाँ, यही ठीक है।”किन्तु, उसकी बात पर मैं विश्वास न ला सका। मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि इसके भीतर कोई षडयन्त्र है। किन्तु, वह इतना नीच, इतना निष्ठुर होगा-ऑंखों से देखे बगैर कोई उसकी कल्पना भी कर सकेगा, यह मैं नहीं सोच सका।चटगाँव का जहाज रविवार को जाता है। ऑफिस बन्द था। सुबह के समय और करता ही क्या; उन्हें 'सी ऑफ' (=बिदा) करने के लिए जहाज-घाट पर जा पहुँचा। जहाज उस समय जेटी से लगा हुआ था। जाने वाले दोनों श्रेणियों के लोगों की दौड़-धूप, चीख-पुकार में कोई किसी की बात नहीं सुन सकता था।यहाँ वहाँ देखते ही उस बर्मी स्त्री पर नजर पड़ गयी। एक किनारे वह अपनी छोटी बहिन का हाथ पकड़े खड़ी है। सारी रात रोते रहने के कारण उसकी दोनों ऑंखें ठीक जबा के फूलों की तरह हो रही हैं। छोटे बाबू बहुत ही व्यस्त हैं। वे अपनी दो चक्रों की गाड़ी (साइकिल), ट्रंक, बिस्तर तथा और भी न जाने क्या-क्या लिये कुलियों के साथ दौड़-धूप कर रहे हैं-उन्हें क्षण-भर का भी अवसर नहीं है।धीरे-धीरे सारी चीजें जहाज पर चढ़ गयीं, यात्री लोग भी सब ठेल-ठालकर ऊपर चढ़ गये। जो यात्री नहीं थे वे नीचे उतर आए, सामने की ओर से लंगर उठने लगा। इसी समय छोटे बाबू अपने सामान को हिफाजत से रखकर और जगह ठीक करके अपनी बर्मी-स्त्री से बिदा लेने के छल से संसार के निष्ठुरतम अंक का अभिनय करने के लिए जहाज पर से नीचे उतरे। द्वितीय दर्जे के यात्री थे, इसलिए उन्हें यह अधिकार प्राप्त था।मैंने अनेक दफे सोचा है कि इसकी भला क्या जरूरत थी? मनुष्य जबर्दस्ती अपनी मानव-आत्मा को इस तरह क्यों अपमानित करता है? मन्त्रदीक्षित पत्नी न हुई तो क्या हुआ, किन्तु वह स्त्री तो है! वह कन्या भगिनी जननी की जाति की तो है। उसी के आश्रय से वह इतने सुदीर्घ समय तक पति के समस्त अधिकारों का उपयोग करता हुआ वहीं रहा है। उसने तो अपने विश्वस्त हृदय की सारी मधुरता, सारा अमृत, सम्पूर्ण शरीर और मन उस पर समर्पित कर दिया है। फिर किस लोभ से वह इन अगणित लोगों की ऑंखों में उसे इतने बड़ें निर्दय परिहास और तमाशे की चीज बनाकर चलता बना। वह एक हाथ से रूमाल के द्वारा अपनी दोनों ऑंखें ढंके हुए है और दूसरा हाथ अपनी बर्मी स्त्री के गले में डाले हुए रोने के स्वर में बहुत कुछ कह रहा है। स्त्री ऑंचल में मुँह छिपाये रो रही है।¹ यह बंगला मुहाविरा है, अर्थ-अंगूठा दिखाकर।आसपास बहुत से बंगाली खड़े हैं। उनमें से कुछ मुँह फिराकर हँस रहे हैं, और कुछ मुँह में कपड़ा देकर हँसी रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मैं कुछ दूरी पर था, इसलिए पहले कुछ समझ न सका, किन्तु नजदीक आते ही सब बातें साफ-साफ सुन पड़ने लगीं। वह रोने के स्वर में बर्मी और देहाती बंगाली मिलाकर विलाप कर रहा है। यदि बंगाली में कुछ मार्जित करके लिखा जाय तो उस विलाप का यह रूप हो- “एक महीने बाद रंगपुर से तमाखू खरीद कर कैसे आ जाऊँगा, यह मैं ही जानता हूँ! जो री मेरी रत्नमणि! तुझे केला दिखाकर चला रे, ¹ केला दिखाकर चला!”वह यह सब केवल हमारे समान कुछ अपरिचित बंगाली दर्शकों के हँसाने के लिए ही कह रहा था। पर, उसकी स्त्री बंगला नहीं समझती है, केवल रोने की आवाज से ही उस बेचारी की छाती फट रही है और किसी तरह वह हाथ उठाकर उसकी ऑंखें पोंछकर सांत्वना देने की चेष्टा कर रही है।वह आदमी जोर-जोर से बिसूर-बिसूर कर रोता हुआ कहने लगा, “बड़ी मुश्किल से तूने पाँच सौ रुपये तमाखू खरीदने को दिए हैं- अब कुछ तेरे पास नहीं है-पेट तो भरा ही नहीं- इसी तरह यदि तेरा मकान भी बेच-बाचकर भले घर के लड़के की तरह घर जा सकता, तो समझता कि हाँ एक दाँव मारा! हाय, यह सब कुछ नहीं हुआ रे। कुछ नहीं हुआ!आसपास के लोग हँसी को रोक रखने के कारण फूल-फूल उठने लगे; किन्तु जिसको लेकर इतनी हँसाई हो रही थी उसकी ऑंखें और कान दु:ख के ऑंसुओं से एकदम आच्छादित हो रहे थे। ऐसा जान पड़ने लगा कि कहीं वेदना के मारे मर न जाय!खलासियों ने ऊपर से पुकार कर कहा, “बाबू, सीढ़ी उठाई जा रही है।”वह आदमी गला छोड़कर सीढ़ी तक गया और फिर लौट आया। स्त्री के हाथ में एक पुराने समय के अच्छे नगवाली अंगूठी थी। इसी पर हाथ रखकर रोता हुआ बोला, “अरी, दे दे री, यह अंगूठी ही ले जाऊँ। इसके कम से कम दो-ढाई सौ रुपये दाम तो होंगे ही- इन्हीं को क्यों छोड़ूँ?”स्त्री ने उसे चटपट खोलकर अपने प्रियतम की अंगुली में पहिना दिया। “जो मिला वही लाभ है।” कहकर वह आदमी रोता-रोता ही सीढ़ी पर चढ़ गया। जहाज जेटी छेड़कर धीरे-धीरे दूर सरकता जाने लगा और स्त्री मुख पर ऑंचल डालकर घुटने टेककर वहीं बैठ गयी। बहुत से लोग दाँत काढ़कर हँसते-हँसते चले गये। किसी ने कहा, “बाह रे लड़के!” किसी ने कहा, “बाह रे बहादुर छोकरे!' बहुत-से लोग यह कहते-कहते चले गये, 'कैसा तमाशा किया! हँसते-हँसते पेट दुखने लगा!' ऐसे-ऐसे न जाने कितने मन्तव्य प्रकट किये गये। केवल मैं ही अकेला सबके हँसी-तमाशे की चीज उस भोली स्त्री के अपरिसीम दु:ख का साक्षी बनकर गुमसुम खड़ा रह गया।छोटी बहिन ऑंखें पोंछती हुई पास में खड़ी अपनी बहिन का हाथ खींच रही थी। मेरे पास में जाकर खड़े होते ही वह धीरे से बोली, “बाबूजी आए हैं बहिन, उठो।”मुँह उठाकर उसने मेरी ओर देखा और साथ ही साथ उसका रुदन मानो बाँध तोड़कर फट पड़ा। मेरे पास सान्त्वना देने के लिए और था ही क्या! फिर भी, उस दिन मैं उसका साथ नहीं छोड़ सका। उसके पीछे-पीछे उसकी गाड़ी में जा बैठा। रास्ते-भर वह रो-रो करके यही बात कहती रही कि, “बाबूजी, आज मेरा मकान सूना हो गया। किस तरह मैं उसके भीतर पैर रक्खूँगी; एक माह के लिए तमाखू खरीदने गये हैं- यह एक मास मैं कैसे काटूँगी! विदेश में उन्हें न जाने कितनी तकलीफ उठानी होगी! मैंने उन्हें वहाँ क्यों जाने दिया! रंगून के बाजार की तमाखू से हमारा काम तो मजे से चल रहा था; तब फिर क्यों अधिक लाभ की आशा से मैंने उन्हें इतनी दूर भेजा! दु:ख के मारे छाती फटी जाती है। बाबूजी, अगली मेल से ही मैं उनके पास चली जाऊँगी।” इस तरह वह न जाने कितना और क्या-क्या कहती रही।मैं एक बात का भी जवाब न दे सका, केवल अपना मुँह फिराकर खिड़की के बाहर देखता हुआ अपनी ऑंखों के ऑंसुओं को छुपाता रहा।वह कहने लगी, “बाबूजी, तुम्हारी जात के लोग जितना प्यार-प्रेम कर सकते हैं, उतना हमारी जात के लोग नहीं कर सकते; तुम लोगों में जितनी दया माया है उतनी और किसी देश के लोगों में नहीं है।”कुछ देर ठहरकर और दो-तीन दफे ऑंखें पोंछकर वह कहने लगी, “बाबू के प्यार में पड़कर जब मैं उनके साथ रहने लगी तब कितने ही लोगों ने मुझे भय दिखाकर रोका था; किन्तु, मैंने किसी की भी बात न सुनी। इस समय न जाने कितनी स्त्रियाँ मेरे सौभाग्य पर मन ही मन जलती हैं।”चौरस्ते के नजदीक मैंने चाहा कि उतरकर अपने डेरे पर चला जाऊँ, किन्तु, वह व्याकुल होकर दोनों हाथों से गाड़ी का दरवाजा रोककर बोली, “ना बाबूजी, सो नहीं होगा। तुम्हें हमारे साथ चलकर एक प्याला चाय पीकर आना होगा; चलिए।”मैं इनकार न कर सका। गाड़ी चलने लगी। उसने एकाएक पूछा, “अच्छा बाबूजी, रंगपुर कितनी दूर है? आप कभी वहां गये हैं? कैसी जगह है? बीमार होने पर वहाँ डॉक्टर तो मिल सकते हैं न?बाहर की ओर देखते हुए मैंने उत्तर दिया, “हाँ, मिलते क्यों नहीं।”एक उसास छोड़कर वह बोली, “फया (=ईश्वर) उन्हें भला रक्खें। उनके भाई भी साथ में है। वे बड़े सज्जन आदमी हैं, छोटे भाई को तो वे प्राणों से ज्यादा रक्खेंगे। तुम लोगों का शरीर तो जैसे प्रेमहीन बना है। मुझे कुछ सोच नहीं करना है, क्यों न बाबूजी?”मैं चुपचाप बाहर की ओर देखता हुआ केवल यही सोचने लगा कि इस महापाप में मेरा खुद का हिस्सा कितना है? चाहे आलस्यवश हो- चाहे ऑंखों की शरम के मारे हो, और चाहे अक्ल मारी जाने के कारण हो, यह जो मैंने अपना मुँह बन्द किये रहकर इतना बड़ा अन्याय अनुष्ठित होते देखा और कुछ कहा नहीं, इसके अपराध से क्या मैं छुटकारा पाऊँगा? और यदि ऐसा ही है, तो फिर सिर ऊँचा करके मैं सीधा क्यों नहीं बैठ सकता? उसकी ऑंखों की ओर देखने का साहस क्यों नहीं कर सकता?चाय-बिस्कुट लेकर और उनके विवाहित जीवन की लाखों घटनाओं का विस्तृत इतिहास सुनकर जब मैं मकान से बाहर हुआ तब दिन अधिक बाकी नहीं था घर लौट जाने की इच्छा नहीं हुई। दिन के अन्त में सब लोग अपना-अपना काम-काज खत्म करके डेरे में लौट आते हैं- दादा ठाकुर का होटल उस समय तरह-तरह के सुन्दर हास-परिहास से मुखरित हो रही है। पर, सब हो-हल्ला मुझे जहर जैसा लगने लगा। अकेला रास्ते-रास्ते घूमते हुए मैं यही सोचने लगा कि इस समस्या की मीमांसा होगी किस तरह? बर्मी लोगों में विवाह के सम्बन्ध में कोई बँधा हुआ नियम नहीं है। विवाह की कुलीन विधि भी है और पति-पत्नी की तरह जो स्त्री-पुरुष तीन दिन एक साथ रहकर एक बर्तन में भोजन कर लेते हैं, उनका भी विवाह हो गया समझा जाता है। न तो समाज ही इसे नामंजूर करती है और न वह स्त्री ही इस कारण किसी तरह हलकी नजर से देखी जाती है। परन्तु, 'बाबू' के लिए हिन्दू कानून में यह सब कुछ भी नहीं है। इस स्त्री को यह अपने देश में ले जाकर नहीं रख सकता। हिन्दू समाज उन्हें न हो तो न अपनावे, किन्तु, यह भी जीवन-भर सहन करते रहना कठिन है कि नीच से नीच आदमी भी उन्हें नीची निगाह से देखे! या तो चिरकाल के लिए निर्वासित की तरह प्रवास में रहा करे; या फिर, बड़े भइया ने अपने छोटे भाई की जो व्यवस्था की, वही ठीक है। इतना होते हुए भी 'धर्म' नामक शब्द का यदि कोई अर्थ हो सकता है- चाहे वह धर्म हिन्दू जाति का हो या और किसी जाति का, तो इतना बड़ा नृशंस व्यापार किस तरह ठीक हो सकता है सो समझना मेरी बुद्धि से परे की बात है। यह सब बातें तो समयानुसार और कभी सोचकर देखूँगा; किन्तु, इस गुस्से के मारे तो मैं जलकर खाक होने लगा, कि यह कापुरुष आज बिना किसी अपराध के इस अनन्य-निर्भर नारी के परम स्नेह के ऊपर वेदना का बोझा लादकर और चकमा देकर भाग गया।रास्ते के किनारे-किनारे जो चलना शुरू किया तो चलता ही गया। बहुत दिन पहले, एक दिन अभया का पत्र पढ़ने जिस चाह की दुकान में गया था उसी दुकान के मालिक ने शायद पहिचान कर मुझे हाँक दी, “बाबू साहब, आइए।”एकाएक जैसे नींद टूटते ही मैंने देखा, यह वही दुकान है और वह रोहिणी भइया का घर है। बिना कुछ कहे उसके बुलाने का मान रखकर मैं अन्दर चला गया और एक प्याला चाय पीकर बाहर निकला। रोहिणी के दरवाजे पर धक्का देकर देखा कि भीतर से बन्द है। बाहर की साँकल को पकड़कर दो-चार दफे हिलाते ही किवाड़ खुल गये। ऑंखें उठाकर देखा कि सामने अभया है।“अरे तुम?”अभया की ऑंखें और चेहरा लाल हो उठा; कोई भी जवाब दिए बगैर वह पलक मारते न मारते अपने कमरे में चली गयी और उसने अन्दर से कुण्डी बन्द कर ली। किन्तु, लज्जा की जो मूर्ति शाम के उस धुँधले प्रकाश में उसके चेहरे पर फूट उठते देखी, उससे जानने-पूछने के लिए और कुछ बाकी ही नहीं रहा। अभिभूत की तरह कुछ देर खड़ा रहकर चुपचाप लौटकर जा रहा था कि अकस्मात् मेरे दोनों कानों में मानो दो तरह के विभिन्न रोने के स्वर एक ही साथ गूँज उठे; एक था उस महापापी का और दूसरा उस बर्मी युवती का। मैं जाना ही चाहता था, किन्तु, फिर लौटकर ऑंगन में खड़ा हो गया। मन ही मन कहा, नहीं, मुझे इस तरह नहीं जाना चाहिए। नहीं-नहीं- ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह उचित नहीं है, यह अच्छा नहीं है- यह सब अनेक दफे सुनने की आदत रही है, अनेक दफे दूसरों को सुनाया भी है-किन्तु बस, अब और नहीं। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्यों अच्छा है, कहाँ किस तरह बुरा है- ये सब प्रश्न यदि हो सकेगा तो स्वयं उसी के मुँह से सुनूँगा और यदि ऐसा न कर सकूँ, तो केवल पोथी के अक्षरों पर दृष्टि रखकर मीमांसा करने का अधिकार न मुझे है, न तुम्हें है और न शायद विधाता को ही है।

❤️,श्रीकांत"❤️

     अध्याय 7

रास्ते में जिन लोगों के सुख-दु:ख में हिस्सा बँटाता हुआ मैं इस परदेश में आकर उपस्थित हुआ था, घटना-चक्र से वे तो रह गये शहर के एक छोर पर और मुझे आश्रय मिला शहर के दूसरे छोर पर। इसलिए, इन पन्द्रह-सोलह दिनों के बीच उस ओर जा न सका। इसके सिवाय, सारे दिन नौकरी की उम्मीदवारी में घूमते इतना थक जाता था कि शाम के कुछ पहले वास-स्थान पर लौटने पर इतनी शक्ति ही नहीं बचती थी कि मैं कहीं भी बाहर जाऊँ। क्रम-से-क्रम जैसे-जैसे दिन बीतने लगे मेरे मन में यह धारणा होने लगी कि इस सुदूर परदेश में आने पर भी नौकरी प्राप्त करना मेरे लिए ठीक उतना ही कठिन है जितना कि देश में था।

अभया की बात याद आई। जिस आदमी पर भरोसा करके वह घर छोड़कर अपना पति खोजने आई है, पता न लगने पर उस आदमी का क्या हाल होगा। घर छोड़कर बाहर आने का मार्ग काफी खुला होने पर भी लौटने का मार्ग ठीक उतना ही प्रशस्त बना रहेगा, इतनी बड़ी आशा की कल्पना करने का साहस बंगाल देश की आबो-हवा में पले होने के कारण मुझमें नहीं है। उन्होंने अधिक दिनों तक अपना निर्वाह कर सकने लायक धन-बल संग्रह करके पैर नहीं बढ़ाया है, इसका अनुमान करना भी मेरे लिए कठिन नहीं है। बाकी बचा केवल एक रास्ता जो कि पन्द्रह आने बंगालियों का एकमात्र सहारा है-अर्थात् महीने-पन्द्रह दिन के बाद पराई नौकरी करके मरण-पर्यन्त किसी तरह शरीर में हाड़-मांस बनाए रहकर जीते रहना। यह कहने की जरूरत नहीं कि रोहिणी बाबू के लिए भी इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं था, किन्तु, रंगून के इस बाजार में केवल अपना ही पेट भरने लायक नौकरी जुटाने में जब मेरा यह हाल है तब एक स्त्री को अपने कन्धों पर लादे हुए अभया के उस बेचारे बिना ढंग-ढौल के गुमसुम 'भइया' का क्या हाल होगा इसकी कल्पना करके मैं भयभीत हो उठा। मैंने स्थिर किया कि जैसे बने, कल एक दफे जाकर उनकी खबर जरूर लूँगा।

दूसरे दिन शाम के समय करीब दो कोस जमीन खोदकर उनके वास-स्थान पर पहुँचा और देखा कि बाहर के बरामदे में एक छोटे-से मोढ़े पर रोहिणी भइया बैठे हुए हैं। उनका मुख-मण्डल बादल छाए हुए 'आषाढस्य प्रथम दिवसे' की तरह गुरु-गम्भीर हो रहा है। बोले, “ओह श्रीकान्त बाबू! आप अच्छे तो हैं?”

मैं बोला, “जी, अच्छा ही हूँ।”

“जाइए, भीतर जाकर बैठिए।”

मैंने डरते हुए पूछा, “आप लोग तो सब अच्छे हैं?”

“हूँ- भीतर जाइए न, वे घर में ही हैं।”

“अच्छा जाता हूँ- आप भी आइए न?”

“नहीं, मैं यहीं पर कुछ देर आराम करूँगा। परिश्रम करते-करते एक तरह से मेरी हत्या ही हुई जाती है- दो घड़ी पैर फैलाकर कुछ बैठ ही लूँ।” वे परिश्रम की अधिकता से मरे हुए से हो गये हैं उनके चेहरे पर से यह प्रकाशित न होते हुए भी मैं मन ही मन कुछ उद्विग्न हो उठा। रोहिणी भइया के भीतर भी इतनी गम्भीरता इतने दिन से प्रच्छन्न रूप में वास कर रही है, अपनी ऑंखों देखे बिना यह विश्वास करना कठिन था। किन्तु मामला क्या है? मैं खुद भी तो रास्ते-रास्ते की धूल छानकर ऊब उठा हूँ। मेरे यह रोहिणी भइया भी क्या-

किवाड़ों की आड़ में से अभया ने अपना हँसता हुआ चेहरा बाहर निकालकर गुपचुप इशारा करके मुझे भीतर बुलाया। दुविधा में पड़कर मैंने कहा, “चलिए न रोहिणी भइया, भीतर चलकर गप-शप करें।”

रोहिणी भइया ने जवाब दिया, “गप-शप! इस समय मर जाऊँ तो जान बचे, यह जानते हो श्रीकान्त बाबू?”

“नहीं जानता”, यह मुझे स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने जवाब में केवल एक प्रचण्ड उसास छोड़ी और कहा, “दो दिन बाद ही मालूम हो जायेगा।”

अभया के दुबारा गुप-चुप बुलाने पर बाहर अधिक देर बहस न करके मैंने अन्दर प्रवेश किया। भीतर रसोई-घर के सिवाय दो और कमरे सोने के हैं। सामने का कमरा ही बड़ा है और उसी में रोहिणी बाबू सोते हैं। एक ओर रस्सी की खाट पर उनके बिस्तर हैं। अन्दर घुसते ही देखा फर्श के ऊपर आसन बिछा है, एक ओर रकाबी में पूरी-तरकारी, थोड़ा-सा हलुआ और एक गिलास जल रखा हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि ज्योतिष से पता लगाकर यह आयोजन दोपहर से ही कुछ मेरे लिए तैयार नहीं किया गया है, इसलिए क्षणभर में ही मैं समझ गया कि कुछ लड़ाई-झगड़ा चल रहा था। इसीलिए रोहिणी भइया का मुँह बादलों से ढँका हुआ है, इसीलिए वे मर जाऊँ तो जान बचने की बात कर रहे हैं। मैं चुपचाप खाट पर जाकर बैठ गया। अभया ने थोड़ी-सी दूर खड़े होकर पूछा, “आप अच्छे तो हैं? इतने दिनों बाद शायद गरीबों का खयाल आया है?”

भोजन के थाल को दिखाकर मैंने कहा, “मेरी बात पीछे होगी। किन्तु यह क्या है?”

अभया हँसी और कुछ देर चुप रहकर बोली, “यह कुछ नहीं है, आप कैसे हैं सो कहिए।”

“कैसा हूँ सो मैं खुद नहीं जानता, दूसरे को किस तरह बताऊँ?” फिर कुछ सोचकर बोला, “जब तक कोई नौकरी न मिल जाय तब तक इस प्रश्न का जवाब देना कठिन है। रोहिणी बाबू कहते थे-” मेरे मुँह की बात मुँह में ही रह गयी। रोहिणी भइया अपनी फटी चिट्ठियों से अस्वाभाविक फटर-फटर शब्द करते हुए भीतर घुस आए और किसी की ओर भी दृष्टिपात किये बगैर उन्होंने पानी का गिलास उठा लिया। एक ही साँस में उन्होंने उसे आधा खाली कर दिया। बाकी दो-तीन घूँट में जबर्दस्ती पीकर शून्य गिलास काठ की मेज पर रख दिया, और वे यह कहते-कहते बाहर चल दिए, “जाने दो खाली पानी पीकर ही पेट भर लूँ। मेरा यहाँ पर और कौन बैठा है जो भूख लगने पर खाने को देगा!”

मैंने अवाक् होकर अभया की ओर ताका। पल-भर के लिए उसका मुँह सुर्ख हो गया; किन्तु, उसी क्षण उसने अपने आपको सँभाल लिया और पहले दीखता है!”

रोहिणी ने यह बात कानों पर ही नहीं दी, और वे बाहर चल दिए, किन्तु, आधा मिनट खत्म होने के पहले ही वापिस लौट आए और किवाड़ें के सामने खड़े होकर मुझे सम्बोधन कर बोले, “सारे दिन ऑफिस में मेहनत करने के बाद भूख के मारे सिर चक्कर खा रहा था श्रीकान्त बाबू, इसीलिए उस समय आपसे बात न कर सका, कुछ खयाल न करिएगा।”

मैंने कहा, “नहीं।”

“उन्होंने फिर कहा, “आप जहाँ ठहरे हैं वहाँ मेरे लिए भी जरा-सा बन्दोबस्त कर सकते हैं?”

उनके मुँह की भाव-भंगी को देखकर मैं हँस पड़ा! बोला, किन्तु वहाँ पर पूडियों और मोहन-भोग का डौल नहीं है।”

रोहिणी भइया बोले, “जरूरत ही क्या है! भूख के समय कोई यदि जरा-सा गुड़ और जल देवे तो वह अमृत है। यहाँ तो वह भी कौन देता है?”

मैंने जानने की इच्छा से अभया की ओर दृष्टि डाली। तुरन्त ही वह धीरे से बोली, “सिर दर्द करता था। इसलिए बेवक्त सो गयी थी, और इसी कारण भोजन बनाने में आज जरा-सी देर हो गयी श्रीकान्त बाबू।”

मैंने आश्चर्य के साथ कहा, “बस, यही अपराध है?”

अभया ने उसी तरह शान्त-भाव से कहा, “यह क्या कोई तुच्छ अपराध है श्रीकान्त बाबू?”

“तुच्छ नहीं तो और क्या है?”

अभया बोली, “आपके समीप तुच्छ हो सकता है, किन्तु जो महाशय अपनी इस फिजूल की गले-पडूको खाने देते हैं वे कैसे माफ करेंगे? मेरा सिर दर्द करे तो उनका काम कैसे चल सकता है?”

रोहिणी बाबू एकदम तड़क कर गर्ज उठे और बोले, “तुम गले-पड़ू हो, मैंने यह कब कहा?”

अभया बोली, “कहोगे क्यों, हजार तरह से दिखा तो रहे हो?”

रोहिणी भइया बोले, “दिखा रहा हूँ! ओह, तुम्हारे मन में जलेबी जैसा पेंच है! यह तुमने मुझसे कब कहा था कि सिर दर्द कर रहा है?”

अभया ने कहा, “कहने से लाभ ही क्या था? क्या तुम विश्वास करते?”

रोहिणी भइया मेरी ओर पलटकर ऊँचे कण्ठ से बोल उठे, “सुनिये श्रीकान्त बाबू, ये सब बातें सुन रखिए। इन्हीं के लिए मैंने देश का त्याग किया- घर लौटने का रास्ता बन्द हो गया- अब इनके मुँह की बात सुनिये। ओह-”

अभया ने भी इस दफे गुस्स् से जवाब दिया, “मेरा जो होना होगा हो जाएगा, तुम्हारी जब इच्छा हो देश लौट आओ! मेरे लिए तुम क्यों इतना कष्ट सहोगे? तुम्हारी कौन होती हूँ मैं? इस तरह ताना कसने की अपेक्षा...”

उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि रोहिणी भइया करीब-करीब चीत्कार कर उठे, “सुनिए श्रीकान्त बाबू, दो रोटी पका देने के लिए- ये बातें आप जरा सुन रखिए। अच्छा, आज से कभी तुमने यदि मेरे लिए रसोईघर में पैर रखा तो तुम्हें बहुत ही बड़ी- बल्कि मैं होटल में-” कहते-कहते उनका गला रुलाई से भर आया, वे धोती का छोर मुँह पर लगाकर तेजी से कदम रखते हुए मकान के बाहर हो गये। अभया ने अपना उतरा हुआ चेहरा नीचे झुका लिया- न जाने ऑंखों के ऑंसू छिपाने के लिए या यों ही; किन्तु मैं तो एकदम काठ हो गया। कुछ दिनों से दोनों के बीच अनबन हो रही है, यह तो ऑंखों से ही देख लिया; किन्तु, इसका गहरा हेतु दृष्टि से बिल्कु'ल परे होने पर भी वह क्षुधा और भोजन बनाने की त्रुटि से बहुत-बहुत दूर है, यह समझने में मुझे जरा-सा भी विलम्ब नहीं लगा। तो फिर, क्या पति खोजने की बात भी-

मैं उठकर खड़ा हो गया। इस नीरवता को भंग करने में मुझे खुद भी जैसे संकोच होने लगा। कुछ इधर-उधर करके अन्त में मैंने कहा, “मुझे बहुत दूर जाना है- इस समय तो अब चलता हूँ।”

अभया ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, “अब कब आइएगा?”

“बहुत दूर!”

“तो फिर जरा ठहर जाइए” कहकर अभया बाहर चली गयी। पाँच-छह मिनट बाद लौटकर आई और मेरे हाथ में एक टुकड़ा कागज देकर बोली, “जिस काम के लिए मैं आई हूँ वह सब इसमें लिख दिया है। पढ़कर जो नीक जँचे सो कीजिएगा। मैं आपसे कुछ अधिक कहना नहीं चाहती।” इतना कहकर गले में ऑंचल डालकर आज उसने मुझे प्रणाम किया और फिर उठकर पूछा, “आपका ठिकाना क्या है?”

सवाल का जवाब देकर मैं उस छोटे से कागज को मुट्ठी में छिपाकर धीरे-धीरे निकल आया। बरामदे के बाहर का वह मोढ़ा इस समय शून्य था। रोहिणी भइया को भी मैं आसपास कहीं न देख सका। डेरे पर पहुँचने तक मैं अपना कुतूहल दमन न कर सका! पास में ही रास्ते के बगल में एक छोटी-सी चाय की दुकान देखकर उसमें घुस गया और लैम्प के उजाले में मैंने उस पत्र को अपनी ऑंखों के सम्मुख खोलकर रख लिया। पेंन्सिल की लिखावट थी किन्तु ठीक पुरुष के से हस्ताक्षर थे। सबसे पहले उसने अपने पति का नाम और उसका पुराना ठिकाना देकर नीचे लिखा था, “आज आप जो अपने मन में धारणा लिये जा रहे हैं सो मैं जानती हूँ; और विपत्ति के समय मुझे आपका कितना भरोसा है सो भी आप जानते हैं। इसीलिए मैंने आपका ठिकाना पूछ लिया है।”

अभया के इस लेख को मैंने बार-बार पढ़ा परन्तु उसमें इन कुछ थोड़ी-सी बातों के सिवाय और किसी भी अतिरिक्त बात का अन्दाजा नहीं लग सका। आज इन लोगों का परस्पर व्यवहार अपनी नजर से देखकर कोई बाहरी आदमी जो भी सोच सकता है उसका अनुमान करना अभया सरीखी बुद्धिमती रमणी के लिए बिल्कुाल ही कठिन नहीं है। किन्तु फिर भी वह अन्दाज सही है या गलत, इस सम्बन्ध में बिन्दु-मात्र भी उसने इशारा नहीं किया। उसके पति का नाम और ठिकाना तो मैंने पहले ही सुना है, पर विपत्ति के समय वह उसकी खोज करना चाहती है या नहीं, अथवा और कौन-सी विपत्ति अवश्यम्भावी समझकर उसने मेरा पता ले लिया है- आदि किसी बात का आभास तक भी मैं उस लेख में खोजकर बाहर न निकाल सका। बातचीत से अनुमान होता है कि रोहिणी किसी दफ्तर में नौकरी पा गया है। किस तरह पा गया है सो भी मुझे मालूम नहीं हुआ। पर हाँ खाने-पीने की दुश्चिन्ता कम से कम मेरी तरह उन्हें नहीं है- पूड़ियाँ भी खाने को मिल जाती हैं। फिर भी, अभया ने किस किस्म की विपत्ति की सम्भावना के लिए मुझे तैयार कर रक्खा है और ऐसा करने से उसने क्या लाभ सोच रक्खा है, सो अभया ही जाने।

बाहर निकलकर रास्ते-भर मैं केवल इन्हीं लोगों के विषय में सोचता सोचता डेरे पर पहुँचा। कुछ भी स्थिर नहीं कर सका। लेकिन यही निश्चय किया कि अभया का पति कोई भी क्यों न हो और चाहे जहाँ, चाहे जिस तरह क्यों न हो, स्त्री की विशेष अनुमति बगैर उसे खोज निकालने का कुतूहल मुझे रोक ही रखना होगा।

दूसरे दिन से मैं फिर अपनी नौकरी की उम्मीदवारी में लग गया; किन्तु हजारों चिन्ताओं में भी अभया की चिन्ता को मन के भीतर से झाड़कर नहीं फेंक सका।

किन्तु, चिन्ता चाहे जितनी ही क्यों न करूँ, दिन के बाद दिन समान-भाव से लुढ़कने लगे। इधर भाग्यवादी दादा ठाकुर का प्रफुल्ल चेहरा धीरे-धीरे मेघाच्छन्न होने लगा। भोजन में तरकारियाँ भी पहले परिमाण में और फिर संख्या में धीरे-धीरे विरल होने लगीं। किन्तु, नौकरी ने मेरे सम्बन्ध में जरा भी अपना मत-परिवर्तन नहीं किया। जैसी नजर से उसने पहिले दिन देखा था महीने भर से अधिक बीतने के बाद भी ठीक उसी नजर से वह देखती रही। तब न जाने किसके ऊपर मैं क्रमश: उत्कण्ठित और विरक्त होने लगा। किन्तु, उस समय तक मैं यह नहीं जानता था कि जब तक नौकरी करने की पूरी जरूरत न हो तब तक वह दर्शन नहीं देती। यह ज्ञान एक दिन एकाएक रास्ते में रोहिणी बाबू को देखकर प्राप्त हुआ। वे बाजार में रास्ते के किनारे शाक-सब्जी खरीद रहे थे। मैं चुपचाप उनके निकट खड़ा होकर देखता रहा। यद्यपि उनके शरीर पर के कपड़े, जूते आदि जीर्णता की प्राय: चरम सीमा को पहुँच चुके हैं- भयंकर कड़ी धूप में सिर पर एक छतरी तक नहीं है, किन्तु, खाद्य पदार्थ वे बड़े आदमियों की तरह खरीद रहे हैं। इस कार्य में ढूँढ़-खोज और जाँच-परख की भी कोई हद नहीं है। झंझट और जहमत चाहे जितनी क्यों न उठानी पड़े अच्छी चीज खरीदने की ओर उनके प्राण लगे हुए हैं। पलक मारते सारा व्यापार मेरी नजर के सामने तैर आया। इस खरीद-बिक्री के भीतर से उनका व्यग्र व्याकुल प्रेम कहाँ जाकर पहुँच रहा है, यह मानो मैं सूर्य के प्रकाश के समान सुस्पष्ट देख सका। क्यों यह सब लेकर उन्हें अपने मकान पर पहुँचना ही चाहिए और क्यों उन्हें इन सब चीजों का मूल्य देने के लिए नौकरी खोजनी ही पड़ी, इस समस्या की मीमांसा करने में जरा-सी देर न लगी। आज मैं साफ-साफ समझ गया कि क्यों इन मनुष्यों के जंगल में उन्होंने अपना रास्ता पा लिया है और क्यों में अभी तक असफल रहा हूँ।

यह दुबला-पतला आदमी रंगून के राजमार्ग पर एक बड़ी-सी गठरी हाथ में लिये हुए सैकड़ों जगह फटे हुए मैले कपड़े पहने घर की ओर जा रहा है, आड़ में से मैंने उसके परितृप्त मुख की ओर नजर की। अपनी ओर नजर करने का मानो उसे अवकाश ही नहीं है। जिस वस्तु से उसका हृदय परिपूर्ण हो रहा है उससे उसके निकट कपड़े-लत्तों का दैन्य मानो एक बारगी अकिंचित्कर हो गया है। और मैं अपने कपड़ों के साधारण से मैलेपन के ही कारण मानो प्रत्येक कदम पर शर्म के मारे सिकुड़कर जड़ हुआ जाता हूँ। रास्ते पर से चलने वाले बिल्कुखल अपरिचित व्यक्ति की भी अपने ऊपर नजर पड़ते देख शर्म के मारे मरा जाता हूँ!

रोहिणी भइया चले गये। मैंने उन्हें नहीं पुकारा और दूसरे क्षण ही वे लोगों के बीच अदृश्य हो गये। क्यों, सो मुझे मालूम नहीं, पर इस बार ऑंसुओं के मारे मेरी दोनों ऑंखें धुँधली हो गयीं। चादर के छोर से उन्हें पोंछते हुए रास्ते के किनारे धीरे-धीरे मैं अपने डेरे पर लौट आया और बार-बार मन ही मन कहने लगा, इस प्रेम से बढ़कर शक्ति, इस प्रेम से बढ़कर शिक्षक संसार में शायद और कोई नहीं। ऐसी कोई बड़ी बात नहीं जिसे यह न कर सके।

फिर भी, बहुत युगों का संचित अन्ध संस्कार मेरे कानों में चुपचाप कहने लगा- यह शुभ नहीं है, यह पवित्र नहीं है- अन्त तक इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

डेरे पर पहुँचते ही एक बड़ा लिफाफा मिला। खोलकर देखा, नौकरी की दरख्वास्त मंजूर हो गयी है। सागौन की लकड़ी का एक बड़ा भारी व्यापारी अनेक लोगों के आवेदन-पत्र होते हुए भी मुझ गरीब पर ही प्रसन्न हुआ है। भगवान उसका भला करें।

नौकरी नामक वस्तु से पुराना परिचय न था इसलिए, उसे पाकर भी मन में सन्देह बना रहा कि बहुत दिनों तक बनी रहेगी या नहीं। मेरे जो साहब हुए थे वे सच्चे साहब (अंगरेज) होकर भी, देखा कि बंगला भाषा खूब जानते हैं, क्योंकि, कलकत्ते के ऑफिस से बदलकर बर्मा आए थे।

दो हफ्ते की नौकरी के उपरान्त ही उन्होंने बुलाकर कहा, “श्रीकान्त बाबू, तुम इस टेबल पर आकर काम करो, तनख्वाह भी इससे करीब ढाई गुनी पाओगे।”

मैंने प्रकट रूप से तथा मन ही मन भी साहब को लाखों आशीर्वाद देते हुए उस हड्डी-पसली निकली हुई टेबल को छोड़कर एकदम हरी बनात मढ़ी हुई टेबल पर दखल जमा लिया। मनुष्य का जब भला होना होता है तब इसी तरह होता है- हम लोगों के होटल के दादा ठाकुर ने बिल्कुयल ही मिथ्या नहीं कहा है।

किराये की गाड़ी पर चढ़कर यह खुशखबरी अभया को देने गया। रोहिणी भइया ऑफिस से लौटकर जलपान करने बैठे थे; किन्तु, आज उन्हें केवल पानी पीकर अपनी भूख मिटाते हुए नहीं देखा। बल्कि, आज जिस तरह वे अपनी भूख पूरी कर रहे थे, उस तरह पूरी करते संसार में और चाहे जिसे आपत्ति हो, मुझे तो नहीं थी। अतएव यह कहना फिजूल है कि अभया के भोजन के प्रस्ताव पर मैंने अपनी असम्मति नहीं प्रकट की। खाना-पीना शेष होते ही रोहिणी भइया कोट पहिरने लगे। अभया ने खिन्न कण्ठ से कहा, “तुमसे मैं बराबर कहती आती हूँ रोहिणी भइया, कि यह शरीर लेकर इतना परिश्रम मत किया करो, क्या तुम किसी तरह भी न सुनोगे? अच्छा हम लोग क्या करेंगे अधिक रुपयों का? दिन तो हमारे अच्छी तरह कट ही रहे हैं।”

रोहिणी भइया के चक्षुओं से मानो स्नेह झरने लगा। वे हँसकर बोले, “अच्छा, अच्छा, सो ठीक। एक रसोइया तक तो रख नहीं सकता, चूल्हे के नजदीक दोनों वेला पचते-पचते तुम्हारी तो देह सूख गयी है।” वे इतना कहकर पान खाकर, जल्दी-जल्दी कदम रखते हुए बाहर चल दिए।

अभया एक छोटी साँस दबाकर, जबरन जरा हँसकर बोली, “देखिए तो श्रीकान्त बाबू, इनका अन्याय! सारे दिन जी-तोड़ मेहनत करने के बाद घर आकर कुछ आराम करें, सो तो नहीं, अब रात को भी नौ बजे तक लड़कों को पढ़ाने बाहर चले गये हैं। मैं इतना कहती हूँ, पर किसी तरह सुनते ही नहीं। दो आदमियों की रसोई के लिए रसोइया रखने की, कहो तो, जरूरत ही क्या है? है न यह सब इनकी ज्यादती?” इतना कहकर उसने एक ओर को ऑंखें फेर लीं।

मैं धीरे से कुछ हँस दिया। 'ना' या 'हाँ' जवाब देना मेरे लिए सम्भव नहीं था- मेरे विधाता के लिए भी सम्भव था या नहीं, इसमें भी सन्देह है।

अभया उठकर गयी और एक पत्र लाकर उसने मेरे हाथ पर रख दिया। कुछ दिन हुए वह बर्मा रेलवे कम्पनी के ऑफिस से आया था। बड़े साहब ने दु:ख प्रकाशित करते हुए लिखा था कि अभया का पति करीब दो वर्ष पहले किसी बहुत बड़े अपराध के कारण कम्पनी की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है, तब से वह कहाँ चला गया सो वे नहीं जानते।

हम दोनों ही बहुत देर तक सन्न होकर बैठे रहे। अन्त में अभया ने ही मौन तोड़ा, “अब आप क्या सलाह देते हैं?”

मैंने धीरे से कहा, “मैं क्या सलाह दूँ?”

अभया सिर हिलाकर बोली, “नहीं, सो नहीं हो सकता। ऐसी परिस्थिति में आपको ही कर्तव्य स्थिर कर देना होगा। इस पत्र के मिलने के बाद से ही मैं बड़ी आशा से आपकी राह देख रही हूँ।”

मैंने मन ही मन कहा, बहुत खूब! मेरी राय लेकर ही घर से बाहर निकली थीं न, जो मेरी सलाह के लिए राह जोह रही हो!

बहुत देर तक चुप रहकर पूछा, “घर लौट जाने के सम्बन्ध में आपका क्या मत है?”

अभया बोली, “कुछ भी नहीं। आप कहें तो जा सकती हूँ, किन्तु मेरे तो वहाँ कोई है नहीं।”

“रोहिणी बाबू क्या कहते हैं?”

“वे कहते हैं कि नहीं लौटेंगे। कम से कम दस बरस तक तो वे उस ओर मुँह भी नहीं फिराएँगे।”

बहुत देर तक चुप रहकर मैंने कहा, “वे क्या आपका बोझा बराबर सँभाले रह सकेंगे?”

अभया बोली, “पराये मन की बात, कहिए किस तरह जानूँ? इसके सिवाय वे खुद भी किस तरह जान सकते हैं?” इतना कहकर क्षण-भर वह चुप रही, फिर बोली, “एक बात और है। मेरे लिए वे जरा भी जिम्मेदार नहीं हैं। दोष कहो, भूल कहो, जो कुछ है सो मेरी है।”

गाड़ीवान ने बाहर से पुकारा, “बाबू, और कितनी देर लगेगी?”

जैसे मेरी जान बच गयी। इस अवस्था-संकट के भीतर से सहसा परित्राण पाने का कोई उपाय मुझे खोजे नहीं मिल रहा था। यह सच है कि विश्वास करने को मेरा दिल नहीं चाहता था कि अभया वास्तव में ही अपार सागर में गिरकर गोते खा रही है, किन्तु मैंने स्त्रियों की इतने तरह की उलटी-सुलटी अवस्थाएँ देखी हैं कि बाहर से इन ऑंखों पर विश्वास कर लेना कितना बड़ा अन्याय है, सो मैं नि:संशय रूप से समझता था।

गाड़ीवान का एक दफे और बुलाना था कि मैं क्षण-भर भी विलम्ब किये बगैर उठ खड़ा हुआ और बोला, “मैं शीघ्र ही और एक दिन आऊँगा।” इतना कहकर मैं तेजी से बाहर हो गया। अभया और कुछ न बोली। निश्चल मूर्ति की तरह जमीन की ओर देखती रह गयी।
♦♦ • ♦♦

गाड़ी में बैठते ही गाड़ी चल दी; दस हाथ भी नहीं गया था कि याद आया, छड़ी तो कहीं भूल आया हूँ। तुरन्त गाड़ी खड़ी की और मकान में प्रवेश करते ही देखा कि ठीक दरवाजे के सामने अभया उलटी पड़ी है और बाण से विधे हुए पशु की तरह अव्यक्त वेदना से पछाड़ खाकर मानो प्राण विसर्जन कर रही है।

क्या कहकर उसे सांत्वना दूँ, सो मेरी बुद्धि के परे की वस्तु थी। वज्राहत की तरह कुछ देर सन्न रहकर उसी तरह चुपचाप लौट आया! अभया जिस तरह रो रही थी उसी तरह रोती रही। उसे यह मालूम ही न हो सका कि उसकी इस निगूढ़ असीम वेदना का एक मौन साक्षी भी इस जगत में विद्यमान है।

राजलक्ष्मी का अनुरोध मैं भूला नहीं था। पटने को पत्र लिखने की बात, जब आया था तभी से, मेरे मन में थी। किन्तु, पहली बात तो यह कि संसार में जितने भी कठिन काम हैं, उनमें चिट्ठी लिखने को मैं किसी से भी कम नहीं समझता। इसके सिवाय, फिर लिखूँ भी क्या? किन्तु, अभया का रोना मेरे दिल में इस तरह भारी हो उठा कि उसमें का कुछ अंश बाहर निकाल दिये बगैर मेरी गति ही नहीं है, ऐसा मालूम होने लगा। इसीलिए, डेरे पर पहुँचते ही कागज-कलम जुटाकर बाईजी को पत्र लिखने बैठ गया। और उसको छोड़कर मेरे दु:ख का अंश बँटाने वाला था ही कौन? दो-तीन घण्टे बाद इस 'साहित्य-चर्चा' को समाप्त करके जब मैंने कलम रखी तब रात के बारह बज गये थे। किन्तु, कहीं सुबह दिन के उजालें में उस चिट्ठी को भेजने में लज्जा न आने लगे, इसलिए, मिजाज गर्म रहते-रहते ही मैं उसे उसी समय डाक-बॉक्स में छोड़ आया।

मुझे सन्देह था कि एक भले घर की स्त्री की निदारुण वेदना का गुप्त इतिहास और किसी दूसरी स्त्री पर प्रकट करना चाहिए या नहीं; किन्तु अभया के इस परम और चरम संकट के समय वह राजलक्ष्मी, जिसने कि एक दिन प्यारी बाई की मर्मान्तिक तृष्णा दमन की थी, उसके लिए क्या नेक सलाह देती है, यह जानने की आकांक्षा ने मुझे एकदम बेकाबू कर दिया। किन्तु अचरज की बात यह है कि इस सवाल को उलट-पलटकर मैंने एक बार भी नहीं सोचा। अभया के पति का पता न लगने की समस्या भी बार-बार मन में आ रही थी, किन्तु पता लगने पर यह समस्या और भी अधिक जटिल हो सकती है, यह चिन्ता एक दफे भी उदित नहीं हुई। और इस गोरखधन्धे को सुलझाने का भार भी विधाता ने मेरे ही ऊपर निर्दिष्ट कर रक्खा है सो भी किसने सोचा था?

तीन-चार दिन के बाद मेरा एक बर्मी क्लर्क टेबल पर एक फाइल रख गया। उस पर नीली पेन्सिल से लिखा हुआ बड़े साहब का मन्तव्य था। उन्होंने मुझे 'केस' का फैसला करने का हुक्म दिया था। मामले को शुरू से आखीर तक पढ़कर कुछ मिनट के लिए मैं सन्न होकर रह गया। घटना संक्षेप में यह थी कि हमारे प्रोम ऑफिस के एक क्लर्क को वहाँ के अंगरेज मनेजर ने लकड़ी चुराने के सन्देह में सस्पेण्ड करके रिपोर्ट की है। क्लर्क का नाम देखकर ही मुझे मालूम हो गया कि यही हमारी अभया का पति है। इसकी भी चार-पाँच पेज की कैफियत थी। बर्मा रेलवे में भी किसी गम्भीर अपराध के कारण यह नौकरी से बरखास्ते हुआ होगा, यह अनुमान करने में भी मुझे देर नहीं लगी।

थोड़ी ही देर बाद उस क्लर्क ने आकर कहा कि एक भले आदमी आपसे मिलना चाहते हैं। इसके लिए मैं तैयार ही था और मैं निश्चय से जानता था कि प्रोम से वह स्वयं केस की पैरवी करने आवेगा। इसलिए, जब कुछ ही मिनट बाद उसने सशरीर आकर दर्शन दिए तब अनायास ही मैंने पहिचान लिया कि यही अभया का पति है। उसकी ओर देखते ही सारा शरीर मानो घृणा से कण्टकित हो गया। पहिने था वह हैट-कोट, किन्तु जितने ही पुराने उतने ही गन्दे। काला मुँह सारा बड़ी-बड़ी मूँछों और दाढ़ी से ढँका हुआ था। नीचे का होठ शायद डेढ़ इंच मोटा था। और पान उसने इतने अधिक खाए थे कि उनका रस दोनों ओर जम गया था- उसके बात करते समय डर लगता था कि कहीं छिटककर अंग पर न आ पड़े।

यह मैं जानता हूँ कि पति ही स्त्री का देवता है-वही उसका इहलोक और परलोक है, किन्तु, इस मूर्तिमान नीचता के निकट अभया की कल्पना करते हुए मेरा शरीर और मन संकुचित हो उठा। अभया और चाहे जो हो फिर भी सुन्दर देह वाली सुरुचि सम्पन्न कुलीन महिला है, किन्तु, यह भैंसा बर्मा के किस घने जंगल में से एकाएक बाहर निकल आया है सो जिन ब्रह्मदेव ने इसे बनाया है वे ही बता सकते हैं।

बैठने का इशारा करके मैंने पूछा कि तुम्हारे विरुद्ध जो इलजाम लगाया गया है वह क्या सत्य है? इसके जवाब में वह दस मिनट तक अनर्गल बकता रहा। भावार्थ यह था कि मैं बिल्कुदल ही निर्दोष हूँ; और मेरे रहते प्रोम ऑफिस का साहब दोनों हाथों लूट नहीं कर सकता था, यही उसके क्रोध का कारण है। जिस तरह भी हो, मुझे अलग करके एक अपने ही आदमी को भरती कर लेने के लिए उसकी यह चाल है। मुझे उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ। मैंने कहा, “यह नौकरी चली जाय तो भी आपके समान होशियार व्यक्ति के लिए बर्मा में चिन्ता ही किस बात की है? रेलवे की नौकरी छूट जाने पर कितने-से दिन आपको खाली बैठना पड़ा था?”

वह मनुष्य पहले तो अकचकाया, फिर बोला, “आप कहते हैं सो बिल्कुतल झूठ नहीं है। किन्तु आप जानते हैं महाशय, फैमिली-मैन हूँ, बहुत-से बच्चे कच्चे...”

“आपने क्या किसी बर्मी स्त्री से विवाह कर लिया है?”

वह एकाएक बोल उठा, “साहब-साले ने रिपोर्ट में लिख दिया दिखता है। इसी से आपको उसकी नाराजगी मालूम हो सकती है!” यह कहकर वह मेरे मुँह की ओर ताककर और कुछ नरम होकर बोला, “आप क्या इस पर विश्वास करते हैं?”

मैंने गर्दन हिलाकर कहा, “इसमें बुराई ही क्या है?”

वह उत्साहित होकर बोला, “ठीक कहते हैं महाशय, मैं तो यह सबसे कहता हूँ कि जो करूँगा सो 'बोल्डली' स्वीकार करूँगा। मैं ऐसा नहीं हूँ कि अन्दर कुछ और बाहर कुछ। और फिर मैं ठहरा मर्द- आप जानते ही हैं। जो कहूँगा सो साफ-साफ कहूँगा महाशय, लुकाने-छुपाने की बात नहीं। और फिर देश में तो मेरा कहीं कोई है नहीं- और जब यहाँ ही रहकर चिरकाल तक नौकरी करके पेट भरना है तब- आप समझते ही हैं महाशय।' मैंने सिर हिलाकर बताया कि मैं सब समझता हूँ। फिर पूछा, “आपका देश में क्या कोई भी नहीं है?”

वह मनुष्य चेहरे पर जरा भी मैल लाए बगैर बोला, “जी नहीं, कहीं कोई नहीं है- काकस्य परिवेदना।' यदि कोई होता तो फिर मैं इस सूर्य मामा के देश में आ पाता! महाशय, आप विश्वास न करेंगे, मैं ऐसे-वैसे घर का लड़का नहीं हूँ, कभी हम लोग भी जमींदार थे! आज भी यदि आप देश के हमारे मकान को देखें तो आपकी ऑंखें चकरा जाँय। किन्तु, छोटी उम्र में ही सब मर-खप गये। मैंने कहा, जाने भी दो; घर-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद यह सब है किसके लिए? सब कुछ जात-बिरादरी वालों को बाँटकर मैं बर्मा चला आया।”

जरा स्थिर होकर पूछा, “आप अभया को जानते हैं?”

वह चौंक उठा। कुछ देर मौन रहकर बोला, “आपने उसे कैसे जाना?”

मैंने कहा, “ऐसा भी तो हो सकता है कि आपका पता लगाकर उसने अपने भरण-पोषण के लिए इस ऑफिस में दरख्वास्त दी हो?” वह कुछ अधिक प्रसन्न स्वर से बोला, “ओ:, यही कहिए न! सो मैं स्वीकार करताहूँ, एक समय वह मेरी स्त्री थी...”

“और अब?”

“कोई नहीं। मैं उसे त्यागकर चला आया हूँ।”

“उसका अपराध?”

वह मनुष्य चेहरे पर बनावटी दु:ख लाकर बोला, “आप जानते हैं महाशय, फैमिली सिक्रेट' कहना उचित नहीं। किन्तु, इस समय आप मेरे आत्मीयों की तरह हैं, इसलिए कहने में कुछ लज्जा नहीं है कि वह एक दुश्चरित्र औरत है। इसी मानसिक घृणा के कारण ही तो मुझे देश छोड़ना पड़ा। नहीं तो क्या कोई शौक से इस देश में कदम रख सकता है? आप ही कहिए न, कि यह क्या कोई ऐसी-वैसी घृणा की बात है।”

जवाब क्या दूँ? लाज के मारे मेरा मुँह नीचा हो गया। शुरू से ही मैंने इस घोर मिथ्यावादी की एक बात पर भी विश्वास नहीं किया था; किन्तु अब मुझे नि:सन्दिग्ध रूप से मालूम हो गया कि यह जितना नीच है उतना ही क्रूर भी है।

अभया के सम्बन्ध में मैं कुछ अधिक नहीं जानता हूँ, किन्तु फिर भी शपथ खाकर कह सकता हूँ कि जो अपवाद पति होकर इस पाखण्डी ने उसके सिर बिना किसी संकोच के लगा दिया, गैर होकर भी मैं उसे मुँह से नहीं निकाल सकता। कुछ देर बाद मुँह उठाकर मैंने कहा, “उसके इस अपराध की बात आपने आते समय तो उससे कही नहीं थी। और जब यहाँ आकर भी कुछ दिनों तक आप चिट्ठी पत्री और रुपया-पैसा भेजते रहे, तब भी पत्र के द्वारा उस पर यह बात प्रकट नहीं की।”

वह महापापी स्वच्छन्दता से अपने विराट स्थूल होठों को फाड़कर हँसता हुआ बोला, “यही तो बात है। आप जानते ही हैं महाशय, कि हम शरीफ आदमी हैं। हम लोग चुपचाप सब कुछ सहन कर लेते हैं, परन्तु हलके लोगों की तरह अपनी स्त्री के कलंक का नगाड़ा नहीं पीट सकते। खैर, ये सब दु:ख की बातें छोड़ दीजिए महाशय, ऐसी स्त्रियों का नाम मुँह पर लाने से भी पाप होता है। तो फिर, 'केस' तो आप ही 'डिस्पोज' (निर्णय) करेंगे न? मेरी जान बची, खैरियत हुई; किन्तु फिर भी कहे देता हूँ कि साहब बच्चू को यों ही न छोड़ दिया जाय। अच्छी तरह ऐसा सबक दिया जाय कि जिससे फिर कभी मेरे पीछे न लगें। वे भी समझ जाय कि मेरे भी मुरब्बी का कुछ जोर है। समझे न आप? अच्छा, मैं कहता हूँ क्या हरामजादे को हेड ऑफिस में नहीं खींचा जा सकता?”

मैंने कहा, “नहीं।”

उसने हँसी की छटा से फाइल को कुछ आगे सरकाते हुए कहा, “लीजिए, मजाक छोड़िए। क्या यह खबर लिये बगैर ही मैं आपके पास आया हूँ कि बड़े साहब बिल्कुेल आपकी मुट्ठी में है? खैर मरने दीजिए इसे, और भी एक दफे वह मेरे पीछे लगकर देख ले। अच्छा, क्या बड़े साहब का 'ऑर्डर' निकालकर आज ही मेरे हाथ नहीं दिया जा सकता? रात के नौ बजे ही मैं चला जाता, रात को कष्ट न उठाना पड़ता। क्या कहते हैं आप?”

मैं एकाएक जवाब न दे सका। क्योंकि, खुशामद चीज ही ऐसी है कि सारी दुरभिसन्धि जान-बूझकर भी क्षुण्ण करते श्लेश का अनुभव होता है। विरुद्ध बात मुँह पर लाते संकोच-सा होने लगा; किन्तु इस बाधा को मैंने नहीं माना। अपने आपको कठोर करके कह ही दिया, “बड़े साहब का हुक्म हाथ में कर लेने से आपको लाभ नहीं होगा। आप और कहीं नौकरी की तलाश कीजिए।”

एक मुहूर्त में ही वह जैसे काठ हो गया और कुछ देर बाद बोला, “इसके मानी?”

“इसके मानी यह कि आपको 'डिसमिस' करने का 'नोट', ही मैं दूँगा। मेरे द्वारा आपको किसी तरह सुविधा न होगी।”

वह उठकर खड़ा हो गया था- एकदम बैठ गया। उसकी दोनों ऑंखें छलछला आईं। हाथ जोड़कर बोला, “बंगाली होकर बंगाली को मत मारिए बाबू, मैं बच्चों कच्चों वाला आदमी मर जाऊँगा।”

“यह देखने का भार मेरे ऊपर नहीं है। इसके सिवाय, मैं आपको जानता नहीं, आपके साहब के विरुद्ध भी मैं नहीं जा सकता।”

उसने एक नजर मेरे मुँह पर डालकर शायद समझ लिया कि मैं दिल्लगी नहीं कर रहा हूँ। और कुछ देर वह चुपचाप बैठा रहा। इसके बाद ही अकस्मात् वह जोर से रो पड़ा। क्लर्क, दरबान, पियून जो जहाँ थे सब इस अचिन्तनीय घटना से दंग हो गये। मैं भी मानो लज्जित-सा हो गया। उसे रोकने के इरादे से मैंने कहा, “अभया आपके लिए बर्मा आई है, अवश्य ही दुश्चरित्रा स्त्री को ग्रहण करने के लिए मैं नहीं कहता। किन्तु, आपकी सब बातें सुनकर भी यदि वह माफ कर सके-आप उसके पास से चिट्ठी ला सकें तो आपकी नौकरी बजा रखने की मैं कोशिश कर देखूँगा। नहीं तो दुबारा मिलकर मुझे लज्जित न करना- मैं मिथ्या बात नहीं कहता।”

मैं जानता था कि ये नीच प्रकृति के लोग अत्यन्त डरपोक होते हैं, उसने ऑंखें पोंछकर कहा, “वह कहाँ पर है?”

“कल इसी समय आओगे तो उसका ठिकाना बता दूँगा।”

वह और कुछ न कहकर लम्बी सलाम करके चला गया।

संध्याि के समय अभया मेरे मुँह से चुपचाप नीचा मुँह किये सारा हाल सुनती रही। उसने ऑंचल से केवल अपनी ऑंखें पोंछ डाली- कुछ कहा नहीं। मेरे क्रोध का भी उसने कुछ जवाब नहीं दिया। बहुत देर बाद मैंने ही पूछा, “आप उसे माफ कर सकेंगी?”

अभया ने केवल गर्दन हिलाकर अपनी सम्मति जाहिर की।

“तुम्हें वह अपने साथ ले जाना चाहे, तो जाओगी?”

उसने उसी तरह सिर हिलाकर जवाब दिया।

“बर्मा की स्त्रियों का स्वभाव कैसा होता है, सो तो तुमने पहले ही दिन खूब जान लिया है, फिर भी वहाँ जाने का तुम्हारा साहस होगा?”

इस दफे अभया ने अपना मुँह ऊपर उठाया, मैंने देखा कि उसकी दोनों ऑंखों से ऑंसुओं की धारा बह रही है। उसने कुछ कहने की कोशिश की परन्तु कह न सकी। इसके बाद बार-बार ऑंचल से अपनी ऑंखों को पोंछती हुई रुद्ध कण्ठ से बोली, “नहीं जाऊँ तो मेरे लिए और उपाय ही क्या है, बताइए?”

उसकी बात सुनकर मैं यह न सोच सका कि मैं खुश होऊँ या ऑंखों से नीर बहाऊँ; किन्तु मुझसे कुछ उत्तर देते नहीं बन पड़ा।

उस दिन और कोई बात नहीं हुई। डेरे को लौटते हुए रास्ते-भर यही एक बात मैं बार-बार अपने आपसे पूछता रहा, किन्तु, इस प्रश्न का किसी ओर से कोई भी उत्तर नहीं मिल सका। केवल हृदय के भीतर का 'वह' न जाने किस पर एक ओर जिस तरह निष्फल क्रोध से जल-जल उठने लगा, उसी तरह दूसरी ओर एक निराश्रया रमणी के उससे भी अधिक निरुपाय प्रश्न से व्यथित और भाराकान्त हो उठा। दूसरे दिन, अभया का ठिकाना पूछने के लिए जब वह मनुष्य सामने आकर खड़ा हो गया तब, मारे घृणा के, मैं उसकी ओर देख भी नहीं सका। मेरे मन का भाव समझकर आज वह अधिक बात किये बगैर ही केवल ठिकाना लेकर नम्रता के साथ चला गया, किन्तु, उसके बाद के दिन जब वह मिलने आया तब उसकी ऑं:खों और मुँह का भाव पूरी तरह बदल गया था। प्रणाम करके उसने अभया के हाथ की एक सतर लिखी हुई मेरी टेबल पर रख दी और कहा, आपने मेरा जो उपकार किया है उसे मुँह से क्या कहूँ- जितने दिन जीऊँगा आपका गुलाम होकर रहूँगा।”

अभया की लिखी पंक्ति पर दृष्टि जमाए हुए ही मैंने कहा, “जाइए, आप अपना काम कीजिए, बड़े साहब ने इस बार माफ कर दिया है।”

उसने हँसकर कहा, “बड़े साहब की चिन्ता मैं नहीं करता, केवल आप क्षमा कर दें तो मैं जी जाऊँ। आपके श्रीचरणों में मैंने बहुत से अपराध किये हैं।” इतना कहकर उसने फिर बकना शुरू कर दिया, उसी किस्म की वैसी ही कोरी मिथ्या खुशामद की बातें। और बीच-बीच में वह रूमाल से ऑंखें भी पोंछने लगा। इतनी बातें सुनने का धीरज और किसी को नहीं हो सकता, इसलिए यह दण्ड मैं आपको नहीं दूँगा। मैं केवल उसका विस्तृत वक्तव्य संक्षेप में कहे देता हूँ। वह यह है कि उसने अपनी स्त्री के ऊपर जो अपवाद लगाया था सो बिल्कुरल ही झूठ है। उसने लज्जा के फेर में पड़कर ही वैसा किया था, नहीं तो ऐसी सती लक्ष्मी क्या कहीं और है! और मन ही मन चिरकाल से वह अभया को प्राणों से भी अधिक चाहता रहा है। तब, यहाँ जो एक और उपसर्ग आ जुटा है उसे जुटाने की उसकी जरा भी इच्छा नहीं थी, केवल बर्मियों के हाथ से अपने प्राण बचाने के लिए ही उसने यह किया है। (कुछ सत्य हो भी सकता है।) किन्तु, आज रात को जब वह अपने घर की लक्ष्मी को ले जा रहा है तब उस बर्मी- बच्ची को दूर करते कितनी देर लगती है? रहे लड़के-बच्चे-ओहो! सालों की जैसी सूरत है वैसा ही स्वभाव है- हैं वे किस काम के? बुढ़ापे में न तो उनसे खाने-पहिनने को ही मिलेगा और न मरने पर एक चुल्लू पानी की ही उनसे आशा है! जाते ही सबको एक साथ झाड़ू मारकर बिदा कर देगा तब उसका नाम- इत्यादि-इत्यादि।

मैंने पूछा, “अभया को क्या आज ही रात को ले जाँयगे आप?” वह विस्मय से अवाक् होकर बोला, “खूब! जितने दिन ऑंखों नहीं देखा था उतने दिन खैर किसी तरह रहा आया; किन्तु, ऑंखों देखकर फिर क्या उसे ऑंखों की ओट कर सकता हूँ? अकेली, इतनी दूर, इतना कष्ट उठाकर, केवल मेरे लिए ही तो आई है! एक दफे सोच तो देखिए जरा इस बात को!”

मैंने पूछा, “क्या उसे एक साथ ही घर में रक्खेंगे?”

“जी नहीं, इस समय तो प्रोम के पोस्ट मास्टर महाशय के यहाँ ही रखूँगा। उनकी स्त्री के साथ मजे में रहेगी। किन्तु, दो-एक दिन में ही- अधिक नहीं- उसके लिए मकान का प्रबन्ध करूँगा और फिर घर की लक्ष्मी को घर ले आऊँगा।”

अभया के स्वामी ने प्रस्थान किया। मैंने भी दैनिक कार्य में मन लगाने के लिए सामने की फाइल को खींच लिया।

उसके नीचे अभया की उस लिखावट पर फिर मेरी नजर जा पड़ी। इसके बाद कितनी दफे उन दो सतरों को मैंने पढ़ा और न जाने कितनी दफे और पढ़ता सो कह नहीं सकता। इतने में ही 'पियून' ने कहा, “बाबूजी, आपके घर क्या कुछ कागज-पत्र पहुँचाने होंगे?” चौंककर मैंने सिर उठाया तो देखा, उस समय सामने की घड़ी में साढ़े चार बज गये हैं, और क्लर्क लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अपने घर चले गये हैं।


♦♦ • ♦♦

अब मुझे अभया के पति का एक पत्र मिला। पहले के ही समान कृतज्ञता सारी चिट्ठी में बिखेर देकर इस बात का बड़े ही अदब और विस्तार के साथ निवेदन करके कि इस समय वह कैसे संकट में पड़ा है, उसने मुझसे उपदेश चाहा है। बात संक्षेप में यह थी कि उसने अपनी शक्ति से अधिक खर्च करके भी एक बड़ा मकान किराये पर ले लिया है; और उसमें एक ओर अपने बर्मी स्त्री-पुत्रादि को रखकर दूसरी ओर अभया को लाकर रखने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु किसी तरह भी उसे सम्मत नहीं कर पाता है। सहधर्मिणी की इस तरह की हठ से वह अतिशय मर्म-पीड़ा अनुभव कर रहा है। यह केवल 'कलि-काल' का फल है, 'सतजुग' में ऐसा नहीं हो सकता था- बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तक भी। अनेक दृष्टान्तों समेत उनका बार-बार उल्लेख करके उसने लिखा है कि हाय! कहाँ है वे आर्यललनाएँ? वे सीता-सावित्री कहाँ गईं? जो आर्य-नारियाँ पति की चरण-युगलों को हृदय में धारण करके हँसती-हँसती चिता में प्राण विसर्जन कर देती थीं और पति सहित अक्षय स्वर्ग-लाभ करती थीं वे अब कहाँ है? जो हिन्दू महिला हँसते हुए चेहरे से अपने कुष्ठग्रसित पति-देवता को कन्धों पर लादकर वेश्या के घर तक पहुँचा आई थीं, कहाँ है उस जैसी पतिव्रता रमणी? कहाँ है वह पति-भक्ति? हाय भारतवर्ष! क्या एकदम ही तेरा अध:पतन हो गया। वह सब क्या अब हम लोग एक दफे भी अपनी ऑंखों न देखेंगे। और क्या हम लोग-इत्यादि इत्यादि, करीब दो पन्ने विलाप से भर दिए हैं। किन्तु अभया पति-देवता को यहाँ तक ही मानसिक कष्ट देकर शान्त नहीं हुई। और भी सुनिए। उसने लिखा है कि इतना ही नहीं कि उसकी अध्र्दांगिनी अब भी दूसरे के घर में रह रही है, बल्कि उसे आज अपने परम मित्र पोस्ट मास्टर से मालूम हुआ कि रोहिणी नामक किसी व्यक्ति ने उसकी स्त्री को पत्र लिखा है और कुछ पैसे भेजे हैं। इससे इस हतभागे की इज्जत को कितना धक्का लगा है सो लिखकर बताया नहीं जा सकता।

चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते मैं अपनी हँसी न रोक सका। फिर भी रोहिणी के व्यवहार पर भी कुछ कम क्रोध नहीं आया। अब उसे चिट्ठी लिखने और रुपये भेजने की जरूरत ही क्या थी? जिसने पति के घर को प्राप्त करने के लिए इतना कष्ट सहन करना स्वीकार किया, उसके चित्त को, जान-बूझकर या बिना जाने-बूझे, उचाट करने की जरूरत ही क्या थी? और अभया ने भी इस तरह का व्यवहार किसलिए शुरू किया? वह क्या चाहती है? उसके पति ने जिसे स्त्री की तरह ग्रहण किया है, लड़के-बच्चे पैदा किये हैं- उन सबको त्याग कर क्या केवल उसी को लेकर वह गृहस्थी चलावे? क्यों, बर्मी स्त्रियाँ क्या स्त्रियाँ नहीं हैं? उन्हें क्या सुख-दु:ख, मान-अपमान का बोध नहीं है? न्याय-अन्याय का कानून क्या उनके लिए ताक पर रख देना चाहिए? और यदि ऐसा ही है तो वहाँ उसे जाने की जरूरत ही क्या थी? सब झंझट यहाँ से ही स्पष्ट करके निबटा देने से ही तो हो जाता।

तब तक मैं रोहिणी से मिलने नहीं गया था। वह झूठमूठ ही क्लेश पा रहा है, यह मन ही मन समझकर ही शायद मेरी उस तरफ पैर बढ़ाने की प्रवृत्ति नहीं हुई थी। आज छुट्टी होने के पहले ही गाड़ी बुलाने के लिए आदमी भेजकर मैं उठने की तैयारी कर रहा था कि उसी समय अभया का पत्र आ पड़ा। खोलकर देखा कि सारा पत्र आदि से अन्त तक रोहिणी के ही सम्बन्ध की बातों से भरा हुआ है। मैं सदा ही उसके ऊपर नजर रक्खूँ- वह कितना दुर्बल, कितना अपटु, कितना असहाय है- यही एक बात पंक्ति-पंक्ति अक्षर-अक्षर में से ऐसी मर्मान्तिक व्यथा के साथ फूटी पड़ती थी कि कोई अत्यन्त सरल-चित्त मनुष्य भी इस आवेदन के तात्पर्य को समझने में भूल करेगा, ऐसा नहीं जान पड़ा। अपने सुख-दुख की बात उसमें प्राय: कुछ भी नहीं थी! फिर पत्र के अन्त में उसने बताया था कि अनेक कारणों से अब भी वह उसी जगह रह रही है जहाँ कि पहले पहल आकर ठहरी थी।

पति सती स्त्री का एकमात्र देवता हो सकता है कि नहीं, इस विषय में अपना मतामत छापे के अक्षरों में प्रकट करने का दु:साहस मुझमें नहीं है और न मुझे इसकी कोई जरूरत ही दिखती है। किन्तु सर्वांगीण सती-धर्म की एक अपूर्वता-दु:सह-दु:ख और सर्वथा अन्याय के बीच में भी उसकी आकाशभेदी विराट महिमा जो मेरी अन्नदा जीजी की स्मृति के साथ चिरकाल के लिए मन की गहराई में खुदकर अंकित हो गयी है, जिसका असह्य सौन्दर्य ऑंखों से देखे बिना अवधारण भी नहीं किया जा सकता, और जिसने एक ही साथ नारी को अति क्षुद्र और अति बृहत् बना दिया है- मेरी वह अव्यक्त उपलब्धि, आज अभया की इस चिट्ठी से आन्दोलित हो उठी।

जानता हूँ कि सब अन्नदा जीजी नहीं है- उस कल्पनातीत निष्ठुरता को छाती फैलाकर धीरज से ग्रहण करने जैसी बड़ी छाती भी सब स्त्रियों की नहीं होती; और जो नहीं है उसके लिए रोज शोक करना ग्रन्थकार मात्र का एकान्त कर्तव्य है या नहीं, सो मैंने विचार कर स्थिर नहीं कर रक्खा है, किन्तु फिर भी सारा चित्त वेदना से भर गया। गुस्से में भरा हुआ मैं गाड़ी पर जा बैठा और उस निकम्मे पर स्त्री-आसक्त रोहिणी को जो कड़ी-कड़ी बातें अच्छी तरह सुनाने जा रहा था उन्हें मन ही मन दुहराता हुआ उसके घर की ओर रवाना हो गया। गाड़ी से उतरकर, किवाड़ खोलकर जब मैंने उसके मकान में प्रवेश किया तब दिया-बत्ती की बेला हो गयी थी, अर्थात् दिन का प्रकाश खत्म होकर रात का अंधेरा अभी-अभी उतर रहा था।

वह भर भादों भी नहीं था और न उस समय भरे बादल ही थे; किन्तु, शून्य घर-बार की भी यदि कोई सूरत-शक्ल होती है तो उस दिन उस प्रकाश और अन्धकार के बीच जो मेरी नजर में पड़ी, उसे छोड़कर और क्या हो सकती है, सो तो मैं आज भी नहीं जानता। घर के सभी दरवाजे भाँय-भाँय कर रहे थे, केवल रसोईघर की एक खिड़की में से धुऑं निकल रहा था। दाहिनी तरफ कुछ आगे बढ़कर झाँककर देखा कि चूल्हा जलकर प्राय: बुझ रहा है और पास में ही जमीन पर रोहिणी बाबू हँसिये से एक बैंगन के दो टुकड़े करके गुमसुम बैठे हुए हैं। मेरे पैरों की आहट उनके कानों तक नहीं गयी, क्योंकि कर्णेन्द्रिय का जो मालिक था वह उस समय और चाहे जहाँ हो किन्तु बैंगन के ऊपर एकाग्र नहीं था, यह मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ। किन्तु चुपचाप लौटकर जब उन दो कमरों के बीच आ खड़ा हुआ तब मुझे साफ-साफ दिखाई दिया कि एक उत्कट वेदना से भरा हुआ रोदन सारे घर को भरकर दँतौरी बाँधे हुए अडिग रूप से वहाँ स्थिर हो रहा है और वह सम्पूर्ण समाज धर्माधर्म और समस्त पाप-पुण्य से भी परे की, अतीत की, वस्तु है।

बाहर आकर मैं बरामदे में एक मोढ़े पर बैठ गया। कितनी ही देर बाद, शायद, दीपक जलाने के लिए रोहिणी बाबू बाहर आए और भयभीत हो उन्होंने पूछा, “कौन है?”

मैंने आवाज देकर कहा, “मैं हूँ श्रीकान्त।”

“श्रीकान्त बाबू? ओह...” इतना कहकर वह तेज चाल से नजदीक आए, भीतर जाकर उन्होंने दीया-बत्ती की और फिर मुझे भीतर ले जाकर बिठाया। इसके बाद किसी के भी मुँह से कोई बात न निकली- दोनों ही चुपचाप बैठे रहे। सबसे पहले मैंने ही मुँह खोला। कहा, “रोहिणी भइया, यहाँ अब क्यों रहते हो? चलो मेरे साथ।”

रोहिणी ने पूछा, “क्यों?”

मैंने कहा, “यहाँ आपको कष्ट होता है इसलिए।”

रोहिणी कुछ देर ठहरकर बोला, “कष्ट अब मुझे क्या है!”

ठीक है! किन्तु, ऐसी अवस्था में तो आलोचना की नहीं जा सकती मैं उसका किस प्रकार तिरस्कार करूँगा, क्या सत्परामर्श दूँगा आदि सब सोचता-सोचता घर से चला था, किन्तु, यहाँ वे सब विचार बह गये। नीतिशास्त्र की पोथी इतनी अधिक नहीं पढ़ी थी कि इतने बड़े प्रेम का अपमान कर सकूँ। कहाँ गया मेरा क्रोध, कहाँ गया मेरा विद्वेष! समस्त साधु-संकल्प अपना सिर नीचा करके कहाँ छिप रहे, पता भी न चला।

रोहिणी बोला कि उसने वह प्राइवेट टयूशन छोड़ दी है क्योंकि उससे तन्दुरुस्ती बिगड़ती है। उसका दफ्तर भी अच्छा नहीं है, बड़ी कड़ी मेहनत पड़ती है। नहीं तो अब कष्ट क्या है।

मैं चुप हो रहा। क्योंकि इसी रोहिणी के मुँह से कुछ दिन पहिले इससे ठीक उलटी बात सुनी थी। वह कुछ देर चुप रहकर फिर कहने लगा, “ऑफिस से थके-माँदे लौटने पर यह राँधना-रूँधना तो बड़ी झुँझलाहट पैदा करता है, क्यों न श्रीकान्त बाबू?”

मैं और क्या कहता? आग बुझ जाने पर केवल जल से ही तो इंजन चलता नहीं, यह तो जानी हुई बात है।

फिर भी, वह यह स्थान छोड़कर दूसरी जगह जाने को राजी नहीं हुआ। कल्पना की तो कोई सीमा निर्दिष्ट कर नहीं सकता, इसलिए उस बात को नहीं छोड़ता, किन्तु, किसी असम्भव आशा ने उसके मन के भीतर भी किसी तरह आश्रय नहीं पाया था सो मैं उसकी कुछ बातों से ही जान गया था। फिर भी क्यों वह इस दु:ख के आगार को छोड़ना नहीं चाहता, यह अवश्य ही मैं नहीं सोच सका। किन्तु, उसके अन्तर्यामी के अगोचर नहीं था कि जिस हतभागी के घर का रास्ता रुद्ध हो गया है, उसे इस शून्य घर की पूँजीभूत वेदना यदि खड़ा न रख सके तो उसे मिट्टी में मिलने से रोकना इस दुनिया में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है।

अपने डेरे पर पहुँचते-पहुँचते कुछ रात हो गयी। घर में घुसकर देखा कि एक कोने में बिस्तर लगाकर एक आदमी सिर से पैर तक कपड़ा ओढ़े सो रहा है। नौकरानी से पूछने पर उसने कहा, “शरीफ आदमी हैं।”

“इसलिए मेरे कमरे में!”

भोजनादि के उपरान्त उन महाशय से बातचीत हुई। उनका मकान चटगाँव जिले में है। करीब चार वर्ष के बाद उनके लापता छोटे भाई का पता मिला है और उसे वापिस घर ले जाने के लिए वे आए हैं। वे बोले, “महाशय, कहानियों में सुना था कि पुराने समय में कामरूप की स्त्रियाँ विदेशी पुरुषों को- भेड़ बनाकर बाँध रखती थीं। न जाने उस समय वे क्या करती होंगी; किन्तु इस जमाने में बर्मा की स्त्रियों की क्षमता उनसे तिल-भर भी कम नहीं है, सो मैं नस नस से अनुभव कर रहा हूँ।”

और भी बहुत-सी बातें करने के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई के उद्धार करने के लिए मेरी सहायता की भिक्षा माँगी। मैंने बचन दिया कि उनके इस साधु उद्देश्य को सफल करने में मैं कमर बाँधकर लग जाऊँगा। क्यों, सो कहने की जरूरत नहीं है। दूसरे दिन सुबह ढूँढ़-खोज करके उनके छोटे भाई की बर्मी ससुराल में जा पहुँचा। बड़े भाई आड़ में रास्ते के ऊपर चहल कदमी करने लगे।

छोटे भाई उपस्थित नहीं थे, साइकिल लेकर सुबह घूमने के लिए बाहर गये थे। मकान में सास-ससुर नहीं थे, केवल स्त्री अपनी एक छोटी बहिन को लेकर एक-दो दासियों सहित वहाँ रहती है। इन लोगों की जीविका बर्मा-चुरुट बनाना था। उस समय सब इसी काम में लगे हुए थे। मुझे बंगाली देखकर और सम्भवत: अपने पति का मित्र समझकर, उन्होंने मेरा आदर के साथ स्वागत किया। बर्मी स्त्रियाँ अत्यन्त परिश्रमी होती हैं, परन्तु पुरुष बहुत ही आलसी होते हैं। वहाँ घर के छोटे-मोटे काम-काज से लेकर व्यवसाय वाणिज्य तक सब कुछ प्राय: स्त्रियों के हाथ में है। इसलिए, लिखना-पढ़ना सीखे बिना उनका काम नहीं चलता, परन्तु पुरुषों की बात अलहदा है। पढ़ना-लिखना सीखा हो तो भला, न सीखा हो तो लज्जा के मारे मरना नहीं होता। निष्कर्मा पुरुष स्त्री का उपार्जित अन्न नष्ट करके बाहर उसी पैसे से बाबूगीरी करता फिरता है और उससे लोगों को कोई अचरज नहीं होता। स्त्रियों भी छि:-छि:, मिनमिन, पिनपिन करके उसकी नाकोंदम कर देना आवश्यक नहीं समझतीं। बल्कि, यही किसी परिणाम में उनके समाज को स्वाभाविक आचार में शामिल हो गया है।

दस-पन्द्रह मिनट के बीच ही बाबू साहब 'द्वि-वक्र-यान' में लौट आए। सारी देह पर अंगरेजी पोशाक, हाथ में दो-तीन अंगूठियाँ, घड़ी, चैन आदि। काम-काज कुछ भी नहीं करना पड़ता, फिर भी देखा, हालत खूब अच्छी है। उनकी बर्मी पत्नी अपने हाथ का काम छोड़कर उठ खड़ी हुई और उनके हाथ से टोपी तथा छड़ी लेकर उसने रख दी। छोटी बहिन ने चुरुट दियासलाई आदि ला दिये, एक दासी ने चाय का सरंजाम और दूसरी ने पान का डब्बा ला दिया। वाह, इस मनुष्य को तो सबने मिलकर एकदम राजा की तरह रख छोड़ा है! नाम मैं भूल गया हूँ। शायद चारु-वारु ऐसा ही कुछ होगा। जाने दो, हम लोग न होगा तो केवल 'बाबू' कहकर पुकार लेंगे।

बाबू ने प्रश्न किया कि आप कौन हैं? मैंने कहा, मैं आपके भाई का मित्र हूँ। उन्होंने विश्वास नहीं किया। बोले, “आप तो कलकतिया हैं; मेरे भाई तो कभी वहाँ गये भी नहीं, मित्रता किस तरह हुई?”

किस तरह मित्रता हुई, कहाँ हुई, इस समय वे कहाँ हैं, इत्यादि संक्षेप से वर्णन करके उनके आने का उद्देश्य भी मैंने बता दिया और यह भी निवेदन कर दिया कि वे अपने भ्रातृ-रत्न के दर्शनों की अभिलाषा से उत्कण्ठित हैं।

दूसरे दिन सुबह ही हमारी होटल में बाबू की चरण-धूलि आ पड़ी और दोनों भाइयों की बड़ी देर की बातचीत के बाद उन्होंने बिदा ग्रहण की। तब से दोनों भाइयों का कुछ ऐसा हेल-मेल हों गया, कि-सुबह नहीं, संध्याट, नहीं-बाबू साहब 'भइया, भइया' कहकर पुकारते हुए लगे जब तब आ उपस्थित होने और फुसफुस खुसखुस सलाह-संलाप करने और खाने-पीने की तो कोई सीमा ही नहीं रही। एक दिन संध्यास को वे अपने भइया को और मुझे भी चाय-बिस्कुट का निमन्त्रण दे गये।

उसी दिन उनकी बर्मी स्त्री से मेरी अच्छी तरह बातचीत हुई। वह अतिशय सरल, विनयी और भली है। प्यार करके स्वेच्छा से ही उसने विवाह किया है और तब से शायद एक दिन के लिए भी इन्हें कोई दु:ख नहीं दिया। कोई चार-पाँच दिन बाद बड़े भइया ने मुसकराते हुए कान में कहा, कि परसों सवेरे के जहाज से हम लोग घर जा रहे हैं। सुनकर मुझे कुछ डर-सा लगा; पूछा, “आपके भाई यहाँ फिर लौटकर तो आयँगे?

बड़े भइया बोले, “अब? राम-राम करके किसी तरह एक दफे जहाज पर चढ़ तो पावें!”

मैंने पूछा, “यह स्त्री को जता दिया है?”

बड़े भइया बोले, “बाप रे! तब क्या हम बच सकेंगे? साली जो जहाँ होंगी रक्त-बीज की तरह आकर घेर लेंगी।” यह कहकर और फिर दोनों ऑंखें मिचकाकर हँसते हुए बोले, “फ्रेंच लीव्ह महाशय, फ्रेच लीव्ह- आप समझे या नहीं?”

मुझे अत्यन्त क्लेश मालूम हुआ, बोला “ऐसा हुआ तब तो स्त्री को अत्यन्त कष्ट होगा।”

मेरी बात सुनकर बड़े भइया तो हँसी से लोट-पोट हो गये। किसी तरह हँसना बन्द करके बोले, “वाह, आपने भी खूब कहा! इन बर्मी औरतों को कष्ट? इन सालियों की जात के लोग खाकर कुल्ला तक नहीं करते, न इनके यहाँ जूठे-मीठे का विचार है, और न जात-पाँत का। साली सब नेप्पी (एक तरह की सड़ाई हुई मछलियाँ) खाती हैं महाशय, जिसकी दुर्गन्ध के मारे भूतनी-पिशाचियाँ तक भाग जावें। इन सालियों को और कष्ट! एक चला जायेगा तो दूसरे को पकड़ लेंगी-छोटी जात की हैं सालीं-

“ठहरिए महाशय, ठहरिए। आपके भाई को उसने जो इन चार वर्षों तक राजा की तरह खिलाया-पिलाया है, और कुछ न हो, इसके लिए भी तो उसका कुछ कृतज्ञ होना चाहिए।”

बड़े भाई का मुँह गम्भीर हो गया। वे कुछ देर चुप रहकर बोले, “आपने तो मुझे अवाक् कर दिया महाशय। मर्द-बच्चे हैं, विदेश की धारती पर आकर यदि उम्र के दोष से कुछ शौक कर ही डाला तो क्या हुआ? और फिर कौन है जो ऐसा नहीं करता, कहिए न? मुझसे तो कुछ छुपा है नहीं- इसका कुछ खुल पड़ा है- सब लोग जान गये हैं, बस-सो इसीलिए क्या चिरकाल तक इसे इसी तरह फिरते रहना होगा? भला बनकर, गृहस्थ-धर्म चलाकर, फिर से पाँच पंचों में अपना स्थान ग्रहण न करना होगा? महाशय, यह तो कुछ बात ही नहीं है, कच्ची उम्र में तो कितने ही लोग होटल में जाकर मुर्गी तक खा आते हैं। किन्तु उम्र पकने पर क्या ऐसा करते हैं? आप ही विचार कीजिए न, मैं कहता हूँ सो सच है कि झूठ?”

वास्तव में यह विचार करने जैसी बुद्धि भगवान ने मुझे नहीं दी, इसलिए मैं चुप रह गया और ऑफिस का समय हो रहा था इसलिए, नहा-खाकर चल दिया।

किन्तु, ऑफिस से लौटते ही वे फिर एकाएक बोल उठे, “मैंने सोच देखा, आपकी सलाह ही ठीक है महाशय! इस जात का कुछ भरोसा नहीं, क्या जाने जाते-जाते अन्त में क्या फसाद खड़ा कर दे। कहकर जाना ही ठीक है। साली जो न करें सो थोड़ा। न लाज है न शरम, और न कुछ धर्म का ज्ञान। इन्हें यदि जानवर कहा जाय तो भी कुछ बेजा नहीं है।”

मैंने कहा, “हाँ, यही ठीक है।”

किन्तु, उसकी बात पर मैं विश्वास न ला सका। मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि इसके भीतर कोई षडयन्त्र है। किन्तु, वह इतना नीच, इतना निष्ठुर होगा-ऑंखों से देखे बगैर कोई उसकी कल्पना भी कर सकेगा, यह मैं नहीं सोच सका।

चटगाँव का जहाज रविवार को जाता है। ऑफिस बन्द था। सुबह के समय और करता ही क्या; उन्हें 'सी ऑफ' (=बिदा) करने के लिए जहाज-घाट पर जा पहुँचा। जहाज उस समय जेटी से लगा हुआ था। जाने वाले दोनों श्रेणियों के लोगों की दौड़-धूप, चीख-पुकार में कोई किसी की बात नहीं सुन सकता था।

यहाँ वहाँ देखते ही उस बर्मी स्त्री पर नजर पड़ गयी। एक किनारे वह अपनी छोटी बहिन का हाथ पकड़े खड़ी है। सारी रात रोते रहने के कारण उसकी दोनों ऑंखें ठीक जबा के फूलों की तरह हो रही हैं। छोटे बाबू बहुत ही व्यस्त हैं। वे अपनी दो चक्रों की गाड़ी (साइकिल), ट्रंक, बिस्तर तथा और भी न जाने क्या-क्या लिये कुलियों के साथ दौड़-धूप कर रहे हैं-उन्हें क्षण-भर का भी अवसर नहीं है।

धीरे-धीरे सारी चीजें जहाज पर चढ़ गयीं, यात्री लोग भी सब ठेल-ठालकर ऊपर चढ़ गये। जो यात्री नहीं थे वे नीचे उतर आए, सामने की ओर से लंगर उठने लगा। इसी समय छोटे बाबू अपने सामान को हिफाजत से रखकर और जगह ठीक करके अपनी बर्मी-स्त्री से बिदा लेने के छल से संसार के निष्ठुरतम अंक का अभिनय करने के लिए जहाज पर से नीचे उतरे। द्वितीय दर्जे के यात्री थे, इसलिए उन्हें यह अधिकार प्राप्त था।

मैंने अनेक दफे सोचा है कि इसकी भला क्या जरूरत थी? मनुष्य जबर्दस्ती अपनी मानव-आत्मा को इस तरह क्यों अपमानित करता है? मन्त्रदीक्षित पत्नी न हुई तो क्या हुआ, किन्तु वह स्त्री तो है! वह कन्या भगिनी जननी की जाति की तो है। उसी के आश्रय से वह इतने सुदीर्घ समय तक पति के समस्त अधिकारों का उपयोग करता हुआ वहीं रहा है। उसने तो अपने विश्वस्त हृदय की सारी मधुरता, सारा अमृत, सम्पूर्ण शरीर और मन उस पर समर्पित कर दिया है। फिर किस लोभ से वह इन अगणित लोगों की ऑंखों में उसे इतने बड़ें निर्दय परिहास और तमाशे की चीज बनाकर चलता बना। वह एक हाथ से रूमाल के द्वारा अपनी दोनों ऑंखें ढंके हुए है और दूसरा हाथ अपनी बर्मी स्त्री के गले में डाले हुए रोने के स्वर में बहुत कुछ कह रहा है। स्त्री ऑंचल में मुँह छिपाये रो रही है।

¹ यह बंगला मुहाविरा है, अर्थ-अंगूठा दिखाकर।

आसपास बहुत से बंगाली खड़े हैं। उनमें से कुछ मुँह फिराकर हँस रहे हैं, और कुछ मुँह में कपड़ा देकर हँसी रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मैं कुछ दूरी पर था, इसलिए पहले कुछ समझ न सका, किन्तु नजदीक आते ही सब बातें साफ-साफ सुन पड़ने लगीं। वह रोने के स्वर में बर्मी और देहाती बंगाली मिलाकर विलाप कर रहा है। यदि बंगाली में कुछ मार्जित करके लिखा जाय तो उस विलाप का यह रूप हो- “एक महीने बाद रंगपुर से तमाखू खरीद कर कैसे आ जाऊँगा, यह मैं ही जानता हूँ! जो री मेरी रत्नमणि! तुझे केला दिखाकर चला रे, ¹ केला दिखाकर चला!”

वह यह सब केवल हमारे समान कुछ अपरिचित बंगाली दर्शकों के हँसाने के लिए ही कह रहा था। पर, उसकी स्त्री बंगला नहीं समझती है, केवल रोने की आवाज से ही उस बेचारी की छाती फट रही है और किसी तरह वह हाथ उठाकर उसकी ऑंखें पोंछकर सांत्वना देने की चेष्टा कर रही है।

वह आदमी जोर-जोर से बिसूर-बिसूर कर रोता हुआ कहने लगा, “बड़ी मुश्किल से तूने पाँच सौ रुपये तमाखू खरीदने को दिए हैं- अब कुछ तेरे पास नहीं है-पेट तो भरा ही नहीं- इसी तरह यदि तेरा मकान भी बेच-बाचकर भले घर के लड़के की तरह घर जा सकता, तो समझता कि हाँ एक दाँव मारा! हाय, यह सब कुछ नहीं हुआ रे। कुछ नहीं हुआ!

आसपास के लोग हँसी को रोक रखने के कारण फूल-फूल उठने लगे; किन्तु जिसको लेकर इतनी हँसाई हो रही थी उसकी ऑंखें और कान दु:ख के ऑंसुओं से एकदम आच्छादित हो रहे थे। ऐसा जान पड़ने लगा कि कहीं वेदना के मारे मर न जाय!

खलासियों ने ऊपर से पुकार कर कहा, “बाबू, सीढ़ी उठाई जा रही है।”

वह आदमी गला छोड़कर सीढ़ी तक गया और फिर लौट आया। स्त्री के हाथ में एक पुराने समय के अच्छे नगवाली अंगूठी थी। इसी पर हाथ रखकर रोता हुआ बोला, “अरी, दे दे री, यह अंगूठी ही ले जाऊँ। इसके कम से कम दो-ढाई सौ रुपये दाम तो होंगे ही- इन्हीं को क्यों छोड़ूँ?”

स्त्री ने उसे चटपट खोलकर अपने प्रियतम की अंगुली में पहिना दिया। “जो मिला वही लाभ है।” कहकर वह आदमी रोता-रोता ही सीढ़ी पर चढ़ गया। जहाज जेटी छेड़कर धीरे-धीरे दूर सरकता जाने लगा और स्त्री मुख पर ऑंचल डालकर घुटने टेककर वहीं बैठ गयी। बहुत से लोग दाँत काढ़कर हँसते-हँसते चले गये। किसी ने कहा, “बाह रे लड़के!” किसी ने कहा, “बाह रे बहादुर छोकरे!' बहुत-से लोग यह कहते-कहते चले गये, 'कैसा तमाशा किया! हँसते-हँसते पेट दुखने लगा!' ऐसे-ऐसे न जाने कितने मन्तव्य प्रकट किये गये। केवल मैं ही अकेला सबके हँसी-तमाशे की चीज उस भोली स्त्री के अपरिसीम दु:ख का साक्षी बनकर गुमसुम खड़ा रह गया।

छोटी बहिन ऑंखें पोंछती हुई पास में खड़ी अपनी बहिन का हाथ खींच रही थी। मेरे पास में जाकर खड़े होते ही वह धीरे से बोली, “बाबूजी आए हैं बहिन, उठो।”

मुँह उठाकर उसने मेरी ओर देखा और साथ ही साथ उसका रुदन मानो बाँध तोड़कर फट पड़ा। मेरे पास सान्त्वना देने के लिए और था ही क्या! फिर भी, उस दिन मैं उसका साथ नहीं छोड़ सका। उसके पीछे-पीछे उसकी गाड़ी में जा बैठा। रास्ते-भर वह रो-रो करके यही बात कहती रही कि, “बाबूजी, आज मेरा मकान सूना हो गया। किस तरह मैं उसके भीतर पैर रक्खूँगी; एक माह के लिए तमाखू खरीदने गये हैं- यह एक मास मैं कैसे काटूँगी! विदेश में उन्हें न जाने कितनी तकलीफ उठानी होगी! मैंने उन्हें वहाँ क्यों जाने दिया! रंगून के बाजार की तमाखू से हमारा काम तो मजे से चल रहा था; तब फिर क्यों अधिक लाभ की आशा से मैंने उन्हें इतनी दूर भेजा! दु:ख के मारे छाती फटी जाती है। बाबूजी, अगली मेल से ही मैं उनके पास चली जाऊँगी।” इस तरह वह न जाने कितना और क्या-क्या कहती रही।

मैं एक बात का भी जवाब न दे सका, केवल अपना मुँह फिराकर खिड़की के बाहर देखता हुआ अपनी ऑंखों के ऑंसुओं को छुपाता रहा।

वह कहने लगी, “बाबूजी, तुम्हारी जात के लोग जितना प्यार-प्रेम कर सकते हैं, उतना हमारी जात के लोग नहीं कर सकते; तुम लोगों में जितनी दया माया है उतनी और किसी देश के लोगों में नहीं है।”

कुछ देर ठहरकर और दो-तीन दफे ऑंखें पोंछकर वह कहने लगी, “बाबू के प्यार में पड़कर जब मैं उनके साथ रहने लगी तब कितने ही लोगों ने मुझे भय दिखाकर रोका था; किन्तु, मैंने किसी की भी बात न सुनी। इस समय न जाने कितनी स्त्रियाँ मेरे सौभाग्य पर मन ही मन जलती हैं।”

चौरस्ते के नजदीक मैंने चाहा कि उतरकर अपने डेरे पर चला जाऊँ, किन्तु, वह व्याकुल होकर दोनों हाथों से गाड़ी का दरवाजा रोककर बोली, “ना बाबूजी, सो नहीं होगा। तुम्हें हमारे साथ चलकर एक प्याला चाय पीकर आना होगा; चलिए।”

मैं इनकार न कर सका। गाड़ी चलने लगी। उसने एकाएक पूछा, “अच्छा बाबूजी, रंगपुर कितनी दूर है? आप कभी वहां गये हैं? कैसी जगह है? बीमार होने पर वहाँ डॉक्टर तो मिल सकते हैं न?

बाहर की ओर देखते हुए मैंने उत्तर दिया, “हाँ, मिलते क्यों नहीं।”

एक उसास छोड़कर वह बोली, “फया (=ईश्वर) उन्हें भला रक्खें। उनके भाई भी साथ में है। वे बड़े सज्जन आदमी हैं, छोटे भाई को तो वे प्राणों से ज्यादा रक्खेंगे। तुम लोगों का शरीर तो जैसे प्रेमहीन बना है। मुझे कुछ सोच नहीं करना है, क्यों न बाबूजी?”

मैं चुपचाप बाहर की ओर देखता हुआ केवल यही सोचने लगा कि इस महापाप में मेरा खुद का हिस्सा कितना है? चाहे आलस्यवश हो- चाहे ऑंखों की शरम के मारे हो, और चाहे अक्ल मारी जाने के कारण हो, यह जो मैंने अपना मुँह बन्द किये रहकर इतना बड़ा अन्याय अनुष्ठित होते देखा और कुछ कहा नहीं, इसके अपराध से क्या मैं छुटकारा पाऊँगा? और यदि ऐसा ही है, तो फिर सिर ऊँचा करके मैं सीधा क्यों नहीं बैठ सकता? उसकी ऑंखों की ओर देखने का साहस क्यों नहीं कर सकता?

चाय-बिस्कुट लेकर और उनके विवाहित जीवन की लाखों घटनाओं का विस्तृत इतिहास सुनकर जब मैं मकान से बाहर हुआ तब दिन अधिक बाकी नहीं था घर लौट जाने की इच्छा नहीं हुई। दिन के अन्त में सब लोग अपना-अपना काम-काज खत्म करके डेरे में लौट आते हैं- दादा ठाकुर का होटल उस समय तरह-तरह के सुन्दर हास-परिहास से मुखरित हो रही है। पर, सब हो-हल्ला मुझे जहर जैसा लगने लगा। अकेला रास्ते-रास्ते घूमते हुए मैं यही सोचने लगा कि इस समस्या की मीमांसा होगी किस तरह? बर्मी लोगों में विवाह के सम्बन्ध में कोई बँधा हुआ नियम नहीं है। विवाह की कुलीन विधि भी है और पति-पत्नी की तरह जो स्त्री-पुरुष तीन दिन एक साथ रहकर एक बर्तन में भोजन कर लेते हैं, उनका भी विवाह हो गया समझा जाता है। न तो समाज ही इसे नामंजूर करती है और न वह स्त्री ही इस कारण किसी तरह हलकी नजर से देखी जाती है। परन्तु, 'बाबू' के लिए हिन्दू कानून में यह सब कुछ भी नहीं है। इस स्त्री को यह अपने देश में ले जाकर नहीं रख सकता। हिन्दू समाज उन्हें न हो तो न अपनावे, किन्तु, यह भी जीवन-भर सहन करते रहना कठिन है कि नीच से नीच आदमी भी उन्हें नीची निगाह से देखे! या तो चिरकाल के लिए निर्वासित की तरह प्रवास में रहा करे; या फिर, बड़े भइया ने अपने छोटे भाई की जो व्यवस्था की, वही ठीक है। इतना होते हुए भी 'धर्म' नामक शब्द का यदि कोई अर्थ हो सकता है- चाहे वह धर्म हिन्दू जाति का हो या और किसी जाति का, तो इतना बड़ा नृशंस व्यापार किस तरह ठीक हो सकता है सो समझना मेरी बुद्धि से परे की बात है। यह सब बातें तो समयानुसार और कभी सोचकर देखूँगा; किन्तु, इस गुस्से के मारे तो मैं जलकर खाक होने लगा, कि यह कापुरुष आज बिना किसी अपराध के इस अनन्य-निर्भर नारी के परम स्नेह के ऊपर वेदना का बोझा लादकर और चकमा देकर भाग गया।

रास्ते के किनारे-किनारे जो चलना शुरू किया तो चलता ही गया। बहुत दिन पहले, एक दिन अभया का पत्र पढ़ने जिस चाह की दुकान में गया था उसी दुकान के मालिक ने शायद पहिचान कर मुझे हाँक दी, “बाबू साहब, आइए।”

एकाएक जैसे नींद टूटते ही मैंने देखा, यह वही दुकान है और वह रोहिणी भइया का घर है। बिना कुछ कहे उसके बुलाने का मान रखकर मैं अन्दर चला गया और एक प्याला चाय पीकर बाहर निकला। रोहिणी के दरवाजे पर धक्का देकर देखा कि भीतर से बन्द है। बाहर की साँकल को पकड़कर दो-चार दफे हिलाते ही किवाड़ खुल गये। ऑंखें उठाकर देखा कि सामने अभया है।

“अरे तुम?”

अभया की ऑंखें और चेहरा लाल हो उठा; कोई भी जवाब दिए बगैर वह पलक मारते न मारते अपने कमरे में चली गयी और उसने अन्दर से कुण्डी बन्द कर ली। किन्तु, लज्जा की जो मूर्ति शाम के उस धुँधले प्रकाश में उसके चेहरे पर फूट उठते देखी, उससे जानने-पूछने के लिए और कुछ बाकी ही नहीं रहा। अभिभूत की तरह कुछ देर खड़ा रहकर चुपचाप लौटकर जा रहा था कि अकस्मात् मेरे दोनों कानों में मानो दो तरह के विभिन्न रोने के स्वर एक ही साथ गूँज उठे; एक था उस महापापी का और दूसरा उस बर्मी युवती का। मैं जाना ही चाहता था, किन्तु, फिर लौटकर ऑंगन में खड़ा हो गया। मन ही मन कहा, नहीं, मुझे इस तरह नहीं जाना चाहिए। नहीं-नहीं- ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह उचित नहीं है, यह अच्छा नहीं है- यह सब अनेक दफे सुनने की आदत रही है, अनेक दफे दूसरों को सुनाया भी है-किन्तु बस, अब और नहीं। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्यों अच्छा है, कहाँ किस तरह बुरा है- ये सब प्रश्न यदि हो सकेगा तो स्वयं उसी के मुँह से सुनूँगा और यदि ऐसा न कर सकूँ, तो केवल पोथी के अक्षरों पर दृष्टि रखकर मीमांसा करने का अधिकार न मुझे है, न तुम्हें है और न शायद विधाता को ही है।

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴By वनिता कासनियां पंजाब अध्याय 1अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?”अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।”मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।”अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।”अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...