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❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 5 इस अभागे जीवन के जिस अध्याय को, उस दिन राजलक्ष्मी के निकट अन्तिम बिदा के समय ऑंखों के जल में समाप्त करके आया था- यह खयाल ही नहीं किया था कि उसके छिन्न सूत्र पुन: जोड़ने के लिए मेरी पुकार होगी। परन्तु पुकार जब सचमुच हुई, तब समझा कि विस्मय और संकोच चाहे जितना हो, पर इस आह्नान को शिरोधार्य किये बिना काम नहीं चल सकता।इसीलिए, आज फिर मैं अपने इस भ्रष्ट जीवन की विशृंखलित घटनाओं की सैकड़ों जगह से छिन्न-भिन्न हुई ग्रन्थियों को फिर एक बार बाँधने के लिए प्रवृत्त हो रहा हूँ।आज मुझे याद आता है कि घर पर लौट आने के बाद मेरे इस सुख-दु:ख-मिश्रित जीवन को किसी ने मानो एकाएक काटकर दो भागों में विभक्त कर दिया था। उस समय खयाल हुआ था कि मेरे इस जीवन के दु:खों का बोझा केवल मेरा ही नहीं है। इस बोझे को लादकर घूमे वह, जिसको कि इसकी नितान्त गरज हो। अर्थात् मैं जो दया करके जीता बच गया हूँ, सो तो राजलक्ष्मी का सौभाग्य है। आकाश का रंग कुछ और ही नजर आने लगा था, हवा का स्पर्श कुछ और ही किस्म का मालूम होने लगा था- मानो, कहीं भी अब घर-बार, अपना-पराया, नहीं रहा था। एक तरह के ऐसे अनिर्वचनीय उल्लास से अन्तर-बाहर एकाकार हो गया था, कि रोग रोग के रूप में, विपदा विपदा के रूप में, अभाव अभाव के रूप में, मन में स्थान ही नहीं पा सकता था। संसार में कहीं जाते हुए, कहीं कुछ करते हुए, दुविधा या बाधा का जरा भी सम्पर्क नहीं रह गया था।यह सब बहुत दिन पहले की बातें हैं। वह आनन्द अब नहीं है; परन्तु उस दिन जीवन में इस एकान्त विश्वास की निश्चित निर्भरता का स्वाद एक दिन के लिए भी मैं उपभोग कर सका, यही मेरे लिए परम लाभ है। परन्तु, साथ ही, मैंने उसे खो दिया, इसका भी मुझे किसी दिन क्षोभ नहीं हुआ। केवल इस बात का ही बीच-बीच में खयाल आ जाता है कि जिस शक्ति ने उस दिन हृदय के भीतर जाग्रत होकर इतनी जल्दी संसार का समस्त निरानन्द हरण कर लिया था, वह कितनी विराट शक्ति है! और सोचता हूँ कि उस दिन अपने ही समान अन्य दो अक्षम दुर्बल हाथों के ऊपर इतना बड़ा गुरु-भार न डालकर यदि मैं समस्त जगद्-ब्रह्माण्ड के भारवाही उन हाथों पर ही अपनी उस दिन की उस अखण्ड विश्वास की समस्त निर्भरता को सौंप देना सीखता, तो फिर, आज चिन्ता ही क्या थी?-किन्तु, अब जाने दो उस बात को।राजलक्ष्मी को मैंने पहुँच का पत्र लिखा था। उस पत्रका जवाब बहुत दिनों बाद आया। मेरे अस्वस्थ शरीर के लिए दु:ख प्रकाशित करके गृहस्थ बनने के लिए उसने मुझे कई तरह के बड़े-बड़े उपदेश दिए थे और अपने संक्षिप्त पत्र यह लिखकर खत्म किया था कि यदि वह कामों के झंझटों के मारे पत्रादि लिखने का समय न पा सके, तो भी, मैं बीच-बीच में अपनी खबर उसे देता रहूँ और उसे अपना ही समझूँ।तथास्तु। इतने दिनों बाद उसी राजलक्ष्मी की यह चिट्ठी!आकाश-कुसुम आकाश में ही सूख गये और जो दो-एक सूखी पंखुड़ियां हवा से झड़ पड़ीं उन्हें बीन करके घर ले जाने के लिए भी मैं जमीन टटोलता नहीं फिरा। ऑंखों में से दो-एक बूँद पानी शायद पड़ा भी हो, किन्तु, वह मुझे याद नहीं। फिर भी, यह याद है कि और अधिक दिन मैंने स्वप्न देखते हुए नहीं काटे। तब भी इस तरह और भी पाँच-छह महीने कट गये।एक दिन सुबह बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। एकाएक एक अद्भुत पत्र आ पहुँचा। ऊपर औरतों के से कच्चे अक्षरों में नाम और ठिकाना लिखा था। खोलते ही पत्र के भीतर से एक छोटा-सा पत्र खट् से जमीन पर गिर पड़ा। उसे उठाकर तथा उसके अक्षर और नाम सही की ओर देखकर मैं मानो अपने दोनों नेत्रों पर भी विश्वास न कर सका। मेरी माँ, जो दस वर्ष पहले ही देह त्याग कर गयी थीं- उन्हीं के श्रीहस्त के ये दस्तखत थे, नाम और सही भी उन्हीं की थी। पढ़कर देखा, माँ ने उसमें अपनी 'गंगाजल¹' को जितना भी हो सकता है उतना अभय वचन दिया था। बात सम्भवत: यह थी, कि बारह-तेरह वर्ष पहले इस 'गंगाजल' के यहाँ जब अधिक उम्र में एक कन्या-रत्न ने जन्म ग्रहण किया, तब दु:ख, दैन्य और दुश्चिन्ता प्रकट करके शायद माँ को उसने एक पत्र लिखा होगा और उसी के प्रत्युत्तर में मेरी स्वर्गवासिनी जननी ने गंगाजल-दुहिता का विवाह का समस्त दायित्व ग्रहण करके जो पत्र लिखा था वही यह मूल्यवान दस्तावेज थी। तात्कालिक करुणा से पिघलकर माँ ने उपसंहार में लिखा था कि सुपात्र यदि कहीं न मिले, बिल्कुतल ही अभाव हो,¹ बंगाल में स्त्रियाँ जिसे अपनी सखी-सहेली बनाती हैं उसे 'गंगाजल' इस प्यार के नाम से सम्बोधित करती हैं।तो फिर मैं तो हूँ ही! सारी चिट्ठी को ऊपर से नीचे तक दो बार पढ़कर मैंने देखा कि वह मुंशियाना ढंग से लिखी गयी है। माँ को वकील होना चाहिए था क्योंकि जितनी भी कल्पनाएँ की जा सकतीं थीं उतनी तरह से वे अपने आपको और अपने वंशधरों को उस दायित्व में बाँध गयी हैं। उससे बचने के लिए दस्तावेज में कहीं जरा-सी भी जगह- जरा-सी भी त्रुटि, नहीं छोड़ी गयी है।वह चाहे जो हो, पर ऐसा तो मुझे नहीं मालूम पड़ा कि 'गंगाजल' इन सुदीर्घ तेरह वर्षों तक इस पक्के दस्तावेज के ही भरोसे निर्भय हो चुपचाप बैठी रही है। परन्तु, उलटे मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि बहुत प्रयत्न करने पर भी जब रुपये और निजी मनुष्यों के अभाव से सुपात्र उसके लिए एकबारगी अप्राप्य हो गया, और कुमारी कन्या की शारीरिक उन्नति की ओर दृष्टिपात करने से हृदय का रक्त मस्तिष्क में चढ़ने की तैयारी करने लगा, तब कहीं जाकर इस हतभाग्य सुपात्र के ऊपर उन्होंने अपना एकमात्र ब्रह्मास्त्र फेंका है।माँ यदि जीती होतीं तो इस चिट्ठी के लिए आज मैं उनका सिर खा जाता और उनके पैरों पर जोर से सिर पटककर अपनी ज्वाला को बुझाता, परन्तु यह रास्ता भी मेरे लिए बन्द है।इसलिए, माँ का तो कुछ भी नहीं कर सका परन्तु, अब उनकी गंगाजल का भी कुछ कर सकता हूँ या नहीं, यह परखने के लिए मैं एक दिन रात्रि को स्टेशन पर जा पहुँचा। सारी रात ट्रेन में काटकर दूसरे दिन जब उनके गाँव के मकान पर पहुँचा तब दिन ढल गया था। गंगाजल-माँ पहले तो मुझे पहिचान न सकीं। अन्त में, परिचय पाकर इन तेरह वर्षों के बाद भी वे इस तरह रो पड़ीं जिस तरह कि माँ की मृत्यु के समय उनका कोई अपना आदमी भी ऑंखों के सामने उनकी मृत्यु होते देखकर, न रो सका होता।वे बोलीं कि लोकदृष्टि से और धर्मदृष्टि से, दोनों ही तरह अब मैं तुम्हारी माता के समान हूँ और फिर दायित्व ग्रहण करने की प्रथम सीढ़ी के रूप में उन्होंने मेरी सांसारिक परिस्थिति का बारीकी से पर्यालोचन करना शुरू कर दिया। बाप कितना छोड़ गये हैं, माँ के कौन-कौन से गहने हैं और वे किसके पास हैं, मैं नौकरी क्यों नहीं करता और यदि करूँ तो अन्दाज से क्या महीना पा सकता हूँ, इत्यादि-इत्यादि। उनका मुँह देखकर खयाल हुआ कि इस आलोचना का फल उनके निकट कुछ वैसा सन्तोषजनक नहीं हुआ। वे बोलीं कि उनका एक रिश्तेदार बर्मा में नौकरी करके 'लाल' हो गया है, अर्थात् अतिशय-धनवान हो गया है। वहाँ तो राह-घाट में रुपये बिखरे पड़े हैं, केवल समेटने-भर की देर है! वहाँ पर जहाज से उतरते न उतरते ही बंगालियों को साहब लोग कन्धों पर उठा ले जाते हैं और नौकरी से लगा देते हैं। इस तरह की बहुत-सी बातें कहीं। बाद में मैंने देखा कि यह गलत धारणा केवल अकेली उन्हीं की नहीं थी। ऐसे बहुत-से लोग इस माया-मरीचिका से उन्मत्तप्राय होकर सहाय-सम्बलहीन अवस्था में वहाँ दौड़ गये हंु और मोह भंग होने के बाद उन्हें वापिस लौटाने में हम लोगों को कम क्लेश सहन नहीं करना पड़ा है। परन्तु वह बात इस समय रहने दो। गंगाजल-माँ का बर्मा-वर्णन मुझे तीर की तरह लगा। 'लाल' होने की आशा से नहीं-मेरे भीतर का जो घुमक्कड़पन कुछ दिनों से सोया हुआ था वह अपनी थकावट झाड़-पोंछकर मुहूर्त-भर में ही उठ खड़ा हुआ। जिस समुद्र को इसके पहले केवल दूर से खड़े-खड़े देखकर ही मुग्ध हो जाता था, अब उस अनन्त जलराशि को भी भेद करके मैं जा सकूँगा- इस इच्छा ने ही मुझे एकबारगी बेचैन कर दिया। तब किसी तरह एक बार छुटकारा पाना ही होगा।मनुष्य मनुष्य से जितने प्रकार की भी जिरह कर सकता है, उनमें से किसी भी प्रकार की जिरह में गंगाजल-माँ ने मुझे नहीं छोड़ा। फिर भी, अपनी लड़की के योग्य पात्र की दृष्टि से उन्होंने मुझे रिहाई दे दी- इस विषय में मैं एक तरह से निश्चिन्त ही हो गया। परन्तु, रात्रि में भोजन के समय उनकी भूमिका का झुकाव देखकर मैं फिर उद्विग्न हो उठा। मैंने देखा, मुझे एकबारगी हाथ से जाने देने की उनकी इच्छा नहीं है। उन्होंने यह कहना शुरू किया कि यदि लड़की के भाग्य में न हो, तो धन, घर-बार, शिक्षा-दीक्षा आदि कितना ही क्यों न देखा जाय, सब कुछ निष्फल है। इस सम्बन्ध में नाम-धाम, विवरणादि के साथ बहुत-सी विश्वास योग्य नजीरें देकर उन्होंने इस बात को प्रमाणित भी कर दिखाया। इतना ही नहीं, इसके विरुद्ध ऐसे भी कितने ही लोगों का नामोल्लेख किया कि जो निराट मूर्ख होते हुए भी केवल स्त्री के ही सौभाग्य के जोर पर इस समय दिन-रात रुपयों के ढेर पर बैठे रहते हैं।मैंने विनय सहित कह दिया कि रुपये-पैसे की तरफ मेरी आसक्ति तो है, फिर भी, चौबीसों घण्टे उन पर बैठा रहूँ, यह विवेचना मुझे प्रीतिकर नहीं मालूम होती और इसके लिए स्त्री का सौभाग्य देखने का कुतूहल भी मुझे नहीं है। किन्तु इसका कोई विशेष फल नहीं हुआ। उन्हें निरस्त न कर सका। क्योंकि, जो स्त्री तेरह वर्ष के इतने लम्बे समय के पश्चात् भी एक पत्र को दस्तावेज के रूप में पेश कर सकती है, उसे इतने सहज में नहीं भुलाया जा सकता। वे बार-बार कहने लगीं कि इसे माता के ऋण के ही रूप में ग्रहण करना उचित है, और जो सन्तान समर्थ होते हुए भी मातृ-ऋण का परिशोध नहीं करती वह... इत्यादि-इत्यादि।जब मैं बहुत ही शंकित और विचलित हो उठा, तब बातों ही बातों में मुझे मालूम हुआ कि पास के गाँव में यद्यपि एक सुपात्र है, परन्तु, पाँच सौ रुपये से कम में उसका पाना असम्भव है।एक क्षीण आशा की रश्मि नजर आई। महीने-भर के बाद जैसे भी हो कोई उपाय कर दूँगा- यह वचन देकर दूसरे दिन सुबह ही मैंने प्रस्थान कर दिया। परन्तु उपाय किस तरह करूँगा- किसी ओर भी उसका कोई कूल किनारा नजर नहीं आया।मेरे ऊपर लादा गया यह भार मेरे लिए कोई सचमुच की वस्तु नहीं हो सकता, यह मैं अनेक तरह से अपने आपको समझाने लगा; परन्तु फिर भी, माँ को इस प्रतिज्ञा के पाश से मुक्ति न देकर चुपचाप खिसक जाने की बात भी किसी तरह मैं नहीं सोच सका।शायद एक उपाय था- मैं यह बात प्यारी से कहूँ। किन्तु, कुछ दिनों तक इस सम्बन्ध में भी मैं अपने मन को स्थिर न कर सका। बहुत दिनों से मुझे उसकी खबर भी नहीं मिली थी। उस पहुँच की खबर को छोड़कर मैंने उसे और कोई चिट्ठी भी नहीं लिखी थी। उसने भी उसके जवाब के सिवाय, दूसरा पत्र नहीं लिखा। इस बात को वह शायद नहीं मानती थी कि चिट्ठी-पत्री के द्वारा ही दोनों के बीच मिलाप का एक सूत्र रहता है। कम से कम उसके उस पत्र से तो मैं समझा। फिर भी अचरज की बात है कि दूसरे की लड़की के लिए भिक्षा माँगने के बहाने एक दिन मैं सचमुच ही पटने जा पहुँचा।मकान में प्रवेश करते ही नीचे बैठने के कमरे के बरामदे में मैंने देखा कि वर्दी पहने हुए दो दरबान बैठे हैं। वे एकाएक एक साधारण से अपरिचित आगन्तुक को देखकर कुछ इस तरह देखते रह गये कि मुझे सीधे ऊपर चढ़ जाने में संकोच मालूम हुआ। इन्हें मैंने पहले नहीं देखा था। प्यारी के पुराने बूढ़े दरबानजी के बदले इन दो और दरबानों की क्या आवश्यकता आ पड़ी, यह मैं न सोच सका। जो भी हो, इनकी परवाह किये बगैर ऊपर चला जाऊँ अथवा विनय के साथ इनकी अनुमति माँगूँ- यह स्थिर करते-करते ही मैंने देखा कि रतन व्यस्त हुआ-सा नीचे आ रहा है। अकस्मात् मुझे देखकर वह पहले तो अवाक् हो गया; बाद में पैरों की ओर झुककर प्रणाम करके बोला-“आप कब आए? यहाँ कैसे खड़े हैं?”“अभी ही आ रहा हूँ, रतन। सब कुशल तो है न?”रतन सिर हिलाकर बोला, “सब कुशल है, बाबू। ऊपर चलिए- मैं बरफ खरीदकर अभी आया।” कहकर वह जाने लगा।“तुम्हारी मालकिन ऊपर ही हैं?”“हाँ हैं”, कहकर वह जल्दी से बाहर चला गया।ऊपर चढ़ते ही जो पास का कमरा मिलता है वह बैठकखाना है। भीतर से एक ऊँची हँसी का शब्द और बहुत से लोगों की आवाज सुनाई दी। मैं जरा विस्मित हुआ। परन्तु, दूसरे ही क्षण, द्वार के नजदीक पहुँचकर मैं अवाक् हो गया। पिछली दफे इस कमरे को व्यवहार में आते नहीं देखा था। इसमें तरह-तरह के साज-सामान, टेबल, चेअर आदि अनेक चीजें एक कोने में ढेर होकर पड़ी रहती थीं। बहुधा कोई इस कमरे में आता भी न था। आज देखता हूँ, सम्पूर्ण कमरे में बिस्तर है, शुरू से अन्त तक कार्पेट बिछा हुआ है और उसके ऊपर सफेद जाजम झक-झककर रही है। तकियों के ऊपर गिलाफ चढ़े हुए हैं और उनके सहारे बैठे हुए कुछ सभ्य पुरुष अचरज से मेरी ओर देख रहे हैं। उनकी पोशाक में बंगालियों की तरह धोती होने पर भी सिर पर की बेल-बूटेदार मसलिन की टोपी से वे बिहारी से मालूम होते थे। तबले की जोड़ी के पास एक हिन्दुस्तानी तबलची था और उसके पास में भी स्वयं प्यारीबाई थीं। एक तरफ छोटा-सा हारमोनियम रखा था। प्यारी के शरीर पर यद्यपि मुजरे की पोशाक नहीं थी, फिर भी बनाव-सिंगार का अभाव नहीं था। समझ गया कि संगीत की बैठक जमी हुई है- थोड़ी देर विश्राम लिया जा रहा है।मुझे देखते ही प्यारी के चेहरे का समस्त खून मानो कहीं अन्तर्हित हो गया। इसके बाद उसने जबर्दस्ती कुछ हँसकर कहा, “यह क्या, श्रीकान्त बाबू हैं। कब आये?”“आज ही।”“आज ही? कब? कहाँ ठहरे हैं?”क्षण-भर के लिए शायद मैं कुछ हतबुद्धि-सा हो गया; नहीं तो उत्तर देने में देर न होती। परन्तु, अपने आपको सम्हा्लने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। मैंने कहा, “यहाँ के सब लोगों को तुम चीन्हती नहीं हो, इसलिए, नाम सुनकर भी न चीन्ह सकोगी।”जो महाशय सबसे अधिक बने-ठने थे वही शायद इस यज्ञ के यजमान थे। बोले, “आइए बाबूजी, बैठिए।” इतना कहकर होठों को दबाकर जरा वे हँसे। भाव-भंगी से उन्होंने यह प्रकट किया कि हम दोनों का सम्बन्ध वे ठीक तौर से भाँप गये हैं! उनका आदर के साथ अभिवादन कर मैंने, जूते के फीते खोलने के बहाने, मुँह नीचा करके परिस्थिति को भाँप लेना चाहा। विचार करने के लिए अधिक समय नहीं था, यह ठीक है, परन्तु, इन थोड़े से क्षणों में मैंने यह स्थिर कर लिया कि हृदय के भीतर कुछ भी हो, बाहर के व्यवहार में वह किसी भी तरह प्रकाशित न होना चाहिए। मेरे मुँह की बातचीत से, ऑंखों की चितवन से, मेरे सारे आचरण के किसी भी छिद्र में से, अन्तर के क्षोभ अथवा अभिमान की एक बूँद भी बाहर आकर न गिरनी चाहिए। क्षण-भर बाद जब मैं सबके बीच में जाकर बैठा तब, यद्यपि यह सच है कि अपने मुख की सूरत अपनी ऑंखों न देख सका, किन्तु भीतर ही भीतर मैंने अनुभव किया कि अब उस पर अप्रसन्नता का लेशमात्र भी चिह्न नहीं रह गया है। राजलक्ष्मी की ओर देखकर मैं हँसते हुए बोला, “बाईजी, यदि शुकदेव मुनिका पता पा जाता तो आज तुम्हारे सामने बिठाकर एक दफा उनके मन की शक्ति की जाँच कर लेता! अरे, यह किया क्या है! यह तो रूप का समुद्र ही बहा दिया है!”प्रशंसा सुनकर प्रमुख बाबू साहब आह्लाद से गलकर सिर हिलाने लगे। वे पुर्निया जिले के रहने वाले थे; मैंने देखा कि बोल न सकने पर भी बंगला अच्छी तरह समझते हैं। परन्तु प्यारी के कान तक लाल हो उठे।-किन्तु, लाज के मारे नहीं- गुस्से के मारे, यह भी समझने में कुछ बाकी न रहा। परन्तु, उस ओर भ्रूक्षेप भी न करके बाबू साहब को उद्देश्य करके मैंने उसी तरह हँसते हुए कहा, “मेरे आने के कारण यदि आप लोगों के आमोद-प्रमोद में थोड़ा-सा भी विघ्न होगा, तो मुझे बहुत दु:ख होगा। गाना-बजाना चलने दीजिए।”बाबूजी इतने प्रसन्न हो उठे कि आवेश में आकार मेरी पीठ पर एक धौल जमाकर बोले, “बहुत अच्छा बाबू। हाँ प्यारी बीबी, एक बढ़िया-सा गाना चलने दो।”“संध्याए के बाद होगा- बस अब और नहीं।” कह कर प्यारी हारमोनियम दूर खिसकाकर सहसा उठा खड़ी हुई।इसी समय बाबू साहब मेरा परिचय पाने के उपलक्ष्य से अपना परिचय देने लगे- उनका नाम था रामचन्द्र सिंह। वे पुर्निया जिले के एक जमींदार हैं, दरभंगा- महाराजा उनके कुटुम्बी हैं, प्यारी बीबी को सात-आठ वर्ष से जानते हैं। वे उनके पुर्निया के मकान पर तीन-चार दफे मुजरा कर आई हैं। वे खुद भी अनेक दफे गाना सुनने यहाँ आए हैं। कभी-कभी दस-दस बारह-बारह दिन तक वे यहीं रहते हैं और तीनेक महीने पहले एक दफे आकर वे एक हफ्ते तक यहाँ रह गये हैं- वगैरह वगैरह। अब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। मेरे जवाब देने के पहले ही वहाँ प्यारी आ उपस्थित हुई। उसकी ओर देखकर मैंने कहा, “बाईजी से ही पूछिए न, कि क्यों आया हूँ।”प्यारी ने मेरे मुँह पर एक तीव्र कटाक्ष डाला, परन्तु, जवाब दिया सहज शान्त स्वर में ही, “ये हमारे देश के आदमी हैं।”मैंने हँसकर कहा, “बाबूजी, मधु होने पर मधुमक्खियाँ आकर जुट जाती हैं, वे देश-विदेश का विचार नहीं करतीं।” किन्तु इतना कहते ही मैंने देखा कि रहस्य को ग्रहण न कर सकने के कारण पुर्निया जिले के जमींदार ने अपने मुँह को गम्भीर बना लिया और उनके नौकर ने ज्यों ही आकर कहा कि संध्याी-पूजा के लिए तैयारी हो गयी है त्यों ही उन्होंने वहाँ से प्रस्थान कर दिया। तबलची तथा अन्य दो महाशय उनके साथ ही साथ बाहर चले गये। उनका मन अकस्मात् क्यों इतना व्याकुल हो गया, सो मैं बिन्दु-विसर्ग कुछ भी नहीं समझा।रतन आकर बोला, “माँ, बाबूजी के बिछौने कहाँ करूँ?”प्यारी ने झुँझलाकर कहा, “क्या और कोई कमरा नहीं है रतन? मुझसे पूछे बिना क्या इतनी-सी बुद्धि भी तू नहीं लगा सकता? चला जा यहाँ से!” इतना कहकर रतन के साथ आप भी बाहर चली गयी। मैंने खूब अच्छी तरह से देखा कि मेरे आकस्मिक शुभागमन से इस मकान का भार-केन्द्र एक सांघातिक ढंग से विचलित हो गया है। प्यारी ने, किन्तु थोड़ी ही देर बाद लौट आकर और मेरे मुँह की ओर कुछ देर देखते रहकर कहा, “ऐसे अचानक कैसे आना हो गया?”मैंने कहा, “देश का आदमी हूँ, तुम्हें बहुत दिन से न देख सकने के कारण व्याकुल हो उठा था, बाईजी!”प्यारी का मुँह और भी भारी हो गया। मेरे परिहास में जरा भी योग न देकर उसने पूछा, “आज रात को यहाँ ही रहोगे न?”“रहने को कहोगी तो रह जाऊँगा।”“मेरे कहने न कहने से क्या! तुम्हें यहाँ शायद कुछ असुविधा हो। जिस कमरे में तुम सोते थे उसमें तो...”“बाबू सोते हैं? ठीक है, मैं नीचे सो जाऊँगा। तुम्हारा नीचे का कमरा तो बहुत उम्दा है।”“नीचे सोओगे? कहते क्या हो! मन में तुम्हारे जरा भी विकार नहीं- दो ही दिन में इतने बड़े परमहंस किस तरह हो गये?”मैंने मन ही मन कहा, “प्यारी, तुमने मुझे अब तक भी नहीं पहचाना।” फिर मुँह से कहा, “इसमें मुझे मान-अपमान का खयाल बिन्दु-भर भी नहीं है। और, कष्ट की बात का यदि खयाल करो, तो वह तो एकबारगी ही फिजूल है। मैं घर से बाहर निकलने के समय खाने-सोने की चिन्ताओं को दूर रख आता हूँ, यह तो तुम भी जानती हो। बिस्तर यदि अधिक हों तो एक ले आने के लिए कह दो, नहीं हो, तो फिर उसकी भी दरकार नहीं है- मुझे अपने कम्बल का सम्बल है।”प्यारी ने सिर हिलाकर कहा, “सो तो मैं जानती हूँ; किन्तु, इससे मन में किसी तरह का दु:ख तो न होगा?”मैंने हँसकर कहा, “नहीं, क्योंकि स्टेशन पर पड़े रहने की अपेक्षा तो यह बहुत ही अच्छा है।”प्यारी कुछ देर चुप खड़ी रही; फिर बोली, “यदि मैं होती तो भले ही वृक्ष के नीचे सो रहती, परन्तु इतना अपमान कभी नहीं सहती।”उसकी उत्तेजना को देखकर मुझसे हँसे बिना न रहा गया। वह मेरे मुँह से क्या सुनना चाहती है, सो मैं बड़ी देर से खूब समझ रहा था। किन्तु शान्त स्वाभाविक स्वरूप से मैंने जवाब दिया, “मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि इस बात को मन में आने दूँ कि तुम, जानबूझकर मुझे नीचे सोने को कहकर, मेरा अपमान कर रही हो। यदि सम्भव होता तो तुम उस दफे के समान इस दफे भी मेरे सोने की व्यवस्था करतीं। जाने दो, इन तुच्छ बातों को लेकर वाग्वितण्डा करने की जरूरत नहीं, तुम रतन को भेज दो कि मुझे नीचे का कमरा दिखा आवे, मैं कम्बल बिछाकर सो रहूँगा। मैं बहुत ही थक गया हूँ।प्यारी ने कहा, “तुम ज्ञानी आदमी हो, तुम ही मेरी ठीक अवस्था को न जान सकोगे तो और जानेगा कौन? चलो, बच गयी।” इतना कहकर उसने एक दीर्घ श्वास दबाकर पूछा, “एकाएक आने का सच्चा कारण तो मैं जान ही न सकी कि क्या है?”मैं बोला, “पहला कारण तो तुम नहीं सुन पाओगी, किन्तु दूसरा सुन सकती हो!”“पहला क्यों नहीं सुन सकूँगी?”“अनावश्यक है, इसलिए।”“अच्छा, दूसरा ही सुनाओ।”“मैं बर्मा जा रहा हूँ। शायद और फिर कभी मिलना न हो सके। कम से कम यह तो निश्चित है कि बहुत दिनों तक मिलाप न होगा। जाने के पहले एक दफे तुम्हें देखने आया हूँ।”रतन कमरे में आकर बोला, “बाबू, आपके बिस्तर तैयार हैं, आइए।”मैंने खुश होकर कहा, “चलो।” प्यारी से कहा, “मुझे बड़ी नींद आ रही है। घण्टे भर बाद यदि समय मिले तो एक दफे नीचे आ जाना- मुझे और भी बहुत-सी बातें करनी हैं।” इतना कहकर रतन को साथ लेकर मैं बाहर हो गया।प्यारी के निज के सोने के कमरे में ले आकर रतन ने मुझे जब शय्या बताई तब मेरे अचरज की सीमा न रही। मैं बोला, “मेरे बिस्तर नीचे के कमरे में न करके यहाँ क्यों किये?”रतन ने अचरज के साथ कहा, “नीचे के कमरे में?”मैंने कहा, “ऐसी ही बात तो हुई थी।”वह अवाक् होकर कुछ देर मेरी ओर देखता रहा और अन्त में बोला, “आपके बिस्तर होंगे नीचे के कमरे में? आप मजाक कर रहे हैं बाबू!” इतना कहकर वह हँसता हुआ जा ही रहा था कि मैंने उसे बुलाकर पूछा, “तुम्हारी मालकिन कहाँ सोवेंगी?”रतन बोला, “बंकू बाबू के कमरे में उनके बिस्तर लगा आया हूँ।” मैंने निकट आकर देखा- यह राजलक्ष्मी के उस डेढ़ हाथ चौड़े तख्ते पर बिछाया हुआ बिस्तर नहीं है। एक पलंग पर एक खूब मोटा गद्दा बिछाकर शाही बिस्तर लगाए गये हैं। शीशे के नजदीक नजदीक एक छोटी-सी टेबल के ऊपर मेज के बीचोंबीच लैम्प जल रहा है। एक किनारे बंगला भाषा की किताबें हैं और दूसरे किनारे गुलदस्ते में कुछ बेला के फूल रक्खे हैं। ऑंखों से देखते ही मैंने अच्छी तरह जान लिया कि इनमें से कोई भी चीज नौकर के हाथ की तैयार की हुई नहीं हैं। जो बहुत प्यार करती है, ये सब चीजें उसी के हाथ की तैयार की हुई हैं। ऊपर की चादर भी राजलक्ष्मी खुद अपने हाथों बिछा गयी है, यह मानो अन्दर ही अन्दर मैंने खूब अनुभव किया।आज उन लोगों के सामने अचानक आ जाने के सबब राजलक्ष्मी ने हतबुद्धि हो, पहले चाहे जैसा व्यवहार क्यों न किया हो, पर यह बात मुझसे अज्ञात नहीं रही कि मेरी निर्विकार उदासीनता से वह मन ही मन शंकित हो उठी थी और यह भी मुझे मालूम हो गया कि मेरे भीतर ईर्ष्या् का प्रकाश देखने के लिए उत्सुक हो वह इतनी देर से इतनी तरह से क्यों बार-बार आघात कर रही थी। किन्तु, सब कुछ जानते हुए भी, अपने निष्ठुर स्वभाव को ही मर्दानगी समझकर मैंने उसका जरा भी अभिमान नहीं रहने दिया- उसके प्रत्येक छोटे से छोटे आघात को सौ गुना करके वापिस लौटा दिया। उसके प्रति किया गया यह अन्याय मेरे मन के भीतर अब सुई की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर लेट गया किन्तु सो नहीं सका। मैं यह निश्चय जानता था कि एक बार वह आयेगी जरूर। इसलिए, उत्सुकता के साथ उस समय की राह देखने लगा।थकावट के कारण शायद कुछ सो भी गया था, सहसा ऑंखें खोलकर देखा कि प्यारी मेरे शरीर पर एक हाथ रखे हुए बैठी है। मेरे उठकर बैठते ही वह बोली, “बर्मा को गया हुआ मनुष्य फिर लौटकर वापिस नहीं आता, यह बात क्या तुम्हें मालूम है?”“नहीं, मुझे नहीं मालूम।”“फिर?”“मुझे लौटना ही होगा, ऐसी तो किसी के सिर की कसम मुझ पर है नहीं।”बात बहुत ही सामान्य थी। किन्तु, संसार में यह एक भारी अचरज की बात है कि मनुष्य की दुर्बलता कब किस झरोखे से अपने आपको प्रकट कर बैठेगी, इसका अनुमान नहीं किया जा सकता। इसके पहले कितने ही और इससे भी अधिक बड़े कारण घट गये हैं, परन्तु, मैंने कभी अपने आपको इस तरह नहीं पकड़ा जाने दिया। किन्तु, आज उसके मुँह से निकली हुई इस अत्यन्त साधारण बात को भी मैं सहन नहीं कर सका। मुँह से सहसा यह बात निकल ही गयी, “सब लोगों के मन की बात तो जानता नहीं राजलक्ष्मी, परन्तु एक मनुष्य के मन की अवश्य जानता हूँ। यदि किसी दिन लौटकर आऊँगा तो केवल तुम्हारे ही लिए। तुम्हारे सिर की कसम मैं कभी अवहेलना नहीं करूँगा।”प्यारी मेरे पैरों पर एकबारगी उलटी ही गिर पड़ी। मैंने इच्छा करके भी पैर पीछे न खींचे, परन्तु, दसेक मिनट बीत जाने पर भी जब उसने अपना सिर ऊपर नहीं उठाया तब उसके सिर पर मैंने अपना दाहिना हाथ रक्खा जिसके पड़ते ही वह एक बार सिहरकर काँप उठी। परन्तु फिर भी वह उसी तरह पड़ी रही। सिर भी नहीं उठाया, बोली भी नहीं। मैंने कहा, “उठकर बैठो, इस अवस्था में हमें कोई देखेगा तो भारी अचम्भे में पड़ जायेगा।”किन्तु, प्यारी ने जवाब तक नहीं दिया तब मैंने उसे जोर से उठाया। उठाते ही मैंने देखा कि उसके नीरव ऑंसुओं से वहाँ की सारी चादर बिल्कुनल भीग गयी है। खींच-तान करने पर वह रुद्ध कण्ठ से बोल उठी, “पहले मेरी दो-तीन बातों का जवाब दो तब मैं उठूँगी।”“कहो, कौन-सी बातें हैं।”“पहले तो यह कहो कि उन लोगों के यहाँ रहने से तुमने मेरे सम्बन्ध में कोई बुरा खयाल तो नहीं किया?”“नहीं।”प्यारी और कुछ देर चुप रहकर बोली, “किन्तु, मैं भली औरत नहीं हूँ, यह तो तुम जानते हो? फिर भी, तुम्हें क्यों सन्देह नहीं हुआ?”सवाल बड़ा ही कठिन था। वह भली स्त्री नहीं है, यह मैं जानता हूँ परन्तु वह खराब है, यह खयाल भी मैं मन में नहीं ला सका। मैं चुप हो रहा।एकाएक वह अपनी ऑंखें पोंछकर झटपट उठ बैठी और बोली, “अच्छा, तुमसे पूछती हूँ; पुरुष कितना ही बुरा क्यों न हो, यदि वह भला होना चाहता है तो उसे कोई रोकता नहीं; किन्तु, हम लोगों की पारी आने पर सब मार्ग क्यों बन्द हो जाते हैं? अज्ञान से, धनाभाव से, एक दिन जो कर बैठी- चिरकाल के लिए मुझे वही क्यों करना पड़ता रहे? हम लोगों को तुम लोग क्यों भला बनने नहीं देते?”मैंने कहा, “हम लोग तो कभी रोकते नहीं। और यदि हम रोकें, तो भी, संसार में भले बनने के मार्ग में कोई किसी को अटकाकर नहीं रख सकता।”प्यारी बड़ी देर तक चुप रहकर मेरे मुँह की ओर देखकर अन्त में धीरे-धीरे बोली, “बहुत ठीक, तो फिर, तुम भी मुझे नहीं रोक सकोगे।”मेरे जवाब देने के पहले ही रतन की खाँसी का शब्द द्वार के निकट सुन पड़ा।प्यारी ने पुकार कर कहा, “क्या है रतन?”रतन ने मुँह आगे निकाल कर कहा, “माँ रात बहुत बीत गयी है- बाबूजी के खाने के लिए ले न आऊँ? रसोइया महाराज तो झोंके खाते-खाते रसोईघर में ही सो गये हैं।”“अरे, तब तो तुममें से किसी ने भी अभी तक खाया न होगा!” इतना कह कर प्यारी घबड़ाकर और लज्जित होकर उठ खड़ी हुई। मेरे लिए खाने को वह अपने ही हाथों हमेशा लाती थी; आज भी लाने के लिए जल्दी से पैर बढ़ाती हुई चली गयी।खाना समाप्त करके जब मैं बिस्तर पर लेटा तब रात का एक बज गया था। प्यारी फिर आकर मेरे पैरों के पास बैठ गयी। बोली, “तुम्हारे लिए अनेक रातें अकेले जागकर बिताई हैं- आज तुम्हें भी जागते रक्खूँगी। इतना कहकर मेरी सम्मति की राह देखे बगैर ही उसने मेरे पैर की तरफ का तकिया खींच लिया और बाएँ हाथ का सहारा लेकर वह लेट गयी तथा बोली, “मैंने बहुत विचार कर देखा, तुम्हरा इतने दूर-देश जाना किसी तरह भी नहीं हो सकता।”मैंने पूछा, “तो फिर, क्या हो सकता है? इसी तरह यहाँ-वहाँ भटकते फिरना?”प्यारी ने इसका जवाब न देकर कहा, “इसके सिवाय किसलिए बर्मा जा रहे हो, कहो तो सही?”“नौकरी करने, यहाँ-वहाँ भटकते फिरने के लिए नहीं।”मेरी बात को सुनकर प्यारी उत्तेजना के वश सीधी होकर बैठ गयी और बोली, “देखो, दूसरे से जो कहना हो कहना, किन्तु मुझे न ठगना। मुझे ठगोगे तो तुम्हारा इहकाल भी नहीं, पर काल भी नहीं बनेगा- सो जानते हो?”“सो तो खूब जानता हूँ, अब क्या करना चाहिए, कहो तुम?”मेरी स्वीकारोक्ति से प्यारी प्रसन्न हुई। हँसकर बोली, “स्त्रियाँ चिरकाल से जो कहती आई हैं वही मैं कहती हूँ। विवाह करके संसारी बन जाओ- गृहस्थ-धर्म का पालन करो।”मैंने प्रश्न किया, “क्या सचमुच ही तुम खुशी होओगी?”उसने सिर हिलाकर कानों के झूले हिलाते हुए उत्साह से कहा, “निश्चय से, एक दफे नहीं, सौ दफे। इससे यदि मैं सुखी नहीं होऊँगी, तो फिर और कौन होगा, बताओ?”मैंने कहा, “सो तो मैं नहीं जानता; परन्तु, इससे मेरे मन की एक दुर्भावना चली गयी। वास्तव में, यही खबर देने मैं आया था कि ब्याह किये बगैर मेरी गुजर नहीं।”प्यारी एक बार अपने कानों के स्वर्णालंकार झुलाती हुई महाआनन्द से बोल उठी, “ऐसा होगा, तो मैं कालीघाट जाकर पूजा दे आऊँगी। किन्तु, लड़की को मैं ही देखकर पसन्द करूँगी, सो कहे देती हूँ।”मैंने कहा, “इसके लिए अब समय नहीं है, लड़की तो स्थिर हो चुकी है।”मेरे गम्भीर स्वर पर शायद प्यारी ने ध्या,न दिया। एकाएक उसके हँसते मुख पर एक मैली-सी छाया पड़ गयी; बोली, “ठीक तो है, अच्छा ही हुआ। स्थिर हो गयी है तो परम सुख की बात है।”मैंने कहा, “सुख-दु:ख तो मैं समझता नहीं राजलक्ष्मी, जो बात स्थिर हो चुकी है वही तुम्हें बताता हूँ।”“प्यारी एकाएक गुस्से से बोल उठी, “जाओ, चालाकी मत करो, सब बात झूठी है।”“एक भी बात मिथ्या नहीं है। चिट्ठी देखते ही समझ जाओगी”, इतना कहकर खीसे में से मैंने दो पत्र बाहर निकाले।“कहाँ हैं, देखूँ चिट्ठी”, इतना कह हाथ बढ़ाकर प्यारी ने दोनों हाथों में चिट्ठियाँ ले लीं। उन्हें हाथ में लेते ही मानों उसके सारे मुँह पर अंधेरा छा गया। दोनों पत्र हाथ में लिये ही लिये वह बोली, “दूसरे का पत्र पढ़ने की मुझे जरूरत ही क्या है। बताओ, कहाँ स्थिर हुई है?”“पढ़ देखो।”“मैं दूसरे की चिट्ठी नहीं पढ़ती।”“तो फिर दूसरे की खबर जानने की तुम्हें जरूरत भी नहीं है।”“मैं नहीं जानना चाहती।” इतना कहकर ऑंखें मींचकर वह लेट गयी। किन्तु दोनों चिट्ठियाँ उसकी मुट्ठी में ही रह गयीं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोली। इसके बाद वह धीरे से उठी, जाकर लैम्प तेज किया और मेज पर दोनों पत्र रखकर स्थिरता से बैठी। उनमें जो कुछ लिखा था सो शायद उसने दो-तीन दफे पढ़ा। इसके बाद वह उठ आई और उसी तरह फिर लेट गयी। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली, “सो गये क्या?”“नहीं।”“इस स्थान पर मैं तुम्हें किसी तरह ब्याह न करने दूँगी; वह लड़की अच्छी नहीं है, उसे मैंने बचपन में देखा है।”“माँ का पत्र पढ़ा?”“हाँ, किन्तु काकी के पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि तुम्हें उसे गले में डालना ही पड़ेगा। और चाहे वह अच्छी हो, चाहे न हो, उस लड़की को मैं किसी तरह भी घर में नहीं लाऊँगी।”“कैसी लड़की घर में लाना चाहती हो, बता सकती हो?”“सो मैं इस समय कैसे बताऊँ? विचार करके देखना होगा।”थोड़ी देर चुप रहने के बाद मैं हँसकर बोला, “तुम्हारी पसन्दगी और विवेचना के ऊपर निर्भर रहा जाय तो मुझे अपना कुमारपन उतारने के लिए आगे और एक जन्म ग्रहण करना पड़े- शायद, उसमें भी पूरा न पड़े। जाने दो, यथासमय, न हो तो दूसरा जन्म ग्रहण कर लूँगा। मुझे जल्दी नहीं है। परन्तु, इस लड़की का तुम उद्धार कर दो। पाँच सौ रुपये हों तो काम हो जायेगा, मैं उन्हीं के मुँह से सुन आया हूँ।”प्यारी उत्साह में आकर उठ बैठी और बोली, “कल ही मैं रुपये भेज दूँगी। काकी की बात मिथ्या नहीं होने दूँगी।” फिर कुछ देर ठहरकर बोली, “सच कहती हूँ तुमसे, यह लड़की अच्छी नहीं है, इसीलिए मुझे आपत्ति है, नहीं तो...”“नहीं तो...?”“नहीं तो फिर क्या! तुम्हारे लायक लड़की जब ढूँढ़ दूँगी, उसी समय इस बात का उत्तर दूँगी, इस समय नहीं।”सिर हिलाकर मैंने कहा, “तुम फिजूल कोशिश मत करो राजलक्ष्मी, मेरे लायक लड़की तुम किसी दिन भी खोजकर न निकाल सकोगी।”वह बहुत देर तक चुप बैठी रहकर एकाएक बोल उठी, “अच्छा सो शायद न निकाल सकूँ, परन्तु तुम बर्मा जाओगे तो मुझे साथ ले चलोगे?”उसके प्रस्ताव को सुनकर मैं हँसा। बोला, “मेरे साथ चलने का तुम्हें साहस होगा?”प्यारी मेरे मुँह के प्रति तीक्ष्ण दृष्टि पात करके बोली, “साहस! इसे क्या तुम कोई बड़ा कठिन काम समझते हो?”“मैं चाहे जो समझूँ, किन्तु तुम्हारे इस सारे घर-द्वार, माल-असबाब, जमीन-जायदाद आदि का क्या होगा?”प्यारी बोली, “चाहे जो हो। तुम्हें नौकरी करने के लिए जब इतनी दूर जाना पड़ा- यह सब रहते हुए भी जब तुम्हारे किसी काम न आया, तब इसे बंकू को दे जाऊँगी।”इस बात का जवाब मैं नहीं दे सका। खुली हुई खिड़की के बाहर अंधेरे में देखता हुआ चुपचाप बैठा रहा।उसने फिर कहा, “इतनी दूर न जाओ तो न चले? यह सब क्या किसी भी दिन तुम्हारे किसी काम में नहीं आ सकता?”मैं बोला, “नहीं, कभी, किसी दिन भी नहीं।”प्यारी ने गर्दन हिलाकर कहा, “यह मैं जानती हूँ। परन्तु, ले चलोगे तुम मुझे अपने साथ?” इतना कहकर उसने मेरे पैरों पर फिर अपने हाथ रख दिये। एक दिन जब प्यारी ने मकान से जबर्दस्ती बिदा कर दिया था तब उस दिन का उसका असाधारण धीरज और मन की ताकत देखकर मैं अवाक् हो गया था। आज उसी की इतनी बड़ी दुर्बलता-करुण कण्ठ की ऐसी कातर मिन्नत। यह सब एक साथ याद करके मेरी छाती फटने लगी। परन्तु, किसी तरह भी राजी न हो सका। बोला, “मैं तुम्हें अपने साथ तो नहीं ले जा सकता, परन्तु, तुम जब बुलाओगी, तभी लौट आऊँगा। मैं कहीं भी रहूँ, हमेशा तुम्हारा ही रहूँगा राजलक्ष्मी।”“क्या तुम चिरकाल तक इस पापिष्ठा के ही होकर रहोगे?”“हाँ, चिरकाल तक।”“तब तो फिर, यह कहो कि तुम्हारा कभी विवाह ही न होगा?”“हाँ, नहीं होगा। इसका कारण यह है, कि तुम्हारी सम्मति के बिना, तुम्हें दु:ख देकर, इस काम में मेरी कभी प्रवृत्ति नहीं होगी।”प्यारी अपलक दृष्टि से कुछ देर तक मेरे मुँह की ओर देखती रही। इसके बाद उसके दोनों नेत्र ऑंसुओं से परिपूर्ण होकर बड़ी-बड़ी बूँदों के रूप में टप-टप गिरने लगे। ऑंखें पोंछकर गाढ़े स्वर में वह बोली, “इस हतभागिनी के लिए तुम जिन्दगी-भर सन्यासी बने रहोगे?”मैंने कहा, “हाँ, बना रहूँगा। तुम्हारे पास जो वस्तु मैंने पाई है, उसके बदले सन्यासी बनकर रहने में मेरा कोई नुकसान नहीं है। मैं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरी इस बात पर तुम कभी अविश्वास न करना।”पल-भर के लिए दोनों की चार नजरें हुईं और दूसरे ही क्षण वह तकिये में मुँह छिपाकर उलटी लेट गयी। उच्छ्वसित क्रन्दन के आवेग से उसका सारा शरीर काँप-काँपकर और फूल-फूलकर उचकने लगा।मैंने मुँह उठाकर देखा, सारा मकान गहरी नींद से ढका हुआ था। कहीं कोई जाग नहीं रहा था। केवल एक दफे खयाल आया, कि झरोखे के बाहर अंधियारी रात्रि अपने कितने ही उत्सवों की प्रिय सहचरी प्यारी के इस हृदय-विदारक अभिनय को मानो आज चुपचाप, ऑंखें खोलकर, अत्यन्त परितृप्ति के साथ देख रही है।♦♦ • ♦♦ऐसी-ऐसी अनेक बातें देखी हैं जिन्हें कि जीवन-भर भूला नहीं जा सकता। वे जब कभी याद आ जाती हैं तब उस समय के शब्द तक मानो कानों में गूँज उठते हैं। प्यारी के अन्तिम शब्द भी इसी तरह के थे। आज भी मैं मानो उनकी गूँज सुना करता हूँ। वह अपने स्वभाव से ही कितनी अधिक संयमी थी, इसका परिचय बचपन में ही उसने बहुत दफे दिया है। और फिर, उसके ऊपर अब कितने दिनों की सांसारिक अभिज्ञता है। उस दफे मेरे बिदा होने के समय किसी तरह भागकर उसने आत्म-रक्षा की थी। परन्तु इस दफे वह किसी तरह भी अपने आपको न सँम्हा्ल सकी, और नौकर-चाकरों के सामने ही रो पड़ी। रुँधे हुए कण्ठ से वह बोल उठीं, “देखों, मैं नासमझ नहीं हूँ। अपने पापों का भारी दण्ड मुझे भोगना ही पड़ेगा, सो मैं जानती हूँ; किन्तु, फिर भी कहती हूँ, हमारा यह समाज बड़ा निष्ठुर-बड़ा निर्दय है। इसे भी इसका दण्ड एक न एक दिन भोगना ही पड़ेगा। भगवान इस पाप की सजा देंगे ही देंगे!”समाज को उसने क्यों इतना बड़ा अभिशाप दिया सो वह जाने और उसके अन्तर्यामी जानें। मैं नहीं जानता, सो बात नहीं है; किन्तु मैं चुप ही रहा। बूढ़ा दरबान गाड़ी का दरवाजा खोलकर मेरे मुँह की ओर देखने लगा। मैं आगे पैर बढ़ा ही रहा था कि प्यारी ऑंखों के ऑंसुओं में से मेरे मुँह की ओर देखकर कुछ हँसी; बोली, “कहाँ जा रहे जो? फिर तो शायद दर्शन होंगे नहीं, एक भिक्षा देते जाओगे?”मैं बोला, “दूँगा, कहो।”प्यारी बोली, “भगवान न करें- किन्तु, तुम्हारी जीवन-यात्रा जिस ढंग की है उससे-अच्छा, जहाँ भी रहो, ऐसे समय में खबर दोगे? शरमाओगे तो नहीं?”“नहीं, शरमाऊँगा नहीं- खबर जरूर दूँगा” इतना कहकर धीरे-धीरे मैं गाड़ी में जा बैठा । प्यारी पीछे-पीछे आई और उसने अपने ऑंचल में मेरे पैरों की धूल ले ली।“अजी सुनते हो?” मैंने मुँह उठाकर देखा कि वह अपने काँपते हुए होठों को प्राणपण से काबू में रखकर कहने की कोशिश कर रही है। दोनों की नजर एक होते ही फिर उसकी ऑंखों से झर-झर पानी झर पड़ा। वह अस्पष्ट रुँधे हुए कण्ठ से धीरे से बोली, “न जाओ इतनी दूर तो? रहने दो, मत जाओ...”चुपके से मैंने अपनी नजर उस ओर से फेर ली। गाड़ीवान ने गाड़ी हाँक दी। चाबुक और चार-चकोंके सम्मिलित सपासप और घर-घर शब्द से शाम का समय मुखरित हो उठा। किन्तु, इस सबको दबाकर केवल एक रुँधे हुए कण्ठ का दबा हुआ रुदन ही मेरे कानों में गूँजने लगा।3पाँच-छ: दिन बाद मैं एक दिन भोर के समय, सिर्फ एक लोहे का ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर कलकत्ते के कोयला-घाट पर जा पहुँचा। गाड़ी से उतरते न उतरते खाकी कुरती पहिने हुए एक कुली ने दोनों चीजों को झपट लिया, उन्हें लेकर पलक-भर में न जाने वह कहाँ अन्तधर्न हो गया और जब तक खोजते-खोजते दुश्चिन्ता के मारे मेरी ऑंखों में ऑंसू न आ गये तब तक उसका कोई पता ही नहीं चला।गाड़ी पर से आते-आते ही मैंने देखा था कि जेटी¹ और बड़े रास्ते के बीच की भूमि नाना रंग के पदार्थों से लदी हुई है- लाल, काले, भूरे, गेरुए। थोड़ा-सा कुहरा भी छाया हुआ था। ऐसा मालूम हुआ कि बछड़ों का एक झुण्ड शायद चालान किये जाने के लिए बँधा हुआ है। निकट आकर ध्याहन से देखा तो मालूम हुआ कि चालान तो अवश्य होगा; किन्तु, बछडों का नहीं-मनुष्यों का। वे लोग बड़ी-बड़ी-सी गठरियाँ लिये, स्त्री-पुत्रों के हाथ पकड़, सारी रात इसलिए इसी तरह ओस में पड़े रहे हैं कि सुबह तड़के ही सबसे पहले जहाज में घुसकर एक अच्छी-सी जगह पर कब्जा कर लेंगे। अतएव, किसके लिए सम्भव था कि पीछे से आकर इन्हें पार करके जेटी के द्वार तक पहुँच सके? थोड़ी ही देर बाद यह दल जब जागकर खड़ा हो गया तब मैंने देखा कि काबुल के उत्तर से कन्याकुमारी के अन्त तक का कोई भी प्रदेश अपना प्रतिनिधि इस कोयला-घाट पर भेजना नहीं भूला है।सभी हैं। काली-काली गंजियाँ पहिने हुए चीनियों का दल भी बाद नहीं गया है। मैं भी तो डेक का (जिससे नीचे और कोई दर्जा नहीं उसका) यात्री था : इसलिए, लोगों को परास्त करके अपने बैठने के लिए एक जगह मुझे भी प्राप्त करनी थी। किन्तु इसका खयाल करते ही मेरा सारा शरीर बरफ-सा ठण्डा हो गया। फिर भी, जब जाना ही है और जहाज को छोड़कर और कोई जाने का रास्ता नहीं है, तब जैसे भी हो इन्हीं लोगों का अनुकरण करना कर्त्तव्य है- ऐसा विचार कर मैं अपने मन को जितना ही साहस देने लगा मानो उतना ही वह हिम्मत हारने लगा। जहाज कब आकर किनारे से लगेगा सो जहाज ही जाने। इस बीच में ही ये चौदह-पन्द्रह सौ लोग भेड़ों के झुण्ड की तरह कतारें बाँधकर एकाएक ऑंख उठाकर देखा, खड़े हो गये हैं। एक हिन्दुस्तानी आदमी से मैंने पूछा, “भैया, सब लोग अच्छी तरह से तो बैठे थे- अब एकाएक कतार बाँधकर क्यों खड़े हो गये?'*¹ जहाँ जहाज ठहरते हैं वह स्थान।वह बोला, “डगदरी होगी।”“डगदरी क्या चीज होती है, भाई?”उस आदमी ने पीछे से आए हुए एक धक्के को सँभालते हुए कुछ झुँझलाहट से कहा, “अरे पिलेग का डगदरी।”बात को समझना और भी कठिन हो गया। पर, समझूँ चाहे न समझूँ- इतने आदमियों के लिए जो जरूरी है वह मेरे लिए भी होगी। किन्तु किस कौशल से अपने आपको इस झुण्ड में घुसेड़ दूँ, यह एक समस्या ही सामने आकर खड़ी हो गयी। कहीं से घुसने के लिए थोड़ी-सी साँसर है या नहीं, यह खोजते-खोजते देखा कि कुछ दूर पर खिदिरपुर के कितने ही मुसलमान संकुचित भाव से खड़े हुए हैं। यह मैंने स्वदेश-विदेश सभी जगह देखा है कि जो काम लज्जित होने जैसा है, उसमें बंगाली लोग अवश्य लज्जित होते हैं। वे भारत की अन्यान्य जातियों के समान बिना संकोच के धक्का-मुक्की मारा-मारी नहीं कर सकते। इस तरह खड़े होने में जो एक तरह की हीनता है, उसकी शरम के मारे मानो ये सब अपना सिर नीचा कर लेते हैं। ये लोग रंगून में दर्जी का काम करते हैं और अनेक दफे आए-गये हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह सब सावधानी, कहीं यहाँ से बर्मा में प्लेग न चली जाय, इसलिए है। डॉक्टर परीक्षा करके पास कर दे तभी जहाज पर चढ़ा जा सकता है। अर्थात् रंगून जाने के लिए जो लोग तैयार हुए हैं, इसके पहले ही जाँच हो जाना चाहिए कि वे प्लेग के रोगी हैं या नहीं। अंग्रेजी राज्य में डॉक्टरों का प्रबल प्रताप है। सुना है, कसाईखाने के यात्रियों को भी अन्दर जाकर जिबह होने का अधिकार प्राप्त करने के लिए इन लोगों का मुँह ताकना पड़ता है। किन्तु, परिस्थिति की दृष्टि से रंगून के यात्रियों के साथ उसकी जो इतनी अधिक समानता है सो उस समय किसने सोची थी।क्रमश: पिलेग की डगदरी निकट आ पहुँची। पियादे-सहित डॉक्टर साहब दिखाई दिये। उस कतारबन्दी की अवस्था में गर्दन टेढ़ी करके देखने का मौका तो नहीं था; फिर भी, आगे-खड़े हुए साथियों के प्रति किया गया परीक्षा-पद्धति का जितना भी प्रयोग दृष्टिगोचर हुआ, उससे मेरी चिन्ता की सीमा नहीं रही। कायर बंगालियों को छोड़कर ऐसा वहाँ कोई नहीं था जो देह के निम्न भाग के उघाड़े जाने पर भयभीत हो, परन्तु, अपने सामने के साहसी वीर पुरुषों के भी परीक्षा के समय बार-बार चौंक उठते देखकर मैं बुरी तरह शंकित हो उठा। सभी जानते हैं कि प्लेग की बीमारी में शरीर का स्थान-विशेष सूज आया करता है डॉक्टर साहब जिस प्रकार लीला-मात्र से और निर्विकार चित्त से उस सन्देह मूलक स्थान में हाथ डालकर सोजिश टटोलने लगे, उससे काठ के पुतलों को भी आपत्ति होती। किन्तु, भारतवासियों की सभ्यता सनातन है, इसलिए, जैसे भी हो एक दफे चौंककर ये स्थिर हो जाते थे। अगर और कोई जाति होती तो डॉक्टर का हाथ मरोड़े-तोड़े बिना न रहती। सो, चाहे जो हो, 'पास' होना जब अवश्य कर्त्तव्य था, तो फिर, और उपाय ही क्या हो सकता था? यथासमय ऑंखें मींचकर, सारा अंग संकुचित कर- एक तरह से हताश ही होकर, डॉक्टर के हाथ आत्म-समर्पण कर दिया और 'पास' भी हो गया।इसके बाद जहाज पर चढ़ने की पारी थी। किन्तु, डेक-पैसिंजरों की यह अधिरोहण-क्रिया किस तरह निष्पन्न होती है- बाहर के लोगों के लिए उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है। फिर भी, कल-कारखानों में जिन्होंने दाँतवाले चक्रों की प्रक्रिया देखी है, उनके लिए इसका समझाना कुछ-कुछ सम्भव हो सकता है। वे जिस तरह आगे के खिंचाव और पीछे के धक्के से अग्रसर होकर चलते हैं, उसी तरह हमारी यह काबुली- पंजाबी- मारवाड़ी- मद्रासी- मराठा- बंगाली-चीनी- उड़िया गठित सुविपुल सेना केवल पारस्पारिक आकर्षण-विकर्षण के वेग से नीचे जमीन से जहाज के डेक पर बिना जाने ही चढ़ गयी और वह गति वहाँ पर भी नहीं रुकी। सामने की ओर देखा, एक गङ्ढे के मुँह पर सीढ़ी लगी हुई है। जहाज के गर्म-देश में उतरने का यही रास्ता था। नाले के अवरुद्ध मुख को खोल देने पर वृष्टि का संचित जल जिस तरह तीव्र वेग से नीचे गिरता है, ठीक उसी तरह यह दल भी स्थान अधिकृत करने के लिए जीने-मरने के ज्ञान से शून्य होकर नीचे उतरने लगा।मुझे जहाँ तक याद आता है, मेरी नीचे जाने की इच्छा नहीं थी। पैरों से चलकर भी नहीं उतरा। क्षण भर के लिए मैं बेहोश हो गया था, इसलिए, मेरे इस कथन में यदि कोई सन्देह प्रकट करे, तो शायद कसम खाकर मैं इसे अस्वीकार भी न कर सकूँगा। होश में आने पर देखा कि गर्भ-गृह के मध्यक बहुत दूर पर एक कोने में मैं अकेला खड़ा हूँ। पैरों की ओर निगाह दौड़ाई, तो देखता हूँ कि इसी बीच में, जादू के खेल की तरह पल-भर में ही कम्बल बिछाकर और बॉक्स-पिटारों आदि से घेरकर हर किसी ने अपने-अपने लिए निरापद-स्थान बना लिया है और शान्ति से बैठकर अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त करना शुरू कर दिया है। इतनी देर के बाद, अब कहीं मेरे उस नम्बर वाले कुली ने आकर दर्शन दिया और कहा, “ट्रंक और बिस्तर ऊपर रख आया हूँ, यदि आप कहें तो नीचे ले आऊँ।”मैंने कहा, “नहीं, बल्कि, किसी तरह यहाँ से उद्धार करके मुझे ही ऊपर ले चल।” क्योंकि वहाँ इतना-सा स्थान भी मुझे कहीं खाली दिखाई नहीं दिया कि दूसरों के बिस्तर खूँदे बगैर तथा उनके साथ हाथापाई की सम्भावना उत्पन्न किये बगैर, मैं कहीं अपना कदम रख सकूँ। वर्षा होने पर ऊपर पानी में भीग जाऊँ यह अच्छा, किन्तु यहाँ एक क्षण-भर भी ठहरना ठीक नहीं। अधिक पैसों के लोभ से कुली, काफी कोशिश और बहस-मुबाहिसे के बाद, कम्बलों और सतरंजियों के किनारों को उलटता-पुलटता हुआ मुझे अपने साथ लिये हुए ऊपर आया और मेरा माल-असबाब दिखाकर बख्शीीश लेकर चलता बना। यहाँ का भी वही हाल- बिस्तर बिछाने के लिए, निरुपाय हो अपने ट्रंक के ऊपर ही बैठने का इन्तजाम करके मैं एकाग्र चित्त से माता भागीरथी के दोनों किनारों की महिमा का निरीक्षण करने लगा।स्टीमर ने तब तक चलना आरम्भ कर दिया था। बहुत देर से प्यास लग रही थी। इन दो घण्टों के भीतर जो तूफान सिर पर से गुजर गया उससे जिनकी छाती शुष्क न हो जाए, ऐसे कठिन-हृदय संसार में बहुत थोड़े ही लोग हैं। किन्तु आफत यह हुई कि साथ में न तो गिलास था और न लोटा। साथ के मुसाफिरों में यदि कहीं कोई बंगाली हो तो कुछ उपाय हो कुछ उपाय हो सकता है, यह सोचकर मैं फिर बाहर निकला। नीचे उतरने के उस गङ्ढे के निकट पहुँचते ही एक तरह का विकट कोलाहल सुन पड़ा। मेरी जानकारी इतनी विस्तृत नहीं है कि उस कोलाहल की उपयुक्त तुलना कर सकूँ। गोशाला में आग देने से एक प्रकार का कोलाहल होने की बात कही जाती है जरूर, किन्तु, इसके अनुरूप कोलाहल होने के लिए जितनी बड़ी गोशाला की आवश्यकता है उतनी बड़ी गोशाला महाभारत के युग में विराट राजा के यहाँ यदि रही तो जुदा बात है, किन्तु इस कलिकाल में किसी के यहाँ हो सकती है, इसकी तो कल्पना करना भी कठिन है।भयपूर्ण हृदय से दो-एक सीढ़ियाँ उतरकर मैंने झाँका तो देखा कि यात्रियों ने अपना अपना 'नेशनल' (=जातीय) संगीत शुरू कर दिया है। काबुल से लेकर ब्रह्मपुत्र और कन्याकुमारी से लेकर चीन की सीमापर्यन्त जितने भी तरह के स्वर ब्रह्म हैं, जहाज के इस बन्द गर्भ के भीतर वाद्ययन्त्रों के सहयोग से, उनका ही समवेत रूप से अनुशीलन हो रहा है। ऐसे महासंगीत को सुनने का सौभाग्य कदाचित् ही संघटित होता है; और संगीत ही ललित कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है, यह बात उस जगह खड़े-खड़े ही मैंने सम्मान के साथ स्वीकार कर ली। किन्तु सबसे अधिक विस्मय की बात यह थी कि वहाँ इतने अधिक संगीत-विशारद एक साथ आ जुटे किस तरह?मैं एकाएक यह स्थिर नहीं कर सका कि मेरा नीचे उतरना उचित है या नहीं। सुना है, अंगरेजी महाकवि शेक्सपियर ने कहा है कि संगीत के द्वारा जो मनुष्य मुग्ध नहीं होता वह खून तक कर सकता है। किन्तु केवल मिनट भर सुन लेने से ही जो मनुष्य के खून को जमा दे ऐसे संगीत की खबर शायद उन्हें भी नहीं थी। जहाज का गर्भ-गृह वीणापाणि का पीठ-स्थान है या नहीं, सो नहीं, सो नहीं जानता परन्तु, यदि न होता तो यह कौन सोच सकता कि काबुली लोग भी गाना गाते हैं!एक तरफ यह अद्भुत काण्ड हो रहा था और मैं मुँह बाए देख रहा था कि एकाएक देखा- पास में ही खड़ा हुआ एक व्यक्ति प्राणपण से हाथ हिला-हिलाकर मेरी नजर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। बहुत कष्ट से अनेक लोगों की लाल-लाल ऑंखें सिर पर रखकर मैं उस मनुष्य के पास जा उपस्थित हुआ। उसने ब्राह्मण समझकर मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अपना परिचय दिया कि मैं रंगून का विख्यात नन्द मिस्री हूँ। पास ही एक विगत-यौवना स्थूल स्त्री बैठी हुई एकटक मेरी ओर देख रही थी। मैं उसके मुँह की ओर देखकर स्तम्भित हो गया। मनुष्य की इतनी बड़ी-बड़ी फुटबाल-सी ऑंखें और इतनी मोटी जुड़ी हुई भौहें पहले कभी न देखी थीं।नन्द मिस्री उसका परिचय देते हुए बोला, “बाबूजी, यह मेरी घरवा...”बात पूरी भी न हो पाई थी कि वह फुँकार कर गर्ज उठी, “घरवाली! ये मेरे सात भाँवरों के स्वामी कहते हैं घरवाली! खबरदार, कहे देती हूँ मिस्री, जिस-तिस के आगे झूठ बोलकर मुझे बदनाम मत किया करो! हाँ...!”मैं तो विस्मय के मारे हतबुद्धि-सा हो गया।नन्द मिस्री कुछ अप्रतिभ-सा होकर बोला, “आहा, नाराज क्यों होती हो टगर? घरवाली और कहते किसे हैं? बीस साल...”टगर विकट क्रोध से बोल उठी, “बीस साल हो गये क्या हुआ। फूटे करम! जात-वैष्णव की लड़की होकर मैं कहलाऊँ केवट की घरवाली! कैसे, किस तरह? बीस बरस से तुम्हारे घर हूँ जरूर, किन्तु एक दिन भी तुम्हें चौके में घुसने दिया है, यह बात कोई भी नहीं कह सकता। टगर वैष्णवी मर जायेगी, पर अपनी जाति नहीं खोएगी, जानते हो?” इतना कहकर वह जात-वैष्णव की लड़की अपनी जाति के गर्व से मेरे मुँह की ओर देखती हुई अपनी दोनों फुटबाल की सी ऑंखें घुमाने लगी।नन्द मिस्री लज्जित होकर बारम्बार कहने लगा, “देखा बाबूजी, देखा? अभी तक इसे जाति का गर्व है! देखा आपने! मैं हूँ, इसी से सह लेता हूँ, और कोई होता...” बीस बरस की उस घरवाली की ओर देखकर बेचारा अपनी बात पूरी भी न कर सका।मैं और कुछ न बोला और उससे एक गिलास लेकर वहाँ से चल दिया। ऊपर पहुँचकर उस वैष्णवी की बातें याद करके मेरी हँसी रोकी न रुकी। किन्तु क्षण-भर बाद ही सोचा, यह तो एक सामान्य अशिक्षिता स्त्री ठहरी; पर, गाँवों में और शहरों में भी क्या ऐसे अनेक शिक्षित पुरुष नहीं हैं, जिनके द्वारा ऐसे ही हास्यकार्य अब भी प्रतिदिन हुआ करते हैं, और जो पाप के सारे अन्यायों से केवल खाना-छूना बचाकर ही परित्राण पा लेते हैं। तब, यह हो सकता है कि इस देश के पुरुषों का हाल देखकर तो हँसी नहीं आती, आती है सिर्फ औरतों को देखकर।आज शाम से ही आकाश में थोड़े बादल जमा हो रहे थे। रात को एक बजे के बाद मामूली-सा पानी और हवा भी चली जिससे कुछ देर के लिए जहाज खूब हिला-डुला। दूसरे दिन सुबह से ही वह शिष्ट शान्त भाव से चलने लगा। जिसे समुद्री बीमारी कहते हैं, मेरा वह उपसर्ग तो शायद छुटपन में ही नाव के ऊपर कट गया था, इसलिए वमन करने के संकट को मैं एकबारगी ही पार कर गया; किन्तु, सपरिवार नन्द मिस्री का क्या हाल हुआ- किस तरह रात कटी, यह जानने के लिए मैं नीचे जा पहुँचा। कल के गायकों में अधिकांश उस समय तक भी औंधे पड़े हुए थे। मैंने समझ लिया कि रात्रि के उत्पात के कारण ही ये लोग अभी तक महासंगीत के लिए तैयार नहीं हो सके हैं। नन्द मिस्री और उसकी बीस बरस की घरवाली दोनों गम्भीर भाव से बैठे हुए थे। मुझे देख उन्होंने प्रणाम किया। उनके चेहरे के भाव से जान पड़ा कि कुछ देर पहले ही दोनों में कुछ कलह-सी जरूर हो चुकी है। मैंने पूछा, “रात को कैसा हाल रहा मिस्रीजी?”नन्द बोला, “अच्छा रहा।”उसकी घरवाली गरज उठी, “खाक रहा अच्छा! मैयारी मैया, कैसा अद्भुत काण्ड हो गया।”कुछ उद्विग्न होकर मैंने पूछा, “कैसा काण्ड?”नन्द मिस्री ने मेरे मुँह की ओर देखा, फिर जम्हाई ली। चुटकियाँ बजाईं और अन्त में कहा, “काण्ड ऐसा कुछ नहीं था बाबूजी। कलकत्ते की गलियों के मोड़ों पर साढ़े बत्तीस तरह का चबेना बेचते हुए आपने किसी को देखा है? यदि देखा हो तो हम लोगों की अवस्था को आप ठीक तौर से समझ सकेंगे। वह जिस तरह अंगूठे के नीचे दो-तीन अंगुलियों की चोट मारकर भुने हुए चावल, दाल, मटर, मसूर, चने, सेम के बीज आदि सबको एकाकार कर देता है, देवता की कृपा से हम सब भी ठीक उसी तरह गड्डमड्ड हो गये थे, अभी ही कुछ देर हुई सब कोई अपने-अपने कपड़े पहिचानकर फिर अपनी जगह आकर बैठे हैं।” इसके बाद वह टगर की ओर देखकर बोला, “बाबूजी, भाग्य से असल वैष्णव की जात नहीं जाती, नहीं तो मेरी टगर...”टगर भड़के हुए भालू की तरह गरज उठी, “अब फिर वही!”“नहीं, तो जाने दो”, कहकर नन्द उदासीनता से दूसरी तरफ को देखता हुआ चुप हो गया।एक काबुली दम्पति, जो कि मलिनता के अवतार थे, सिर से पैर तक पृथ्वी की सारी गन्दगी लादे हुए अत्यन्त तृप्ति के साथ रोटी खा रहे थे। क्रुद्ध टगर उन हतभागों के प्रति अपने बड़े-बड़े चक्षुओं से एकंटक होकर अग्नि वर्षण करने लगी। नन्द ने अपनी घरवाली को उद्देश्य करके प्रश्न किया, “तो फिर आज खाना-पीना कुछ न होगा, क्यों?”घरवाली ने कहा, “मौत और किसे कहते हैं? होगा कैसे, सुनूँ तो?”मामला न समझ सकने के कारण मैंने कहा, “अभी तो बड़ी सकार है, कुछ बेला चढ़ जाने पर...”नन्द मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, “कलकत्ते से एक हाँड़ी में बढ़िया रसगुल्ले लाया था बाबूजी, जहाज पर सवार होने तक कहता रहा, “आओ टगर, कुछ खा लेवें, आत्मा को कष्ट न दें”, परन्तु नहीं- “मैं रंगून ले जाऊँगी।” (टगर के प्रति) ले, अब ले जा रंगून, क्या ले जाती है?”टगर ने, इस क्रुद्ध अभियोग का स्पष्ट प्रतिवाद न कर, क्षुब्ध अभिमान से एक दफे मेरी ओर देखा और फिर, वह उस हतभागे काबुली को अपनी नजर से पहले के समान ही दग्ध करने लगी।मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ रसगुल्लों का?”नन्द टगर को लक्ष्य करके कटाक्ष करता हुआ बोला, “उनका क्या हुआ सो नहीं कह सकता। वह देखो न फूटी हाँड़ी, और वह देखो बिछौने में गिरा हुआ रस। इससे ज्यादा कुछ जानना चाहो तो पूछो उस हरामजादे से।” इतना कहकर टगर की दृष्टि का अनुसरण कर वह भी कठोर दृष्टि से उनकी ओर ताकने लगा।मैंने बड़ी मुश्किल से हँसी रोकते हुए मुँह नीचा करके कहा, “तो जाने दो, साथ में चिउड़ा तो है!”नन्द बोला, “उस ओर से भी छुट्टी मिल गयी है। बाबूजी को एक दफे दिखा तो दो, टगर।”टगर ने एक छोटी-सी पोटली को पैरों से ठुकराते हुए कहा, “दिखा दो न तुम्हीं-”नन्द बोला, “जो भी कहो बाबू, काबुली जात नमकहराम नहीं कही जा सकती। ये लोग जिस तरह रसगुल्ले खा जाते हैं, उसी तरह अपने काबुलदेश की मोटी रोटियाँ भी तो बाँध देते हैं,- फेंकना नहीं टगर, रख छोड़, तेरे ठाकुरजी के भोग के काम में आ जायेंगीं।”नन्द के इस परिहास से मैं जोर से हँस पड़ा, किन्तु दूसरे ही क्षण टगर के मुँह की ओर देखकर डर गया। क्रोध के मारे उसका सारा मुँह काला हो गया था। ऊँचे कण्ठ से वज्र-कर्कश शब्दों में जहाज के सब लोगों को चौंकाकर वह चिल्ला उठी, “जात तक मत जाना भला मिस्री-कहे देती हूँ, अच्छा न होगा, हाँ...”उसकी चिल्लाहट से जिन लोगों ने मुँह उठाकर उस ओर देखा, उनकी विस्मित दृष्टि के सामने, शरम के मारे, नन्द का मुँह जरा-सा रह गया। टगर को वह बखूबी जानता था। अपनी निरर्गल दिल्लगी के कारण पैदा हुए उसके क्रोध को किसी तरह शान्त करने में ही कुशल थी। शरमिन्दा होकर वह चट से बोल उठा, “सिर की कसम टगर, गुस्सा मत हो, मैं तो केवल मजाक कर रहा था।”टगर ने वह बात जैसे सुनी ही नहीं। पुतलियाँ और भौहें एक बार बाईं ओर और एक बार दाहिनी ओर घुमाकर और कण्ठ के स्वर को और एक पर्दा ऊपर चढ़ाकर वह बोली, “मजाक कैसा! जात को लेकर भी क्या कोई मजाक किया जाता है। मुसलमानों की रोटियों से भोग लगाया जायेगा? केवट के मुँह में आग-जरूरत हो तो तू ही न रख छोड़-बाप को इनका पिण्डदान दे देना!”डोरी छोड़े हुए धानुष्य की तरह नन्द चट से सीधा होकर खड़ा हो गया और उसने टगर का झोंटा पकड़ लिया, “हरामजादी, तू बाप तक जाती है।”टगर कमर का कपड़ा सँम्हालती हुई हाँफते-हाँफते बोली, और “हरामजादे, तू जात तक जायेगा!” इतना कहकर कानों तक मुँह फाड़कर उसने नन्द की भुजा के एक हिस्से में काट खाया। मुहूर्त-भर में ही नन्द मिस्री और टगर वैष्णवी का मल्ल-युद्ध गहरा हो उठा। देखते ही देखते सब लोग घेरकर खड़े हो गये। भीड़ हो गयी। समुद्री बीमारी की तकलीफ को भूलकर सारे 'हिन्दुस्तानी'¹ ऊँचे कण्ठ से वाहवाही देने लगे, पंजाबी छि:-छि: करने लगे, उड़िया चीं-चीं करने लगे। एक तरह से पूरा लंका काण्ड मच गया मैं सन्नाटे में आ गया। और मेरा मुँह विवर्ण हो गया। इतनी मामूली-सी बात पर निर्लज्जता का ऐसा नंगा नाच हो सकता है, इसकी मैं कल्पना भी न कर सका था। और वह भी एक बंगाली स्त्री-पुरुष के द्वारा जहाज-भर के लोगों के सामने हो रहा है, यह देखकर तो मैं लज्जा के मारे जमीन में गड़ा जाने लगा। पास में ही एक जौनपुरी दरबान अत्यन्त सन्तोष के साथ तमाशा देख रहा था। मेरी ओर लक्ष्य करके बोला, “बाबूजी, बंगालिन तो बहुत अच्छी लड़ने वाली है, हटती ही नहीं।”मैं उसकी ओर ऑंखें उठाकर देख भी न सका, चुपचाप गर्दन नीची किये किसी तरह भीड़ को चीरता हुआ ऊपर भाग गया।

❤️,श्रीकांत"❤️

   अध्याय 5

इस अभागे जीवन के जिस अध्याय को, उस दिन राजलक्ष्मी के निकट अन्तिम बिदा के समय ऑंखों के जल में समाप्त करके आया था- यह खयाल ही नहीं किया था कि उसके छिन्न सूत्र पुन: जोड़ने के लिए मेरी पुकार होगी। परन्तु पुकार जब सचमुच हुई, तब समझा कि विस्मय और संकोच चाहे जितना हो, पर इस आह्नान को शिरोधार्य किये बिना काम नहीं चल सकता।

इसीलिए, आज फिर मैं अपने इस भ्रष्ट जीवन की विशृंखलित घटनाओं की सैकड़ों जगह से छिन्न-भिन्न हुई ग्रन्थियों को फिर एक बार बाँधने के लिए प्रवृत्त हो रहा हूँ।

आज मुझे याद आता है कि घर पर लौट आने के बाद मेरे इस सुख-दु:ख-मिश्रित जीवन को किसी ने मानो एकाएक काटकर दो भागों में विभक्त कर दिया था। उस समय खयाल हुआ था कि मेरे इस जीवन के दु:खों का बोझा केवल मेरा ही नहीं है। इस बोझे को लादकर घूमे वह, जिसको कि इसकी नितान्त गरज हो। अर्थात् मैं जो दया करके जीता बच गया हूँ, सो तो राजलक्ष्मी का सौभाग्य है। आकाश का रंग कुछ और ही नजर आने लगा था, हवा का स्पर्श कुछ और ही किस्म का मालूम होने लगा था- मानो, कहीं भी अब घर-बार, अपना-पराया, नहीं रहा था। एक तरह के ऐसे अनिर्वचनीय उल्लास से अन्तर-बाहर एकाकार हो गया था, कि रोग रोग के रूप में, विपदा विपदा के रूप में, अभाव अभाव के रूप में, मन में स्थान ही नहीं पा सकता था। संसार में कहीं जाते हुए, कहीं कुछ करते हुए, दुविधा या बाधा का जरा भी सम्पर्क नहीं रह गया था।

यह सब बहुत दिन पहले की बातें हैं। वह आनन्द अब नहीं है; परन्तु उस दिन जीवन में इस एकान्त विश्वास की निश्चित निर्भरता का स्वाद एक दिन के लिए भी मैं उपभोग कर सका, यही मेरे लिए परम लाभ है। परन्तु, साथ ही, मैंने उसे खो दिया, इसका भी मुझे किसी दिन क्षोभ नहीं हुआ। केवल इस बात का ही बीच-बीच में खयाल आ जाता है कि जिस शक्ति ने उस दिन हृदय के भीतर जाग्रत होकर इतनी जल्दी संसार का समस्त निरानन्द हरण कर लिया था, वह कितनी विराट शक्ति है! और सोचता हूँ कि उस दिन अपने ही समान अन्य दो अक्षम दुर्बल हाथों के ऊपर इतना बड़ा गुरु-भार न डालकर यदि मैं समस्त जगद्-ब्रह्माण्ड के भारवाही उन हाथों पर ही अपनी उस दिन की उस अखण्ड विश्वास की समस्त निर्भरता को सौंप देना सीखता, तो फिर, आज चिन्ता ही क्या थी?-किन्तु, अब जाने दो उस बात को।

राजलक्ष्मी को मैंने पहुँच का पत्र लिखा था। उस पत्रका जवाब बहुत दिनों बाद आया। मेरे अस्वस्थ शरीर के लिए दु:ख प्रकाशित करके गृहस्थ बनने के लिए उसने मुझे कई तरह के बड़े-बड़े उपदेश दिए थे और अपने संक्षिप्त पत्र यह लिखकर खत्म किया था कि यदि वह कामों के झंझटों के मारे पत्रादि लिखने का समय न पा सके, तो भी, मैं बीच-बीच में अपनी खबर उसे देता रहूँ और उसे अपना ही समझूँ।

तथास्तु। इतने दिनों बाद उसी राजलक्ष्मी की यह चिट्ठी!

आकाश-कुसुम आकाश में ही सूख गये और जो दो-एक सूखी पंखुड़ियां हवा से झड़ पड़ीं उन्हें बीन करके घर ले जाने के लिए भी मैं जमीन टटोलता नहीं फिरा। ऑंखों में से दो-एक बूँद पानी शायद पड़ा भी हो, किन्तु, वह मुझे याद नहीं। फिर भी, यह याद है कि और अधिक दिन मैंने स्वप्न देखते हुए नहीं काटे। तब भी इस तरह और भी पाँच-छह महीने कट गये।

एक दिन सुबह बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। एकाएक एक अद्भुत पत्र आ पहुँचा। ऊपर औरतों के से कच्चे अक्षरों में नाम और ठिकाना लिखा था। खोलते ही पत्र के भीतर से एक छोटा-सा पत्र खट् से जमीन पर गिर पड़ा। उसे उठाकर तथा उसके अक्षर और नाम सही की ओर देखकर मैं मानो अपने दोनों नेत्रों पर भी विश्वास न कर सका। मेरी माँ, जो दस वर्ष पहले ही देह त्याग कर गयी थीं- उन्हीं के श्रीहस्त के ये दस्तखत थे, नाम और सही भी उन्हीं की थी। पढ़कर देखा, माँ ने उसमें अपनी 'गंगाजल¹' को जितना भी हो सकता है उतना अभय वचन दिया था। बात सम्भवत: यह थी, कि बारह-तेरह वर्ष पहले इस 'गंगाजल' के यहाँ जब अधिक उम्र में एक कन्या-रत्न ने जन्म ग्रहण किया, तब दु:ख, दैन्य और दुश्चिन्ता प्रकट करके शायद माँ को उसने एक पत्र लिखा होगा और उसी के प्रत्युत्तर में मेरी स्वर्गवासिनी जननी ने गंगाजल-दुहिता का विवाह का समस्त दायित्व ग्रहण करके जो पत्र लिखा था वही यह मूल्यवान दस्तावेज थी। तात्कालिक करुणा से पिघलकर माँ ने उपसंहार में लिखा था कि सुपात्र यदि कहीं न मिले, बिल्कुतल ही अभाव हो,

¹ बंगाल में स्त्रियाँ जिसे अपनी सखी-सहेली बनाती हैं उसे 'गंगाजल' इस प्यार के नाम से सम्बोधित करती हैं।

तो फिर मैं तो हूँ ही! सारी चिट्ठी को ऊपर से नीचे तक दो बार पढ़कर मैंने देखा कि वह मुंशियाना ढंग से लिखी गयी है। माँ को वकील होना चाहिए था क्योंकि जितनी भी कल्पनाएँ की जा सकतीं थीं उतनी तरह से वे अपने आपको और अपने वंशधरों को उस दायित्व में बाँध गयी हैं। उससे बचने के लिए दस्तावेज में कहीं जरा-सी भी जगह- जरा-सी भी त्रुटि, नहीं छोड़ी गयी है।

वह चाहे जो हो, पर ऐसा तो मुझे नहीं मालूम पड़ा कि 'गंगाजल' इन सुदीर्घ तेरह वर्षों तक इस पक्के दस्तावेज के ही भरोसे निर्भय हो चुपचाप बैठी रही है। परन्तु, उलटे मन ही मन मुझे ऐसा लगा कि बहुत प्रयत्न करने पर भी जब रुपये और निजी मनुष्यों के अभाव से सुपात्र उसके लिए एकबारगी अप्राप्य हो गया, और कुमारी कन्या की शारीरिक उन्नति की ओर दृष्टिपात करने से हृदय का रक्त मस्तिष्क में चढ़ने की तैयारी करने लगा, तब कहीं जाकर इस हतभाग्य सुपात्र के ऊपर उन्होंने अपना एकमात्र ब्रह्मास्त्र फेंका है।

माँ यदि जीती होतीं तो इस चिट्ठी के लिए आज मैं उनका सिर खा जाता और उनके पैरों पर जोर से सिर पटककर अपनी ज्वाला को बुझाता, परन्तु यह रास्ता भी मेरे लिए बन्द है।

इसलिए, माँ का तो कुछ भी नहीं कर सका परन्तु, अब उनकी गंगाजल का भी कुछ कर सकता हूँ या नहीं, यह परखने के लिए मैं एक दिन रात्रि को स्टेशन पर जा पहुँचा। सारी रात ट्रेन में काटकर दूसरे दिन जब उनके गाँव के मकान पर पहुँचा तब दिन ढल गया था। गंगाजल-माँ पहले तो मुझे पहिचान न सकीं। अन्त में, परिचय पाकर इन तेरह वर्षों के बाद भी वे इस तरह रो पड़ीं जिस तरह कि माँ की मृत्यु के समय उनका कोई अपना आदमी भी ऑंखों के सामने उनकी मृत्यु होते देखकर, न रो सका होता।

वे बोलीं कि लोकदृष्टि से और धर्मदृष्टि से, दोनों ही तरह अब मैं तुम्हारी माता के समान हूँ और फिर दायित्व ग्रहण करने की प्रथम सीढ़ी के रूप में उन्होंने मेरी सांसारिक परिस्थिति का बारीकी से पर्यालोचन करना शुरू कर दिया। बाप कितना छोड़ गये हैं, माँ के कौन-कौन से गहने हैं और वे किसके पास हैं, मैं नौकरी क्यों नहीं करता और यदि करूँ तो अन्दाज से क्या महीना पा सकता हूँ, इत्यादि-इत्यादि। उनका मुँह देखकर खयाल हुआ कि इस आलोचना का फल उनके निकट कुछ वैसा सन्तोषजनक नहीं हुआ। वे बोलीं कि उनका एक रिश्तेदार बर्मा में नौकरी करके 'लाल' हो गया है, अर्थात् अतिशय-धनवान हो गया है। वहाँ तो राह-घाट में रुपये बिखरे पड़े हैं, केवल समेटने-भर की देर है! वहाँ पर जहाज से उतरते न उतरते ही बंगालियों को साहब लोग कन्धों पर उठा ले जाते हैं और नौकरी से लगा देते हैं। इस तरह की बहुत-सी बातें कहीं। बाद में मैंने देखा कि यह गलत धारणा केवल अकेली उन्हीं की नहीं थी। ऐसे बहुत-से लोग इस माया-मरीचिका से उन्मत्तप्राय होकर सहाय-सम्बलहीन अवस्था में वहाँ दौड़ गये हंु और मोह भंग होने के बाद उन्हें वापिस लौटाने में हम लोगों को कम क्लेश सहन नहीं करना पड़ा है। परन्तु वह बात इस समय रहने दो। गंगाजल-माँ का बर्मा-वर्णन मुझे तीर की तरह लगा। 'लाल' होने की आशा से नहीं-मेरे भीतर का जो घुमक्कड़पन कुछ दिनों से सोया हुआ था वह अपनी थकावट झाड़-पोंछकर मुहूर्त-भर में ही उठ खड़ा हुआ। जिस समुद्र को इसके पहले केवल दूर से खड़े-खड़े देखकर ही मुग्ध हो जाता था, अब उस अनन्त जलराशि को भी भेद करके मैं जा सकूँगा- इस इच्छा ने ही मुझे एकबारगी बेचैन कर दिया। तब किसी तरह एक बार छुटकारा पाना ही होगा।

मनुष्य मनुष्य से जितने प्रकार की भी जिरह कर सकता है, उनमें से किसी भी प्रकार की जिरह में गंगाजल-माँ ने मुझे नहीं छोड़ा। फिर भी, अपनी लड़की के योग्य पात्र की दृष्टि से उन्होंने मुझे रिहाई दे दी- इस विषय में मैं एक तरह से निश्चिन्त ही हो गया। परन्तु, रात्रि में भोजन के समय उनकी भूमिका का झुकाव देखकर मैं फिर उद्विग्न हो उठा। मैंने देखा, मुझे एकबारगी हाथ से जाने देने की उनकी इच्छा नहीं है। उन्होंने यह कहना शुरू किया कि यदि लड़की के भाग्य में न हो, तो धन, घर-बार, शिक्षा-दीक्षा आदि कितना ही क्यों न देखा जाय, सब कुछ निष्फल है। इस सम्बन्ध में नाम-धाम, विवरणादि के साथ बहुत-सी विश्वास योग्य नजीरें देकर उन्होंने इस बात को प्रमाणित भी कर दिखाया। इतना ही नहीं, इसके विरुद्ध ऐसे भी कितने ही लोगों का नामोल्लेख किया कि जो निराट मूर्ख होते हुए भी केवल स्त्री के ही सौभाग्य के जोर पर इस समय दिन-रात रुपयों के ढेर पर बैठे रहते हैं।

मैंने विनय सहित कह दिया कि रुपये-पैसे की तरफ मेरी आसक्ति तो है, फिर भी, चौबीसों घण्टे उन पर बैठा रहूँ, यह विवेचना मुझे प्रीतिकर नहीं मालूम होती और इसके लिए स्त्री का सौभाग्य देखने का कुतूहल भी मुझे नहीं है। किन्तु इसका कोई विशेष फल नहीं हुआ। उन्हें निरस्त न कर सका। क्योंकि, जो स्त्री तेरह वर्ष के इतने लम्बे समय के पश्चात् भी एक पत्र को दस्तावेज के रूप में पेश कर सकती है, उसे इतने सहज में नहीं भुलाया जा सकता। वे बार-बार कहने लगीं कि इसे माता के ऋण के ही रूप में ग्रहण करना उचित है, और जो सन्तान समर्थ होते हुए भी मातृ-ऋण का परिशोध नहीं करती वह... इत्यादि-इत्यादि।

जब मैं बहुत ही शंकित और विचलित हो उठा, तब बातों ही बातों में मुझे मालूम हुआ कि पास के गाँव में यद्यपि एक सुपात्र है, परन्तु, पाँच सौ रुपये से कम में उसका पाना असम्भव है।

एक क्षीण आशा की रश्मि नजर आई। महीने-भर के बाद जैसे भी हो कोई उपाय कर दूँगा- यह वचन देकर दूसरे दिन सुबह ही मैंने प्रस्थान कर दिया। परन्तु उपाय किस तरह करूँगा- किसी ओर भी उसका कोई कूल किनारा नजर नहीं आया।

मेरे ऊपर लादा गया यह भार मेरे लिए कोई सचमुच की वस्तु नहीं हो सकता, यह मैं अनेक तरह से अपने आपको समझाने लगा; परन्तु फिर भी, माँ को इस प्रतिज्ञा के पाश से मुक्ति न देकर चुपचाप खिसक जाने की बात भी किसी तरह मैं नहीं सोच सका।

शायद एक उपाय था- मैं यह बात प्यारी से कहूँ। किन्तु, कुछ दिनों तक इस सम्बन्ध में भी मैं अपने मन को स्थिर न कर सका। बहुत दिनों से मुझे उसकी खबर भी नहीं मिली थी। उस पहुँच की खबर को छोड़कर मैंने उसे और कोई चिट्ठी भी नहीं लिखी थी। उसने भी उसके जवाब के सिवाय, दूसरा पत्र नहीं लिखा। इस बात को वह शायद नहीं मानती थी कि चिट्ठी-पत्री के द्वारा ही दोनों के बीच मिलाप का एक सूत्र रहता है। कम से कम उसके उस पत्र से तो मैं समझा। फिर भी अचरज की बात है कि दूसरे की लड़की के लिए भिक्षा माँगने के बहाने एक दिन मैं सचमुच ही पटने जा पहुँचा।

मकान में प्रवेश करते ही नीचे बैठने के कमरे के बरामदे में मैंने देखा कि वर्दी पहने हुए दो दरबान बैठे हैं। वे एकाएक एक साधारण से अपरिचित आगन्तुक को देखकर कुछ इस तरह देखते रह गये कि मुझे सीधे ऊपर चढ़ जाने में संकोच मालूम हुआ। इन्हें मैंने पहले नहीं देखा था। प्यारी के पुराने बूढ़े दरबानजी के बदले इन दो और दरबानों की क्या आवश्यकता आ पड़ी, यह मैं न सोच सका। जो भी हो, इनकी परवाह किये बगैर ऊपर चला जाऊँ अथवा विनय के साथ इनकी अनुमति माँगूँ- यह स्थिर करते-करते ही मैंने देखा कि रतन व्यस्त हुआ-सा नीचे आ रहा है। अकस्मात् मुझे देखकर वह पहले तो अवाक् हो गया; बाद में पैरों की ओर झुककर प्रणाम करके बोला-

“आप कब आए? यहाँ कैसे खड़े हैं?”

“अभी ही आ रहा हूँ, रतन। सब कुशल तो है न?”

रतन सिर हिलाकर बोला, “सब कुशल है, बाबू। ऊपर चलिए- मैं बरफ खरीदकर अभी आया।” कहकर वह जाने लगा।

“तुम्हारी मालकिन ऊपर ही हैं?”

“हाँ हैं”, कहकर वह जल्दी से बाहर चला गया।

ऊपर चढ़ते ही जो पास का कमरा मिलता है वह बैठकखाना है। भीतर से एक ऊँची हँसी का शब्द और बहुत से लोगों की आवाज सुनाई दी। मैं जरा विस्मित हुआ। परन्तु, दूसरे ही क्षण, द्वार के नजदीक पहुँचकर मैं अवाक् हो गया। पिछली दफे इस कमरे को व्यवहार में आते नहीं देखा था। इसमें तरह-तरह के साज-सामान, टेबल, चेअर आदि अनेक चीजें एक कोने में ढेर होकर पड़ी रहती थीं। बहुधा कोई इस कमरे में आता भी न था। आज देखता हूँ, सम्पूर्ण कमरे में बिस्तर है, शुरू से अन्त तक कार्पेट बिछा हुआ है और उसके ऊपर सफेद जाजम झक-झककर रही है। तकियों के ऊपर गिलाफ चढ़े हुए हैं और उनके सहारे बैठे हुए कुछ सभ्य पुरुष अचरज से मेरी ओर देख रहे हैं। उनकी पोशाक में बंगालियों की तरह धोती होने पर भी सिर पर की बेल-बूटेदार मसलिन की टोपी से वे बिहारी से मालूम होते थे। तबले की जोड़ी के पास एक हिन्दुस्तानी तबलची था और उसके पास में भी स्वयं प्यारीबाई थीं। एक तरफ छोटा-सा हारमोनियम रखा था। प्यारी के शरीर पर यद्यपि मुजरे की पोशाक नहीं थी, फिर भी बनाव-सिंगार का अभाव नहीं था। समझ गया कि संगीत की बैठक जमी हुई है- थोड़ी देर विश्राम लिया जा रहा है।

मुझे देखते ही प्यारी के चेहरे का समस्त खून मानो कहीं अन्तर्हित हो गया। इसके बाद उसने जबर्दस्ती कुछ हँसकर कहा, “यह क्या, श्रीकान्त बाबू हैं। कब आये?”

“आज ही।”

“आज ही? कब? कहाँ ठहरे हैं?”

क्षण-भर के लिए शायद मैं कुछ हतबुद्धि-सा हो गया; नहीं तो उत्तर देने में देर न होती। परन्तु, अपने आपको सम्हा्लने में भी मुझे अधिक देर नहीं लगी। मैंने कहा, “यहाँ के सब लोगों को तुम चीन्हती नहीं हो, इसलिए, नाम सुनकर भी न चीन्ह सकोगी।”

जो महाशय सबसे अधिक बने-ठने थे वही शायद इस यज्ञ के यजमान थे। बोले, “आइए बाबूजी, बैठिए।” इतना कहकर होठों को दबाकर जरा वे हँसे। भाव-भंगी से उन्होंने यह प्रकट किया कि हम दोनों का सम्बन्ध वे ठीक तौर से भाँप गये हैं! उनका आदर के साथ अभिवादन कर मैंने, जूते के फीते खोलने के बहाने, मुँह नीचा करके परिस्थिति को भाँप लेना चाहा। विचार करने के लिए अधिक समय नहीं था, यह ठीक है, परन्तु, इन थोड़े से क्षणों में मैंने यह स्थिर कर लिया कि हृदय के भीतर कुछ भी हो, बाहर के व्यवहार में वह किसी भी तरह प्रकाशित न होना चाहिए। मेरे मुँह की बातचीत से, ऑंखों की चितवन से, मेरे सारे आचरण के किसी भी छिद्र में से, अन्तर के क्षोभ अथवा अभिमान की एक बूँद भी बाहर आकर न गिरनी चाहिए। क्षण-भर बाद जब मैं सबके बीच में जाकर बैठा तब, यद्यपि यह सच है कि अपने मुख की सूरत अपनी ऑंखों न देख सका, किन्तु भीतर ही भीतर मैंने अनुभव किया कि अब उस पर अप्रसन्नता का लेशमात्र भी चिह्न नहीं रह गया है। राजलक्ष्मी की ओर देखकर मैं हँसते हुए बोला, “बाईजी, यदि शुकदेव मुनिका पता पा जाता तो आज तुम्हारे सामने बिठाकर एक दफा उनके मन की शक्ति की जाँच कर लेता! अरे, यह किया क्या है! यह तो रूप का समुद्र ही बहा दिया है!”

प्रशंसा सुनकर प्रमुख बाबू साहब आह्लाद से गलकर सिर हिलाने लगे। वे पुर्निया जिले के रहने वाले थे; मैंने देखा कि बोल न सकने पर भी बंगला अच्छी तरह समझते हैं। परन्तु प्यारी के कान तक लाल हो उठे।-किन्तु, लाज के मारे नहीं- गुस्से के मारे, यह भी समझने में कुछ बाकी न रहा। परन्तु, उस ओर भ्रूक्षेप भी न करके बाबू साहब को उद्देश्य करके मैंने उसी तरह हँसते हुए कहा, “मेरे आने के कारण यदि आप लोगों के आमोद-प्रमोद में थोड़ा-सा भी विघ्न होगा, तो मुझे बहुत दु:ख होगा। गाना-बजाना चलने दीजिए।”

बाबूजी इतने प्रसन्न हो उठे कि आवेश में आकार मेरी पीठ पर एक धौल जमाकर बोले, “बहुत अच्छा बाबू। हाँ प्यारी बीबी, एक बढ़िया-सा गाना चलने दो।”

“संध्याए के बाद होगा- बस अब और नहीं।” कह कर प्यारी हारमोनियम दूर खिसकाकर सहसा उठा खड़ी हुई।

इसी समय बाबू साहब मेरा परिचय पाने के उपलक्ष्य से अपना परिचय देने लगे- उनका नाम था रामचन्द्र सिंह। वे पुर्निया जिले के एक जमींदार हैं, दरभंगा- महाराजा उनके कुटुम्बी हैं, प्यारी बीबी को सात-आठ वर्ष से जानते हैं। वे उनके पुर्निया के मकान पर तीन-चार दफे मुजरा कर आई हैं। वे खुद भी अनेक दफे गाना सुनने यहाँ आए हैं। कभी-कभी दस-दस बारह-बारह दिन तक वे यहीं रहते हैं और तीनेक महीने पहले एक दफे आकर वे एक हफ्ते तक यहाँ रह गये हैं- वगैरह वगैरह। अब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। मेरे जवाब देने के पहले ही वहाँ प्यारी आ उपस्थित हुई। उसकी ओर देखकर मैंने कहा, “बाईजी से ही पूछिए न, कि क्यों आया हूँ।”

प्यारी ने मेरे मुँह पर एक तीव्र कटाक्ष डाला, परन्तु, जवाब दिया सहज शान्त स्वर में ही, “ये हमारे देश के आदमी हैं।”

मैंने हँसकर कहा, “बाबूजी, मधु होने पर मधुमक्खियाँ आकर जुट जाती हैं, वे देश-विदेश का विचार नहीं करतीं।” किन्तु इतना कहते ही मैंने देखा कि रहस्य को ग्रहण न कर सकने के कारण पुर्निया जिले के जमींदार ने अपने मुँह को गम्भीर बना लिया और उनके नौकर ने ज्यों ही आकर कहा कि संध्याी-पूजा के लिए तैयारी हो गयी है त्यों ही उन्होंने वहाँ से प्रस्थान कर दिया। तबलची तथा अन्य दो महाशय उनके साथ ही साथ बाहर चले गये। उनका मन अकस्मात् क्यों इतना व्याकुल हो गया, सो मैं बिन्दु-विसर्ग कुछ भी नहीं समझा।

रतन आकर बोला, “माँ, बाबूजी के बिछौने कहाँ करूँ?”

प्यारी ने झुँझलाकर कहा, “क्या और कोई कमरा नहीं है रतन? मुझसे पूछे बिना क्या इतनी-सी बुद्धि भी तू नहीं लगा सकता? चला जा यहाँ से!” इतना कहकर रतन के साथ आप भी बाहर चली गयी। मैंने खूब अच्छी तरह से देखा कि मेरे आकस्मिक शुभागमन से इस मकान का भार-केन्द्र एक सांघातिक ढंग से विचलित हो गया है। प्यारी ने, किन्तु थोड़ी ही देर बाद लौट आकर और मेरे मुँह की ओर कुछ देर देखते रहकर कहा, “ऐसे अचानक कैसे आना हो गया?”

मैंने कहा, “देश का आदमी हूँ, तुम्हें बहुत दिन से न देख सकने के कारण व्याकुल हो उठा था, बाईजी!”

प्यारी का मुँह और भी भारी हो गया। मेरे परिहास में जरा भी योग न देकर उसने पूछा, “आज रात को यहाँ ही रहोगे न?”

“रहने को कहोगी तो रह जाऊँगा।”

“मेरे कहने न कहने से क्या! तुम्हें यहाँ शायद कुछ असुविधा हो। जिस कमरे में तुम सोते थे उसमें तो...”

“बाबू सोते हैं? ठीक है, मैं नीचे सो जाऊँगा। तुम्हारा नीचे का कमरा तो बहुत उम्दा है।”

“नीचे सोओगे? कहते क्या हो! मन में तुम्हारे जरा भी विकार नहीं- दो ही दिन में इतने बड़े परमहंस किस तरह हो गये?”

मैंने मन ही मन कहा, “प्यारी, तुमने मुझे अब तक भी नहीं पहचाना।” फिर मुँह से कहा, “इसमें मुझे मान-अपमान का खयाल बिन्दु-भर भी नहीं है। और, कष्ट की बात का यदि खयाल करो, तो वह तो एकबारगी ही फिजूल है। मैं घर से बाहर निकलने के समय खाने-सोने की चिन्ताओं को दूर रख आता हूँ, यह तो तुम भी जानती हो। बिस्तर यदि अधिक हों तो एक ले आने के लिए कह दो, नहीं हो, तो फिर उसकी भी दरकार नहीं है- मुझे अपने कम्बल का सम्बल है।”

प्यारी ने सिर हिलाकर कहा, “सो तो मैं जानती हूँ; किन्तु, इससे मन में किसी तरह का दु:ख तो न होगा?”

मैंने हँसकर कहा, “नहीं, क्योंकि स्टेशन पर पड़े रहने की अपेक्षा तो यह बहुत ही अच्छा है।”

प्यारी कुछ देर चुप खड़ी रही; फिर बोली, “यदि मैं होती तो भले ही वृक्ष के नीचे सो रहती, परन्तु इतना अपमान कभी नहीं सहती।”

उसकी उत्तेजना को देखकर मुझसे हँसे बिना न रहा गया। वह मेरे मुँह से क्या सुनना चाहती है, सो मैं बड़ी देर से खूब समझ रहा था। किन्तु शान्त स्वाभाविक स्वरूप से मैंने जवाब दिया, “मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ कि इस बात को मन में आने दूँ कि तुम, जानबूझकर मुझे नीचे सोने को कहकर, मेरा अपमान कर रही हो। यदि सम्भव होता तो तुम उस दफे के समान इस दफे भी मेरे सोने की व्यवस्था करतीं। जाने दो, इन तुच्छ बातों को लेकर वाग्वितण्डा करने की जरूरत नहीं, तुम रतन को भेज दो कि मुझे नीचे का कमरा दिखा आवे, मैं कम्बल बिछाकर सो रहूँगा। मैं बहुत ही थक गया हूँ।

प्यारी ने कहा, “तुम ज्ञानी आदमी हो, तुम ही मेरी ठीक अवस्था को न जान सकोगे तो और जानेगा कौन? चलो, बच गयी।” इतना कहकर उसने एक दीर्घ श्वास दबाकर पूछा, “एकाएक आने का सच्चा कारण तो मैं जान ही न सकी कि क्या है?”

मैं बोला, “पहला कारण तो तुम नहीं सुन पाओगी, किन्तु दूसरा सुन सकती हो!”

“पहला क्यों नहीं सुन सकूँगी?”

“अनावश्यक है, इसलिए।”

“अच्छा, दूसरा ही सुनाओ।”

“मैं बर्मा जा रहा हूँ। शायद और फिर कभी मिलना न हो सके। कम से कम यह तो निश्चित है कि बहुत दिनों तक मिलाप न होगा। जाने के पहले एक दफे तुम्हें देखने आया हूँ।”

रतन कमरे में आकर बोला, “बाबू, आपके बिस्तर तैयार हैं, आइए।”

मैंने खुश होकर कहा, “चलो।” प्यारी से कहा, “मुझे बड़ी नींद आ रही है। घण्टे भर बाद यदि समय मिले तो एक दफे नीचे आ जाना- मुझे और भी बहुत-सी बातें करनी हैं।” इतना कहकर रतन को साथ लेकर मैं बाहर हो गया।

प्यारी के निज के सोने के कमरे में ले आकर रतन ने मुझे जब शय्या बताई तब मेरे अचरज की सीमा न रही। मैं बोला, “मेरे बिस्तर नीचे के कमरे में न करके यहाँ क्यों किये?”

रतन ने अचरज के साथ कहा, “नीचे के कमरे में?”

मैंने कहा, “ऐसी ही बात तो हुई थी।”

वह अवाक् होकर कुछ देर मेरी ओर देखता रहा और अन्त में बोला, “आपके बिस्तर होंगे नीचे के कमरे में? आप मजाक कर रहे हैं बाबू!” इतना कहकर वह हँसता हुआ जा ही रहा था कि मैंने उसे बुलाकर पूछा, “तुम्हारी मालकिन कहाँ सोवेंगी?”

रतन बोला, “बंकू बाबू के कमरे में उनके बिस्तर लगा आया हूँ।” मैंने निकट आकर देखा- यह राजलक्ष्मी के उस डेढ़ हाथ चौड़े तख्ते पर बिछाया हुआ बिस्तर नहीं है। एक पलंग पर एक खूब मोटा गद्दा बिछाकर शाही बिस्तर लगाए गये हैं। शीशे के नजदीक नजदीक एक छोटी-सी टेबल के ऊपर मेज के बीचोंबीच लैम्प जल रहा है। एक किनारे बंगला भाषा की किताबें हैं और दूसरे किनारे गुलदस्ते में कुछ बेला के फूल रक्खे हैं। ऑंखों से देखते ही मैंने अच्छी तरह जान लिया कि इनमें से कोई भी चीज नौकर के हाथ की तैयार की हुई नहीं हैं। जो बहुत प्यार करती है, ये सब चीजें उसी के हाथ की तैयार की हुई हैं। ऊपर की चादर भी राजलक्ष्मी खुद अपने हाथों बिछा गयी है, यह मानो अन्दर ही अन्दर मैंने खूब अनुभव किया।

आज उन लोगों के सामने अचानक आ जाने के सबब राजलक्ष्मी ने हतबुद्धि हो, पहले चाहे जैसा व्यवहार क्यों न किया हो, पर यह बात मुझसे अज्ञात नहीं रही कि मेरी निर्विकार उदासीनता से वह मन ही मन शंकित हो उठी थी और यह भी मुझे मालूम हो गया कि मेरे भीतर ईर्ष्या् का प्रकाश देखने के लिए उत्सुक हो वह इतनी देर से इतनी तरह से क्यों बार-बार आघात कर रही थी। किन्तु, सब कुछ जानते हुए भी, अपने निष्ठुर स्वभाव को ही मर्दानगी समझकर मैंने उसका जरा भी अभिमान नहीं रहने दिया- उसके प्रत्येक छोटे से छोटे आघात को सौ गुना करके वापिस लौटा दिया। उसके प्रति किया गया यह अन्याय मेरे मन के भीतर अब सुई की तरह चुभने लगा। मैं बिस्तर पर लेट गया किन्तु सो नहीं सका। मैं यह निश्चय जानता था कि एक बार वह आयेगी जरूर। इसलिए, उत्सुकता के साथ उस समय की राह देखने लगा।

थकावट के कारण शायद कुछ सो भी गया था, सहसा ऑंखें खोलकर देखा कि प्यारी मेरे शरीर पर एक हाथ रखे हुए बैठी है। मेरे उठकर बैठते ही वह बोली, “बर्मा को गया हुआ मनुष्य फिर लौटकर वापिस नहीं आता, यह बात क्या तुम्हें मालूम है?”

“नहीं, मुझे नहीं मालूम।”

“फिर?”

“मुझे लौटना ही होगा, ऐसी तो किसी के सिर की कसम मुझ पर है नहीं।”

बात बहुत ही सामान्य थी। किन्तु, संसार में यह एक भारी अचरज की बात है कि मनुष्य की दुर्बलता कब किस झरोखे से अपने आपको प्रकट कर बैठेगी, इसका अनुमान नहीं किया जा सकता। इसके पहले कितने ही और इससे भी अधिक बड़े कारण घट गये हैं, परन्तु, मैंने कभी अपने आपको इस तरह नहीं पकड़ा जाने दिया। किन्तु, आज उसके मुँह से निकली हुई इस अत्यन्त साधारण बात को भी मैं सहन नहीं कर सका। मुँह से सहसा यह बात निकल ही गयी, “सब लोगों के मन की बात तो जानता नहीं राजलक्ष्मी, परन्तु एक मनुष्य के मन की अवश्य जानता हूँ। यदि किसी दिन लौटकर आऊँगा तो केवल तुम्हारे ही लिए। तुम्हारे सिर की कसम मैं कभी अवहेलना नहीं करूँगा।”

प्यारी मेरे पैरों पर एकबारगी उलटी ही गिर पड़ी। मैंने इच्छा करके भी पैर पीछे न खींचे, परन्तु, दसेक मिनट बीत जाने पर भी जब उसने अपना सिर ऊपर नहीं उठाया तब उसके सिर पर मैंने अपना दाहिना हाथ रक्खा जिसके पड़ते ही वह एक बार सिहरकर काँप उठी। परन्तु फिर भी वह उसी तरह पड़ी रही। सिर भी नहीं उठाया, बोली भी नहीं। मैंने कहा, “उठकर बैठो, इस अवस्था में हमें कोई देखेगा तो भारी अचम्भे में पड़ जायेगा।”

किन्तु, प्यारी ने जवाब तक नहीं दिया तब मैंने उसे जोर से उठाया। उठाते ही मैंने देखा कि उसके नीरव ऑंसुओं से वहाँ की सारी चादर बिल्कुनल भीग गयी है। खींच-तान करने पर वह रुद्ध कण्ठ से बोल उठी, “पहले मेरी दो-तीन बातों का जवाब दो तब मैं उठूँगी।”

“कहो, कौन-सी बातें हैं।”

“पहले तो यह कहो कि उन लोगों के यहाँ रहने से तुमने मेरे सम्बन्ध में कोई बुरा खयाल तो नहीं किया?”

“नहीं।”

प्यारी और कुछ देर चुप रहकर बोली, “किन्तु, मैं भली औरत नहीं हूँ, यह तो तुम जानते हो? फिर भी, तुम्हें क्यों सन्देह नहीं हुआ?”

सवाल बड़ा ही कठिन था। वह भली स्त्री नहीं है, यह मैं जानता हूँ परन्तु वह खराब है, यह खयाल भी मैं मन में नहीं ला सका। मैं चुप हो रहा।

एकाएक वह अपनी ऑंखें पोंछकर झटपट उठ बैठी और बोली, “अच्छा, तुमसे पूछती हूँ; पुरुष कितना ही बुरा क्यों न हो, यदि वह भला होना चाहता है तो उसे कोई रोकता नहीं; किन्तु, हम लोगों की पारी आने पर सब मार्ग क्यों बन्द हो जाते हैं? अज्ञान से, धनाभाव से, एक दिन जो कर बैठी- चिरकाल के लिए मुझे वही क्यों करना पड़ता रहे? हम लोगों को तुम लोग क्यों भला बनने नहीं देते?”

मैंने कहा, “हम लोग तो कभी रोकते नहीं। और यदि हम रोकें, तो भी, संसार में भले बनने के मार्ग में कोई किसी को अटकाकर नहीं रख सकता।”

प्यारी बड़ी देर तक चुप रहकर मेरे मुँह की ओर देखकर अन्त में धीरे-धीरे बोली, “बहुत ठीक, तो फिर, तुम भी मुझे नहीं रोक सकोगे।”

मेरे जवाब देने के पहले ही रतन की खाँसी का शब्द द्वार के निकट सुन पड़ा।

प्यारी ने पुकार कर कहा, “क्या है रतन?”

रतन ने मुँह आगे निकाल कर कहा, “माँ रात बहुत बीत गयी है- बाबूजी के खाने के लिए ले न आऊँ? रसोइया महाराज तो झोंके खाते-खाते रसोईघर में ही सो गये हैं।”

“अरे, तब तो तुममें से किसी ने भी अभी तक खाया न होगा!” इतना कह कर प्यारी घबड़ाकर और लज्जित होकर उठ खड़ी हुई। मेरे लिए खाने को वह अपने ही हाथों हमेशा लाती थी; आज भी लाने के लिए जल्दी से पैर बढ़ाती हुई चली गयी।

खाना समाप्त करके जब मैं बिस्तर पर लेटा तब रात का एक बज गया था। प्यारी फिर आकर मेरे पैरों के पास बैठ गयी। बोली, “तुम्हारे लिए अनेक रातें अकेले जागकर बिताई हैं- आज तुम्हें भी जागते रक्खूँगी। इतना कहकर मेरी सम्मति की राह देखे बगैर ही उसने मेरे पैर की तरफ का तकिया खींच लिया और बाएँ हाथ का सहारा लेकर वह लेट गयी तथा बोली, “मैंने बहुत विचार कर देखा, तुम्हरा इतने दूर-देश जाना किसी तरह भी नहीं हो सकता।”

मैंने पूछा, “तो फिर, क्या हो सकता है? इसी तरह यहाँ-वहाँ भटकते फिरना?”

प्यारी ने इसका जवाब न देकर कहा, “इसके सिवाय किसलिए बर्मा जा रहे हो, कहो तो सही?”

“नौकरी करने, यहाँ-वहाँ भटकते फिरने के लिए नहीं।”

मेरी बात को सुनकर प्यारी उत्तेजना के वश सीधी होकर बैठ गयी और बोली, “देखो, दूसरे से जो कहना हो कहना, किन्तु मुझे न ठगना। मुझे ठगोगे तो तुम्हारा इहकाल भी नहीं, पर काल भी नहीं बनेगा- सो जानते हो?”

“सो तो खूब जानता हूँ, अब क्या करना चाहिए, कहो तुम?”

मेरी स्वीकारोक्ति से प्यारी प्रसन्न हुई। हँसकर बोली, “स्त्रियाँ चिरकाल से जो कहती आई हैं वही मैं कहती हूँ। विवाह करके संसारी बन जाओ- गृहस्थ-धर्म का पालन करो।”

मैंने प्रश्न किया, “क्या सचमुच ही तुम खुशी होओगी?”

उसने सिर हिलाकर कानों के झूले हिलाते हुए उत्साह से कहा, “निश्चय से, एक दफे नहीं, सौ दफे। इससे यदि मैं सुखी नहीं होऊँगी, तो फिर और कौन होगा, बताओ?”

मैंने कहा, “सो तो मैं नहीं जानता; परन्तु, इससे मेरे मन की एक दुर्भावना चली गयी। वास्तव में, यही खबर देने मैं आया था कि ब्याह किये बगैर मेरी गुजर नहीं।”

प्यारी एक बार अपने कानों के स्वर्णालंकार झुलाती हुई महाआनन्द से बोल उठी, “ऐसा होगा, तो मैं कालीघाट जाकर पूजा दे आऊँगी। किन्तु, लड़की को मैं ही देखकर पसन्द करूँगी, सो कहे देती हूँ।”

मैंने कहा, “इसके लिए अब समय नहीं है, लड़की तो स्थिर हो चुकी है।”

मेरे गम्भीर स्वर पर शायद प्यारी ने ध्या,न दिया। एकाएक उसके हँसते मुख पर एक मैली-सी छाया पड़ गयी; बोली, “ठीक तो है, अच्छा ही हुआ। स्थिर हो गयी है तो परम सुख की बात है।”

मैंने कहा, “सुख-दु:ख तो मैं समझता नहीं राजलक्ष्मी, जो बात स्थिर हो चुकी है वही तुम्हें बताता हूँ।”

“प्यारी एकाएक गुस्से से बोल उठी, “जाओ, चालाकी मत करो, सब बात झूठी है।”

“एक भी बात मिथ्या नहीं है। चिट्ठी देखते ही समझ जाओगी”, इतना कहकर खीसे में से मैंने दो पत्र बाहर निकाले।

“कहाँ हैं, देखूँ चिट्ठी”, इतना कह हाथ बढ़ाकर प्यारी ने दोनों हाथों में चिट्ठियाँ ले लीं। उन्हें हाथ में लेते ही मानों उसके सारे मुँह पर अंधेरा छा गया। दोनों पत्र हाथ में लिये ही लिये वह बोली, “दूसरे का पत्र पढ़ने की मुझे जरूरत ही क्या है। बताओ, कहाँ स्थिर हुई है?”

“पढ़ देखो।”

“मैं दूसरे की चिट्ठी नहीं पढ़ती।”

“तो फिर दूसरे की खबर जानने की तुम्हें जरूरत भी नहीं है।”

“मैं नहीं जानना चाहती।” इतना कहकर ऑंखें मींचकर वह लेट गयी। किन्तु दोनों चिट्ठियाँ उसकी मुट्ठी में ही रह गयीं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोली। इसके बाद वह धीरे से उठी, जाकर लैम्प तेज किया और मेज पर दोनों पत्र रखकर स्थिरता से बैठी। उनमें जो कुछ लिखा था सो शायद उसने दो-तीन दफे पढ़ा। इसके बाद वह उठ आई और उसी तरह फिर लेट गयी। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली, “सो गये क्या?”

“नहीं।”

“इस स्थान पर मैं तुम्हें किसी तरह ब्याह न करने दूँगी; वह लड़की अच्छी नहीं है, उसे मैंने बचपन में देखा है।”

“माँ का पत्र पढ़ा?”

“हाँ, किन्तु काकी के पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि तुम्हें उसे गले में डालना ही पड़ेगा। और चाहे वह अच्छी हो, चाहे न हो, उस लड़की को मैं किसी तरह भी घर में नहीं लाऊँगी।”

“कैसी लड़की घर में लाना चाहती हो, बता सकती हो?”

“सो मैं इस समय कैसे बताऊँ? विचार करके देखना होगा।”

थोड़ी देर चुप रहने के बाद मैं हँसकर बोला, “तुम्हारी पसन्दगी और विवेचना के ऊपर निर्भर रहा जाय तो मुझे अपना कुमारपन उतारने के लिए आगे और एक जन्म ग्रहण करना पड़े- शायद, उसमें भी पूरा न पड़े। जाने दो, यथासमय, न हो तो दूसरा जन्म ग्रहण कर लूँगा। मुझे जल्दी नहीं है। परन्तु, इस लड़की का तुम उद्धार कर दो। पाँच सौ रुपये हों तो काम हो जायेगा, मैं उन्हीं के मुँह से सुन आया हूँ।”

प्यारी उत्साह में आकर उठ बैठी और बोली, “कल ही मैं रुपये भेज दूँगी। काकी की बात मिथ्या नहीं होने दूँगी।” फिर कुछ देर ठहरकर बोली, “सच कहती हूँ तुमसे, यह लड़की अच्छी नहीं है, इसीलिए मुझे आपत्ति है, नहीं तो...”

“नहीं तो...?”

“नहीं तो फिर क्या! तुम्हारे लायक लड़की जब ढूँढ़ दूँगी, उसी समय इस बात का उत्तर दूँगी, इस समय नहीं।”

सिर हिलाकर मैंने कहा, “तुम फिजूल कोशिश मत करो राजलक्ष्मी, मेरे लायक लड़की तुम किसी दिन भी खोजकर न निकाल सकोगी।”

वह बहुत देर तक चुप बैठी रहकर एकाएक बोल उठी, “अच्छा सो शायद न निकाल सकूँ, परन्तु तुम बर्मा जाओगे तो मुझे साथ ले चलोगे?”

उसके प्रस्ताव को सुनकर मैं हँसा। बोला, “मेरे साथ चलने का तुम्हें साहस होगा?”

प्यारी मेरे मुँह के प्रति तीक्ष्ण दृष्टि पात करके बोली, “साहस! इसे क्या तुम कोई बड़ा कठिन काम समझते हो?”

“मैं चाहे जो समझूँ, किन्तु तुम्हारे इस सारे घर-द्वार, माल-असबाब, जमीन-जायदाद आदि का क्या होगा?”

प्यारी बोली, “चाहे जो हो। तुम्हें नौकरी करने के लिए जब इतनी दूर जाना पड़ा- यह सब रहते हुए भी जब तुम्हारे किसी काम न आया, तब इसे बंकू को दे जाऊँगी।”

इस बात का जवाब मैं नहीं दे सका। खुली हुई खिड़की के बाहर अंधेरे में देखता हुआ चुपचाप बैठा रहा।

उसने फिर कहा, “इतनी दूर न जाओ तो न चले? यह सब क्या किसी भी दिन तुम्हारे किसी काम में नहीं आ सकता?”

मैं बोला, “नहीं, कभी, किसी दिन भी नहीं।”

प्यारी ने गर्दन हिलाकर कहा, “यह मैं जानती हूँ। परन्तु, ले चलोगे तुम मुझे अपने साथ?” इतना कहकर उसने मेरे पैरों पर फिर अपने हाथ रख दिये। एक दिन जब प्यारी ने मकान से जबर्दस्ती बिदा कर दिया था तब उस दिन का उसका असाधारण धीरज और मन की ताकत देखकर मैं अवाक् हो गया था। आज उसी की इतनी बड़ी दुर्बलता-करुण कण्ठ की ऐसी कातर मिन्नत। यह सब एक साथ याद करके मेरी छाती फटने लगी। परन्तु, किसी तरह भी राजी न हो सका। बोला, “मैं तुम्हें अपने साथ तो नहीं ले जा सकता, परन्तु, तुम जब बुलाओगी, तभी लौट आऊँगा। मैं कहीं भी रहूँ, हमेशा तुम्हारा ही रहूँगा राजलक्ष्मी।”

“क्या तुम चिरकाल तक इस पापिष्ठा के ही होकर रहोगे?”

“हाँ, चिरकाल तक।”

“तब तो फिर, यह कहो कि तुम्हारा कभी विवाह ही न होगा?”

“हाँ, नहीं होगा। इसका कारण यह है, कि तुम्हारी सम्मति के बिना, तुम्हें दु:ख देकर, इस काम में मेरी कभी प्रवृत्ति नहीं होगी।”

प्यारी अपलक दृष्टि से कुछ देर तक मेरे मुँह की ओर देखती रही। इसके बाद उसके दोनों नेत्र ऑंसुओं से परिपूर्ण होकर बड़ी-बड़ी बूँदों के रूप में टप-टप गिरने लगे। ऑंखें पोंछकर गाढ़े स्वर में वह बोली, “इस हतभागिनी के लिए तुम जिन्दगी-भर सन्यासी बने रहोगे?”

मैंने कहा, “हाँ, बना रहूँगा। तुम्हारे पास जो वस्तु मैंने पाई है, उसके बदले सन्यासी बनकर रहने में मेरा कोई नुकसान नहीं है। मैं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरी इस बात पर तुम कभी अविश्वास न करना।”

पल-भर के लिए दोनों की चार नजरें हुईं और दूसरे ही क्षण वह तकिये में मुँह छिपाकर उलटी लेट गयी। उच्छ्वसित क्रन्दन के आवेग से उसका सारा शरीर काँप-काँपकर और फूल-फूलकर उचकने लगा।

मैंने मुँह उठाकर देखा, सारा मकान गहरी नींद से ढका हुआ था। कहीं कोई जाग नहीं रहा था। केवल एक दफे खयाल आया, कि झरोखे के बाहर अंधियारी रात्रि अपने कितने ही उत्सवों की प्रिय सहचरी प्यारी के इस हृदय-विदारक अभिनय को मानो आज चुपचाप, ऑंखें खोलकर, अत्यन्त परितृप्ति के साथ देख रही है।
♦♦ • ♦♦

ऐसी-ऐसी अनेक बातें देखी हैं जिन्हें कि जीवन-भर भूला नहीं जा सकता। वे जब कभी याद आ जाती हैं तब उस समय के शब्द तक मानो कानों में गूँज उठते हैं। प्यारी के अन्तिम शब्द भी इसी तरह के थे। आज भी मैं मानो उनकी गूँज सुना करता हूँ। वह अपने स्वभाव से ही कितनी अधिक संयमी थी, इसका परिचय बचपन में ही उसने बहुत दफे दिया है। और फिर, उसके ऊपर अब कितने दिनों की सांसारिक अभिज्ञता है। उस दफे मेरे बिदा होने के समय किसी तरह भागकर उसने आत्म-रक्षा की थी। परन्तु इस दफे वह किसी तरह भी अपने आपको न सँम्हा्ल सकी, और नौकर-चाकरों के सामने ही रो पड़ी। रुँधे हुए कण्ठ से वह बोल उठीं, “देखों, मैं नासमझ नहीं हूँ। अपने पापों का भारी दण्ड मुझे भोगना ही पड़ेगा, सो मैं जानती हूँ; किन्तु, फिर भी कहती हूँ, हमारा यह समाज बड़ा निष्ठुर-बड़ा निर्दय है। इसे भी इसका दण्ड एक न एक दिन भोगना ही पड़ेगा। भगवान इस पाप की सजा देंगे ही देंगे!”

समाज को उसने क्यों इतना बड़ा अभिशाप दिया सो वह जाने और उसके अन्तर्यामी जानें। मैं नहीं जानता, सो बात नहीं है; किन्तु मैं चुप ही रहा। बूढ़ा दरबान गाड़ी का दरवाजा खोलकर मेरे मुँह की ओर देखने लगा। मैं आगे पैर बढ़ा ही रहा था कि प्यारी ऑंखों के ऑंसुओं में से मेरे मुँह की ओर देखकर कुछ हँसी; बोली, “कहाँ जा रहे जो? फिर तो शायद दर्शन होंगे नहीं, एक भिक्षा देते जाओगे?”

मैं बोला, “दूँगा, कहो।”

प्यारी बोली, “भगवान न करें- किन्तु, तुम्हारी जीवन-यात्रा जिस ढंग की है उससे-अच्छा, जहाँ भी रहो, ऐसे समय में खबर दोगे? शरमाओगे तो नहीं?”

“नहीं, शरमाऊँगा नहीं- खबर जरूर दूँगा” इतना कहकर धीरे-धीरे मैं गाड़ी में जा बैठा । प्यारी पीछे-पीछे आई और उसने अपने ऑंचल में मेरे पैरों की धूल ले ली।

“अजी सुनते हो?” मैंने मुँह उठाकर देखा कि वह अपने काँपते हुए होठों को प्राणपण से काबू में रखकर कहने की कोशिश कर रही है। दोनों की नजर एक होते ही फिर उसकी ऑंखों से झर-झर पानी झर पड़ा। वह अस्पष्ट रुँधे हुए कण्ठ से धीरे से बोली, “न जाओ इतनी दूर तो? रहने दो, मत जाओ...”

चुपके से मैंने अपनी नजर उस ओर से फेर ली। गाड़ीवान ने गाड़ी हाँक दी। चाबुक और चार-चकोंके सम्मिलित सपासप और घर-घर शब्द से शाम का समय मुखरित हो उठा। किन्तु, इस सबको दबाकर केवल एक रुँधे हुए कण्ठ का दबा हुआ रुदन ही मेरे कानों में गूँजने लगा।

3

पाँच-छ: दिन बाद मैं एक दिन भोर के समय, सिर्फ एक लोहे का ट्रंक और एक पतला-सा बिस्तर लेकर कलकत्ते के कोयला-घाट पर जा पहुँचा। गाड़ी से उतरते न उतरते खाकी कुरती पहिने हुए एक कुली ने दोनों चीजों को झपट लिया, उन्हें लेकर पलक-भर में न जाने वह कहाँ अन्तधर्न हो गया और जब तक खोजते-खोजते दुश्चिन्ता के मारे मेरी ऑंखों में ऑंसू न आ गये तब तक उसका कोई पता ही नहीं चला।

गाड़ी पर से आते-आते ही मैंने देखा था कि जेटी¹ और बड़े रास्ते के बीच की भूमि नाना रंग के पदार्थों से लदी हुई है- लाल, काले, भूरे, गेरुए। थोड़ा-सा कुहरा भी छाया हुआ था। ऐसा मालूम हुआ कि बछड़ों का एक झुण्ड शायद चालान किये जाने के लिए बँधा हुआ है। निकट आकर ध्याहन से देखा तो मालूम हुआ कि चालान तो अवश्य होगा; किन्तु, बछडों का नहीं-मनुष्यों का। वे लोग बड़ी-बड़ी-सी गठरियाँ लिये, स्त्री-पुत्रों के हाथ पकड़, सारी रात इसलिए इसी तरह ओस में पड़े रहे हैं कि सुबह तड़के ही सबसे पहले जहाज में घुसकर एक अच्छी-सी जगह पर कब्जा कर लेंगे। अतएव, किसके लिए सम्भव था कि पीछे से आकर इन्हें पार करके जेटी के द्वार तक पहुँच सके? थोड़ी ही देर बाद यह दल जब जागकर खड़ा हो गया तब मैंने देखा कि काबुल के उत्तर से कन्याकुमारी के अन्त तक का कोई भी प्रदेश अपना प्रतिनिधि इस कोयला-घाट पर भेजना नहीं भूला है।

सभी हैं। काली-काली गंजियाँ पहिने हुए चीनियों का दल भी बाद नहीं गया है। मैं भी तो डेक का (जिससे नीचे और कोई दर्जा नहीं उसका) यात्री था : इसलिए, लोगों को परास्त करके अपने बैठने के लिए एक जगह मुझे भी प्राप्त करनी थी। किन्तु इसका खयाल करते ही मेरा सारा शरीर बरफ-सा ठण्डा हो गया। फिर भी, जब जाना ही है और जहाज को छोड़कर और कोई जाने का रास्ता नहीं है, तब जैसे भी हो इन्हीं लोगों का अनुकरण करना कर्त्तव्य है- ऐसा विचार कर मैं अपने मन को जितना ही साहस देने लगा मानो उतना ही वह हिम्मत हारने लगा। जहाज कब आकर किनारे से लगेगा सो जहाज ही जाने। इस बीच में ही ये चौदह-पन्द्रह सौ लोग भेड़ों के झुण्ड की तरह कतारें बाँधकर एकाएक ऑंख उठाकर देखा, खड़े हो गये हैं। एक हिन्दुस्तानी आदमी से मैंने पूछा, “भैया, सब लोग अच्छी तरह से तो बैठे थे- अब एकाएक कतार बाँधकर क्यों खड़े हो गये?'*

¹ जहाँ जहाज ठहरते हैं वह स्थान।

वह बोला, “डगदरी होगी।”

“डगदरी क्या चीज होती है, भाई?”

उस आदमी ने पीछे से आए हुए एक धक्के को सँभालते हुए कुछ झुँझलाहट से कहा, “अरे पिलेग का डगदरी।”

बात को समझना और भी कठिन हो गया। पर, समझूँ चाहे न समझूँ- इतने आदमियों के लिए जो जरूरी है वह मेरे लिए भी होगी। किन्तु किस कौशल से अपने आपको इस झुण्ड में घुसेड़ दूँ, यह एक समस्या ही सामने आकर खड़ी हो गयी। कहीं से घुसने के लिए थोड़ी-सी साँसर है या नहीं, यह खोजते-खोजते देखा कि कुछ दूर पर खिदिरपुर के कितने ही मुसलमान संकुचित भाव से खड़े हुए हैं। यह मैंने स्वदेश-विदेश सभी जगह देखा है कि जो काम लज्जित होने जैसा है, उसमें बंगाली लोग अवश्य लज्जित होते हैं। वे भारत की अन्यान्य जातियों के समान बिना संकोच के धक्का-मुक्की मारा-मारी नहीं कर सकते। इस तरह खड़े होने में जो एक तरह की हीनता है, उसकी शरम के मारे मानो ये सब अपना सिर नीचा कर लेते हैं। ये लोग रंगून में दर्जी का काम करते हैं और अनेक दफे आए-गये हैं। पूछने पर उन्होंने बताया कि यह सब सावधानी, कहीं यहाँ से बर्मा में प्लेग न चली जाय, इसलिए है। डॉक्टर परीक्षा करके पास कर दे तभी जहाज पर चढ़ा जा सकता है। अर्थात् रंगून जाने के लिए जो लोग तैयार हुए हैं, इसके पहले ही जाँच हो जाना चाहिए कि वे प्लेग के रोगी हैं या नहीं। अंग्रेजी राज्य में डॉक्टरों का प्रबल प्रताप है। सुना है, कसाईखाने के यात्रियों को भी अन्दर जाकर जिबह होने का अधिकार प्राप्त करने के लिए इन लोगों का मुँह ताकना पड़ता है। किन्तु, परिस्थिति की दृष्टि से रंगून के यात्रियों के साथ उसकी जो इतनी अधिक समानता है सो उस समय किसने सोची थी।

क्रमश: पिलेग की डगदरी निकट आ पहुँची। पियादे-सहित डॉक्टर साहब दिखाई दिये। उस कतारबन्दी की अवस्था में गर्दन टेढ़ी करके देखने का मौका तो नहीं था; फिर भी, आगे-खड़े हुए साथियों के प्रति किया गया परीक्षा-पद्धति का जितना भी प्रयोग दृष्टिगोचर हुआ, उससे मेरी चिन्ता की सीमा नहीं रही। कायर बंगालियों को छोड़कर ऐसा वहाँ कोई नहीं था जो देह के निम्न भाग के उघाड़े जाने पर भयभीत हो, परन्तु, अपने सामने के साहसी वीर पुरुषों के भी परीक्षा के समय बार-बार चौंक उठते देखकर मैं बुरी तरह शंकित हो उठा। सभी जानते हैं कि प्लेग की बीमारी में शरीर का स्थान-विशेष सूज आया करता है डॉक्टर साहब जिस प्रकार लीला-मात्र से और निर्विकार चित्त से उस सन्देह मूलक स्थान में हाथ डालकर सोजिश टटोलने लगे, उससे काठ के पुतलों को भी आपत्ति होती। किन्तु, भारतवासियों की सभ्यता सनातन है, इसलिए, जैसे भी हो एक दफे चौंककर ये स्थिर हो जाते थे। अगर और कोई जाति होती तो डॉक्टर का हाथ मरोड़े-तोड़े बिना न रहती। सो, चाहे जो हो, 'पास' होना जब अवश्य कर्त्तव्य था, तो फिर, और उपाय ही क्या हो सकता था? यथासमय ऑंखें मींचकर, सारा अंग संकुचित कर- एक तरह से हताश ही होकर, डॉक्टर के हाथ आत्म-समर्पण कर दिया और 'पास' भी हो गया।

इसके बाद जहाज पर चढ़ने की पारी थी। किन्तु, डेक-पैसिंजरों की यह अधिरोहण-क्रिया किस तरह निष्पन्न होती है- बाहर के लोगों के लिए उसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं है। फिर भी, कल-कारखानों में जिन्होंने दाँतवाले चक्रों की प्रक्रिया देखी है, उनके लिए इसका समझाना कुछ-कुछ सम्भव हो सकता है। वे जिस तरह आगे के खिंचाव और पीछे के धक्के से अग्रसर होकर चलते हैं, उसी तरह हमारी यह काबुली- पंजाबी- मारवाड़ी- मद्रासी- मराठा- बंगाली-चीनी- उड़िया गठित सुविपुल सेना केवल पारस्पारिक आकर्षण-विकर्षण के वेग से नीचे जमीन से जहाज के डेक पर बिना जाने ही चढ़ गयी और वह गति वहाँ पर भी नहीं रुकी। सामने की ओर देखा, एक गङ्ढे के मुँह पर सीढ़ी लगी हुई है। जहाज के गर्म-देश में उतरने का यही रास्ता था। नाले के अवरुद्ध मुख को खोल देने पर वृष्टि का संचित जल जिस तरह तीव्र वेग से नीचे गिरता है, ठीक उसी तरह यह दल भी स्थान अधिकृत करने के लिए जीने-मरने के ज्ञान से शून्य होकर नीचे उतरने लगा।

मुझे जहाँ तक याद आता है, मेरी नीचे जाने की इच्छा नहीं थी। पैरों से चलकर भी नहीं उतरा। क्षण भर के लिए मैं बेहोश हो गया था, इसलिए, मेरे इस कथन में यदि कोई सन्देह प्रकट करे, तो शायद कसम खाकर मैं इसे अस्वीकार भी न कर सकूँगा। होश में आने पर देखा कि गर्भ-गृह के मध्यक बहुत दूर पर एक कोने में मैं अकेला खड़ा हूँ। पैरों की ओर निगाह दौड़ाई, तो देखता हूँ कि इसी बीच में, जादू के खेल की तरह पल-भर में ही कम्बल बिछाकर और बॉक्स-पिटारों आदि से घेरकर हर किसी ने अपने-अपने लिए निरापद-स्थान बना लिया है और शान्ति से बैठकर अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त करना शुरू कर दिया है। इतनी देर के बाद, अब कहीं मेरे उस नम्बर वाले कुली ने आकर दर्शन दिया और कहा, “ट्रंक और बिस्तर ऊपर रख आया हूँ, यदि आप कहें तो नीचे ले आऊँ।”

मैंने कहा, “नहीं, बल्कि, किसी तरह यहाँ से उद्धार करके मुझे ही ऊपर ले चल।” क्योंकि वहाँ इतना-सा स्थान भी मुझे कहीं खाली दिखाई नहीं दिया कि दूसरों के बिस्तर खूँदे बगैर तथा उनके साथ हाथापाई की सम्भावना उत्पन्न किये बगैर, मैं कहीं अपना कदम रख सकूँ। वर्षा होने पर ऊपर पानी में भीग जाऊँ यह अच्छा, किन्तु यहाँ एक क्षण-भर भी ठहरना ठीक नहीं। अधिक पैसों के लोभ से कुली, काफी कोशिश और बहस-मुबाहिसे के बाद, कम्बलों और सतरंजियों के किनारों को उलटता-पुलटता हुआ मुझे अपने साथ लिये हुए ऊपर आया और मेरा माल-असबाब दिखाकर बख्शीीश लेकर चलता बना। यहाँ का भी वही हाल- बिस्तर बिछाने के लिए, निरुपाय हो अपने ट्रंक के ऊपर ही बैठने का इन्तजाम करके मैं एकाग्र चित्त से माता भागीरथी के दोनों किनारों की महिमा का निरीक्षण करने लगा।

स्टीमर ने तब तक चलना आरम्भ कर दिया था। बहुत देर से प्यास लग रही थी। इन दो घण्टों के भीतर जो तूफान सिर पर से गुजर गया उससे जिनकी छाती शुष्क न हो जाए, ऐसे कठिन-हृदय संसार में बहुत थोड़े ही लोग हैं। किन्तु आफत यह हुई कि साथ में न तो गिलास था और न लोटा। साथ के मुसाफिरों में यदि कहीं कोई बंगाली हो तो कुछ उपाय हो कुछ उपाय हो सकता है, यह सोचकर मैं फिर बाहर निकला। नीचे उतरने के उस गङ्ढे के निकट पहुँचते ही एक तरह का विकट कोलाहल सुन पड़ा। मेरी जानकारी इतनी विस्तृत नहीं है कि उस कोलाहल की उपयुक्त तुलना कर सकूँ। गोशाला में आग देने से एक प्रकार का कोलाहल होने की बात कही जाती है जरूर, किन्तु, इसके अनुरूप कोलाहल होने के लिए जितनी बड़ी गोशाला की आवश्यकता है उतनी बड़ी गोशाला महाभारत के युग में विराट राजा के यहाँ यदि रही तो जुदा बात है, किन्तु इस कलिकाल में किसी के यहाँ हो सकती है, इसकी तो कल्पना करना भी कठिन है।

भयपूर्ण हृदय से दो-एक सीढ़ियाँ उतरकर मैंने झाँका तो देखा कि यात्रियों ने अपना अपना 'नेशनल' (=जातीय) संगीत शुरू कर दिया है। काबुल से लेकर ब्रह्मपुत्र और कन्याकुमारी से लेकर चीन की सीमापर्यन्त जितने भी तरह के स्वर ब्रह्म हैं, जहाज के इस बन्द गर्भ के भीतर वाद्ययन्त्रों के सहयोग से, उनका ही समवेत रूप से अनुशीलन हो रहा है। ऐसे महासंगीत को सुनने का सौभाग्य कदाचित् ही संघटित होता है; और संगीत ही ललित कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है, यह बात उस जगह खड़े-खड़े ही मैंने सम्मान के साथ स्वीकार कर ली। किन्तु सबसे अधिक विस्मय की बात यह थी कि वहाँ इतने अधिक संगीत-विशारद एक साथ आ जुटे किस तरह?

मैं एकाएक यह स्थिर नहीं कर सका कि मेरा नीचे उतरना उचित है या नहीं। सुना है, अंगरेजी महाकवि शेक्सपियर ने कहा है कि संगीत के द्वारा जो मनुष्य मुग्ध नहीं होता वह खून तक कर सकता है। किन्तु केवल मिनट भर सुन लेने से ही जो मनुष्य के खून को जमा दे ऐसे संगीत की खबर शायद उन्हें भी नहीं थी। जहाज का गर्भ-गृह वीणापाणि का पीठ-स्थान है या नहीं, सो नहीं, सो नहीं जानता परन्तु, यदि न होता तो यह कौन सोच सकता कि काबुली लोग भी गाना गाते हैं!

एक तरफ यह अद्भुत काण्ड हो रहा था और मैं मुँह बाए देख रहा था कि एकाएक देखा- पास में ही खड़ा हुआ एक व्यक्ति प्राणपण से हाथ हिला-हिलाकर मेरी नजर अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। बहुत कष्ट से अनेक लोगों की लाल-लाल ऑंखें सिर पर रखकर मैं उस मनुष्य के पास जा उपस्थित हुआ। उसने ब्राह्मण समझकर मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अपना परिचय दिया कि मैं रंगून का विख्यात नन्द मिस्री हूँ। पास ही एक विगत-यौवना स्थूल स्त्री बैठी हुई एकटक मेरी ओर देख रही थी। मैं उसके मुँह की ओर देखकर स्तम्भित हो गया। मनुष्य की इतनी बड़ी-बड़ी फुटबाल-सी ऑंखें और इतनी मोटी जुड़ी हुई भौहें पहले कभी न देखी थीं।

नन्द मिस्री उसका परिचय देते हुए बोला, “बाबूजी, यह मेरी घरवा...”

बात पूरी भी न हो पाई थी कि वह फुँकार कर गर्ज उठी, “घरवाली! ये मेरे सात भाँवरों के स्वामी कहते हैं घरवाली! खबरदार, कहे देती हूँ मिस्री, जिस-तिस के आगे झूठ बोलकर मुझे बदनाम मत किया करो! हाँ...!”

मैं तो विस्मय के मारे हतबुद्धि-सा हो गया।

नन्द मिस्री कुछ अप्रतिभ-सा होकर बोला, “आहा, नाराज क्यों होती हो टगर? घरवाली और कहते किसे हैं? बीस साल...”

टगर विकट क्रोध से बोल उठी, “बीस साल हो गये क्या हुआ। फूटे करम! जात-वैष्णव की लड़की होकर मैं कहलाऊँ केवट की घरवाली! कैसे, किस तरह? बीस बरस से तुम्हारे घर हूँ जरूर, किन्तु एक दिन भी तुम्हें चौके में घुसने दिया है, यह बात कोई भी नहीं कह सकता। टगर वैष्णवी मर जायेगी, पर अपनी जाति नहीं खोएगी, जानते हो?” इतना कहकर वह जात-वैष्णव की लड़की अपनी जाति के गर्व से मेरे मुँह की ओर देखती हुई अपनी दोनों फुटबाल की सी ऑंखें घुमाने लगी।

नन्द मिस्री लज्जित होकर बारम्बार कहने लगा, “देखा बाबूजी, देखा? अभी तक इसे जाति का गर्व है! देखा आपने! मैं हूँ, इसी से सह लेता हूँ, और कोई होता...” बीस बरस की उस घरवाली की ओर देखकर बेचारा अपनी बात पूरी भी न कर सका।

मैं और कुछ न बोला और उससे एक गिलास लेकर वहाँ से चल दिया। ऊपर पहुँचकर उस वैष्णवी की बातें याद करके मेरी हँसी रोकी न रुकी। किन्तु क्षण-भर बाद ही सोचा, यह तो एक सामान्य अशिक्षिता स्त्री ठहरी; पर, गाँवों में और शहरों में भी क्या ऐसे अनेक शिक्षित पुरुष नहीं हैं, जिनके द्वारा ऐसे ही हास्यकार्य अब भी प्रतिदिन हुआ करते हैं, और जो पाप के सारे अन्यायों से केवल खाना-छूना बचाकर ही परित्राण पा लेते हैं। तब, यह हो सकता है कि इस देश के पुरुषों का हाल देखकर तो हँसी नहीं आती, आती है सिर्फ औरतों को देखकर।

आज शाम से ही आकाश में थोड़े बादल जमा हो रहे थे। रात को एक बजे के बाद मामूली-सा पानी और हवा भी चली जिससे कुछ देर के लिए जहाज खूब हिला-डुला। दूसरे दिन सुबह से ही वह शिष्ट शान्त भाव से चलने लगा। जिसे समुद्री बीमारी कहते हैं, मेरा वह उपसर्ग तो शायद छुटपन में ही नाव के ऊपर कट गया था, इसलिए वमन करने के संकट को मैं एकबारगी ही पार कर गया; किन्तु, सपरिवार नन्द मिस्री का क्या हाल हुआ- किस तरह रात कटी, यह जानने के लिए मैं नीचे जा पहुँचा। कल के गायकों में अधिकांश उस समय तक भी औंधे पड़े हुए थे। मैंने समझ लिया कि रात्रि के उत्पात के कारण ही ये लोग अभी तक महासंगीत के लिए तैयार नहीं हो सके हैं। नन्द मिस्री और उसकी बीस बरस की घरवाली दोनों गम्भीर भाव से बैठे हुए थे। मुझे देख उन्होंने प्रणाम किया। उनके चेहरे के भाव से जान पड़ा कि कुछ देर पहले ही दोनों में कुछ कलह-सी जरूर हो चुकी है। मैंने पूछा, “रात को कैसा हाल रहा मिस्रीजी?”

नन्द बोला, “अच्छा रहा।”

उसकी घरवाली गरज उठी, “खाक रहा अच्छा! मैयारी मैया, कैसा अद्भुत काण्ड हो गया।”

कुछ उद्विग्न होकर मैंने पूछा, “कैसा काण्ड?”

नन्द मिस्री ने मेरे मुँह की ओर देखा, फिर जम्हाई ली। चुटकियाँ बजाईं और अन्त में कहा, “काण्ड ऐसा कुछ नहीं था बाबूजी। कलकत्ते की गलियों के मोड़ों पर साढ़े बत्तीस तरह का चबेना बेचते हुए आपने किसी को देखा है? यदि देखा हो तो हम लोगों की अवस्था को आप ठीक तौर से समझ सकेंगे। वह जिस तरह अंगूठे के नीचे दो-तीन अंगुलियों की चोट मारकर भुने हुए चावल, दाल, मटर, मसूर, चने, सेम के बीज आदि सबको एकाकार कर देता है, देवता की कृपा से हम सब भी ठीक उसी तरह गड्डमड्ड हो गये थे, अभी ही कुछ देर हुई सब कोई अपने-अपने कपड़े पहिचानकर फिर अपनी जगह आकर बैठे हैं।” इसके बाद वह टगर की ओर देखकर बोला, “बाबूजी, भाग्य से असल वैष्णव की जात नहीं जाती, नहीं तो मेरी टगर...”

टगर भड़के हुए भालू की तरह गरज उठी, “अब फिर वही!”

“नहीं, तो जाने दो”, कहकर नन्द उदासीनता से दूसरी तरफ को देखता हुआ चुप हो गया।

एक काबुली दम्पति, जो कि मलिनता के अवतार थे, सिर से पैर तक पृथ्वी की सारी गन्दगी लादे हुए अत्यन्त तृप्ति के साथ रोटी खा रहे थे। क्रुद्ध टगर उन हतभागों के प्रति अपने बड़े-बड़े चक्षुओं से एकंटक होकर अग्नि वर्षण करने लगी। नन्द ने अपनी घरवाली को उद्देश्य करके प्रश्न किया, “तो फिर आज खाना-पीना कुछ न होगा, क्यों?”

घरवाली ने कहा, “मौत और किसे कहते हैं? होगा कैसे, सुनूँ तो?”

मामला न समझ सकने के कारण मैंने कहा, “अभी तो बड़ी सकार है, कुछ बेला चढ़ जाने पर...”

नन्द मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, “कलकत्ते से एक हाँड़ी में बढ़िया रसगुल्ले लाया था बाबूजी, जहाज पर सवार होने तक कहता रहा, “आओ टगर, कुछ खा लेवें, आत्मा को कष्ट न दें”, परन्तु नहीं- “मैं रंगून ले जाऊँगी।” (टगर के प्रति) ले, अब ले जा रंगून, क्या ले जाती है?”

टगर ने, इस क्रुद्ध अभियोग का स्पष्ट प्रतिवाद न कर, क्षुब्ध अभिमान से एक दफे मेरी ओर देखा और फिर, वह उस हतभागे काबुली को अपनी नजर से पहले के समान ही दग्ध करने लगी।

मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ रसगुल्लों का?”

नन्द टगर को लक्ष्य करके कटाक्ष करता हुआ बोला, “उनका क्या हुआ सो नहीं कह सकता। वह देखो न फूटी हाँड़ी, और वह देखो बिछौने में गिरा हुआ रस। इससे ज्यादा कुछ जानना चाहो तो पूछो उस हरामजादे से।” इतना कहकर टगर की दृष्टि का अनुसरण कर वह भी कठोर दृष्टि से उनकी ओर ताकने लगा।

मैंने बड़ी मुश्किल से हँसी रोकते हुए मुँह नीचा करके कहा, “तो जाने दो, साथ में चिउड़ा तो है!”

नन्द बोला, “उस ओर से भी छुट्टी मिल गयी है। बाबूजी को एक दफे दिखा तो दो, टगर।”

टगर ने एक छोटी-सी पोटली को पैरों से ठुकराते हुए कहा, “दिखा दो न तुम्हीं-”

नन्द बोला, “जो भी कहो बाबू, काबुली जात नमकहराम नहीं कही जा सकती। ये लोग जिस तरह रसगुल्ले खा जाते हैं, उसी तरह अपने काबुलदेश की मोटी रोटियाँ भी तो बाँध देते हैं,- फेंकना नहीं टगर, रख छोड़, तेरे ठाकुरजी के भोग के काम में आ जायेंगीं।”

नन्द के इस परिहास से मैं जोर से हँस पड़ा, किन्तु दूसरे ही क्षण टगर के मुँह की ओर देखकर डर गया। क्रोध के मारे उसका सारा मुँह काला हो गया था। ऊँचे कण्ठ से वज्र-कर्कश शब्दों में जहाज के सब लोगों को चौंकाकर वह चिल्ला उठी, “जात तक मत जाना भला मिस्री-कहे देती हूँ, अच्छा न होगा, हाँ...”

उसकी चिल्लाहट से जिन लोगों ने मुँह उठाकर उस ओर देखा, उनकी विस्मित दृष्टि के सामने, शरम के मारे, नन्द का मुँह जरा-सा रह गया। टगर को वह बखूबी जानता था। अपनी निरर्गल दिल्लगी के कारण पैदा हुए उसके क्रोध को किसी तरह शान्त करने में ही कुशल थी। शरमिन्दा होकर वह चट से बोल उठा, “सिर की कसम टगर, गुस्सा मत हो, मैं तो केवल मजाक कर रहा था।”

टगर ने वह बात जैसे सुनी ही नहीं। पुतलियाँ और भौहें एक बार बाईं ओर और एक बार दाहिनी ओर घुमाकर और कण्ठ के स्वर को और एक पर्दा ऊपर चढ़ाकर वह बोली, “मजाक कैसा! जात को लेकर भी क्या कोई मजाक किया जाता है। मुसलमानों की रोटियों से भोग लगाया जायेगा? केवट के मुँह में आग-जरूरत हो तो तू ही न रख छोड़-बाप को इनका पिण्डदान दे देना!”

डोरी छोड़े हुए धानुष्य की तरह नन्द चट से सीधा होकर खड़ा हो गया और उसने टगर का झोंटा पकड़ लिया, “हरामजादी, तू बाप तक जाती है।”

टगर कमर का कपड़ा सँम्हालती हुई हाँफते-हाँफते बोली, और “हरामजादे, तू जात तक जायेगा!” इतना कहकर कानों तक मुँह फाड़कर उसने नन्द की भुजा के एक हिस्से में काट खाया। मुहूर्त-भर में ही नन्द मिस्री और टगर वैष्णवी का मल्ल-युद्ध गहरा हो उठा। देखते ही देखते सब लोग घेरकर खड़े हो गये। भीड़ हो गयी। समुद्री बीमारी की तकलीफ को भूलकर सारे 'हिन्दुस्तानी'¹ ऊँचे कण्ठ से वाहवाही देने लगे, पंजाबी छि:-छि: करने लगे, उड़िया चीं-चीं करने लगे। एक तरह से पूरा लंका काण्ड मच गया मैं सन्नाटे में आ गया। और मेरा मुँह विवर्ण हो गया। इतनी मामूली-सी बात पर निर्लज्जता का ऐसा नंगा नाच हो सकता है, इसकी मैं कल्पना भी न कर सका था। और वह भी एक बंगाली स्त्री-पुरुष के द्वारा जहाज-भर के लोगों के सामने हो रहा है, यह देखकर तो मैं लज्जा के मारे जमीन में गड़ा जाने लगा। पास में ही एक जौनपुरी दरबान अत्यन्त सन्तोष के साथ तमाशा देख रहा था। मेरी ओर लक्ष्य करके बोला, “बाबूजी, बंगालिन तो बहुत अच्छी लड़ने वाली है, हटती ही नहीं।”

मैं उसकी ओर ऑंखें उठाकर देख भी न सका, चुपचाप गर्दन नीची किये किसी तरह भीड़ को चीरता हुआ ऊपर भाग गया।

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴By वनिता कासनियां पंजाब अध्याय 1अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?”अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।”मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।”अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।”अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...