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❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 6 उस दिन फिर मेरा जी न चाहा कि नीचे जाऊँ, इसलिए, नन्द और टगर के युद्ध का अन्त किस तरह हुआ- सन्धि-पत्र में कौन-कौन-सी शर्तें निश्चित हुईं, सो मैं कुछ नहीं जान पाया। परन्तु, बाद में देखा कि शर्तें चाहे जो हों, विपत्ति के समय वह 'स्कैप ऑफ पेपर' (कागज का रद्दी टुकड़ा) किसी काम नहीं आता। जब जिसे जरूरत होती है, खिलवाड़ की तरह उसे फाड़ फेंकता है और दूसरे का ब्यूह भेद कर डालता है। बीस बरस से ये दोनों यही करते आए हैं तथा और भी बीस बरस तक ऐसा न करते रहेंगे, इसकी शपथ स्वयं विधाता भी नहीं ले सकेंगे।सारे दिन तो आकाश में बादलों के टुकड़े यहाँ से वहाँ घूमते रहे; परन्तु, अब शाम के लगभग एक गहरा काला बादल सारे क्षितिज को ढँककर धीरे-धीरे सिर उठाकर, ऊपर आने लगा। मालूम हुआ कि खलासियों के मुँह और ऑंखों पर मानो घबराहट की छाया आ पड़ी है। उनके चलने-फिरने में भी मानो एक प्रकार के घबराहट के चिह्न नजर आने लगे हैं जो इसके पहले नहीं थे।एक बूढ़े-से खलासी को बुलाकर पूछा, “अजी चौधरी, आज रात को भी क्या कल ही के समान ऑंधी आवेगी?”विनय से चौधरीजी वश में हो गये। खड़े होकर बोले, “मालिक, नीचे चले जाइए; कप्तान ने कहा है, साइक्लोन (= बण्ण्डर) उठ सकता है।”पन्द्रह मिनट बाद ही देखा कि उसका कथन निर्मल नहीं है। ऊपर जितने भी यात्री थे उन सबको खलासी लोग एक तरह से जबरन 'होल्डर' में उतारने लगे। दो-चार लोगों के आपत्ति करने पर सेकण्ड ऑफिसर ने खुद आकर उन्हें धक्के मारकर उठा दिया और उनके बिस्तर वगैरह लातों से हटाना शुरू कर दिया। मेरा ट्रंक, बिस्तर आदि तो खलासी लोग झटपट नीचे उठा ले गये; किन्तु, मैं खुद एक तरफ खिसक गया। मैंने सुना कि सबको- अर्थात् जो हतभागे दस रुपये से अधिक किराया नहीं दे सकते थे उन्हें- उस जहाज के गर्भ-गृह में भर के उसका मुँह बन्द कर दिया जायेगा। उनकी खैरियत के लिए यही एक उपाय था।किन्तु, मुझे खुद अपने लिए खैरियत की यह व्यवस्था किसी तरह पसन्द नहीं आई। इसके पहले साइक्लोन नामक वस्तु को समुद्र में तो क्या, जमीन पर भी नहीं देखा था। कैसा इसका उपद्रव होता है, कैसा इसका स्वरूप है और अमंगल करने की कितनी इसकी शक्ति है, मैं बिल्कुहल नहीं जानता था। मन ही मन सोचने लगा कि मेरे भाग्य से यदि ऐसी वस्तु का आविर्भाव होना सन्निकट ही है, तो फिर उसे बगैर अच्छी तरह देखे नहीं छोडूँगा। भाग्य में जो बदा हो सो हो। और तूफान में यदि जहाज डूबना ही है, तो इस तरह प्लेग के चूहे की तरह पिंजरे में कैद होकर और सिर पटक-पटककर खारे पानी में क्यों मरूँ? इसकी अपेक्षा जब तक बने, हाथ-पाँव हिलाकर, लहरों के हिंडोले पर झूलते-उतराते हुए एक गोता लगाकर पाताल के राजमहल का अतिथि होना अच्छा। किन्तु, यह उस समय मुझे मालूम न था कि राजा का जहाज आगे-पीछे लाखों-करोड़ों हिंस्र अनुचरों के बगैर काले पानी में एक डग भी नहीं चलता और उन्हें लोगों का कलेवा कर डालने में घड़ी-भर की देर नहीं लगती।बहुत समय से थोड़ी-थोड़ी वृष्टि हो रही थी। शाम के लगभग हवा और वृष्टि दोनों का ही वेग बढ़ गया। यह हालत हो गयी कि भाग निकलने की भी कोई जुगत न रही। जहाँ भी मिले सुविधानुसार एक आश्रय-स्थान खोजे बगैरे काम नहीं चल सकता। शाम के अंधेरे में जब मैं अपने स्थान पर वापिस आया तब ऊपर का डेक निर्जन हो गया था। मस्तूल के पास उचककर देखा कि ठीक सामने ही बूढ़ा कप्तान हाथ में दूरबीन लिये ब्रिज के ऊपर यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। इस डर से कि एकाएक उसकी शुभ दृष्टि में पड़कर फिर से, इतने कष्ट के बाद भी, दुबारा उसी गव् में न घुसना पड़े, एक ऐसी जगह खोजने लगा जहाँ सुभीते से बैठ सकूँ। खोजते-खोजते आखिर एक जगह मिल गयी जिसकी कि मैंने पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक किनारे बहुत-सी भेड़ों, मुर्गियों और बत्तखों के पिंजड़े एक के ऊपर एक गँजे हुए थे। उछलकर मंब उन्हीं के ऊपर बैठ गया। जान पड़ा, ऐसी निरापद जगह शायद जहाज भर में और कहीं नहीं है। किन्तु, तब भी बहुत-सी बातें जानना बाकी थीं।वृष्टि, हवा अन्धकार और जहाज का झूलना- ये सभी धीरे-धीरे अधिकाधिक बढ़ने लगे। समुद्र की लहरों का आकार देखकर मैंने मन ही मन सोचा, यही है शायद वह साइक्लोन; किन्तु वह सागर के समीप सिर्फ गौ के खुर के गढ़े के समान ही था, इस बात को अच्छी तरह हृदयंगम करने के लिए मुझे और भी थोड़ी देर ठहरना पड़ा।एकाएक छाती के भीतर तक कँपकँपी पैदा करता हुआ जहाज का भोंपू बज उठा। ऊपर की ओर ताका तो जान पड़ा, मानो किसी मन्त्र के बल से आकाश का चेहरा ही बदल गया है। वे बादल अब नहीं रहे- मालूम हुआ कि सब तरफ से छिन्न-भिन्न होकर जैसे सम्पूर्ण आकाश हलका होकर कहीं ऊपर की ओर उड़ा जा रहा है। दूसरे ही क्षण समुद्र के एक प्रान्त से एक ऐसा विकट शब्द तेजी से आकर कानों में पैठ गया कि मैं नहीं जानता, उसकी किसके साथ तुलना करूँ।लकड़पन में अंधेरी रातों में दादी की छाती से लगकर एक कहानी सुना करता था। किसी राजपुत्र ने डुबकी लगाकर तालाब के भीतर से एक चाँदी की डिबिया निकाली थी और उसमें बन्द सात सौ राक्षसियों के प्राणरूप एक सोने के भौंरे को चुटकी से मसलकर मार डाला था। फिर वे सात-सौ राक्षसियाँ मृत्यु यन्त्रणा से चीखती चिल्लाती हुईं सारी पृथ्वी को पैरों के बोझ-से कुचलतीं चूर्ण-विचूर्ण करतीं दौड़ आई थीं। वैसा ही यह भी कहीं कोई विप्ल्व-सा हो रहा है, ऐसा जान पड़ा; परन्तु, इस दफे सात सौ करोड़ राक्षसियाँ हैं- वे उन्मत्त भाव से कोलाहल करती हुई इसी ओर दौड़ी आ रही हैं। आ भी पड़ीं- राक्षसियाँ नहीं, परन्तु, तूफानी हवाएँ। तब मैंने सोचा कि इनकी अपेक्षा तो उन राक्षसियों का आना ही कहीं अच्छा था।इस दुर्जेय वायु की शक्ति का वर्णन करना तो बहुत दूर की बात है, समग्र चेतना से अनुभव करना भी मानो मनुष्य के सामर्थ्य के बाहर है। सम्पूर्ण ज्ञान-बुद्धि को लुप्त करके केवल एक ही धारणा मेरे मन के भीतर अस्पष्ट और निस्संदिग्ध रूप से जागती रह गयी, कि दुनिया की मियाद एकबारगी खत्म होने में अब और कितनी-सी देर है। पास में ही जो एक लोहे का खूँटा था, गले की चादर से मैंने अपने आपको उसी से बाँध रक्खा था। प्रत्येक क्षण मेरे मन में यही खयाल उठने लगा कि बस मुझे यह हवा इस दफे ही खूँटे से छुड़ा देगी और उड़ा ले जाकर समुद्र में जा पटकेगी।एकाएक जान बड़ा कि काला पानी मानो भीतर के धक्कों से घरघराता हुआ क्रम-क्रम से जहाज के ऊपर चढ़ रहा है। दूर को ऑंख उठाई तो उस तरफ से दृष्टि को पुन: वापस न लौटा सका। एक दफे जान पड़ा वह तो कोई पड़ाव है, किन्तु दूसरे ही क्षण जब भ्रम भंग हुआ तब हाथ जोड़कर मैंने कहा, “भगवान, जैसे तुमने ये दोनों नेत्र दिए थे, वैसे ही आज इन्हें सार्थक भी कर दिया। इतने दिनों तक तो संसार में सर्वत्र ही ऑंखें खोले घूमता फिरा हूँ। किन्तु, तुम्हारी इस सृष्टि की तुलना तो कहीं भी नहीं देखी थी। जहाँ तक दृष्टि पहुँचती है एक अचिन्तनीय विराट्काय महातरंग सिर पर चाँदी-सा शुभ्र किरीट धारण किये तेज चाल से आगे बढ़ती हुई आ रही है। जगत में और भी क्या कोई इतना बड़ा विस्मय है?”समुद्र में न जाने कितने लोग आया-जाया करते हैं; मैं खुद भी तो कितनी ही दफे इस रास्ते गया-आया हूँ; किन्तु ऐसा दृश्य तो पहले कभी कहीं नहीं देखा था। इसके सिवाय, जिस मनुष्य ने ऑंखों नहीं देखा, उसे समझाकर यह बताना कल्पना के बाप के लिए भी सम्भव नहीं कि पानी की लहर किसी तरह इतनी बड़ी हो सकती है!मन ही मन बोला, हे तरंग-सम्राट! तुम्हारी टक्कर से हमारा जो कुछ होगा, उसे तो हम जानते ही हैं, किन्तु, अब भी तो तुम्हें यहाँ तक आ पहुँचने में आखिर आधा मिनट की देर है, तब कम से कम उतने समय तक तो मैं अच्छी तरह जी-भरकर तुम्हारे कलेवर को देख लूँ।यह भाव किसी वस्तु की सुविपुल ऊँचाई और उससे भी अधिक विस्तार देखकर ही इस तरह मन में उत्पन्न नहीं हुआ करता, क्योंकि यदि ऐसा हो तो इसके लिए हिमालय का कोई भी अंग-प्रत्यंग यथेष्ट है। किन्तु, जो यह विराट व्यापार सजीव के समान दौड़ा आ रहा है, उसकी अपरिमेय शक्ति की अनुभूति ने ही मुझे अभिभूत कर डाला।किन्तु, समुद्र-जल के टकराने से जो एक तरह की ज्वाला सी बार-बार चमक उठती है वह ज्वाला विचित्र रेखाओं में यदि इसके सिर पर न खेलती होती तो गम्भीर कृष्ण जल-राशि की विपुलता को मैं इस अन्धकार में शायद उस तरह न देख पाता। इस समय जितनी भी दूर तक मेरी दृष्टि जाती है उतनी ही दूर तक इस आलोक-माला ने मानो छोटे-छोटे प्रदीपों को जलाकर इस भयंकर सौन्दर्य का चेहरा मेरी ऑंखों के सामने खोल दिया है।जहाज का भोंपू असीम वायु-वेग से थरथर काँपता हुआ लगातार बजने लगा और भयार्त्त खलासियों का दल अल्लाह के कानों तक अपना आकुल आवेदन पहुँचा देने के लिए गला फाड़-फाड़कर एक साथ चिल्लाने लगा।जिसके शुभागमन के निमित्त इतना भय, इतनी चीख-पुकार- इतना उद्योग-आयोजन हो रहा था, वह महातरंग आखिर आ पहुँची। एक प्रकाण्ड प्रकार की उलट-पलट के बीच हरवल्लभ के समान मुझे भी पहले जान पड़ा कि निश्चय से ही हम डूब गये हैं; इसलिए, दुर्गा का नाम जपने से अब और क्या हो सकता है। आस-पास ऊपर-नीचे, चारों ओर काला जल ही जल है! जहाज समेत सब लोग पाताल के राजमहल में निमन्त्रण खाने जा रहे हैं, इसमें अब कोई सन्देह नहीं रहा। इस समय चिन्ता केवल यही है कि खाना-पीना आदि वहाँ न जाने किस किस्म का होगा।किन्तु, करीब मिनट-भर बाद ही दिखाई दिया-नहीं, डूबे नहीं हैं, जहाज समेत हम सब केवल जल के ऊपर उतरा रहे हैं। इसके सिवाय लहर के ऊपर लहर आना भी खत्म नहीं हुआ है, इसलिए हम लोगों का हिंडोला झूलना भी समाप्त नहीं हुआ है। इतनी देर के बाद अब पता लगा कि क्यों कप्तान-साहब ने लोगों को जानवरों के समान गढ़े में डालकर ताला लगवा दिया है। डेक के ऊपर से बीच-बीच में मानो जल की धारा बह जाने लगी। मेरे नीचे की बत्तखें और मुर्गियाँ कितनी ही दफे फड़फड़ाकर और भेड़ें कई बार 'मैं-मैं' करके भव-लीला समाप्त कर गयीं। सिर्फ मैं ही उनके ऊपर आश्रय ग्रहण किये, लोहे के ख्रुंटे को जोर से पकड़े हुए, अपनी भव-लीला सुरक्षित बनाए रहा।किन्तु, इसी समय एक और प्रकार की आफत आ जुटी। केवल जल के छींटे ही मेरे शरीर में सुई की तरह छिद रहे हों सो बात नहीं- समस्त कपड़े और धोती के भीग जाने से और प्रचण्ड वायु से इतनी ठण्ड लगने लगी कि दाँत कटकट बजने लगे। खयाल आया, कि हाल जल में डूबने से तो किसी तरह बच भी सकता हूँ, किन्तु निमोनिया के हाथ से किस तरह परित्राण पाऊँगा? और, यह तो मैंने नि:संशय अनुभव किया कि इसी तरह यदि और भी कुछ देर बैठा रहूँगा तो परित्राण पाना सचमुच ही असम्भव हो जायेगा। इसलिए जिस तरह भी हो, इस स्थान का परित्याग करके किसी ऐसी जगह आश्रय लेना चाहिए जहाँ कि जल के छींटे बर्छी के फल की तरह शरीर में न चुभें। एक बार सोचा कि भेड़ों के पिंजरे में घुस जाऊँ तो कैसा हो! किन्तु वह भी कितना सुरक्षित है? उसके भीतर यदि खारे जल की धारा प्रवेश कर जाय तो ठीक 'मैं-मैं' करके न सही, पर 'माँ-माँ' करके अन्त में अवश्य ही इह-लीला समाप्त करनी पड़ेगी।सिर्फ एक उपाय है। जहाज जब पार्श्व-परिवर्तन करता है तब भागने का कुछ मौका मिल जाता है; इसलिए, उस समय यदि कहीं जाकर घुस सकूँ तो शायद जान बच जाय। जो सोचा, वही किया। किन्तु पिंजरों पर से नीचे उतरकर, तीन बार दौड़कर, और तीन बार बैठकर, किसी तरह जब मैं सेकण्ड क्लास के केबिन के द्वार पर पहुँचा, तब देखा, द्वार बन्द है। लोहे के किवाड़ों ने हजार धक्का-मुक्की करने पर भी रास्ता नहीं दिया। इसलिए, वही रास्ता फिर उसी तरह तय करके मैं फर्स्ट क्लास के दरवाजे पर आ उपस्थित हुआ। इस दफे भाग्य देवता ने सुप्रसन्न होकर एक निराले कमरे में आश्रय दे दिया; और जरा भी दुविधा न करके मैं किवाड़ बन्द करके पलंग पर जा सोया।रात के बारह बजे के भीतर तूफान तो थम गया, किन्तु समुद्र का गुस्सा दूसरे दिन भोर तक भी शान्त न हुआ।मेरे सामान का और साथी मुसाफिरों का क्या हाल हुआ, और, खास तौर से सपत्नीक मिस्रीजी ने किस तरह रात बितई, यह जानने के लिए सुबह मैं नीचे उतर गया। कल नन्द मिस्री ने जरा दिल्लगी करते हुए कहा था कि “बाबूजी, साढ़े बत्तीस प्रकार के चबेने के समान हम लोग आपस में गड्डमड्ड हो गये थे और अभी ही कुछ देर हुई, सब कोई अपनी-अपनी जगह आकर बैठे हैं।” आज का गड्डमड्ड साढ़े बत्तीस प्रकार में गिना जा सकता है या नहीं, सो मुझे नहीं मालूम; किन्तु, इस समय तक कोई भी अपने निजी स्थान पर लौटकर न आने पाया था यह मैंने अपनी ऑंखों देखा।उन लोगों की व्यवस्था देखने पर सचमुच ही रुलाई आने लगी। इन तीन-चार-सौ यात्रियों में से किसी के समर्थ रहने की बात तो दूर-शायद, अक्षत भी कोई नहीं बचा था।औरतें सिल पर जिस तहर लोढ़े से मसाला बाँटती हैं, कल का साइक्लोन इन तीन-चार सौ लोगों का ठीक उसी तरह सारी रात मसाला बाँटता रहा। सारे माल-असबाब के सहित-बक्स-पेटियों आदि के सहित ये सब लोग रात-भर जहाज के इस किनारे से उस किनारे तक लुढ़कते फिरे हैं। वमन तथा अन्य दो क्रियाएँ इतनी अधिक की गयी हैं कि दुर्गन्ध के मारे खड़ा होना भी भारी हो रहा है और इस समय डॉक्टर बाबू जहाज के मेहतर और खलासियों को साथ लिये इन लोगों का 'पंकोद्धार' करने की व्यवस्था कर रहे हैं।डॉक्टर बाबू ऊपर से नीचे तक मेरा बार-बार निरीक्षण करके शायद मुझे सेकण्ड क्लास का मुसाफिर समझ बैठे थे, फिर भी, अत्यन्त आश्चर्य के साथ बोले, “महाशय तो खूब ताजे दिख रहे हैं; जान पड़ता है कि आराम करने के लिए कोई हैमॉक (भ्उउवबा= जहाज पर रहनेवाला एक तरह का एक झुलन-खटोला) पा गये थे, क्यों न?”“हैमॉक कहाँ से पाता महाशय, पाया था एक भेड़ों का पिंजरा। इसीलिए तरो-ताजा दीख रहा हूँ।”डॉक्टर बाबू मुँह फाड़कर मेरी ओर ताकते रह गये। मैं बोला, “डॉक्टर बाबू, यह अधम भी इसी नरक-कुण्ड का यात्री है। किन्तु, कमजोर होने के सबब यहाँ घुस न सका- शुरु से ही डेक के ऊपर रहा आया। कल साइक्लोन की खबर पाकर कुछ देर भेड़ों के पिंजरों के ऊपर बैठकर, और रात को फर्स्ट क्लास के एक कमरे में अनधिकार प्रवेश करके आत्मरक्षा कर सका हूँ। क्या कहते हैं आप, मैंने कुछ अनुचित तो नहीं किया?”सारा इतिहास सुनकर डॉक्टर बाबू इतने प्रसन्न हुए कि उसी क्षण उन्होंने मुझे अपने निजी कमरे में बाकी दो दिन काटने के लिए सादर निमन्त्रण दे दिया। अवश्य ही उस निमन्त्रण को मैं स्वीकार नहीं कर सका- केवल एक चेयर मैंने उनसे ले ली।दोपहर को भूख की मार से मुर्दे की तरह चेयर पर पड़ा हुआ ब्रह्माण्ड की समस्त खाद्य-वस्तुओं का ध्या न कर रहा था- कहाँ जाकर क्या कौशल करूँ कि कुछ खाने को मिल जाय। इसी समय, जब कि मैं इस दुश्चिन्ता में डूबा हुआ था, खिदिरपुर के मुसलमान दर्जियों में से एक ने आकर कहा, “बाबू साहब, एक बंगाली औरत आपको बुला रही है।”“औरत?” समझा कि टगर होगी। क्यों बुला रही है सो भी अनुमान कर लेना मेरे लिए कठिन नहीं था। निश्चय ही मिस्री के साथ स्वामी और स्त्री के स्वत्व सिद्ध करने के व्यापार में फिर मतभेद उपस्थित हो गया है। किन्तु, मेरी जरूरत क्यों आ पड़ी? ज्तपंस इल वतकमंस (अग्नि-परीक्षा के) सिवाय बाहर के किसी आदमी ने आकर किसी दिन इसकी मीमाँसा कर दी हो, यह सोचना भी कठिन है।मैंने कहा, “घण्टे-भर बाद आऊँगा, कह देना।”उस मनुष्य ने कुण्ठित होकर कहा, “नहीं बाबू साहब, बड़ी मिन्नत करके बुला रही है...”“मिन्नत करके?” किन्तु टगर तो मिन्नत करने वाली औरत नहीं है। पूछा “उसके साथ का मर्द क्या कर रहा है?”वह बोला, “उसी की बीमारी के कारण तो आपको बुला रही है।”बीमारी होना बिल्कु'ल ही अचरज की बात नहीं थी, इसलिए मैं उठ खड़ा हुआ। वह मुझे अपने साथ नीचे ले गया। काफी दूर पर एक कोने में कुण्डली किये हुए मोटे-मोटे रस्से रखे हुए थे। उन्हीं की आड़ में एक बाईस-तेईस वर्ष की बंगाली स्त्री बैठी थी। पहले कभी उस पर मेरी नजर नहीं पड़ी थी। पास में ही एक मैली शतरंजी के ऊपर करीब-करीब इसी उम्र का एक अत्यन्त क्षीणकाय युवक मुर्दे की तरह ऑंखों मूँदकर पड़ा हुआ है- वही बीमार है।मेरे निकट आते ही उस औरत ने धीरे-धीरे अपने सिर का वस्त्र आगे खींच लिया, किन्तु मैं उसका मुँह देख चुका था।वह मुख सन्दर कहा जाय तो बहस उठ सकती है, किन्तु फिर भी उपेक्षा करने योग्य नहीं था। ऊँचा कपाल स्त्रियों की सौन्दर्य-तालिका में कोई स्थान नहीं रखता, यह मुझे मालूम है; फिर भी, इस तरुणी के चौड़े मस्तक पर बुद्धि और विचार-शक्ति की एक ऐसी छाप लगी हुई देखी जिसे मैंने कदाचित् ही देखा है। मेरी अन्नदा जीजी का कपाल भी प्रशस्त था। इसका भी बहुत कुछ उसी तरह का था। माँग में सिन्दूर झलक रहा था, हाथ में लोहे की चूड़ियाँ¹ और शंख के वलयों को छोड़कर और कोई अलंकार नहीं था। ऑंग में एक सीधी-सादी रंगीन साड़ी थी।परिचय न होने पर भी इतने स्वाभाविक ढंग से उसने बात की कि मैं विस्मित हो गया। वह बोली, “आपके साथ डॉक्टर बाबू का तो परिचय है, क्या एक दफे आप बुला सकते हैं?”मैंने कहा, “आज ही उनसे परिचय हुआ है। फिर भी, जान पड़ता है, डॉक्टर बाबू भले आदमी हैं। किन्तु, उन्हें क्यों बुलाती हो?”वह बोली, “यदि बुलाने पर विजिट देनी पड़ती हो, तो फिर जरूरत नहीं है; न होगा, ये ही थोड़ा कष्ट करके ऊपर चले चलेंगे।” इतना कहकर उसने उस रोगी आदमी को दिखा दिया।मैंने सोचकर कहा, “जहाज के डॉक्टर को शायद कुछ भी देना नहीं होता। किन्तु, इन्हें हो क्या गया है?”मैंने सोचा था कि रोगी इनका पति है; किन्तु, बातचीत से कुछ सन्देह हुआ। उस मनुष्य के मुँह के ऊपर कुछ झुककर उसने पूछा, “घर से चलते समय से ही तुम्हें पेट की बीमारी थी न?”उस मनुष्य ने सिर हिला दिया, तब इसने सिर ऊपर उठाकर कहा, “हाँ, इन्हें पेट की बीमारी देश में ही हुई थी, किन्तु कल से बुखार आ गया। इस समय देखती हूँ कि बुखार तेज हो आया है, कुछ दवाई दिए बिना काम न चलेगा।”मैंने भी स्वयं हाथ डालकर उसके शरीर का ताप देखा, वास्तव में बुखार खूब तेज था। डॉक्टर को बुलाने मैं ऊपर चला गया।डॉक्टर बाबू नीचे आए, रोग-परीक्षा करके और दवाई का पुरजा देकर बोले, “चलो श्रीकान्त बाबू, कमरे में चलकर गप-शप करें।”डॉक्टर बाबू खूब रंगीले थे। अपने कमरे में ले जाकर बोले, “चाय पीते हैं?” मैंने कहा, “हाँ, पीता हूँ।”“और बिस्कुट?”“सो भी खाता हूँ?”“अच्छा।”खाना-पीना समाप्त होने के बाद दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गये। डॉक्टर बाबू बोले, “आज कैसे जा भिड़े उस औरत से?”मैंने कहा, “उसने ही मुझे बुला भेजा था।”डॉक्टर बाबू इस तरह सिर हिलाकर कि मानो सब कुछ जानते हों, बोले, “बुलाना ही चाहिए- शादी-वादी की है या नहीं?”मैंने कहा, “नहीं।”डॉक्टर बाबू बोले, “तो बस, भिड़ जाओ। ऐसी कुछ बुरी नहीं है। उस आदमी का चेहरा देखा, उस पर टाईफाइड के लक्षण नजर आते हैं। कुछ भी हो, वह अधिक दिन न टिकेगा, यह निश्चित है। इस बीच उस पर नजर बनाए रखना। कहीं और कोई साला न भिड़ जाय।”मैं अवाक् होकर बोला, “आप यह सब कह क्या रहे हैं, डॉक्टर बाबू?”डॉक्टर बाबू जरा भी अप्रतिभ हुए बिना बोले, “अच्छा, वह छोकरा ही उसे घर से निकाल लाया है या उसी को वह बाहर निकाल लाई है- तुम्हें क्या मालूम होता है, श्रीकान्त बाबू? खूब फारवर्ड है। बातचीत तो बहुत अच्छी करती है।”मैंने कहा, “इस तरह का खयाल आपके मन में क्यों आया?”डॉक्टर बाबू बोले, “हर एक ट्रीप में तो देखता हूँ कि एक न एक है ही। पिछली दफे भी बेलघर की एक ऐसी ही जोड़ी थी। एक बार बर्मा में जाकर कदम तो रक्खो, तब देखोगे कि मेरी बात सच है या नहीं।”उनकी बर्मा की बात बहुत कुछ सच है, यह मैंने बाद में अवश्य देखा; किन्तु उस समय तो ऊपर से नीचे तक मेरा सारा मन अरुचि से तीखा हो उठा। डॉक्टर बाबू से बिदा लेकर नन्द मिस्री की खबर लेने नीचे गया। घरवाली सहित मिस्री उस समय फलाहार की तैयारी कर रहा था। नमस्कार करने के बाद सबसे पहले उसने यह प्रश्न किया, “यह औरत कौन है, बाबू?...”टगर सिर दर्द के कारण अपने सिर पर एक कपड़ा पगड़ी की तरह बाँध रही थी। एकदम फुसकारकर बोल उठी, “यह जानने की तुम्हें क्या गरज पड़ी है, बताओ तो सही?”मिस्री ने मुझे मध्ययस्थ मानकर कहा, “देखी महाशय, इस औरत की ओछी तबियत? कौन बंगाली औरत रंगून जा रही है, यह पूछना भी जैसे पाप हो!”टगर अपना सिर-दर्द भूल गयी और पगड़ी को फेंककर मेरी ओर ताकने लगी। उसने अपनी दोनों गोल-गोल ऑंखें फाड़कर कहा, “महाशय, टगर वैष्णवी के हाथ के नीचे से इन सरीखे से न जाने कितने मिस्री आदमी बनकर निकल गये हैं- अब भी क्या यह मेरी ऑंखों में धूल झोंक सकते हैं? अरे, तुम डॉक्टर हो कि वैद्य, जो मैं जरा-सा पानी लेने गयी, कि इतनी ही देर में, चट से दौड़कर वहाँ देखने जा पहुँचे? क्यों, कौन है वह? यह अच्छा नहीं होगा, सो कहे देती हूँ, मिस्री। यदि दुबारा फिर कभी वहाँ जाते देखूँगी तो फिर एक दिन या तो तुम ही हो या मैं ही।”नन्द मिस्री ने गर्म होकर कहा, “तेरा क्या मैं पालतू बन्दर हूँ जो तू जिस तरफ साँकल पकड़कर ले जायेगी उसी तरह जाऊँगा? मेरी इच्छा होगी तो फिर जाकर उस बेचारे को देखने जाऊँगा। तेरे मन में आवे सो कर।” इतना कहकर उसने फलाहार में चित्त लगाया।टगर ने भी सिर्फ 'अच्छा' कहकर अपनी पगड़ी बाँधना शुरू कर दिया। मैं भी वहाँ से चल दिया। चलते-चलते मैं सोचता गया- इसी तरह इन दोनों ने बीस बरस काट दिए हैं। अनेक दफे हाथ जलाकर टगर इतना सीखी है कि जहाँ पर सत्य का बन्धन नहीं है वहाँ रास को जरा भी ढीला करना अच्छा नहीं होता। ठगाना ही पड़ता है। या तो रात-दिन सतर्क बने रहकर जोर-जबरदस्ती से अपना दखल जमाए रखना पड़ेगा, नहीं तो, जवानी की तरह नन्द मिस्री भी एक दिन अनजान में खिसक जायेगा।किन्तु, जिसको लक्ष्य करके टगर के मन में यह विद्वेष उत्पन्न हुआ और डॉक्टर बाबू ने कुत्सित तीव्र कटाक्ष किया, वह है कौन? टगर ने कहा था- यही कार्य करते हुए मैंने अपने बाल पकाए हैं। ऐसी औरत है कहाँ जो मेरी ऑंखों में धूल झोंक सके? डॉक्टर बाबू ने अपना मन्तव्य जाहिर किया था कि ऐसी घटनाएँ नित्य ही देखते रहने के कारण उनकी ऑंखों में दिव्यदृष्टि उत्पन्न हो गयी है। इसमें यदि भूल हो, तो वे ऐसी ऑंखों को निकाल फेंकने के लिए तैयार हैं।ऐसा ही होता है। दूसरे का विचार करते समय किसी मनुष्य को कभी यह कहते नहीं सुना कि वह अन्तर्यामी नहीं हैं, अथवा कहीं भी उसका कोई भ्रम या प्रमाद हो सकता है। सभी कहते हैं कि मनुष्य को चीन्हने में हम बेजोड़ हैं और इस विषय में हम एक पक्के जौहरी हैं। फिर भी, संसार में मैं नहीं जानता कि कभी किसी ने अपने खुद के भी मन को ठीक तरह से पहिचाना हो। मगर हाँ, मेरे समान जिसने भी कहीं कोई कठिन चोट खाई है, उसे अवश्य ही सावधान होना पड़ा है। यह बात उसे मन ही मन मंजूर करनी ही पड़ती है कि संसार में जब अन्नदा जीजी सरीखी स्त्रियाँ भी हैं, तब बुद्धि के अहंकार से दूसरे को हीन और नासमझ समझकर खुद बुद्धिमान बनने की अपेक्षा, सब-कुछ अच्छी तरह जानते हुए भी, नासमझ बनने में ही एक तरह से अधिक बुद्धिमानी है। इसलिए, इन दो परम विज्ञ स्त्री-पुरुषों के उपदेश की मैं अभ्रान्त न मान सका। किन्तु डॉक्टर बाबू ने जो कहा था कि अत्यन्त 'फॉरवर्ड' है, सो ठीक मालूम हुआ। और, केवल यही बात मुझे रह-रहकर चुभने लगी।बहुत रात गये मैं फिर बुलाया गया। इस दफे इस औरत का मुझे परिचय प्राप्त हुआ। नाम था अभया। उत्तरराढ़ी कायस्थ है, घर है बालूचर के निकट। जो व्यक्ति बीमार पड़ा है वह गाँव के रिश्ते से भाई होता है, नाम है उसका रोहिणी सिंह। “दवा से रोहिणी बाबू को काफी लाभ पहुँचा है”, इस तरह कहना आरम्भ करके थोड़े ही समय में अभया ने मुझे अपना आत्मीय बना लिया। किन्तु मुझे यह तो स्वीकार करना ही चाहिए कि मेरे मन में, अनिच्छा होते हुए भी, एक कठोर समालोचना का भाव बराबर जाग्रत हो गया था। फिर भी, इस स्त्री की सारी बातचीत और आलोचना के दरम्यायन कहीं भी मैं जरा-सी भी असंगति या अनुचित प्रगल्भता नहीं पकड़ पाया।अभया में मनुष्य को वश करने की अद्भुत शक्ति है। इस बीच में ही उसने मेरा केवल नाम-धाम ही नहीं जान लिया, वरन् 'मैं उसके लापता पति को, जिस तरह हो सके, खोज दूँगा', यह वचन भी उसने मेरे मुँह से निकलवा लिया। उसका पति आठ वर्ष पहले बर्मा में नौकरी के लिए आया था। दो वर्ष तक उसकी चिट्ठी-पत्री आती रही थी; किन्तु इन छह वर्षों से उसका कोई पता नहीं है। देश में कुटुम्ब-कबीले का और कोई नहीं है। माँ थीं; परन्तु वे भी करीब महीने-भर पहले गुजर गयीं। बाप के घर अभिभावकहीन होकर रहना असम्भव हो जाने से रोहिणी भाई को राजी कर बर्मा आई है।कुछ देर चुप रहकर एकाएक वह बोल उठी, “अच्छा, इतनी-सी भी कोशिश न करके यदि किसी तरह देश में ही पड़ी रहती तो क्या यह मेरे हक में अच्छा होता? इसके सिवाय इस उम्र में बदनामी मोल लेते कितनी-सी देर लगती है?”मैंने पूछा, “क्या आप जानती हैं कि इतने दिन तक क्यों आपकी उन्होंने कुछ खबर नहीं ली?”“नहीं, कुछ नहीं जानती।”“इसके पहले वे कहाँ थे, सो मालूम है?”“जानती हूँ। रंगून में ही थे, बर्मा रेलवे में काम करते थे; किन्तु, कितनी ही चिट्ठियाँ दीं, कोई उत्तर नहीं मिला। और, कभी कोई चिट्ठी लौटकर वापिस भी नहीं आई।”प्रत्येक पत्र अभया के पति को मिला है, यह तो निश्चित था। किन्तु, क्यों उसने जवाब नहीं दिया, इसका सम्भाव्य कारण हाल ही मैंने डॉक्टर बाबू के निकट सुना था। बहुत-से बंगाली वहाँ जाकर किसी ब्रह्मदेश की सुन्दरी को घर बिठाकर नयी गिरस्ती बसा लेते हैं और उनमें ऐसे अनेक हैं जो सारी जिन्दगी फिर लौटकर देश नहीं गये।मुझे चुप देखकर अभया ने पूछा, “वे जीवित नहीं हैं, यही क्या आपको जान पड़ता है?”मैंने सिर हिलाकर कहा, “बल्कि, ठीक इससे उल्टा। वे जीवित हैं, यह तो मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ।”चट से अभया ने मेरे पैरे छूकर प्रणाम किया और कहा, “आपके मुँह में फूल-चन्दन पड़ें। श्रीकान्त बाबू, मैं और कुछ नहीं चाहती। वे जीवित हैं, बस इतना ही मेरे लिए काफी है।”मैं फिर मौन हो रहा। अभया खुद भी कुछ देर मौन रहकर बोली, “आप क्या सोच रहे हैं, सो मैं जानती हूँ।”“जानती हो?”“जानती नहीं तो? आप पुरुष होकर जिसका खयाल कर रहे हैं, स्त्री होकर भी क्या मुझे वह भय नहीं होगा? सो होने दो, मुझे उसका डर नहीं है- मैं अपनी सौत के साथ मजे से गिरस्ती चला सकती हूँ।”फिर भी मैं चुप ही बना रहा। किन्तु, मेरे मन की बात का अनुमान करने में इस बुद्धिमती स्त्री को जरा-सा भी विलम्ब नहीं हुआ। बोली, “आप सोच रहे हैं कि मेरे गिरिस्ती चलाने के लिए राजी होने से ही तो काम नहीं चलेगा; मेरी सौत को भी तो राजी होना चाहिए?-यही न सोच रहे हैं?”दरअसल मैं अवाक् हो गया और बोला, “ठीक यदि ऐसा ही हो तो क्या करेंगी?”इस दफे अभया की दोनों ऑंखें छलछला उठीं। वह मेरे मुँह की ओर अपनी सजल दृष्टि निबद्ध करके बोली, “उस विपत्ति में आप मेरी थोड़ी-सी सहायता कर सकेंगे, श्रीकान्त बाबू, मेरे रोहिणी भइया बड़े सीधे-सादे भोले आदमी हैं, इसलिए उस समय तो इनके द्वारा मेरा कोई उपकार न होगा।”राजी होकर मैंने कहा, “बन पड़ेगा तो जरूर सहायता करूँगा; किन्तु इन सब कामों में बाहर के लोगों के द्वारा प्राय: काम होता तो कुछ नहीं, उलटा बिगड़ ही जाता है।”“यह बात सच है” कहकर अभया चुपचाप कुछ सोचने लगी।दूसरे दिन ग्यारह-बारह बजे के बीच जहाज रंगून पहुँचने वाला था; किन्तु भोर होने के पहले से ही सब लोगों की ऑंखों और चेहरों पर भय और चंचलता के चिह्न नजर आने लगे। चारों ओर से एक अस्फुट शब्द कानों में आने लगा, 'केरेंटिन, केरेंठिन।' पता लगाने से मालूम हुआ कि ठीक शब्द 'कारेंटाइन' ;फनंतंदपजपदमद्ध है। उस समय बर्मा की सरकार प्लेग के डर से अत्यन्त सावधान थी। शहर से आठ-दस मील दूर पर रेत में काँटेदार तारों से थोड़ा-सा स्थान घेरकर उसमें बहुत-सी झोपड़ियाँ खड़ी कर दी गयी थीं- इसमें ही डेक के समस्त यात्रियों को बिना कुछ विचार किये उतार दिया जाता था। यहाँ पर दस दिन ठहरने के बाद उन्हें शहर में जाने दिया जाता था। हाँ, यदि किसी का कोई आत्मीय शहर में होता और वह पोर्ट हेल्थ ऑफिसर के पास जाकर किसी कौशल से 'छोड़पत्र' जुटा सकता तो बात जुदी थी।डॉक्टर बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर बोले, “श्रीकान्त बाबू, एक 'छोड़पत्र' जुटाए बगैर आपका यहाँ आना उचित नहीं हुआ; कारेंटाइन में ले जाकर वे लोग मनुष्य को इतना कष्ट देते हैं कि कसाईखाने के गाय-बैल-भेड़ आदि जानवरों को भी उतना कष्ट नहीं सहना पड़ता। साधारण आदमी तो उसे किसी तरह सह लेते हैं, मर्मांन्तिक कष्ट तो केवल भले आदमियों को ही सहना पड़ता है। एक तो यहाँ कोई मजूर नहीं मिलता-अपना सब माल-असबाब अपने ही कन्धों पर लादकर एक सीधी जर्जर सीढ़ी पर से चढ़ना-उतरना होता है, और उतनी दूर ले जाना पड़ता है। इसके बाद, सारा माल-असबाब वहाँ खोलकर बिखेर दिया जाता है और स्टीम में उबालकर बर्बाद किया जाता है। और महाशय, ऐसी कड़ी धूप में तो कष्ट का कोई पार ही नहीं रहता।”अत्यन्त भयभीत होकर मैंने कहा, “इसका कोई प्रतिकार नहीं है क्या डॉक्टर बाबू?”उन्होंने सिर हिलाकर कहा, “नहीं-हाँ, जब डॉक्टर साहब जहाज के ऊपर चढ़ आवेंगे तब मैं उनसे कह देखूँगा। उनका क्लर्क यदि आपकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को राजी होगा तो...”किन्तु, उनकी बात अच्छी तरह पूरी न होने पाई थी कि बाहर एक ऐसा काण्ड घटित हुआ जिसकी याद करके मैं खुद भी लाज के मारे मर जाता हूँ। कुछ गोलमाल सुनकर दोनों जनें कमरे से बाहर निकले। देखा कि जहाज का सेकण्ड ऑफिसर छह-सात खलासियों को बेधड़क चाहे जिस तरह लातें मार रहा है, और, उसके बूट की ठोकरें खाकर वे जहाँ बन पड़ता है वहाँ भाग रहे हैं। यह अंगरेज युवक अत्यन्त उद्धत था, इसलिए डॉक्टर बाबू के साथ इसकी पहले भी कहा-सुनी हो चुकी थी, और आज फिर एक झपट हो गयी।डॉक्टर गुस्सा होकर बोले, “तुम्हारा इस तरह का काम अत्यन्त निन्दनीय है, किसी दिन इसके लिए तुम्हें दु:ख उठाना पड़ेगा, यह मैं कहे देता हूँ।”वह पलटकर खड़ा हो गया और बोला, “क्यों?”डॉक्टर बाबू बोले, “इस तरह लातें मारना बड़ा भारी अन्याय है।”उसने जवाब दिया, “मार खाए बिना क्या ढोर सीधे होते हैं?”डॉक्टर बाबू कुछ 'स्वदेशी खयाल' के आदमी थे; वे उत्तेजित होकर कहने लगे, “ये लोग जानवर नहीं हैं, गरीब मनुष्य हैं! हमारे देशी आदमी नम्र और शान्त होने के कारण कप्तान साहब के पास जाकर तुम्हारी शिकायत नहीं करते; और इसीलिए, तुम अत्याचार करने का साहस करते हो!”एकाएक साहब का मुँह अकृत्रिम हँसी से भर गया। डॉक्टर का हाथ खींचकर उसने अंगुली से दिखाते हुए कहा, Look, Doctor, theres your country-men, you ought to be proud of them? (देखो डॉक्टर, वह देखो तुम्हारे देश के आदमी, तुम्हें अवश्य ही इन पर फक्र होना चाहिए।)मैंने नजर उठाकर देखा, कुछ ऊँचे पीपों की आड़ में खड़े होकर वे खींसे बाहर निकाल कर हँस रहे हैं और शरीर की धूल झाड़ रहे हैं। साहब थोड़ा-सा हँसकर, डॉक्टर बाबू के मुँह पर दोनों हाथों के अंगूठे हिलाकर दाएँ-बाएँ झूमता सीटी देता हुआ चल दिया। विजय का गर्व जैसे उसके सारे शरीर से फूट पड़ने लगा।डॉक्टर बाबू का मुँह लज्जा से, क्षोभ से और अपमान से काला हो गया। तेजी से कदम आगे रखते हुए क्रुद्ध स्वर से वे बोल उठे, “बेहया सालो, खींसे बाहर निकालकर हँस रहे हो!”इस दफे, इतनी देर बाद, देशी लोगों का आत्म सम्मान शायद लौट आया। सब लोगों ने एक साथ हँसना बन्द करके तेजी से जवाब दिया, “तुम डॉक्टर बाबू, 'साला' कहने वाले कौन होते हो? किसी का कर्ज खाकर तो हम लोग नहीं हँसते?”“जबर्दस्ती से डॉक्टर बाबू को खींचकर उनके कमरे में वापिस ले आया। कुर्सी पर धम्म से गिरते हुए उनके मुँह से सिर्फ 'ऊ:-!' निकला।और कोई दूसरी बात उनके मुँह से बाहर निकलना भी असम्भव थी। ग्यारह बजे के लगभग कॉरेण्टाइन के पास एक छोटा-सा स्टीमर आकर जहाज से सटकर खड़ा हो गया। समस्त डेक के यात्रियों को यही उस भयानक स्थान में ले जाएगा। माल-असबाब बाँधने-छोरने की धूम मच गयी। मुझे जल्दी नहीं थी; क्योंकि, डॉक्टर बाबू का आदमी अभी ही कह गया था कि मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। निश्चिंत होकर यात्रियों और खलासियों की चिल्लाहट और दौड़-धूप कुछ अन्यमनस्क-सा होकर देख रहा था। हठात् पीछे से एक शब्द सुन पड़ा, पलटकर देखा कि अभया खड़ी है। आश्चर्य के साथ पूछा, “आप यहाँ कैसे?”अभया बोली, “क्यों, क्या आप अपनी चीज-बस्त बाँधोगे नहीं?”मैंने कहा, “नहीं, मुझे अभी काफी देर है, मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। एकदम शहर में जाकर उतरूँगा।”अभया बोली, “नहीं, शीघ्र सामान ठीक कर लीजिए।”मैंने कहा, “मुझे अब भी बहुत समय है।...”अभया ने प्रबल वेग से सिर हिलाकर कहा, “नहीं, सो नहीं हो सकता, मुझे छोड़कर आप किसी तरह नहीं जाने पाएँगे।”मैं अवाक् होकर बोला, “यह क्या? मेरा तो वहाँ जाना नहीं हो सकेगा।”अभया बोली, “तो फिर, मेरा भी नहीं हो सकेगा। मैं पानी में भले ही फाँद पूड़ूँ, परन्तु, निराश्रय होकर इस जगह किसी तरह नहीं जाऊँगी। वहाँ की सब बातें सुन चुकी हूँ।” यह कहते-कहते उसकी ऑंखें छलछला आईं। मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठा रहा। “यह कौन है जो मुझे इस तरह धीरे-धीरे जोर डालकर अपने जीवन के साथ जकड़ रही है?वह ऑंचल से ऑंखें पोंछकर बोली, “मुझे अकेली छोड़कर चले जावेंगे? मैं नहीं सोच सकती कि आप इतने निष्ठुर हो सकते हैं। उठिए, नीचे चलिए। आप न होंगे तो उस बीमार आदमी को साथ लेकर मैं अकेली औरत-जात क्या करूँगी, आप ही बताइए?”अपना माल-असबाब लेकर जब मैं छोटे स्टीमर पर चढ़ा तब डॉक्टर बाबू ऊपर के डेक पर खड़े थे। हठात् मुझे इस अवस्था में देखकर वे हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहने लगे, “नहीं नहीं, आपको न जाना होगा। लौट आइए, लौट आइए- आपके लिए हुक्म हो गया है, आप...”मैंने भी हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहा, “असंख्य धन्यवाद, किन्तु एक और हुक्म से मुझे जाना पड़ रहा है।”सहसा उनकी दृष्टि अभया और रोहिणी पर जा पड़ी। वे मुसकराते हुए बोले, “तब मुझे बेकार ही कष्ट दिया?”“उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”“नहीं नहीं, उसकी जरूरत नहीं, मैं पहले से ही जानता था, गुड बाई।” यह कहकर डॉक्टर बाबू हँसते चेहरे से चले गये।♦♦ • ♦♦'कॉरंटाइन' नामक जेलखाने में भेजने का कानून केवल 'कुलियों' के लिए है- शरीफों के लिए नहीं; और जो जहाज का किराया दस रुपये से अधिक नहीं देता वही 'कुली' है। चाय के बगीचों का कायदा क्या कहता है सो नहीं मालूम; पर जहाजी कानून तो यही है। और अधिकारी या अफसर प्रत्यक्ष ज्ञान से क्या जानते हैं, यह तो वे ही जानें; किन्तु ऑफिशियल इससे अधिक जानने की रीति नहीं है। इसलिए, इस यात्रा में हम सब 'कुली' थे। और, साहब लोग यह भी समझते हैं कि कुली की जीवन-यात्रा के लिए माल-असबाब ऐसा कुछ अधिक नहीं हो सकता- और न होना उचित ही है, कि जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कन्धों पर रखकर वह न ले जा सकता हो। इसलिए, उतरने के घाट पर केरिण्टिन-यात्रियों का माल-असबाब ले जाने के लिए यदि कोई व्यवस्था नहीं है तो इसके लिए क्षुब्ध होने का कोई कारण नहीं। यह सब सच है; फिर भी, यह केवल हमारे ही भाग्य का दोष समझिए कि हम तीन प्राणी, सिर के ऊपर प्रचण्ड सूर्य और पैरों के नीचे उससे भी अधिक उग्र बालुका-राशि से जलते हुए, एक अपरिचित नदी के किनारे बड़े-बड़े गट्ठर सामने रखकर किंकर्तव्यवि‍‍मूढ़ भाव से एक दूसरे का मुँह देखते खड़े हुए हैं। साथ के यात्रियों का परिचय पहले ही दे चुका हूँ। वे लोग अपने लोटे-कम्बल पीठ पर रखकर, और अपेक्षाकृत अधिक बोझ अपनी गृहलक्ष्मियों के सिर पर लादकर, मजे से गन्तव्य स्थान पर चले गये।देखते-देखते रोहिणी भइया बिस्तरों के एक बण्डल पर काँपते-काँपते धम से बैठ गये। बुखार, पेट का दर्द और भारी थकावट- इन सब कारणों के एकत्र होने से उनकी अवस्था ऐसी थी कि उनके लिए, चलना बहुत दूर की बात है; बैठना भी असम्भव हो गया। लेट जाने में ही उनकी रक्षा थी। अभया ठहरी औरत-जात। बचा सिर्फ मैं और मेरी तथा पराई छोटी-मोटी गठरियाँ। मेरी दशा एकबारगी सोचकर देखने योग्य थी। एक तो अकारण ही एक अज्ञात अप्रीतिकर स्थान में जा रहा था; दूसरे, एक कन्धों पर तो एक अज्ञात निरुपाय स्त्री का बोझ था और दूसरे कन्धों पर झूल रहा था उतना ही अपरिचित एक बीमार पुरुष और ऊपर से घाते में थीं गठरियाँ। इन सबके बीच में मैं अत्यन्त उग्र प्यास को लिये, जो कि सारे गले को सुखाए देती थी, एक अज्ञात जगह में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़ा था। मेरे इस चित्र की कल्पना करके बतौर पाठ के लोगों को खूब आनन्द आ सकता है- कुछ सहृदय पाठक, शायद, मेरी इस नि:स्वार्थ परोपकार-वृत्ति की प्रशंसा भी कर सकते हैं; किन्तु, मुझे यह कहते जरा भी शर्म नहीं कि उस उस समय इस हतभागी का मन झुँझलाहट और पश्चात्ताप से एकबारगी परिपूर्ण हो गया था। अपने आपको सैकड़ों धिक्कार देता हुआ मन ही मन कह रहा था, कि इतना बड़ा गधा त्रिलोक में क्या और भी कोई होगा! किन्तु, बड़े अचरज की बात है, कि यद्यपि यह परिचय मेरे शरीर पर लिखा हुआ नहीं था, फिर भी, जहाज-भर के इतने लोगों के बीच में भार-वहन करने के लिए अभया ने मुझे ही क्यों और किस तरह एकदम से पहिचानकर छाँट लिया?किन्तु, मेरा विस्मय दूर हुआ उसकी हँसी से। उसने मुँह उठाकर जरा-सा हँस दिया। उसके हँसी भरे चेहरे को देखकर मुझे केवल विस्मय ही नहीं हुआ-उसके भयानक दु:ख की छाया भी इस दफे मुझे दिख गयी। किन्तु सबसे अधिक अचरज तो मुझे उस ग्रामीण स्त्री की बात सुनकर हुआ। कहाँ तो लज्जा और कृतज्ञता से धरती में गड़कर उसे भिक्षा माँगना चाहिए था, और कहाँ उसने हँसकर कहा, “कहीं यह खयाल न कर बैठना, कि खूब ठगाए गये! अनायास ही जा सकते थे फिर भी गये नहीं, इसी का नाम है दान। पर, मैं यह कहे रखती हूँ कि इतना बड़ा दान करने का सुयोग जीवन में, शायद, कम ही मिलेगा। किन्तु, जाने दो इन बातों को। माल-असबाब इसी जगह पड़ा रहने दो, और चलो, देखें, इन्हें कहीं छाया में सुलाया जा सकता है या नहीं।”आखिर, गट्ठर-गठरियों की ममता छोड़कर मैं रोहिणी भइया को पीठ पर लादकर केरिण्टिन की ओर रवाना हुआ। अभया ने केवल एक छोटा-सा हाथ-बॉक्स लेकर मेरा अनुसरण किया और समान वहाँ ही पड़ा रहा। अवश्य ही वह सब खोया नहीं गया- कोई दो घण्टे बाद उसे ले आने का प्रबन्ध हो गया।अधिकांश स्थानों में देखा जाता है कि सचमुच की विपत्ति काल्पनिक विपत्ति की अपेक्षा अधिक सहज और सह्य होती है। पहिले से ही इस बात का खयाल रखने से अनेक दुश्चिन्ताओं के हाथ से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए, यद्यपि कुछ-कुछ क्लेश और असुविधाएँ निश्चय से मुझे भोगनी पड़ीं, फिर भी, यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ती है कि हम लोगों के केरिण्टिन की मियाद के दिन एक तरह से आराम से ही कट गये। इसके सिवाय, पैसा खर्च कर सकने पर यमराज के घर भी जब ससुराल जैसा आदर प्राप्त किया जा सकता है, तब तो यह केरिण्टिन ही थी!जहाज के डॉक्टर बाबू ने कहा था कि स्त्री खूब 'फारवर्ड' है, किन्तु, जरूरत के समय यह स्त्री कहाँ तक 'फारवर्ड' हो सकती है, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। रोहिणी बाबू को जब पीठ पर से मैंने उतार दिया तब अभया बोली, “बस, अब आपको और कुछ भी नहीं करना होगा श्रीकान्त बाबू, आप विश्राम करें, और जो कुछ करने का है मैं कर लूँगी।”विश्राम की मुझे वास्तव में जरूरत थी- दोनों पैर थकावट के कारण टूटे जाते थे; फिर भी मैंने अचरज के साथ पूछा, “आप क्या करेंगी?” अभया ने जवाब दिया, “काम क्या कुछ कम है? चीजें-बस्तें लानी होंगी एक अच्छा-सा कमरा तलाश करके आप दोनों के लिए बिस्तर तैयार कर देने होंगे, रसोई करके जो कुछ हो दोनों को खिला देना होगा- तब जाकर मुझे छुट्टी मिलेगी, और तब ही तो थोड़ा-सा बैठकर मैं आराम कर सकूँगी। नहीं-नहीं, मेरे सिर की कसम, उठिएगा नहीं, मैं अभी-अभी सब ठीक-ठाक किये देती हूँ।” फिर थोड़ा-सा हँसकर कहा, “सोचते होओगे कि औरत होकर यह अकेली सब प्रबन्ध किस तरह करेगी, यही न? पर क्यों न कर सकूँगी? अच्छा, आपको ही खोज निकालने वाला कौन था? मैं ही थी न, कि और कोई?” इतना कहकर उसने छोटे बॉक्स को खोला और उसमें से कुछ रुपये निकालकर ऑंचल में बाँध लिये तथा केरेण्टिन के ऑफिस की ओर चल दी।वह कुछ कर सके चाहे न कर सके, किसी तरह बैठने को मिल जाने से मेरी तो जान बच गयी। आधे घण्टे के भीतर ही एक चपरासी मुझे बुलाने आया। रोहिणी को साथ लेकर उसके पीछे-पीछे गया। देखा, रहने का कमरा तो अच्छा ही है। मेम डॉक्टरिन साहिबा खुद खड़े होकर नौकर से सब साफ करा रही हैं, जरूरी चीजें आ पहुँची हैं और दो खाटों पर दो आदमियों के लिए बिस्तर तक बिछा दिए गये हैं। एक ओर नयी हाँड़ियाँ, चावल, दाल, आलू, घी, मैदा, लकड़ी आदि सब मौजूद हैं। मद्रासी डॉक्टरिन के साथ अभया टूटी-फूटी हिन्दी में बातचीत कर रही है। मुझे देखते ही बोली, “तब तक आप थोड़ी नींद न ले लो, मैं सिर पर दो घड़ा जल डालकर इस वक्त के लिए चावल-दाल मिलाकर थोड़ी-सी खिचड़ी राँध देती हूँ। उस वक्त के लिए फिर देखा जायेगा।” इतना कहकर गमछा-कपड़ा लेकर मेम साहिबा को सलाम कर, एक खलासी को साथ लेकर वह नहाने चली गयी। इस तरह, उसके संरक्षण में हम लोगों के दिन अच्छी तरह से कट गये, यह कहने में मैं निश्चय से जरा भी अत्युक्ति नहीं कर रहा हूँ।इस अभया में मैं दो बातें अन्त तक लक्ष्य कर रहा था। ऐसी अवस्था में ऐसे स्त्री-पुरुषों में जिनमें परस्पर कोई रिश्ता नहीं होता है, घनिष्ठता स्वत: ही बड़ी तेजी से बढ़ने लगती है। किन्तु इसका उसने कभी मौका ही नहीं दिया। उसके व्यवहार में ऐसा कुछ था जो प्रत्येक क्षण याद दिला दिया करता था कि हम लोग केवल यात्री हैं जो एक जगह ठहर गये हैं- किसी के साथ किसी का सचमुच का कोई सम्बन्ध नहीं है; दो दिन बाद शायद जीवन-भर फिर कहीं किसी की किसी से मुलाकात ही न हो। दूसरी बात यह थी कि ऐसा आनन्दयुक्त परिश्रम भी मैंने कहीं नहीं देखा। दिन-भर वह हम लोगों की सेवा में लगी रहती और काम खुद ही करना चाहती। सहायता करने की कोशिश करते ही वह हँसकर कहती, “यह तो सब मेरा खुद का कार्य है। नहीं तो, रोहिणी भइया को ही क्या जरूरत थी कि वे इतना कष्ट उठाते, और आपको ही क्या पड़ी थी इस जेलखाने में आने की? मेरे लिए ही तो आप लोगों को इतनी सब तकलीफें उठानी पड़ती हैं।”अक्सर ऐसा होता कि खाने-पीने के बाद थोड़ी-सी गपशप चल रही होती और ऑफिस की घड़ी में दो बज जाते। बस, वह एकदम खड़ी हो जाती और कहने लगती, “जाती हूँ आप लोगों के लिए चाय तैयार कर लाऊँ- दो बज गये।” मन ही मन मैं कहता, “तुम्हारा पति चाहे कितना ही पापी क्यों न हो, मनुष्य तो जरूर होगा। यदि कभी उसे पा लोगी, तो वह तुम्हारा मूल्य अवश्य समझेगा।इसके बाद एक दिन मियाद खत्म हुई। रोहिणी भी अच्छा हो गया। हम लोग भी सरकारी 'छोड़-पत्र' पाकर गट्ठर-गठरियाँ बाँध रंगून को चल पड़े। निश्चय किया था कि शहर के मुसाफिरखाने में दो-एक दिन के लिए ठहर कर, और इन लोगों के लिए ठहरने का कोई स्थान ठीक करके, मैं अपने स्थान पर चला जाऊँगा; और फिर जहाँ-कहीं भी रहूँगा वहाँ से उसके पति का पता मालूम करके उसे समाचार भेजने की भरसक कोशिश करूँगा।शहर में जिस दिन हम लोगों ने कदम रखे वह बर्मावासियों का एक त्योहार का दिन था। और, त्योहार तो उनके लगे ही रहते हैं। दल के दल स्त्री-पुरुष रेशमी पोशाक पहने अपने मन्दिरों को जा रहे हैं। स्त्री-स्वातन्त्रय का देश है; इसलिए, वहाँ के आनन्द-उत्सव में स्त्रियों की संख्या भी अधिक होती है। बूढ़ी, युवती, बालिका- सब उम्र की स्त्रियाँ अपूर्व पोशाक-परिच्छद में सज्जित होकर हँसती-बोलती-गाती सारे रास्ते को मुखरित करती हुई चली जा रही हैं। उनमें अधिकांश का रंग खूब गोरा है। मेघ की तरह घने बालों का बोझा सौ में से नब्बे स्त्रियों का घुटनों के नीचे तक लटकता है। जूड़े में फूल, कानों मे फूल और गले में फूलों की माला। घूँघट की झंझट नहीं, पुरुषों को देखकर तेजी से जाने की व्यग्रता से ठोकर खाकर गिरने का अन्देशा नहीं, दुविधा या लाज का लेश नहीं- मानो झरने के मुक्त प्रवाह के समान स्वच्छन्द बेरोक गति से बही जा रही हैं। पहली ही दृष्टि से एकदम मुग्ध हो गया। अपने यहाँ की तुलना में मन ही मन उनकी अशेष प्रशंसा करके बोला, यही तो होना चाहिए! इसके बिना जीवन ही क्या है! उनका सौभाग्य सहसा मानो ईर्ष्याि के समान मेरे हृदय में छिद गया। मैंने कहा, चारों दिशाओं में ये जिस आनन्द की सृष्टि करती जा रही हैं, वह क्या अवहेलना की वस्तु है? रमणियों को इतनी स्वाधीनता देकर इस देश के पुरुष क्या ठगे गये हैं? और, हम लोग क्या उनको नीचे से ऊपर तक जकड़ रखकर और उनके जीवन को लँगड़ा बनाकर लाभ में रहे हैं? हमारी स्त्रियाँ भी यदि किसी ऐसे ही दिन- एकाएक गोलमाल सुनकर मैंने लौटकर जो कुछ देखा वह आज भी मेरे मन पर साफ-साफ अंकित है। झगड़ा हो रहा था घोड़ा-गाड़ी के किराए के सम्बन्ध में। गाड़ीवान हमारे यहाँ का हिन्दुस्तानी मुसलमान था। वह कह रहा था कि आठ आने किराया तय हुआ है और तीन भले घर की बर्मी स्त्रियाँ गाड़ी पर से उतरकर एक साथ चिल्लादकर कह रही थीं कि नहीं, पाँच आना हुआ है। दो-तीन मिनट कहा-सुनी होने के बाद ही बस, 'बलं बलं बाहुबलं।' रास्ते के किनारे एक आदमी मोटे-मोटे गन्नों के टुकड़े करके बेच रहा था। अकस्मात् तीनों ने झपटकर उसके तीन टुकड़े उठा लिये और एक साथ गाड़ीवान पर आक्रमण कर दिया। ओह! वह कैसी बेधड़क मार थी। बेचारा स्त्रियों के शरीर पर हाथ भी नहीं लगा सकता था, आत्मरक्षा करने के लिए यदि एक को अटकाता था तो दूसरी की चोट सिर पर पड़ती, उसको अटकाता तो तीसरी की चोट आ पड़ती। चारों और लोग जमा हो गये- किन्तु केवल तमाशा देखने। उस अभागे का कहाँ गया टोपी-साफा और कहाँ गया हाथ का चाबुक! और अधिक न सह सकने के कारण आखिर वह मैदान छोड़कर 'पुलिस! पुलिस! सिपाही! सिपाही!' चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ।मैं हाल ही बंगाल से आ रहा था और सो भी देहात से। कलकत्ते में स्त्री-स्वाधीनता है- कानों से अवश्य सुनी है, पर ऑंखों नहीं देखी। किन्तु, क्या स्वाधीनता प्राप्त करके भले घर की 'अबलाएँ' भी एक जवान मर्द पर खुले आम सड़क पर आक्रमण करके लट्ठबाजी कर सकती हैं! क्रमश: उनके इतनी अधिक 'सबला' हो उठने की सम्भावना मेरी कल्पना के भी परे की वस्तु थी। बहुत देर तक हतबुद्धि की तरह खड़े रहने के बाद मैंने अपने कार्य के लिए प्रस्थान किया। मन ही मन कहने लगा कि स्त्री-स्वाधीनता भली है या बुरी, समाज के आनन्द की मात्रा इससे घटेगी या बढ़ेगी- यह विचार तो किसी और दिन करूँगा; किन्तु, आज अपनी ऑंखों जो कुछ देखा उससे तो मेरा सारा चित्त एकदम उद्भ्रान्त हो गया।♦♦ • ♦♦अभया और रोहिणी को उनके नये वास-स्थान में- नयी घर-गिरिस्ती में प्रतिष्ठित करके जिस दिन मैं अपने जिन के लिए आश्रय खोजने रंगून के राज-मार्ग पर निकल पड़ा, उस दिन यह मैं नहीं कहना चाहता कि उन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में मेरे मन में बिल्कुाल किसी तरह की ग्लानि छू भी नहीं गयी थी। किन्तु, इस अपवित्र विचार को दूर करने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। क्योंकि, दो खास उम्र के स्त्री-पुरुषों को किसी खास अवस्था में देखने-मात्र से ही उनके बीच में किसी सम्बन्ध-विशेष की कल्पना कर लेना कितनी भारी भ्रान्ति है, यह शिक्षा मुझे पहले ही मिल चुकी थी। और भविष्यत् की जटिल समस्या को भी भविष्यत् के ही हाथ सौंप देने में मुझे किसी तरह की हिचक नहीं होती, इसलिए, केवल अपना ही भार अपने कन्धों पर लादकर उस दिन प्रभात के समय उनके नये वास-स्थान से बाहर निकला।आजकल की तरह उस समय किसी भी नये बंगाली के बर्मा में कदम रखते ही पुलिस के प्रकट और अप्रकट कर्मचारियों का दल उनसे सवाल पर सवाल करके, उन पर व्यंग्य कसके और अपमान करके तथा बिना कसूर थाने में खींच ले जाकर और डर दिखाकर हद दर्जे की तकलीफ नहीं देता था। मन में किसी तरह का पाप न हो, तो उन दिनों प्रत्येक परिचित-अपरिचित को निर्भयता से घूमने-फिरने का अधिकार था और आजकल की तरह अपने आपको निर्दोष प्रमाणित करने का अत्यन्त गुरु भार भी नवागत बंगवासी के कन्धों पर नहीं लादा गया था। इसलिए, मुझे खूब याद है कि स्वच्छन्द चित्त से किसी आश्रय-स्थान की खोज में उस दिन सुबह से दोपहर तक राह-राह खूब घूमता फिरा। राह में एक बंगाली से भेंट हुई। वह मजदूर के सिर पर तरकारी का बोझा लिये हुए पसीना पोंछते-पोंछते तेज़ी से चला जा रहा था; मैंने पूछा, “महाशय, नन्द मिस्री का घर कहाँ है, क्या आप बतला सकते हैं?”वह आदमी रुककर खड़ा हो गया, “कौन नन्द? क्या आप रिबिट-घर के नन्द पागडी को खोज रहे हैं?”मैंने कहा, “सो तो जानता नहीं महाशय, कि वे किस घर के हैं। उन्होंने केवल यही परिचय दिया था कि वे रंगून के विख्यात नन्द मिस्री हैं।” उस आदमी ने एक प्रकार का असम्मान-सूचक मुँह का भाव बनाकर कहा, “ओ:-मिस्तरी! ऐसे तो सभी अपने को मिस्तरी कहलवाते हैं महाशय, पर मिस्तरी होना सहज नहीं है। मर्कट साहब ने जब मुझसे कहा था कि हरिपद, तुमको छोड़कर मिस्तरी होने लायक आदमी मुझे और कोई नहीं दीख पड़ता, तब क्या आप जानते हैं कि बड़े साहब के समीप कितनी अनिश्चित अर्जियाँ पड़ी हुई थीं? करीब एक सौ के। आरी और बसूले का जोर हो, तो अर्जियों की जरूरत ही क्या है? काटकर जो जोड़ दे सकता हूँ! किन्तु महाशय, आप जानते हैं...”मैंने देखा, अनजान में ही मैंने इस आदमी के ऐसी जगह पर चोट पहुँचा दी है जिसकी मीमांसा होना कठिन है। इसलिए, चट से मैंने रुकावट डालकर कहा, “फिर, नन्द नाम के किसी भी आदमी को आप नहीं जानते?”“यह आपने खूब कहा! चालीस वर्ष से रंगून में रह रहा हूँ, मैं जानता किसे नहीं? नन्द क्या एक है? तीन-तीन नन्द हैं! आपने नन्द मिस्तरी कहा न? कहाँ से आ रहे हैं आप? शायद बंगाल से, न? ओह, तब कहो न कि टगर के मर्द को पूछ रहे हैं?”मैंने सिर हिलाकर कहा, “हाँ, हाँ, जरूर वही!”वह बोला, “तो फिर यह कहिए। परिचय पाए बगैर पहिचानूँ कैसे? आइए मेरे साथ तकदीर के जोर से नन्द कमा खा रहा है महाशय, नहीं तो नन्द पागड़ी भी क्या कोई मिस्तरी है? महाशय, आप कौन हैं?”यह सुनकर कि मैं ब्राह्मण हूँ, उस आदमी ने रास्ते पर ही झुककर मुझे प्रणाम किया। बोला, “वह आपकी नौकरी लगा देगा? साहब से कहकर आपकी तजबीज लगवा सकता है जरूर; किन्तु, दो महीने की तनख्वाह उसे पहले ही घूँस में देनी होगी। दे सकेंगे क्या? दे सकें तो अठारह-बीस आने रोज की नौकरी लगा सकता है। इससे अधिक की नहीं।”मैंने उसे बताया कि फिलहाल तो मैं नौकरी की उम्मेदवारी में नहीं जा रहा हूँ- थोड़े से आश्रय की तजवीज की गरज से ही बाहर निकला हूँ, और, इसकी आशा नन्द मिस्री ने जहाज पर दिलाई थी।यह सुनकर हरिपद मिस्री ने आश्चर्य से पूछा, “महाशय, आप भले आदमी हैं, तो फिर, भले आदमियों के 'मेस' में क्यों नहीं जाते?” मैंने कहा, “मेस कहाँ है, सो तो जानता ही नहीं।”उसे भी नहीं मालूम, यह उसने स्वीकार किया। किन्तु, उस जून खोज करके बताने की आशा देकर वह बोला, “किन्तु, इस समय तो नन्द से मुलाकात हो न सकेगी; वह काम पर गया है, टगर साँकल दिए सो रही है और पुकार कर उसकी नींद भंग करने में खैर नहीं!”यह तो खूब जानता था। इसलिए रास्ते के बीच मुझे वहाँ करते देखकर उसने हिम्मत देकर कहा, “न गये वहाँ तो क्या! दादा ठाकुर का बढ़िया होटल सामने ही है। वहाँ स्नान-भोजन करके नींद ले लीजिए, उस बेला फिर देखा जायेगा।”हरिपद के साथ बातें करते-करते जब मैं दादा ठाकुर के होटल में पहुँचा तब होटल के डायनिंग रूम में (=भोजन के कमरे में) करीब पन्द्रह आदमी भोजन करने बैठे थे।अंगरेजी में दरो शब्द हैं 'इन्स्टिक्ट' और “प्रेज्युडिस', किन्तु, हमारे यहाँ, केवल एक ही शब्द है 'संस्कार'। यह समझना कठिन नहीं है कि एक जो है सो दूसरा नहीं। अर्थात् दोनों शब्द अंगरेजी में भिन्न-भिन्न भाववाची हैं। किन्तु दादा ठाकुर के उक्त होटल के सम्पर्क में आकर यह बात आज पहले ही पहल मुझे मालूम हुई कि हम लोगों का जाति-भेद, खान-पान आदि वस्तुएँ 'इन्स्टिक्ट' के हिसाब से 'संस्कार' नहीं है, और यदि ये 'संस्कार' हों भी तो कितने तुच्छ हैं- इनके बन्धन से मुक्त होना कितना सहज है, यह सब प्रत्यक्ष देखकर मैं आश्चर्य से चकित हो गया। हमारे देश में यह जो असंख्य जाति-भेद की श्रृंखला है, इसे दोनों पैरों में पहिनकर झनझनाते हुए विचरण करने में कितना गौरव और मंगल है, इसकी आलोचना तो इस समय रहने दूँगा; किन्तु यह बात मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ कि जो लोग इसे अपने छोटे-छोटे-से गाँवों में बिल्कुनल बेखटके जमे हुए पुरखों से चला आता हुआ संस्कार बताकर स्थिर रखे हुए हैं, और इसके शासन-जाल को तोड़ने की दुरूहता के सम्बन्ध में जिन्हें लेशमात्र भी अविश्वास नहीं है, उन लोगों ने इस बड़े भारी भ्रम को जान-बूझकर ही पाल रक्खा है। वास्तव में जिस देश में खाने-पीने में छुआछूत का विचार प्रचलित नहीं है उस देश में कदम रखते ही यह अच्छी तरह देखा जाता है कि यह छप्पन पुश्तों की खाने-पीने में छुआछूत रखने की सांकल न जाने कैसे रातों-रात खुलकर अलग हो जाती है। विलायत जाने से जाति चली जाती है इसका एक मुख्य कारण यह बतलाया जाता है कि वहाँ निषिद्ध माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस नहीं खाते, उनकी भी चली जाती है; कारण, जिन्होंने जाति मारने का इजारा ले रखा है वे पंच लोग कहते हैं कि वहाँ मांस न खाने पर भी समझ लेना चाहिए कि 'खाया ही है'।और उनका यह कहना निहायत गलत भी नहीं है। बर्मा तो तीन-चार दिन का ही रास्ता है; फिर भी मैंने देखा है कि पन्द्रह आने बंगाली भले आदमी जिनमें शायद ब्राह्मण ही अधिक होंगे- क्योंकि इस युग में उन्हीं के लोभ ने सबको मात कर दिया है- जहाज के होटल में ही सस्ते दामों में पेट भर लेते हैं तब कहीं सूखी जमीन पर पदार्पण करते हैं। उस होटल में मुसलमान और गोआनीज बावर्ची क्या राँधकर 'सर्व' करते हैं, यह सवाल अप्रिय हो सकता है; किन्तु, वे लोग हविष्यान्न पकाकर केले के पत्तों में नहीं परोसते होंगे, यह अनुमान करना तो भाटपाड़े के भट्टाचार्यों के लिए भी शायद कठिन नहीं है- फिर मैं तो ठहरा साथ का मुसाफिर। जो लोग कम से कम यह सब नहीं खाना चाहते वे भी हार मानकर अन्त में चाह-रोटी, फल फूलादि तो खाते ही हैं! मैंने देखा है कि एकदम निषिद्ध मांस से लेकर मत्तमान और रम्भा (केले की दो जातियाँ) तक सब कुछ एक में ही गड्डमड्ड करके जहाज के कोल्ड-रूम में रक्खा जाता है और यह काम किसी की नजर से छुपाकर करने की पद्धति भी मैंने जहाज के नियम-कानूनों में नहीं देखी। हाँ, फिर भी, आराम की बात यह है कि बर्मा- जाने वाले यात्री की जाति जाने का कानून, शायद, किसी तरह शास्त्रकारों की 'सिविल कोड' की नजर बचा गया है। नहीं तो शायद फिर एक छोटी-मोटी ब्राह्मण-सभा की जरूरत होती! जाने दो, भले लोगों की बात आज यहीं तक रहे।होटल में जो लोग पंक्तिबद्ध होकर भोजन करने बैठे थे वे भले आदमी नहीं थे- कम से कम हम लोग उन्हें 'भला' नहीं मानते। सब लोग कारीगर थे, साढ़े दस बजे की छुट्टी में भोजन करने आए थे। शहर के इस हिस्से में एक बड़ा मैदान है जिसके तीन तरफ नाना आकार और प्रकार के कारखाने हैं, और इस बस्ती के बीच एक तरफ को दादा ठाकुर का यह होटल है। एक विचित्र बस्ती है। एक कतार में, एक से एक सटी हुई, जीर्ण काठ की छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी हुई हैं। इनमें चीनी, बर्मी, मद्रासी, उड़िया, तैलंगी, चटगाँव के हिन्दू और मुसलमान आदि सभी रहते हैं; और, रहते हैं हमारी जाति के बंगाली भी। इनके समीप मैंने पहले ही पहल यह सीखा है कि किसी को भी छोटी जाति का कहकर घृणा करके उसे दूर रखने की बुरी आदत का परित्याग करना कोई बड़ा कठिन काम नहीं है। जो नहीं करते वे अशक्यता के कारण न करते हों सो बात नहीं है; किन्तु, जिस कारण वे नहीं करते उसे प्रकाशित कर देने से झगड़ा बढ़ खड़ा होगा।दादा ठाकुर ने आकर यत्नपूर्वक मेरा स्वागत किया और एक छोटा-सा कमरा दिखाकर कहा, “जितने दिन आपकी इच्छा हो इस कमरे में रहें और हमारे यहाँ भोजन करें। नौकरी-चाकरी लगने की बाद दाम चुका देना।”मैंने कहा, “मुझे तो आप पहिचानते नहीं हैं, एक महीने रहकर और खा-पीकर बिना दाम दिये भी तो चला जा सकता हूँ।”दादा ठाकुर ने अपना कपाल दिखाते हुए हँसकर कहा, “इसे तो आप साथ में ले नहीं जा सकते महाशय!”मैंने कहा, “जी नहीं, उस पर मुझे जरा भी लोभ नहीं है।”दादा ठाकुर सिर हिलाते-हिलाते इस दफे परम गम्भीर भाव बनाकर बोले, “देखिए, तकदीर भी है महाशय! इसके सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं, यही मैं सब लोगों से कहा करता हूँ।”वास्तव में केवल उनका जबानी जमाखर्च नहीं था। इस सत्य पर वे स्वयं किस कदर अकपट रूप से विश्वास करते थे यह हाथों-हाथ प्रमाणित करने के लिए चार-पाँच महीने के बाद, एक दिन वे प्रात:काल बहुतों की धरोहर-रुपये-पैसे अंगूठी, घड़ी इत्यादि साथ लेकर केवल उनके निराट कपालों को बर्मा में उस शून्य होटल के भेज पर जोर से पटकने के लिए छोड़कर अपने देश चले गये।जो भी हो, उस समय दादा ठाकुर की बात सुनने में बुरी नहीं लगी और मैं भी उनका एक नया मुवक्किल बनकर एक टूटा-सा कमरा दखल करके बैठ गया। रात को एक कच्ची उम्र की बंगालिन दासी मेरे कमरे में आसन बिछाकर भोजन के लिए जगह करने आई; पास में ही डायनिंग रूम में से लोगों के भोजन का शोर सुनाई दे रहा था। मैंने पूछा, “मुझे भी वहाँ ही न कराके यहाँ भोजन कराने क्यों लाई?”वह बोली, “वे लोग तो हल के दर्जे के लोहा काटने-पीटनेवाले मजदूर हैं बाबू, उनके साथ आपको कैसे खिलाया जा सकता है?”अर्थात् वे थे 'वर्कमेन' और मैं था 'भला आदमी'। मैंने हँसकर कहा, “मुझे भी यहाँ क्या-क्या काटना-पीटना पड़ेगा सो तो अब भी निश्चित नहीं हुआ है। जो भी हो, आज खिलाती हो तो खिला जाओ, किन्तु, कल से मुझे भी उन्हीं के साथ उसी कमरे में खिलाना।”दासी बोली, “आप बाम्हन हैं, आपको वहाँ खाने की जरूरत नहीं।”“क्यों? वे सब बंगाली तो हैं?”दासी ने गले को जरा धीमा करके कहा, “बंगाली जरूर हैं, किन्तु उनमें एक डोम भी है।”डोम! देश में यह जाति अस्पृश्य-अछूत है। छू जाने पर स्नान करना 'कम्पलसरी' (=अनिवार्य) है या नहीं सो तो नहीं मालूम; किन्तु यह जानता हूँ कि कपड़े बदलकर गंगाजल सिर पर छिड़कना पड़ता है। अत्यन्त अचरज से मैंने पूछा, “और सब?”दासी बोली, “और सब अच्छी जाति के हैं। कायथ हैं, कैवर्त (=केवट) हैं, अहीर हैं, लुहार...”“ये लोग कोई आपत्ति नहीं करते?”दासी अब कुछ हँसकर बोली, “इस पर देश में सात समुन्दर पार आकर क्या इतनी बमहनयी चल सकती है बाबू? वे कहते हैं, देश लौटकर गंगा-स्नान करके एक अंग-प्रायश्चित कर लेंगे।भले ही कर लें किन्तु, मुझे मालूम है कि जो दो-चार आदमी बीच-बीच में देश जाते हैं वे चलते-चलाते कलकत्ते की गंगा में एकाध दफे गंगा-स्नान तो शायद कर लेते हों; किन्तु, अंग-प्रायश्चित कभी कोई नहीं करता। परदेश की आब-हवा के प्रभाव से ये लोग उस पर विश्वास नहीं रखते।देखा कि होटल में सिर्फ दो हुक्के हैं। एक तो ब्राह्मणों के लिए, दूसरा जो ब्राह्मण नहीं हैं उनके लिए। भोजनादि के बाद कैवर्त के हाथ से डोम और डोम के हाथ से लुहार महाशय ने हाथ बढ़ाकर हुक्का ग्रहण किया और स्वच्छन्दता से पिया। दुविधा का लेश भी नहीं। दो दिन बाद उस लुहार के साथ बातचीत करते हुए मैंने पूछा, “अच्छा, इस तरह तुम्हारी जाति नहीं जाती?”लुहार बोला, “जाती क्यों नहीं महाशय, जाती तो है ही!”“तब?”“उसने पहिले डोम कहकर अपना परिचय थोड़े ही दिया था; कहा था कि मैं कैवर्त हूँ। इसके बाद ही सब मालूम पड़ा।”“तब तुम लोगों ने कुछ नहीं कहा?”“कहते और क्या महाशय, काम तो बहुत ही बुरा हुआ, यह तो मंजूर करना ही पड़ता है। लेकिन कहीं उसे शर्मिन्दगी न उठानी पड़े, यह सोचकर सबने जान-बूझकर मामले को दबा दिया।”“किन्तु देश में होते तो क्या होता?”वह आदमी जैसे सिहर उठा। बोला, “तो, क्या फिर किसी की रक्षा हो सकती थी?” इसके बाद जरा-सा चुप रहकर वह खुद ही बोलने लगा, “किन्तु आप जानते हैं बाबू मैं ब्राह्मनों की बात नहीं कहता- वे ठहरे वर्णों के गुरु, उनकी बात ही अलहदा है। नहीं तो, बाकी और सब जात समान हैं। चाहे तेली, माली, तमोली, अहीर, नाई, बढ़ई, लुहार, कुम्हार और गंधी इन नौ शाखाओं के हिन्दू हों, चाहे हाड़ी-डोम आदि हों- किसी के शरीर पर कुछ लिखा तो है नहीं; सभी भगवान के बनाए हैं, सब एक हैं, सभी पेट की ज्वाला से जलकर परदेश में आए हैं और लोहा पीट रहे हैं। और सोचिए तो बाबू, हरि मोडल डोम है तो क्या हुआ? शराब पीता नहीं, गाँजा छूता नहीं- आचार-विचार को देखकर कौन कह सकता है कि वह अच्छी जात का नहीं है- डोम का लड़का है! और लक्ष्मण- वह तो भले कायथ का लड़का है, पर उसके आचार-विचार को देखो न एक बार, बच्चू दो-दो बार जेल जाते-जाते बचे हैं। हम सब नहीं होते तो अब तक जेल में पड़े-पड़े मेहतर के हाथ की रोटियाँ खाते होते।”न तो मुझे लक्ष्मण के सम्बन्ध में ही किसी तरह का कुतूहल हुआ और न हरि मोडल ने अपने डोमत्व को छिपाकर कितना बड़ा अन्याय किया इसकी मीमांसा करने की ही मेरी प्रवृत्ति हुई। मैं सिर्फ यही सोचने लगा कि जिस देश में भले आदमी तक जासूस लगाकर अपने जन्म के पड़ोसी के छिद्र ढूँढ़कर और उसके पितृ-श्राद्ध को बिगाड़कर आत्म-तुष्टि लाभ करते हैं, उसी देश के अक्षिक्षित, नीच जातीय होने पर भी इन लोगों ने एक अपरिचित बंगाली का इतना बड़ा भयंकर अपराध भी माफ कर दिया! और- केवल इतना ही नहीं, पीछे से इस परदेश में कहीं उसे लज्जित और दीन होकर न रहना पड़े, इस आशंका से उस प्रसंग को उठाया तक नहीं! यह सब असम्भव कार्य किस तरह सम्भव हुआ, विदेशी आदमी भले ही न समझ सकें, परन्तु, हम तो समझ सकते हैं कि हृदय की कितनी विशालता और मन की कितनी बड़ी उदारता इसके लिए आवश्यक है! यह केवल उनके देश छोड़कर विदेश आने का फल है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। खयाल हुआ कि इसी शिक्षा की हमारे देश को इस समय सबसे अधिक जरूरत है। सारी जिन्दगी अपने छोटे से गाँव में ही बैठकर बिता देने से बढ़कर मनुष्यों को सब विषयों में छोटा, संकुचित कर देने वाला बड़ा शत्रु और कोई नहीं है। खैर, जाने दो इस बात को।इन लोगों के साथ मैं बहुत दिनों तक रहा। किन्तु जब तक उन्हें यह न मालूम हुआ कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, केवल तब तक ही मुझे इनके साथ घनिष्ठता से मिलने-जुलने का सुयोग मिलता रहा- उनके सब तरह के सुख-दु:खों में मैं भी हिस्सेदार बनता रहा, किन्तु जिस क्षण ही उन्हें मालूम हुआ कि मैं भला आदमी हूँ और मुझे अंगरेजी आती है, उसी क्षण से उन्होंने मुझे गैर समझना शुरू कर दिया। अंगरेजी जानने वाले शिक्षित भले आदमियों के समीप ये लोग आपद्-विपद् के समय जाते जरूर हैं, उनसे सलाह-मशविरा भी करते हैं- यह भी सच है, परन्तु, ये लोग न तो उन पर विश्वास ही करते हैं और न उन्हें अपना आदमी ही समझते हैं। देश के इस कुसंस्कार को वे आज भी दूर नहीं कर पाए हैं कि मैं उन्हें छोटा समझकर मन ही मन घृणा नहीं करता हैं,- पीछे-पीछे उनका उपहास नहीं करता हूँ। केवल इसी कारण मेरे कितने सत्संकल्प इन लोगों के बीच विफल हो गये हैं। मैं समझता हूँ, उनकी कोई सीमा नहीं। किन्तु खैर, आज इस बात को जाने दो।मैंने देखा कि बंगाली स्त्रियों की संख्या भी इस ओर कुछ कम नहीं है। यद्यपि उनके कुलों का परिचय न देना ही अच्छा है; किन्तु, आज वे किसी और दूसरे ही रूप में परिवर्तित होकर एकदम शुद्ध गृहस्थों की धर्मपत्नियाँ बन गयी हैं। पुरुषों के मनों में तो शायद आज भी 'जाति' की पुरानी स्मृति बाकी बनी हुई है। किन्तु, स्त्रियाँ तो न कभी देश आती हैं और न देश के साथ कोई सम्पर्क ही रखती हैं। उनके बच्चे-बच्चियों से पूछा जाय तो वे यही कहते हैं कि “हम बंगाली हैं'- अर्थात् मुसलमान, क्रिस्तान, बर्मी आदि नहीं हैं- बंगाली हिन्दू हैं। आपस में विवाहादि, आदान-प्रदान, स्वच्छन्दता से होता है- केवल 'बंगाली' होना ही यथेष्ट है, और चटगाँव के किसी बंगाली ब्राह्मण द्वारा मन्त्र पढ़ाकर दोनों के हाथ मिलाकर एक कर दिया जाना ही बस है। विधवा हो जाने पर विधवा-विवाह का रिवाज नहीं है- सो शायद इसलिए कि पुरोहित मन्त्र पढ़ने को राजी नहीं होता। परन्तु वैधव्य भी ये पसन्द नहीं करतीं और फिर एक नयी गृहस्थी बना लेती हैं। उनके लड़के-बच्चे होते हैं और वे भी कहते हैं कि 'हम बंगाली हैं', तथा उनके विवाह में वही पुरोहित आकर वैदिक मन्त्र पढ़ाकर विवाह करा जाते हैं- इस दफे उन्हें तिल-भर भी आपत्ति नहीं होती। पति के द्वारा अत्यन्त दु:ख-यन्त्रणा पाने पर ये दूसरे का आश्रय भी ग्रहण करती हैं जरूर, किन्तु, यह अत्यन्त लज्जा की बात समझी जाती है और इसके लिए दु:ख-यन्त्रणा का परिमाण भी अत्यधिक होना चाहिए। परन्तु फिर भी, ये वास्तव में हिन्दू हैं और दुर्गा-पूजा से शुरू करके षष्टी महाकाली आदि कोई भी पूजा नहीं छोड़तीं।

❤️,श्रीकांत"❤️
    अध्याय 6

उस दिन फिर मेरा जी न चाहा कि नीचे जाऊँ, इसलिए, नन्द और टगर के युद्ध का अन्त किस तरह हुआ- सन्धि-पत्र में कौन-कौन-सी शर्तें निश्चित हुईं, सो मैं कुछ नहीं जान पाया। परन्तु, बाद में देखा कि शर्तें चाहे जो हों, विपत्ति के समय वह 'स्कैप ऑफ पेपर' (कागज का रद्दी टुकड़ा) किसी काम नहीं आता। जब जिसे जरूरत होती है, खिलवाड़ की तरह उसे फाड़ फेंकता है और दूसरे का ब्यूह भेद कर डालता है। बीस बरस से ये दोनों यही करते आए हैं तथा और भी बीस बरस तक ऐसा न करते रहेंगे, इसकी शपथ स्वयं विधाता भी नहीं ले सकेंगे।

सारे दिन तो आकाश में बादलों के टुकड़े यहाँ से वहाँ घूमते रहे; परन्तु, अब शाम के लगभग एक गहरा काला बादल सारे क्षितिज को ढँककर धीरे-धीरे सिर उठाकर, ऊपर आने लगा। मालूम हुआ कि खलासियों के मुँह और ऑंखों पर मानो घबराहट की छाया आ पड़ी है। उनके चलने-फिरने में भी मानो एक प्रकार के घबराहट के चिह्न नजर आने लगे हैं जो इसके पहले नहीं थे।

एक बूढ़े-से खलासी को बुलाकर पूछा, “अजी चौधरी, आज रात को भी क्या कल ही के समान ऑंधी आवेगी?”

विनय से चौधरीजी वश में हो गये। खड़े होकर बोले, “मालिक, नीचे चले जाइए; कप्तान ने कहा है, साइक्लोन (= बण्ण्डर) उठ सकता है।”

पन्द्रह मिनट बाद ही देखा कि उसका कथन निर्मल नहीं है। ऊपर जितने भी यात्री थे उन सबको खलासी लोग एक तरह से जबरन 'होल्डर' में उतारने लगे। दो-चार लोगों के आपत्ति करने पर सेकण्ड ऑफिसर ने खुद आकर उन्हें धक्के मारकर उठा दिया और उनके बिस्तर वगैरह लातों से हटाना शुरू कर दिया। मेरा ट्रंक, बिस्तर आदि तो खलासी लोग झटपट नीचे उठा ले गये; किन्तु, मैं खुद एक तरफ खिसक गया। मैंने सुना कि सबको- अर्थात् जो हतभागे दस रुपये से अधिक किराया नहीं दे सकते थे उन्हें- उस जहाज के गर्भ-गृह में भर के उसका मुँह बन्द कर दिया जायेगा। उनकी खैरियत के लिए यही एक उपाय था।

किन्तु, मुझे खुद अपने लिए खैरियत की यह व्यवस्था किसी तरह पसन्द नहीं आई। इसके पहले साइक्लोन नामक वस्तु को समुद्र में तो क्या, जमीन पर भी नहीं देखा था। कैसा इसका उपद्रव होता है, कैसा इसका स्वरूप है और अमंगल करने की कितनी इसकी शक्ति है, मैं बिल्कुहल नहीं जानता था। मन ही मन सोचने लगा कि मेरे भाग्य से यदि ऐसी वस्तु का आविर्भाव होना सन्निकट ही है, तो फिर उसे बगैर अच्छी तरह देखे नहीं छोडूँगा। भाग्य में जो बदा हो सो हो। और तूफान में यदि जहाज डूबना ही है, तो इस तरह प्लेग के चूहे की तरह पिंजरे में कैद होकर और सिर पटक-पटककर खारे पानी में क्यों मरूँ? इसकी अपेक्षा जब तक बने, हाथ-पाँव हिलाकर, लहरों के हिंडोले पर झूलते-उतराते हुए एक गोता लगाकर पाताल के राजमहल का अतिथि होना अच्छा। किन्तु, यह उस समय मुझे मालूम न था कि राजा का जहाज आगे-पीछे लाखों-करोड़ों हिंस्र अनुचरों के बगैर काले पानी में एक डग भी नहीं चलता और उन्हें लोगों का कलेवा कर डालने में घड़ी-भर की देर नहीं लगती।

बहुत समय से थोड़ी-थोड़ी वृष्टि हो रही थी। शाम के लगभग हवा और वृष्टि दोनों का ही वेग बढ़ गया। यह हालत हो गयी कि भाग निकलने की भी कोई जुगत न रही। जहाँ भी मिले सुविधानुसार एक आश्रय-स्थान खोजे बगैरे काम नहीं चल सकता। शाम के अंधेरे में जब मैं अपने स्थान पर वापिस आया तब ऊपर का डेक निर्जन हो गया था। मस्तूल के पास उचककर देखा कि ठीक सामने ही बूढ़ा कप्तान हाथ में दूरबीन लिये ब्रिज के ऊपर यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। इस डर से कि एकाएक उसकी शुभ दृष्टि में पड़कर फिर से, इतने कष्ट के बाद भी, दुबारा उसी गव् में न घुसना पड़े, एक ऐसी जगह खोजने लगा जहाँ सुभीते से बैठ सकूँ। खोजते-खोजते आखिर एक जगह मिल गयी जिसकी कि मैंने पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक किनारे बहुत-सी भेड़ों, मुर्गियों और बत्तखों के पिंजड़े एक के ऊपर एक गँजे हुए थे। उछलकर मंब उन्हीं के ऊपर बैठ गया। जान पड़ा, ऐसी निरापद जगह शायद जहाज भर में और कहीं नहीं है। किन्तु, तब भी बहुत-सी बातें जानना बाकी थीं।

वृष्टि, हवा अन्धकार और जहाज का झूलना- ये सभी धीरे-धीरे अधिकाधिक बढ़ने लगे। समुद्र की लहरों का आकार देखकर मैंने मन ही मन सोचा, यही है शायद वह साइक्लोन; किन्तु वह सागर के समीप सिर्फ गौ के खुर के गढ़े के समान ही था, इस बात को अच्छी तरह हृदयंगम करने के लिए मुझे और भी थोड़ी देर ठहरना पड़ा।

एकाएक छाती के भीतर तक कँपकँपी पैदा करता हुआ जहाज का भोंपू बज उठा। ऊपर की ओर ताका तो जान पड़ा, मानो किसी मन्त्र के बल से आकाश का चेहरा ही बदल गया है। वे बादल अब नहीं रहे- मालूम हुआ कि सब तरफ से छिन्न-भिन्न होकर जैसे सम्पूर्ण आकाश हलका होकर कहीं ऊपर की ओर उड़ा जा रहा है। दूसरे ही क्षण समुद्र के एक प्रान्त से एक ऐसा विकट शब्द तेजी से आकर कानों में पैठ गया कि मैं नहीं जानता, उसकी किसके साथ तुलना करूँ।

लकड़पन में अंधेरी रातों में दादी की छाती से लगकर एक कहानी सुना करता था। किसी राजपुत्र ने डुबकी लगाकर तालाब के भीतर से एक चाँदी की डिबिया निकाली थी और उसमें बन्द सात सौ राक्षसियों के प्राणरूप एक सोने के भौंरे को चुटकी से मसलकर मार डाला था। फिर वे सात-सौ राक्षसियाँ मृत्यु यन्त्रणा से चीखती चिल्लाती हुईं सारी पृथ्वी को पैरों के बोझ-से कुचलतीं चूर्ण-विचूर्ण करतीं दौड़ आई थीं। वैसा ही यह भी कहीं कोई विप्ल्व-सा हो रहा है, ऐसा जान पड़ा; परन्तु, इस दफे सात सौ करोड़ राक्षसियाँ हैं- वे उन्मत्त भाव से कोलाहल करती हुई इसी ओर दौड़ी आ रही हैं। आ भी पड़ीं- राक्षसियाँ नहीं, परन्तु, तूफानी हवाएँ। तब मैंने सोचा कि इनकी अपेक्षा तो उन राक्षसियों का आना ही कहीं अच्छा था।

इस दुर्जेय वायु की शक्ति का वर्णन करना तो बहुत दूर की बात है, समग्र चेतना से अनुभव करना भी मानो मनुष्य के सामर्थ्य के बाहर है। सम्पूर्ण ज्ञान-बुद्धि को लुप्त करके केवल एक ही धारणा मेरे मन के भीतर अस्पष्ट और निस्संदिग्ध रूप से जागती रह गयी, कि दुनिया की मियाद एकबारगी खत्म होने में अब और कितनी-सी देर है। पास में ही जो एक लोहे का खूँटा था, गले की चादर से मैंने अपने आपको उसी से बाँध रक्खा था। प्रत्येक क्षण मेरे मन में यही खयाल उठने लगा कि बस मुझे यह हवा इस दफे ही खूँटे से छुड़ा देगी और उड़ा ले जाकर समुद्र में जा पटकेगी।

एकाएक जान बड़ा कि काला पानी मानो भीतर के धक्कों से घरघराता हुआ क्रम-क्रम से जहाज के ऊपर चढ़ रहा है। दूर को ऑंख उठाई तो उस तरफ से दृष्टि को पुन: वापस न लौटा सका। एक दफे जान पड़ा वह तो कोई पड़ाव है, किन्तु दूसरे ही क्षण जब भ्रम भंग हुआ तब हाथ जोड़कर मैंने कहा, “भगवान, जैसे तुमने ये दोनों नेत्र दिए थे, वैसे ही आज इन्हें सार्थक भी कर दिया। इतने दिनों तक तो संसार में सर्वत्र ही ऑंखें खोले घूमता फिरा हूँ। किन्तु, तुम्हारी इस सृष्टि की तुलना तो कहीं भी नहीं देखी थी। जहाँ तक दृष्टि पहुँचती है एक अचिन्तनीय विराट्काय महातरंग सिर पर चाँदी-सा शुभ्र किरीट धारण किये तेज चाल से आगे बढ़ती हुई आ रही है। जगत में और भी क्या कोई इतना बड़ा विस्मय है?”

समुद्र में न जाने कितने लोग आया-जाया करते हैं; मैं खुद भी तो कितनी ही दफे इस रास्ते गया-आया हूँ; किन्तु ऐसा दृश्य तो पहले कभी कहीं नहीं देखा था। इसके सिवाय, जिस मनुष्य ने ऑंखों नहीं देखा, उसे समझाकर यह बताना कल्पना के बाप के लिए भी सम्भव नहीं कि पानी की लहर किसी तरह इतनी बड़ी हो सकती है!

मन ही मन बोला, हे तरंग-सम्राट! तुम्हारी टक्कर से हमारा जो कुछ होगा, उसे तो हम जानते ही हैं, किन्तु, अब भी तो तुम्हें यहाँ तक आ पहुँचने में आखिर आधा मिनट की देर है, तब कम से कम उतने समय तक तो मैं अच्छी तरह जी-भरकर तुम्हारे कलेवर को देख लूँ।

यह भाव किसी वस्तु की सुविपुल ऊँचाई और उससे भी अधिक विस्तार देखकर ही इस तरह मन में उत्पन्न नहीं हुआ करता, क्योंकि यदि ऐसा हो तो इसके लिए हिमालय का कोई भी अंग-प्रत्यंग यथेष्ट है। किन्तु, जो यह विराट व्यापार सजीव के समान दौड़ा आ रहा है, उसकी अपरिमेय शक्ति की अनुभूति ने ही मुझे अभिभूत कर डाला।

किन्तु, समुद्र-जल के टकराने से जो एक तरह की ज्वाला सी बार-बार चमक उठती है वह ज्वाला विचित्र रेखाओं में यदि इसके सिर पर न खेलती होती तो गम्भीर कृष्ण जल-राशि की विपुलता को मैं इस अन्धकार में शायद उस तरह न देख पाता। इस समय जितनी भी दूर तक मेरी दृष्टि जाती है उतनी ही दूर तक इस आलोक-माला ने मानो छोटे-छोटे प्रदीपों को जलाकर इस भयंकर सौन्दर्य का चेहरा मेरी ऑंखों के सामने खोल दिया है।

जहाज का भोंपू असीम वायु-वेग से थरथर काँपता हुआ लगातार बजने लगा और भयार्त्त खलासियों का दल अल्लाह के कानों तक अपना आकुल आवेदन पहुँचा देने के लिए गला फाड़-फाड़कर एक साथ चिल्लाने लगा।

जिसके शुभागमन के निमित्त इतना भय, इतनी चीख-पुकार- इतना उद्योग-आयोजन हो रहा था, वह महातरंग आखिर आ पहुँची। एक प्रकाण्ड प्रकार की उलट-पलट के बीच हरवल्लभ के समान मुझे भी पहले जान पड़ा कि निश्चय से ही हम डूब गये हैं; इसलिए, दुर्गा का नाम जपने से अब और क्या हो सकता है। आस-पास ऊपर-नीचे, चारों ओर काला जल ही जल है! जहाज समेत सब लोग पाताल के राजमहल में निमन्त्रण खाने जा रहे हैं, इसमें अब कोई सन्देह नहीं रहा। इस समय चिन्ता केवल यही है कि खाना-पीना आदि वहाँ न जाने किस किस्म का होगा।

किन्तु, करीब मिनट-भर बाद ही दिखाई दिया-नहीं, डूबे नहीं हैं, जहाज समेत हम सब केवल जल के ऊपर उतरा रहे हैं। इसके सिवाय लहर के ऊपर लहर आना भी खत्म नहीं हुआ है, इसलिए हम लोगों का हिंडोला झूलना भी समाप्त नहीं हुआ है। इतनी देर के बाद अब पता लगा कि क्यों कप्तान-साहब ने लोगों को जानवरों के समान गढ़े में डालकर ताला लगवा दिया है। डेक के ऊपर से बीच-बीच में मानो जल की धारा बह जाने लगी। मेरे नीचे की बत्तखें और मुर्गियाँ कितनी ही दफे फड़फड़ाकर और भेड़ें कई बार 'मैं-मैं' करके भव-लीला समाप्त कर गयीं। सिर्फ मैं ही उनके ऊपर आश्रय ग्रहण किये, लोहे के ख्रुंटे को जोर से पकड़े हुए, अपनी भव-लीला सुरक्षित बनाए रहा।

किन्तु, इसी समय एक और प्रकार की आफत आ जुटी। केवल जल के छींटे ही मेरे शरीर में सुई की तरह छिद रहे हों सो बात नहीं- समस्त कपड़े और धोती के भीग जाने से और प्रचण्ड वायु से इतनी ठण्ड लगने लगी कि दाँत कटकट बजने लगे। खयाल आया, कि हाल जल में डूबने से तो किसी तरह बच भी सकता हूँ, किन्तु निमोनिया के हाथ से किस तरह परित्राण पाऊँगा? और, यह तो मैंने नि:संशय अनुभव किया कि इसी तरह यदि और भी कुछ देर बैठा रहूँगा तो परित्राण पाना सचमुच ही असम्भव हो जायेगा। इसलिए जिस तरह भी हो, इस स्थान का परित्याग करके किसी ऐसी जगह आश्रय लेना चाहिए जहाँ कि जल के छींटे बर्छी के फल की तरह शरीर में न चुभें। एक बार सोचा कि भेड़ों के पिंजरे में घुस जाऊँ तो कैसा हो! किन्तु वह भी कितना सुरक्षित है? उसके भीतर यदि खारे जल की धारा प्रवेश कर जाय तो ठीक 'मैं-मैं' करके न सही, पर 'माँ-माँ' करके अन्त में अवश्य ही इह-लीला समाप्त करनी पड़ेगी।

सिर्फ एक उपाय है। जहाज जब पार्श्व-परिवर्तन करता है तब भागने का कुछ मौका मिल जाता है; इसलिए, उस समय यदि कहीं जाकर घुस सकूँ तो शायद जान बच जाय। जो सोचा, वही किया। किन्तु पिंजरों पर से नीचे उतरकर, तीन बार दौड़कर, और तीन बार बैठकर, किसी तरह जब मैं सेकण्ड क्लास के केबिन के द्वार पर पहुँचा, तब देखा, द्वार बन्द है। लोहे के किवाड़ों ने हजार धक्का-मुक्की करने पर भी रास्ता नहीं दिया। इसलिए, वही रास्ता फिर उसी तरह तय करके मैं फर्स्ट क्लास के दरवाजे पर आ उपस्थित हुआ। इस दफे भाग्य देवता ने सुप्रसन्न होकर एक निराले कमरे में आश्रय दे दिया; और जरा भी दुविधा न करके मैं किवाड़ बन्द करके पलंग पर जा सोया।

रात के बारह बजे के भीतर तूफान तो थम गया, किन्तु समुद्र का गुस्सा दूसरे दिन भोर तक भी शान्त न हुआ।

मेरे सामान का और साथी मुसाफिरों का क्या हाल हुआ, और, खास तौर से सपत्नीक मिस्रीजी ने किस तरह रात बितई, यह जानने के लिए सुबह मैं नीचे उतर गया। कल नन्द मिस्री ने जरा दिल्लगी करते हुए कहा था कि “बाबूजी, साढ़े बत्तीस प्रकार के चबेने के समान हम लोग आपस में गड्डमड्ड हो गये थे और अभी ही कुछ देर हुई, सब कोई अपनी-अपनी जगह आकर बैठे हैं।” आज का गड्डमड्ड साढ़े बत्तीस प्रकार में गिना जा सकता है या नहीं, सो मुझे नहीं मालूम; किन्तु, इस समय तक कोई भी अपने निजी स्थान पर लौटकर न आने पाया था यह मैंने अपनी ऑंखों देखा।

उन लोगों की व्यवस्था देखने पर सचमुच ही रुलाई आने लगी। इन तीन-चार-सौ यात्रियों में से किसी के समर्थ रहने की बात तो दूर-शायद, अक्षत भी कोई नहीं बचा था।

औरतें सिल पर जिस तहर लोढ़े से मसाला बाँटती हैं, कल का साइक्लोन इन तीन-चार सौ लोगों का ठीक उसी तरह सारी रात मसाला बाँटता रहा। सारे माल-असबाब के सहित-बक्स-पेटियों आदि के सहित ये सब लोग रात-भर जहाज के इस किनारे से उस किनारे तक लुढ़कते फिरे हैं। वमन तथा अन्य दो क्रियाएँ इतनी अधिक की गयी हैं कि दुर्गन्ध के मारे खड़ा होना भी भारी हो रहा है और इस समय डॉक्टर बाबू जहाज के मेहतर और खलासियों को साथ लिये इन लोगों का 'पंकोद्धार' करने की व्यवस्था कर रहे हैं।

डॉक्टर बाबू ऊपर से नीचे तक मेरा बार-बार निरीक्षण करके शायद मुझे सेकण्ड क्लास का मुसाफिर समझ बैठे थे, फिर भी, अत्यन्त आश्चर्य के साथ बोले, “महाशय तो खूब ताजे दिख रहे हैं; जान पड़ता है कि आराम करने के लिए कोई हैमॉक (भ्उउवबा= जहाज पर रहनेवाला एक तरह का एक झुलन-खटोला) पा गये थे, क्यों न?”

“हैमॉक कहाँ से पाता महाशय, पाया था एक भेड़ों का पिंजरा। इसीलिए तरो-ताजा दीख रहा हूँ।”

डॉक्टर बाबू मुँह फाड़कर मेरी ओर ताकते रह गये। मैं बोला, “डॉक्टर बाबू, यह अधम भी इसी नरक-कुण्ड का यात्री है। किन्तु, कमजोर होने के सबब यहाँ घुस न सका- शुरु से ही डेक के ऊपर रहा आया। कल साइक्लोन की खबर पाकर कुछ देर भेड़ों के पिंजरों के ऊपर बैठकर, और रात को फर्स्ट क्लास के एक कमरे में अनधिकार प्रवेश करके आत्मरक्षा कर सका हूँ। क्या कहते हैं आप, मैंने कुछ अनुचित तो नहीं किया?”

सारा इतिहास सुनकर डॉक्टर बाबू इतने प्रसन्न हुए कि उसी क्षण उन्होंने मुझे अपने निजी कमरे में बाकी दो दिन काटने के लिए सादर निमन्त्रण दे दिया। अवश्य ही उस निमन्त्रण को मैं स्वीकार नहीं कर सका- केवल एक चेयर मैंने उनसे ले ली।

दोपहर को भूख की मार से मुर्दे की तरह चेयर पर पड़ा हुआ ब्रह्माण्ड की समस्त खाद्य-वस्तुओं का ध्या न कर रहा था- कहाँ जाकर क्या कौशल करूँ कि कुछ खाने को मिल जाय। इसी समय, जब कि मैं इस दुश्चिन्ता में डूबा हुआ था, खिदिरपुर के मुसलमान दर्जियों में से एक ने आकर कहा, “बाबू साहब, एक बंगाली औरत आपको बुला रही है।”

“औरत?” समझा कि टगर होगी। क्यों बुला रही है सो भी अनुमान कर लेना मेरे लिए कठिन नहीं था। निश्चय ही मिस्री के साथ स्वामी और स्त्री के स्वत्व सिद्ध करने के व्यापार में फिर मतभेद उपस्थित हो गया है। किन्तु, मेरी जरूरत क्यों आ पड़ी? ज्तपंस इल वतकमंस (अग्नि-परीक्षा के) सिवाय बाहर के किसी आदमी ने आकर किसी दिन इसकी मीमाँसा कर दी हो, यह सोचना भी कठिन है।

मैंने कहा, “घण्टे-भर बाद आऊँगा, कह देना।”

उस मनुष्य ने कुण्ठित होकर कहा, “नहीं बाबू साहब, बड़ी मिन्नत करके बुला रही है...”

“मिन्नत करके?” किन्तु टगर तो मिन्नत करने वाली औरत नहीं है। पूछा “उसके साथ का मर्द क्या कर रहा है?”

वह बोला, “उसी की बीमारी के कारण तो आपको बुला रही है।”

बीमारी होना बिल्कु'ल ही अचरज की बात नहीं थी, इसलिए मैं उठ खड़ा हुआ। वह मुझे अपने साथ नीचे ले गया। काफी दूर पर एक कोने में कुण्डली किये हुए मोटे-मोटे रस्से रखे हुए थे। उन्हीं की आड़ में एक बाईस-तेईस वर्ष की बंगाली स्त्री बैठी थी। पहले कभी उस पर मेरी नजर नहीं पड़ी थी। पास में ही एक मैली शतरंजी के ऊपर करीब-करीब इसी उम्र का एक अत्यन्त क्षीणकाय युवक मुर्दे की तरह ऑंखों मूँदकर पड़ा हुआ है- वही बीमार है।

मेरे निकट आते ही उस औरत ने धीरे-धीरे अपने सिर का वस्त्र आगे खींच लिया, किन्तु मैं उसका मुँह देख चुका था।

वह मुख सन्दर कहा जाय तो बहस उठ सकती है, किन्तु फिर भी उपेक्षा करने योग्य नहीं था। ऊँचा कपाल स्त्रियों की सौन्दर्य-तालिका में कोई स्थान नहीं रखता, यह मुझे मालूम है; फिर भी, इस तरुणी के चौड़े मस्तक पर बुद्धि और विचार-शक्ति की एक ऐसी छाप लगी हुई देखी जिसे मैंने कदाचित् ही देखा है। मेरी अन्नदा जीजी का कपाल भी प्रशस्त था। इसका भी बहुत कुछ उसी तरह का था। माँग में सिन्दूर झलक रहा था, हाथ में लोहे की चूड़ियाँ¹ और शंख के वलयों को छोड़कर और कोई अलंकार नहीं था। ऑंग में एक सीधी-सादी रंगीन साड़ी थी।

परिचय न होने पर भी इतने स्वाभाविक ढंग से उसने बात की कि मैं विस्मित हो गया। वह बोली, “आपके साथ डॉक्टर बाबू का तो परिचय है, क्या एक दफे आप बुला सकते हैं?”

मैंने कहा, “आज ही उनसे परिचय हुआ है। फिर भी, जान पड़ता है, डॉक्टर बाबू भले आदमी हैं। किन्तु, उन्हें क्यों बुलाती हो?”

वह बोली, “यदि बुलाने पर विजिट देनी पड़ती हो, तो फिर जरूरत नहीं है; न होगा, ये ही थोड़ा कष्ट करके ऊपर चले चलेंगे।” इतना कहकर उसने उस रोगी आदमी को दिखा दिया।

मैंने सोचकर कहा, “जहाज के डॉक्टर को शायद कुछ भी देना नहीं होता। किन्तु, इन्हें हो क्या गया है?”

मैंने सोचा था कि रोगी इनका पति है; किन्तु, बातचीत से कुछ सन्देह हुआ। उस मनुष्य के मुँह के ऊपर कुछ झुककर उसने पूछा, “घर से चलते समय से ही तुम्हें पेट की बीमारी थी न?”

उस मनुष्य ने सिर हिला दिया, तब इसने सिर ऊपर उठाकर कहा, “हाँ, इन्हें पेट की बीमारी देश में ही हुई थी, किन्तु कल से बुखार आ गया। इस समय देखती हूँ कि बुखार तेज हो आया है, कुछ दवाई दिए बिना काम न चलेगा।”

मैंने भी स्वयं हाथ डालकर उसके शरीर का ताप देखा, वास्तव में बुखार खूब तेज था। डॉक्टर को बुलाने मैं ऊपर चला गया।

डॉक्टर बाबू नीचे आए, रोग-परीक्षा करके और दवाई का पुरजा देकर बोले, “चलो श्रीकान्त बाबू, कमरे में चलकर गप-शप करें।”

डॉक्टर बाबू खूब रंगीले थे। अपने कमरे में ले जाकर बोले, “चाय पीते हैं?” मैंने कहा, “हाँ, पीता हूँ।”

“और बिस्कुट?”

“सो भी खाता हूँ?”

“अच्छा।”

खाना-पीना समाप्त होने के बाद दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गये। डॉक्टर बाबू बोले, “आज कैसे जा भिड़े उस औरत से?”

मैंने कहा, “उसने ही मुझे बुला भेजा था।”

डॉक्टर बाबू इस तरह सिर हिलाकर कि मानो सब कुछ जानते हों, बोले, “बुलाना ही चाहिए- शादी-वादी की है या नहीं?”

मैंने कहा, “नहीं।”

डॉक्टर बाबू बोले, “तो बस, भिड़ जाओ। ऐसी कुछ बुरी नहीं है। उस आदमी का चेहरा देखा, उस पर टाईफाइड के लक्षण नजर आते हैं। कुछ भी हो, वह अधिक दिन न टिकेगा, यह निश्चित है। इस बीच उस पर नजर बनाए रखना। कहीं और कोई साला न भिड़ जाय।”

मैं अवाक् होकर बोला, “आप यह सब कह क्या रहे हैं, डॉक्टर बाबू?”

डॉक्टर बाबू जरा भी अप्रतिभ हुए बिना बोले, “अच्छा, वह छोकरा ही उसे घर से निकाल लाया है या उसी को वह बाहर निकाल लाई है- तुम्हें क्या मालूम होता है, श्रीकान्त बाबू? खूब फारवर्ड है। बातचीत तो बहुत अच्छी करती है।”

मैंने कहा, “इस तरह का खयाल आपके मन में क्यों आया?”

डॉक्टर बाबू बोले, “हर एक ट्रीप में तो देखता हूँ कि एक न एक है ही। पिछली दफे भी बेलघर की एक ऐसी ही जोड़ी थी। एक बार बर्मा में जाकर कदम तो रक्खो, तब देखोगे कि मेरी बात सच है या नहीं।”

उनकी बर्मा की बात बहुत कुछ सच है, यह मैंने बाद में अवश्य देखा; किन्तु उस समय तो ऊपर से नीचे तक मेरा सारा मन अरुचि से तीखा हो उठा। डॉक्टर बाबू से बिदा लेकर नन्द मिस्री की खबर लेने नीचे गया। घरवाली सहित मिस्री उस समय फलाहार की तैयारी कर रहा था। नमस्कार करने के बाद सबसे पहले उसने यह प्रश्न किया, “यह औरत कौन है, बाबू?...”

टगर सिर दर्द के कारण अपने सिर पर एक कपड़ा पगड़ी की तरह बाँध रही थी। एकदम फुसकारकर बोल उठी, “यह जानने की तुम्हें क्या गरज पड़ी है, बताओ तो सही?”

मिस्री ने मुझे मध्ययस्थ मानकर कहा, “देखी महाशय, इस औरत की ओछी तबियत? कौन बंगाली औरत रंगून जा रही है, यह पूछना भी जैसे पाप हो!”

टगर अपना सिर-दर्द भूल गयी और पगड़ी को फेंककर मेरी ओर ताकने लगी। उसने अपनी दोनों गोल-गोल ऑंखें फाड़कर कहा, “महाशय, टगर वैष्णवी के हाथ के नीचे से इन सरीखे से न जाने कितने मिस्री आदमी बनकर निकल गये हैं- अब भी क्या यह मेरी ऑंखों में धूल झोंक सकते हैं? अरे, तुम डॉक्टर हो कि वैद्य, जो मैं जरा-सा पानी लेने गयी, कि इतनी ही देर में, चट से दौड़कर वहाँ देखने जा पहुँचे? क्यों, कौन है वह? यह अच्छा नहीं होगा, सो कहे देती हूँ, मिस्री। यदि दुबारा फिर कभी वहाँ जाते देखूँगी तो फिर एक दिन या तो तुम ही हो या मैं ही।”

नन्द मिस्री ने गर्म होकर कहा, “तेरा क्या मैं पालतू बन्दर हूँ जो तू जिस तरफ साँकल पकड़कर ले जायेगी उसी तरह जाऊँगा? मेरी इच्छा होगी तो फिर जाकर उस बेचारे को देखने जाऊँगा। तेरे मन में आवे सो कर।” इतना कहकर उसने फलाहार में चित्त लगाया।

टगर ने भी सिर्फ 'अच्छा' कहकर अपनी पगड़ी बाँधना शुरू कर दिया। मैं भी वहाँ से चल दिया। चलते-चलते मैं सोचता गया- इसी तरह इन दोनों ने बीस बरस काट दिए हैं। अनेक दफे हाथ जलाकर टगर इतना सीखी है कि जहाँ पर सत्य का बन्धन नहीं है वहाँ रास को जरा भी ढीला करना अच्छा नहीं होता। ठगाना ही पड़ता है। या तो रात-दिन सतर्क बने रहकर जोर-जबरदस्ती से अपना दखल जमाए रखना पड़ेगा, नहीं तो, जवानी की तरह नन्द मिस्री भी एक दिन अनजान में खिसक जायेगा।

किन्तु, जिसको लक्ष्य करके टगर के मन में यह विद्वेष उत्पन्न हुआ और डॉक्टर बाबू ने कुत्सित तीव्र कटाक्ष किया, वह है कौन? टगर ने कहा था- यही कार्य करते हुए मैंने अपने बाल पकाए हैं। ऐसी औरत है कहाँ जो मेरी ऑंखों में धूल झोंक सके? डॉक्टर बाबू ने अपना मन्तव्य जाहिर किया था कि ऐसी घटनाएँ नित्य ही देखते रहने के कारण उनकी ऑंखों में दिव्यदृष्टि उत्पन्न हो गयी है। इसमें यदि भूल हो, तो वे ऐसी ऑंखों को निकाल फेंकने के लिए तैयार हैं।

ऐसा ही होता है। दूसरे का विचार करते समय किसी मनुष्य को कभी यह कहते नहीं सुना कि वह अन्तर्यामी नहीं हैं, अथवा कहीं भी उसका कोई भ्रम या प्रमाद हो सकता है। सभी कहते हैं कि मनुष्य को चीन्हने में हम बेजोड़ हैं और इस विषय में हम एक पक्के जौहरी हैं। फिर भी, संसार में मैं नहीं जानता कि कभी किसी ने अपने खुद के भी मन को ठीक तरह से पहिचाना हो। मगर हाँ, मेरे समान जिसने भी कहीं कोई कठिन चोट खाई है, उसे अवश्य ही सावधान होना पड़ा है। यह बात उसे मन ही मन मंजूर करनी ही पड़ती है कि संसार में जब अन्नदा जीजी सरीखी स्त्रियाँ भी हैं, तब बुद्धि के अहंकार से दूसरे को हीन और नासमझ समझकर खुद बुद्धिमान बनने की अपेक्षा, सब-कुछ अच्छी तरह जानते हुए भी, नासमझ बनने में ही एक तरह से अधिक बुद्धिमानी है। इसलिए, इन दो परम विज्ञ स्त्री-पुरुषों के उपदेश की मैं अभ्रान्त न मान सका। किन्तु डॉक्टर बाबू ने जो कहा था कि अत्यन्त 'फॉरवर्ड' है, सो ठीक मालूम हुआ। और, केवल यही बात मुझे रह-रहकर चुभने लगी।

बहुत रात गये मैं फिर बुलाया गया। इस दफे इस औरत का मुझे परिचय प्राप्त हुआ। नाम था अभया। उत्तरराढ़ी कायस्थ है, घर है बालूचर के निकट। जो व्यक्ति बीमार पड़ा है वह गाँव के रिश्ते से भाई होता है, नाम है उसका रोहिणी सिंह। “दवा से रोहिणी बाबू को काफी लाभ पहुँचा है”, इस तरह कहना आरम्भ करके थोड़े ही समय में अभया ने मुझे अपना आत्मीय बना लिया। किन्तु मुझे यह तो स्वीकार करना ही चाहिए कि मेरे मन में, अनिच्छा होते हुए भी, एक कठोर समालोचना का भाव बराबर जाग्रत हो गया था। फिर भी, इस स्त्री की सारी बातचीत और आलोचना के दरम्यायन कहीं भी मैं जरा-सी भी असंगति या अनुचित प्रगल्भता नहीं पकड़ पाया।

अभया में मनुष्य को वश करने की अद्भुत शक्ति है। इस बीच में ही उसने मेरा केवल नाम-धाम ही नहीं जान लिया, वरन् 'मैं उसके लापता पति को, जिस तरह हो सके, खोज दूँगा', यह वचन भी उसने मेरे मुँह से निकलवा लिया। उसका पति आठ वर्ष पहले बर्मा में नौकरी के लिए आया था। दो वर्ष तक उसकी चिट्ठी-पत्री आती रही थी; किन्तु इन छह वर्षों से उसका कोई पता नहीं है। देश में कुटुम्ब-कबीले का और कोई नहीं है। माँ थीं; परन्तु वे भी करीब महीने-भर पहले गुजर गयीं। बाप के घर अभिभावकहीन होकर रहना असम्भव हो जाने से रोहिणी भाई को राजी कर बर्मा आई है।

कुछ देर चुप रहकर एकाएक वह बोल उठी, “अच्छा, इतनी-सी भी कोशिश न करके यदि किसी तरह देश में ही पड़ी रहती तो क्या यह मेरे हक में अच्छा होता? इसके सिवाय इस उम्र में बदनामी मोल लेते कितनी-सी देर लगती है?”

मैंने पूछा, “क्या आप जानती हैं कि इतने दिन तक क्यों आपकी उन्होंने कुछ खबर नहीं ली?”

“नहीं, कुछ नहीं जानती।”

“इसके पहले वे कहाँ थे, सो मालूम है?”

“जानती हूँ। रंगून में ही थे, बर्मा रेलवे में काम करते थे; किन्तु, कितनी ही चिट्ठियाँ दीं, कोई उत्तर नहीं मिला। और, कभी कोई चिट्ठी लौटकर वापिस भी नहीं आई।”

प्रत्येक पत्र अभया के पति को मिला है, यह तो निश्चित था। किन्तु, क्यों उसने जवाब नहीं दिया, इसका सम्भाव्य कारण हाल ही मैंने डॉक्टर बाबू के निकट सुना था। बहुत-से बंगाली वहाँ जाकर किसी ब्रह्मदेश की सुन्दरी को घर बिठाकर नयी गिरस्ती बसा लेते हैं और उनमें ऐसे अनेक हैं जो सारी जिन्दगी फिर लौटकर देश नहीं गये।

मुझे चुप देखकर अभया ने पूछा, “वे जीवित नहीं हैं, यही क्या आपको जान पड़ता है?”

मैंने सिर हिलाकर कहा, “बल्कि, ठीक इससे उल्टा। वे जीवित हैं, यह तो मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ।”

चट से अभया ने मेरे पैरे छूकर प्रणाम किया और कहा, “आपके मुँह में फूल-चन्दन पड़ें। श्रीकान्त बाबू, मैं और कुछ नहीं चाहती। वे जीवित हैं, बस इतना ही मेरे लिए काफी है।”

मैं फिर मौन हो रहा। अभया खुद भी कुछ देर मौन रहकर बोली, “आप क्या सोच रहे हैं, सो मैं जानती हूँ।”

“जानती हो?”

“जानती नहीं तो? आप पुरुष होकर जिसका खयाल कर रहे हैं, स्त्री होकर भी क्या मुझे वह भय नहीं होगा? सो होने दो, मुझे उसका डर नहीं है- मैं अपनी सौत के साथ मजे से गिरस्ती चला सकती हूँ।”

फिर भी मैं चुप ही बना रहा। किन्तु, मेरे मन की बात का अनुमान करने में इस बुद्धिमती स्त्री को जरा-सा भी विलम्ब नहीं हुआ। बोली, “आप सोच रहे हैं कि मेरे गिरिस्ती चलाने के लिए राजी होने से ही तो काम नहीं चलेगा; मेरी सौत को भी तो राजी होना चाहिए?-यही न सोच रहे हैं?”

दरअसल मैं अवाक् हो गया और बोला, “ठीक यदि ऐसा ही हो तो क्या करेंगी?”

इस दफे अभया की दोनों ऑंखें छलछला उठीं। वह मेरे मुँह की ओर अपनी सजल दृष्टि निबद्ध करके बोली, “उस विपत्ति में आप मेरी थोड़ी-सी सहायता कर सकेंगे, श्रीकान्त बाबू, मेरे रोहिणी भइया बड़े सीधे-सादे भोले आदमी हैं, इसलिए उस समय तो इनके द्वारा मेरा कोई उपकार न होगा।”

राजी होकर मैंने कहा, “बन पड़ेगा तो जरूर सहायता करूँगा; किन्तु इन सब कामों में बाहर के लोगों के द्वारा प्राय: काम होता तो कुछ नहीं, उलटा बिगड़ ही जाता है।”

“यह बात सच है” कहकर अभया चुपचाप कुछ सोचने लगी।

दूसरे दिन ग्यारह-बारह बजे के बीच जहाज रंगून पहुँचने वाला था; किन्तु भोर होने के पहले से ही सब लोगों की ऑंखों और चेहरों पर भय और चंचलता के चिह्न नजर आने लगे। चारों ओर से एक अस्फुट शब्द कानों में आने लगा, 'केरेंटिन, केरेंठिन।' पता लगाने से मालूम हुआ कि ठीक शब्द 'कारेंटाइन' ;फनंतंदपजपदमद्ध है। उस समय बर्मा की सरकार प्लेग के डर से अत्यन्त सावधान थी। शहर से आठ-दस मील दूर पर रेत में काँटेदार तारों से थोड़ा-सा स्थान घेरकर उसमें बहुत-सी झोपड़ियाँ खड़ी कर दी गयी थीं- इसमें ही डेक के समस्त यात्रियों को बिना कुछ विचार किये उतार दिया जाता था। यहाँ पर दस दिन ठहरने के बाद उन्हें शहर में जाने दिया जाता था। हाँ, यदि किसी का कोई आत्मीय शहर में होता और वह पोर्ट हेल्थ ऑफिसर के पास जाकर किसी कौशल से 'छोड़पत्र' जुटा सकता तो बात जुदी थी।

डॉक्टर बाबू मुझे अपने कमरे में बुलाकर बोले, “श्रीकान्त बाबू, एक 'छोड़पत्र' जुटाए बगैर आपका यहाँ आना उचित नहीं हुआ; कारेंटाइन में ले जाकर वे लोग मनुष्य को इतना कष्ट देते हैं कि कसाईखाने के गाय-बैल-भेड़ आदि जानवरों को भी उतना कष्ट नहीं सहना पड़ता। साधारण आदमी तो उसे किसी तरह सह लेते हैं, मर्मांन्तिक कष्ट तो केवल भले आदमियों को ही सहना पड़ता है। एक तो यहाँ कोई मजूर नहीं मिलता-अपना सब माल-असबाब अपने ही कन्धों पर लादकर एक सीधी जर्जर सीढ़ी पर से चढ़ना-उतरना होता है, और उतनी दूर ले जाना पड़ता है। इसके बाद, सारा माल-असबाब वहाँ खोलकर बिखेर दिया जाता है और स्टीम में उबालकर बर्बाद किया जाता है। और महाशय, ऐसी कड़ी धूप में तो कष्ट का कोई पार ही नहीं रहता।”

अत्यन्त भयभीत होकर मैंने कहा, “इसका कोई प्रतिकार नहीं है क्या डॉक्टर बाबू?”

उन्होंने सिर हिलाकर कहा, “नहीं-हाँ, जब डॉक्टर साहब जहाज के ऊपर चढ़ आवेंगे तब मैं उनसे कह देखूँगा। उनका क्लर्क यदि आपकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को राजी होगा तो...”

किन्तु, उनकी बात अच्छी तरह पूरी न होने पाई थी कि बाहर एक ऐसा काण्ड घटित हुआ जिसकी याद करके मैं खुद भी लाज के मारे मर जाता हूँ। कुछ गोलमाल सुनकर दोनों जनें कमरे से बाहर निकले। देखा कि जहाज का सेकण्ड ऑफिसर छह-सात खलासियों को बेधड़क चाहे जिस तरह लातें मार रहा है, और, उसके बूट की ठोकरें खाकर वे जहाँ बन पड़ता है वहाँ भाग रहे हैं। यह अंगरेज युवक अत्यन्त उद्धत था, इसलिए डॉक्टर बाबू के साथ इसकी पहले भी कहा-सुनी हो चुकी थी, और आज फिर एक झपट हो गयी।

डॉक्टर गुस्सा होकर बोले, “तुम्हारा इस तरह का काम अत्यन्त निन्दनीय है, किसी दिन इसके लिए तुम्हें दु:ख उठाना पड़ेगा, यह मैं कहे देता हूँ।”

वह पलटकर खड़ा हो गया और बोला, “क्यों?”

डॉक्टर बाबू बोले, “इस तरह लातें मारना बड़ा भारी अन्याय है।”

उसने जवाब दिया, “मार खाए बिना क्या ढोर सीधे होते हैं?”

डॉक्टर बाबू कुछ 'स्वदेशी खयाल' के आदमी थे; वे उत्तेजित होकर कहने लगे, “ये लोग जानवर नहीं हैं, गरीब मनुष्य हैं! हमारे देशी आदमी नम्र और शान्त होने के कारण कप्तान साहब के पास जाकर तुम्हारी शिकायत नहीं करते; और इसीलिए, तुम अत्याचार करने का साहस करते हो!”

एकाएक साहब का मुँह अकृत्रिम हँसी से भर गया। डॉक्टर का हाथ खींचकर उसने अंगुली से दिखाते हुए कहा, Look, Doctor, theres your country-men, you ought to be proud of them? (देखो डॉक्टर, वह देखो तुम्हारे देश के आदमी, तुम्हें अवश्य ही इन पर फक्र होना चाहिए।)

मैंने नजर उठाकर देखा, कुछ ऊँचे पीपों की आड़ में खड़े होकर वे खींसे बाहर निकाल कर हँस रहे हैं और शरीर की धूल झाड़ रहे हैं। साहब थोड़ा-सा हँसकर, डॉक्टर बाबू के मुँह पर दोनों हाथों के अंगूठे हिलाकर दाएँ-बाएँ झूमता सीटी देता हुआ चल दिया। विजय का गर्व जैसे उसके सारे शरीर से फूट पड़ने लगा।

डॉक्टर बाबू का मुँह लज्जा से, क्षोभ से और अपमान से काला हो गया। तेजी से कदम आगे रखते हुए क्रुद्ध स्वर से वे बोल उठे, “बेहया सालो, खींसे बाहर निकालकर हँस रहे हो!”

इस दफे, इतनी देर बाद, देशी लोगों का आत्म सम्मान शायद लौट आया। सब लोगों ने एक साथ हँसना बन्द करके तेजी से जवाब दिया, “तुम डॉक्टर बाबू, 'साला' कहने वाले कौन होते हो? किसी का कर्ज खाकर तो हम लोग नहीं हँसते?”

“जबर्दस्ती से डॉक्टर बाबू को खींचकर उनके कमरे में वापिस ले आया। कुर्सी पर धम्म से गिरते हुए उनके मुँह से सिर्फ 'ऊ:-!' निकला।

और कोई दूसरी बात उनके मुँह से बाहर निकलना भी असम्भव थी। ग्यारह बजे के लगभग कॉरेण्टाइन के पास एक छोटा-सा स्टीमर आकर जहाज से सटकर खड़ा हो गया। समस्त डेक के यात्रियों को यही उस भयानक स्थान में ले जाएगा। माल-असबाब बाँधने-छोरने की धूम मच गयी। मुझे जल्दी नहीं थी; क्योंकि, डॉक्टर बाबू का आदमी अभी ही कह गया था कि मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। निश्चिंत होकर यात्रियों और खलासियों की चिल्लाहट और दौड़-धूप कुछ अन्यमनस्क-सा होकर देख रहा था। हठात् पीछे से एक शब्द सुन पड़ा, पलटकर देखा कि अभया खड़ी है। आश्चर्य के साथ पूछा, “आप यहाँ कैसे?”

अभया बोली, “क्यों, क्या आप अपनी चीज-बस्त बाँधोगे नहीं?”

मैंने कहा, “नहीं, मुझे अभी काफी देर है, मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। एकदम शहर में जाकर उतरूँगा।”

अभया बोली, “नहीं, शीघ्र सामान ठीक कर लीजिए।”

मैंने कहा, “मुझे अब भी बहुत समय है।...”

अभया ने प्रबल वेग से सिर हिलाकर कहा, “नहीं, सो नहीं हो सकता, मुझे छोड़कर आप किसी तरह नहीं जाने पाएँगे।”

मैं अवाक् होकर बोला, “यह क्या? मेरा तो वहाँ जाना नहीं हो सकेगा।”

अभया बोली, “तो फिर, मेरा भी नहीं हो सकेगा। मैं पानी में भले ही फाँद पूड़ूँ, परन्तु, निराश्रय होकर इस जगह किसी तरह नहीं जाऊँगी। वहाँ की सब बातें सुन चुकी हूँ।” यह कहते-कहते उसकी ऑंखें छलछला आईं। मैं हतबुद्धि-सा होकर बैठा रहा। “यह कौन है जो मुझे इस तरह धीरे-धीरे जोर डालकर अपने जीवन के साथ जकड़ रही है?

वह ऑंचल से ऑंखें पोंछकर बोली, “मुझे अकेली छोड़कर चले जावेंगे? मैं नहीं सोच सकती कि आप इतने निष्ठुर हो सकते हैं। उठिए, नीचे चलिए। आप न होंगे तो उस बीमार आदमी को साथ लेकर मैं अकेली औरत-जात क्या करूँगी, आप ही बताइए?”

अपना माल-असबाब लेकर जब मैं छोटे स्टीमर पर चढ़ा तब डॉक्टर बाबू ऊपर के डेक पर खड़े थे। हठात् मुझे इस अवस्था में देखकर वे हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहने लगे, “नहीं नहीं, आपको न जाना होगा। लौट आइए, लौट आइए- आपके लिए हुक्म हो गया है, आप...”

मैंने भी हाथ हिलाते हुए चिल्लाकर कहा, “असंख्य धन्यवाद, किन्तु एक और हुक्म से मुझे जाना पड़ रहा है।”

सहसा उनकी दृष्टि अभया और रोहिणी पर जा पड़ी। वे मुसकराते हुए बोले, “तब मुझे बेकार ही कष्ट दिया?”

“उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”

“नहीं नहीं, उसकी जरूरत नहीं, मैं पहले से ही जानता था, गुड बाई।” यह कहकर डॉक्टर बाबू हँसते चेहरे से चले गये।
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'कॉरंटाइन' नामक जेलखाने में भेजने का कानून केवल 'कुलियों' के लिए है- शरीफों के लिए नहीं; और जो जहाज का किराया दस रुपये से अधिक नहीं देता वही 'कुली' है। चाय के बगीचों का कायदा क्या कहता है सो नहीं मालूम; पर जहाजी कानून तो यही है। और अधिकारी या अफसर प्रत्यक्ष ज्ञान से क्या जानते हैं, यह तो वे ही जानें; किन्तु ऑफिशियल इससे अधिक जानने की रीति नहीं है। इसलिए, इस यात्रा में हम सब 'कुली' थे। और, साहब लोग यह भी समझते हैं कि कुली की जीवन-यात्रा के लिए माल-असबाब ऐसा कुछ अधिक नहीं हो सकता- और न होना उचित ही है, कि जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कन्धों पर रखकर वह न ले जा सकता हो। इसलिए, उतरने के घाट पर केरिण्टिन-यात्रियों का माल-असबाब ले जाने के लिए यदि कोई व्यवस्था नहीं है तो इसके लिए क्षुब्ध होने का कोई कारण नहीं। यह सब सच है; फिर भी, यह केवल हमारे ही भाग्य का दोष समझिए कि हम तीन प्राणी, सिर के ऊपर प्रचण्ड सूर्य और पैरों के नीचे उससे भी अधिक उग्र बालुका-राशि से जलते हुए, एक अपरिचित नदी के किनारे बड़े-बड़े गट्ठर सामने रखकर किंकर्तव्यवि‍‍मूढ़ भाव से एक दूसरे का मुँह देखते खड़े हुए हैं। साथ के यात्रियों का परिचय पहले ही दे चुका हूँ। वे लोग अपने लोटे-कम्बल पीठ पर रखकर, और अपेक्षाकृत अधिक बोझ अपनी गृहलक्ष्मियों के सिर पर लादकर, मजे से गन्तव्य स्थान पर चले गये।

देखते-देखते रोहिणी भइया बिस्तरों के एक बण्डल पर काँपते-काँपते धम से बैठ गये। बुखार, पेट का दर्द और भारी थकावट- इन सब कारणों के एकत्र होने से उनकी अवस्था ऐसी थी कि उनके लिए, चलना बहुत दूर की बात है; बैठना भी असम्भव हो गया। लेट जाने में ही उनकी रक्षा थी। अभया ठहरी औरत-जात। बचा सिर्फ मैं और मेरी तथा पराई छोटी-मोटी गठरियाँ। मेरी दशा एकबारगी सोचकर देखने योग्य थी। एक तो अकारण ही एक अज्ञात अप्रीतिकर स्थान में जा रहा था; दूसरे, एक कन्धों पर तो एक अज्ञात निरुपाय स्त्री का बोझ था और दूसरे कन्धों पर झूल रहा था उतना ही अपरिचित एक बीमार पुरुष और ऊपर से घाते में थीं गठरियाँ। इन सबके बीच में मैं अत्यन्त उग्र प्यास को लिये, जो कि सारे गले को सुखाए देती थी, एक अज्ञात जगह में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़ा था। मेरे इस चित्र की कल्पना करके बतौर पाठ के लोगों को खूब आनन्द आ सकता है- कुछ सहृदय पाठक, शायद, मेरी इस नि:स्वार्थ परोपकार-वृत्ति की प्रशंसा भी कर सकते हैं; किन्तु, मुझे यह कहते जरा भी शर्म नहीं कि उस उस समय इस हतभागी का मन झुँझलाहट और पश्चात्ताप से एकबारगी परिपूर्ण हो गया था। अपने आपको सैकड़ों धिक्कार देता हुआ मन ही मन कह रहा था, कि इतना बड़ा गधा त्रिलोक में क्या और भी कोई होगा! किन्तु, बड़े अचरज की बात है, कि यद्यपि यह परिचय मेरे शरीर पर लिखा हुआ नहीं था, फिर भी, जहाज-भर के इतने लोगों के बीच में भार-वहन करने के लिए अभया ने मुझे ही क्यों और किस तरह एकदम से पहिचानकर छाँट लिया?

किन्तु, मेरा विस्मय दूर हुआ उसकी हँसी से। उसने मुँह उठाकर जरा-सा हँस दिया। उसके हँसी भरे चेहरे को देखकर मुझे केवल विस्मय ही नहीं हुआ-उसके भयानक दु:ख की छाया भी इस दफे मुझे दिख गयी। किन्तु सबसे अधिक अचरज तो मुझे उस ग्रामीण स्त्री की बात सुनकर हुआ। कहाँ तो लज्जा और कृतज्ञता से धरती में गड़कर उसे भिक्षा माँगना चाहिए था, और कहाँ उसने हँसकर कहा, “कहीं यह खयाल न कर बैठना, कि खूब ठगाए गये! अनायास ही जा सकते थे फिर भी गये नहीं, इसी का नाम है दान। पर, मैं यह कहे रखती हूँ कि इतना बड़ा दान करने का सुयोग जीवन में, शायद, कम ही मिलेगा। किन्तु, जाने दो इन बातों को। माल-असबाब इसी जगह पड़ा रहने दो, और चलो, देखें, इन्हें कहीं छाया में सुलाया जा सकता है या नहीं।”

आखिर, गट्ठर-गठरियों की ममता छोड़कर मैं रोहिणी भइया को पीठ पर लादकर केरिण्टिन की ओर रवाना हुआ। अभया ने केवल एक छोटा-सा हाथ-बॉक्स लेकर मेरा अनुसरण किया और समान वहाँ ही पड़ा रहा। अवश्य ही वह सब खोया नहीं गया- कोई दो घण्टे बाद उसे ले आने का प्रबन्ध हो गया।

अधिकांश स्थानों में देखा जाता है कि सचमुच की विपत्ति काल्पनिक विपत्ति की अपेक्षा अधिक सहज और सह्य होती है। पहिले से ही इस बात का खयाल रखने से अनेक दुश्चिन्ताओं के हाथ से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए, यद्यपि कुछ-कुछ क्लेश और असुविधाएँ निश्चय से मुझे भोगनी पड़ीं, फिर भी, यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ती है कि हम लोगों के केरिण्टिन की मियाद के दिन एक तरह से आराम से ही कट गये। इसके सिवाय, पैसा खर्च कर सकने पर यमराज के घर भी जब ससुराल जैसा आदर प्राप्त किया जा सकता है, तब तो यह केरिण्टिन ही थी!

जहाज के डॉक्टर बाबू ने कहा था कि स्त्री खूब 'फारवर्ड' है, किन्तु, जरूरत के समय यह स्त्री कहाँ तक 'फारवर्ड' हो सकती है, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। रोहिणी बाबू को जब पीठ पर से मैंने उतार दिया तब अभया बोली, “बस, अब आपको और कुछ भी नहीं करना होगा श्रीकान्त बाबू, आप विश्राम करें, और जो कुछ करने का है मैं कर लूँगी।”

विश्राम की मुझे वास्तव में जरूरत थी- दोनों पैर थकावट के कारण टूटे जाते थे; फिर भी मैंने अचरज के साथ पूछा, “आप क्या करेंगी?” अभया ने जवाब दिया, “काम क्या कुछ कम है? चीजें-बस्तें लानी होंगी एक अच्छा-सा कमरा तलाश करके आप दोनों के लिए बिस्तर तैयार कर देने होंगे, रसोई करके जो कुछ हो दोनों को खिला देना होगा- तब जाकर मुझे छुट्टी मिलेगी, और तब ही तो थोड़ा-सा बैठकर मैं आराम कर सकूँगी। नहीं-नहीं, मेरे सिर की कसम, उठिएगा नहीं, मैं अभी-अभी सब ठीक-ठाक किये देती हूँ।” फिर थोड़ा-सा हँसकर कहा, “सोचते होओगे कि औरत होकर यह अकेली सब प्रबन्ध किस तरह करेगी, यही न? पर क्यों न कर सकूँगी? अच्छा, आपको ही खोज निकालने वाला कौन था? मैं ही थी न, कि और कोई?” इतना कहकर उसने छोटे बॉक्स को खोला और उसमें से कुछ रुपये निकालकर ऑंचल में बाँध लिये तथा केरेण्टिन के ऑफिस की ओर चल दी।

वह कुछ कर सके चाहे न कर सके, किसी तरह बैठने को मिल जाने से मेरी तो जान बच गयी। आधे घण्टे के भीतर ही एक चपरासी मुझे बुलाने आया। रोहिणी को साथ लेकर उसके पीछे-पीछे गया। देखा, रहने का कमरा तो अच्छा ही है। मेम डॉक्टरिन साहिबा खुद खड़े होकर नौकर से सब साफ करा रही हैं, जरूरी चीजें आ पहुँची हैं और दो खाटों पर दो आदमियों के लिए बिस्तर तक बिछा दिए गये हैं। एक ओर नयी हाँड़ियाँ, चावल, दाल, आलू, घी, मैदा, लकड़ी आदि सब मौजूद हैं। मद्रासी डॉक्टरिन के साथ अभया टूटी-फूटी हिन्दी में बातचीत कर रही है। मुझे देखते ही बोली, “तब तक आप थोड़ी नींद न ले लो, मैं सिर पर दो घड़ा जल डालकर इस वक्त के लिए चावल-दाल मिलाकर थोड़ी-सी खिचड़ी राँध देती हूँ। उस वक्त के लिए फिर देखा जायेगा।” इतना कहकर गमछा-कपड़ा लेकर मेम साहिबा को सलाम कर, एक खलासी को साथ लेकर वह नहाने चली गयी। इस तरह, उसके संरक्षण में हम लोगों के दिन अच्छी तरह से कट गये, यह कहने में मैं निश्चय से जरा भी अत्युक्ति नहीं कर रहा हूँ।

इस अभया में मैं दो बातें अन्त तक लक्ष्य कर रहा था। ऐसी अवस्था में ऐसे स्त्री-पुरुषों में जिनमें परस्पर कोई रिश्ता नहीं होता है, घनिष्ठता स्वत: ही बड़ी तेजी से बढ़ने लगती है। किन्तु इसका उसने कभी मौका ही नहीं दिया। उसके व्यवहार में ऐसा कुछ था जो प्रत्येक क्षण याद दिला दिया करता था कि हम लोग केवल यात्री हैं जो एक जगह ठहर गये हैं- किसी के साथ किसी का सचमुच का कोई सम्बन्ध नहीं है; दो दिन बाद शायद जीवन-भर फिर कहीं किसी की किसी से मुलाकात ही न हो। दूसरी बात यह थी कि ऐसा आनन्दयुक्त परिश्रम भी मैंने कहीं नहीं देखा। दिन-भर वह हम लोगों की सेवा में लगी रहती और काम खुद ही करना चाहती। सहायता करने की कोशिश करते ही वह हँसकर कहती, “यह तो सब मेरा खुद का कार्य है। नहीं तो, रोहिणी भइया को ही क्या जरूरत थी कि वे इतना कष्ट उठाते, और आपको ही क्या पड़ी थी इस जेलखाने में आने की? मेरे लिए ही तो आप लोगों को इतनी सब तकलीफें उठानी पड़ती हैं।”

अक्सर ऐसा होता कि खाने-पीने के बाद थोड़ी-सी गपशप चल रही होती और ऑफिस की घड़ी में दो बज जाते। बस, वह एकदम खड़ी हो जाती और कहने लगती, “जाती हूँ आप लोगों के लिए चाय तैयार कर लाऊँ- दो बज गये।” मन ही मन मैं कहता, “तुम्हारा पति चाहे कितना ही पापी क्यों न हो, मनुष्य तो जरूर होगा। यदि कभी उसे पा लोगी, तो वह तुम्हारा मूल्य अवश्य समझेगा।

इसके बाद एक दिन मियाद खत्म हुई। रोहिणी भी अच्छा हो गया। हम लोग भी सरकारी 'छोड़-पत्र' पाकर गट्ठर-गठरियाँ बाँध रंगून को चल पड़े। निश्चय किया था कि शहर के मुसाफिरखाने में दो-एक दिन के लिए ठहर कर, और इन लोगों के लिए ठहरने का कोई स्थान ठीक करके, मैं अपने स्थान पर चला जाऊँगा; और फिर जहाँ-कहीं भी रहूँगा वहाँ से उसके पति का पता मालूम करके उसे समाचार भेजने की भरसक कोशिश करूँगा।

शहर में जिस दिन हम लोगों ने कदम रखे वह बर्मावासियों का एक त्योहार का दिन था। और, त्योहार तो उनके लगे ही रहते हैं। दल के दल स्त्री-पुरुष रेशमी पोशाक पहने अपने मन्दिरों को जा रहे हैं। स्त्री-स्वातन्त्रय का देश है; इसलिए, वहाँ के आनन्द-उत्सव में स्त्रियों की संख्या भी अधिक होती है। बूढ़ी, युवती, बालिका- सब उम्र की स्त्रियाँ अपूर्व पोशाक-परिच्छद में सज्जित होकर हँसती-बोलती-गाती सारे रास्ते को मुखरित करती हुई चली जा रही हैं। उनमें अधिकांश का रंग खूब गोरा है। मेघ की तरह घने बालों का बोझा सौ में से नब्बे स्त्रियों का घुटनों के नीचे तक लटकता है। जूड़े में फूल, कानों मे फूल और गले में फूलों की माला। घूँघट की झंझट नहीं, पुरुषों को देखकर तेजी से जाने की व्यग्रता से ठोकर खाकर गिरने का अन्देशा नहीं, दुविधा या लाज का लेश नहीं- मानो झरने के मुक्त प्रवाह के समान स्वच्छन्द बेरोक गति से बही जा रही हैं। पहली ही दृष्टि से एकदम मुग्ध हो गया। अपने यहाँ की तुलना में मन ही मन उनकी अशेष प्रशंसा करके बोला, यही तो होना चाहिए! इसके बिना जीवन ही क्या है! उनका सौभाग्य सहसा मानो ईर्ष्याि के समान मेरे हृदय में छिद गया। मैंने कहा, चारों दिशाओं में ये जिस आनन्द की सृष्टि करती जा रही हैं, वह क्या अवहेलना की वस्तु है? रमणियों को इतनी स्वाधीनता देकर इस देश के पुरुष क्या ठगे गये हैं? और, हम लोग क्या उनको नीचे से ऊपर तक जकड़ रखकर और उनके जीवन को लँगड़ा बनाकर लाभ में रहे हैं? हमारी स्त्रियाँ भी यदि किसी ऐसे ही दिन- एकाएक गोलमाल सुनकर मैंने लौटकर जो कुछ देखा वह आज भी मेरे मन पर साफ-साफ अंकित है। झगड़ा हो रहा था घोड़ा-गाड़ी के किराए के सम्बन्ध में। गाड़ीवान हमारे यहाँ का हिन्दुस्तानी मुसलमान था। वह कह रहा था कि आठ आने किराया तय हुआ है और तीन भले घर की बर्मी स्त्रियाँ गाड़ी पर से उतरकर एक साथ चिल्लादकर कह रही थीं कि नहीं, पाँच आना हुआ है। दो-तीन मिनट कहा-सुनी होने के बाद ही बस, 'बलं बलं बाहुबलं।' रास्ते के किनारे एक आदमी मोटे-मोटे गन्नों के टुकड़े करके बेच रहा था। अकस्मात् तीनों ने झपटकर उसके तीन टुकड़े उठा लिये और एक साथ गाड़ीवान पर आक्रमण कर दिया। ओह! वह कैसी बेधड़क मार थी। बेचारा स्त्रियों के शरीर पर हाथ भी नहीं लगा सकता था, आत्मरक्षा करने के लिए यदि एक को अटकाता था तो दूसरी की चोट सिर पर पड़ती, उसको अटकाता तो तीसरी की चोट आ पड़ती। चारों और लोग जमा हो गये- किन्तु केवल तमाशा देखने। उस अभागे का कहाँ गया टोपी-साफा और कहाँ गया हाथ का चाबुक! और अधिक न सह सकने के कारण आखिर वह मैदान छोड़कर 'पुलिस! पुलिस! सिपाही! सिपाही!' चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ।

मैं हाल ही बंगाल से आ रहा था और सो भी देहात से। कलकत्ते में स्त्री-स्वाधीनता है- कानों से अवश्य सुनी है, पर ऑंखों नहीं देखी। किन्तु, क्या स्वाधीनता प्राप्त करके भले घर की 'अबलाएँ' भी एक जवान मर्द पर खुले आम सड़क पर आक्रमण करके लट्ठबाजी कर सकती हैं! क्रमश: उनके इतनी अधिक 'सबला' हो उठने की सम्भावना मेरी कल्पना के भी परे की वस्तु थी। बहुत देर तक हतबुद्धि की तरह खड़े रहने के बाद मैंने अपने कार्य के लिए प्रस्थान किया। मन ही मन कहने लगा कि स्त्री-स्वाधीनता भली है या बुरी, समाज के आनन्द की मात्रा इससे घटेगी या बढ़ेगी- यह विचार तो किसी और दिन करूँगा; किन्तु, आज अपनी ऑंखों जो कुछ देखा उससे तो मेरा सारा चित्त एकदम उद्भ्रान्त हो गया।


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अभया और रोहिणी को उनके नये वास-स्थान में- नयी घर-गिरिस्ती में प्रतिष्ठित करके जिस दिन मैं अपने जिन के लिए आश्रय खोजने रंगून के राज-मार्ग पर निकल पड़ा, उस दिन यह मैं नहीं कहना चाहता कि उन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में मेरे मन में बिल्कुाल किसी तरह की ग्लानि छू भी नहीं गयी थी। किन्तु, इस अपवित्र विचार को दूर करने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। क्योंकि, दो खास उम्र के स्त्री-पुरुषों को किसी खास अवस्था में देखने-मात्र से ही उनके बीच में किसी सम्बन्ध-विशेष की कल्पना कर लेना कितनी भारी भ्रान्ति है, यह शिक्षा मुझे पहले ही मिल चुकी थी। और भविष्यत् की जटिल समस्या को भी भविष्यत् के ही हाथ सौंप देने में मुझे किसी तरह की हिचक नहीं होती, इसलिए, केवल अपना ही भार अपने कन्धों पर लादकर उस दिन प्रभात के समय उनके नये वास-स्थान से बाहर निकला।

आजकल की तरह उस समय किसी भी नये बंगाली के बर्मा में कदम रखते ही पुलिस के प्रकट और अप्रकट कर्मचारियों का दल उनसे सवाल पर सवाल करके, उन पर व्यंग्य कसके और अपमान करके तथा बिना कसूर थाने में खींच ले जाकर और डर दिखाकर हद दर्जे की तकलीफ नहीं देता था। मन में किसी तरह का पाप न हो, तो उन दिनों प्रत्येक परिचित-अपरिचित को निर्भयता से घूमने-फिरने का अधिकार था और आजकल की तरह अपने आपको निर्दोष प्रमाणित करने का अत्यन्त गुरु भार भी नवागत बंगवासी के कन्धों पर नहीं लादा गया था। इसलिए, मुझे खूब याद है कि स्वच्छन्द चित्त से किसी आश्रय-स्थान की खोज में उस दिन सुबह से दोपहर तक राह-राह खूब घूमता फिरा। राह में एक बंगाली से भेंट हुई। वह मजदूर के सिर पर तरकारी का बोझा लिये हुए पसीना पोंछते-पोंछते तेज़ी से चला जा रहा था; मैंने पूछा, “महाशय, नन्द मिस्री का घर कहाँ है, क्या आप बतला सकते हैं?”

वह आदमी रुककर खड़ा हो गया, “कौन नन्द? क्या आप रिबिट-घर के नन्द पागडी को खोज रहे हैं?”

मैंने कहा, “सो तो जानता नहीं महाशय, कि वे किस घर के हैं। उन्होंने केवल यही परिचय दिया था कि वे रंगून के विख्यात नन्द मिस्री हैं।” उस आदमी ने एक प्रकार का असम्मान-सूचक मुँह का भाव बनाकर कहा, “ओ:-मिस्तरी! ऐसे तो सभी अपने को मिस्तरी कहलवाते हैं महाशय, पर मिस्तरी होना सहज नहीं है। मर्कट साहब ने जब मुझसे कहा था कि हरिपद, तुमको छोड़कर मिस्तरी होने लायक आदमी मुझे और कोई नहीं दीख पड़ता, तब क्या आप जानते हैं कि बड़े साहब के समीप कितनी अनिश्चित अर्जियाँ पड़ी हुई थीं? करीब एक सौ के। आरी और बसूले का जोर हो, तो अर्जियों की जरूरत ही क्या है? काटकर जो जोड़ दे सकता हूँ! किन्तु महाशय, आप जानते हैं...”

मैंने देखा, अनजान में ही मैंने इस आदमी के ऐसी जगह पर चोट पहुँचा दी है जिसकी मीमांसा होना कठिन है। इसलिए, चट से मैंने रुकावट डालकर कहा, “फिर, नन्द नाम के किसी भी आदमी को आप नहीं जानते?”

“यह आपने खूब कहा! चालीस वर्ष से रंगून में रह रहा हूँ, मैं जानता किसे नहीं? नन्द क्या एक है? तीन-तीन नन्द हैं! आपने नन्द मिस्तरी कहा न? कहाँ से आ रहे हैं आप? शायद बंगाल से, न? ओह, तब कहो न कि टगर के मर्द को पूछ रहे हैं?”

मैंने सिर हिलाकर कहा, “हाँ, हाँ, जरूर वही!”

वह बोला, “तो फिर यह कहिए। परिचय पाए बगैर पहिचानूँ कैसे? आइए मेरे साथ तकदीर के जोर से नन्द कमा खा रहा है महाशय, नहीं तो नन्द पागड़ी भी क्या कोई मिस्तरी है? महाशय, आप कौन हैं?”

यह सुनकर कि मैं ब्राह्मण हूँ, उस आदमी ने रास्ते पर ही झुककर मुझे प्रणाम किया। बोला, “वह आपकी नौकरी लगा देगा? साहब से कहकर आपकी तजबीज लगवा सकता है जरूर; किन्तु, दो महीने की तनख्वाह उसे पहले ही घूँस में देनी होगी। दे सकेंगे क्या? दे सकें तो अठारह-बीस आने रोज की नौकरी लगा सकता है। इससे अधिक की नहीं।”

मैंने उसे बताया कि फिलहाल तो मैं नौकरी की उम्मेदवारी में नहीं जा रहा हूँ- थोड़े से आश्रय की तजवीज की गरज से ही बाहर निकला हूँ, और, इसकी आशा नन्द मिस्री ने जहाज पर दिलाई थी।

यह सुनकर हरिपद मिस्री ने आश्चर्य से पूछा, “महाशय, आप भले आदमी हैं, तो फिर, भले आदमियों के 'मेस' में क्यों नहीं जाते?” मैंने कहा, “मेस कहाँ है, सो तो जानता ही नहीं।”

उसे भी नहीं मालूम, यह उसने स्वीकार किया। किन्तु, उस जून खोज करके बताने की आशा देकर वह बोला, “किन्तु, इस समय तो नन्द से मुलाकात हो न सकेगी; वह काम पर गया है, टगर साँकल दिए सो रही है और पुकार कर उसकी नींद भंग करने में खैर नहीं!”

यह तो खूब जानता था। इसलिए रास्ते के बीच मुझे वहाँ करते देखकर उसने हिम्मत देकर कहा, “न गये वहाँ तो क्या! दादा ठाकुर का बढ़िया होटल सामने ही है। वहाँ स्नान-भोजन करके नींद ले लीजिए, उस बेला फिर देखा जायेगा।”

हरिपद के साथ बातें करते-करते जब मैं दादा ठाकुर के होटल में पहुँचा तब होटल के डायनिंग रूम में (=भोजन के कमरे में) करीब पन्द्रह आदमी भोजन करने बैठे थे।

अंगरेजी में दरो शब्द हैं 'इन्स्टिक्ट' और “प्रेज्युडिस', किन्तु, हमारे यहाँ, केवल एक ही शब्द है 'संस्कार'। यह समझना कठिन नहीं है कि एक जो है सो दूसरा नहीं। अर्थात् दोनों शब्द अंगरेजी में भिन्न-भिन्न भाववाची हैं। किन्तु दादा ठाकुर के उक्त होटल के सम्पर्क में आकर यह बात आज पहले ही पहल मुझे मालूम हुई कि हम लोगों का जाति-भेद, खान-पान आदि वस्तुएँ 'इन्स्टिक्ट' के हिसाब से 'संस्कार' नहीं है, और यदि ये 'संस्कार' हों भी तो कितने तुच्छ हैं- इनके बन्धन से मुक्त होना कितना सहज है, यह सब प्रत्यक्ष देखकर मैं आश्चर्य से चकित हो गया। हमारे देश में यह जो असंख्य जाति-भेद की श्रृंखला है, इसे दोनों पैरों में पहिनकर झनझनाते हुए विचरण करने में कितना गौरव और मंगल है, इसकी आलोचना तो इस समय रहने दूँगा; किन्तु यह बात मैं निस्सन्देह कह सकता हूँ कि जो लोग इसे अपने छोटे-छोटे-से गाँवों में बिल्कुनल बेखटके जमे हुए पुरखों से चला आता हुआ संस्कार बताकर स्थिर रखे हुए हैं, और इसके शासन-जाल को तोड़ने की दुरूहता के सम्बन्ध में जिन्हें लेशमात्र भी अविश्वास नहीं है, उन लोगों ने इस बड़े भारी भ्रम को जान-बूझकर ही पाल रक्खा है। वास्तव में जिस देश में खाने-पीने में छुआछूत का विचार प्रचलित नहीं है उस देश में कदम रखते ही यह अच्छी तरह देखा जाता है कि यह छप्पन पुश्तों की खाने-पीने में छुआछूत रखने की सांकल न जाने कैसे रातों-रात खुलकर अलग हो जाती है। विलायत जाने से जाति चली जाती है इसका एक मुख्य कारण यह बतलाया जाता है कि वहाँ निषिद्ध माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस खाना पड़ता है। यहाँ तक कि जो लोग अपने देश में भी कभी माँस नहीं खाते, उनकी भी चली जाती है; कारण, जिन्होंने जाति मारने का इजारा ले रखा है वे पंच लोग कहते हैं कि वहाँ मांस न खाने पर भी समझ लेना चाहिए कि 'खाया ही है'।

और उनका यह कहना निहायत गलत भी नहीं है। बर्मा तो तीन-चार दिन का ही रास्ता है; फिर भी मैंने देखा है कि पन्द्रह आने बंगाली भले आदमी जिनमें शायद ब्राह्मण ही अधिक होंगे- क्योंकि इस युग में उन्हीं के लोभ ने सबको मात कर दिया है- जहाज के होटल में ही सस्ते दामों में पेट भर लेते हैं तब कहीं सूखी जमीन पर पदार्पण करते हैं। उस होटल में मुसलमान और गोआनीज बावर्ची क्या राँधकर 'सर्व' करते हैं, यह सवाल अप्रिय हो सकता है; किन्तु, वे लोग हविष्यान्न पकाकर केले के पत्तों में नहीं परोसते होंगे, यह अनुमान करना तो भाटपाड़े के भट्टाचार्यों के लिए भी शायद कठिन नहीं है- फिर मैं तो ठहरा साथ का मुसाफिर। जो लोग कम से कम यह सब नहीं खाना चाहते वे भी हार मानकर अन्त में चाह-रोटी, फल फूलादि तो खाते ही हैं! मैंने देखा है कि एकदम निषिद्ध मांस से लेकर मत्तमान और रम्भा (केले की दो जातियाँ) तक सब कुछ एक में ही गड्डमड्ड करके जहाज के कोल्ड-रूम में रक्खा जाता है और यह काम किसी की नजर से छुपाकर करने की पद्धति भी मैंने जहाज के नियम-कानूनों में नहीं देखी। हाँ, फिर भी, आराम की बात यह है कि बर्मा- जाने वाले यात्री की जाति जाने का कानून, शायद, किसी तरह शास्त्रकारों की 'सिविल कोड' की नजर बचा गया है। नहीं तो शायद फिर एक छोटी-मोटी ब्राह्मण-सभा की जरूरत होती! जाने दो, भले लोगों की बात आज यहीं तक रहे।

होटल में जो लोग पंक्तिबद्ध होकर भोजन करने बैठे थे वे भले आदमी नहीं थे- कम से कम हम लोग उन्हें 'भला' नहीं मानते। सब लोग कारीगर थे, साढ़े दस बजे की छुट्टी में भोजन करने आए थे। शहर के इस हिस्से में एक बड़ा मैदान है जिसके तीन तरफ नाना आकार और प्रकार के कारखाने हैं, और इस बस्ती के बीच एक तरफ को दादा ठाकुर का यह होटल है। एक विचित्र बस्ती है। एक कतार में, एक से एक सटी हुई, जीर्ण काठ की छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी हुई हैं। इनमें चीनी, बर्मी, मद्रासी, उड़िया, तैलंगी, चटगाँव के हिन्दू और मुसलमान आदि सभी रहते हैं; और, रहते हैं हमारी जाति के बंगाली भी। इनके समीप मैंने पहले ही पहल यह सीखा है कि किसी को भी छोटी जाति का कहकर घृणा करके उसे दूर रखने की बुरी आदत का परित्याग करना कोई बड़ा कठिन काम नहीं है। जो नहीं करते वे अशक्यता के कारण न करते हों सो बात नहीं है; किन्तु, जिस कारण वे नहीं करते उसे प्रकाशित कर देने से झगड़ा बढ़ खड़ा होगा।

दादा ठाकुर ने आकर यत्नपूर्वक मेरा स्वागत किया और एक छोटा-सा कमरा दिखाकर कहा, “जितने दिन आपकी इच्छा हो इस कमरे में रहें और हमारे यहाँ भोजन करें। नौकरी-चाकरी लगने की बाद दाम चुका देना।”

मैंने कहा, “मुझे तो आप पहिचानते नहीं हैं, एक महीने रहकर और खा-पीकर बिना दाम दिये भी तो चला जा सकता हूँ।”

दादा ठाकुर ने अपना कपाल दिखाते हुए हँसकर कहा, “इसे तो आप साथ में ले नहीं जा सकते महाशय!”

मैंने कहा, “जी नहीं, उस पर मुझे जरा भी लोभ नहीं है।”

दादा ठाकुर सिर हिलाते-हिलाते इस दफे परम गम्भीर भाव बनाकर बोले, “देखिए, तकदीर भी है महाशय! इसके सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं, यही मैं सब लोगों से कहा करता हूँ।”

वास्तव में केवल उनका जबानी जमाखर्च नहीं था। इस सत्य पर वे स्वयं किस कदर अकपट रूप से विश्वास करते थे यह हाथों-हाथ प्रमाणित करने के लिए चार-पाँच महीने के बाद, एक दिन वे प्रात:काल बहुतों की धरोहर-रुपये-पैसे अंगूठी, घड़ी इत्यादि साथ लेकर केवल उनके निराट कपालों को बर्मा में उस शून्य होटल के भेज पर जोर से पटकने के लिए छोड़कर अपने देश चले गये।

जो भी हो, उस समय दादा ठाकुर की बात सुनने में बुरी नहीं लगी और मैं भी उनका एक नया मुवक्किल बनकर एक टूटा-सा कमरा दखल करके बैठ गया। रात को एक कच्ची उम्र की बंगालिन दासी मेरे कमरे में आसन बिछाकर भोजन के लिए जगह करने आई; पास में ही डायनिंग रूम में से लोगों के भोजन का शोर सुनाई दे रहा था। मैंने पूछा, “मुझे भी वहाँ ही न कराके यहाँ भोजन कराने क्यों लाई?”

वह बोली, “वे लोग तो हल के दर्जे के लोहा काटने-पीटनेवाले मजदूर हैं बाबू, उनके साथ आपको कैसे खिलाया जा सकता है?”

अर्थात् वे थे 'वर्कमेन' और मैं था 'भला आदमी'। मैंने हँसकर कहा, “मुझे भी यहाँ क्या-क्या काटना-पीटना पड़ेगा सो तो अब भी निश्चित नहीं हुआ है। जो भी हो, आज खिलाती हो तो खिला जाओ, किन्तु, कल से मुझे भी उन्हीं के साथ उसी कमरे में खिलाना।”

दासी बोली, “आप बाम्हन हैं, आपको वहाँ खाने की जरूरत नहीं।”

“क्यों? वे सब बंगाली तो हैं?”

दासी ने गले को जरा धीमा करके कहा, “बंगाली जरूर हैं, किन्तु उनमें एक डोम भी है।”

डोम! देश में यह जाति अस्पृश्य-अछूत है। छू जाने पर स्नान करना 'कम्पलसरी' (=अनिवार्य) है या नहीं सो तो नहीं मालूम; किन्तु यह जानता हूँ कि कपड़े बदलकर गंगाजल सिर पर छिड़कना पड़ता है। अत्यन्त अचरज से मैंने पूछा, “और सब?”

दासी बोली, “और सब अच्छी जाति के हैं। कायथ हैं, कैवर्त (=केवट) हैं, अहीर हैं, लुहार...”

“ये लोग कोई आपत्ति नहीं करते?”

दासी अब कुछ हँसकर बोली, “इस पर देश में सात समुन्दर पार आकर क्या इतनी बमहनयी चल सकती है बाबू? वे कहते हैं, देश लौटकर गंगा-स्नान करके एक अंग-प्रायश्चित कर लेंगे।

भले ही कर लें किन्तु, मुझे मालूम है कि जो दो-चार आदमी बीच-बीच में देश जाते हैं वे चलते-चलाते कलकत्ते की गंगा में एकाध दफे गंगा-स्नान तो शायद कर लेते हों; किन्तु, अंग-प्रायश्चित कभी कोई नहीं करता। परदेश की आब-हवा के प्रभाव से ये लोग उस पर विश्वास नहीं रखते।

देखा कि होटल में सिर्फ दो हुक्के हैं। एक तो ब्राह्मणों के लिए, दूसरा जो ब्राह्मण नहीं हैं उनके लिए। भोजनादि के बाद कैवर्त के हाथ से डोम और डोम के हाथ से लुहार महाशय ने हाथ बढ़ाकर हुक्का ग्रहण किया और स्वच्छन्दता से पिया। दुविधा का लेश भी नहीं। दो दिन बाद उस लुहार के साथ बातचीत करते हुए मैंने पूछा, “अच्छा, इस तरह तुम्हारी जाति नहीं जाती?”

लुहार बोला, “जाती क्यों नहीं महाशय, जाती तो है ही!”

“तब?”

“उसने पहिले डोम कहकर अपना परिचय थोड़े ही दिया था; कहा था कि मैं कैवर्त हूँ। इसके बाद ही सब मालूम पड़ा।”

“तब तुम लोगों ने कुछ नहीं कहा?”

“कहते और क्या महाशय, काम तो बहुत ही बुरा हुआ, यह तो मंजूर करना ही पड़ता है। लेकिन कहीं उसे शर्मिन्दगी न उठानी पड़े, यह सोचकर सबने जान-बूझकर मामले को दबा दिया।”

“किन्तु देश में होते तो क्या होता?”

वह आदमी जैसे सिहर उठा। बोला, “तो, क्या फिर किसी की रक्षा हो सकती थी?” इसके बाद जरा-सा चुप रहकर वह खुद ही बोलने लगा, “किन्तु आप जानते हैं बाबू मैं ब्राह्मनों की बात नहीं कहता- वे ठहरे वर्णों के गुरु, उनकी बात ही अलहदा है। नहीं तो, बाकी और सब जात समान हैं। चाहे तेली, माली, तमोली, अहीर, नाई, बढ़ई, लुहार, कुम्हार और गंधी इन नौ शाखाओं के हिन्दू हों, चाहे हाड़ी-डोम आदि हों- किसी के शरीर पर कुछ लिखा तो है नहीं; सभी भगवान के बनाए हैं, सब एक हैं, सभी पेट की ज्वाला से जलकर परदेश में आए हैं और लोहा पीट रहे हैं। और सोचिए तो बाबू, हरि मोडल डोम है तो क्या हुआ? शराब पीता नहीं, गाँजा छूता नहीं- आचार-विचार को देखकर कौन कह सकता है कि वह अच्छी जात का नहीं है- डोम का लड़का है! और लक्ष्मण- वह तो भले कायथ का लड़का है, पर उसके आचार-विचार को देखो न एक बार, बच्चू दो-दो बार जेल जाते-जाते बचे हैं। हम सब नहीं होते तो अब तक जेल में पड़े-पड़े मेहतर के हाथ की रोटियाँ खाते होते।”

न तो मुझे लक्ष्मण के सम्बन्ध में ही किसी तरह का कुतूहल हुआ और न हरि मोडल ने अपने डोमत्व को छिपाकर कितना बड़ा अन्याय किया इसकी मीमांसा करने की ही मेरी प्रवृत्ति हुई। मैं सिर्फ यही सोचने लगा कि जिस देश में भले आदमी तक जासूस लगाकर अपने जन्म के पड़ोसी के छिद्र ढूँढ़कर और उसके पितृ-श्राद्ध को बिगाड़कर आत्म-तुष्टि लाभ करते हैं, उसी देश के अक्षिक्षित, नीच जातीय होने पर भी इन लोगों ने एक अपरिचित बंगाली का इतना बड़ा भयंकर अपराध भी माफ कर दिया! और- केवल इतना ही नहीं, पीछे से इस परदेश में कहीं उसे लज्जित और दीन होकर न रहना पड़े, इस आशंका से उस प्रसंग को उठाया तक नहीं! यह सब असम्भव कार्य किस तरह सम्भव हुआ, विदेशी आदमी भले ही न समझ सकें, परन्तु, हम तो समझ सकते हैं कि हृदय की कितनी विशालता और मन की कितनी बड़ी उदारता इसके लिए आवश्यक है! यह केवल उनके देश छोड़कर विदेश आने का फल है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। खयाल हुआ कि इसी शिक्षा की हमारे देश को इस समय सबसे अधिक जरूरत है। सारी जिन्दगी अपने छोटे से गाँव में ही बैठकर बिता देने से बढ़कर मनुष्यों को सब विषयों में छोटा, संकुचित कर देने वाला बड़ा शत्रु और कोई नहीं है। खैर, जाने दो इस बात को।

इन लोगों के साथ मैं बहुत दिनों तक रहा। किन्तु जब तक उन्हें यह न मालूम हुआ कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, केवल तब तक ही मुझे इनके साथ घनिष्ठता से मिलने-जुलने का सुयोग मिलता रहा- उनके सब तरह के सुख-दु:खों में मैं भी हिस्सेदार बनता रहा, किन्तु जिस क्षण ही उन्हें मालूम हुआ कि मैं भला आदमी हूँ और मुझे अंगरेजी आती है, उसी क्षण से उन्होंने मुझे गैर समझना शुरू कर दिया। अंगरेजी जानने वाले शिक्षित भले आदमियों के समीप ये लोग आपद्-विपद् के समय जाते जरूर हैं, उनसे सलाह-मशविरा भी करते हैं- यह भी सच है, परन्तु, ये लोग न तो उन पर विश्वास ही करते हैं और न उन्हें अपना आदमी ही समझते हैं। देश के इस कुसंस्कार को वे आज भी दूर नहीं कर पाए हैं कि मैं उन्हें छोटा समझकर मन ही मन घृणा नहीं करता हैं,- पीछे-पीछे उनका उपहास नहीं करता हूँ। केवल इसी कारण मेरे कितने सत्संकल्प इन लोगों के बीच विफल हो गये हैं। मैं समझता हूँ, उनकी कोई सीमा नहीं। किन्तु खैर, आज इस बात को जाने दो।

मैंने देखा कि बंगाली स्त्रियों की संख्या भी इस ओर कुछ कम नहीं है। यद्यपि उनके कुलों का परिचय न देना ही अच्छा है; किन्तु, आज वे किसी और दूसरे ही रूप में परिवर्तित होकर एकदम शुद्ध गृहस्थों की धर्मपत्नियाँ बन गयी हैं। पुरुषों के मनों में तो शायद आज भी 'जाति' की पुरानी स्मृति बाकी बनी हुई है। किन्तु, स्त्रियाँ तो न कभी देश आती हैं और न देश के साथ कोई सम्पर्क ही रखती हैं। उनके बच्चे-बच्चियों से पूछा जाय तो वे यही कहते हैं कि “हम बंगाली हैं'- अर्थात् मुसलमान, क्रिस्तान, बर्मी आदि नहीं हैं- बंगाली हिन्दू हैं। आपस में विवाहादि, आदान-प्रदान, स्वच्छन्दता से होता है- केवल 'बंगाली' होना ही यथेष्ट है, और चटगाँव के किसी बंगाली ब्राह्मण द्वारा मन्त्र पढ़ाकर दोनों के हाथ मिलाकर एक कर दिया जाना ही बस है। विधवा हो जाने पर विधवा-विवाह का रिवाज नहीं है- सो शायद इसलिए कि पुरोहित मन्त्र पढ़ने को राजी नहीं होता। परन्तु वैधव्य भी ये पसन्द नहीं करतीं और फिर एक नयी गृहस्थी बना लेती हैं। उनके लड़के-बच्चे होते हैं और वे भी कहते हैं कि 'हम बंगाली हैं', तथा उनके विवाह में वही पुरोहित आकर वैदिक मन्त्र पढ़ाकर विवाह करा जाते हैं- इस दफे उन्हें तिल-भर भी आपत्ति नहीं होती। पति के द्वारा अत्यन्त दु:ख-यन्त्रणा पाने पर ये दूसरे का आश्रय भी ग्रहण करती हैं जरूर, किन्तु, यह अत्यन्त लज्जा की बात समझी जाती है और इसके लिए दु:ख-यन्त्रणा का परिमाण भी अत्यधिक होना चाहिए। परन्तु फिर भी, ये वास्तव में हिन्दू हैं और दुर्गा-पूजा से शुरू करके षष्टी महाकाली आदि कोई भी पूजा नहीं छोड़तीं।

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴By वनिता कासनियां पंजाब अध्याय 1अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?”अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।”मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।”अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।”अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...