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❣️ श्रीकांत"❣️ अध्याय 2पैर उठते ही न थे, फिर भी किसी तरह गंगा के किनारे-किनारे चलकर सवेरे लाल ऑंखें और अत्यन्त सूखा म्लान मुँह लेकर घर पहुँचा। मानो एक समारोह-सा हो उठा। “यह आया! यह आया!” कहकर सबके सब एक साथ एक स्वर में इस तरह अभ्यर्थना कर उठे कि मेरा हृत्पिण्ड थम जाने की तैयारी करने लगा।जतीन करीब-करीब मेरी ही उम्र का था। इसलिए आनन्द भी उसका सबसे प्रचण्ड था। वह कहीं से दौड़ता हुआ आया और “आ गया श्रीकान्त- यह आ गया, मँझले भइया!” इस प्रकार के उन्मत्त चीत्कार से घर को फाड़ता हुआ मेरे आने की बात घोषित करने लगा और मुहूर्त भर का भी विलम्ब किये बगैर, उसने परम आदर से मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुए मुझे बैठकखाने के पायंदाज पर ला खड़ा किया।वहाँ पर मँझले भइया गहरा मन लगाए परीक्षा पास करने का पाठ पढ़ रहे थे। मुँह उठाकर थोड़ी-सी देर मेरे मुँह की ओर देखकर उन्होंने फिर पढ़ने में अपना मन लगा दिया अर्थात् बाघ, शिकार को अपने अधिकार में कर लेने के उपरान्त, निरापद स्थान में बैठकर, जिस तरह दूसरी तरफ अवहेलना भरी दृष्टि से देखता है, ठीक उसी तरह उनका भाव था। दण्ड देने का इतना बड़ा महेन्द्र योग उनके भाग्य में पहले और कभी जुटा था या नहीं, इसमें सन्देह है।मिनट-भर वे चुप रहे। सारी रात बाहर बिताने के कारण दोनों कानों और गालों पर जो कुछ बीतेगी सो मैं जानता था। किन्तु, अब और अधिक देर खड़ा भी न रह सकता था और उधर 'कर्म-कर्ता' को भी तो फुरसत नहीं थी। वे भी तो परीक्षा पास करने की तैयारी में लगे थे!हमारे इन मँझले भइया को आप शायद इतने जल्दी भूले न होंगे। ये वही हैं जिनकी कठोर देख-रेख में कल शाम को हम सब पाठाभ्यास कर रहे थे और क्षण-भर बाद ही, जिनके सुगम्भीर 'ओं-ओं' शब्द और चिरागदान उलटा देने की चोट से गत रात्रि उस 'दि रॉयल बेंगाल' को भी दिग्भ्रमित होकर एक दफा अनार के वृक्ष पर आश्रय लेना पड़ा था।'पंचाँग तो देख रे सतीश, आज इस बेला बैंगन खाना अच्छा है या नहीं।” कहती हुई पास के द्वार को खोलकर बुआजी ने जैसे ही घर में पैर रक्खा वैसे ही मुझे देखकर वे अवाक् हो गयी। “कब आया रे? कहाँ चला गया था? धन्य है लड़के तुझे- सारी रात नींद नहीं आई- सोच सोचकर मर गयी- उस इन्द्र के साथ चुपके-से जो बाहर गया, सो फिर दिखाई ही नहीं दिया। न खाना, न पीना; कहाँ था बोल तो रे अभागे। मुख स्याह हो गया है, ऑंखें लाल छलछला रही हैं-कहती हूँ, ज्वर तो नहीं चढ़ आया है? जरा पास में तो आ, देखूँ तो ऑंग।” एक साथ इतने बहुत से प्रश्न करने के उपरान्त बुआ स्वयं ही आगे बढ़कर, मेरे कपाल पर हाथ देकर ही बोल उठीं, “जो सोचा था आखिर वही हुआ न! ऑंग खूब गरम है। ऐसे लड़कों के तो हाथ-पैर बाँधकर जल-बिछुआ लगा दिया जाय, तभी जी शान्त हो! तुझे घर से बिल्कुील बिदा करके ही अब और कुछ करूँगी। चल, भीतर चलकर सो जा, पाजी!” वे बैंगन-खाने के प्रश्न को बिल्कुथल ही भूल गयीं। उन्होंने हाथ पकड़कर मुझे अपनी गोद में खींच लिया।मँझले भइया ने बादलों के समान गम्भीर कण्ठो से संक्षेप में कहा, “अभी वह न जा सकेगा।”“क्यों, यहाँ क्या करेगा? नहीं, नहीं, इस समय, अब इसका पढ़ना-लिखना न होगा। पहले दो कौर खाकर थोड़ा सो ले। आ मेरे साथ।” कहकर बुआजी मुझको लेकर चलने लगीं।किन्तु शिकार जो हाथ से निकला जाता था! मँझले भइया स्थान-काल भूल गये, जोर से चिल्ला उठे और धमकाकर बोले, “खबरदार कहता हूँ, यहाँ से मत जा, श्रीकान्त! बुआ तब कुछ चौंक उठीं। इसके बाद मुँह फेर मँझले भइया की ओर देखकर केवल इतना ही बोलीं, “सतीऽऽ!”बुआजी गम्भीर प्रकृति की औरत थीं। सारा घर उनसे डरता था। मँझले भइया तो बस उस एक तीखी नजर से ही भय के मारे सिटपिटा गये। और फिर, पास ही के कमरे में बड़े भाई भी बैठे थे। बात कहीं उनके कान तक गयी तो फिर खैर नहीं थी।बुआजी का एक स्वभाव हम लोग हमेशा से देखते आ रहे थे। कभी किसी भी कारण वे शोरगुल करके लोगों को इकट्ठा करना पसन्द नहीं करती थीं। हजार गुस्सा होने पर भी वे कभी जोर से नहीं बोलती थीं। वे बोलीं, “जान पड़ता है, तेरे ही डर से यह यहाँ खड़ा है। देख सतीश, जब तब सुना करती हूँ कि तू बच्चों को मारता-पीटता है। आज से यदि कभी किसी को हाथ भी लगाया, और मुझे मालूम हो गया; तो इसी खम्भे से बँधवाकर नौकर के हाथ तुझे बेंत लगवाऊँगी। बेहया खुद तो हर साल फेल हुआ करता है- और फिर दूसरों पर रुआब गाँठता है! कोई पढ़े चाहे न पढ़े, आगे से तू किसी से भी कुछ पूछ न सकेगा!”इतना कहकर, जिस रास्ते आई थीं कि उसी रास्ते मुझे लेकर वे चली गयी। मँझले भइया अपना-सा मुँह लिये बैठे रहे। यह बात मँझले भइया भली-भाँति जानते थे कि इस आदेश की अवहेलना करना किसी के वश की बात नहीं है।मुझे अपने साथ ले बुआ अपने कमरे में आयीं, मेरे कपड़े बदलवाए, पेट भरकर गरम-गरम जलेबियाँ खिलाईं, बिस्तर पर सुला दिया और यह बात अच्छी तरह जताकर, बाहर से साँकल लगाकर, चली गयी कि मैं मर जाऊँ तो उनके हाड़ जुड़ा जाएँ!पाँचेक मिनट के बाद खट-से साँकल खोलकर छोटा भाई हाँफता-हाँफता आया और मेरे बिछौने पर आकर पट पड़ गया। आनन्द के अतिरेक से पहले तो वह बात भी न कर सका, फिर थोड़ा 'दम' लेकर फुसफुसाकर बोला, “मँझले भइया को माँ ने क्या हुक्म दिया है, जानते हो? हम लोगों के किसी भी काम में पड़ने की उन्हें अब जरूरत नहीं है। अब तुम और मैं दोनों एक कमरे में पढ़ेंगे- मँझले भइया की हम जरा भी 'केयर' (परवाह) न करेंगे।” इतना कहकर उसने अपने दोनों हाथों के अंगूठे एकत्र करके जोर से नचा दिए।तीन भी पीछे-पीछे आकर हाजिर हो गया। यह अपनी कारगुजारी की उत्तेजना में एकबारगी अधीर हो रहा था और छोटे भाई को यह सुसमाचार देकर यहाँ खींच लाया था। पहले तो वह कुछ देर तक खूब हँसता रहा। फिर हँसना बन्द करके अपनी छाती बारम्बार ठोंककर बोला, “मैं! मैं!! मेरे ही सबब से यह सब हुआ है, सो क्या तुम नहीं जानते? मैं यदि इसे (मुझे) मँझले भइया के सामने न ले गया होता तो क्या माँ ऐसा हुक्म देतीं? पर छोटे भइया, तुम्हें अपना कलदार लट्टू मुझे देना होगा सो कहे देता हूँ।”, “अच्छा दिया। ले आ, जा, मेरे डेस्क में से।” छोटे भाई ने उसी क्षण हुक्म दे डाला। किन्तु उसी लट्टू को घण्टे भर पहले शायद वह पृथ्वी की सारी सम्पत्ति के बदले भी न दे सकता।सा ही मूल्य होता है, मनुष्य की स्वाधीनता का। व्यक्तिगत न्याय अधिकारों को प्राप्त करने का ऐसा ही आनन्द होता है। आज मुझे बार-बार खयाल आता है कि बच्चों के निकट भी उसकी अमूल्यता बिन्दुभर भी कम नहीं है। मँझले भइया, बड़े होने के कारण, स्वेच्छाचार से, अपने से छोटों के जिन समस्त अधिकारों को ग्रास कर बैठे थे, उन्हें फिर से प्राप्त करने के सौभाग्य लाभ से छोटे भाई ने अपनी प्राणों से भी प्रिय वस्तु बिना संकोच के दे डाली। दरअसल मँझले भइया के अत्याचारों की सीमा न थी। रविवार को कड़ी-दुपहरी में एक मील का रास्ता नापकर, उनके ताश खेलनेवाले दोस्तों को बुलाने जाना पड़ता था। गर्मी की छुट्टियों में, दिन में जब तक वे सोते रहते थे तब तक पंखा झलना पड़ता था। सर्दी के दिनों में, जब वे लिहाफ के भीतर हाथ-पैर छिपाकर कछुए की तरह बैठे किताब पढ़ते थे, तब हमें बैठे-बैठे उनकी किताब के पन्ने पलट देने होते थे- यही सब उनके अत्याचार थे। और फिर 'न' कहने का भी कोई उपाय नहीं था। किसी के निकट शिकायत करने की भी ताब नहीं थी। घुणाक्षर-न्याय से भी यदि वे जान पाते तो हुक्म दे बैठते, “केशव, जा तो अपनी जाग्रफी ले आ, देखूँ तुझे पुराना सबक याद है कि नहीं। जतीन, जा तो एक अच्छी-सी झाऊ की छड़ी तोड़ ला।” अर्थात् पिटना अनिवार्य था, अतएव आनन्द की मात्रा में इन लोगों में यदि प्रतिस्पर्धा हो रही थी तो इसमें अचरज की बात ही क्या थी?किन्तु आनन्द कितना ही क्यों न हो, अन्त में उसे स्थगित रखना आवश्यक हो गया; क्योंकि स्कूल का समय हो रहा था। मुझे तो ज्वर था, इसलिए कहीं जाना न था।याद आता है कि उस रात को बुखार तेज हो गया और फिर, 7-8 दिन तक खाट में ही पड़े रहना पड़ा!इसके कितने दिनों बाद स्कूल गया और फिर कितने दिनों बाद इन्द्र से भेंट हुई सो याद नहीं है; परन्तु इतना जरूर याद है कि बहुत दिनों बाद हुई। शनिवार का दिन था, जल्दी बन्द हो जाने के कारण मैं जल्दी ही स्कूल से लौट आया था। उन दिनों गंगा में पानी उतरना शुरू हो गया था और गंगा से लगे हुए एक नाले के किनारे मैं बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा था। वहाँ और भी बहुत-से आदमी मछली पकड़ रहे थे। एकाएक मैंने देखा कि एक आदमी, पास में ही सरकी के झुण्ड की आड़ में, बैठकर टपाटप मछलियाँ पकड़ रहा है। आड़ में होने के कारण वह तो अच्छी तरह दिखाई न देता था। परन्तु उसका मछली पकड़ना दिखाई पड़ता था। बहुत देर से मुझे अपनी जगह पसन्द नहीं आ रही थी। मन में सोचा कि चलो, मैं भी उसी के निकट जा बैठूँ। बंसी हाथ में लेकर मेरे एक बार घूमकर खड़े होते ही वह बोला, “मेरे दाहिनी ओर आकर बैठ जा। अच्छा तो है श्रीकान्त?” छाती धक् कर उठी। यद्यपि मैं उसका मुँह न देख पाया था तो भी- पहिचान गया कि इन्द्र है। शरीर के भीतर से बिजली का तीव्र प्रवाह बह जाने से, जो जहाँ है वह, एक मुहूर्त में, जैसे सजग हो उठा है, उसके कण्ठ-स्वर से भी मेरी वही दशा हुई। पलक मारते-मारते सर्वांग का रक्त चंचल हो उठा और उद्दाम होकर छाती पर मानो जोर-जोर से पछाड़ खाने लगा। किसी तरह भी मुँह से जरा-सा जवाब न निकला। यह बात मैं लिख तो जरूर गया हूँ किन्तु उस वस्तु को भाषा में व्यक्त करने की बात तो दूर, उसे समझना भी मेरे लिए, अत्यन्त कठिन ही नहीं, शायद असाध्यक था। क्योंकि बोलने के लिए यही बहुव्यवहृत साधारण वाक्य-राशि-जैसे हृदय का रक्त आलोड़ित हो रहा था- उद्दाम या चंचल हो रहा था, बिजली के प्रवाह के समान बह रहा था- आदि के उपयोग के सिवाय और तो कोई रास्ता है नहीं। किन्तु इससे कितना-सा व्यक्त किया जा सकता है? जो जानता नहीं उसके आगे मेरे मन की बात कितनी-सी प्रकाशित हुई? जिसने अपने जीवन में एक दिन के लिए भी यह अनुभव नहीं किया, मैं कहीं उसे यह किस तरह जताऊँ और वही इसे किस तरह जाने? जिसकी कि मैं प्रति समय याद करता रहता था- कामना करता रहता था, आकांक्षा करता रहता था और फिर भी, कहीं उससे किसी रूप में मुलाकात न हो जाय, इस भय के मारे दिन-ब-दिन सूखकर काँटा हुआ जाता था- उसी ने, इस प्रकार अकस्मात् इतने अमानवीय रूप में मेरी ऑंखों के सामने, मुझे अपने पार्श्व में आकर बैठने का अनुरोध किया! उसके पास जाकर बैठ भी गया; परन्तु फिर भी कुछ कह न सका।इन्द्र बोला, “उस दिन वापिस आकर तूने बड़ी मार खाई- क्यों न श्रीकान्त? तुझे ले जाकर मैंने अच्छा काम नहीं किया। उसके लिए रोज मुझे बड़ा दु:ख होता है।” मैंने सिर हिलाकर कहा, “मार नहीं खाई।” इन्द्र खुश होकर बोला, “नहीं खाई? सुन रे श्रीकान्त, तेरे जाने के बाद मैंने काली माता को अनेक दफे पुकारा था जिससे तुझे कोई न मारे। काली माता बड़ी जागृत देवी हैं रे! उन्हें मन लगाकर पुकारने से कभी कोई मार नहीं सकता। माता आकर इस प्रकार भुला देती हैं कि कोई कुछ भी नहीं कर सकता।” ऐसा कहकर उसने बंसी को रख दिया और हाथ जोड़कर कपाल में लगा लिये, मानो उन्हीं को मन ही मन प्रणाम किया हो। फिर बंसी में चारा लगाकर उसे जल में डालते हुए वह बोला, “मुझे तो खयाल न था कि तुझे ज्वर आ जायेगा, यदि होता तो मैं वह भी न आने देता।”मैंने आहिस्ते से प्रश्न किया, “क्या करते तुम?” इन्द्र बोला, “कुछ नहीं, सिर्फ जवाफूल (गुड़हल) लाकर माता के पैरों पर चढ़ा देता। उन्हें जवा फूल बड़े प्यारे हैं। जो जैसी कामना से उन्हें चढ़ाता है उसका वैसा ही फल होता है। यह तो सभी जानते हैं, क्या तू नहीं जानता?” मैंने पूछा, “तुम्हारी तबियत तो नहीं बिगड़ी थी?” इन्द्र ने आश्चर्य से कहा, “मेरी? मेरी तबियत कभी खराब नहीं होती। कभी कुछ नहीं होता।” वह एकाएक उद्दिप्त होकर बोला, “देख श्रीकान्त, मैं तुझे एक चीज सिखाए देता हूँ। यदि तू दोनों बेला खूब मन लगाकर देवी का नाम लिया करेगा, तो वे सामने आकर खड़ी हो जाँयगी- तू उन्हें स्पष्ट देख सकेगा। और फिर वे कभी तेरा बुरा न होने देंगी। तेरा कोई बाल भी बाँका न कर सकेगा- तू स्वयं जान जायेगा-फिर मेरी तरह मन चाहे वहाँ जाना, खुशी पड़े सो करना, फिर कोई चिन्ता नहीं। समझ में आया?”मैंने सिर हिलाकर कहा, “ठीक है।” फिर बंसी में चारा लगाकर और उसे पानी में डालकर मृदु-कण्ठ से पूछा, “अब तुम किसे साथ लेकर वहाँ जाते हो?”“कहाँ?”“उस पार मछली पकड़ने।”इन्द्र बंसी को उठाकर और सावधानी से पास में रखकर बोला, “अब मैं नहीं जाता।” उसकी बात सुनकर मुझे अचरज हुआ। पूछा, “उसके बाद क्या तुम एक दिन भी नहीं गये?”'नहीं, एक दिन भी नहीं- मुझे सिर की कसम रखकर।” बात को पूरा किये बगैर ही कुछ सिटपिटाकर इन्द्र चुप हो गया।उसके सम्बन्ध में मुझे यह बात रह-रहकर काँटे जैसी चुभती रही है। किसी तरह भी उस दिन की वह मछली बेचने की बात भूल न सका था, इसलिए यद्यपि वह चुप हो रहा पर मैं न रह सका। मैंने पूछा, “किसने तुम्हें सिर की कसम रखाई भाई? तुम्हारी माँ ने?”“नहीं, माँ ने नहीं।” कहकर इन्द्र फिर चुप हो रहा। बंसी में धीरे-धीरे डोरी लपेटता हुआ बोला, “श्रीकान्त, अपनी उस रात की बात घर में तूने किसी से कही तो नहीं?”'नहीं, किन्तु यह सभी जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ चला गया था।”इन्द्र ने और कोई प्रश्न न किया। मैंने सोचा था कि अब वह उठेगा। किन्तु वह नहीं उठा, चुप बैठा रहा। उसके मुँह पर हमेशा हँसी का-सा भाव रहता था, परन्तु इस समय वह नहीं था। मानो, वह कुछ मुझसे कहना चाहता हो और किसी कारण, कुछ न कह सकता हो, तथा साथ ही, बिना कुछ कहे रहा भी न जाता हो- बैठे-बैठे भी मानो वह आकुलता का अनुभव कर रहा हो। आप लोग शायद यह कह बैठेंगे कि, “यह तो बाबू, तुम्हारी बिल्कु।ल मिथ्या बात है, इतना मनस्तत्व आविष्कार करने की उम्र तो वह तुम्हारी नहीं थी।” मैं भी इसे स्वीकार करता हूँ। किन्तु आप लोग भी इस बात को भूले जाते हैं कि मैं इन्द्र को प्यार करता था; एक आदमी दूसरे के मन की बात को जान सकता है तो केवल सहानुभूति और प्यार से- उम्र और बुद्धि से नहीं। संसार में जिसने प्यार किया है, दूसरे के मन की भाषा उसके आगे उतनी ही व्यक्त हो उठी है। यह अत्यन्त कठिन अन्तर्दृष्टि सिर्फ प्रेम के ज़ोर से ही प्राप्त की जा सकती है, और किसी तरह नहीं। उसका प्रमाण देता हूँ।इन्द्र ने मुँह उठाकर मानो कुछ बोलना चाहा परन्तु बोल न सकने से उसका समस्त मुख आकरण ही रँग गया। चट से सरकी का एक सोंटा उसने तोड़ लिया और वह उसे नीचा मुँह किये, पानी पर पटकने लगा; फिर बोला, “श्रीकान्त!”“क्या है भइया?”“तेरे-पास रुपये हैं?”“कितने रुपये?”“कितने? अरे यही चार-पाँच रुपये।”“हैं। तुम लोगे?” कहकर मैंने बड़ी प्रसन्नता से उसके मुख की ओर देखा। ये थोड़े से रुपये ही मेरे पास थे। इन्द्र के काम में आने की अपेक्षा इनके और अधिक सद्व्यवहार की मैं कल्पना भी न कर सकता था! किन्तु कहाँ, इन्द्र तो कुछ खुश न हुआ। उसका मुँह तो मानो और भी अधिक लज्जा के कारण कुछ विचित्र किस्म का हो गया। कुछ देर चुप रहने के उपरान्त वह बोला, “किन्तु मैं इन रुपयों को तुम्हें लौटा न सकूँगा।”“मैं इन्हें लौटाना चाहता भी नहीं,” यह कहकर गर्व के साथ मैं उसकी ओर देखने लगा।और भी थोड़ी देर तक नीचा मुँह किये रहने के उपरान्त वह धीरे से बोला, “रुपये मैं स्वयं अपने लिए नहीं चाहता। एक आदमी को देने होंगे; इसी से मैंने माँगे हैं। वे लोग बेचारे बड़े दु:खी हैं- उन्हें खाने को भी नहीं मिलता। क्या तू वहाँ चलेगा?” निमेष-मात्र में ही मुझे उस रात की बात याद आ गयी। बोला, “वही न, जिनको रुपया देने के लिए उस दिन तुम नाव पर से उतरे जा रहे थे?” इन्द्र ने अन्यमनस्क भाव से सिर हिलाकर कहा, “हाँ, वही। रुपया तो मैं खुद ही बहुत-से दे सकता था, परन्तु जीजी तो किसी तरह लेना ही नहीं चाहतीं। तुझे भी साथ चलना होगा श्रीकान्त, नहीं तो इन रुपयों को वे न लेंगी, सोचेंगी कि मैं माँ के बक्से में से चोरी करके लाया हूँ। चलेगा श्रीकान्त?”“मालूम होता है वे तुम्हारी जीजी होती हैं?”इन्द्र ने कुछ हँसकर कहा, “नहीं, जीजी होती नहीं हैं- जीजी कहता हूँ। चलेगा न?” मुझे चुप देखकर वह बोला, “दिन को जाने में वहाँ कुछ भय नहीं है। कल रविवार है, तू खा-पीकर यहाँ आ जाना, मैं तुझे ले चलूँगा; तुरंत ही लौट आवेंगे। चलेगा न भाई?” इतना कहकर वह जिस प्रकार मेरा हाथ पकड़कर मेरे मुँह की ओर देखने लगा, उससे मेरा 'नहीं' कहना सम्भव नहीं रहा, मैं दुबारा उसकी नौका में जाने का वचन देकर घर लौट आया।वचन तो सचमुच ही दे आया, किन्तु वहाँ जाना कितना बड़ा दु:साहस है, यह तो मुझसे बढ़कर कोई न जानता था। उसी समय से मेरा मन भारी हो गया और नींद के समय में प्रगाढ़ अशान्ति का भाव मेरे सर्वांग में विचरण करता रहा। सुबह उठते ही, पहले यही मन में आया कि आज जिस जगह जाने के लिए वचन-बद्ध हुआ हूँ, उस जगह जाने से किसी भी तरह मेरा भला न होगा। किसी सूत्र से यदि कोई जान जायेगा, तो वापिस लौटने पर जो सजा भुगतनी पड़ेगी, उसकी चाहना तो शायद मँझले भइया के लिए भी छोटे भइया न कर सकेंगे। अन्त में खा पीकर, पाँच रुपये छिपाकर, जब मैं घर से बाहर निकला तब यह बात भी अनेक बार मन में आई कि, जाने की जरूरत नहीं है। बला से, न रक्खा अपने वचन को, और इससे मेरा आता-जाता ही क्या है?यथा-स्थान पहुँचकर देखा कि सरकी के झुण्ड के नीचे, उसी छोटी-सी नाव के ऊपर, इन्द्र सिर ऊपर उठाए मेरी राह देख रहा है। ऑंख से ऑंख मिलते ही उसने इस तरह हँसकर मुझे बुलाया कि न जाने की बात अपने मुँह से मैं निकाल ही न सका। सावधानी से, धीरे-धीरे उतरकर, चुपचाप, मैं नाव पर चढ़ गया। इन्द्र ने नाव खोल दी।आज मैं सोचता हूँ कि बहुत जन्म के पुण्यों का फल था जो उस दिन मैं भय के मारे लौट न आया। उस दिन को उपलक्ष्य करके जो चीज मैं देख आया, उसे देखना, सारे जीवन सारी पृथ्वीि छान डालने पर भी कितने से लोगों के भाग्य में होता है? स्वयं मैं भी वैसी वस्तु और कहाँ देख सका हूँ? जीवन में ऐसा शुभ मुहूर्त अनेक बार नहीं आता। यदि कभी आता भी है तो, वह समस्त चेतना पर ऐसी गम्भीर छाप मार जाता है कि बाद का सारा जीवन मानो उसी साँचे में ढल जाता है। मैं समझता हूँ कि इसीलिए मैं स्त्री-जाति को कभी तुच्छ रूप में नहीं देख सका। इसीलिए बुद्धि से मैं इस प्रकार के चाहे जितने तर्क क्यों न करूँ कि संसार में क्या पिशाचियाँ नहीं हैं? यदि नहीं, तो राह घाट में इतनी पाप-मूर्तियाँ किनकी देख पड़ती हैं? सब ही यदि इन्द्र की जीजी हैं, तो इतने प्रकार के दु:खों के स्रोत कौन बहाती हैं? तो भी, न जाने क्यों, मन में आता है कि यह सब उनके बाह्य आवरण हैं, जिन्हें कि वे जब चाहें तब दूर फेंककर ठीक उन्हीं के (दीदी के) समान उच्च आसन पर जाकर विराज सकती हैं। मित्र लोग कहते हैं कि यह मेरा अति जघन्य शोचनीय भ्रम है। मैं इसका भी प्रतिवाद नहीं करता, सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि यह मेरी युक्ति नहीं है, संस्कार है! इस संस्कार के मूल में जो है, नहीं मालूम, वह पुण्यवती आज भी जीवित है या नहीं। यदि हो भी तो वह कैसे, कहाँ पर है, इसकी खोज-खबर लेने की चेष्टा भी मैंने नहीं की है। किन्तु फिर भी मन ही मन मैंने उन्हें कितनी बार प्रणाम किया है, इसे भगवान ही जानते हैं।श्मशान के उसी सँकरे घाट के पास, बड़ के वृक्ष की जड़ों से, नाव को बाँधकर जब हम दोनों रवाना हुए तब बहुत दिन बाकी था। कुछ दूर चलने पर, दाहिनी तरफ, वन के भीतर अच्छी तरह देखने से एक रास्ता-सा दिखाई दिया। उसी से होकर इन्द्र ने अन्दर प्रवेश किया। करीब दस मिनट चलने के बाद एक पर्णकुटी दिखाई दी। नजदीक जाकर देखा कि भीतर जाने का रास्ता एक बेंड़े से बन्द है। इन्द्र ने सावधानी से, उसका बन्धन खोलकर, प्रवेश किया; और मुझे अन्दर लेकर फिर उसे उसी तरह बाँध दिया। मैंने वैसा वास-स्थान अपने जीवन में कभी नहीं देखा। एक तो चारों तरफ निबिड़ जंगल, दूसरे सिर के ऊपर एक प्रकाण्ड इमली और पाकर के वृक्ष ने सारी जगह को मानो अन्धकारमय कर रक्खा था। हमारी आवाज पाकर मुर्गियाँ और उनके बच्चे चीत्कार कर उठे। एक तरफ बँधी हुई दो बकरियाँ मिमियाँ उठीं। ध्यारन से सामने देखा तो- अरे बाबा! एक बड़ा भारी अजगर, टेढ़ा-मेढ़ा होकर, करीब-करीब सारे ऑंगन को व्याप्त करके पड़ा है! पल-भर में एक अस्फुट चीत्कार करके मुर्गियों को और भी भयभीत करता हुआ, मैं एकदम उस बेंड़े पर चढ़ गया। इन्द्र खिल-खिलाकर हँस पड़ा, बोला, “यह किसी से नहीं बोलता है रे, बड़ा भला साँप है- इसका नाम है रहीम।” इतना कहकर वह उसके पास गया और उसने उसे, पेट पकड़कर ऑंगन की दूसरी ओर, खींचकर सरका दिया। तब मैंने बेंड़े पर से उतरकर दाहिनी ओर देखा। उस पर्णकुटी के बरामदे में बहुत-सी फटी चटाइयों और फटी कथरियों के बिछौने पर बैठा हुआ एक दीर्घकाय दुबला-पतला मनुष्य प्रबल खाँसी के मारे हाँफ रहा है। उसके सिर की जटाएँ ऊँची बँधी हुई थीं और गले में विविध प्रकार की छोटी-बड़ी मालाएँ पड़ी थीं। शरीर के कपड़े अत्यन्त मैले और एक प्रकार के हल्दी के रंग में रँगे हुए थे। उसकी लम्बी दाढ़ी कपड़े की एक चिन्दी के जटा के साथ बँधी हुई थी। पहले तो मैं उसे पहिचान नहीं सका; परन्तु पास में आते ही पहिचान गया कि वह सँपेरा है। पाँच-छ: महीने पहले मैं उसे करीब-करीब सभी जगह देखा करता था। हमारे घर भी वह कई दफे साँप का खेल दिखाने आया है। इन्द्र ने उसे 'शाहजी' कहकर सम्बोधन किया। उसने हमें बैठने का इशारा किया और हाथ उठाकर इन्द्र को गाँजे का साज-सरंजाम और चिलम दिखा दी। इन्द्र ने कुछ कहे बगैर ही उसके आदेश का पालन करना शुरू कर दिया। जब चिलम तैयार हुई तब शाहजी, खाँसी से बेदम होने पर भी, मानो 'चाहे मरुँ चाहे बचूँ' का प्रण करके, दम खींचने लगा और रत्ती भर भी धुऑं कहीं से बाहर न निकल जाय, इस आशंका के मारे उसने अपनी बाईं हथेली से नाक और मुँह अच्छी तरह दबा लिया, फिर सिर के एक झटके के साथ उसने चिलम इन्द्र के हाथ में दे दी और कहा, “पियो।”इन्द्र ने चिलम पी नहीं। धीरे-से उसे नीचे रखते हुए कहा, “नहीं।” शाहजी ने अत्यन्त विस्मित होकर कारण पूछा, किन्तु उत्तर के लिए एक क्षण की भी प्रतीक्षा नहीं की। फिर स्वयं ही उसे उठा लिया और खींच-खींचकर नि:शेष करके उलटकर रख दिया! इसके बाद दोनों के बीच कोमल स्वर में बातचीत शुरू हुई जिसमें से अधिकांश को न तो मैं सुन सका और न समझ ही सका। किन्तु एक बात को मैंने लक्ष्य किया कि शाहजी हिन्दी बोलते रहे और इन्द्र ने बंगला छोड़ और किसी भाषा का व्यवहार न किया।शाहजी का कंठ-स्वर क्रम-क्रम से गर्म हो उठा और देखते ही देखते वह पागलों की-सी चिल्लाहट में परिणत हो गया। इन्द्र को उद्देश्य करके वह जो गाली-गलौज करने लगा वह ऐसी थी कि न सुनी जा सकती है और न सही। इन्द्र ने तो उसे सह लिया परन्तु मैं कभी नहीं सहता। इसके बाद वह बेंड़े के सहारे बैठ गया और दम-भर बाद ही गर्दन झुका करके सो गया। दोनों जनों के, कुछ देर तक, वैसे ही चुपचाप बैठे रहने के कारण मैं ऊब उठा और बोला, “समय जा रहा है, तुम्हें क्या वहाँ नहीं जाना?”“कहाँ श्रीकान्त?”“अपनी जीजी के यहाँ। क्या रुपये देने नहीं जाना है?”“अपनी जीजी के लिए ही तो मैं बैठा हूँ। यही तो उनका घर है।”“यही क्या तुम्हारी जीजी का घर है? यह तो सँपेरे-मुसलमान हैं!” इन्द्र कुछ कहने को उद्यत हुआ-पर फिर उसे दबा गया और चुप रहकर मेरी ओर ताकने लगा। उसकी दृष्टि बड़ी भारी व्यथा से मानो म्लान हो गयी। कुछ ठहरकर बोला, “एक दिन तुझे सब कहूँगा। साँप खिलाना देखेगा श्रीकान्त?”उसकी बात सुनकर मैं अवाक् हो गया। “क्या साँप को खिलाओगे तुम? यदि काट खाए तो?”इन्द्र उठकर घर के अन्दर गया और एक छोटी-सी पिटारी और सँपेरे की तूँबी (बाजा) ले आया। उसने उसे सामने रखा, पिटारी का ढक्कन खोला और तूँबी बजाई। मैं डर के मारे काठ हो गया, “पिटारी मत खोलो भाई, भीतर यदि गोखरू साँप हुआ तो?” इन्द्र ने इसका जवाब देने की भी जरूरत नहीं समझी, केवल इशारे से बता दिया कि मैं गोखरू साँप को भी खिला सकता हूँ। दूसरे ही क्षण सिर हिला-हिलाकर तूँबी बजाते हुए उसने ढक्कन को अलग कर दिया। बस फिर क्या था, एक बड़ा भारी गोखरू साँप एक हाथ ऊँचा होकर फन फैलाकर खड़ा हो गया। मुहूर्त मात्र का भी विलम्ब किये बगैर इन्द्र के हाथ के ढक्कन में उसने जोर से मुँह मारा और पिटारी में से बाहर निकल पड़ा।'अरे बाप रे!' कहकर इन्द्र ऑंगन में उछल पड़ा। मैं बेंडे पर चढ़ गया। क्रुद्ध सर्पराज, तूँबी पर और एक आघात करके, घर के भीतर घुस गये। इन्द्र का मुँह काला हो गया। उसने कहा, “यह तो एकदम जंगली है। जिसे मैं खिलाया करता था, वह यह नहीं है!” भय, झुँझलाहट और खीझ से मुझे करीब-करीब रुलाई आ गयी। मैं बोला, “क्यों ऐसा काम किया? उसने जाकर कहीं शाहजी को काट खाया तो?” इन्द्र असीम शर्म के मारे गड़ा जा रहा था। बोला, “घर का अर्गल लगा आऊँ? किन्तु यदि पास में ही छिपा हुआ हो तो?” मैं बोला, “तो फिर, निकलते ही उसे काट खाएगा।” निरुपाय भाव से इधर-उधर देखकर इन्द्र बोला, “काटने दो बच्चू को जंगली साँप रख छोड़ा है जो- साले गँजेड़ी को इतनी भी अक्ल नहीं है- यह लो वह जीजी आ गयी। आना मत! आना मत! वहीं खड़ी रहो।” मैंने सिर घुमाकर इन्द्र की जीजी को देखा। मानो राख से ढँकी हुई आग हो। जैसे युग-युगान्तरव्यापी कठोर तपस्या समाप्त करके अभी आसन से ही उठकर आई हों। बाईं ओर कमर पर रस्सी से बँधी हुई थोड़ी-सी सूखी लकड़ियाँ थीं और दाहिने हाथ में फूलों की डलिया के समान एक टोकनी में कुछ शाक-सब्जी थी। पहिनावे में हिन्दुस्तानी मुसलमानिन के कपड़े थे, जो गेरुए रंग में रंगे हुए थे, परन्तु मैले नहीं थे। हाथ में लाख की दो चूड़ियाँ थीं। माँग हिन्दुस्तानियों के समान सिन्दूर से भरी थी। उन्होंने लकड़ी का बोझा नीचे रख दिया और बेंड़ा खोलते-खोलते कहा, “क्या है?” इन्द्र बहुत ही व्यस्त होकर बोला, “खोलो मत जीजी, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ- एक बड़ा भारी साँप घर में घुस गया है।” उन्होंने मेरे मुँह की ओर देखकर मानो कुछ सोचा। इसके बाद थोड़ा-सा हँसकर कहा, “वही तो। सँपेरे के घर में साँप घुसा है, यह तो बड़े अचरज की बात है! है न, श्रीकान्त?” मैं अनिमेष दृष्टि से केवल उन्हीं के मुँह की ओर देखता रहा। “किन्तु, यह तो कहो इन्द्रनाथ, वह अन्दर किस तरह गया?” इन्द्र बोला, “पिटारी के भीतर से निकल पड़ा है। एकदम जंगली साँप है।”“शायद वे अन्दर सो रहे हैं, क्यों?” इन्द्र ने गुस्से से कहा, “गाँजा पीकर एकदम बेहोश पड़े हैं। चिल्ला-चिल्लाकर मर जाने पर भी न उठेंगे।” उन्होंने फिर हँसकर कहा, “और यही सुयोग पाकर तुम श्रीकान्त को साँप का खिलाना दिखाने चले थे, क्यों न? अच्छा, आओ, मैं पकड़े देती हूँ।”“तुम मत जाना जीजी, तुम्हें काट खायगा। शाहजी को उठा दो- मैं तुम्हें न जाने दूँगा।” यह कहकर और दोनों हाथ पसारकर वह रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसके इस व्याकुल कण्ठ-स्वर में जो प्रेम प्रकाशित हो उठा, उसे उन्होंने खूब ही अनुभव किया। मुहूर्त-भर के लिए उनकी दोनों ऑंखें छल छला उठीं; किन्तु उन्हें छिपाकर वे हँसकर बोलीं, “अरे पागल, इतना पुण्य तेरी इस जीजी ने नहीं किया। मुझे वह नहीं काटेगा, अभी पकड़े देती हूँ देख...” कहकर बाँस के मंच पर से एक किरोसीन की डिबिया उठाकर और जलाकर वे घर में गयी। एक मिनट-भर में ही साँप को पकड़ लाईं और उसे पिटारी में बन्द कर दिया। इन्द्र ने चट से उनके पैरों पर गिरकर नमस्कार किया और पैरों की धूल सिर पर लगाकर कहा, “जीजी, यदि तुम कहीं मेरी जीजी होतीं!” उन्होंने दाहिना हाथ बढ़ाकर इन्द्र का चिबुक स्पर्श किया और उस अंगुली को चूम लिया। फिर मुँह फेरकर अलक्ष्य में मानो उन्होंने अपनी दोनों ऑंखें पोंछ डालीं।♦♦ • ♦♦सारी घटना सुनते-सुनते इन्द्र की जीजी हठात् दो-एक बार इस तरह सिहर उठीं कि यदि इन्द्र का उस तरफ तनिक भी ध्याकन होता, तो उसे बड़ा आश्चर्य होता। वह तो न देख पाया, परन्तु मैंने देख लिया। वे कुछ देर तक चुपचाप उसकी ओर देखकर स्नेहभरे तिरस्कार से बोलीं, “छि: भइया, ऐसा कार्य अब और कभी मत करना। इन सब भयानक जानवरों से क्या खिलवाड़ किया जाता है? भाग्य से तुम्हारे हाथ की पिटारी के ढक्कन पर ही उसने फन मारा, नहीं तो आज कैसा अनर्थ हो जाता, बोलो तो?”“मैं क्या ऐसा बेवकूफ हूँ जीजी।” इतना कहकर उसने अपनी धोती का छोर खींचकर कमर में से सूत से बँधी हुई एक सूखी जड़ी दिखाकर कहा, “यह देख जीजी, पूरी सावधानी के साथ बाँध रखी है। यदि यह न होती तो क्या आज वह मुझे काटे बिना छोड़ देता? शाहजी के पास से इसे प्राप्त करने में क्या मुझे कम कष्ट उठाने पड़े हैं? इसके होते हुए तो मुझे कोई भी नहीं काट सकता, और यदि काट भी लेता- तो भी क्या बिगड़ता? शाहजी को तुरंत ही जगाकर उनसे जहर-मोहरा लेकर कटी जगह पर रख देता। अच्छा, जीजी, यह जहर-मोहरा कितनी देर में सब विष खींच लेता है? आधा घण्टे में? एक घण्टे में? नहीं, इतनी देर न लगती होगी, क्यों जीजी?”जीजी, किन्तु उसी तरह, चुपचाप देखती रहीं। इन्द्र उत्तेजित हो गया था, बोला, “आज दो न जीजी मुझे एक जहर-मोहरा-तुम्हारे पास तो दो-तीन पड़े हैं- कितने दिनों से मैं माँग रहा हूँ।” फिर उत्तर के लिए प्रतीक्षा किये बगैर ही वह क्षुब्ध अभिमान के स्वर में उसी क्षण बोल उठा, “मुझसे तो तुम लोग जो भी कहते हो मैं वही कर देता हूँ- पर तुम लोग मुझे हमेशा झाँसा देकर कहते हो, आज नहीं कल, कल नहीं परसों-यदि नहीं देना है तो साफ क्यों नहीं कह देते? मैं फिर नहीं आऊँगा- जाओ।”इन्द्र ने लक्ष्य नहीं किया, किन्तु मैंने जीजी की तरफ देखते हुए खूब अनुभव किया कि उनका मुख, किसी असीम व्यथा और लज्जा के कारण, मानो एकदम काला हो गया है। किन्तु दूसरे ही क्षण कुछ हँसी का भाव अपने सूखे होठों पर जबर्दस्ती लाकर उन्होंने कहा, “हाँ रे इन्द्र, क्या तू अपनी जीजी के यहाँ सिर्फ साँप के मन्त्र और जहर-मोहरा के लिए ही आया करता है?”इन्द्र नि:संकोच होकर बोल उठा, “और नहीं तो क्या!” फिर निद्रित शाहजी की ओर तिरछी नजर से देखकर बोला, “किन्तु वह मुझे हमेशा झाँसा ही देते रहते हैं- इस तिथि को नहीं, उस तिथि को नहीं-केवल वह एक झाड़ने का मन्त्र दिया था, बस और कुछ देना ही नहीं चाहते। किन्तु, आज मुझे खूब मालूम हो गया है जीजी, कि तुम भी कुछ कम नहीं हो- तुम भी सब जानती हो। अब और उनकी खुशामद नहीं करूँगा जीजी, तुम्हारे पास से ही सब मन्त्र सीख लूँगा।” इतना कहकर उसने मेरी ओर देखा और फिर सहसा एक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर शाहजी को लक्ष्य करके उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करते हुए कहा, “शाहजी गाँजा-वाँजा जरूर पीते हैं श्रीकान्त, किन्तु तीन दिन के मरे हुए मुर्दे को आधा घण्टे के भीतर ही उठाकर खड़ा कर सकते हैं- इतने बड़े उस्ताद हैं ये! हाँ जीजी, तुम भी तो मुर्दे को जिला सकती हो?”जीजी कुछ देर चुपचाप देखती रहीं और फिर एकाएक खिलखिलाकर हँस पड़ीं। वह कितना मधुर हास था! इस तरह मैंने बहुत ही थोड़े लोगों को हँसते देखा है; किन्तु वह हास, मानो निबिड़ मेघों से भरे हुए आकाश की बिजली को चमक की तरह, दूसरे ही क्षण अन्धकार में विलीन हो गया।किन्तु इन्द्र ने उस तरफ ध्या न ही नहीं दिया, वह एकदम जीजी के गले पड़ गया और बोला, “मैं जानता हूँ कि तुम्हें सब मालूम है; परन्तु मैं कहे देता हूँ कि एक-एक करके तुम्हें अपनी सब विद्याएँ देनी होंगी। जितने दिन जाऊँगा उतने दिन तुम्हारा पूरा गुलाम होकर रहूँगा। तुमने कितने मुर्दे जिलाए हैं जीजी?”जीजी बोली, “मैं तो मुर्दे जिलाना जानती नहीं, इन्द्रनाथ!”इन्द्र ने पूछा, “तुम्हें शाहजी ने यह मन्त्र नहीं दिया?” जीजी ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।” इन्द्र, मिनट-भर तक उनके मुँह की ओर देखते रहने के उपरान्त, स्वयं भी अपना सिर हिलाते-हिलाते बोला, “यह विद्या क्या कोई शीघ्र देना चाहता है जीजी? अच्छा, कौड़ी चलाना तो तुमने निश्चय ही सीख लिया होगा?”जीजी बोली, “कौड़ी चलाना किसे कहते हैं, सो भी तो मैं नहीं जानती भाई।”इन्द्र को विश्वास नहीं हुआ। वह बोला, “हुश्, जानती कैसे नहीं! नहीं दूँगी, यही कह दो न!” फिर मेरी ओर देखकर बोला, “कौड़ी चलाना कभी देखा है श्रीकान्त? दो कौड़ियाँ मन्त्र पढ़कर छोड़ दी जाती हैं, वे जहाँ साँप होता है वहाँ जाकर उसके सिर पर जा चिपटती हैं और उसे दस दिन तक के रास्ते से खींच लाकर हाजिर कर देती हैं। ऐसा ही मन्त्र का जोर है! अच्छा जीजी, घर बाँधना, देह-बाँधना, धूल पढ़ना- यह सब तो तुम जानती हो न? यदि जानती न होतीं, तो इस तरह साँप को कैसे पकड़ लेतीं?” इतना कहकर वह जिज्ञासु-दृष्टि से जीजी के मुँह की ओर देखने लगा।जीजी ने बहुत देर तक सिर झुकाए हुए चुपचाप मन ही मन मानो कुछ सोच लिया और फिर मुँह उठाकर धीरे से कहा, “इन्द्र, तेरी जीजी के पास ये सब विद्याएँ कानी-कौड़ी की भी नहीं हैं किन्तु; क्यों नहीं है, सो यदि तू विश्वास करे भाई, तो आज तेरे आगे सब बातें खोलकर अपनी छाती का बोझ हलका कर डालूँ। बोलो, तुम लोग आज मेरी सब बातों पर विश्वास करोगे?” बोलते-बोलते ही उनके पिछले शब्द एक तरह से कुछ भारी-से हो उठे।अभी तक मैं प्राय: कुछ भी न बोला था। इस दफे, सबसे आगे जोर से बोल उठा, “मैं तुम्हारी सब बातों पर विश्वास करूँगा जीजी! सब पर- जो तुम कहोगी, सब पर। एक भी बात पर अविश्वास न करूँगा।”मेरी ओर देखकर वे कुछ हँसीं और बोलीं, “विश्वास क्यों न करोगे भाई, तुम भले घरों के लड़के जो ठहरे! इतर (छोटे) लोग ही अनजान अपरिचित लोगों की बात में सन्देह करते और भय से पीछे हट जाते हैं। सिवाय इसके मैंने तो कभी झूठ बोला नहीं भाई!” इतना कहकर उन्होंने एक दफे सिर हमारी ओर देखकर म्लान भाव-से थोड़ा-सा हँस दिया।उस समय संध्याे की धुंध दूर होकर, आकाश में चन्द्रमा का उदय हो रहा था और उसकी धुँधली-सी किरण-रेखाएँ, वृक्षों की घनी शाखाओं और पत्तों में से छनकर नीचे के गहरे अन्धकार में पड़ रही थीं।कुछ देर चुप रहकर जीजी एकाएक बोल उठीं, “इन्द्रनाथ, सोचा था कि आज ही अपनी सब कहानी तुम्हें सुना दूँ। किन्तु सोचकर देखा कि नहीं, अभी वह समय नहीं आया है। परन्तु मेरी एक बात पर अवश्य विश्वास कर लो कि हम लोगों की सारी करामात शुरू से आखिर तक प्रवंचना ही है। इसलिए अब तुम झूठी आशा से शाहजी के पीछे-पीछे चक्कर मत काटो। हम लोग मन्त्र-तन्त्र कुछ नहीं जानते, मुर्दे को भी नहीं जिला सकते; कौड़ी फेंककर साँप को भी पकड़कर नहीं ला सकते। और कोई कर सकता है या नहीं, सो तो मैं नहीं जानती, परन्तु हम लोगों में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है।”न मालूम क्यों इस अत्यल्प काल के परिचय से ही मैंने उनके प्रत्येक शब्द पर असंशय विश्वास कर लिया; किन्तु, इतने दिनों के घनिष्ठ परिचय के होते हुए भी इन्द्र विश्वास न कर सका। वह क्रुद्ध होकर बोला, “यदि शक्ति नहीं है तो तुमने साँप को पकड़ किस तरह लिया?”जीजी बोलीं, “यह तो सिर्फ हाथ का कौशल-भर है इन्द्र, किसी मन्त्र का जोर नहीं। साँप का मन्त्र हम लोग नहीं जानते।”इन्द्र बोला, “यदि नहीं जानते; तो तुम दोनों ने धूर्तता से मुझसे इतने रुपये क्यों ठग लिये?”जीजी तत्काल जवाब न दे सकीं; शायद अपने को कुछ सँभालने लगीं। इन्द्र ने फिर कर्कश कण्ठ से कहा, “तुम सब ठग, धूर्त, चोट्टे हो- अच्छा दिखाता हूँ तुम लोगों को इसका मजा।”पास में ही एक किरासन की डिबिया जल रही थी। मैंने उसी के प्रकाश में देखा, जीजी का मुँह मुर्दे के समान सफेद हो गया है। वे भय और संकोच के साथ बोलीं, “हम लोग मदारी जो हैं भाई- ठगना ही तो हमारा व्यवसाय है।”“तुम्हरा व्यवसाय मैं अभी सब बाहर निकाले देता हूँ- चल रे श्रीकान्त, इन साले धूर्तों की छाया से भी बचना चाहिए। हरामजादे, बदजात, धूर्त, बदमाश!” यह कहकर इन्द्र सहसा मेरा हाथ पकड़कर और जोर से एक झटका देकर खड़ा हो गया और जरा भी विलम्ब किये बिना मुझे खींच ले गया।इन्द्र को दोष नहीं दिया जा सकता; क्योंकि उसकी बहुत दिनों की बड़ी-बड़ी आशाएँ, मानो पलक मारते ही, भूमिसात हो गयी थीं। किन्तु मैं अपनी दोनों ऑंखों को जीजी की उन ऑंखों की ओर से फिर न लौटा सका। मैं बलपूर्वक इन्द्र से अपना हाथ छुड़ाकर पाँच रुपये सामने रखते हुए बोला, “तुम्हारे लिए लाया था जीजी-इन्हें ले लो।”इन्द्र ने झपटकर उन्हें उठा लिया और कहा, “अब और रुपये! धूर्तता से इन्होंने मुझसे कितने रुपये लिये हैं, सो क्या तुझे मालूम है श्रीकान्त? मैं तो अब यही चाहता हूँ कि ये लोग बिना खाए-पिए सूखकर मर जाँय।”मैंने उसका हाथ दबाकर कहा, “नहीं इन्द्र, दे देने दो- मैं ये जीजी के लिए ही लाया हूँ?”“ओ:, बड़ी आई तेरी जीजी!” कहकर वह मुझे खींचकर बेंड़े के पास घसीट लाया!इतने में इस गोल माल से शाहजी का नशा उचट गया। “क्या हुआ! क्या हुआ!” कहते हुए वह उठ बैठा।इन्द्र मुझे छोड़कर उसकी ओर बढ़ गया और बोला, “डाकू साले! कभी रास्ते में देख पाया तो चाबुक से तेरी पीठ का चमड़ा उधेड़ दूँगा।” “क्या हुआ?”, “बदमाश साला, जानता कुछ भी नहीं, फिर भी कहता फिरता है, मन्त्र के जोर से मुर्दे जिलाता हूँ! यदि कभी रास्ते पर दिखाई दिया तो अबकी बार अच्छी तरह 'देखूँगा तुझे?” इतना कहकर उसने एक ऐसा अशिष्ट इशारा किया जिससे कि शाहजी चौंक उठा।एक तो नशे की खुमारी फिर अकस्मात् यह अचिन्तय काण्ड। इससे यह 'किंतर्कव्य-विमूढ़' हो गया और उसी भाव से टुकुर-टुकुर देखने लगा।इन्द्र मुझे लेकर जब तक द्वार के बाहर आया, तब तक शायद वह कुछ होश में आकर शुद्ध बंगाली में पुकार उठा, “सुन इन्द्रनाथ, क्या हुआ है बोल तो?” यह पहले ही पहल मैंने उसे बंगाली में बोलते सुना।इन्द्र लौटकर बोला, “जन्त्र-मन्त्र तुम कुछ नहीं जानते, फिर क्यों' झूठ मूठ मुझे धोखा देकर इतने दिनों तक रुपया ऐंठते रहे? इसका जवाब दो!”वह बोला, “नहीं जानता, यह तुमसे किसने कहा?”इन्द्र ने उसी क्षण उस स्तब्ध नतमुखी जीजी की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “इन्होंने कहा कि तुम्हारे पास कानी कौड़ी की भी विद्या नहीं है। विद्या है सिर्फ धूर्तता की और लोगों को ठगने की। यही तुम लोगों का व्यवसाय है! मिथ्यावादी, चोर!”शाहजी की ऑंखें भक से जल उठीं। वह कैसी भीषण प्रकृति का आदमी है, इसका परिचय मुझे तब तक भी नहीं था। उसकी केवल उस दृष्टि से ही मेरे शरीर में मानो काँटे उठ आए। वह अपनी बिखरी हुई जटाओं को बाँधते-बाँधते उठ खड़ा हुआ और सामने आकर बोला, “कहा है, तूने?”जीजी उसी तरह नीचा मुँह किये निरुत्तर बैठी रही। इन्द्र ने मुझे एक धक्का देकर कहा, “रात हो गयी- चल न।” मैंने कहा, “रात अवश्य हो रही है, परन्तु मेरे पैर तो जैसे अपनी जगह से हिलते ही नहीं हैं।” किन्तु इन्द्र ने उस ओर भ्रूक्षेप भी न किया। वह मुझे प्राय: जबर्दस्ती ही खींच ले चला।कुछ कदम आगे बढ़ते ही शाहजी का कंठ-स्वर फिर सुनाई दिया, “क्यों कहा तूने?”प्रश्न तो जरूर सुना किन्तु प्रत्युत्तर न सुन सका। थोडे क़दम और अग्रसर होते ही अकस्मात् चारों ओर के उस निबिड़ अन्धकार की छाती को चीरता हुआ एक तीव्र आर्त्त-स्वर पीछे की अंधेरी झोंपड़ी में से हमारे कानों को बेधता हुआ निकल गया; और ऑंख की पलक गिरते-न गिरते इन्द्र उस शब्द का अनुसरण करके अदृश्य हो गया। किन्तु मेरे भाग्य में कुछ और ही था। सामने ही एक बड़ी कँटीली झाड़ी थी। मैं जोर से उसी पर जा गिरा और काँटों से मेरा सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया। यह जो हुआ, सो हुआ किन्तु अपने को काँटों से छुड़ाने में ही मुझे करीब दस मिनट लग गये। इस काँटे को छुड़ाओ तो किसी अन्य काँटे में कपड़ा बिंध जाता और उसे छुड़ाओ तो किसी तीसरे में जा अटकता। इस प्रकार अनेक कष्ट और विलम्ब के उपरान्त जब मैं शाहजी के घर के ऑंगन के किनारे पहुँचा, तब देखा कि उस ऑंगन के एक हिस्से में जीजी मूर्च्छित पड़ी हुई हैं और दूसरे हिस्से में दोनों का- गुरु-शिष्य का बाकायदा मल्ल-युद्ध हो रहा है। पास ही में एक तेजधार वाली बर्छी पड़ी हुई है।शाहजी-शरीर से अत्यन्त बलवान था, किन्तु उसे पता न था कि इन्द्र उससे भी कितना अधिक बली है। यदि होता तो शायद वह इतने बड़े दु:साहस का परिचय न देता। देखते ही देखते इन्द्र उसे चित्त करके उसकी छाती पर चढ़ बैठा और उसकी गर्दन को जोर से दबोचने लगा। वह ऐसा दबोचना था कि यदि मैं बाधा न देता तो, शायद, शाहजी का मदारी-जीवन उसी समय समाप्त हो जाता।बहुत खींच-तान के बाद जब मैंने दोनों को पृथक किया तब इन्द्र की अवस्था देखकर डर के मारे एकदम रो दिया। पहले मैं अन्धकार में देख न सका था कि उसके सब कपड़े खून से तर-ब-तर हो रहे हैं। इन्द्र हाँफते-हाँफते बोला, “साले गँजेड़ी ने मुझे साँप मारने का बर्छा मारा है- यह देख?” कुरते की आस्तीन उठाकर उसने बताया, भुजा में करीब दो-तीन इंच गहरा घाव हो गया है, और उसमें से लगातार खून बह रहा है।इन्द्र बोला, “रो मत, इस कपड़े से मेरे घाव को खूब खींचकर बाँध दे। अरे खबरदार! ठीक ऐसा ही बैठा रह, उठा तो गले पर पैर रखकर तेरी जीभ खींचकर बाहर निकाल लूँगा, हरामजादे सूअर! ले इन्द्र, तू खींचकर बाँध, देरी न कर।” इतना कहकर उसने चर्र-चर्र अपनी धोती के छोर का एक अंश फाड़ डाला। मैं काँपते हाथों से घाव को बाँधने लगा और शाहजी निकट ही, आसन्न मृत्यु विषैले सर्प की तरह, बैठा हुआ, चुपचाप देखने लगा।इन्द्र बोला, “नहीं, तेरा विश्वास नहीं है, तू खून कर डालेगा। मैं तेरे हाथ बाँधूँगा।” यह कहकर उसने उसी की गेरुए रंग की पगड़ी से खींच-खींचकर उसके दोनों हाथ खूब कसकर बाँध दिए। उसने कोई बाधा नहीं दी, प्रतिवाद नहीं किया, जरा-सी चूँ-चपड़ भी न की।जिस लाठी के प्रहार से जीजी बेहोश हो गयी थीं उसे उठाकर एक तरफ रखते हुए इन्द्र बोला, “कैसा नमकहराम शैतान है यह साला! मैंने इसे अपने पिता के न जाने कितने रुपये चुराकर दिए हैं, और यदि जीजी ने सिर की कसम रखाकर रोका न होता तो और भी देता। इतने पर भी यह मुझे बर्छी मार बैठा! श्रीकान्त, इस पर नजर रख जिससे यह उठ न बैठे- मैं जीजी की ऑंखों और चेहरे पर जल के छींटे देता हूँ।”पानी के छींटे देकर हवा करते हुए वह बोला, “जिस दिन जीजी ने कहा कि इन्द्रनाथ तेरे कमाए हुए पैसे होते तो मैं ले लेती- किन्तु इन्हें लेकर मैं अपना इहलोक-परलोक मिट्टी न करूँगी।' उस दिन से अब तक इस शैतान के बच्चे ने उन्हें कितनी मार मारी है, इसका कोई हिसाब नहीं। इतने पर भी जीजी लकड़ी ढोकर कंडे बेचकर किसी तरह इसे खिलाती-पिलाती हैं, गाँजे के लिए पैसे देती हैं- फिर भी यह उनका अपना न हुआ। किन्तु अब मैं इसे पुलिस के हाथ में दूँगा, तब छोड़ूँगा- नहीं तो यह जीजी का खून कर डालेगा, यह खून कर सकता है।”मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मानो वह मनुष्य इस बात से सिहर उठा और सिर उठाकर उसे तुरंत नीचा कर लिया। यह सब निमेष-भर में ही हो गया। किन्तु अपराधी की निबिड़ आशंका मैंने उसके चेहरे पर इस प्रकार परिस्फुट होती हुई देखी कि उसका उस समय का वह चेहरा मुझे आज भी साफ-साफ याद आ जाता है।मैं अच्छी तरह जानता हूँ, कि इस कहानी को, जिसे कि आज मैं लिख रहा हूँ, इतना ही नहीं कि सत्य मानकर ग्रहण करने में लोग दुविधा करेंगे परन्तु इसे विचित्र कल्पना कहकर उपहास करने में भी शायद संकोच न करेंगे। फिर भी, यह सब कुछ जानते हुए भी, मैंने इसे लिखा है और यही मेरी अभिज्ञता का सच्चा मूल्य है। क्योंकि सत्य के ऊपर खड़े हुए बगैर, किसी भी तरह यह सब कथा मुँह से बाहर नहीं निकाली जा सकती। पग-पग पर डर लगता है कि लोग इसे हँसी में न उड़ा दें। जगत में वास्तविक घटनाएँ कल्पना को भी बहुत दूर पीछे छोड़ जाती हैं-यह कैफियत, स्वयं उसे लेखबद्ध करने में, किसी तरह की मदद नहीं करती, बल्कि हाथ की कलम को बार-बार खींचकर रोकती है।पर जाने दो इस बात को। जीजी जब ऑंखें खोलकर उठ बैठीं तब शायद आधी रात हो गयी थी। उनकी विह्वलता दूर होते और भी एक घण्टा बीत गया। इसके बाद हमारे मुँह से सारा वृत्तान्त सुनकर वे उठकर धीरे-धीरे खड़ी हो गयीं और शाहजी को बन्धन-मुक्त करके बोलीं, “जाओ; अब सो रहो।”उसके चले जाने के उपरान्त उन्होंने इन्द्र को पास बुलाकर और उसका दाहिना हाथ अपने सिर पर रखकर कहा, “इन्द्र, मेरे इस सिर पर हाथ रखकर शपथ तो कर भाई, कि अब फिर कभी तू इस घर में न आयेगा। हमारा जो होना हो सो हो, तू अब कोई खबर न लेना।”इन्द्र पहले तो अवाक् हो रहा; परन्तु दूसरे ही क्षण आग की तरह जल उठा और बोला, “ठीक ही तो है! मेरा खून किये डालता था, सो तो कुछ भी नहीं। और मैंने जो उसे थोड़ी देर के लिए बाँध दिया, सो इस पर तुम्हारा इतना गुस्सा! ऐसा न हो तो फिर यह कलियुग ही क्यों कहलावे! परन्तु तुम दोनों कितने नमकहराम हो! आ रे श्रीकान्त, चलें, बस हो चुका।”जीजी चुप हो रहीं- उन्होंने इस अभियोग का जरा भी प्रतिवाद नहीं किया। क्यों नहीं किया सो, पीछे मैंने चाहे जितना क्यों न समझा हो, परन्तु उस समय मैं बिल्कुथल न समझ सका। तथापि मैं अलक्ष्य रूप से चुपचाप वे पाँच रुपये वहीं खम्भे के पास रखकर इन्द्र के पीछे-पीछे चल दिया। ऑंगन के बाहर आकर इन्द्र चिल्लाकर बोला, “हिन्दू की लड़की होकर जो एक मुसलमान के साथ भाग आती है, उसका धर्म-कर्म ही क्या! चूल्हे में चली जाय, अब मैं न कोई खोज ही करूँगा और न खबर ही लूँगा। हरामजादा, नीच कहीं का!” यह कहकर वह तेजी से उस वन-पथ को लाँघकर चल दिया।हम दोनों नाव में आकर बैठ गये, इन्द्र चुपचाप नाव खेने लगा और बीच-बीच में हाथ उठा-उठाकर ऑंखें पोंछने लगा। यह साफ-साफ समझकर कि वह रो रहा है, मैंने और कोई भी प्रश्न नहीं किया।श्मशान के उसी रास्ते से मैं लौट आया और उसी रास्ते अब भी चला जा रहा हूँ, परन्तु न मालूम क्यों, आज मेरे मन में भय की कोई बात ही नहीं आती। मालूम होता है, शायद, उस समय मन इतना विह्वल और इतना ढँका हुआ था कि इतनी रात को किस तरह घर में घुसूँगा और घुसने पर क्या दशा होगी, इसकी चिन्ता भी उसमें स्थान न पा सकी।प्राय: पिछली रात को नाव घाट पर आ लगी। मुझे उतारकर इन्द्र बोला, “घर चला जा श्रीकान्त, तू बड़ा अपशकुनिया है। तुझे साथ लेने से एक न एक फसाद उठ खड़ा होता है। आज से अब तुझे किसी भी कार्य के लिए न बुलाऊँगा- और तू भी अब मेरे सामने न आना। जा, चला जा।” इतना कहकर वह गहरे पानी में नौका ठेलकर देखते ही देखते घुमाव की तरफ अदृश्य हो गया। विस्मित, व्यथित और स्तब्ध होकर मैं निर्जन नदी के तीर पर अकेला खड़ा रह गया।♦♦ • ♦♦निस्तब्ध गम्भीर रात में पाता गंगा के किनारे बिल्कुाल अकारण ही, जब इन्द्र मुझे बिल्कुसल अकेला छोड़कर चला गया, तब मैं रुलाई को और न सँभाल सका। उसे मैं प्यार करता हूँ, इसका उसने कोई मूल्य ही नहीं समझा। दूसरे के घर में रहते हुए कठोर शासन-जाल की उपेक्षा करके, उसके साथ गया, इसकी भी उसने कोई कद्र नहीं की। सिवाय इसके, मुझे अपशकुनिया अकर्मण्य कहकर और अकेले असहाय अवस्था में विदा करके, बेपरवाही से चला गया। उसकी यह निष्ठुरता मुझे कितनी अधिक चुभी इसको बताने की चेष्टा करना भी निरर्थक है। इसके बाद, बहुत दिनों तक न उसने मुझे खोजा और न मैंने ही उसे। दैवात् यदि कभी राह-घाट में मिल भी जाता तो मैं इस तरह मुँह मोड़कर चला जाता मानो उसे देखा ही न हो। किन्तु मेरा यह 'मानो' मुझे ही हमेशा तुस की आग की तरह जलाया करता, उसकी जरा-सी भी हानि न कर सकता। लड़कों के दल में उसका बड़ा सम्मान था। फुटबाल-क्रिकेट का वह दलपति था, जिमनास्टिक अखाड़े का मास्टर था। उसके कितने ही अनुचर थे, और कितने ही भक्त। मैं तो उसकी तुलना में कुछ भी न था। फिर-क्यों वह दो ही दिन के परिचय में मुझे 'मित्र' कहने लगा और फिर क्यों उसने त्याग दिया? परन्तु जब उसने त्याग दिया तब मैं भी जबर्दस्ती करके उससे सम्बन्ध जोड़ने नहीं गया।मुझे खूब याद है कि मेरे संगी-साथी जब इन्द्र का उल्लेख करके उसके सम्बन्ध में तरह-तरह की अद्भुत अचरजभरी बातें कहना शुरू कर देते, तब मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहता। छोटी-सी बात कहकर भी मैंने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वह मुझे जानता है अथवा उसके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूँ। न जाने कैसे मैं उस उम्र में ही यह जान गया था कि 'बड़े' और 'छोटे' की दोस्ती का परिणाम प्राय: ऐसा ही होता है। भविष्य जीवन में मैं भाग्यवश अनेक 'बड़े' मित्रों के संसर्ग में आऊँगा इसलिए, शायद, भगवान ने दया करके यह सहज-ज्ञान मुझे दे दिया था जिससे कि मैं कभी किसी भी कारण से अपनी अवस्था का अतिक्रमण करके अर्थात् अपनी योग्यता का खयाल किये बिना मित्रता का मूल्य ऑंकने न जाऊँ। नहीं तो देखते-देखते 'मित्र' प्रभु बन जाता है, और साध की 'मित्रता' का पाश दासत्व की बेड़ी बनकर 'छोटे' के पैरों को जकड़ लेता है। यह दिव्यज्ञान इतने सहज में और इस तरह सत्य रूप में मुझे प्राप्त हो गया था कि इसमें मैं हमेशा के लिए अपमान और लांछनाओं से छुटकारा पा गया हूँ।तीन-चार महीने कट गये। दोनों ने ही दोनों को त्याग दिया- भले ही इसकी वेदना किसी पक्ष के लिए कितनी ही निदारुण क्यों न हो; किसी ने किसी की भी खोज-खबर नहीं ली।दत्त-परिवार के घर में काली-पूजा के उपलक्ष्य में उस मुहल्ले का शौकिया नाटक-स्टेज तैयार हो रहा था। 'मेघनाद वध' का अभिनय होने वाला था। इसके पहले देहात में यात्रा¹ तो अनेक बार देखी थी किन्तु नाटक अधिक नहीं देखे थे। मैंने सारे दिन न नहाया, न खाया और न विश्राम ही किया। स्टेज बनाने में सहायता कर सकने से ही मैं मानो बिल्कुतल कृतार्थ हो गया था। इतना ही नहीं, जो सज्जन राम का अभिनय करने वाले थे, उन्होंने स्वयं मुझसे उस दिन एक रस्सी पकड़े रहने के लिए कहा था। इसलिए मुझे बड़ी आशा थी कि रात्रि में जब लड़के कनात के छेदों में से अन्दर ग्रीन-रूम में ढूँकेंगे और मार तथा लाठी के हूले खायँगे, तब मैं 'श्रीराम' की कृपा से बच जाऊँगा। शायद, वे मुझे देखकर भीतर भी एकाध बार जाने दें। किन्तु हाय रे दुर्भाग्य! सारे दिन जी-जान लगाकर जो परिश्रम किया, संध्यान के बाद उसका कुछ भी पुरस्कार नहीं मिला। घण्टों ग्रीन-रूम के द्वार पर खड़ा रहा, 'रामचन्द्र' कितने ही बार आए और गये; किन्तु, उन्होंने मुझे न पहिचाना। एक बार पूछा भी नहीं कि मैं इस तरह खड़ा क्यों हूँ। हाय रे! अकृतज्ञ राम! क्या रस्सी पकड़वाने का मतलब भी तुम्हारा एकबारगी समाप्त हो गया?¹ बंगाल में जो दृश्य-पट हीन अभिनय होते हैं, उन्हें 'यात्रा' कहते हैं, जैसे कि यहाँ पर रामलीला होती है।रात्रि के दस बजे नाटक की पहली घण्टी बजी। नितान्त खिन्न चित्त से, सारे व्यापार के प्रति श्रद्धाहीन होकर, परदे के सामने ही एक जगह पर मैंने दखल जमाया और वहीं बैठ गया। किन्तु थोड़ी ही देर में सारा रूठना भूल गया। कैसा सुन्दर नाटक था! जीवन में मैंने बहुत-से नाटक देखे हैं, किन्तु वैसा कभी नहीं देखा। मेघनाद स्वयं एक अद्भुत तमाशा था। उसकी छह हाथ ऊँची देह और चार-साढ़े चार हाथ पेट का घेरा था। सभी कहते थे कि यदि यह मर गया तो बैलगाड़ी पर ले जाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं। बहुत दिनों की बात हो गयी। मुझे सारी घटना का स्मरण नहीं है। किन्तु इतना स्मरण है, कि उसने उस दिन जो विक्रम दिखाया वह हमारे देस के हारान पलसाई भीम के अभिनय में सागौन की डाल कन्धों पर रखकर दाँत किड़मिड़ाकर भी नहीं दिखा सकते।ड्रॉप सीन उठा। जान पड़ा- वे लक्ष्मण ही होंगे-थोड़ा-बहुत वीरत्व प्रकाश कर रहे हैं। इसी समय वही मेघनाद कहीं से एक छलाँग मारकर सामने आ धमका। सारा स्टेज चरमराकर काँप उठा, फूट-लाइट के पाँच-छ: गोले उलटकर बुझ गये- और साथ ही साथ उसका खुद का पेट बाँधने का जरी का कमरपट्टा भी तड़ाक से टूट गया! एक हलचल सी मच गयी। उसे बैठ जाने के लिए कई लोग तो भयभीत चीत्कार कर उठे, और कई लोग सीन ड्राप कर देने के लिए चिल्ला उठे- परन्तु बहादुर मेघनाद, किसी की भी किसी बात से, विचलित नहीं हुआ। बाएँ हाथ के धनुष को फेंककर उसने पटलून को थाम लिया और दाहिने हाथ से केवल तीरों से ही युद्ध करना शुरू किया।धन्य वीर! धन्य वीरत्व! मानता हूँ कि मैंने तरह-तरह के युद्ध देखे हैं किन्तु हाथ में धनुष नहीं, बाएँ हाथ की अवस्था भी युद्ध-क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं-फिर भी केवल दाहिने हाथ और सिर्फ तीरों से लगातार लड़ाई क्या कभी किसी ने देखी है! अन्त में उसी की जीत हुई। शत्रु को भागकर आत्म-रक्षा करनी पड़ी।आनन्द की सीमा नहीं थी, मग्न होकर देख रहा था और मन ही मन इस विचित्र लड़ाई के लिए उसकी शत-कोटि प्रशंसा कर रहा था। ऐसे ही समय पीठ के ऊपर अंगुली का दबाव पड़ा। मुँह घुमाकर देखा तो इन्द्र।वह धीरे-से बोला, “बाहर आ श्रीकान्त- जीजी तुझे बुलाती हैं।” बिजली के द्वारा छू जाने के समान मैं सीधा खड़ा हो गया और बोला, “क्हाँ हैं वे?”“बाहर तो आ, कहता हूँ।” रास्ते पर आने पर वह, सिर्फ 'मेरे साथ चल' कहकर चलने लगा।गंगा के घाट पर पहुँचकर देखा, उसकी नाव बँधी हुई है- चुपचाप हम दोनों उस पर जा बैठे, इन्द्र ने बन्धन खोल दिया।फिर उसी अन्धकारपूर्ण जंगल के रास्ते से होते हुए दोनों जने शाहजी की कुटी में जा पहुँचे। उस समय, शायद रात्रि अधिक बाकी नहीं थी।किरासिन का एक दीपक जलाए जीजी बैठी हुई थीं। उनकी गोद में शाहजी का सिर रक्खा हुआ था और उनके पैरों के पास एक बड़ा लम्बा काला साँप पड़ा था।जीजी ने कोमल स्वर में सारी घटना संक्षेप में कह सुनाई। आज दोपहर को किसी के घर से साँप पकड़ने का बुलावा आया था। वहाँ इस साँप को पकड़ने में जो इनाम मिला उसने उससे ताड़ी लेकर पी ली और चढ़े नशे में संध्यां के कुछ पहले घर लौट आया। फिर जीजी के बार-बार मना करने पर भी वह उस साँप को खिलाने के लिए उद्यत हुआ और देर तक खिलाता भी रहा। परन्तु अन्त में खेल को समाप्त करने के पहले, जब वह उसे पूँछ पकड़कर हंडी में बन्द करने लगा तब नशे की झोंक में आकर ज्यों ही उसके मुख को अपने मुख के पास लाकर, चुम्बन करके, अपना प्यार प्रकट करने गया, त्यों ही उसने भी अपना प्यार व्यक्त करने को शाहजी के गले पर तीव्र चुम्बन अंकित कर दिया।जीजी ने अपने मैले ऑंचल के छोर से अपनी ऑंखें पोंछते हुए मुझे लक्ष्य करके कहा, “श्रीकान्त, उसी समय उसे ज्ञात हुआ कि अब समय अधिक नहीं है। तब उन्होंने यह कहकर कि 'आ रे, अब हम दोनों इस दुनिया से एक साथ ही कूच करें' साँप के सिर को पैर के नीचे दबा लिया और दोनों हाथों से उसकी पूँछ खींचकर इतना लम्बा करके फेंक दिया। इसके बाद दोनों का ही 'खेल' समाप्त हो गया!” इतना कहकर उन्होंने, हाथ से अत्यन्त वेदना के साथ, शाहजी के मुख के ऊपर का कपड़ा दूर कर दिया और बहुत सावधानी से उसके नीले होठों को अपने हाथ से स्पर्श करके कहा, “जाने दो, अच्छा ही हुआ इन्द्रनाथ, भगवान को मैं तनिक भी दोष नहीं देती।”हम दोनों में से किसी से भी बोलते न बन पड़ा। उस कण्ठ-स्वर में जो मर्मान्तिक वेदना, जो प्रार्थना और जो घना अभिमान प्रकाशित हुआ, उसे जिसने सुना उसके लिए, भूल जाना इस जीवन में कभी सम्भव नहीं, किन्तु किसके लिए था यह अभिमान! और प्रार्थना भी किसके लिए?कुछ देर स्थिर रहकर वे बोलीं, “तुम लोग अभी बच्चे हो, किन्तु, दोनों को छोड़कर मेरा तो कोई और है नहीं भाई; इसीलिए तुमसे भिक्षा माँगती हूँ कि इनका कुछ उपाय कर जाओ!” फिर अंगुली से कुटी के दक्षिण ओर के जंगल को बताकर कहा, “वहाँ पर जगह है। इन्द्रनाथ, बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि यदि मैं मर जाऊँ तो उसी जगह जा सोऊँ। सुबह होते ही उसी जगह ले जाकर इन्हें सुला देना। इस जीवन में इन्होंने अनेक कष्ट भोगे हैं- वहाँ कुछ शान्ति पाएँगे।”इन्द्र ने पूछा, “शाहजी क्या बर में दफनाए जाँयगे!”जीजी बोलीं, “मुसलमान जब हैं तब कब्र में ही दफनाना होगा भाई!”इन्द्र ने पुन: पूछा, “जीजी, क्या तुम भी मुसलमान हो?”जीजी बोली, “हाँ, मुसलमान नहीं तो और क्या हूँ?”उत्तर सुनकर इन्द्र भी मानो कुछ संकुचित और कुण्ठित हो उठा। उसके चेहरे के भाव से अच्छी तरह देख पड़ता था कि इस जवाब की उसने आशा नहीं की थी। जीजी को वह दरअसल चाहता था। इसीलिए मन ही मन वह एक गुप्त आशा पोषण कर रहा था कि उसकी जीजी उसी के समाज की एक स्त्री है। परन्तु मुझे उनके कहने पर विश्वास नहीं हुआ। खुद उनके मुँह से स्वीकारोक्ति सुनकर भी मेरे मन में यह बात न बैठी कि वे हिन्दू-कन्या नहीं हैं।बाकी रात भी कट गयी। इन्द्र निर्दिष्ट स्थान में जाकर कब्र खोद आया और हम तीनों जनों ने ले जाकर शाहजी की मृत देह को समाहित कर दिया। गंगाजी के ठीक ऊपर, कंकरों का एक कगारा, टूटकर, मानो किसी की ठीक अन्तिम शय्या के लिए ही अपने आप यह जगह बन गयी थी। 20-25 हाथ नीचे ही जाद्रवी मैया की धारा थी- और सिर से ऊपर वन्य-लताओं का आच्छादन। किसी प्रिय वस्तु को सावधानी से लुका रखने के लिए मानो यह स्थान बनाया गया था। बड़े ही भाराक्रान्त हृदय से हम तीनों जनें पास ही बैठे- और एक जन हमारी गोद के ही पास मिट्टी के नीचे चिर-निद्रा में अभिभूत होकर सो गया। तब भी सूर्योदय नहीं हुआ था- नीचे से मन्द-स्रोता भागीरथी का कलकल शब्द कानों में आने लगा- सिर के ऊपर, आसपास, वन के पक्षी प्रभाती गाने लगे। कल जो था आज वह नहीं है। कल सुबह क्या यह सोचा था कि आज रात इस तरह बीतेगी? कौन जानता था कि एक मनुष्य का शेष मुहूर्त इतने निकट आ पहुँचा है?हठात् जीजी उसकी कब्र पर लेट गयी और विदीर्ण कण्ठ से चिल्लाकर रो पड़ी, “माँ गंगा, मुझे भी अपने चरणों में स्थान दो, मेरे लिए अब और कहीं जगह नहीं है।” उनकी यह प्रार्थना, वह निवेदन, कितना मर्मान्तिक सत्य था यह उस दिन मैं उतनी तीव्रता से अनुभव नहीं कर सका था जितना कि उसके दो दिन बाद कर सका। इन्द्र ने एक बार मेरी ओर ऑंखें उठाकर देखा, इसके बाद उस आर्त्त-स्वर में कहा, “जीजी, तुम मेरे यहाँ चलो- मेरी माँ अब भी जीती हैं, वे तुम्हें फेंकेंगी नहीं, अपनी गोद में उठा लेंगी। वे प्रेम-मूर्ति हैं, एक बार चलकर तुम सिर्फ उनके सामने खड़ी भर हो जाना। चलो, तुम हिन्दू ही की लड़की हो जीजी, मुसलमानिन किसी तरह भी नहीं!”जीजी कुछ बोली नहीं, कुछ देर उसी तरह मूर्च्छित-सी पड़ी रहीं और अन्त में उठ बैठीं। इसके बाद उठकर हम तीनों ने गंगा-स्नान किया। जीजी ने हाथ की चूड़ियाँ और सुहाग की कण्ठी तोड़कर गंगा में बहा दी। मिट्टी से मस्तक का सिन्दूर पोंछकर, सद्य-विधवा के वेष में सूर्योदय के साथ ही साथ वे कुटी में लौट आईं।इतने दिनों बाद पहले-पहल आज उन्होंने कहा कि शाहजी उनका पति था किन्तु, इन्द्र के मन में यह बात अच्छी तरह जमकर बैठती ही नहीं थी। संदिग्ध स्वर से उसने प्रश्न किया, “किन्तु तुम तो हिन्दू की लड़की हो जीजी?”जीजी बोली, “हाँ, ब्राह्मण की लड़की हूँ और वे भी ब्राह्मण थे।”इन्द्र कुछ देर अवाक् हो रहा, फिर बोला, “उन्होंने अपनी जात क्यों छोड़ दी?”जीजी बोली, “सो बात मैं अच्छी तरह नहीं जानती भाई। किन्तु जब उन्होंने अपनी जात खो दी, तो उसके साथ मेरी भी खो गयी। स्त्री सहधर्मिणी जो है! नहीं तो वैसे मैंने अपने हाथों अपनी जाति भी नहीं छोड़ी- और किसी दिन किसी तरह का अनाचार भी नहीं किया।”इन्द्र गाढ़े स्वर में बोला, “सो तो मैं देखता हूँ जीजी! इसीलिए तो जब तब मेरे मन में यही बात आती रही है, मुझे माफ करना जीजी- तुम कैसे यहाँ आ पड़ीं, तुम्हारी किस तरह ऐसी दुर्बुद्धि हुई। परन्तु अब मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूँगा, मेरे घर तुम्हें चलना ही पड़ेगा। चलो, इसी वक्त चलो।”जीजी देर तक चुपचाप मानो कुछ सोचती रहीं, फिर मुँह उठाकर धीरे-धीरे बोलीं, “अभी मैं कहीं भी जा न सकूँगी, इन्द्रनाथ।”“क्यों नहीं जा सकोगी जीजी?”जीजी बोलीं, “मुझे मालूम है कि वे कुछ 'देना' कर गये हैं। जब तक उसे चुका न दूँ, तब तक मैं कहीं हिल नहीं सकती।”इन्द्र हठात् क्रुद्ध हो उठा, बोला, “सो तो मैं भी जानता हूँ। ताड़ी की दुकान का, गाँजे की दुकान का जरूर कुछ देना होगा; किन्तु इससे तुम्हें क्या? किसकी ताकत है कि तुमसे रुपया माँगे? चलो तुम मेरे साथ, देखूँ कौन रोकता है तुम्हें?”इतने दु:ख में भी जीजी को कुछ हँसी आ गयी। बोलीं, “अरे पागल, मुझे रोकने वाला मेरा खुद का ही धर्म है। पति का ऋण मेरा खुद का ही ऋण है और उन लेने वालों को तुम किस तरह रोक सकोगे भाई? यह नहीं हो सकता। आज तुम लोग घर जाओ- मेरे पास जो कुछ थोड़ा-बहुत है, उसे बेच-बाच कर कर्ज चुकाने की कोशिश करूँगी। कल-परसों फिर किसी दिन आना।”इतनी देर मैं चुपचाप ही था। इस बार बोला, “जीजी, मेरे पास घर में और भी चार-पाँच रुपये पड़े हैं- ले आऊँ क्या?” बात पूरी भी न होने पाई थी कि वे उठकर खड़ी हो गयी और छोटे बच्चे की तरह मुझे अपनी छाती से लगाकर, मेरे मस्तक पर अपने होंठ छुआकर, मेरे मुँह की ओर प्रेम से देखती हुई बोलीं, “नहीं भइया, और लाने को जरूरत नहीं है। उस दिन तुम पाँच रुपये रख गये थे, तुम्हारी वह दया मैं मरने तक याद रखूँगी, भइया! आशीर्वाद दिये जाती हूँ कि भगवान सदा तुम्हारे हृदय के भीतर बसें और इसी तरह दुखियों के लिए ऑंसू बहाते रहें।” बोलते-बोलते ही उनकी ऑंखों से झर-झर नीर झरने लगा।करीब आठ-नौ बजे हम घर जाने को तैयार हुए। उस दिन वे साथ-साथ रास्ते तक पहुँचाने आयीं। जाते समय इन्द्र का एक-हाथ पकड़कर बोलीं, “इन्द्रनाथ, श्रीकान्त को तो आशीर्वाद दे दिया, किन्तु तुम्हें आशीर्वाद देने का साहस मुझ में नहीं है। तुम मनुष्य के आशीर्वाद के परे हो। इसलिए मैंने आज मन ही मन तुम्हें भगवान के श्रीचरणों में सौंप दिया है। वे तुम्हें अपना लें।”इन्द्र को उन्होंने पहिचान लिया था। रोकते हुए भी इन्द्र ने उनके पैरों की धूलि सिर पर लेकर प्रणाम किया और रोते-रोते कहा, “जीजी, इस जंगल में तुम्हें अकेली छोड़ जाने को मेरा किसी तरह साहस नहीं होता। मन में न जाने क्यों, ऐसा लगता है कि मैं तुम्हें और न देख पाऊँगा!”जीजी ने उनका कुछ जवाब नहीं दिया, सहसा मुँह फेरकर ऑंखें पोंछती हुईं वे उसी वन-पथ से अपनी शोक से ढँकी हुई उस शून्य कुटी में लौट गयीं। जहाँ तक दिखाई देती रहीं वहाँ तक मैं उनकी ओर देखता रहा। किन्तु उन्होंने एक बार भी लौटकर नहीं देखा-उसी तरह, मस्तक नीचा किये, एक ही भाव से चलती हुई वे दृष्टि से ओझल हो गयीं और तब, उन्होंने लौटकर क्यों नहीं देखा, इसे मन ही मन हम दोनों ही जनों ने अनुभव किया।तीन दिन बाद स्कूल की छुट्टी होते ही बाहर आकर देखा कि इन्द्रनाथ फाटक के बाहर खड़ा है। उसका मुँह अत्यन्त शुष्क हो रहा था, पैरों में जूते नहीं थे और वे घुटनों तक धूल में भरे हुए थे। उस अत्यन्त दीन चेहरे को देखकर मैं भयभीत हो गया। वह बड़े आदमी का लड़का था और साधारणतया बाहर से कुछ शौकीन भी था। ऐसी अवस्था में मैंने उसको कभी नहीं देखा था और मैं समझता हूँ कि और किसी ने भी न देखा होगा। इशारा करके मुझे मैदान की ओर ले जाकर उसने कहा, “जीजी नहीं हैं। कहीं चली गयीं। मेरे मुँह की ओर उसने ऑंख उठाकर भी नहीं देखा। बोला, “कल से कितनी जगह जाकर मैं खोज आया हूँ, परन्तु कहीं वे नहीं दिखाई दीं। तेरे लिए वे एक चिट्ठी लिखकर रख गयी हैं; यह ले।” इतना कहकर एक मुड़ा हुआ पीला कागज मेरे हाथ में थमाकर वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ दूसरी ओर चल दिया। जान पड़ा कि हृदय उसका इतना पीड़ित, इतना शोकातुर हो रहा था कि किसी के साथ आलोचना करना उसके लिए असाध्यक था।उसी जगह मैं धम से बैठ गया और घड़ी खोलकर उस कागज को मैंने अपनी ऑंखों के सामने रखा। उसमें जो कुछ लिखा था, इतने समय बाद, यद्यपि वह सब याद नहीं रहा है फिर भी बहुत-सी बातें याद कर सकता हूँ- लिखा था, “श्रीकान्त, जाते समय मैं तुम लोगों को आशीर्वाद दिए जाती हूँ। केवल आज ही नहीं, जितने दिन जीऊँगी तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी। किन्तु मेरे लिए तुम दु:ख मत करना। इन्द्रनाथ मुझे ढूँढ़ता फिरेगा, यह मैं जानती हूँ; किन्तु तुम उसे समझाकर रोकना। मेरी सब बातें तुम आज ही नहीं समझ सकोगे; किन्तु, बड़े होने पर एक दिन अवश्य समझोगे, इस आशा से यह पत्र लिखे जा रही हूँ। अपनी कहानी अपने ही मुँह से तुमसे कह जा सकती थी, परन्तु, न जाने क्यों, नहीं कह सकी; कहूँ-कहूँ सोचते हुए भी न जाने क्यों चुप रह गयी। परन्तु, यदि आज न कह सकी तो फिर कभी कहने का मौका न मिलेगा।“मेरी कहानी सिर्फ मेरी कहानी ही नहीं है भाई- मेरे स्वामी की कहानी भी है। और फिर, वह भी कुछ अच्छी कहानी नहीं है। मेरे इस जन्म के पाप कितने हैं, सो तो मैं नहीं जानती; किन्तु पूर्व जन्म के संचित पापों की कोई सीमा-परिसीमा नहीं, इसमें जरा भी सन्देह नहीं। इसीलिए, जब-जब मैंने कहना चाहा है तब-तब मेरे मन में यही आया है कि स्त्री होकर, अपने मुँह से, पति की निन्दा करके, उस पाप के बोझ को और भी भाराक्रान्त नहीं करूँगी। किन्तु, अब वे परलोक चले गये। और परलोक चले गये इसलिए उसके कहने में कोई दोष नहीं है, यह मैं नहीं मानती। फिर भी, न जाने क्यों, अपनी इस अन्तविहीन दु:ख-कथा को तुम्हें जनाए बगैर, मैं किसी तरह भी विदा लेने में समर्थ नहीं हो रही हूँ।“श्रीकान्त, तुम्हारी इस दु:खिनी जीजी का नाम अन्नदा है। पति का नाम क्यों छिपा रही हूँ, इसका कारण, इस लेख को, शेष पर्यन्त पढ़ने के बाद, मालूम होगा।“मेरे पिता बड़े आदमी हैं। उनके कोई लड़का नहीं है। हम सिर्फ दो बहनें थीं। इसीलिए, मेरे पिता ने मेरे पति को एक दरिद्र के घर से लाकर, अपने पास रखकर, पढ़ा-लिखाकर 'आदमी' बनाना चाहा था। वे उन्हें पढ़ा-लिखा तो अवश्य सके, किन्तु 'आदमी' नहीं बना सके। मेरी बड़ी बहन विधवा होकर घर ही रहती थी- उसी की हत्या करके वे एक दिन लापता हो गये। यह दुष्ट कर्म उन्होंने क्यों किया, इसका हेतु, तुम अभी बच्चे हो, इसलिए न समझ सकोगे, फिर भी किसी दिन जान लोगे। पर कहो तो श्रीकान्त, यह दु:ख कितना बड़ा है? यह लज्जा कितनी मर्मान्तिक है? फिर भी तुम्हारी जीजी ने सब कुछ सह लिया। किन्तु पति बनकर जिस अपमान की अग्नि को उन्होंने अपनी स्त्री के हृदय में जला दिया था उस ज्वाला को तुम्हारी जीजी आज तक भी बुझा नहीं सकी। पर जाने दो उस बात को-“उक्त घटना के सात वर्ष के बाद मैं उन्हें फिर देख पाई। जिस वेश में तुमनें उन्हें देखा था उसी वेश में वे हमारे घर के सामने साँप का खेल दिखा रहे थे। उन्हें और कोई तो नहीं पहिचान सका, किन्तु मैंने पहिचान लिया। मेरी ऑंखों को वे धोखा नहीं दे सके। सुना है कि यह दु:साहस उन्होंने मेरे लिए ही किया था। परन्तु यह झूठ है! फिर भी, एक दिन गहरी रात में, खिड़की का द्वार खोलकर मैंने पति के लिए ही गृह-त्याग कर दिया। किन्तु सबने यही सुना, यही जाना कि अन्नदा कुल को कलंक लगाकर घर से निकल गयी।“यह कलंक का बोझा मुझे हमेशा ही अपने ऊपर लादे फिरना होगा। कोई उपाय नहीं है क्योंकि, पति के जीवित रहते तो अपने आपको प्रकट नहीं कर सकी-पिता को पहचानती थी; वे कभी, किसी तरह भी, अपनी संतान की हत्या करने वाले को क्षमा नहीं कर सकते। किन्तु आज यद्यपि वह भय नहीं है- आज जाकर यह सब हाल उनसे कह सकती हूँ, किन्तु इस पर, इतने दिनों बाद, कौन विश्वास करेगा? इसलिए पितृ-गृह में मेरे लिए अब कोई स्थान नहीं है। और फिर, अब मैं मुसलमानिन हूँ।“यहाँ पर जो पति का कर्ज था वह सब चुक गया है। मैंने अपने पास सोने की दो बालियाँ छिपाकर रख छोड़ी थीं, उन्हें आज बेच दिया है। तुम जो पाँच रुपये एक दिन रख गये थे उन्हें मैंने खर्च नहीं किया। बड़े रास्ते के मोड़ पर जो मोदी की दुकान है, उसके मालिक के पास उन्हें रख दिया है- माँगते ही वे तुम्हें मिल जाँयगे। मन में दु:ख मत करना भइया! ये रुपये तो अवश्य मैंने लौटा दिए हैं, किन्तु तुम्हारे उस कच्चे कोमल छाटे-से हृदय को मैं अपने हृदय में रखे लिए जाती हूँ। और तुम्हारी जीजी का यह एक आदेश है श्रीकान्त, कि तुम लोग मेरी याद करके अपना मन खराब न करना। समझ लेना कि तुम्हारी जीजी जहाँ कहीं भी रहेगी अच्छी ही रहेगी। क्योंकि दु:ख सहन करते-करते उसकी यह दशा हो गयी है, कि उसके शरीर पर अब किसी भी दु:ख का असर नहीं होता। किसी तरह भी उसे व्यथा नहीं पहुँच सकती। मेरे दोनों भाइयों, तुम्हें मैं क्या कहकर आशीर्वाद दूँ, सो मैं ढूँढकर भी नहीं पा सकती हूँ। इसीलिए, केवल यही कहे जाती हूँ कि, भगवान-यदि पतिव्रता स्त्री की बात रखते हैं तो, वे तुम लोगों की मैत्री चिरकाल के लिए अक्षय करेंगे। -तुम्हारी जीजी, अन्नदा।” Chapter 2The feet did not rise, yet somehow, walking along the banks of the Ganges, reached home early in the morning with red eyes and very dry mouth. It was like a ceremony. "It came! It came!" By saying that everyone together is one self.


❣️श्रीकांत"❣️

अध्याय 2

पैर उठते ही न थे, फिर भी किसी तरह गंगा के किनारे-किनारे चलकर सवेरे लाल ऑंखें और अत्यन्त सूखा म्लान मुँह लेकर घर पहुँचा। मानो एक समारोह-सा हो उठा। “यह आया! यह आया!” कहकर सबके सब एक साथ एक स्वर में इस तरह अभ्यर्थना कर उठे कि मेरा हृत्पिण्ड थम जाने की तैयारी करने लगा।

जतीन करीब-करीब मेरी ही उम्र का था। इसलिए आनन्द भी उसका सबसे प्रचण्ड था। वह कहीं से दौड़ता हुआ आया और “आ गया श्रीकान्त- यह आ गया, मँझले भइया!” इस प्रकार के उन्मत्त चीत्कार से घर को फाड़ता हुआ मेरे आने की बात घोषित करने लगा और मुहूर्त भर का भी विलम्ब किये बगैर, उसने परम आदर से मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुए मुझे बैठकखाने के पायंदाज पर ला खड़ा किया।

वहाँ पर मँझले भइया गहरा मन लगाए परीक्षा पास करने का पाठ पढ़ रहे थे। मुँह उठाकर थोड़ी-सी देर मेरे मुँह की ओर देखकर उन्होंने फिर पढ़ने में अपना मन लगा दिया अर्थात् बाघ, शिकार को अपने अधिकार में कर लेने के उपरान्त, निरापद स्थान में बैठकर, जिस तरह दूसरी तरफ अवहेलना भरी दृष्टि से देखता है, ठीक उसी तरह उनका भाव था। दण्ड देने का इतना बड़ा महेन्द्र योग उनके भाग्य में पहले और कभी जुटा था या नहीं, इसमें सन्देह है।

मिनट-भर वे चुप रहे। सारी रात बाहर बिताने के कारण दोनों कानों और गालों पर जो कुछ बीतेगी सो मैं जानता था। किन्तु, अब और अधिक देर खड़ा भी न रह सकता था और उधर 'कर्म-कर्ता' को भी तो फुरसत नहीं थी। वे भी तो परीक्षा पास करने की तैयारी में लगे थे!

हमारे इन मँझले भइया को आप शायद इतने जल्दी भूले न होंगे। ये वही हैं जिनकी कठोर देख-रेख में कल शाम को हम सब पाठाभ्यास कर रहे थे और क्षण-भर बाद ही, जिनके सुगम्भीर 'ओं-ओं' शब्द और चिरागदान उलटा देने की चोट से गत रात्रि उस 'दि रॉयल बेंगाल' को भी दिग्भ्रमित होकर एक दफा अनार के वृक्ष पर आश्रय लेना पड़ा था।

'पंचाँग तो देख रे सतीश, आज इस बेला बैंगन खाना अच्छा है या नहीं।” कहती हुई पास के द्वार को खोलकर बुआजी ने जैसे ही घर में पैर रक्खा वैसे ही मुझे देखकर वे अवाक् हो गयी। “कब आया रे? कहाँ चला गया था? धन्य है लड़के तुझे- सारी रात नींद नहीं आई- सोच सोचकर मर गयी- उस इन्द्र के साथ चुपके-से जो बाहर गया, सो फिर दिखाई ही नहीं दिया। न खाना, न पीना; कहाँ था बोल तो रे अभागे। मुख स्याह हो गया है, ऑंखें लाल छलछला रही हैं-कहती हूँ, ज्वर तो नहीं चढ़ आया है? जरा पास में तो आ, देखूँ तो ऑंग।” एक साथ इतने बहुत से प्रश्न करने के उपरान्त बुआ स्वयं ही आगे बढ़कर, मेरे कपाल पर हाथ देकर ही बोल उठीं, “जो सोचा था आखिर वही हुआ न! ऑंग खूब गरम है। ऐसे लड़कों के तो हाथ-पैर बाँधकर जल-बिछुआ लगा दिया जाय, तभी जी शान्त हो! तुझे घर से बिल्कुील बिदा करके ही अब और कुछ करूँगी। चल, भीतर चलकर सो जा, पाजी!” वे बैंगन-खाने के प्रश्न को बिल्कुथल ही भूल गयीं। उन्होंने हाथ पकड़कर मुझे अपनी गोद में खींच लिया।

मँझले भइया ने बादलों के समान गम्भीर कण्ठो से संक्षेप में कहा, “अभी वह न जा सकेगा।”

“क्यों, यहाँ क्या करेगा? नहीं, नहीं, इस समय, अब इसका पढ़ना-लिखना न होगा। पहले दो कौर खाकर थोड़ा सो ले। आ मेरे साथ।” कहकर बुआजी मुझको लेकर चलने लगीं।

किन्तु शिकार जो हाथ से निकला जाता था! मँझले भइया स्थान-काल भूल गये, जोर से चिल्ला उठे और धमकाकर बोले, “खबरदार कहता हूँ, यहाँ से मत जा, श्रीकान्त! बुआ तब कुछ चौंक उठीं। इसके बाद मुँह फेर मँझले भइया की ओर देखकर केवल इतना ही बोलीं, “सतीऽऽ!”

बुआजी गम्भीर प्रकृति की औरत थीं। सारा घर उनसे डरता था। मँझले भइया तो बस उस एक तीखी नजर से ही भय के मारे सिटपिटा गये। और फिर, पास ही के कमरे में बड़े भाई भी बैठे थे। बात कहीं उनके कान तक गयी तो फिर खैर नहीं थी।

बुआजी का एक स्वभाव हम लोग हमेशा से देखते आ रहे थे। कभी किसी भी कारण वे शोरगुल करके लोगों को इकट्ठा करना पसन्द नहीं करती थीं। हजार गुस्सा होने पर भी वे कभी जोर से नहीं बोलती थीं। वे बोलीं, “जान पड़ता है, तेरे ही डर से यह यहाँ खड़ा है। देख सतीश, जब तब सुना करती हूँ कि तू बच्चों को मारता-पीटता है। आज से यदि कभी किसी को हाथ भी लगाया, और मुझे मालूम हो गया; तो इसी खम्भे से बँधवाकर नौकर के हाथ तुझे बेंत लगवाऊँगी। बेहया खुद तो हर साल फेल हुआ करता है- और फिर दूसरों पर रुआब गाँठता है! कोई पढ़े चाहे न पढ़े, आगे से तू किसी से भी कुछ पूछ न सकेगा!”

इतना कहकर, जिस रास्ते आई थीं कि उसी रास्ते मुझे लेकर वे चली गयी। मँझले भइया अपना-सा मुँह लिये बैठे रहे। यह बात मँझले भइया भली-भाँति जानते थे कि इस आदेश की अवहेलना करना किसी के वश की बात नहीं है।

मुझे अपने साथ ले बुआ अपने कमरे में आयीं, मेरे कपड़े बदलवाए, पेट भरकर गरम-गरम जलेबियाँ खिलाईं, बिस्तर पर सुला दिया और यह बात अच्छी तरह जताकर, बाहर से साँकल लगाकर, चली गयी कि मैं मर जाऊँ तो उनके हाड़ जुड़ा जाएँ!

पाँचेक मिनट के बाद खट-से साँकल खोलकर छोटा भाई हाँफता-हाँफता आया और मेरे बिछौने पर आकर पट पड़ गया। आनन्द के अतिरेक से पहले तो वह बात भी न कर सका, फिर थोड़ा 'दम' लेकर फुसफुसाकर बोला, “मँझले भइया को माँ ने क्या हुक्म दिया है, जानते हो? हम लोगों के किसी भी काम में पड़ने की उन्हें अब जरूरत नहीं है। अब तुम और मैं दोनों एक कमरे में पढ़ेंगे- मँझले भइया की हम जरा भी 'केयर' (परवाह) न करेंगे।” इतना कहकर उसने अपने दोनों हाथों के अंगूठे एकत्र करके जोर से नचा दिए।

तीन भी पीछे-पीछे आकर हाजिर हो गया। यह अपनी कारगुजारी की उत्तेजना में एकबारगी अधीर हो रहा था और छोटे भाई को यह सुसमाचार देकर यहाँ खींच लाया था। पहले तो वह कुछ देर तक खूब हँसता रहा। फिर हँसना बन्द करके अपनी छाती बारम्बार ठोंककर बोला, “मैं! मैं!! मेरे ही सबब से यह सब हुआ है, सो क्या तुम नहीं जानते? मैं यदि इसे (मुझे) मँझले भइया के सामने न ले गया होता तो क्या माँ ऐसा हुक्म देतीं? पर छोटे भइया, तुम्हें अपना कलदार लट्टू मुझे देना होगा सो कहे देता हूँ।”, “अच्छा दिया। ले आ, जा, मेरे डेस्क में से।” छोटे भाई ने उसी क्षण हुक्म दे डाला। किन्तु उसी लट्टू को घण्टे भर पहले शायद वह पृथ्वी की सारी सम्पत्ति के बदले भी न दे सकता।

सा ही मूल्य होता है, मनुष्य की स्वाधीनता का। व्यक्तिगत न्याय अधिकारों को प्राप्त करने का ऐसा ही आनन्द होता है। आज मुझे बार-बार खयाल आता है कि बच्चों के निकट भी उसकी अमूल्यता बिन्दुभर भी कम नहीं है। मँझले भइया, बड़े होने के कारण, स्वेच्छाचार से, अपने से छोटों के जिन समस्त अधिकारों को ग्रास कर बैठे थे, उन्हें फिर से प्राप्त करने के सौभाग्य लाभ से छोटे भाई ने अपनी प्राणों से भी प्रिय वस्तु बिना संकोच के दे डाली। दरअसल मँझले भइया के अत्याचारों की सीमा न थी। रविवार को कड़ी-दुपहरी में एक मील का रास्ता नापकर, उनके ताश खेलनेवाले दोस्तों को बुलाने जाना पड़ता था। गर्मी की छुट्टियों में, दिन में जब तक वे सोते रहते थे तब तक पंखा झलना पड़ता था। सर्दी के दिनों में, जब वे लिहाफ के भीतर हाथ-पैर छिपाकर कछुए की तरह बैठे किताब पढ़ते थे, तब हमें बैठे-बैठे उनकी किताब के पन्ने पलट देने होते थे- यही सब उनके अत्याचार थे। और फिर 'न' कहने का भी कोई उपाय नहीं था। किसी के निकट शिकायत करने की भी ताब नहीं थी। घुणाक्षर-न्याय से भी यदि वे जान पाते तो हुक्म दे बैठते, “केशव, जा तो अपनी जाग्रफी ले आ, देखूँ तुझे पुराना सबक याद है कि नहीं। जतीन, जा तो एक अच्छी-सी झाऊ की छड़ी तोड़ ला।” अर्थात् पिटना अनिवार्य था, अतएव आनन्द की मात्रा में इन लोगों में यदि प्रतिस्पर्धा हो रही थी तो इसमें अचरज की बात ही क्या थी?

किन्तु आनन्द कितना ही क्यों न हो, अन्त में उसे स्थगित रखना आवश्यक हो गया; क्योंकि स्कूल का समय हो रहा था। मुझे तो ज्वर था, इसलिए कहीं जाना न था।

याद आता है कि उस रात को बुखार तेज हो गया और फिर, 7-8 दिन तक खाट में ही पड़े रहना पड़ा!

इसके कितने दिनों बाद स्कूल गया और फिर कितने दिनों बाद इन्द्र से भेंट हुई सो याद नहीं है; परन्तु इतना जरूर याद है कि बहुत दिनों बाद हुई। शनिवार का दिन था, जल्दी बन्द हो जाने के कारण मैं जल्दी ही स्कूल से लौट आया था। उन दिनों गंगा में पानी उतरना शुरू हो गया था और गंगा से लगे हुए एक नाले के किनारे मैं बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा था। वहाँ और भी बहुत-से आदमी मछली पकड़ रहे थे। एकाएक मैंने देखा कि एक आदमी, पास में ही सरकी के झुण्ड की आड़ में, बैठकर टपाटप मछलियाँ पकड़ रहा है। आड़ में होने के कारण वह तो अच्छी तरह दिखाई न देता था। परन्तु उसका मछली पकड़ना दिखाई पड़ता था। बहुत देर से मुझे अपनी जगह पसन्द नहीं आ रही थी। मन में सोचा कि चलो, मैं भी उसी के निकट जा बैठूँ। बंसी हाथ में लेकर मेरे एक बार घूमकर खड़े होते ही वह बोला, “मेरे दाहिनी ओर आकर बैठ जा। अच्छा तो है श्रीकान्त?” छाती धक् कर उठी। यद्यपि मैं उसका मुँह न देख पाया था तो भी- पहिचान गया कि इन्द्र है। शरीर के भीतर से बिजली का तीव्र प्रवाह बह जाने से, जो जहाँ है वह, एक मुहूर्त में, जैसे सजग हो उठा है, उसके कण्ठ-स्वर से भी मेरी वही दशा हुई। पलक मारते-मारते सर्वांग का रक्त चंचल हो उठा और उद्दाम होकर छाती पर मानो जोर-जोर से पछाड़ खाने लगा। किसी तरह भी मुँह से जरा-सा जवाब न निकला। यह बात मैं लिख तो जरूर गया हूँ किन्तु उस वस्तु को भाषा में व्यक्त करने की बात तो दूर, उसे समझना भी मेरे लिए, अत्यन्त कठिन ही नहीं, शायद असाध्यक था। क्योंकि बोलने के लिए यही बहुव्यवहृत साधारण वाक्य-राशि-जैसे हृदय का रक्त आलोड़ित हो रहा था- उद्दाम या चंचल हो रहा था, बिजली के प्रवाह के समान बह रहा था- आदि के उपयोग के सिवाय और तो कोई रास्ता है नहीं। किन्तु इससे कितना-सा व्यक्त किया जा सकता है? जो जानता नहीं उसके आगे मेरे मन की बात कितनी-सी प्रकाशित हुई? जिसने अपने जीवन में एक दिन के लिए भी यह अनुभव नहीं किया, मैं कहीं उसे यह किस तरह जताऊँ और वही इसे किस तरह जाने? जिसकी कि मैं प्रति समय याद करता रहता था- कामना करता रहता था, आकांक्षा करता रहता था और फिर भी, कहीं उससे किसी रूप में मुलाकात न हो जाय, इस भय के मारे दिन-ब-दिन सूखकर काँटा हुआ जाता था- उसी ने, इस प्रकार अकस्मात् इतने अमानवीय रूप में मेरी ऑंखों के सामने, मुझे अपने पार्श्व में आकर बैठने का अनुरोध किया! उसके पास जाकर बैठ भी गया; परन्तु फिर भी कुछ कह न सका।

इन्द्र बोला, “उस दिन वापिस आकर तूने बड़ी मार खाई- क्यों न श्रीकान्त? तुझे ले जाकर मैंने अच्छा काम नहीं किया। उसके लिए रोज मुझे बड़ा दु:ख होता है।” मैंने सिर हिलाकर कहा, “मार नहीं खाई।” इन्द्र खुश होकर बोला, “नहीं खाई? सुन रे श्रीकान्त, तेरे जाने के बाद मैंने काली माता को अनेक दफे पुकारा था जिससे तुझे कोई न मारे। काली माता बड़ी जागृत देवी हैं रे! उन्हें मन लगाकर पुकारने से कभी कोई मार नहीं सकता। माता आकर इस प्रकार भुला देती हैं कि कोई कुछ भी नहीं कर सकता।” ऐसा कहकर उसने बंसी को रख दिया और हाथ जोड़कर कपाल में लगा लिये, मानो उन्हीं को मन ही मन प्रणाम किया हो। फिर बंसी में चारा लगाकर उसे जल में डालते हुए वह बोला, “मुझे तो खयाल न था कि तुझे ज्वर आ जायेगा, यदि होता तो मैं वह भी न आने देता।”

मैंने आहिस्ते से प्रश्न किया, “क्या करते तुम?” इन्द्र बोला, “कुछ नहीं, सिर्फ जवाफूल (गुड़हल) लाकर माता के पैरों पर चढ़ा देता। उन्हें जवा फूल बड़े प्यारे हैं। जो जैसी कामना से उन्हें चढ़ाता है उसका वैसा ही फल होता है। यह तो सभी जानते हैं, क्या तू नहीं जानता?” मैंने पूछा, “तुम्हारी तबियत तो नहीं बिगड़ी थी?” इन्द्र ने आश्चर्य से कहा, “मेरी? मेरी तबियत कभी खराब नहीं होती। कभी कुछ नहीं होता।” वह एकाएक उद्दिप्त होकर बोला, “देख श्रीकान्त, मैं तुझे एक चीज सिखाए देता हूँ। यदि तू दोनों बेला खूब मन लगाकर देवी का नाम लिया करेगा, तो वे सामने आकर खड़ी हो जाँयगी- तू उन्हें स्पष्ट देख सकेगा। और फिर वे कभी तेरा बुरा न होने देंगी। तेरा कोई बाल भी बाँका न कर सकेगा- तू स्वयं जान जायेगा-फिर मेरी तरह मन चाहे वहाँ जाना, खुशी पड़े सो करना, फिर कोई चिन्ता नहीं। समझ में आया?”

मैंने सिर हिलाकर कहा, “ठीक है।” फिर बंसी में चारा लगाकर और उसे पानी में डालकर मृदु-कण्ठ से पूछा, “अब तुम किसे साथ लेकर वहाँ जाते हो?”

“कहाँ?”

“उस पार मछली पकड़ने।”

इन्द्र बंसी को उठाकर और सावधानी से पास में रखकर बोला, “अब मैं नहीं जाता।” उसकी बात सुनकर मुझे अचरज हुआ। पूछा, “उसके बाद क्या तुम एक दिन भी नहीं गये?”

'नहीं, एक दिन भी नहीं- मुझे सिर की कसम रखकर।” बात को पूरा किये बगैर ही कुछ सिटपिटाकर इन्द्र चुप हो गया।

उसके सम्बन्ध में मुझे यह बात रह-रहकर काँटे जैसी चुभती रही है। किसी तरह भी उस दिन की वह मछली बेचने की बात भूल न सका था, इसलिए यद्यपि वह चुप हो रहा पर मैं न रह सका। मैंने पूछा, “किसने तुम्हें सिर की कसम रखाई भाई? तुम्हारी माँ ने?”

“नहीं, माँ ने नहीं।” कहकर इन्द्र फिर चुप हो रहा। बंसी में धीरे-धीरे डोरी लपेटता हुआ बोला, “श्रीकान्त, अपनी उस रात की बात घर में तूने किसी से कही तो नहीं?”

'नहीं, किन्तु यह सभी जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ चला गया था।”

इन्द्र ने और कोई प्रश्न न किया। मैंने सोचा था कि अब वह उठेगा। किन्तु वह नहीं उठा, चुप बैठा रहा। उसके मुँह पर हमेशा हँसी का-सा भाव रहता था, परन्तु इस समय वह नहीं था। मानो, वह कुछ मुझसे कहना चाहता हो और किसी कारण, कुछ न कह सकता हो, तथा साथ ही, बिना कुछ कहे रहा भी न जाता हो- बैठे-बैठे भी मानो वह आकुलता का अनुभव कर रहा हो। आप लोग शायद यह कह बैठेंगे कि, “यह तो बाबू, तुम्हारी बिल्कु।ल मिथ्या बात है, इतना मनस्तत्व आविष्कार करने की उम्र तो वह तुम्हारी नहीं थी।” मैं भी इसे स्वीकार करता हूँ। किन्तु आप लोग भी इस बात को भूले जाते हैं कि मैं इन्द्र को प्यार करता था; एक आदमी दूसरे के मन की बात को जान सकता है तो केवल सहानुभूति और प्यार से- उम्र और बुद्धि से नहीं। संसार में जिसने प्यार किया है, दूसरे के मन की भाषा उसके आगे उतनी ही व्यक्त हो उठी है। यह अत्यन्त कठिन अन्तर्दृष्टि सिर्फ प्रेम के ज़ोर से ही प्राप्त की जा सकती है, और किसी तरह नहीं। उसका प्रमाण देता हूँ।

इन्द्र ने मुँह उठाकर मानो कुछ बोलना चाहा परन्तु बोल न सकने से उसका समस्त मुख आकरण ही रँग गया। चट से सरकी का एक सोंटा उसने तोड़ लिया और वह उसे नीचा मुँह किये, पानी पर पटकने लगा; फिर बोला, “श्रीकान्त!”

“क्या है भइया?”

“तेरे-पास रुपये हैं?”

“कितने रुपये?”

“कितने? अरे यही चार-पाँच रुपये।”

“हैं। तुम लोगे?” कहकर मैंने बड़ी प्रसन्नता से उसके मुख की ओर देखा। ये थोड़े से रुपये ही मेरे पास थे। इन्द्र के काम में आने की अपेक्षा इनके और अधिक सद्व्यवहार की मैं कल्पना भी न कर सकता था! किन्तु कहाँ, इन्द्र तो कुछ खुश न हुआ। उसका मुँह तो मानो और भी अधिक लज्जा के कारण कुछ विचित्र किस्म का हो गया। कुछ देर चुप रहने के उपरान्त वह बोला, “किन्तु मैं इन रुपयों को तुम्हें लौटा न सकूँगा।”

“मैं इन्हें लौटाना चाहता भी नहीं,” यह कहकर गर्व के साथ मैं उसकी ओर देखने लगा।

और भी थोड़ी देर तक नीचा मुँह किये रहने के उपरान्त वह धीरे से बोला, “रुपये मैं स्वयं अपने लिए नहीं चाहता। एक आदमी को देने होंगे; इसी से मैंने माँगे हैं। वे लोग बेचारे बड़े दु:खी हैं- उन्हें खाने को भी नहीं मिलता। क्या तू वहाँ चलेगा?” निमेष-मात्र में ही मुझे उस रात की बात याद आ गयी। बोला, “वही न, जिनको रुपया देने के लिए उस दिन तुम नाव पर से उतरे जा रहे थे?” इन्द्र ने अन्यमनस्क भाव से सिर हिलाकर कहा, “हाँ, वही। रुपया तो मैं खुद ही बहुत-से दे सकता था, परन्तु जीजी तो किसी तरह लेना ही नहीं चाहतीं। तुझे भी साथ चलना होगा श्रीकान्त, नहीं तो इन रुपयों को वे न लेंगी, सोचेंगी कि मैं माँ के बक्से में से चोरी करके लाया हूँ। चलेगा श्रीकान्त?”

“मालूम होता है वे तुम्हारी जीजी होती हैं?”

इन्द्र ने कुछ हँसकर कहा, “नहीं, जीजी होती नहीं हैं- जीजी कहता हूँ। चलेगा न?” मुझे चुप देखकर वह बोला, “दिन को जाने में वहाँ कुछ भय नहीं है। कल रविवार है, तू खा-पीकर यहाँ आ जाना, मैं तुझे ले चलूँगा; तुरंत ही लौट आवेंगे। चलेगा न भाई?” इतना कहकर वह जिस प्रकार मेरा हाथ पकड़कर मेरे मुँह की ओर देखने लगा, उससे मेरा 'नहीं' कहना सम्भव नहीं रहा, मैं दुबारा उसकी नौका में जाने का वचन देकर घर लौट आया।

वचन तो सचमुच ही दे आया, किन्तु वहाँ जाना कितना बड़ा दु:साहस है, यह तो मुझसे बढ़कर कोई न जानता था। उसी समय से मेरा मन भारी हो गया और नींद के समय में प्रगाढ़ अशान्ति का भाव मेरे सर्वांग में विचरण करता रहा। सुबह उठते ही, पहले यही मन में आया कि आज जिस जगह जाने के लिए वचन-बद्ध हुआ हूँ, उस जगह जाने से किसी भी तरह मेरा भला न होगा। किसी सूत्र से यदि कोई जान जायेगा, तो वापिस लौटने पर जो सजा भुगतनी पड़ेगी, उसकी चाहना तो शायद मँझले भइया के लिए भी छोटे भइया न कर सकेंगे। अन्त में खा पीकर, पाँच रुपये छिपाकर, जब मैं घर से बाहर निकला तब यह बात भी अनेक बार मन में आई कि, जाने की जरूरत नहीं है। बला से, न रक्खा अपने वचन को, और इससे मेरा आता-जाता ही क्या है?

यथा-स्थान पहुँचकर देखा कि सरकी के झुण्ड के नीचे, उसी छोटी-सी नाव के ऊपर, इन्द्र सिर ऊपर उठाए मेरी राह देख रहा है। ऑंख से ऑंख मिलते ही उसने इस तरह हँसकर मुझे बुलाया कि न जाने की बात अपने मुँह से मैं निकाल ही न सका। सावधानी से, धीरे-धीरे उतरकर, चुपचाप, मैं नाव पर चढ़ गया। इन्द्र ने नाव खोल दी।

आज मैं सोचता हूँ कि बहुत जन्म के पुण्यों का फल था जो उस दिन मैं भय के मारे लौट न आया। उस दिन को उपलक्ष्य करके जो चीज मैं देख आया, उसे देखना, सारे जीवन सारी पृथ्वीि छान डालने पर भी कितने से लोगों के भाग्य में होता है? स्वयं मैं भी वैसी वस्तु और कहाँ देख सका हूँ? जीवन में ऐसा शुभ मुहूर्त अनेक बार नहीं आता। यदि कभी आता भी है तो, वह समस्त चेतना पर ऐसी गम्भीर छाप मार जाता है कि बाद का सारा जीवन मानो उसी साँचे में ढल जाता है। मैं समझता हूँ कि इसीलिए मैं स्त्री-जाति को कभी तुच्छ रूप में नहीं देख सका। इसीलिए बुद्धि से मैं इस प्रकार के चाहे जितने तर्क क्यों न करूँ कि संसार में क्या पिशाचियाँ नहीं हैं? यदि नहीं, तो राह घाट में इतनी पाप-मूर्तियाँ किनकी देख पड़ती हैं? सब ही यदि इन्द्र की जीजी हैं, तो इतने प्रकार के दु:खों के स्रोत कौन बहाती हैं? तो भी, न जाने क्यों, मन में आता है कि यह सब उनके बाह्य आवरण हैं, जिन्हें कि वे जब चाहें तब दूर फेंककर ठीक उन्हीं के (दीदी के) समान उच्च आसन पर जाकर विराज सकती हैं। मित्र लोग कहते हैं कि यह मेरा अति जघन्य शोचनीय भ्रम है। मैं इसका भी प्रतिवाद नहीं करता, सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि यह मेरी युक्ति नहीं है, संस्कार है! इस संस्कार के मूल में जो है, नहीं मालूम, वह पुण्यवती आज भी जीवित है या नहीं। यदि हो भी तो वह कैसे, कहाँ पर है, इसकी खोज-खबर लेने की चेष्टा भी मैंने नहीं की है। किन्तु फिर भी मन ही मन मैंने उन्हें कितनी बार प्रणाम किया है, इसे भगवान ही जानते हैं।

श्मशान के उसी सँकरे घाट के पास, बड़ के वृक्ष की जड़ों से, नाव को बाँधकर जब हम दोनों रवाना हुए तब बहुत दिन बाकी था। कुछ दूर चलने पर, दाहिनी तरफ, वन के भीतर अच्छी तरह देखने से एक रास्ता-सा दिखाई दिया। उसी से होकर इन्द्र ने अन्दर प्रवेश किया। करीब दस मिनट चलने के बाद एक पर्णकुटी दिखाई दी। नजदीक जाकर देखा कि भीतर जाने का रास्ता एक बेंड़े से बन्द है। इन्द्र ने सावधानी से, उसका बन्धन खोलकर, प्रवेश किया; और मुझे अन्दर लेकर फिर उसे उसी तरह बाँध दिया। मैंने वैसा वास-स्थान अपने जीवन में कभी नहीं देखा। एक तो चारों तरफ निबिड़ जंगल, दूसरे सिर के ऊपर एक प्रकाण्ड इमली और पाकर के वृक्ष ने सारी जगह को मानो अन्धकारमय कर रक्खा था। हमारी आवाज पाकर मुर्गियाँ और उनके बच्चे चीत्कार कर उठे। एक तरफ बँधी हुई दो बकरियाँ मिमियाँ उठीं। ध्यारन से सामने देखा तो- अरे बाबा! एक बड़ा भारी अजगर, टेढ़ा-मेढ़ा होकर, करीब-करीब सारे ऑंगन को व्याप्त करके पड़ा है! पल-भर में एक अस्फुट चीत्कार करके मुर्गियों को और भी भयभीत करता हुआ, मैं एकदम उस बेंड़े पर चढ़ गया। इन्द्र खिल-खिलाकर हँस पड़ा, बोला, “यह किसी से नहीं बोलता है रे, बड़ा भला साँप है- इसका नाम है रहीम।” इतना कहकर वह उसके पास गया और उसने उसे, पेट पकड़कर ऑंगन की दूसरी ओर, खींचकर सरका दिया। तब मैंने बेंड़े पर से उतरकर दाहिनी ओर देखा। उस पर्णकुटी के बरामदे में बहुत-सी फटी चटाइयों और फटी कथरियों के बिछौने पर बैठा हुआ एक दीर्घकाय दुबला-पतला मनुष्य प्रबल खाँसी के मारे हाँफ रहा है। उसके सिर की जटाएँ ऊँची बँधी हुई थीं और गले में विविध प्रकार की छोटी-बड़ी मालाएँ पड़ी थीं। शरीर के कपड़े अत्यन्त मैले और एक प्रकार के हल्दी के रंग में रँगे हुए थे। उसकी लम्बी दाढ़ी कपड़े की एक चिन्दी के जटा के साथ बँधी हुई थी। पहले तो मैं उसे पहिचान नहीं सका; परन्तु पास में आते ही पहिचान गया कि वह सँपेरा है। पाँच-छ: महीने पहले मैं उसे करीब-करीब सभी जगह देखा करता था। हमारे घर भी वह कई दफे साँप का खेल दिखाने आया है। इन्द्र ने उसे 'शाहजी' कहकर सम्बोधन किया। उसने हमें बैठने का इशारा किया और हाथ उठाकर इन्द्र को गाँजे का साज-सरंजाम और चिलम दिखा दी। इन्द्र ने कुछ कहे बगैर ही उसके आदेश का पालन करना शुरू कर दिया। जब चिलम तैयार हुई तब शाहजी, खाँसी से बेदम होने पर भी, मानो 'चाहे मरुँ चाहे बचूँ' का प्रण करके, दम खींचने लगा और रत्ती भर भी धुऑं कहीं से बाहर न निकल जाय, इस आशंका के मारे उसने अपनी बाईं हथेली से नाक और मुँह अच्छी तरह दबा लिया, फिर सिर के एक झटके के साथ उसने चिलम इन्द्र के हाथ में दे दी और कहा, “पियो।”

इन्द्र ने चिलम पी नहीं। धीरे-से उसे नीचे रखते हुए कहा, “नहीं।” शाहजी ने अत्यन्त विस्मित होकर कारण पूछा, किन्तु उत्तर के लिए एक क्षण की भी प्रतीक्षा नहीं की। फिर स्वयं ही उसे उठा लिया और खींच-खींचकर नि:शेष करके उलटकर रख दिया! इसके बाद दोनों के बीच कोमल स्वर में बातचीत शुरू हुई जिसमें से अधिकांश को न तो मैं सुन सका और न समझ ही सका। किन्तु एक बात को मैंने लक्ष्य किया कि शाहजी हिन्दी बोलते रहे और इन्द्र ने बंगला छोड़ और किसी भाषा का व्यवहार न किया।

शाहजी का कंठ-स्वर क्रम-क्रम से गर्म हो उठा और देखते ही देखते वह पागलों की-सी चिल्लाहट में परिणत हो गया। इन्द्र को उद्देश्य करके वह जो गाली-गलौज करने लगा वह ऐसी थी कि न सुनी जा सकती है और न सही। इन्द्र ने तो उसे सह लिया परन्तु मैं कभी नहीं सहता। इसके बाद वह बेंड़े के सहारे बैठ गया और दम-भर बाद ही गर्दन झुका करके सो गया। दोनों जनों के, कुछ देर तक, वैसे ही चुपचाप बैठे रहने के कारण मैं ऊब उठा और बोला, “समय जा रहा है, तुम्हें क्या वहाँ नहीं जाना?”

“कहाँ श्रीकान्त?”

“अपनी जीजी के यहाँ। क्या रुपये देने नहीं जाना है?”

“अपनी जीजी के लिए ही तो मैं बैठा हूँ। यही तो उनका घर है।”

“यही क्या तुम्हारी जीजी का घर है? यह तो सँपेरे-मुसलमान हैं!” इन्द्र कुछ कहने को उद्यत हुआ-पर फिर उसे दबा गया और चुप रहकर मेरी ओर ताकने लगा। उसकी दृष्टि बड़ी भारी व्यथा से मानो म्लान हो गयी। कुछ ठहरकर बोला, “एक दिन तुझे सब कहूँगा। साँप खिलाना देखेगा श्रीकान्त?”

उसकी बात सुनकर मैं अवाक् हो गया। “क्या साँप को खिलाओगे तुम? यदि काट खाए तो?”

इन्द्र उठकर घर के अन्दर गया और एक छोटी-सी पिटारी और सँपेरे की तूँबी (बाजा) ले आया। उसने उसे सामने रखा, पिटारी का ढक्कन खोला और तूँबी बजाई। मैं डर के मारे काठ हो गया, “पिटारी मत खोलो भाई, भीतर यदि गोखरू साँप हुआ तो?” इन्द्र ने इसका जवाब देने की भी जरूरत नहीं समझी, केवल इशारे से बता दिया कि मैं गोखरू साँप को भी खिला सकता हूँ। दूसरे ही क्षण सिर हिला-हिलाकर तूँबी बजाते हुए उसने ढक्कन को अलग कर दिया। बस फिर क्या था, एक बड़ा भारी गोखरू साँप एक हाथ ऊँचा होकर फन फैलाकर खड़ा हो गया। मुहूर्त मात्र का भी विलम्ब किये बगैर इन्द्र के हाथ के ढक्कन में उसने जोर से मुँह मारा और पिटारी में से बाहर निकल पड़ा।

'अरे बाप रे!' कहकर इन्द्र ऑंगन में उछल पड़ा। मैं बेंडे पर चढ़ गया। क्रुद्ध सर्पराज, तूँबी पर और एक आघात करके, घर के भीतर घुस गये। इन्द्र का मुँह काला हो गया। उसने कहा, “यह तो एकदम जंगली है। जिसे मैं खिलाया करता था, वह यह नहीं है!” भय, झुँझलाहट और खीझ से मुझे करीब-करीब रुलाई आ गयी। मैं बोला, “क्यों ऐसा काम किया? उसने जाकर कहीं शाहजी को काट खाया तो?” इन्द्र असीम शर्म के मारे गड़ा जा रहा था। बोला, “घर का अर्गल लगा आऊँ? किन्तु यदि पास में ही छिपा हुआ हो तो?” मैं बोला, “तो फिर, निकलते ही उसे काट खाएगा।” निरुपाय भाव से इधर-उधर देखकर इन्द्र बोला, “काटने दो बच्चू को जंगली साँप रख छोड़ा है जो- साले गँजेड़ी को इतनी भी अक्ल नहीं है- यह लो वह जीजी आ गयी। आना मत! आना मत! वहीं खड़ी रहो।” मैंने सिर घुमाकर इन्द्र की जीजी को देखा। मानो राख से ढँकी हुई आग हो। जैसे युग-युगान्तरव्यापी कठोर तपस्या समाप्त करके अभी आसन से ही उठकर आई हों। बाईं ओर कमर पर रस्सी से बँधी हुई थोड़ी-सी सूखी लकड़ियाँ थीं और दाहिने हाथ में फूलों की डलिया के समान एक टोकनी में कुछ शाक-सब्जी थी। पहिनावे में हिन्दुस्तानी मुसलमानिन के कपड़े थे, जो गेरुए रंग में रंगे हुए थे, परन्तु मैले नहीं थे। हाथ में लाख की दो चूड़ियाँ थीं। माँग हिन्दुस्तानियों के समान सिन्दूर से भरी थी। उन्होंने लकड़ी का बोझा नीचे रख दिया और बेंड़ा खोलते-खोलते कहा, “क्या है?” इन्द्र बहुत ही व्यस्त होकर बोला, “खोलो मत जीजी, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ- एक बड़ा भारी साँप घर में घुस गया है।” उन्होंने मेरे मुँह की ओर देखकर मानो कुछ सोचा। इसके बाद थोड़ा-सा हँसकर कहा, “वही तो। सँपेरे के घर में साँप घुसा है, यह तो बड़े अचरज की बात है! है न, श्रीकान्त?” मैं अनिमेष दृष्टि से केवल उन्हीं के मुँह की ओर देखता रहा। “किन्तु, यह तो कहो इन्द्रनाथ, वह अन्दर किस तरह गया?” इन्द्र बोला, “पिटारी के भीतर से निकल पड़ा है। एकदम जंगली साँप है।”

“शायद वे अन्दर सो रहे हैं, क्यों?” इन्द्र ने गुस्से से कहा, “गाँजा पीकर एकदम बेहोश पड़े हैं। चिल्ला-चिल्लाकर मर जाने पर भी न उठेंगे।” उन्होंने फिर हँसकर कहा, “और यही सुयोग पाकर तुम श्रीकान्त को साँप का खिलाना दिखाने चले थे, क्यों न? अच्छा, आओ, मैं पकड़े देती हूँ।”

“तुम मत जाना जीजी, तुम्हें काट खायगा। शाहजी को उठा दो- मैं तुम्हें न जाने दूँगा।” यह कहकर और दोनों हाथ पसारकर वह रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसके इस व्याकुल कण्ठ-स्वर में जो प्रेम प्रकाशित हो उठा, उसे उन्होंने खूब ही अनुभव किया। मुहूर्त-भर के लिए उनकी दोनों ऑंखें छल छला उठीं; किन्तु उन्हें छिपाकर वे हँसकर बोलीं, “अरे पागल, इतना पुण्य तेरी इस जीजी ने नहीं किया। मुझे वह नहीं काटेगा, अभी पकड़े देती हूँ देख...” कहकर बाँस के मंच पर से एक किरोसीन की डिबिया उठाकर और जलाकर वे घर में गयी। एक मिनट-भर में ही साँप को पकड़ लाईं और उसे पिटारी में बन्द कर दिया। इन्द्र ने चट से उनके पैरों पर गिरकर नमस्कार किया और पैरों की धूल सिर पर लगाकर कहा, “जीजी, यदि तुम कहीं मेरी जीजी होतीं!” उन्होंने दाहिना हाथ बढ़ाकर इन्द्र का चिबुक स्पर्श किया और उस अंगुली को चूम लिया। फिर मुँह फेरकर अलक्ष्य में मानो उन्होंने अपनी दोनों ऑंखें पोंछ डालीं।
♦♦ • ♦♦

सारी घटना सुनते-सुनते इन्द्र की जीजी हठात् दो-एक बार इस तरह सिहर उठीं कि यदि इन्द्र का उस तरफ तनिक भी ध्याकन होता, तो उसे बड़ा आश्चर्य होता। वह तो न देख पाया, परन्तु मैंने देख लिया। वे कुछ देर तक चुपचाप उसकी ओर देखकर स्नेहभरे तिरस्कार से बोलीं, “छि: भइया, ऐसा कार्य अब और कभी मत करना। इन सब भयानक जानवरों से क्या खिलवाड़ किया जाता है? भाग्य से तुम्हारे हाथ की पिटारी के ढक्कन पर ही उसने फन मारा, नहीं तो आज कैसा अनर्थ हो जाता, बोलो तो?”

“मैं क्या ऐसा बेवकूफ हूँ जीजी।” इतना कहकर उसने अपनी धोती का छोर खींचकर कमर में से सूत से बँधी हुई एक सूखी जड़ी दिखाकर कहा, “यह देख जीजी, पूरी सावधानी के साथ बाँध रखी है। यदि यह न होती तो क्या आज वह मुझे काटे बिना छोड़ देता? शाहजी के पास से इसे प्राप्त करने में क्या मुझे कम कष्ट उठाने पड़े हैं? इसके होते हुए तो मुझे कोई भी नहीं काट सकता, और यदि काट भी लेता- तो भी क्या बिगड़ता? शाहजी को तुरंत ही जगाकर उनसे जहर-मोहरा लेकर कटी जगह पर रख देता। अच्छा, जीजी, यह जहर-मोहरा कितनी देर में सब विष खींच लेता है? आधा घण्टे में? एक घण्टे में? नहीं, इतनी देर न लगती होगी, क्यों जीजी?”

जीजी, किन्तु उसी तरह, चुपचाप देखती रहीं। इन्द्र उत्तेजित हो गया था, बोला, “आज दो न जीजी मुझे एक जहर-मोहरा-तुम्हारे पास तो दो-तीन पड़े हैं- कितने दिनों से मैं माँग रहा हूँ।” फिर उत्तर के लिए प्रतीक्षा किये बगैर ही वह क्षुब्ध अभिमान के स्वर में उसी क्षण बोल उठा, “मुझसे तो तुम लोग जो भी कहते हो मैं वही कर देता हूँ- पर तुम लोग मुझे हमेशा झाँसा देकर कहते हो, आज नहीं कल, कल नहीं परसों-यदि नहीं देना है तो साफ क्यों नहीं कह देते? मैं फिर नहीं आऊँगा- जाओ।”

इन्द्र ने लक्ष्य नहीं किया, किन्तु मैंने जीजी की तरफ देखते हुए खूब अनुभव किया कि उनका मुख, किसी असीम व्यथा और लज्जा के कारण, मानो एकदम काला हो गया है। किन्तु दूसरे ही क्षण कुछ हँसी का भाव अपने सूखे होठों पर जबर्दस्ती लाकर उन्होंने कहा, “हाँ रे इन्द्र, क्या तू अपनी जीजी के यहाँ सिर्फ साँप के मन्त्र और जहर-मोहरा के लिए ही आया करता है?”

इन्द्र नि:संकोच होकर बोल उठा, “और नहीं तो क्या!” फिर निद्रित शाहजी की ओर तिरछी नजर से देखकर बोला, “किन्तु वह मुझे हमेशा झाँसा ही देते रहते हैं- इस तिथि को नहीं, उस तिथि को नहीं-केवल वह एक झाड़ने का मन्त्र दिया था, बस और कुछ देना ही नहीं चाहते। किन्तु, आज मुझे खूब मालूम हो गया है जीजी, कि तुम भी कुछ कम नहीं हो- तुम भी सब जानती हो। अब और उनकी खुशामद नहीं करूँगा जीजी, तुम्हारे पास से ही सब मन्त्र सीख लूँगा।” इतना कहकर उसने मेरी ओर देखा और फिर सहसा एक दीर्घ नि:श्वास छोड़कर शाहजी को लक्ष्य करके उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करते हुए कहा, “शाहजी गाँजा-वाँजा जरूर पीते हैं श्रीकान्त, किन्तु तीन दिन के मरे हुए मुर्दे को आधा घण्टे के भीतर ही उठाकर खड़ा कर सकते हैं- इतने बड़े उस्ताद हैं ये! हाँ जीजी, तुम भी तो मुर्दे को जिला सकती हो?”

जीजी कुछ देर चुपचाप देखती रहीं और फिर एकाएक खिलखिलाकर हँस पड़ीं। वह कितना मधुर हास था! इस तरह मैंने बहुत ही थोड़े लोगों को हँसते देखा है; किन्तु वह हास, मानो निबिड़ मेघों से भरे हुए आकाश की बिजली को चमक की तरह, दूसरे ही क्षण अन्धकार में विलीन हो गया।

किन्तु इन्द्र ने उस तरफ ध्या न ही नहीं दिया, वह एकदम जीजी के गले पड़ गया और बोला, “मैं जानता हूँ कि तुम्हें सब मालूम है; परन्तु मैं कहे देता हूँ कि एक-एक करके तुम्हें अपनी सब विद्याएँ देनी होंगी। जितने दिन जाऊँगा उतने दिन तुम्हारा पूरा गुलाम होकर रहूँगा। तुमने कितने मुर्दे जिलाए हैं जीजी?”

जीजी बोली, “मैं तो मुर्दे जिलाना जानती नहीं, इन्द्रनाथ!”

इन्द्र ने पूछा, “तुम्हें शाहजी ने यह मन्त्र नहीं दिया?” जीजी ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।” इन्द्र, मिनट-भर तक उनके मुँह की ओर देखते रहने के उपरान्त, स्वयं भी अपना सिर हिलाते-हिलाते बोला, “यह विद्या क्या कोई शीघ्र देना चाहता है जीजी? अच्छा, कौड़ी चलाना तो तुमने निश्चय ही सीख लिया होगा?”

जीजी बोली, “कौड़ी चलाना किसे कहते हैं, सो भी तो मैं नहीं जानती भाई।”

इन्द्र को विश्वास नहीं हुआ। वह बोला, “हुश्, जानती कैसे नहीं! नहीं दूँगी, यही कह दो न!” फिर मेरी ओर देखकर बोला, “कौड़ी चलाना कभी देखा है श्रीकान्त? दो कौड़ियाँ मन्त्र पढ़कर छोड़ दी जाती हैं, वे जहाँ साँप होता है वहाँ जाकर उसके सिर पर जा चिपटती हैं और उसे दस दिन तक के रास्ते से खींच लाकर हाजिर कर देती हैं। ऐसा ही मन्त्र का जोर है! अच्छा जीजी, घर बाँधना, देह-बाँधना, धूल पढ़ना- यह सब तो तुम जानती हो न? यदि जानती न होतीं, तो इस तरह साँप को कैसे पकड़ लेतीं?” इतना कहकर वह जिज्ञासु-दृष्टि से जीजी के मुँह की ओर देखने लगा।

जीजी ने बहुत देर तक सिर झुकाए हुए चुपचाप मन ही मन मानो कुछ सोच लिया और फिर मुँह उठाकर धीरे से कहा, “इन्द्र, तेरी जीजी के पास ये सब विद्याएँ कानी-कौड़ी की भी नहीं हैं किन्तु; क्यों नहीं है, सो यदि तू विश्वास करे भाई, तो आज तेरे आगे सब बातें खोलकर अपनी छाती का बोझ हलका कर डालूँ। बोलो, तुम लोग आज मेरी सब बातों पर विश्वास करोगे?” बोलते-बोलते ही उनके पिछले शब्द एक तरह से कुछ भारी-से हो उठे।

अभी तक मैं प्राय: कुछ भी न बोला था। इस दफे, सबसे आगे जोर से बोल उठा, “मैं तुम्हारी सब बातों पर विश्वास करूँगा जीजी! सब पर- जो तुम कहोगी, सब पर। एक भी बात पर अविश्वास न करूँगा।”

मेरी ओर देखकर वे कुछ हँसीं और बोलीं, “विश्वास क्यों न करोगे भाई, तुम भले घरों के लड़के जो ठहरे! इतर (छोटे) लोग ही अनजान अपरिचित लोगों की बात में सन्देह करते और भय से पीछे हट जाते हैं। सिवाय इसके मैंने तो कभी झूठ बोला नहीं भाई!” इतना कहकर उन्होंने एक दफे सिर हमारी ओर देखकर म्लान भाव-से थोड़ा-सा हँस दिया।

उस समय संध्याे की धुंध दूर होकर, आकाश में चन्द्रमा का उदय हो रहा था और उसकी धुँधली-सी किरण-रेखाएँ, वृक्षों की घनी शाखाओं और पत्तों में से छनकर नीचे के गहरे अन्धकार में पड़ रही थीं।

कुछ देर चुप रहकर जीजी एकाएक बोल उठीं, “इन्द्रनाथ, सोचा था कि आज ही अपनी सब कहानी तुम्हें सुना दूँ। किन्तु सोचकर देखा कि नहीं, अभी वह समय नहीं आया है। परन्तु मेरी एक बात पर अवश्य विश्वास कर लो कि हम लोगों की सारी करामात शुरू से आखिर तक प्रवंचना ही है। इसलिए अब तुम झूठी आशा से शाहजी के पीछे-पीछे चक्कर मत काटो। हम लोग मन्त्र-तन्त्र कुछ नहीं जानते, मुर्दे को भी नहीं जिला सकते; कौड़ी फेंककर साँप को भी पकड़कर नहीं ला सकते। और कोई कर सकता है या नहीं, सो तो मैं नहीं जानती, परन्तु हम लोगों में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है।”

न मालूम क्यों इस अत्यल्प काल के परिचय से ही मैंने उनके प्रत्येक शब्द पर असंशय विश्वास कर लिया; किन्तु, इतने दिनों के घनिष्ठ परिचय के होते हुए भी इन्द्र विश्वास न कर सका। वह क्रुद्ध होकर बोला, “यदि शक्ति नहीं है तो तुमने साँप को पकड़ किस तरह लिया?”

जीजी बोलीं, “यह तो सिर्फ हाथ का कौशल-भर है इन्द्र, किसी मन्त्र का जोर नहीं। साँप का मन्त्र हम लोग नहीं जानते।”

इन्द्र बोला, “यदि नहीं जानते; तो तुम दोनों ने धूर्तता से मुझसे इतने रुपये क्यों ठग लिये?”

जीजी तत्काल जवाब न दे सकीं; शायद अपने को कुछ सँभालने लगीं। इन्द्र ने फिर कर्कश कण्ठ से कहा, “तुम सब ठग, धूर्त, चोट्टे हो- अच्छा दिखाता हूँ तुम लोगों को इसका मजा।”

पास में ही एक किरासन की डिबिया जल रही थी। मैंने उसी के प्रकाश में देखा, जीजी का मुँह मुर्दे के समान सफेद हो गया है। वे भय और संकोच के साथ बोलीं, “हम लोग मदारी जो हैं भाई- ठगना ही तो हमारा व्यवसाय है।”

“तुम्हरा व्यवसाय मैं अभी सब बाहर निकाले देता हूँ- चल रे श्रीकान्त, इन साले धूर्तों की छाया से भी बचना चाहिए। हरामजादे, बदजात, धूर्त, बदमाश!” यह कहकर इन्द्र सहसा मेरा हाथ पकड़कर और जोर से एक झटका देकर खड़ा हो गया और जरा भी विलम्ब किये बिना मुझे खींच ले गया।

इन्द्र को दोष नहीं दिया जा सकता; क्योंकि उसकी बहुत दिनों की बड़ी-बड़ी आशाएँ, मानो पलक मारते ही, भूमिसात हो गयी थीं। किन्तु मैं अपनी दोनों ऑंखों को जीजी की उन ऑंखों की ओर से फिर न लौटा सका। मैं बलपूर्वक इन्द्र से अपना हाथ छुड़ाकर पाँच रुपये सामने रखते हुए बोला, “तुम्हारे लिए लाया था जीजी-इन्हें ले लो।”

इन्द्र ने झपटकर उन्हें उठा लिया और कहा, “अब और रुपये! धूर्तता से इन्होंने मुझसे कितने रुपये लिये हैं, सो क्या तुझे मालूम है श्रीकान्त? मैं तो अब यही चाहता हूँ कि ये लोग बिना खाए-पिए सूखकर मर जाँय।”

मैंने उसका हाथ दबाकर कहा, “नहीं इन्द्र, दे देने दो- मैं ये जीजी के लिए ही लाया हूँ?”

“ओ:, बड़ी आई तेरी जीजी!” कहकर वह मुझे खींचकर बेंड़े के पास घसीट लाया!

इतने में इस गोल माल से शाहजी का नशा उचट गया। “क्या हुआ! क्या हुआ!” कहते हुए वह उठ बैठा।

इन्द्र मुझे छोड़कर उसकी ओर बढ़ गया और बोला, “डाकू साले! कभी रास्ते में देख पाया तो चाबुक से तेरी पीठ का चमड़ा उधेड़ दूँगा।” “क्या हुआ?”, “बदमाश साला, जानता कुछ भी नहीं, फिर भी कहता फिरता है, मन्त्र के जोर से मुर्दे जिलाता हूँ! यदि कभी रास्ते पर दिखाई दिया तो अबकी बार अच्छी तरह 'देखूँगा तुझे?” इतना कहकर उसने एक ऐसा अशिष्ट इशारा किया जिससे कि शाहजी चौंक उठा।

एक तो नशे की खुमारी फिर अकस्मात् यह अचिन्तय काण्ड। इससे यह 'किंतर्कव्य-विमूढ़' हो गया और उसी भाव से टुकुर-टुकुर देखने लगा।

इन्द्र मुझे लेकर जब तक द्वार के बाहर आया, तब तक शायद वह कुछ होश में आकर शुद्ध बंगाली में पुकार उठा, “सुन इन्द्रनाथ, क्या हुआ है बोल तो?” यह पहले ही पहल मैंने उसे बंगाली में बोलते सुना।

इन्द्र लौटकर बोला, “जन्त्र-मन्त्र तुम कुछ नहीं जानते, फिर क्यों' झूठ मूठ मुझे धोखा देकर इतने दिनों तक रुपया ऐंठते रहे? इसका जवाब दो!”

वह बोला, “नहीं जानता, यह तुमसे किसने कहा?”

इन्द्र ने उसी क्षण उस स्तब्ध नतमुखी जीजी की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “इन्होंने कहा कि तुम्हारे पास कानी कौड़ी की भी विद्या नहीं है। विद्या है सिर्फ धूर्तता की और लोगों को ठगने की। यही तुम लोगों का व्यवसाय है! मिथ्यावादी, चोर!”

शाहजी की ऑंखें भक से जल उठीं। वह कैसी भीषण प्रकृति का आदमी है, इसका परिचय मुझे तब तक भी नहीं था। उसकी केवल उस दृष्टि से ही मेरे शरीर में मानो काँटे उठ आए। वह अपनी बिखरी हुई जटाओं को बाँधते-बाँधते उठ खड़ा हुआ और सामने आकर बोला, “कहा है, तूने?”

जीजी उसी तरह नीचा मुँह किये निरुत्तर बैठी रही। इन्द्र ने मुझे एक धक्का देकर कहा, “रात हो गयी- चल न।” मैंने कहा, “रात अवश्य हो रही है, परन्तु मेरे पैर तो जैसे अपनी जगह से हिलते ही नहीं हैं।” किन्तु इन्द्र ने उस ओर भ्रूक्षेप भी न किया। वह मुझे प्राय: जबर्दस्ती ही खींच ले चला।

कुछ कदम आगे बढ़ते ही शाहजी का कंठ-स्वर फिर सुनाई दिया, “क्यों कहा तूने?”

प्रश्न तो जरूर सुना किन्तु प्रत्युत्तर न सुन सका। थोडे क़दम और अग्रसर होते ही अकस्मात् चारों ओर के उस निबिड़ अन्धकार की छाती को चीरता हुआ एक तीव्र आर्त्त-स्वर पीछे की अंधेरी झोंपड़ी में से हमारे कानों को बेधता हुआ निकल गया; और ऑंख की पलक गिरते-न गिरते इन्द्र उस शब्द का अनुसरण करके अदृश्य हो गया। किन्तु मेरे भाग्य में कुछ और ही था। सामने ही एक बड़ी कँटीली झाड़ी थी। मैं जोर से उसी पर जा गिरा और काँटों से मेरा सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया। यह जो हुआ, सो हुआ किन्तु अपने को काँटों से छुड़ाने में ही मुझे करीब दस मिनट लग गये। इस काँटे को छुड़ाओ तो किसी अन्य काँटे में कपड़ा बिंध जाता और उसे छुड़ाओ तो किसी तीसरे में जा अटकता। इस प्रकार अनेक कष्ट और विलम्ब के उपरान्त जब मैं शाहजी के घर के ऑंगन के किनारे पहुँचा, तब देखा कि उस ऑंगन के एक हिस्से में जीजी मूर्च्छित पड़ी हुई हैं और दूसरे हिस्से में दोनों का- गुरु-शिष्य का बाकायदा मल्ल-युद्ध हो रहा है। पास ही में एक तेजधार वाली बर्छी पड़ी हुई है।

शाहजी-शरीर से अत्यन्त बलवान था, किन्तु उसे पता न था कि इन्द्र उससे भी कितना अधिक बली है। यदि होता तो शायद वह इतने बड़े दु:साहस का परिचय न देता। देखते ही देखते इन्द्र उसे चित्त करके उसकी छाती पर चढ़ बैठा और उसकी गर्दन को जोर से दबोचने लगा। वह ऐसा दबोचना था कि यदि मैं बाधा न देता तो, शायद, शाहजी का मदारी-जीवन उसी समय समाप्त हो जाता।

बहुत खींच-तान के बाद जब मैंने दोनों को पृथक किया तब इन्द्र की अवस्था देखकर डर के मारे एकदम रो दिया। पहले मैं अन्धकार में देख न सका था कि उसके सब कपड़े खून से तर-ब-तर हो रहे हैं। इन्द्र हाँफते-हाँफते बोला, “साले गँजेड़ी ने मुझे साँप मारने का बर्छा मारा है- यह देख?” कुरते की आस्तीन उठाकर उसने बताया, भुजा में करीब दो-तीन इंच गहरा घाव हो गया है, और उसमें से लगातार खून बह रहा है।

इन्द्र बोला, “रो मत, इस कपड़े से मेरे घाव को खूब खींचकर बाँध दे। अरे खबरदार! ठीक ऐसा ही बैठा रह, उठा तो गले पर पैर रखकर तेरी जीभ खींचकर बाहर निकाल लूँगा, हरामजादे सूअर! ले इन्द्र, तू खींचकर बाँध, देरी न कर।” इतना कहकर उसने चर्र-चर्र अपनी धोती के छोर का एक अंश फाड़ डाला। मैं काँपते हाथों से घाव को बाँधने लगा और शाहजी निकट ही, आसन्न मृत्यु विषैले सर्प की तरह, बैठा हुआ, चुपचाप देखने लगा।

इन्द्र बोला, “नहीं, तेरा विश्वास नहीं है, तू खून कर डालेगा। मैं तेरे हाथ बाँधूँगा।” यह कहकर उसने उसी की गेरुए रंग की पगड़ी से खींच-खींचकर उसके दोनों हाथ खूब कसकर बाँध दिए। उसने कोई बाधा नहीं दी, प्रतिवाद नहीं किया, जरा-सी चूँ-चपड़ भी न की।

जिस लाठी के प्रहार से जीजी बेहोश हो गयी थीं उसे उठाकर एक तरफ रखते हुए इन्द्र बोला, “कैसा नमकहराम शैतान है यह साला! मैंने इसे अपने पिता के न जाने कितने रुपये चुराकर दिए हैं, और यदि जीजी ने सिर की कसम रखाकर रोका न होता तो और भी देता। इतने पर भी यह मुझे बर्छी मार बैठा! श्रीकान्त, इस पर नजर रख जिससे यह उठ न बैठे- मैं जीजी की ऑंखों और चेहरे पर जल के छींटे देता हूँ।”

पानी के छींटे देकर हवा करते हुए वह बोला, “जिस दिन जीजी ने कहा कि इन्द्रनाथ तेरे कमाए हुए पैसे होते तो मैं ले लेती- किन्तु इन्हें लेकर मैं अपना इहलोक-परलोक मिट्टी न करूँगी।' उस दिन से अब तक इस शैतान के बच्चे ने उन्हें कितनी मार मारी है, इसका कोई हिसाब नहीं। इतने पर भी जीजी लकड़ी ढोकर कंडे बेचकर किसी तरह इसे खिलाती-पिलाती हैं, गाँजे के लिए पैसे देती हैं- फिर भी यह उनका अपना न हुआ। किन्तु अब मैं इसे पुलिस के हाथ में दूँगा, तब छोड़ूँगा- नहीं तो यह जीजी का खून कर डालेगा, यह खून कर सकता है।”

मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मानो वह मनुष्य इस बात से सिहर उठा और सिर उठाकर उसे तुरंत नीचा कर लिया। यह सब निमेष-भर में ही हो गया। किन्तु अपराधी की निबिड़ आशंका मैंने उसके चेहरे पर इस प्रकार परिस्फुट होती हुई देखी कि उसका उस समय का वह चेहरा मुझे आज भी साफ-साफ याद आ जाता है।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ, कि इस कहानी को, जिसे कि आज मैं लिख रहा हूँ, इतना ही नहीं कि सत्य मानकर ग्रहण करने में लोग दुविधा करेंगे परन्तु इसे विचित्र कल्पना कहकर उपहास करने में भी शायद संकोच न करेंगे। फिर भी, यह सब कुछ जानते हुए भी, मैंने इसे लिखा है और यही मेरी अभिज्ञता का सच्चा मूल्य है। क्योंकि सत्य के ऊपर खड़े हुए बगैर, किसी भी तरह यह सब कथा मुँह से बाहर नहीं निकाली जा सकती। पग-पग पर डर लगता है कि लोग इसे हँसी में न उड़ा दें। जगत में वास्तविक घटनाएँ कल्पना को भी बहुत दूर पीछे छोड़ जाती हैं-यह कैफियत, स्वयं उसे लेखबद्ध करने में, किसी तरह की मदद नहीं करती, बल्कि हाथ की कलम को बार-बार खींचकर रोकती है।

पर जाने दो इस बात को। जीजी जब ऑंखें खोलकर उठ बैठीं तब शायद आधी रात हो गयी थी। उनकी विह्वलता दूर होते और भी एक घण्टा बीत गया। इसके बाद हमारे मुँह से सारा वृत्तान्त सुनकर वे उठकर धीरे-धीरे खड़ी हो गयीं और शाहजी को बन्धन-मुक्त करके बोलीं, “जाओ; अब सो रहो।”

उसके चले जाने के उपरान्त उन्होंने इन्द्र को पास बुलाकर और उसका दाहिना हाथ अपने सिर पर रखकर कहा, “इन्द्र, मेरे इस सिर पर हाथ रखकर शपथ तो कर भाई, कि अब फिर कभी तू इस घर में न आयेगा। हमारा जो होना हो सो हो, तू अब कोई खबर न लेना।”

इन्द्र पहले तो अवाक् हो रहा; परन्तु दूसरे ही क्षण आग की तरह जल उठा और बोला, “ठीक ही तो है! मेरा खून किये डालता था, सो तो कुछ भी नहीं। और मैंने जो उसे थोड़ी देर के लिए बाँध दिया, सो इस पर तुम्हारा इतना गुस्सा! ऐसा न हो तो फिर यह कलियुग ही क्यों कहलावे! परन्तु तुम दोनों कितने नमकहराम हो! आ रे श्रीकान्त, चलें, बस हो चुका।”

जीजी चुप हो रहीं- उन्होंने इस अभियोग का जरा भी प्रतिवाद नहीं किया। क्यों नहीं किया सो, पीछे मैंने चाहे जितना क्यों न समझा हो, परन्तु उस समय मैं बिल्कुथल न समझ सका। तथापि मैं अलक्ष्य रूप से चुपचाप वे पाँच रुपये वहीं खम्भे के पास रखकर इन्द्र के पीछे-पीछे चल दिया। ऑंगन के बाहर आकर इन्द्र चिल्लाकर बोला, “हिन्दू की लड़की होकर जो एक मुसलमान के साथ भाग आती है, उसका धर्म-कर्म ही क्या! चूल्हे में चली जाय, अब मैं न कोई खोज ही करूँगा और न खबर ही लूँगा। हरामजादा, नीच कहीं का!” यह कहकर वह तेजी से उस वन-पथ को लाँघकर चल दिया।

हम दोनों नाव में आकर बैठ गये, इन्द्र चुपचाप नाव खेने लगा और बीच-बीच में हाथ उठा-उठाकर ऑंखें पोंछने लगा। यह साफ-साफ समझकर कि वह रो रहा है, मैंने और कोई भी प्रश्न नहीं किया।

श्मशान के उसी रास्ते से मैं लौट आया और उसी रास्ते अब भी चला जा रहा हूँ, परन्तु न मालूम क्यों, आज मेरे मन में भय की कोई बात ही नहीं आती। मालूम होता है, शायद, उस समय मन इतना विह्वल और इतना ढँका हुआ था कि इतनी रात को किस तरह घर में घुसूँगा और घुसने पर क्या दशा होगी, इसकी चिन्ता भी उसमें स्थान न पा सकी।

प्राय: पिछली रात को नाव घाट पर आ लगी। मुझे उतारकर इन्द्र बोला, “घर चला जा श्रीकान्त, तू बड़ा अपशकुनिया है। तुझे साथ लेने से एक न एक फसाद उठ खड़ा होता है। आज से अब तुझे किसी भी कार्य के लिए न बुलाऊँगा- और तू भी अब मेरे सामने न आना। जा, चला जा।” इतना कहकर वह गहरे पानी में नौका ठेलकर देखते ही देखते घुमाव की तरफ अदृश्य हो गया। विस्मित, व्यथित और स्तब्ध होकर मैं निर्जन नदी के तीर पर अकेला खड़ा रह गया।
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निस्तब्ध गम्भीर रात में पाता गंगा के किनारे बिल्कुाल अकारण ही, जब इन्द्र मुझे बिल्कुसल अकेला छोड़कर चला गया, तब मैं रुलाई को और न सँभाल सका। उसे मैं प्यार करता हूँ, इसका उसने कोई मूल्य ही नहीं समझा। दूसरे के घर में रहते हुए कठोर शासन-जाल की उपेक्षा करके, उसके साथ गया, इसकी भी उसने कोई कद्र नहीं की। सिवाय इसके, मुझे अपशकुनिया अकर्मण्य कहकर और अकेले असहाय अवस्था में विदा करके, बेपरवाही से चला गया। उसकी यह निष्ठुरता मुझे कितनी अधिक चुभी इसको बताने की चेष्टा करना भी निरर्थक है। इसके बाद, बहुत दिनों तक न उसने मुझे खोजा और न मैंने ही उसे। दैवात् यदि कभी राह-घाट में मिल भी जाता तो मैं इस तरह मुँह मोड़कर चला जाता मानो उसे देखा ही न हो। किन्तु मेरा यह 'मानो' मुझे ही हमेशा तुस की आग की तरह जलाया करता, उसकी जरा-सी भी हानि न कर सकता। लड़कों के दल में उसका बड़ा सम्मान था। फुटबाल-क्रिकेट का वह दलपति था, जिमनास्टिक अखाड़े का मास्टर था। उसके कितने ही अनुचर थे, और कितने ही भक्त। मैं तो उसकी तुलना में कुछ भी न था। फिर-क्यों वह दो ही दिन के परिचय में मुझे 'मित्र' कहने लगा और फिर क्यों उसने त्याग दिया? परन्तु जब उसने त्याग दिया तब मैं भी जबर्दस्ती करके उससे सम्बन्ध जोड़ने नहीं गया।

मुझे खूब याद है कि मेरे संगी-साथी जब इन्द्र का उल्लेख करके उसके सम्बन्ध में तरह-तरह की अद्भुत अचरजभरी बातें कहना शुरू कर देते, तब मैं चुपचाप उन्हें सुनता रहता। छोटी-सी बात कहकर भी मैंने कभी यह जाहिर नहीं किया कि वह मुझे जानता है अथवा उसके सम्बन्ध में मैं कुछ जानता हूँ। न जाने कैसे मैं उस उम्र में ही यह जान गया था कि 'बड़े' और 'छोटे' की दोस्ती का परिणाम प्राय: ऐसा ही होता है। भविष्य जीवन में मैं भाग्यवश अनेक 'बड़े' मित्रों के संसर्ग में आऊँगा इसलिए, शायद, भगवान ने दया करके यह सहज-ज्ञान मुझे दे दिया था जिससे कि मैं कभी किसी भी कारण से अपनी अवस्था का अतिक्रमण करके अर्थात् अपनी योग्यता का खयाल किये बिना मित्रता का मूल्य ऑंकने न जाऊँ। नहीं तो देखते-देखते 'मित्र' प्रभु बन जाता है, और साध की 'मित्रता' का पाश दासत्व की बेड़ी बनकर 'छोटे' के पैरों को जकड़ लेता है। यह दिव्यज्ञान इतने सहज में और इस तरह सत्य रूप में मुझे प्राप्त हो गया था कि इसमें मैं हमेशा के लिए अपमान और लांछनाओं से छुटकारा पा गया हूँ।

तीन-चार महीने कट गये। दोनों ने ही दोनों को त्याग दिया- भले ही इसकी वेदना किसी पक्ष के लिए कितनी ही निदारुण क्यों न हो; किसी ने किसी की भी खोज-खबर नहीं ली।

दत्त-परिवार के घर में काली-पूजा के उपलक्ष्य में उस मुहल्ले का शौकिया नाटक-स्टेज तैयार हो रहा था। 'मेघनाद वध' का अभिनय होने वाला था। इसके पहले देहात में यात्रा¹ तो अनेक बार देखी थी किन्तु नाटक अधिक नहीं देखे थे। मैंने सारे दिन न नहाया, न खाया और न विश्राम ही किया। स्टेज बनाने में सहायता कर सकने से ही मैं मानो बिल्कुतल कृतार्थ हो गया था। इतना ही नहीं, जो सज्जन राम का अभिनय करने वाले थे, उन्होंने स्वयं मुझसे उस दिन एक रस्सी पकड़े रहने के लिए कहा था। इसलिए मुझे बड़ी आशा थी कि रात्रि में जब लड़के कनात के छेदों में से अन्दर ग्रीन-रूम में ढूँकेंगे और मार तथा लाठी के हूले खायँगे, तब मैं 'श्रीराम' की कृपा से बच जाऊँगा। शायद, वे मुझे देखकर भीतर भी एकाध बार जाने दें। किन्तु हाय रे दुर्भाग्य! सारे दिन जी-जान लगाकर जो परिश्रम किया, संध्यान के बाद उसका कुछ भी पुरस्कार नहीं मिला। घण्टों ग्रीन-रूम के द्वार पर खड़ा रहा, 'रामचन्द्र' कितने ही बार आए और गये; किन्तु, उन्होंने मुझे न पहिचाना। एक बार पूछा भी नहीं कि मैं इस तरह खड़ा क्यों हूँ। हाय रे! अकृतज्ञ राम! क्या रस्सी पकड़वाने का मतलब भी तुम्हारा एकबारगी समाप्त हो गया?

¹ बंगाल में जो दृश्य-पट हीन अभिनय होते हैं, उन्हें 'यात्रा' कहते हैं, जैसे कि यहाँ पर रामलीला होती है।

रात्रि के दस बजे नाटक की पहली घण्टी बजी। नितान्त खिन्न चित्त से, सारे व्यापार के प्रति श्रद्धाहीन होकर, परदे के सामने ही एक जगह पर मैंने दखल जमाया और वहीं बैठ गया। किन्तु थोड़ी ही देर में सारा रूठना भूल गया। कैसा सुन्दर नाटक था! जीवन में मैंने बहुत-से नाटक देखे हैं, किन्तु वैसा कभी नहीं देखा। मेघनाद स्वयं एक अद्भुत तमाशा था। उसकी छह हाथ ऊँची देह और चार-साढ़े चार हाथ पेट का घेरा था। सभी कहते थे कि यदि यह मर गया तो बैलगाड़ी पर ले जाने के सिवाय और कोई उपाय नहीं। बहुत दिनों की बात हो गयी। मुझे सारी घटना का स्मरण नहीं है। किन्तु इतना स्मरण है, कि उसने उस दिन जो विक्रम दिखाया वह हमारे देस के हारान पलसाई भीम के अभिनय में सागौन की डाल कन्धों पर रखकर दाँत किड़मिड़ाकर भी नहीं दिखा सकते।

ड्रॉप सीन उठा। जान पड़ा- वे लक्ष्मण ही होंगे-थोड़ा-बहुत वीरत्व प्रकाश कर रहे हैं। इसी समय वही मेघनाद कहीं से एक छलाँग मारकर सामने आ धमका। सारा स्टेज चरमराकर काँप उठा, फूट-लाइट के पाँच-छ: गोले उलटकर बुझ गये- और साथ ही साथ उसका खुद का पेट बाँधने का जरी का कमरपट्टा भी तड़ाक से टूट गया! एक हलचल सी मच गयी। उसे बैठ जाने के लिए कई लोग तो भयभीत चीत्कार कर उठे, और कई लोग सीन ड्राप कर देने के लिए चिल्ला उठे- परन्तु बहादुर मेघनाद, किसी की भी किसी बात से, विचलित नहीं हुआ। बाएँ हाथ के धनुष को फेंककर उसने पटलून को थाम लिया और दाहिने हाथ से केवल तीरों से ही युद्ध करना शुरू किया।

धन्य वीर! धन्य वीरत्व! मानता हूँ कि मैंने तरह-तरह के युद्ध देखे हैं किन्तु हाथ में धनुष नहीं, बाएँ हाथ की अवस्था भी युद्ध-क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं-फिर भी केवल दाहिने हाथ और सिर्फ तीरों से लगातार लड़ाई क्या कभी किसी ने देखी है! अन्त में उसी की जीत हुई। शत्रु को भागकर आत्म-रक्षा करनी पड़ी।

आनन्द की सीमा नहीं थी, मग्न होकर देख रहा था और मन ही मन इस विचित्र लड़ाई के लिए उसकी शत-कोटि प्रशंसा कर रहा था। ऐसे ही समय पीठ के ऊपर अंगुली का दबाव पड़ा। मुँह घुमाकर देखा तो इन्द्र।

वह धीरे-से बोला, “बाहर आ श्रीकान्त- जीजी तुझे बुलाती हैं।” बिजली के द्वारा छू जाने के समान मैं सीधा खड़ा हो गया और बोला, “क्हाँ हैं वे?”

“बाहर तो आ, कहता हूँ।” रास्ते पर आने पर वह, सिर्फ 'मेरे साथ चल' कहकर चलने लगा।

गंगा के घाट पर पहुँचकर देखा, उसकी नाव बँधी हुई है- चुपचाप हम दोनों उस पर जा बैठे, इन्द्र ने बन्धन खोल दिया।

फिर उसी अन्धकारपूर्ण जंगल के रास्ते से होते हुए दोनों जने शाहजी की कुटी में जा पहुँचे। उस समय, शायद रात्रि अधिक बाकी नहीं थी।

किरासिन का एक दीपक जलाए जीजी बैठी हुई थीं। उनकी गोद में शाहजी का सिर रक्खा हुआ था और उनके पैरों के पास एक बड़ा लम्बा काला साँप पड़ा था।

जीजी ने कोमल स्वर में सारी घटना संक्षेप में कह सुनाई। आज दोपहर को किसी के घर से साँप पकड़ने का बुलावा आया था। वहाँ इस साँप को पकड़ने में जो इनाम मिला उसने उससे ताड़ी लेकर पी ली और चढ़े नशे में संध्यां के कुछ पहले घर लौट आया। फिर जीजी के बार-बार मना करने पर भी वह उस साँप को खिलाने के लिए उद्यत हुआ और देर तक खिलाता भी रहा। परन्तु अन्त में खेल को समाप्त करने के पहले, जब वह उसे पूँछ पकड़कर हंडी में बन्द करने लगा तब नशे की झोंक में आकर ज्यों ही उसके मुख को अपने मुख के पास लाकर, चुम्बन करके, अपना प्यार प्रकट करने गया, त्यों ही उसने भी अपना प्यार व्यक्त करने को शाहजी के गले पर तीव्र चुम्बन अंकित कर दिया।

जीजी ने अपने मैले ऑंचल के छोर से अपनी ऑंखें पोंछते हुए मुझे लक्ष्य करके कहा, “श्रीकान्त, उसी समय उसे ज्ञात हुआ कि अब समय अधिक नहीं है। तब उन्होंने यह कहकर कि 'आ रे, अब हम दोनों इस दुनिया से एक साथ ही कूच करें' साँप के सिर को पैर के नीचे दबा लिया और दोनों हाथों से उसकी पूँछ खींचकर इतना लम्बा करके फेंक दिया। इसके बाद दोनों का ही 'खेल' समाप्त हो गया!” इतना कहकर उन्होंने, हाथ से अत्यन्त वेदना के साथ, शाहजी के मुख के ऊपर का कपड़ा दूर कर दिया और बहुत सावधानी से उसके नीले होठों को अपने हाथ से स्पर्श करके कहा, “जाने दो, अच्छा ही हुआ इन्द्रनाथ, भगवान को मैं तनिक भी दोष नहीं देती।”

हम दोनों में से किसी से भी बोलते न बन पड़ा। उस कण्ठ-स्वर में जो मर्मान्तिक वेदना, जो प्रार्थना और जो घना अभिमान प्रकाशित हुआ, उसे जिसने सुना उसके लिए, भूल जाना इस जीवन में कभी सम्भव नहीं, किन्तु किसके लिए था यह अभिमान! और प्रार्थना भी किसके लिए?

कुछ देर स्थिर रहकर वे बोलीं, “तुम लोग अभी बच्चे हो, किन्तु, दोनों को छोड़कर मेरा तो कोई और है नहीं भाई; इसीलिए तुमसे भिक्षा माँगती हूँ कि इनका कुछ उपाय कर जाओ!” फिर अंगुली से कुटी के दक्षिण ओर के जंगल को बताकर कहा, “वहाँ पर जगह है। इन्द्रनाथ, बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि यदि मैं मर जाऊँ तो उसी जगह जा सोऊँ। सुबह होते ही उसी जगह ले जाकर इन्हें सुला देना। इस जीवन में इन्होंने अनेक कष्ट भोगे हैं- वहाँ कुछ शान्ति पाएँगे।”

इन्द्र ने पूछा, “शाहजी क्या बर में दफनाए जाँयगे!”

जीजी बोलीं, “मुसलमान जब हैं तब कब्र में ही दफनाना होगा भाई!”

इन्द्र ने पुन: पूछा, “जीजी, क्या तुम भी मुसलमान हो?”

जीजी बोली, “हाँ, मुसलमान नहीं तो और क्या हूँ?”

उत्तर सुनकर इन्द्र भी मानो कुछ संकुचित और कुण्ठित हो उठा। उसके चेहरे के भाव से अच्छी तरह देख पड़ता था कि इस जवाब की उसने आशा नहीं की थी। जीजी को वह दरअसल चाहता था। इसीलिए मन ही मन वह एक गुप्त आशा पोषण कर रहा था कि उसकी जीजी उसी के समाज की एक स्त्री है। परन्तु मुझे उनके कहने पर विश्वास नहीं हुआ। खुद उनके मुँह से स्वीकारोक्ति सुनकर भी मेरे मन में यह बात न बैठी कि वे हिन्दू-कन्या नहीं हैं।

बाकी रात भी कट गयी। इन्द्र निर्दिष्ट स्थान में जाकर कब्र खोद आया और हम तीनों जनों ने ले जाकर शाहजी की मृत देह को समाहित कर दिया। गंगाजी के ठीक ऊपर, कंकरों का एक कगारा, टूटकर, मानो किसी की ठीक अन्तिम शय्या के लिए ही अपने आप यह जगह बन गयी थी। 20-25 हाथ नीचे ही जाद्रवी मैया की धारा थी- और सिर से ऊपर वन्य-लताओं का आच्छादन। किसी प्रिय वस्तु को सावधानी से लुका रखने के लिए मानो यह स्थान बनाया गया था। बड़े ही भाराक्रान्त हृदय से हम तीनों जनें पास ही बैठे- और एक जन हमारी गोद के ही पास मिट्टी के नीचे चिर-निद्रा में अभिभूत होकर सो गया। तब भी सूर्योदय नहीं हुआ था- नीचे से मन्द-स्रोता भागीरथी का कलकल शब्द कानों में आने लगा- सिर के ऊपर, आसपास, वन के पक्षी प्रभाती गाने लगे। कल जो था आज वह नहीं है। कल सुबह क्या यह सोचा था कि आज रात इस तरह बीतेगी? कौन जानता था कि एक मनुष्य का शेष मुहूर्त इतने निकट आ पहुँचा है?

हठात् जीजी उसकी कब्र पर लेट गयी और विदीर्ण कण्ठ से चिल्लाकर रो पड़ी, “माँ गंगा, मुझे भी अपने चरणों में स्थान दो, मेरे लिए अब और कहीं जगह नहीं है।” उनकी यह प्रार्थना, वह निवेदन, कितना मर्मान्तिक सत्य था यह उस दिन मैं उतनी तीव्रता से अनुभव नहीं कर सका था जितना कि उसके दो दिन बाद कर सका। इन्द्र ने एक बार मेरी ओर ऑंखें उठाकर देखा, इसके बाद उस आर्त्त-स्वर में कहा, “जीजी, तुम मेरे यहाँ चलो- मेरी माँ अब भी जीती हैं, वे तुम्हें फेंकेंगी नहीं, अपनी गोद में उठा लेंगी। वे प्रेम-मूर्ति हैं, एक बार चलकर तुम सिर्फ उनके सामने खड़ी भर हो जाना। चलो, तुम हिन्दू ही की लड़की हो जीजी, मुसलमानिन किसी तरह भी नहीं!”

जीजी कुछ बोली नहीं, कुछ देर उसी तरह मूर्च्छित-सी पड़ी रहीं और अन्त में उठ बैठीं। इसके बाद उठकर हम तीनों ने गंगा-स्नान किया। जीजी ने हाथ की चूड़ियाँ और सुहाग की कण्ठी तोड़कर गंगा में बहा दी। मिट्टी से मस्तक का सिन्दूर पोंछकर, सद्य-विधवा के वेष में सूर्योदय के साथ ही साथ वे कुटी में लौट आईं।

इतने दिनों बाद पहले-पहल आज उन्होंने कहा कि शाहजी उनका पति था किन्तु, इन्द्र के मन में यह बात अच्छी तरह जमकर बैठती ही नहीं थी। संदिग्ध स्वर से उसने प्रश्न किया, “किन्तु तुम तो हिन्दू की लड़की हो जीजी?”

जीजी बोली, “हाँ, ब्राह्मण की लड़की हूँ और वे भी ब्राह्मण थे।”

इन्द्र कुछ देर अवाक् हो रहा, फिर बोला, “उन्होंने अपनी जात क्यों छोड़ दी?”

जीजी बोली, “सो बात मैं अच्छी तरह नहीं जानती भाई। किन्तु जब उन्होंने अपनी जात खो दी, तो उसके साथ मेरी भी खो गयी। स्त्री सहधर्मिणी जो है! नहीं तो वैसे मैंने अपने हाथों अपनी जाति भी नहीं छोड़ी- और किसी दिन किसी तरह का अनाचार भी नहीं किया।”

इन्द्र गाढ़े स्वर में बोला, “सो तो मैं देखता हूँ जीजी! इसीलिए तो जब तब मेरे मन में यही बात आती रही है, मुझे माफ करना जीजी- तुम कैसे यहाँ आ पड़ीं, तुम्हारी किस तरह ऐसी दुर्बुद्धि हुई। परन्तु अब मैं तुम्हारी कोई बात नहीं मानूँगा, मेरे घर तुम्हें चलना ही पड़ेगा। चलो, इसी वक्त चलो।”

जीजी देर तक चुपचाप मानो कुछ सोचती रहीं, फिर मुँह उठाकर धीरे-धीरे बोलीं, “अभी मैं कहीं भी जा न सकूँगी, इन्द्रनाथ।”

“क्यों नहीं जा सकोगी जीजी?”

जीजी बोलीं, “मुझे मालूम है कि वे कुछ 'देना' कर गये हैं। जब तक उसे चुका न दूँ, तब तक मैं कहीं हिल नहीं सकती।”

इन्द्र हठात् क्रुद्ध हो उठा, बोला, “सो तो मैं भी जानता हूँ। ताड़ी की दुकान का, गाँजे की दुकान का जरूर कुछ देना होगा; किन्तु इससे तुम्हें क्या? किसकी ताकत है कि तुमसे रुपया माँगे? चलो तुम मेरे साथ, देखूँ कौन रोकता है तुम्हें?”

इतने दु:ख में भी जीजी को कुछ हँसी आ गयी। बोलीं, “अरे पागल, मुझे रोकने वाला मेरा खुद का ही धर्म है। पति का ऋण मेरा खुद का ही ऋण है और उन लेने वालों को तुम किस तरह रोक सकोगे भाई? यह नहीं हो सकता। आज तुम लोग घर जाओ- मेरे पास जो कुछ थोड़ा-बहुत है, उसे बेच-बाच कर कर्ज चुकाने की कोशिश करूँगी। कल-परसों फिर किसी दिन आना।”

इतनी देर मैं चुपचाप ही था। इस बार बोला, “जीजी, मेरे पास घर में और भी चार-पाँच रुपये पड़े हैं- ले आऊँ क्या?” बात पूरी भी न होने पाई थी कि वे उठकर खड़ी हो गयी और छोटे बच्चे की तरह मुझे अपनी छाती से लगाकर, मेरे मस्तक पर अपने होंठ छुआकर, मेरे मुँह की ओर प्रेम से देखती हुई बोलीं, “नहीं भइया, और लाने को जरूरत नहीं है। उस दिन तुम पाँच रुपये रख गये थे, तुम्हारी वह दया मैं मरने तक याद रखूँगी, भइया! आशीर्वाद दिये जाती हूँ कि भगवान सदा तुम्हारे हृदय के भीतर बसें और इसी तरह दुखियों के लिए ऑंसू बहाते रहें।” बोलते-बोलते ही उनकी ऑंखों से झर-झर नीर झरने लगा।

करीब आठ-नौ बजे हम घर जाने को तैयार हुए। उस दिन वे साथ-साथ रास्ते तक पहुँचाने आयीं। जाते समय इन्द्र का एक-हाथ पकड़कर बोलीं, “इन्द्रनाथ, श्रीकान्त को तो आशीर्वाद दे दिया, किन्तु तुम्हें आशीर्वाद देने का साहस मुझ में नहीं है। तुम मनुष्य के आशीर्वाद के परे हो। इसलिए मैंने आज मन ही मन तुम्हें भगवान के श्रीचरणों में सौंप दिया है। वे तुम्हें अपना लें।”

इन्द्र को उन्होंने पहिचान लिया था। रोकते हुए भी इन्द्र ने उनके पैरों की धूलि सिर पर लेकर प्रणाम किया और रोते-रोते कहा, “जीजी, इस जंगल में तुम्हें अकेली छोड़ जाने को मेरा किसी तरह साहस नहीं होता। मन में न जाने क्यों, ऐसा लगता है कि मैं तुम्हें और न देख पाऊँगा!”

जीजी ने उनका कुछ जवाब नहीं दिया, सहसा मुँह फेरकर ऑंखें पोंछती हुईं वे उसी वन-पथ से अपनी शोक से ढँकी हुई उस शून्य कुटी में लौट गयीं। जहाँ तक दिखाई देती रहीं वहाँ तक मैं उनकी ओर देखता रहा। किन्तु उन्होंने एक बार भी लौटकर नहीं देखा-उसी तरह, मस्तक नीचा किये, एक ही भाव से चलती हुई वे दृष्टि से ओझल हो गयीं और तब, उन्होंने लौटकर क्यों नहीं देखा, इसे मन ही मन हम दोनों ही जनों ने अनुभव किया।

तीन दिन बाद स्कूल की छुट्टी होते ही बाहर आकर देखा कि इन्द्रनाथ फाटक के बाहर खड़ा है। उसका मुँह अत्यन्त शुष्क हो रहा था, पैरों में जूते नहीं थे और वे घुटनों तक धूल में भरे हुए थे। उस अत्यन्त दीन चेहरे को देखकर मैं भयभीत हो गया। वह बड़े आदमी का लड़का था और साधारणतया बाहर से कुछ शौकीन भी था। ऐसी अवस्था में मैंने उसको कभी नहीं देखा था और मैं समझता हूँ कि और किसी ने भी न देखा होगा। इशारा करके मुझे मैदान की ओर ले जाकर उसने कहा, “जीजी नहीं हैं। कहीं चली गयीं। मेरे मुँह की ओर उसने ऑंख उठाकर भी नहीं देखा। बोला, “कल से कितनी जगह जाकर मैं खोज आया हूँ, परन्तु कहीं वे नहीं दिखाई दीं। तेरे लिए वे एक चिट्ठी लिखकर रख गयी हैं; यह ले।” इतना कहकर एक मुड़ा हुआ पीला कागज मेरे हाथ में थमाकर वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाता हुआ दूसरी ओर चल दिया। जान पड़ा कि हृदय उसका इतना पीड़ित, इतना शोकातुर हो रहा था कि किसी के साथ आलोचना करना उसके लिए असाध्यक था।

उसी जगह मैं धम से बैठ गया और घड़ी खोलकर उस कागज को मैंने अपनी ऑंखों के सामने रखा। उसमें जो कुछ लिखा था, इतने समय बाद, यद्यपि वह सब याद नहीं रहा है फिर भी बहुत-सी बातें याद कर सकता हूँ- लिखा था, “श्रीकान्त, जाते समय मैं तुम लोगों को आशीर्वाद दिए जाती हूँ। केवल आज ही नहीं, जितने दिन जीऊँगी तुम्हें आशीर्वाद देती रहूँगी। किन्तु मेरे लिए तुम दु:ख मत करना। इन्द्रनाथ मुझे ढूँढ़ता फिरेगा, यह मैं जानती हूँ; किन्तु तुम उसे समझाकर रोकना। मेरी सब बातें तुम आज ही नहीं समझ सकोगे; किन्तु, बड़े होने पर एक दिन अवश्य समझोगे, इस आशा से यह पत्र लिखे जा रही हूँ। अपनी कहानी अपने ही मुँह से तुमसे कह जा सकती थी, परन्तु, न जाने क्यों, नहीं कह सकी; कहूँ-कहूँ सोचते हुए भी न जाने क्यों चुप रह गयी। परन्तु, यदि आज न कह सकी तो फिर कभी कहने का मौका न मिलेगा।

“मेरी कहानी सिर्फ मेरी कहानी ही नहीं है भाई- मेरे स्वामी की कहानी भी है। और फिर, वह भी कुछ अच्छी कहानी नहीं है। मेरे इस जन्म के पाप कितने हैं, सो तो मैं नहीं जानती; किन्तु पूर्व जन्म के संचित पापों की कोई सीमा-परिसीमा नहीं, इसमें जरा भी सन्देह नहीं। इसीलिए, जब-जब मैंने कहना चाहा है तब-तब मेरे मन में यही आया है कि स्त्री होकर, अपने मुँह से, पति की निन्दा करके, उस पाप के बोझ को और भी भाराक्रान्त नहीं करूँगी। किन्तु, अब वे परलोक चले गये। और परलोक चले गये इसलिए उसके कहने में कोई दोष नहीं है, यह मैं नहीं मानती। फिर भी, न जाने क्यों, अपनी इस अन्तविहीन दु:ख-कथा को तुम्हें जनाए बगैर, मैं किसी तरह भी विदा लेने में समर्थ नहीं हो रही हूँ।

“श्रीकान्त, तुम्हारी इस दु:खिनी जीजी का नाम अन्नदा है। पति का नाम क्यों छिपा रही हूँ, इसका कारण, इस लेख को, शेष पर्यन्त पढ़ने के बाद, मालूम होगा।

“मेरे पिता बड़े आदमी हैं। उनके कोई लड़का नहीं है। हम सिर्फ दो बहनें थीं। इसीलिए, मेरे पिता ने मेरे पति को एक दरिद्र के घर से लाकर, अपने पास रखकर, पढ़ा-लिखाकर 'आदमी' बनाना चाहा था। वे उन्हें पढ़ा-लिखा तो अवश्य सके, किन्तु 'आदमी' नहीं बना सके। मेरी बड़ी बहन विधवा होकर घर ही रहती थी- उसी की हत्या करके वे एक दिन लापता हो गये। यह दुष्ट कर्म उन्होंने क्यों किया, इसका हेतु, तुम अभी बच्चे हो, इसलिए न समझ सकोगे, फिर भी किसी दिन जान लोगे। पर कहो तो श्रीकान्त, यह दु:ख कितना बड़ा है? यह लज्जा कितनी मर्मान्तिक है? फिर भी तुम्हारी जीजी ने सब कुछ सह लिया। किन्तु पति बनकर जिस अपमान की अग्नि को उन्होंने अपनी स्त्री के हृदय में जला दिया था उस ज्वाला को तुम्हारी जीजी आज तक भी बुझा नहीं सकी। पर जाने दो उस बात को-

“उक्त घटना के सात वर्ष के बाद मैं उन्हें फिर देख पाई। जिस वेश में तुमनें उन्हें देखा था उसी वेश में वे हमारे घर के सामने साँप का खेल दिखा रहे थे। उन्हें और कोई तो नहीं पहिचान सका, किन्तु मैंने पहिचान लिया। मेरी ऑंखों को वे धोखा नहीं दे सके। सुना है कि यह दु:साहस उन्होंने मेरे लिए ही किया था। परन्तु यह झूठ है! फिर भी, एक दिन गहरी रात में, खिड़की का द्वार खोलकर मैंने पति के लिए ही गृह-त्याग कर दिया। किन्तु सबने यही सुना, यही जाना कि अन्नदा कुल को कलंक लगाकर घर से निकल गयी।

“यह कलंक का बोझा मुझे हमेशा ही अपने ऊपर लादे फिरना होगा। कोई उपाय नहीं है क्योंकि, पति के जीवित रहते तो अपने आपको प्रकट नहीं कर सकी-पिता को पहचानती थी; वे कभी, किसी तरह भी, अपनी संतान की हत्या करने वाले को क्षमा नहीं कर सकते। किन्तु आज यद्यपि वह भय नहीं है- आज जाकर यह सब हाल उनसे कह सकती हूँ, किन्तु इस पर, इतने दिनों बाद, कौन विश्वास करेगा? इसलिए पितृ-गृह में मेरे लिए अब कोई स्थान नहीं है। और फिर, अब मैं मुसलमानिन हूँ।

“यहाँ पर जो पति का कर्ज था वह सब चुक गया है। मैंने अपने पास सोने की दो बालियाँ छिपाकर रख छोड़ी थीं, उन्हें आज बेच दिया है। तुम जो पाँच रुपये एक दिन रख गये थे उन्हें मैंने खर्च नहीं किया। बड़े रास्ते के मोड़ पर जो मोदी की दुकान है, उसके मालिक के पास उन्हें रख दिया है- माँगते ही वे तुम्हें मिल जाँयगे। मन में दु:ख मत करना भइया! ये रुपये तो अवश्य मैंने लौटा दिए हैं, किन्तु तुम्हारे उस कच्चे कोमल छाटे-से हृदय को मैं अपने हृदय में रखे लिए जाती हूँ। और तुम्हारी जीजी का यह एक आदेश है श्रीकान्त, कि तुम लोग मेरी याद करके अपना मन खराब न करना। समझ लेना कि तुम्हारी जीजी जहाँ कहीं भी रहेगी अच्छी ही रहेगी। क्योंकि दु:ख सहन करते-करते उसकी यह दशा हो गयी है, कि उसके शरीर पर अब किसी भी दु:ख का असर नहीं होता। किसी तरह भी उसे व्यथा नहीं पहुँच सकती। मेरे दोनों भाइयों, तुम्हें मैं क्या कहकर आशीर्वाद दूँ, सो मैं ढूँढकर भी नहीं पा सकती हूँ। इसीलिए, केवल यही कहे जाती हूँ कि, भगवान-यदि पतिव्रता स्त्री की बात रखते हैं तो, वे तुम लोगों की मैत्री चिरकाल के लिए अक्षय करेंगे। -तुम्हारी जीजी, अन्नदा।”

 

Chapter 2


The feet did not rise, yet somehow, walking along the banks of the Ganges, reached home early in the morning with red eyes and very dry mouth. It was like a ceremony. "It came! It came!" By saying that everyone together is one self

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रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...