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❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 9 कलकत्ते के घाट पर जहाज जा भिड़ा देखा, जेटी के ऊपर बंकू खड़ा है। वह सीढ़ी से चटपट ऊपर चढ़ आया और जमीन पर सिर टेक प्रणाम करके बोला, “माँ रास्ते पर गाड़ी में राह देख रही हैं। आप नीचे जाइए, मैं सामान लेकर पीछे आता हूँ।”बाहर आते ही और भी एक आदमी झुककर पैर छूकर खड़ा हो गया। मैंने कहा, “अरे रतन कहो, अच्छे तो हो?”रतन कुछ हँसकर बोला, “आपके आशीर्वाद से। आइए।” यह कहकर उसने रास्ता दिखाते हुए गाड़ी के समीप लाकर दरवाजा खोल दिया। राजलक्ष्मी बोली, “आइए, और रतन, तुम लोग एक और गाड़ी करके पीछे से आ जाना दो बज रहे हैं, अभी तक इन्होंने नहाया-खाया भी नहीं, हम लोग डेरे पर चलते हैं। गाड़ी हाँकने को कह दे।”मैं गाड़ी पर बैठ गया। रतन ने 'जी, अच्छा' कहकर गाड़ी का दरवाजा बन्द कर दिया और गाड़ीवान को हाँकने के लिए इशारा कर दिया। राजलक्ष्मी ने झुककर पद-धूलि ली और कहा, “जहाज में कष्ट तो नहीं हुआ?”“नहीं।”“तबीयत बहुत खराब हो गयी थी क्या?”“तबीयत खराब तो जरूर हो गयी थी, परन्तु बहुत नहीं। किन्तु तुम भी तो स्वस्थ नहीं दीख पड़तीं। घर से कब आईं?”“परसों। अभया के द्वारा तुम्हारे आने की खबर पाते ही हम लोग घर से चल दिये। आना तो था ही, इसलिए दो दिन पहले ही चले आए। यहाँ पर तुम्हें कितना काम करना है, मालूम है?”मैं बोला, “काम की बात फिर होगी- किन्तु तुम ऐसी क्यों दिखाई दे रही हो? तुम्हें क्या हुआ था?”राजलक्ष्मी हँस दी। इस हँसी को देखकर ही आज खयाल आया कि न जाने कितने दिनों से यह हँसी नहीं देखी और साथ ही एक कितनी बड़ी अदम्य इच्छा को उस समय चुपचाप दमन कर डाला, सो उस अन्तर्यामी के सिवाय और किसी ने नहीं जाना। किन्तु, दीर्घ श्वास को मैं उससे छिपा नहीं सका। उसने विस्मित की तरह क्षण-भर तक मेरी तरफ ताकते रहकर फिर हँसकर पूछा, “कैसी दिख पड़ती हूँ मैं-बीमार?”एकाएक इस प्रश्न का उत्तर न दे सका। बीमार? हाँ, कुछ बीमार-सी जान पड़ती है। किन्तु नहीं, यह कुछ भी नहीं है। खयाल हुआ, मानो वह कितने ही देश-विदेश पैदल चलकर, तीर्थाटन करके, उसी समय लौट आई है- ऐसी मुरझाई-सी, ऐसी थकी-सी। अपना भार आप वहन करने की जैसे उसमें शक्ति ही नहीं है प्रवृत्ति भी नहीं है- इस समय वह केवल निश्चिन्त, निर्भय होकर ऑंखें मूँदकर सोने की जरा-सी जगह ढूँढ़ रही है। मुझे निरुत्तर देखकर बोली, “क्यों, कहते क्यों नहीं?”मैंने कहा, “मत कहलवाओ।”राजलक्ष्मी बच्चों की तरह जोर से सिर हिलाकर बोली, “नहीं, कहना ही होगा। लोग तो कहते हैं कि देखने में बिल्कु।ल बदसूरत हो गयी हूँ। यह सच है?”मैंने गम्भीर होकर कहा, “हाँ सच है।”राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, “तुम आदमी को इस कदर अप्रतिभ कर देते हो कि बस-अच्छा, इसमें बुरा क्या है? अच्छा ही तो है! सुन्दरता लेकर अब मैं करूँगी क्या? तुम्हारे साथ मेरा सुन्दर-असुन्दर का-अच्छी-बुरी दीख पड़ने का तो सम्बन्ध है नहीं, जो मैं इसकी चिन्ता में मर जाऊँ!”मैंने कहा, “सो तो ठीक है, चिन्ता में मरने का कोई कारण नहीं है। एक तो लोग यह बात तुमसे कहते नहीं, इसके सिवाय, यदि वे कहें भी तो तुम विश्वास करनेवाली नहीं। मन ही मन समझती तो हो कि...”राजलक्ष्मी गुस्से से बोल उठी, “तुम अन्तर्यामी जो हो कि सबके मन की बात जानते हो। मैं कभी यह बात नहीं सोचती। तुम खुद ही सच-सच कहो, जब वहाँ शिकार करने गये थे तब तुमने जैसा देखा था, अब भी क्या मैं वैसी रही हूँ? तब से तो कितनी बदसूरत हो गयी हूँ।”मैंने कहा, “नहीं, बल्कि तबसे अच्छी दीख पड़ती हो।”राजलक्ष्मी ने पल-भल में खिड़की के बाहर मुँह फेरकर अपना हँसता हुआ चेहरा शायद मेरी मुग्ध दृष्टि की ओर से हटा लिया और कोई उत्तर न देखकर चुप्पी साध ली। कुछ देर बाद परिहास के सब निशान अपने चेहरे पर से दूर करके उसने अपना चेहरा फिर इस ओर फेर लिया और पूछा, “तुम्हें क्या बुखार आ गया था? उस देश का हवा-पानी माफिक नहीं आता?”मैंने कहा, “न आवे तो उपाय ही क्या है? जैसे बने वैसे माफिक ही कर लेना पड़ता है।” मैं मन ही मन निश्चिन्त रूप से जानता था कि राजलक्ष्मी इस बात का क्या उत्तर देगी। क्योंकि, जिस देश का जल-वायु आज तक अपना नहीं हो सका, किसी सुदूर भविष्य में भी उसे अपने अनुकूल कर लेने की आशा के भरोसे वह किसी तरह भी मेरे लौट जाने पर सम्मत नहीं होगी, बल्कि घोर आपत्ति उठाकर रुकावट डालेगी-यही मेरा खयाल था। किन्तु, ऐसा नहीं हुआ। वह क्षण-भर मौन रहकर कोमल-स्वर से बोली, “सो सच है। इसके सिवाय, वहाँ पर और भी तो बहुत-से बंगाली रहते हैं। उन्हें जब माफिक आता है तब तुम्हें ही क्यों न माफिक आवेगा? क्या कहते हो?”मेरे स्वास्थ्य के सम्बन्ध में उसकी इस प्रकार की उद्वेगहीनता ने मुझे चोट पहुँचाई। इसीलिए, केवल एक इशारे-भर से 'हाँ' कहकर चुप हो गया। एक बात मैं बार-बार सोचता था कि अपनी प्लेग की कथा किस रूप में राजलक्ष्मी के कानों पर डालूँ। सुदूर प्रवास में जिस समय मेरे दिन जीवन-मृत्यु के सन्धि-स्थल में बीत रहे थे उस समय के हजारों तरह के दु:खों का वर्णन सुनते-सुनते उसके हृदय के भीतर कैसा तूफान उठेगा! दोनों नेत्रों को प्लावित करके कैसे ऑंसुओं की धारा बह निकलेगी। कह नहीं सकता कि इसे कितने रसों और कितने रंगों से भरकर मैं कल्पना के नेत्रों से दिन-प्रतिदिन देखता रहा हूँ। इस समय इसी कल्पना ने मुझे सबसे अधिक लज्जित किया; सोचा-छि:-छि: सौभाग्य से कोई किसी के मन की बात नहीं जानता। नहीं तो- परन्तु जाने दो उस बात को। मन ही मन कहा, और चाहे जो करूँ, अपनी उस मरने-जीने की कहानी इससे न कहूँगा।बहूबाजार के डेरे पर आ पहुँचा। राजलक्ष्मी ने हाथ दिखाकर कहा, “यह जीना है, तुम्हारा कमरा तीसरे मंजिल पर है। जरा जाकर सो रहो, मैं जाती हूँ।” यह कहकर वह अपने रसोई-घर की ओर चल दी।कमरे में घुसते ही देखा कि कमरा मेरे ही लिए सजाया गया है। प्यारी पटने के मकान से मेरी किताबें, और मेरा हुक्का तक लाना नहीं भूली है। सूर्यास्त का एक कीमती चित्र मुझे बहुत पसन्द था। वहाँ पर उसने उसे अपने कमरे में से निकालकर मेरे सोने के कमरे में टाँग दिया था। उस चित्र तक को वह कलकत्ते अपने साथ लाई है और ठीक उसी तरह उसी दीवाल पर टाँग दिया है। मेरे लिखने-पढ़ने का साज-सरंजाम, मेरे कपड़े, मेरी लाल मखमली चट्टियाँ, ठीक उसी तरह यत्नपूर्वक सजाकर रक्खी हुई हैं। वहाँ एक आराम-कुर्सी मैं सदा ही व्यवहार में लाता था। उसे शायद लाना सम्भव नहीं हुआ, इसीलिए, उसी तरह की एक नयी कुर्सी खिड़की के समीप रक्खी हुई है। धीरे-धीरे जाकर मैं उसी के ऊपर ऑंखें मूँदकर लेट गया। जान पड़ा, जैसे भाटे की नदी में ज्वार के जलोच्छ्वास का शब्द मुहाने के निकट फिर सुनाई दे रहा है।नहा-खाकर थकावट के मारे दिन-दोपहर को ही सो गया। नींद टूटते ही देखा-पश्चिम की ओर की खिड़की से शाम की धूप मेरे पैरों के समीप आकर पड़ रही है और प्यारी एक हाथ के बल मेरे मुँह पर झुकी हुई दूसरे हाथ से ऑंचल के छोर से सिर, कन्धे और छाती पर का पसीना पोंछ रही है। बोली, “पसीने से तकिये और बिछौने भीग गये हैं। पश्चिम की ओर खुला होने से यह कमरा बड़ा गरम है। कल दूसरे मंजिल पर अपने पास के कमरे में ही तुम्हारे बिस्तर कर दूँगी।” यह कहकर मेरी छाती के बिल्कुहल निकट बैठकर पंखा उठाकर हवा करने लगी। रतन ने कमरे में आकर पूछा, “माँ, बाबू के लिए चाय ले आऊँ?”“हाँ, ले आ। और बंकू यदि मकान में हो तो उसे जरा भेज देना।” मैंने फिर अपनी ऑंखें बन्द कर लीं। थोड़ी ही देर बाद बाहर से चट्टियों की आवाज सुन पड़ी। प्यारी ने पुकारकर कहा, “कौन, बंकू? “जरा इधर तो आ।”उसके पैरों के शब्द से मालूम हुआ कि उसने अतिशय संकुचित भाव से अन्दर प्रवेश किया है। प्यारी उसी तरह पंखा झलते बोली, “जरा कागज-पेन्सिल लेकर बैठ जा। क्या-क्या लाना है, उसकी फेहरिस्त बनाकर दरबान के साथ जरा बाजार जा बेटा, घर में कुछ है नहीं।”मैंने देखा, यह एक बिल्कु'ल नया वाकया है। बीमारी की बात अलहदा पर उसे छोड़कर इसके पहले किसी दिन मेरे बिछौने के इतने समीप बैठकर उसने हवा तक नहीं की थी। किन्तु यह भी, न हो तो, मैं एक दिन सम्भव मान सकता। किन्तु, यह जो उसने रंच-मात्र भी दुविधा नहीं की, सब नौकर-चाकरों के, यहाँ तक कि बंकू के सामने भी दर्प के साथ अपने आपको प्रकट कर दिया- इसके अपूर्व सौन्दर्य ने मुझे अभिभूत कर डाला। मुझे उस दिन की बात याद आ गयी जिस दिन पटने के मकान से मुझे इसलिए बिदा लेनी पड़ी थी कि यह बंकू ही कुछ और खयाल न करने लगे। उस दिन के साथ आज के आचरण में कितना अन्तर है।चीज-बस्त की फेहरिस्त बनाकर बंकू चला गया। रतन भी चाय-तमाखू देकर नीचे चला गया। प्यारी कुछ देर चुपचाप मेरे मुँह की ओर निहारती रही; फिर एकाएक बोली, “तुमसे मैं एक बात पूछती हूँ- अच्छा, रोहिणी बाबू और अभया में से किसका प्यार अधिक है, बता सकते हो?”मैंने हँसकर कहा, “जो तुम पर पूरी तरह हावी हो गयी है, निश्चय से उस अभया का ही प्यार अधिक है।”राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी, बोली, “यह तुमने कैसे जाना कि वह मुझ पर हावी हो गयी है?”मैंने कहा, “चाहे जैसे जाना हो, पर बात सच है या नहीं, यह बताओ?”राजलक्ष्मी क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, “सो जैसे भी हो, किन्तु, अधिक प्यार तो रोहिणी बाबू ही करते हैं। दरअसल वे इतना प्यार करते थे, इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा दु:ख अपने सिर पर उठा लिया। अन्यथा यह उनका कोई अवश्य कर्त्तव्य तो था नहीं। उनकी अभया को कितना सा स्वार्थ-त्याग करना पड़ा?”उसके सवाल को सुनकर मैं सचमुच ही विस्मित हो गया। मैं बोला, बल्कि मैं तो ठीक इससे उलटा देखता हूँ। और उस हिसाब से जो कुछ कठिन दु:ख-भोग और त्याग है, वह सब अभया को ही करना पड़ा है। तुम इस अभ्रान्त सत्य को क्यों भूली जाती हो कि रोहिणी बाबू चाहे जो करें, समाज की नजरों में आखिर वे मर्द हैं।राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, “मैं कुछ भी नहीं भूलती। उन्हें मर्द बतलाकर सहज में बच निकलने के जिस मौके की ओर तुम इशारा कर रहे हो वह अत्यन्त क्षुद्र और अधम पुरुषों के लिए है- रोहिणी बाबू सरीखे मनुष्य के लिए नहीं। शौक पूरा हो गया, अथवा कुछ सार न रहा, तो छोड़-छाड़कर फेंककर भाग सकते हैं और घर लौटकर फिर गण्य-मान्य भद्र मनुष्यों की तरह जीवन-यात्रा कर सकते हैं- यही न कहते हो? कर सकते हैं-ठीक है; किन्तु, क्या सभी कर सकते हैं? तुम कर सकते हो? तब, जो नहीं कर सकता उसके बोझ के वजन को तो जरा सोच देखो। उसे अपना निन्दित जीवन मकान के निराले कोने में काट डालने का भी सुभीता नहीं। उसे तो संसार के बीच द्वन्द्व-युद्ध में उतर आना होगा, अविचार और अपयश का बोझा चुपचाप अकेले ही वहन करना पड़ेगा। अपने एकान्त-स्नेह की पात्री को- भावी सन्तान की जननी को समाज के सारे अपमानों और अकल्याणों से बचाकर रखना होगा। तुम क्या इसे मामूली कष्ट समझते हो? और, सबसे बढ़कर दु:ख यह है कि जो अनायास ही इस दु:ख के बोझे को उतारकर खिसक सकता है, सर्वनाशी विकट प्रलोभन से अपने आपको रात-दिन बचाकर चलने का गुरुभार भी उसको ही लिये घूमना पड़ता है। दु:ख के तराजू में इस आत्मोत्सर्ग के साथ समतौलता बनाए रखने के लिए जिस प्रेम की जरूरत है, उसे यदि पुरुष अपने भीतर से बाहर न प्रकट कर सके, तो किसी भी स्त्री के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह उसे पूरा कर सके।”इस बात को इस पहलू से, इस तरह, कभी सोचकर नहीं देखा था। रोहिणी का वह सीधा-सादा गुमसुम भाव और उसके बाद, अभया जब अपने पति के घर चली गयी तब उसके उसी शान्त मुखमण्डल के ऊपर अपरिसीम वेदना को चुपचाप सहन करने का जो चित्र मैंने अपनी ऑंखों देखा था, वही पल-भर में ज्यों का त्यों, प्रत्येक रेखा सहित मेरे मन में खिंच गया। किन्तु, मुँह से मैंने कहा, “चिट्ठी में तो तुमने सिर्फ अभया के लिए ही पुष्पांजलि भेजी थी।”राजलक्ष्मी बोली, “उनका जो प्राप्त है वह आज भी उन्हें ही देती हूँ। क्योंकि, मेरा विश्वास है कि जो भी पाप या अपराध था उसने उनके आन्तरिक तेज से जलकर उन्हें शुद्ध-निर्मल कर दिया है। यदि ऐसा न होता, तो आज वे बिल्कुकल साधारण स्त्रियों के समान ही तुच्छ-हीन हो जाती।”“हीन क्यों?”राजलक्ष्मी ने कहा, “खूब! पति-परित्याग के पाप की भी कोई सीमा है? उस पाप को ध्वंहस करने योग्य आग उनमें न होती तो आज वे...”मैंने कहा, “आग की बात जाने दो। किन्तु उनका पति कैसा नष्ट है, सो तो एक दफे सोच देखो।”राजलक्ष्मी बोली, “पुरुष जाति चिरकाल से ही उच्छृंखल रही है- चिरकाल से ही कुछ-कुछ अत्याचारी भी रही है; किन्तु, इसीलिए तो स्त्री के पक्ष में भाग खड़े होने की युक्ति काम नहीं दे सकती। स्त्री-जाति को सहन करना ही होगा; नहीं तो संसार नहीं चल सकता।”बात सुनकर मेरे सारे विचार गड़बड़ा गये। मन ही मन बोला, “यह स्त्रियों का वही सनातन दासत्व का संस्कार है! कुछ असहिष्णु होकर पूछा, “तो फिर अभी तक तुम 'आग आग, क्या बक रही थीं?”राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “क्या बक रही थी, सुनोगे? आज ही दो घण्टे पहले पटने के ठिकाने पर लिखी हुई अभया की चिट्ठी मिली है। आग क्या है, जानते हो? उस दिन 'प्लेग' कहकर जब तुम उनकी तुरंत की जमाई गिरस्ती के द्वार पर जा खड़े हुए तब जिस वस्तु ने तुम्हें निर्भयता से बिना किसी सोच-विचार के भीतर बुला लिया, मैं उसी को कहती हूँ उनकी 'आग'। उस समय उन्हें अपने सुख का खयाल नहीं था। जो तेज मनुष्य को कर्त्तव्य समझकर सामने की ओर ही ढकेलता है, दुविधा से पीछे नहीं हटने देता, अब तक मैं उसी को 'आग-आग' कह रही थी। आग का एक नाम 'सर्वभुक्' है, सो क्या तुम नहीं जानते? वह सुख और दु:ख- दोनों को खींच लेती है, उसे किसी तरह का भेद-विचार नहीं होता। उन्होंने एक और बात क्या लिखी है, जानते हो? वे रोहिणी बाबू को सार्थक कर देना चाहती हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि केवल अपने जीवन की सार्थकता के भीतर से ही संसार में दूसरे के जीवन में सार्थकता पहुँचाई जा सकती है; और व्यर्थता से सिर्फ अकेला ही जीवन व्यर्थ नहीं होता- वह अपने साथ और भी अनेक जीवनों को जुदा-जुदा दिशाओं से व्यर्थ करके व्यर्थ हो जाता है। बिल्कुनल सच है न?” इतना कहकर वह एकाएक श्वास छोड़कर चुप हो रही। इसके बाद हम दोनों ही बहुत देर तक मौन रहे। जान पड़ता है, कहने को कुछ न होने के कारण ही अब वह मेरे सिर के रूखे बालों को अपनी अंगुलियों से व्यर्थ ही इधर-उधर विपर्यस्त करने लगी। उसका यह आचरण भी बिल्कु'ल नया था। सहसा बोली, “वे खूब शिक्षिता हैं न? नहीं तो, इतनी तेजस्विता नहीं होती।”मैंने कहा, “हाँ, दरअसल वे एक शिक्षिता रमणी हैं।”राजलक्ष्मी बोली, “किन्तु, एक बात उन्होंने मुझसे छिपाई है। माँ होने के लोभ को वे चिट्ठी के अन्दर बार-बार दबा गयी हैं।”मैंने कहा, “क्या उन्हें यह लोभ है? कहाँ, मैं तो नहीं सुना?”राजलक्ष्मी बोल उठी, “जाओ,- यह लोभ भला किस स्त्री को नहीं है? किन्तु क्या इसलिए उसे मर्दों से कहते फिरना चाहिए? तुम तो खूब हो!” मैंने कहा, “तो फिर तुम्हें भी है, क्या?”“जाओ!” कहकर वह अकस्मात् लज्जा से लाल हो गयी और दूसरे ही क्षण अपने आरक्त मुख को छिपाने के लिए बिछौने पर झुक गयी। उसी समय अस्तोन्मुख सूर्य की किरणों ने पश्चिम की खुली हुई खिड़की से प्रवेश किया था। वह आरक्त आभा उसके मेघ के समान काले केशों पर विचित्र शोभा के साथ बिखर गयी। और, कानों के हीरे के दोनों लटकनों में नाना वर्णों की द्युति झिलमिल करती हुई खेलने लगी। क्षण-भर बाद ही अपने आपको सँभालकर और सीधे बैठकर उसने कहा, “क्यों, क्या मेरे लड़के-बच्चे नहीं हैं जो लोभ होगा, लड़कियों का ब्याह कर चुकी हूँ, लड़के को ब्याहने आई हूँ,- एक-दो नाती-पोते हो जाँयगे, उनको लेकर सुख-स्वच्छता से रहूँगी,- मुझे अभाव किस बात का है?”मैं चुप हो रहा। इस बात को लेकर बहस करने की प्रवृत्ति नहीं हुई।रात को राजलक्ष्मी ने कहा, “बंकू के ब्याह के लिए तो अब भी दस-बारह दिन की देर है; चलो न काशी चलें, तुम्हें अपने गुरुजी को दिखा लाऊँ।”मैंने हँसकर कहा, “मैं क्या कोई नुमाइशी चीज हूँ?”राजलक्ष्मी ने कहा, “यह सोचने का भार जो लोग देखते उन पर है, तुम पर नहीं।”मैंने कहा, “ऐसे ही सही, परन्तु, इससे मुझे ही क्या लाभ और तुम्हारे गुरुदेव को भी क्या लाभ होगा?”राजलक्ष्मी ने गम्भीर होकर कहा, “लाभ तुम लोगों को नहीं है, किन्तु मुझे है न हो, तो केवल मेरे लिए ही चले चलो।”इसलिए मैं राजी हो गया। आगे बहुत समय तक लग्न न थी, इसीलिए उस समय जैसे चारों ओर से विवाहों की बाढ़ आ गयी थी। जब तक बैण्ड का कार्नेट और बैग-पाइप की बाँसुरी विविध तरह के वाद्य-भाडों के सहयोग से मनुष्य को पागल बना डालने की तजवीज कर रही थी। हम लोगों की स्टेशन-यात्रा के समय भी इस तरह की कुछ उत्तम आवाजों की झड़ प्रचण्ड वेग से बह गयी। वेग के कुछ कम हो जाने पर राजलक्ष्मी ने सहसा प्रश्न किया, अच्छा, तुम्हारे मत से यदि सभी लोग चलने लगें, तो फिर गरीबों का विवाह ही न हो और घर-गिरस्ती भी न बने। तब फिर सृष्टि कैसे रहे?”उसकी असाधारण गम्भीरता देखकर मैं हँस पड़ा। बोला, “सृष्टि-रक्षा के लिए चिन्ता करने की तुम्हें जरा भी जरूरत नहीं। क्योंकि हमारी तरह चलने वाले लोग दुनिया में अधिक नहीं हैं। कम से कम अपने इस देश में तो नहीं है; यह कहा जा सकता है।”राजलक्ष्मी ने कहा, “न रहना ही भला है। केवल बड़े आदमी ही मनुष्य हैं? और क्या गरीब बेचारे संसार में कहीं से बह आए हैं? बाल-बच्चों को लेकर घर-गिरस्ती करने की साध क्या उन्हें नहीं होती?” मैंने कहा, “पर इसका क्या यह अर्थ है कि साध होती है इसलिए उसे प्रश्रय देना ही चाहिए?”राजलक्ष्मी ने पूछा “क्या नहीं मुझे समझा दो।”कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “सभी दरिद्रों के सम्बन्ध में मेरा यह मत नहीं है। मेरा मत केवल दरिद्र भले आदमियों के सम्बन्ध में है और मेरा विश्वास है कि तुम उसका कारण भी जानती हो।”राजलक्ष्मी ने जिद के स्वर में कहा, “तुम्हारा यह मत गलत है।”मुझ पर भी मानो जिद सवार हो गयी, मैंने कह डाला, “हजार गलत होने पर भी कम से कम तुम्हारे मुँह से तो यह बात शोभा नहीं देती। बंकू के बाप ने सिर्फ बहत्तर रुपयों के लोभ से दोनों बहिनों को व्याह लिया था,- वह दिन अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि भूल गयी होओ। खैर मनाओ कि उस आदमी का पेशा ही यही था। नहीं तो, कल्पना करो, यदि वह तुम्हें अपने घर ले जाता, तुम्हारे दो-चार बाल-बच्चे हो जाते-तब एक दफे सोच देखो कि तुम्हारी क्या दशा होती?”राजलक्ष्मी की ऑंखों में जैसे झगड़ने का भाव घना हो उठा; बोली, “भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी देख-भाल भी कर करते हैं। तुम नास्तिक हो, इसीलिए विश्वास नहीं करते।”मैंने भी जवाब दिया, “मैं नास्तिक होऊँ चाहे जो होऊँ परन्तु आस्तिक लोगों को भगवान की जरूरत क्या केवल इसीलिए है?- इन सब बच्चों को आदमी बनाने के लिए?”राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध कण्ठ से कहा, “भले ही वे न बनावें। किन्तु मैं तुम्हारी तरह डरपोक नहीं हूँ। मैं द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर भी उन्हें आदमी बनाती। और जो भी हो, नाचने-गाने वाली बनने की अपेक्षा वह मेरे हक में बहुत अच्छा होता?”मैंने फिर और तर्क नहीं किया। आलोचना बिल्कुेल ही व्यक्तिगत और अप्रिय ढंग पर उतर आई थी, इसलिए, मैं खिड़की के बाहर रास्ते की ओर देखता हुआ बैठा रहा।हमारी गाड़ी धीरे-धीरे सरकारी और गैर सरकारी ऑफिस क्वार्टर्स छोड़कर बहुत दूर आ पड़ी। शनिवार का दिन है, दो बजे के बाद अधिकांश दफ्तरों के क्लर्क छुट्टी पाकर ढाई की ट्रेन पकड़ने के लिए तेजी से चले आ रहे हैं। प्राय: सभी के हाथों में कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री है। किसी के हाथ में एक-दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ, किसी के रूमाल में बकरे का मांस, किसी के हाथ में गँवई-गाँव में नहीं मिलने वाली हरी तरकारियाँ और फल। सात दिनों के बाद घर पहुँचकर उत्सुक बाल-बच्चों के मुँह पर जरा-सी आनन्द की हँसी देखने के लिए करीब-करीब सभी अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार थोड़ी-बहुत मिठाई चादर के छोर में बाँधकर भागे जा रहे हैं। प्रत्येक के मुँह पर आनन्द और ट्रेन पकड़ने की उत्कण्ठा एक साथ इस तरह परिस्फुटित हो उठी है कि राजलक्ष्मी ने मेरा हाथ खींचकर अत्यन्त कुतूहल के साथ पूछा, “हाँ जी, ये सब लोग इस तरह स्टेशन की ओर क्यों भाग रहे हैं? आज क्या है?”मैंने घूमकर कहा, “आज शनिवार है। ये सब दफ्तरों के क्लर्क हैं, रविवार की छुट्टी में घर जा रहे हैं।”राजलक्ष्मी ने गर्दन हिलाकर कहा, “हाँ यही मालूम होता है। और देखो सब एक न एक खाने की चीज लिये जाते हैं। गँवई-गाँव में तो यह सब मिलता नहीं, इसलिए मालूम होता है, बाल-बच्चों को हाथ में देने के लिये खरीदे लिए जाते हैं, क्यों न?”मैंने कहा, “हाँ।”उसकी कल्पना तेजी से दौड़ने लगी। इसीलिए, उसने उसी क्षण कहा “आ:, लड़के-लड़कियों में आज कितना उत्साह होगा। कोलाहल मचाएँगे, गले से लिपटकर बाप की गोद में चढ़ने की चेष्टा करेंगे, माँ को खबर देने रसोईघर में दौड़ जाँयगे, घर-घर में आज मानो एक काण्ड-सा मच जायेगा। क्यों न?” कहते-कहते उसका सारा मुँह उज्ज्वल हो उठा।मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “खूब सम्भव है।”राजलक्ष्मी ने गाड़ी की खिड़की में से और भी कुछ देर उनकी तरफ निहारते रहकर एकाएक एक गहरी नि:श्वास छोड़ दी और कहा, “हाँ जी, उनकी तनखा कितना होगी?”मैंने कहा, “क्लर्कों की तनख्वाह और कितनी होती है,- यही बीस-पच्चीस तीस रुपये।राजलक्ष्मी ने कहा- “किन्तु, घर तो इनके माँ है, भाई-बहिन हैं, स्त्री हैं, लड़के-बच्चे हैं।”मैंने इतना और जोड़ दिया, “दो-एक विधवा बहिनें हैं: शादी-ब्याह, क्रिया-कर्म, लोक-व्यवहार, भलमंसी है; कलकत्ते का भोजन-खर्च है, लगातार रोगों का खर्चं है,-बंगाली क्लर्क-जीवन का सब कुछ इन्हीं तीस रुपयों पर निर्भर रहता है।”राजलक्ष्मी की मानो साँस ही अटकने लगी। वह बहुत व्याकुल होकर बोल उठी,“तुम नहीं जानते। इन लोगों के घर जमीन-जायदाद भी है, निश्चय से है।”उसका मुँह देखकर निराश करते हुए मुझे वेदना हुई, फिर भी, मैंने कहा, “मैं इन लोगों की घर-गिरस्ती का इतिहास खूब घनिष्ठता से जानता हूँ। मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि इनमें से चौदह आने लोगों के पास कुछ भी नहीं है। यदि नौकरी चली जाय तो या तो इन्हें भिक्षावृत्ति करनी होगी या फिर पूरे परिवार के साथ उपवास करना होगा। इन लोगों के लड़के-लड़कियों की कहानी सुनोगी?”राजलक्ष्मी अकस्मात् दोनों हाथ उठाकर चिल्ला उठी, “नहीं-नहीं, नहीं सुनूँगी,- मैं नहीं सुनना चाहती।”यह बात मैं उसकी ऑंखों की ओर निहारते ही जान गया कि उसने प्राणपण से ऑंसुओं को रोक रक्खा है। इसीलिए मैंने और कुछ न कहकर फिर रास्ते की ओर मुँह मोड़ लिया। बहुत देर तक उसकी कोई आहट नहीं मिली। इतनी देर, शायद, अपने आपसे वकालत करके और अन्त में अपने कुतूहल के निकट ही पराजय मानकर उसने मेरे कोट का खूँट पकड़कर खींचा और पलटकर देखते ही करुण कण्ठ से कहा, “अच्छा तो, कहो उनके लड़के-लड़कियों की कहानी। किन्तु तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, झूठ-मूठ बढ़ाकर मत कहना। दुहाई है तुम्हारी!”उसकी मिन्नत करने की भाव-भंगीमा देखकर हँसी तो छूटी, किन्तु, हँसा नहीं। बल्कि कुछ अतिरिक्त गम्भीरता से बोला, “बढ़ाकर कहना तो दूर, तुम्हारे पूछने पर भी मैं नहीं सुनाता, यदि तुमने अभी कुछ ही पहले अपने सम्बन्ध में भीख माँगकर बच्चों को आदमी बनाने की बात न कही होती। भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी सुव्यवस्था का भार भी वे लेते हैं, यह बात अवश्य है। इसे अस्वीकार करूँ तो शायद नास्तिक कहकर फिर भला-बुरा कहोगी; किन्तु सन्तान की जवाबदारी बाप के ऊपर कितनी है और भगवान के ऊपर कितनी है, इन दो समस्याओं की मीमांसा तुम खुद ही करो। मैं जो जानता हूँ केवल वही कहूँगा,- है न ठीक?”यह देखकर कि वह चुपचाप मेरी ओर जिज्ञासु-मुख से निहार रही है, मैंने कहा, “बच्चा पैदा होने पर उसे कुछ दिन छाती का दूध पिलाकर जिलाए रखने का भार, मैं समझता हूँ, उसकी माँ के ऊपर है। भगवान के ऊपर अचल भक्ति है, उनकी दया पर भी मुझे अन्धविश्वास है, किन्तु फिर भी, माँ के बदले इस भार को खुद अपने ऊपर लेने का उपाय उनके पास है कि नहीं,...”राजलक्ष्मी नाराज होकर हँस पड़ी और बोली, “देखो चतुराई रहने दो- यह मैं भी जानती हूँ।”“जानती हो? तब जाने दो, एक जटिल समस्या की मीमांसा हो गयी। किन्तु, तीस रुपये के घर की जननी के दूध का स्रोत सूख जाने में देर क्यों नहीं लगती, यह जानना हो तो किसी तीस रुपये मासिक के घर की जच्चा के आहार के समय उपस्थित रहना आवश्यक होगा। किन्तु, तुमसे जब यह नहीं हो सकता तब इस विषय में न हो तो मेरी बात मान लो।”राजलक्ष्मी मलीन मुख किये चुपचाप मेरी ओर ताकती रही।मैं बोला, “देहात में गो-दुग्ध का बिल्कुसल अभाव है, यह बात भी तुम्हें मान लेनी होगी।”राजलक्ष्मी ने चट से कहा, “सो तो मैं खुद भी जानती हूँ। घर में गाय हो तब तो ठीक, नहीं तो, आजकल सिर पटककर मर जाने पर भी किसी गाँव में एक बूँद दूध पाना कठिन है ढोर ही नहीं हैं, दूध कहाँ से हो?”मैंने कहा, “खैर और भी एक समस्या का समाधान हो गया। तब फिर बच्चों के भाग में रहा खालिस स्वदेशी ताल-तलैयों का जल और विदेशी डब्बों का खालिस बार्ली (जौ) का चूरा। अभागियों के भाग्य में अक्सर उनका स्वाभाविक खाद्य,- थोड़ा- बहुत माता का दूध भी, जुटा सकता है, किन्तु वह सौभाग्य भी इन सब घरों में अधिक दिनों तक टिकने का नियम नहीं। क्योंकि चारेक महीने के भीतर ही और एक नूतन आगन्तुक अपने आविर्भाव का नोटिस देकर अपने भाई के दूध का हक एकदम बन्द कर देता है। यह शायद तुम...”राजलक्ष्मी लज्जा के मारे लाल होकर बोल उठी, “हाँ हाँ, जानती हूँ, जानती हूँ। मुझे व्याख्या करके समझाने की जरूरत नहीं। तुम इसके बाद की बात कहो।”मैंने कहा, “इसके बाद धर दबाता है बच्चे को पेट का दर्द और स्वदेशी मलेरिया बुखार। तब बाप का कर्तव्य होता है विदेशी कुनैन और बार्ली का चूरा जुटाना। और माँ के सिर पर पड़ता है, जैसा कि मैंने पहले कहा, प्रसूतिगृह में पुन: भर्ती होने के बीच के समय की फुरसत में इन सबको खालिस देशी जल में घोलकर पिलाने का काम! इसके बाद यथासमय सूतिका-गृह का झगड़ा मिटने पर नवजात शिशु को गोद में लेकर बाहर आना और पहले बच्चे के लिए कुछ दिन तक रोना।”राजलक्ष्मी नीली पड़कर बोली, “रोना क्यों?”मैंने कहा, “अरे, यह तो माता का स्वभाव है! और ऐसा स्वभाव जो क्लर्क के घर में भी अन्यथा नहीं हो सकता जब कि भगवान दायित्व से मुक्त करने के लिए उस पहले बच्चे को अपने श्रीचरणों में बुला लेते हैं।”इतनी देर बाहर की ओर ताकते रहकर ही बातें कर रहा था। अकस्मात् नजर घुमाकर देखा कि उसकी बड़ी-बड़ी ऑंखें अश्रु-जल में तैर रही हैं। मुझे अत्यन्त दु:ख मालूम हुआ। सोचा, इस बेचारी को व्यर्थ दु:ख देने से क्या लाभ? अधिकांश धनियों के समान जगत के इस विराट दु:ख की बाजू यदि इसके लिए भी अगोचर बनी रहती तो क्या हर्ज था! भयंकर दरिद्रता से पीड़ित बंगाल के क्षुद्र नौकरपेशा गृहस्थ-परिवार केवल अन्न के अभाव से ही, मलेरिया हैजा आदि के बहाने, दिन पर दिन शून्य होते जा रहे हैं,- यह बात अन्य बहुत-से बड़े आदमियों की तरह, न होता, यह भी न जानती। इससे क्या ऐसी कोई बड़ी भारी हानि हो जाती!ठीक ऐसे ही समय राजलक्ष्मी ऑंखें पोंछते-पोंछते अवरुद्ध कण्ठ से बोल उठी, “भले ही क्लर्क हों, फिर भी वे तुमसे कई दर्जे अच्छे हैं। तुम तो पत्थर हो! तुम्हें स्वयं कोई दु:ख नहीं है, इसीलिए इन लोगों के दु:ख कष्ट इस तरह आह्लाद के साथ वर्णन कर रहे हो। किन्तु मेरा तो हृदय फटा जाता है।”यह कहकर वह ऑंचल से बार-बार ऑंखें पोंछने लगी। इसका मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि, इससे कोई लाभ न होता। बल्कि नम्रता के साथ कहा, “इन लोगों के सुख का हिस्सा भी तो मेरे भाग्य में नहीं है। घर पहुँचने की उनकी उत्सुकता भी तो एक सोचने-देखने की चीज है।”राजलक्ष्मी का मुँह हँसी और ऑंसुओं से एक साथ दीप्त हो उठा। वह बोली, “मैं भी तो यही कहती हूँ। आज पिता आ रहे हैं, इसलिए सारे बाल-बच्चे रास्ता देख रहे हैं। उन्हें कष्ट किस बात का है? उन लोगों की तनखा शायद कम हो, किन्तु वैसी बाबूगिरी भी तो नहीं है। किन्तु फिर भी क्या पचीस-तीस ही रुपया?-इतना कम? कभी नहीं। कम से कम सौ-डेढ़ सौ रुपये तो होंगे, मैं निश्चय से कहता हूँ।”मैंने कहा, “हो भी सकता है। मैं शायद ठीक-ठीक नहीं जानता।”उत्साह पाकर राजलक्ष्मी का लोभ बढ़ गया। अतिशय क्षुद्र क्लर्क के लिए भी डेढ़ सौ रुपया महीना उसे नहीं जँचा। बोली, “क्या तुम समझते हो कि केवल उसी मासिक पर ही उनका सारा दारोमदार है? ऊपर से भी तो कितना ही पा जाते हैं।”मैंने कहा, “ऊपर से? प्याला?”अब उसने कुछ नहीं कहा। वह मुँह भारी करके रास्ते की ओर ताकती हुई बैठी रही। कुछ देर बाद बाहर की ओर दृष्टि रक्खे हुए ही उसने कहा, “तुम्हें जितना ही देखती हूँ तुम्हारे ऊपर से मेरा मन उतना ही हटता जाता है। तुम जानते हो कि तुम्हें छोड़कर मेरी ओर कोई गति नहीं है, इसीलिए तुम मुझे इस कदर छेदते हो!इतने दिनों बाद, आज शायद पहले ही पहल मैंने उसके दोनों हाथ जोर से अपनी ओर खींच लिये और उसके मुँह की ओर देखकर मानो कुछ कहना भी चाहा; किन्तु इतने में ही गाड़ी स्टेशन के समीप आकर खड़ी हो गयी। एक स्वतन्त्र डिब्बा रिजर्व कर लिया गया था, फिर भी, बंकू कुछ सामान लेकर दोपहर के पहले ही आ गया था। कोचबाक्स पर रतन को देखते ही वह दौड़ आया। मैं हाथ छोड़कर सीधा बैठ गया। जो बात मुँह पर आ गयी थी। वह चुपचाप अन्दर में जाकर छिप गयीं।ढाई बजे की लोकल ट्रेन छूटने ही को थी। हमारी ट्रेन उसके बाद जाती थी। इसी समय एक प्रौढ़ अवस्था का दरिद्र भला आदमी एक हाथ में तरह-तरह की हरी तरकारियों की पोटली और दूसरे हाथ में डण्डी पर बैठा हुआ एक मिट्टी का पक्षी लिये, केवल प्लेटफार्म पर लक्ष्य रक्खे और सब दिशाओं के ज्ञान से शून्य होकर दौड़ता हुआ राजलक्ष्मी के ऊपर आ पड़ा। मिट्टी का खिलौना नीचे गिरकर चूर हो गया। वह हाय-हाय करके शायद उसे बटोरने जा रहा था कि पाण्डेजी ने हुँकार मारकर एक छलाँग में उसकी गर्दन धर दबाई और बंकू छड़ी उठाकर 'अन्धे' आदि कहकर मारने को तैयार हो गया। मैं कुछ दूरी पर अन्यमनस्क-सा खड़ा था,-घबड़ाकर रंगभूमि पर आ गया। वह बेचारा भय और शर्म के मारे बार-बार कहने लगा, “देख नहीं पाया माँ, मुझसे बड़ा कसूर हो गया...”मैंने उसे चटपट छुड़ा दिया और कहा, “जो होना था सो हो गया, आप शीघ्र जाइए, आपकी गाड़ी छूट रही है।”उस बेचारे ने फिर भी अपने खिलौने के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए कुछ देर इधर-उधर किया और अन्त में दौड़ लगा दी। किन्तु अधिक दूर नहीं जाना पड़ा, गाड़ी चल दी। तब लौटकर फिर उसने एक दफा क्षमा माँगी और वह उन टूटे टुकड़ों को बटोरने में प्रवृत्त हो गया। यह देखकर मैंने जरा हँसकर कहा, “इससे अब क्या होगा?”उसने कहा, “कुछ नहीं महाशय, लड़की बीमार है। पिछले सोमवार को घर से आते समय उसने कह दिया था- “मेरे लिए एक खिलौना खरीद लाना।” खरीदने गया तो बच्चू ने गरज समझकर दाम हाँके, “दो आने-एक पैसा भी कम नहीं। खैर वही सही। रामराम करके किसी तरह पूरे आठ पैसे फेंककर ले आया। किन्तु देखिए दुर्भाग्य की बात कि ऐन मौके पर फूट गया, रोगी लड़की के हाथ में न दे सका। बिटिया रोकर कहेगी, “बाबा, लाए नहीं!” कुछ भी हो, टुकड़े ही ले जाऊँ, दिखाकर कहूँगा, बेटी, इस महीने की तनखा पाने पर पहले तेरा खिलौना खरीदूँगा, तब और काम करूँगा।”इतना कहकर सारे टुकड़े बटोरकर और चादर के छोर में बाँधकर कहने लगा, “आपकी स्त्री को शायद बहुत चोट लग गयी है, मैंने देखा नहीं- नुकसान का नुकसान हुआ और गाड़ी भी नहीं मिली। मिल जाती तो रोगी बिटिया को आधा घण्टे पहले पहुँचकर देख लेता।” कहते-कहते वह फिर प्लेटफार्म की ओर चल दिया। बंग पाण्डेजी को लेकर किसी काम से कहीं अन्यत्र चला गया था। मैंने एकाएक पीछे की ओर घूमकर देखा, राजलक्ष्मी की ऑंखों से सावन की धारा की तरह ऑंसू बह रहे हैं। व्यस्त होकर निकट जाकर पूछा, “ज्यादा चोट आ गयी क्या? कहाँ लगी है?”राजलक्ष्मी ने ऑंचल से ऑंख पोंछकर कहा, “हाँ, बहुत चोट लगी है- परन्तु लगी है ऐसी जगह कि तुम जैसे पत्थर न उसे देख उसे देख सकते हैं और न समझ सकते हैं!”♦♦ • ♦♦श्रीमान् बंकू को बाध्ये होकर हमारे लिए स्वतन्त्र डब्बा क्यों रिज़र्व करना पड़ा उनसे जब मैं इस बात की पूछताछ कर रहा था तब राजलक्ष्मी कान लगाकर सुन रही थी। इस समय उनके जरा अन्यत्र जाते ही राजलक्ष्मी ने बिल्कुकल ही गले पड़कर मुझे सुना दिया कि अपने लिए फिजूल के खर्च करना वह जितना ही नापसन्द करती है उसके भाग्य से उतनी ही ये सब विडम्बनाएँ उपस्थित हो जाती हैं। वह बोली- “यदि उन लोगों की तृप्ति सेकण्ड क्लास या फर्स्ट क्लास में जाने से ही होती हो तो ठीक है; पर मेरे लिए तो औरतों का डब्बा था। रेलवे कम्पनी को फिजूल ही इतने अधिक रुपये क्यों दिये जाँय?”बंकू की कैफियत के साथ उसकी माँ की इस मितव्यय-निष्ठा का कोई विशेष सामंजस्य मैं नहीं देख पाया। किन्तु, ऐसी बातें स्त्रियों से कहने से व्यर्थ का कलह होता है। अतएव, चुपचाप मैं केवल सुनता रहा। कुछ बोला नहीं।प्लेटफार्म की एक बेंच पर बैठकर पूर्वोक्त सज्जन ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने से जाते हुए मैंने पूछा, “आप कहाँ जाँयगे?”वे बोले, “बर्दवान।”कुछ आगे जाते ही राजलक्ष्मी ने मुझसे धीरे से कहा, “तो फिर वे अनायास ही अपने डब्बे में चल सकते हैं, न? किराया तो देना न होगा- फिर क्यों नहीं उन्हें बुला लेते!”मैंने कहा, “टिकट तो निश्चय से खरीद लिया गया है- किराए के पैसे नहीं बचेंगे।”राजलक्ष्मी बोली- “भले ही खरीद लिया गया हो-भीड़ के कष्ट से तो बच जाँयगे।”मैंने कहा, “उन्हें अभ्यास है, वे भीड़ की तकलीफ की परवाह नहीं करते।”तब राजलक्ष्मी ने जिद करके कहा, “नहीं-नहीं, तुम उनसे कहो। हम लोग तीन आदमी बातचीत करते हुए जाँयगे, इतना रास्ता मजे से कट जायेगा।”मैंने समझ लिया कि इस समय उसे अपनी भूल महसूस हो रही है। बंकू और अपने नौकर-चाकरों की नजर में मेरे साथ अकेली अलहदा डब्बे में बैठने की खटक को वह किसी तरह कुछ हलका कर लेना चाहती है। फिर भी मैंने इसको और भी अधिक ऑंखों में अंगुली डालकर दिखाने के अभिप्राय से लापरवाही के भाव से कहा, “जरूरत क्या है एक अनावश्यक आदमी को डब्बे में बुलाने की? तुम मेरे साथ जितनी चाहो उतनी बातें कर लेना- मजे से समय कट जायेगा।”राजलक्ष्मी ने मुझ पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष निक्षेप करके कहा- “सो मैं जानती हूँ। मुझे छकाने का इतना बड़ा मौका क्या तुम छोड़ सकते हो?”इतना कहकर वह चुप हो रही। किन्तु ट्रेन के स्टेशन पर आते ही मैंने जाकर कहा, “आप क्यों नहीं हमारे डब्बे में बैठ जाँय। हम दो को छोड़कर उसमें और कोई नहीं है। भीड़ की तकलीफ से आप बच जाँयगे।”कहने की जरूरत नहीं, उन्हें राजी करने में कोई तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। अनुरोध करने-भर की देर थी कि वे अपनी पोटली लेकर हमारे डब्बे में आ बैठै।ट्रेन दो-चार स्टेशन ही पार कर पाई थी कि राजलक्ष्मी ने उनके साथ खूब बातचीत करना शुरू कर दिया और कुछ ही स्टेशनों को पार करते-करते तो उनके घर की खबरें, मुहल्ले की खबरें यहाँ तक कि आस-पास के गाँवों तक की खबरें कुरेद-कुरेदकर जान लीं।राजलक्ष्मी के गुरुदेव काशी में अपने नाती पातिनों के साथ रहते हैं, उनके लिए वह कलकत्ते से अनेक चीजें लिये जा रही थी। बर्दवान नजदीक आते ही ट्रंक खोलकर उनमें से चुनकर एक सब्ज रंग की रेशमी की साड़ी बाहर निकाली और कहा, “सरला को उसके खिलौने के बदले साड़ी दे देना।”वे सज्जन पहले तो अवाक् हो रहे, बाद में सलज्ज भाव से जल्दी से बोले- “नहीं बेटी, सरला को मैं अबकी दफे खिलौना खरीद दूँगा- आप साड़ी रहने दें। इसके सिवाय, यह तो बहुत बेशकीमती कपड़ा है बेटी!”राजलक्ष्मी ने कपड़े को उनके पास रखते हुए कहा, “बेशकीमती नहीं है और और कीमत कुछ भी हो, इसे उसके हाथ में देकर कहिएगा कि तुम्हारी मौसी ने अच्छे होने पर पहिरने के लिए दिया है!”सज्जन की ऑंखें छलछला आईं। आधा घण्टे की बातचीत में ही एक अपरिचित आदमी की पीड़िता कन्या को एक मूल्यवान् वस्तु का उपहार देना, उन्होंने शायद अपने जीवन में और कभी नहीं देखा था। कहा, “आशीर्वाद दीजिए कि वह अच्छी हो जाय; किन्तु, गरीबी का घर है, इतने कीमती कपड़े का वह क्या करेगी बेटी? आप उसे उठाकर रख लीजिए।” इतना कहकर उन्हांने मेरी ओर भी एक दफे देखा। मैंने कहा, “जब उसकी मौसी पहिरने के लिए दे रही है तब आपका ले जाना ही उचित है।” फिर हँसकर कहा, “सरला का भाग्य अच्छा है, हम लोगों की भी कोई मौसी-औसी होती तो बड़ा सुभीता होता! अबकी बार महाशय, आपकी लड़की, आप देखेंगे कि, चटपट अच्छी हो जायगींउस समय उस पुरुष के समस्त चेहरे से कृतज्ञता मानो उछल पड़ने लगी। और आपत्ति न करके उन्होंने उस वस्त्र को ग्रहण कर लिया। अब दोनों जनों में फिर बातचीत होने लगी। गृहस्थाश्रम की बातें, समाज की बातें, सुख-दु:ख की बातें, और न जाने क्या-क्या। मैं सिर्फ खिड़की के बाहर ताकता हुआ स्तब्ध होकर बैठा रहा और जो प्रश्न अपने आपसे बहुत बार पूछ चुका था वही इस छोटी-सी घटना के सूत्र के सहारे फिर मेरे मन में उठ खड़ा हुआ कि इस यात्रा का अन्त कहाँ है?एक दस-बारह रुपये का वस्त्र दान कर देना राज्यलक्ष्मी के लिए कठिन बात थी और नयी। उसके दास-दासी शायद इस बात का कभी खयाल भी नहीं करते। किन्तु मेरी चिन्ता दूसरी ही थी। यह दी हुई चीज दान के हिसाब से उसके लिए कुछ न थी। यह मैं जानता था। किन्तु, मैं सोच रहा था कि उसके हृदय की धारा जिस ओर लक्ष्य करके अपने आपको नि:शेष करने के लिए उद्दाम के लिए गति से दौड़ी चली जा रही है, उसका अवसान कहाँ होगा और किस तरह?समस्त रमणियों के अन्तर में 'नारी' वास करती है या नहीं, यह जोर से कहना अत्यन्त दु:साहस का काम है। किन्तु नारी की चरम सार्थकता मातृत्व में है, यह बात शायद खूब गला फाड़ करके प्रचारित की जा सकती है।राजलक्ष्मी को मैंने पहिचान लिया था। यह मैंने विशेष ध्या नपूर्वक देखा था कि उसमें की प्यारी बाई अपने अपरिणत यौवन के समस्त दुर्दम्य मनस्तापों के साथ प्रति-मुहूर्त मर रही है। आज उस नाम का उच्चारण करने से भी वह मानो लज्जा के मारे मिट्टी में मिल जाती है। मेरे लिए एक यह समस्या हो गयी।सर्वस्व लगाकर संसार का उपभोग करने का वह उत्तम आवेग राजलक्ष्मी में अब नहीं है; आज वह शान्त, स्थिर हैं उसकी कामना वासना आज उसी के मध्यप में इस तरह गोता लगा गयी है कि बाहर से एकाएक सन्देह होता है कि वह है भी या नहीं। उसी ने इस सामान्य घटना को उपलक्ष्य करके मुझे फिर स्मरण दिला दिया कि आज उसके परिणत यौवन के सुगम्भीर तल-देश से जो मातृत्व सहसा जाग उठा है, तुरन्त ही जागे हुए कुम्भकर्ण के समान उसकी विराट क्षुधा के लिए आहार कहाँ मिलेगा? उसके सन्तान होने पर जो बात सहज और स्वाभाविक हो सकती, उसी के अभाव में समस्या इस तरह एकान्त जटिल हो उठी है।उस दिन पटने में उसके जिस मातृरूप को देखकर मैं मुग्ध और अभिभूत हो गया था, आज उसी मूर्ति का स्मरण करके अत्यन्त व्यथा के साथ मैं केवल यही सोचने लगा कि इतनी बड़ी आग को केवल फूंक मारकर नहीं बुझाया जा सकता। इसीलिए, आज पराए लड़के को पुत्र कल्पित करने के खिलवाड़ से राजलक्ष्मी के हृदय की तृष्णा किसी तरह भी नहीं मिट रही है। इसलिए आज एक मात्र बंकू ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है, आज दुनिया में जहाँ जितने भी लड़के हैं उन सबका सुख-दु:ख भी उसके हृदय को आलोड़ित कर रहा है।बर्दवान में वे महाशय उतर गये। राजलक्ष्मी बहुत देर चुपचाप बैठी रही। मैंने खिड़की की ओर से दृष्टि हटाकर पूछा, “यह रोना किसके लिए हुआ? सरला के लिए, या उसकी माँ के लिए?”राजलक्ष्मी ने मुँह उठाकर कहा, “मालूम होता है, तुम इतनी देर तक हम लोगों की बात चीत सुन रहे थे।”मैंने कहा, “यों ही अनायास। स्वयं बात न करने पर भी बाहर से बहुत-सी बातें मनुष्य के कानों में आ घुसती हैं। संसार में भगवान ने कम बोलने वालों के लिए इस दण्ड की सृष्टि कर रक्खी है। इससे बचने की कोई युक्ति नहीं। खैर जाने दो, किन्तु यह ऑंखों का पानी किसके लिए झरा, सो नहीं बताया?”राजलक्ष्मी ने कहा, “मेरी ऑंखों का पानी किसके लिए झरता है, यह जानने से तुम्हें कोई लाभ नहीं।”मैंने कहा, “लाभ की आशा नहीं करता- केवल नुकसान बचाकर ही चला जा सके तो काफी है। सरला अथवा उसकी माँ के लिए जितनी इच्छा हो ऑंसू बहाओ, मुझे कोई आपत्ति नहीं-किन्तु, उसके बाप के लिए बहाना मैं पसन्द नहीं करता।”राजलक्ष्मी केवल एक 'हूँ' करके खिड़की के बाहर झाँकने लगी।सोचा था कि यह दिल्लगी निष्फल नहीं जायेगी, अनेक रुँधे हुए झरनों के द्वार खोल देगी। किन्तु, सो तो हुआ नहीं; हुआ यह कि अब तक वह इस ओर देख रही थी सो दिल्लगी सुनकर उस ओर को मुँह फेरकर बैठ गयी।किन्तु बहुत देर से मौन था- बातचीत करने के लिए भीतर ही भीतर एक आवेग उपस्थित हो गया था। इसलिए अधिक देर तक चुप न रह सका और बोला, “बर्दवान से कुछ खाने को मोल ले लिया होता!”राजलक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, वह उसी तरह चुप बनी रही।मैं बोला, “दूसरे के दु:ख में रो-रोकर नद बहा दिया, और घर के दु:ख पर कान ही नहीं देतीं! तुमने यह विलायत से लौटे हुओं की विद्या कहाँ से सीख ली?”राजलक्ष्मी ने इस दफे धीरे से कहा, “देखती हूँ कि विलायत से लौटे हुओं पर तुम्हारी भारी भक्ति है!”मैंने कहा, “हाँ, वे लोग भक्ति के पात्र जो हैं!”“क्यों, उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”“अभी तक तो कुछ नहीं बिगाड़ा किन्तु, बाद में कहीं कुछ बिगाड़ न दें, इस डर से पहले ही भक्ति करता हूँ।”राजलक्ष्मी ने क्षण-भर चुप रहकर कहा, “यह तुम लोगों का अन्याय है। तुम लोगों ने उन्हें अपने दल से, जाति से, समाज से-सब ओर से बहिष्कृत कर दिया है। फिर भी, यदि वे लोग तुम्हारे लिए थोड़ा-सा भी कुछ करते हैं, तो उतने ही के लिए तुम्हें उनका कृतज्ञ होना चाहिए।”मैंने कहा, “हम लोग बहुत ज्यादा कृतज्ञ होते, यदि वे उस क्रोध के कारण पूरे-पूरे मुसलमान या क्रिस्तान हो जाते! उन लोगों में जो अपने को 'ब्राह्म' कहते हैं वे ब्राह्म-समाज को नष्ट करते हैं, जो 'हिन्दू' कहते हैं वे हिन्दू समाज को हैरान करते हैं। यदि वे पहले यह ठीक करके कि स्वयं कौन हैं दूसरों के लिए रोने बैठते तो उससे उनका खुद का कल्याण होता और जिनके लिए रोते हैं उनका भी शायद कुछ उपकार हो जाता।”राज्यलक्ष्मी बोली, “किन्तु, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता।”मैंने कहा, “नहीं जान पड़ता तो कोई विशेष हानि नहीं। किन्तु, जिसके लिए इस समय अटका हुआ हूँ वह अन्य बात है। कहाँ, उसका तो कोई जवाब ही नहीं दिया?”इस दफे राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “अजी, उसके लिए अटकना नहीं पड़ेगा। पहले तुम्हारी भूख तो पक जाय, उसके बाद विचार किया जायेगा।”मैंने कहा, “तब विचार क्या होगा, जिस-किसी स्टेशन से जो कुछ मिलेगा वही निगलने को दे दोगी!-किन्तु, सो नहीं होगा, मैं कहे रखता हूँ।”मेरा उत्तर सुनकर वह मेरे मुँह की ओर कुछ देर चुपचाप देखती रही और फिर कुछ हँसकर बोली, “सो मैं कर सकती हूँ- तुम्हें विश्वास होता है?”“मैंने कहा- “खूब! इतना-सा भी विश्वास तुम पर नहीं होगा?”“तो ठीक है!” कहकर वह फिर अपनी खिड़की से बाहर झाँकती हुई चुपचाप बैठी रही।अगले स्टेशन पर राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर खाने के लिए जगह करा दी और उसे हुक्का लाने का हुक्म देकर थाली में समस्त खाद्य-सामग्री सजाकर सामने रख दी। देखा, इस विषय में कहीं बिन्दु-भर भी भूल-चूक नहीं हुई है- मुझे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब चुन-चुन कर संग्रह करके लाया गया है।बेंच पर रतन ने बिस्तर कर दिये। इतमीनान के साथ भोजन समाप्त करके गुड़गुड़ी की नली मुँह में डालकर आराम से ऑंखें मूँदने की तैयारी कर रहा था कि राजलक्ष्मी बोली, “खाने की चीजें उठा ले जा रतन, इनमें से जो भावे सो खा लेना- और तेरे डिब्बे में और भी कोई खावे तो दे देना।”किन्तु, रतन को अत्यन्त लज्जित और संकुचित लक्ष्य करके मैंने कुछ, अचरज के साथ पूछा, “कहाँ, तुमने तो कुछ खाया नहीं?”राजलक्ष्मी बोली, “नहीं, मुझे भूख नहीं है। जा न रतन, खड़ा क्यों है? गाड़ी चल देगी जो!”रतन लज्जा के मारे मानो गड़ गया। “मुझसे बड़ी भूल हो गयी बाबू मुसलमान कुली से खाना छू गया है! कितना ही कहता हूँ- माँ, स्टेशन से कुछ खरीद लाने दो, किन्तु किसी तरह मानती ही नहीं।” इतना कहकर उसने मेरे मुँह पर अपनी कातर-दृष्टि डाली जैसे मेरी ही अनुमति चाह रहा हो।किन्तु मैं कुछ कहूँ, इसके पहले ही राजलक्ष्मी ने उसे धमकाकर कहा, तूँ जायेगा नहीं, खड़ा-खड़ा तर्क करेगा?”रतन फिर कुछ न बोला और भोजन के बर्तन हाथ में लेकर बाहर चला गया। ट्रेन के चलते ही राजलक्ष्मी मेरे सिरहाने आ बैठी और सिर के बालों में धीरे-धीरे अंगुलियाँ चलाते-चलाते बोली, “अच्छा देखो...”बीच में ही टोककर बोला, “देखूँगा फिर कभी। किन्तु...”उसने भी मुझे उसी घड़ी टोककर कहा, “तुम्हें 'किन्तु' से शुरू करके लेक्चर न देना होगा, मैं सब समझ गयी। मैं मुसलमान से घृणा नहीं करती; उसके छू लेने से भोजन नष्ट हो जाता है, सो भी नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो तुम्हें अपने हाथों से वह भोजन न परोसती।”“किन्तु, तुमने खुद क्यों नहीं खाया?”“स्त्रियों को नहीं खाना चाहिए।”“क्यों?”“क्यों और क्या? स्त्रियों को खाने की मनाई है।”“और पुरुषों के लिए मनाई नहीं है?”राजलक्ष्मी ने मेरा सिर हिलाकर कहा- नहीं, मर्दों के लिए ये बँधे हुए आईन-कानून किसलिए? वे जो इच्छा हो खावें, जो इच्छा हो पहिनें, जैसे भी हो सुख से रहें- हम लोग आचार का पालन करती जावें, बस यही बहुत है। हम तो सैकड़ों कष्ट सह सकती हैं, किन्तु क्या तुम लोग सह सकते हो? यही देखो न शाम होते न होते ही भूल के मोर ऑंखों के आगे अंधेरा देखने लगे थे!”मैंने कहा, “हो सकता है, किन्तु, हम कष्ट नहीं सहन कर सकते, इसमें हम लोगों के लिए भी तो कोई गौरव की बात नहीं है।”राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा- “नहीं, इसमें तुम्हारा जरा भी अगौरव नहीं है। तुम लोग हम लोगों की तरह दासी की जाति नहीं हो जो कष्ट सहन करके जाओ। लज्जा की बात तो हमारे लिए है, यदि हम कष्ट न सहन कर सकें।”मैंने कहा, “यह न्याय-शास्त्र तुम्हें सिखाया किसने? काशी के गुरुजी ने?”राजलक्ष्मी मेरे मुँह के अत्यन्त निकट झुककर क्षण-भर स्थिर हो रही, फिर मुस्कराकर बोली, “मुझे जो कुछ शिक्षा मिली है सब तुम्हारे ही समीप- तुमसे बढ़कर गुरु मेरा और कोई नहीं।”मैंने कहा, “तब तो फिर, गुरु से तुमने ठीक उलटी बात सीख रक्खी है। मैंने किसी दिन नहीं कहा कि तुम लोग दासी की जाति हो। बल्कि, मैं तो यही बात चिरकाल से मानता हूँ कि तुम दासी नहीं हो। तुम किसी तरह भी हम लोगों की अपेक्षा तिल-भर छोटी नहीं हो।”राजलक्ष्मी की ऑंखें छलछला आईं, बोली, “सो मैं जानती हूँ। और जानती हूँ इसीलिए तो यह बात तुम्हारे समीप सीख पाई हूँ। तुम्हारी तरह यदि सभी पुरुष यही बात सोच सकते, तो फिर पृथ्वी-भर की समस्त स्त्रियों के मुँह से यही बात सुन पड़ती। कान बड़ा है और कान छोटा, यह समस्या ही कभी न उठती।”“अर्थात्, यह सत्य बिना किसी विचार के सभी मान लेते?”राजलक्ष्मी बोली, “हाँ।”तब मैंने हँसकर कहा, “सौभाग्य से पृथ्वी-भर की स्त्रियाँ, तुम्हारे साथ सहमत नहीं हैं, यही खैरियत है। किन्तु, अपनी जाति को इतना हीन समझते तुम्हें लाज नहीं आती?”मेरे उपहास पर राजलक्ष्मी ने ध्याकन दिया या नहीं, इसमें सन्देह है। यह बहुत ही सहज भाव से बोली, “किन्तु, इसमें तो हीनता की कोई बात नहीं है।”मैंने कहा, “सो ठीक है, हम लोग मालिक हैं और तुम दासी, यह संस्कार इस देश की स्त्रियों के मन में इस तरह बद्धमूल हो गया है कि इसकी हीनता भी तुम्हारी नजर में नहीं आती। जान पड़ता है कि इसी पाप से पृथ्वी के सारे देशों की स्त्रियों की अपेक्षा तुम सचमुच ही आज छोटी हो गयी हो।”राजलक्ष्मी एकाएक सख्त होकर बैठ गयी और दोनों नेत्रों को प्रदीप्त करके बोली, “नहीं, इस कारण नहीं। तुम्हारे देश की स्त्रियाँ अपने आपको छोटा समझने के कारण छोटी नहीं हो गयीं। सच यह है कि तुम्हीं लोगों ने उन्हें छोटा समझकर छोटा बना दिया है, और तुम खुद भी छोटे हो गये हो।”यह बात मुझे अकस्मात् कुछ नयी-सी मालूम हुई। इसमें जो कुछ गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह धीरे-धीरे सुस्पष्ट-सा होने लगा। सचमुच ही इसमें बहुत-सा सत्य छिपा हुआ है जो अब तक मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुआ था।राजलक्ष्मी बोली, “तुमने तो उस भद्र पुरुष के सम्बन्ध में मजाक किया था किन्तु उसकी बात सुनकर मेरी ऑंखें कितनी खुल गयी हैं, सो तुम नहीं जानते।”'नहीं जानता', यह स्वीकार करते ही वह कहने लगी, “नहीं जानते इसके कारण हैं। किसी भी वस्तु को जानने के लिए जब तक मनुष्य के हृदय के भीतर एक तरह की व्याकुलता नहीं उठती तब तक सब कुछ उसकी नजर में धुँधला ही बना रहता है। इतने दिन तुम्हारे मुँह से सुनकर सोचा करती थी कि सचमुच कि सचमुच ही यदि हमारे देश के लोगों का दु:ख इतना अधिक है, सचमुच ही यदि हमारा समाज इतना अधिक अन्धा है, तो उसमें मनुष्य जीता ही क्योंकर है, और उसको मानकर ही क्यों चलता है?”मैं चुपचाप सुन रहा हूँ, यह देखकर वह आहिस्ते-आहिस्ते कहने लगी, “और तुम भी क्या समझोगे? कभी इन लोगों के बीच रहे नहीं, कभी इन लोगों के सुख-दु:ख भोगे नहीं; इसीलिए बाहर ही बाहर बाहर के समाज के साथ तुलना करके समझते हो कि इन लोगों के कष्टों की शायद कोई सीमा ही नहीं। धनी जमींदार पुलाव खाया करता है। वह अपनी किसी दरिद्र प्रजा को बासी भात खाते देखकर सोचता है कि 'इसके दु:ख की कोई सीमा नहीं है'- जिस तरह वह भूलता है उसी तरह तुम भूलते हो।”मैंने कहा, “तुम्हारा तर्क यद्यपि न्याय-शास्त्र के नियमानुसार नहीं चल रहा है, फिर भी पूछता हूँ कि तुमने कैसे जाना कि मुझे देश के सम्बन्ध में इससे अधिक ज्ञान नहीं है?”राजलक्ष्मी ने कहा, “हो ही कैसे सकता है? दुनिया में तुम्हारे जैसा स्वार्थी कोई भी है क्या? जो केवल अपने ही आराम के लिए भागता फिरता है, वह घर की खबर जानेगा ही कहाँ से? तुम जैसे लोग ही तो समाज की अधिक निन्दा करते फिरते हैं जो समाज से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखते, बल्कि उसकी ओर से सर्वथा उपेक्षित रहते हैं। तुम लोग न तो अच्छी तरह पराए समाज को जानते हो और न अच्छी तरह अपने ही समाज को।”मैंने कहा, “इसके बाद?”राजलक्ष्मी बोली, “इसके बाद बाहर रहकर बाहरी सामाजिक व्यवस्था देखकर तुम लोग सोच में मरे जाते हो कि हमारी स्त्रियाँ मकान में कैद रहकर दिन-रात काम किया करती हैं, इसलिए उनके समान दु:खी, उनके समान पीड़ित, उनके समान हीन, शायद और किसी देश की स्त्रियाँ नहीं हैं। किन्तु कुछ दिन हमारी चिन्ता छोड़कर केवल अपनी ही चिन्ता कर देखो, अपने को कुछ ऊँचा उठाने की चेष्टा करो!- यदि कहीं कुछ सचमुच का दोष होगा तो वह केवल उसी समय नजर आयेगा- उससे पहले नहीं।”“इसके बाद?”राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध होकर कहा, “तुम मुझसे मजाक कर रहे हो, यह मैं जानती हूँ। किन्तु, मैं मजाक की बात नहीं कर रही हूँ। घर की मालकिन सब लोगों से खराब खाती-पीती है, कभी-कभी तो नौकरों की अपेक्षा भी। बहुधा उसे नौकरों से भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किन्तु, तुम इस दु:ख से व्याकुल होकर रोते हुए मत फिरो; हम लोगों को दासी के समान ही बनी रहने दो, दूसरे देशों जैसी रानी बना डालने की चेष्टा मत करो;- मैं यही बात तुमसे कहती हूँ।”मैंने, कहा, यद्यपि तुम तर्क-शास्त्र के गाथे पर पैर देकर उसे डुबा देने की तजबीज कर रही हो, किन्तु, फिर भी यह स्वीकार करता हूँ कि शास्त्रानुसार तर्क करने का रास्ता मुझे भी नहीं मिल रहा है।”उसने कहा, “इसमें तर्क करने- जैसा कुछ भी नहीं है।”मैंने कहा, “हो भी, तो वह शक्ति मुझमें नहीं है-बड़ी नींद आ रही है। किन्तु, “तुम्हारी बात एक तरह से समझ रहा हूँ।”राजलक्ष्मी जरा चुप रहकर बोली, “हमारे देश में चाहे जिस कारण हो, छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, सभी लोगों में रुपयों का लोभ बहुत ही बढ़ गया है। कोई भी थोड़े में सन्तुष्ट होना नहीं जानता, चाहता भी नहीं। इससे कितना अनिष्ट हुआ है, इसका पता मैंने पा लिया है।”“बात सच है, किन्तु तुमने पता किस तरह पाया?”राजलक्ष्मी बोली, “रुपयों के लोभ से ही तो मेरी यह दशा हुई है! किन्तु पूर्व काल में शायद इतना लोभ नहीं था।”मैंने कहा, “इस इतिहास को मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।”वह कहने लगी, “इतना कभी नहीं था। उस समय माता रुपये के लोभ से अपनी बेटी को कभी इस रास्ते पर नहीं ढकेलती, उस समय धर्म का डर था। आज तो मेरे पास रुपयों की कमी नहीं है किन्तु मेरे समान दु:खी भी क्या कोई है? रास्ते का भिखारी भी, मैं समझती हूँ, मुझसे बहुत अधिक सुखी है।”उसका हाथ अपने हाथ में मैं रखकर पूछा, “तुम्हें सचमुच ही इतना कष्ट है!”राजलक्ष्मी ने क्षण-भर मौन रहकर और एक बार ऑंचल से ऑंख-मुँह पोंछकर कहा, “मेरी बात मेरे अन्तर्यामी ही जानते हैं।”इसके बाद दोनों ही गुमसुम हो रहे। गाड़ी की रफ्तार कम होकर वह एक छोटे स्टेशन पर आकर खड़ी हो गयी। कुछ देर बाद उसने फिर चलना शुरू किया। मैंने कहा, “क्या करने से तुम्हारा शेष जीवन सुख से कट सकता है, यह मुझे बतला सकती हो?”राजलक्ष्मी बोली, “यह मैंने सोच रक्खा है मेरा सारा धन यदि किसी तरह चला जाय, कुछ न बच रहे-एकबारगी निराश्रय हो जाऊं, तो...”अब फिर बिल्कु'ल गुमसुम हो रहे। उसकी बात इतनी स्पष्ट थी कि सभी समझ सकते हैं, मुझे भी मसझने में देर न लगी। कुछ देर चुप रहकर पूछा, “यह खयाल कब से आया तुम्हारे मन में?”राजलक्ष्मी बोली, “जिस दिन अभया की बात सुनी उसी दिन से।”“मैने कहा, “किन्तु, उन लोगों की जीवन-यात्रा तो बीच में ही खत्म हुई नहीं जाती। भविष्य में वे कितना दु:ख पा सकते हैं, सो तो तुम जानती नहीं।”वह सिर हिलाकर बोली, “नहीं, जानती नहीं, यह सत्य है; किन्तु वे चाहे कितना ही दु:ख क्यों न पावें, मेरे समान दु:ख किसी दिन न पावेंगे, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकती हूँ।”और भी कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारे लिए मैं अपना सर्वस्व त्याग कर सकता हूँ; किन्तु इज्जत का त्याग कैसे करूँ?”राजलक्ष्मी बोली, “मैं क्या तुमसे कुछ त्यागने को कहती हूँ? इज्जत ही तो मनुष्य की असली चीज है। उसका यदि त्याग नहीं कर सकते तो त्याग की बात ही क्यों मुँह पर लाते हो? तुमसे तो मैंने कुछ भी त्याग करने के लिए नहीं कहा।”मैंने कहा, “कहा नहीं, सो ठीक है; किन्तु, कर सकता हूँ। इज्जत जाने के बाद पुरुष का जीता रहना एक विडम्बना है। केवल इस इज्जत को छोड़कर तुम्हारे लिए मैं सभी कुछ विसर्जित कर सकता हूँ।”राजलक्ष्मी ने सहसा हाथ खींच लिया और कहा, “मेरे लिए तुम्हें कुछ भी विसर्जित करना पड़ेगा। किन्तु तुम क्या यह समझते हो कि केवल तुम लोगों के ही इज्जत है, हम लोगों की कोई इज्जत नहीं? हम लोगों के लिए उसका त्याग देना क्या इतना अधिक सहज है? फिर भी, तुम लोगों के लिए ही सैकड़ों-हजारों स्त्रियों ने इसे धूल की तरह फेंक दिया है, यह अवश्य ही तुम नहीं जानते, पर मैं जानती हूँ।”मेरे कुछ बोलने की चेष्टा करते ही उसने रोकर कहा, “रहने दो, अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। तुम्हें इतने दिन मैंने जो समझा था वह गलत था। तुम सो जाओ- अब इस सम्बन्ध में मैं भी कभी कोई ऐसी बात न कहूँगी, तुम भी न कहना।” इतना कहकर वह उठी और अपनी बेंच पर जा बैठी।दूसरे दिन ठीक समय पर काशी आ पहुँचा और प्यारी के मकान में ही ठहरा। ऊपर के दो कमरों को छोड़कर करीब सारा का सारा मकान जुदा-जुदा उम्र की विधवा स्त्रियों से भरा हुआ था।प्यारी बोली, “ये सब मेरी किराएदार हैं।” इतना कहकर वह मुँह फिराकर कुछ हँस दी।मैंने कहा, “हँसी क्यों? शायद किराया अदा नहीं होता?”प्यारी बोली, “नहीं, बल्कि कुछ न कुछ और देना पड़ता है।”“इसके मानी?”प्यारी इस दफे हँस पड़ी और बोली, “इसके मानी है, भविष्य की आशा पर मुझको ही इन्हें खाना-कपड़ा देकर जिलाए रखना है। जीती रहेंगी तभी तो बाद में देंगी, यह भी क्या नहीं समझ सकते?”मैंने भी हँसकर कहा, “समझता नहीं तो! इस तरह भविष्य की आशा पर कितने लोगों को तुम्हें गुपचुप अन्न-वस्त्र जुटाना-पटाना पड़ता होगा- मैं केवल वही सोच रहा हूँ!”इनके सिवाय मेरी दो-एक रिश्तेदार भी हैं।”“सो भी है क्या? किन्तु, मालूम कैसे हुआ तुम्हें कि रिश्तेदार हैं?”प्यारी जरा सूखी हँसी हँसकर बोली, “माँ के साथ आने पर इस काशी में ही तो मेरी 'मौत' हुई थी, शायद तुम्हें यह याद नहीं रहा। तब असमय में ही जिन्होंने मेरी 'सद्गति' की थी, उन लोगों का वह उपकार क्या प्राण रहते कभी भूला जा सकता है?”मैं चुप हो रहा। प्यारी कहने लगी- “इन लोगों का वह शरीर बड़ा ही दयापूर्ण है। इसीलिए, पास रखकर इन पर जरा कड़ी नजर रखती हूँ, जिससे इन्हें और अधिक उपकार करने का सुयोग न मिले।”उसके चेहरे की ओर निहारते ही एकाएक मेरे मुँह से बाहर निकल गया, “तुम्हारे हृदय के भीतर क्या है-बीच-बीच में उसे ही चीरकर देखने की इच्छा होती है राजलक्ष्मी!”“मरने पर देखना। अच्छा, कमरे में जाकर सो जाओ। रसोई बन जाने पर उठा दूँगी।” इतना कहकर और हाथ के इशारे से कमरा दिखाकर वह जीने से नीचे उतर गयी।मैं वहीं पर कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। यह नहीं कि आज मैंने उसके हृदय का कोई नया परिचय प्राप्त किया हो, किन्तु, मेरे खुद के हृदय में यह सामान्य कहानी एक नये चक्कर की सृष्टि कर गयी।रात को प्यारी बोली, “तुम्हें फिजूल कष्ट देकर इतनी दूर ले आई। गुरुदेव तीर्थाटन करने निकल गये हैं, उनसे नहीं मिला सकी।”मैंने कहा, “इसके लिए मैं जरा भी दु:खित नहीं हूँ। अब तो कलकत्ते लौट चलना होगा न?”प्यारी ने गर्दन हिलाकर बताया, “हाँ।”मैंने कहा, “क्या मेरा साथ चलना आवश्यक है? न हो तो मैं जरा और पश्चिम की ओर घूम आना चाहता हूँ।”प्यारी ने कहा, “बंकू के ब्याह में तो अब भी कुछ देर है। चलो न, मैं भी प्रयाग चलकर स्नान कर आऊँ।”मैं जरा मुश्किल में पड़ गया। मेरे दूर के रिश्ते के एक चचा वहाँ नौकरी करते हैं। सोचा था कि वहीं जाकर ठहरूँगा। सिवाय इसके और भी कई परिचित मित्र दोस्त वहाँ रहते हैं।प्यारी ने निमेष-मात्र में मेरे मन का भाव ताड़कर कहा, “मैं साथ रहूँगी तो शायद कोई देख लेगा, यही न?'अप्रतिभ होकर कहा, “वास्तव में कलंक चीज ही ऐसी है कि लोग झूठे कलंक का भी भय किये बगैर नहीं रह सकते।”प्यारी ने जबर्दस्ती हँसते हुए कहा, “सो ठीक है। गत साल आरे में तो तुम्हें एक तरह से गोद में लिये ही लिये मेरे दिन-रात कटे हैं। सौभाग्य से उस दशा में किसी ने तुम्हें नहीं देखा। उस जगह शायद तुम्हारी जान-पहिचान का कोई बन्धु-बान्धव नहीं था।”मैंने अतिशय लज्जित होकर कहा, “मुझे ताना मारना वृथा है। मनुष्यता के लिहाज से मैं तुम्हारी अपेक्षा बहुत हीन हूँ, इस बात को मैं अस्वीकार करता नहीं।”प्यारी तीक्ष्ण स्वर से बोल उठी, “ताना! तुम्हें ताना मार सकूँगी, यही सोचकर शायद मैं वहाँ गयी थी, क्यों? देखो, मनुष्य के पीड़ा पहुँचाने की भी एक हद होती है- उसे मत लाँघ जाना।”कुछ देर चुप रहकर फिर बोली, “ठीक, कलंक ही तो है! यदि मैं होती तो इस कलंक को सिर पर लेकर लोगों को बुलाकर दिखाती फिरती, पर ऐसी बात मुँह से बाहर न निकाल सकती।”मैंने कहा, “तुमने मुझे प्राण-दान जरूर दिया है-किन्तु, मैं अत्यन्त छोटा आदमी हूँ राज्यलक्ष्मी, तुम्हारे साथ तुलना ही नहीं हो सकती।” राजलक्ष्मी दर्पयुक्त स्वर में बोली, “प्राण-दान यदि दिया है तो अपनी ही गरज से दिया है, तुम्हारी गरज से नहीं। उसके लिए तुम्हें रत्ती-भर भी अहसान मानने की जरूरत नहीं। किन्तु मैं तुम्हें छोटा-छोटी तबीयत का आदमी नहीं खयाल कर सकती। ऐसा होता तो आफत कटती, गले में फाँसी लगाकर सारी ज्वाला को जुड़ा सकती।” इतना कहकर वह मेरे जवाब की राह देखे बगैर ही कमरे से बाहर चली गयी।दूसरे दिन सुबह राजलक्ष्मी चाय देकर चुपचाप चली जा रही थी कि मैंने बुलाकर कहा, “बात-चीत बन्द है क्या?”वह पलटकर खड़ी हो गयी, बोली, “नहीं तो, कुछ कहोगे?”मैंने कहा, “चलो, एक दफे प्रयाग घूम आवें?”“ठीक तो है, जाइए।”“तुम भी चलो।”“अनुग्रह करते हो क्या?”“नहीं चाहतीं?”“नहीं। जरूरत होगी तब माँग लूँगी, इस समय नहीं।” इतना कहकर वह अपने काम से चली गयी।मेरे मुँह से केवल एक लम्बी साँस बाहर निकल गयी, किन्तु कोई बात नहीं निकली।दोपहर को भोजन के समय मैंने हँसकर कहा, “अच्छा लक्ष्मी, मुझसे बोलना बन्द करके क्या तुमसे रहा जायेगा जो इस असाध्यह-साधन की कोशिश कर रही हो?”राजलक्ष्मी ने शान्त-गम्भीर मुद्रा से कहा- “सामने होने पर किसी से नहीं रहा जाता- मुझसे भी नहीं रहा जायेगा। इसके सिवाय, यह मेरी इच्छा भी नहीं है।”“तब फिर इच्छा क्या है?”राजलक्ष्मी बोली, “मैं कल से ही सोच रही हूँ कि इस खींच-तान को बन्द किये वगैर नहीं चल सकता। तुमने भी एक तरह से साफ-साफ जता दिया है और मैं भी एक तरह से खूब जान गयी हूँ। गलती मेरी ही हुई, यह मैं स्वीकार करती हूँ, किन्तु...”उसे सहसा रुकते देख मैंने पूछा, “किन्तु, क्या?”राजलक्ष्मी बोली, “किन्तु, कुछ भी नहीं। यह जो एक निर्लज्ज वाचाल की तरह याचना करती तुम्हारे पीछे-पीछे घूमती फिरती हूँ,” इतना कहकर उसने एकाएक अपना मुँह मानो घृणा से सिकोड़ लिया और कहा, “लड़का ही क्या सोचता होगा, नौकर-चाकर ही मन ही मन क्या कहते होंगे! राम, राम, मानो मैंने इसे एक हँसी का व्यापार बना डाला है।”कुछ देर ठहर कर फिर कहने लगी, “बुढ़ापे में यह क्या मुझे सोहता है? तुम इलाहाबाद जाना चाहते थे, जाओ। फिर भी यदि हो सके तो बर्मा रवाना होने के पहिले एक दफे भेंट कर जाना।” इतना कहकर वह चली गयी।साथ ही साथ मेरी भूख भी गायब हो गयी। उसका मुँह देखकर आज मुझे पहले ही पहल ज्ञात हुआ कि यह सब मान-मनौवल का मामला नहीं है, सचमुच ही उसने कुछ न कुछ सोचकर स्थिर कर लिया है।संध्याष के समय आज एक हिन्दुस्तानी दासी जल-पान आदि सामग्री लेकर आई तो उससे कुछ अचरज के साथ प्यारी का हाल पूछा। जवाब सुनकर मैंने और भी अचरज के साथ जाना कि प्यारी मकान में नहीं है, वह साज-सिंगार करके फिटन पर कहीं गयी है। फिटन कहाँ से आई, उसे साज-सिंगार करके कहाँ जाने की जरूरत पड़ गयी- सो कुछ भी न समझा। तब स्वयं उसी के मुँह की वह बात याद आ गयी कि वह काशी में ही एक दिन 'मरी' थी।यह सच है कि कुछ भी समझ में न आया, फिर भी, इस खबर से सारा मन बेस्वाद हो गया।शाम हुई, घर-घर में दीए जले, किन्तु राजलक्ष्मी नहीं लौटी।चादर कन्धों पर डालकर जरा घूम आने के लिए बाहर निकल पड़ा। रास्ते-रास्ते चक्कर काटता, बहुत देखता-सुनता, रात के दस बजे के बाद मकान पर लौटा, तो सुना कि प्यारी तब भी लौटकर नहीं आई है। मामला क्या है? कुछ डर-सा मालूम होने लगा। सोच ही रहा था कि रतन को बुलाकर सारा संकोच दूर करके इस सम्बन्ध का पता लगाऊँ या नहीं कि एक भारी जोड़ी के घोड़ों की टापों का शब्द सुनाई दिया। खिड़की में से झाँका तो देखता हूँ एक बड़ी भारी फिटन मकान के सामने आकर खड़ी है।प्यारी उतरकर आई। ज्योत्स्ना के आलोक में उसके सर्वांग के जेवर झलमला उठे। जो दो भले आदमी फिटन में बैठे थे वे धीमे स्वर से जान पड़ा, प्यारी को सम्बोधन कर कुछ कह रहे हैं जिसे मैं सुन न सका। वे बंगाली हैं या बिहारी, सो भी न जान सका। चाबुक खाकर घोड़े पलक मारते न मारते ऑंखों के ओझल हो गये।♦♦ • ♦♦राजलक्ष्मी ने मेरी खबर लेने के लिए उसी साज-सिंगार के साथ मेरे कमरे में प्रवेश किया।मैं उछलकर और उसकी ओर दाहिना हाथ पसारकर थिएटरी गले से बोला, “अरी पाखण्डिनी रोहिणी1! तू गोविन्द2 लाल को नहीं पहचानती? अहा! आज यदि मेरे पास एक पिस्तौल होती, या एक तलवार ही होती!”राजलक्ष्मी ने सूखे कण्ठ-स्वर से कहा, “तो क्या करते?- खून?”हँसकर बोला, “नहीं प्यारी, मुझे इतना बड़ा नवाबी शौक नहीं है। इसके सिवाय इस बीसवीं शताब्दि में ऐसा निष्ठुर राक्षस धाम कौन है जो संसार की इतनीबड़ी आनन्द की खान को पत्थर से मूँद दे? बल्कि, आर्शीवाद देता हूँ कि हे बाई-कुल-शिरोमणि! तुम दीर्घजीवी होओ- तुम्हारा सुन्दर रूप त्रिलोक विजयी हो, तुम्हारा कण्ठ-स्वर वीणा-विनिन्दित हो, तुम्हारे इन दोनों चरण कमलों नृत्य उर्वशी-तिलोत्तमा का गर्व खर्व कर दे, और मैं दूर से तुम्हारा जय-गान करके धन्य होऊँ!”प्यारी बोली, “इन सब बातों का अर्थ?”मैंने कहा, “अर्थमनर्थम्-! उसे जाने दो। मैं इसी एक बजे की गाड़ी से बिदा होता हूँ। अभी तो प्रयाग जाता हूँ, इसके बाद जाऊँगा बंगालियों के परमतीर्थ चाकरिस्तान- अर्थात् बर्मा को। यदि समय और सुयोग होगा, तो मिलकर जाऊँगा।”“मैं कहाँ गयी थी, यह सुनना भी आवश्यक नहीं समझते?”“नहीं, बिल्कुतल नहीं।”“यह बहाना पाकर क्या तुम एकदम चले जा रहे हो?”मैंने कहा, “इस पापी मुँह से अब भी कुछ नहीं कह सकता। इस गोरख-धन्धे से यदि पार हो सकूँ तो...”प्यारी कुछ देर चुपचाप खड़ी रही और बोली, “तुम क्या मुझ पर जो जी चाहे वही अत्याचार कर सकते हो?”मैं बोला, “जो जी चाहे? बिल्कुनल नहीं। बल्कि, जान-अनजान में यदि बिन्दुमात्र अत्याचार किया हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”“इसके माने, आज रात को ही तुम चले जाओगे?”“हाँ।”“मुझे बिना अपराध दण्ड देने का तुम्हें अधिकार है?”1-2. बंकिमबाबू के 'विषवृक्ष' नामक उपन्यास के दो पात्र।“नहीं, तिल-भर भी नहीं। किन्तु, यदि मेरे जाने को ही तुम 'दण्ड देना' समझती हो, तो वह अधिकार मुझे जरूर है।”प्यारी ने हठात् कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मुँह की ओर कुछ क्षण चुपचाप देखते रहकर कहा, “मैं कहाँ गयी थी, क्यों गयी थी- नहीं सुनोगे?”“नहीं, मेरी सम्मति लेकर तो तुम वहाँ गयी नहीं थी, जो लौट आकर उसका हाल सुनाओगी। सिवाय इसके; उसके लिए मेरे पास न समय है और न इच्छा।”प्यारी चोट खाई हुई सर्पिणी की तरह एकाएक फुंकार उठी, “मेरी भी सुनाने की इच्छा नहीं है। मैं किसी की खरीदी हुई बाँदी नहीं हूँ जो कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ, इसकी अनुमति लेती फिरूँ! जाते हो, जाओ!” यों कहकर रूप और अलंकारों की एक हिलोर-सी उठाकर वह तेजी के साथ कमरे से बाहर हो गयी।आदमी गाड़ी बुलाने गया। कोई घण्टे-भर बाद सदर दरवाजे पर एक गाड़ी के खड़े होने का शब्द सुनकर बैग हाथ में लेकर जा ही रहा था कि प्यारी आकर पीछे खड़ी हो गयी। बोली, “इसे क्या तुम बच्चों का खिलवाड़ समझते हो? मुझे अकेली छोड़कर चले जाओगे, तो नौकर-चाकर क्या सोचेंगे? तुम क्या इन लोगों के सामने भी मुझे मुँह दिखाने योग्य न रक्खोगे?”पलटकर खड़े होकर कहा, “अपने नौकरों के साथ तुम निपटती रहना- मेरा उससे कोई ताल्लुक नहीं।”“वह न हो न सही, किन्तु लौटकर मैं बंकू को ही क्या जवाब दूँगी?”“यही जवाब दे देना कि वे पश्चिम को घूमने चले गये हैं।”,“इस पर क्या कोई विश्वास करेगा?“जिस पर विश्वास किया जा सके ऐसी ही कोई बात बनाकर कह देना।”प्यारी क्षण-भर मौन रहकर बोली, “यदि कुछ अन्याय ही कर बैठी हूँ तो क्या वह माफ नहीं हो सकता? तुम क्षमा न करोगे तो और कौन करेगा?”“मैं बोला, “प्यारी, यह तो एक बाँदी-दासी सरीखी बात हुई। तुम्हारे मुँह से तो नहीं सोहती।”इस ताने का प्यारी सहसा कोई उत्तर न दे सकी। उसका मुँह लाल हो गया, वह चुपचाप खड़ी रही। यह साफ मालूम हो गया कि वह प्राणपण से अपने आपको सँम्हाालने की चेष्टा कर रही है। बाहर से गाड़ीवान ने चिल्लाकर देर का कारण पूछा। मेरे चुपचाप बैग हाथ में लेते ही प्यारी धप से पैरों के समीप बैठ गयी और रुद्ध स्वर में बोल उठी, “मैं सचमुच का अपराध कभी कर ही नहीं सकती, यह जानते हुए भी यदि तुम दण्ड देना चाहते हो तो अपने हाथ से दो, किन्तु, घर-भर के लोगों के समीप मेरा सिर नीचा मत करो। यदि आज तुम इस तरह चले जाओगे तो मैं अब किसी के समीप कभी अपना मुँह ऊँचा करके खड़ी न हो सकूँगी।”हाथ का बैग नीचे रखकर एक चौकी पर बैठ गया और बोला- “अच्छा आज तुम्हारे-हमारे बीच अन्तिम फैसला हो जाय। तुम्हारा आज का आचरण मैंने माफ कर दिया। किन्तु, मैंने बहुत विचार करके देखा है कि हम दोनों का मिलना-जुलना अब नहीं को सकेगा।”प्यारी ने अपना अत्यन्त उत्कण्ठित मुँह मेरे मुँह की ओर उठाकर डरते हुए पूछा, “क्यों?”मैं बोला, “अप्रिय सत्य सह सकोगी?”प्यारी गर्दन हिलाकर अस्फुट स्वर में कहा, “हाँ, सह सकूँगी।”किन्तु, किसी आदमी के व्यथा सहने को तैयार हो जाने से ही कुछ व्यथा देने का कार्य सहज नहीं हो जाता। मुझे बहुत देर तक चुपचाप बैठकर सोचना पड़ा। फिर भी मैंने स्थिर कर लिया कि आज किसी तरह भी अपना इरादा नहीं बदलूँगा और इसीलिए अन्त में मैंने धीरे से कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारा आज का व्यवहार माफ करना कितना ही कठिन क्यों न हो, मैंने माफ कर दिया। किन्तु, तुम स्वयं इस लोभ को किसी तरह नहीं छोड़ सकोगी। तुम्हारे पास बहुत धन-दौलत है- बहुत-सा रूप-गुण है। बहुतों पर तुम्हारा असीम प्रभुत्व भी है। संसार में इससे बढ़कर लोभ की वस्तु और कोई नहीं है। तुम मुझे प्यार कर सकती हो, किन्तु इस मोह को किसी तरह भी नहीं काट सकोगी।”राजलक्ष्मी ने मृदु कण्ठ से कहा, “अर्थात् इस तरह का काम मैं बीच-बीच में करूँगी ही?”जवाब में मैं केवल मौन हो रहा। वह खुद भी कुछ देर चुप रहकर बोली, “उसके बाद?”“उसके बाद एक दिन ताश के मकान की तरह सब गिर पड़ेगा। उस दिन की उस हीनता से तो यही भला है कि आज मुझे हमेशा के लिए रिहाई दे दो-तुम्हारे समीप मेरी यही प्रार्थना है।”प्यारी बहुत देर तक मुँह नीचा किये चुपचाप बैठी रही। इसके बाद जब उसने मुँह उठाया तब देखा, उसकी ऑंखों से पानी गिर रहा है। उसे ऑंचल से पोंछकर पूछा, “क्या मैंने कभी तुम्हें कोई छोटा काम करने के लिए प्रवृत्त किया है?”इस गिरती हुई अश्रु-धारा ने मेरे संयम की भीत पर चोट पहुँचाई; किन्तु, बाहर से मैंने उसे किसी तरह प्रकट नहीं होने दिया। शान्त दृढ़ता के साथ कहा, “नहीं, किसी दिन नहीं। तुम स्वयं छोटी नहीं हो। छोटा काम तुम स्वयं कभी कर नहीं सकती और दूसरों को भी नहीं करने दे सकतीं।”फिर कुछ ठहरकर कहा, “किन्तु दुनिया तो मनसा पण्डित की पाठशाला की उस राजलक्ष्मी को पहिचानेगी नहीं। वह तो पहिचानेगी सिर्फ पटना की प्रसिद्ध प्यारी बाई को। तब दुनिया की नजरों में कितना छोटा हो जाऊँगा, सो तुम क्या नहीं देख सकती? बतलाओ, तुम उसे किस तरह रोकोगी?”राजलक्ष्मी ने एक लम्बी साँस छोड़कर कहा, “किन्तु, उसे तो सचमुच में छोटा होना नहीं कहते?”मैंने कहा, “भगवान की नजर में न हो, किन्तु, संसार की ऑंखें भी तो उपेक्षा करने की चीज नहीं है लक्ष्मी।”राजलक्ष्मी ने कहा, “किन्तु, उन्हीं की नजर को ही तो सबसे पहले मानना उचित है।”मैंने कहा, एक तरह से यह बात सच है। किन्तु, उनकी नजर तो हमेशा दीख नहीं पड़ती और फिर जो दृष्टि संसार में दस आदमियों के भीतर से प्रकाश पाती है, वह भी भगवान की ही दृष्टि है राजलक्ष्मी, इसे भी अस्वीकार करना अन्याय है।”“इसी डर से तुम मुझे जन्म-भर के लिए छोड़कर चले जाओगे?”मैं बोला, “फिर मिलूँगा। तुम कहीं भी क्यों न होओ, बर्मा जाने के पहले मैं एक दफे और भी तुमसे मिल जाऊँगा।”राजलक्ष्मी तेजी के साथ सिर हिलाकर रूँआसे स्वर से कह उठी, “जाते हो तो जाओ। किन्तु तुम मुझे चाहे जैसा क्यों न समझो, मुझसे बढ़कर अपना तुम्हारा और कोई नहीं। पर उसी से मुझको त्याग कर जाना दस आदमियों की निगाह में धर्म है, यह बात मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगी।” इतना कहकर वह तेजी से कमरा छोड़कर चली गयी।घड़ी निकालकर देखा, अब भी समय है, अब भी शायद एक बजे की गाड़ी मिल जाय। चुपचाप बैग उठाकर धीरे से उतरकर मैं गाड़ी में जा बैठा।इनाम के लोभ से गाड़ीवान ने प्राणपण से दौड़कर स्टेशन पहुँचा दिय। किन्तु उसी क्षण पश्चिम की ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया। पूछने से मालूम हुआ कि आधा घण्टे बाद ही एक ट्रेन कलकत्ते की ओर जायेगी। सोचा, चलो, यही अच्छा है; गाँव का मुँह बहुत दिन से नहीं देखा- उस जंगल में ही जाकर बाकी के कुछ दिन काट दूँ।इसलिए, पश्चिम के बदले पूर्व का टिकट खरीद कर आधा घण्टे के बाद एक विपरीत-गामिनी भाफ की गाड़ी में बैठकर काशी से चल दिया।♦♦ • ♦♦बहुत दिनों बाद फिर एक दिन शाम को गाँव में आकर प्रवेश किया। मेरा मकान उस समय सगे-सम्बन्धी रिश्तेदारों तथा उनके भी रिश्तेदारों से भरा हुआ था। बड़े मजे से सारे घर को घेरकर उन्होंने अपनी घर-गिरस्ती फैला रक्खी थी, कहीं सुई रखने के लिए भी जगह नहीं थी।मेरे एकाएक आ पहुँचने और वहाँ रहने के इरादे को सुनकर आनन्द के मारे उनका चेहरा स्याह हो गया। वे कहने लगे, “आहा, यह तो बड़े आनन्द की बात है। इस बार ब्याह करके संसारी बन जाओ श्रीकान्त, हम लोग देखकर अपनी ऑंखें ठण्डी करें।”मैंने कहा, “इसीलिए तो आया हूँ। इस समय कम से कम मेरी माँ का कमरा खाली कर दो, मैं अपने हाथ-पाँव फैलाकर जरा लेट रहूँ।”मेरे पिता की ममेरी बहिन अपने पति-पुत्र के साथ कुछ दिन से रह रही थी। वे आकर बोलीं, “ठीक तो कहते हो!”मैंने कहा, “अच्छा, न हो तो मैं बाहर के कमरे में पड़ रहूँगा।”जाकर देखा, कोने में सुर्खी, और एक कोने में चूने का ढेर लगा हुआ है। उसके भी 'मालिक' बोले, “ठीक तो है। देखता हूँ कि वे सब चीजें तो जरा देख-सुनकर हटानी पड़ेंगी। पर कमरा तो छोटा नहीं है, तब तक न हो तो इस किनारे एक तख्त-पोश बिछाकर- क्या कहते हो श्रीकान्त?”मैंने कहा, “अच्छा रात-भर के लिए न हो तो यही सही।”वास्तव में मैं इतना थक गया था कि मालूम होता था जहाँ भी हो जरा-सी सोने को जगह भर मिल जाय तो जान में जान आ जाय। बर्मा की उस बीमारी के बाद से अब तक शरीर पूरी तौर से स्वस्थ और सबल न हो पाया था। भीतर ही भीतर एक तरह का अवसाद प्राय: भी अनुभव होता था। इसी से शाम के बाद जब माथा दुखने लगा तब विशेष अचरज नहीं हुआ।नयी बनी हुई बहिन ने आकर कहा- “अरे यह तो जरा गर्मी-सी चढ़ गयी है भात खाकर सोने से ही चली जायेगी।”तथास्तु। वही हुआ। गुरुजन की आज्ञा शिरोधार्य करके गर्मी दूर करने के लिए भात खाकर शय्या ग्रहण कर ली। पर सुबह नींद टूटी खूब अच्छी तरह बुखार लिये हुए!दीदी ने शरीर पर हाथ रखकर कहा, “कुछ नहीं, यह तो मलेरिया है, इसमें भोजन किया जाता है।”किन्तु अब हाँ में हाँ न मिला सका। बोला, “नहीं जीजी, मैं अब तक तुम्हारे मलेरिया-राज की प्रजा नहीं बना हूँ। उनकी दुहाई देकर अत्याचार किया जाना शायद मैं सहन नहीं कर सकूँ। आज मेरी लंघन है।”सारी रात गुजरी, दूसरा दिन गुजरा, उसके बाद का दिन भी कट गया, किन्तु बुखार ने पीछा नहीं छोड़ा। बल्कि, उसे अधिकाधिक चढ़ते देख मन ही मन व्याकुल हो उठा। गोविन्द डॉक्टर इस बेला उस बेला देखने आने लगे। नाड़ी, पकड़कर, जीभ देखकर, पेट ठोककर 'सुस्वादु' ओषधियों की योजना कर केवल 'लागत के दाम' भर लेने लगे, किन्तु एक-एक दिन करके सारा सप्ताह इसी तरह गुजर गया। मेरे पिता के मामा, मेरे बाबा आकर बोले, “इसीलिए तो भइया, मैं कहता हूँ कि वहाँ खबर पठा दो, तुम्हारी फुआ को आ जाने दो। बुखार तो जैसे...”बात पूरी न होने पर भी मैं समझ गया कि बाबा कुछ मुश्किल में पड़ गये हैं। इस तरह और भी चार-पाँच दिन बीत गये, किन्तु, बुखार में कोई फर्क नहीं हुआ। उस दिन सुबह गोविन्द डॉक्टर ने आकर यथारीति दवाई देकर तीन दिन के बाकी 'लागत के दाम' माँगे। शय्या में पड़े-पड़े किसी तरह हाथ बढ़ाकर अपना बैग खोला- देखा तो मनी-बैग गायब है! अतिशय शंकित होकर मैं उठ बैठा। बैग को औंधा करके हर एक चीज अलग-अलग करके खोज की; किन्तु जो नहीं था सो नहीं मिला।गोविन्द डॉक्टर मामला समझकर चिन्तित होकर बार-बार सवाल करने लगे, “कुछ चला गया है क्या?”मैंने कहा, “नहीं, कुछ भी तो नहीं गया।”किन्तु उनकी दवा का मूल्य जब मैं न दे सका तब वे समझ गये। स्तम्भित की तरह कुछ देर खड़े रहकर उन्होंने पूछा, “थे कितने?”“कुछ थोड़े-से।”“चाबी को जरा सावधानी से रखना चाहिए भइया। खैर, तुम पराए नहीं हो, रुपये की चिन्ता मत करना। अच्छे हो जाओ, उसके बाद जब सुभीता हो भेज देना। इलाज में कोई कसर न होगी।” इतना कहकर डॉक्टर साहब गैर होकर भी परम आत्मीय से भी अधिक सान्त्वना देकर चले गये। उनसे कह दिया कि “यह बात कोई सुन न पावे।”डॉक्टर साहब बोले, “अच्छा, अच्छा, देखा जायेगा।”देहात में विश्वास पर रुपये उधर देने की चाल नहीं है। रुपया ही क्यों, एक चवन्नी भी खाली हाथ उधार माँगने पर लोग समझते हैं कि यह आदमी खालिस दिल्लगी कर रहा है। क्योंकि, इस बात की देहात के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि संसार में इतना नासमझ भी कोई है जो खाली हाथ उधार चाहता है, अतएव, मैंने यह कोशिश भी नहीं की। पहले से ही स्थिर कर लिया था कि इसकी सूचना राजलक्ष्मी को नहीं दूँगा। जरा स्वस्थ हो जाऊँ तब जो हो सकेगा करूँगा। मन में सम्भवत: यह संकल्प था कि अभया को पत्र लिखकर रुपये मँगाऊँगा। किन्तु, इसके लिए समय नहीं मिला। सहसा सेवा-शुश्रूषा का सुर भी 'तारा' से 'उदारा' में उतर पड़ते ही समझ गया कि मेरी विपत्ति की बात मकान के भीतर छिपी नहीं रही है।परिस्थिति को संक्षेप में जताकर राजलक्ष्मी को एक चिट्ठी लिखी अवश्य, किन्तु उसमें मैं अपने आपको इतना हीन, अपमानित, महसूस करने लगा कि किसी तरह भी उसे न भेज सका- फाड़कर फेंक दिया। दूसरा दिन इसी तरह कट गया। किन्तु, इसके बाद के दिन ने किसी तरह भी कटना न चाहा। उस दिन किसी ओर से कोई रास्ता न देख पाकर अन्त में एक तरह से जान पर खेलकर ही कुछ रुपयों के लिए राजलक्ष्मी को पत्र लिखकर पटना और कलकत्ते के ठिकाने पर भेज दिए।वह रुपये भेजेगी, इसमें जरा भी सन्देह नहीं था, फिर भी, उस दिन सुबह से ही मानो एक प्रकार के उत्कण्ठित संशय से पोस्टमैन की आशा में सामने की खुली खिड़की में से रास्ते के ऊपर अपनी दृष्टि बिछाए हुए उन्मुख पड़ा रहा।समय निकल गया। आज अब उसकी आशा नहीं है। ऐसा सोचकर करवट बदलने की तैयारी कर रहा था कि उस समय दूर पर एक गाड़ी के शब्द से चकित होकर तकिये पर भार देकर उठ बैठा। गाड़ी आकर ठीक सामने ही खड़ी हो गयी। देखता हूँ, कोचवान के बगल में रतन बैठा है। उसके नीचे उतरकर गाड़ी का दरवाजा खोलते ही जो दिखाई दिया उस पर सत्य मानकर विश्वास करना कठिन हो गया।प्रकट रूप से दिन के समय इस गाँव के रास्ते पर राजलक्ष्मी आकर खड़ी हो सकती है, यह मेरी कल्पना के भी परे की बात थी।रतन बोला- “ये हैं बाबूजी।”राजलक्ष्मी ने केवल एक बार मेरे मुँह की ओर देखा। गाड़ीवान बोला- “माँ, देर लगेगी? घोड़ा खोल दूँ?”“जरा ठहरो।” कहकर उसने अविचिलित धीर पद रखते हुए मेरे कमरे में प्रवेश किया। प्रणाम करके, पैरों की धूलि मस्तक पर लगाकर और हाथ से मस्तक और छाती का उत्ताप देखकर कहा, “इस समय तो अब बुखार नहीं है। उस जून सात बजे की गाड़ी से जाना हो सकेगा? घोड़े छोड़ देने को कह दूँ?”मैं अभिभूत की तरह उसके मुँह की ओर निहार रहा था। बोला, “दो दिन से बुखार आना तो बन्द है, क्या मुझे आज ही ले चलना चाहती हो?”राजलक्ष्मी बोली, “न हो तो आज रहने दो। रात में चलने की जरूरत नहीं, सर्दी लग सकती है, कल सुबह ही चलेंगे।”इतनी देर में जैसे मैं होश में आ गया। बोला, “इस गाँव में इस मुहल्ले के बीच तुम आई किस साहस से? तुम क्या सोचती हो कि यहाँ तुम्हें कोई भी न पहिचान सकेगा?”राजलक्ष्मी ने सहज में ही कहा, “भले ही पहिचान लें। यहीं तो पैदा हुई और बड़ी हुई और यहीं पर लोग मुझे पहिचान न सकेंगे? जो देखेगा वही पहिचान लेगा।”“तब?”“क्या करूँ बताओ? मेरा भाग्य! नहीं तो तुम यहाँ आकर बीमार ही क्यों पड़ते?”“आई क्यों? रुपये मँगाए थे, रुपये भेज देने से ही तो चल जाता!”“सो क्या कभी हो सकता है? ऐसी बीमारी की खबर सुनकर क्या केवल रुपये भेजकर ही स्थिर रह सकती हूँ?”मैंने कहा, “तुम तो शायद स्थिर हो गयीं, किन्तु मुझे तो बहुत ही अस्थिर कर दिया। अभी ही यहाँ जब सब आ पड़ेंगे तब तुम अपना मुँह किस तरह दिखाओगी, और मैं ही क्या जवाब दूँगा?”राजलक्ष्मी ने जवाब में केवल एक बार और अपने ललाट को छूकर कहा, “जवाब और क्या दोगे- मेरा भाग्य!”उसकी बेपरवाही और उदासीनता से अत्यन्त असहिष्णु होकर बोला, “भाग्य तो ठीक है! किन्तु लाज-शर्म को एकबारगी ही चाट बैठी हो? यहाँ मुँह दिखाते भी तुम्हें हिचकिचाहट नहीं हुई?”राजलक्ष्मी ने वैसे ही उदास कण्ठ से जवाब दिया, “मेरी लाज-शरम जो कुछ है सो इस समय बस तुम ही हो।”इसके बाद अब मैं और कहूँ ही क्या! सुनूँ भी क्या? ऑंखें मूँदकर चुपचाप लेट रहा।कुछ देर बाद पूछा, “बंकू का विवाह निर्विघ्न हो गया?”राजलक्ष्मी बोली, “हाँ।”“अभी कहाँ से आ रही हो?- कलकत्ते से?”“नहीं पटने से। वहीं पर तुम्हारी चिट्ठी मिली थी।”“मुझे कहाँ ले जाओगी?- पटने?”राजलक्ष्मी ने कुछ सोचकर कहा, “एक बार तो वहाँ तुम्हें जाना ही पड़ेगा। पहले कलकत्ते चलें, वहाँ पर तुम्हें दिखा लूँ, उसके बाद तन्दुरुस्त होने पर...”मैंने सवाल किया, “किन्तु, उसके बाद भी मुझे पटना क्यों जाना पड़ेगा?”राजलक्ष्मी बोली, दान-पत्र की तो वहीं रजिस्टरी करानी पड़ेगी। लिखा-पढ़ी एक तरह से सब कर आई हूँ; किन्तु तुम्हारे हुक्म के बिना तो कुछ हो न सकेगा।”अत्यन्त अचरज के साथ पूछा, “क्या बात का दान-पत्र? किसके नाम?”राजलक्ष्मी बोली, “मकान तो दोनों बंकू को दिये हैं। केवल काशी का मकान गुरुदेव को देना विचारा है। और कम्पनी के कागज, गहने वगैरह का हिस्सा-बाँट भी अपनी समझ-बूझ के अनुसार एक तरह से कर आई हूँ। अब तुम्हारे कहने- भर की...”मेरे अचरज की सीमा नहीं रही, बोला, “ऐसी अवस्था में अब तुम्हारा खुद का और क्या रह गया? बंकू यदि तुम्हारा भार न ले तो? अब उसकी खुद की गिरस्ती हो गयी, अन्त में यदि वह भी तुम्हें खाने को न दे तो?”“क्या मैं वह चाहती हूँ? निज का सब कुछ दान करके क्या उसी के हाथ का दिया खाऊँगी? तुम भी खूब हो!”धीरज को और न सँम्हाील सकने के कारण मैं उठकर क्रुद्ध कण्ठ से बोला, “हरिश्चन्द्र के समान यह दुर्बुद्धि तुम्हें दी किसने? खाओगी क्या? बुढ़ापे में किसकी गल-ग्रह बनने जाओगी!”राजलक्ष्मी बोली, “तुम्हें गुस्सा करने की जरूरत नहीं है, तुम लौट जाओ। जिसने मुझे यह बुद्धि दी है वही मुझे खाने को देगा। मैं हजार बूढ़ी हो जाऊँगी वह मुझे कभी गल-ग्रह नहीं समझेगा! तुम फिजूल सिर गर्म मत करो- शान्ति से लेट रहो।”मैं शान्त होकर लेट रहा। सामने की खुली खिड़की से डूबते हुए सूर्य की किरणों से रँगा हुआ विचित्र आकाश दीख पड़ा। स्वप्नाविष्ट की तरह निर्निमेष दृष्टि से उसी ओर निहारते-निहारते जान पड़ने लगा- मानो एक अद्भुत शोभा और सौन्दर्य में सारा विश्व-ब्रह्माण्ड बहा जा रहा है। तीनों लोकों के बीच रोग-शोक, अभाव-अभियोग, हिंसा-द्वेष, अब कहीं भी कुछ नहीं है।इस निर्वाक् निस्तब्धता में मग्न रहकर दोनों ने कितना समय बिता दिया, समझता हूँ, इसका किसी ने हिसाब ही नहीं किया। सहसा दरवाजे के बाहर मनुष्य के गले की आवाज सुनकर हम दोनों ही चौंक पड़े और राजलक्ष्मी के शय्या छोड़ने के पहले ही डॉक्टर साहब ने प्रसन्न बाबा को साथ में लिये अन्दर प्रवेश किया। किन्तु, उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही रुककर खड़े हो गये। बाबा जब दिवा-निद्रा ले रहे थे तब यह खबर उनके कानों में अवश्य पड़ गयी थी कि कोई बन्धु कलकत्ते से गाड़ी लेकर मेरे पास आया है, किन्तु वह कोई स्त्री हो सकती है, यह शायद किसी की कल्पना में भी नहीं था। इसीलिए, शायद अब तक घर की स्त्रियाँ भी बाहर नहीं आईं थीं।बाबाजी अत्यन्त विलक्षण आदमी थे। उन्होंने कुछ देर राजलक्ष्मी के नीचे झुके हुए मुख की ओर देखकर कहा, “यह लड़की कौन है श्रीकान्त? कुछ पहिचानी हुई-सी मालूम होती है।”डॉक्टर साहब भी प्राय: साथ ही साथ कह उठे, “छोटे काका, मुझे भी ऐसा लगता है जैसे इन्हें कहीं देखा है।”मैंने तिरछी नजर से देखा, राजलक्ष्मी का सारा मुख-मण्डल जैसे मुर्दे की तरह फक हो गया है उसी क्षण जैसे कोई मेरे हृदय के भीतर से बोल उठा-”श्रीकान्त, इस सर्वस्व-त्यागिनी स्त्री ने केवल तुम्हारे लिए ही स्वेच्छा से यह दु:ख अपने सिर पर उठा लिया है।”एकबारगी सारी देह रोमांचित हो उठी, मन ही मन बोला, मुझे सत्य से मतलब नहीं, आज मैं मिथ्या को ही सर पर धारण करूँगा और दूसरे ही क्षण उसके हाथ को जरा दबाकर कह बैठा, “तुम अपने पति की सेवा करने आई हो। तुम्हें लाज किस बात की है राजलक्ष्मी? ये बाबा और डॉक्टर साहब हैं, इनको प्रणाम करो।”पल-भर के लिए दोनों की चार ऑंखें हो गयीं; इसके बाद उसने उठकर जमीन पर सिर टेककर दोनों को प्रणाम किया।वनिता कासनियां पंजाब द्वारा️,Srikanth"❤️Chapter 9Saw the ship colliding on the pier of Calcutta, Banku is standing on top of the jetty. He quickly climbed up the ladder and bowed his head on the ground and said, "Mother, look in the car on the way.


❤️,श्रीकांत"❤️
   
     अध्याय 9

कलकत्ते के घाट पर जहाज जा भिड़ा देखा, जेटी के ऊपर बंकू खड़ा है। वह सीढ़ी से चटपट ऊपर चढ़ आया और जमीन पर सिर टेक प्रणाम करके बोला, “माँ रास्ते पर गाड़ी में राह देख रही हैं। आप नीचे जाइए, मैं सामान लेकर पीछे आता हूँ।”

बाहर आते ही और भी एक आदमी झुककर पैर छूकर खड़ा हो गया। मैंने कहा, “अरे रतन कहो, अच्छे तो हो?”

रतन कुछ हँसकर बोला, “आपके आशीर्वाद से। आइए।” यह कहकर उसने रास्ता दिखाते हुए गाड़ी के समीप लाकर दरवाजा खोल दिया। राजलक्ष्मी बोली, “आइए, और रतन, तुम लोग एक और गाड़ी करके पीछे से आ जाना दो बज रहे हैं, अभी तक इन्होंने नहाया-खाया भी नहीं, हम लोग डेरे पर चलते हैं। गाड़ी हाँकने को कह दे।”

मैं गाड़ी पर बैठ गया। रतन ने 'जी, अच्छा' कहकर गाड़ी का दरवाजा बन्द कर दिया और गाड़ीवान को हाँकने के लिए इशारा कर दिया। राजलक्ष्मी ने झुककर पद-धूलि ली और कहा, “जहाज में कष्ट तो नहीं हुआ?”

“नहीं।”

“तबीयत बहुत खराब हो गयी थी क्या?”

“तबीयत खराब तो जरूर हो गयी थी, परन्तु बहुत नहीं। किन्तु तुम भी तो स्वस्थ नहीं दीख पड़तीं। घर से कब आईं?”

“परसों। अभया के द्वारा तुम्हारे आने की खबर पाते ही हम लोग घर से चल दिये। आना तो था ही, इसलिए दो दिन पहले ही चले आए। यहाँ पर तुम्हें कितना काम करना है, मालूम है?”

मैं बोला, “काम की बात फिर होगी- किन्तु तुम ऐसी क्यों दिखाई दे रही हो? तुम्हें क्या हुआ था?”

राजलक्ष्मी हँस दी। इस हँसी को देखकर ही आज खयाल आया कि न जाने कितने दिनों से यह हँसी नहीं देखी और साथ ही एक कितनी बड़ी अदम्य इच्छा को उस समय चुपचाप दमन कर डाला, सो उस अन्तर्यामी के सिवाय और किसी ने नहीं जाना। किन्तु, दीर्घ श्वास को मैं उससे छिपा नहीं सका। उसने विस्मित की तरह क्षण-भर तक मेरी तरफ ताकते रहकर फिर हँसकर पूछा, “कैसी दिख पड़ती हूँ मैं-बीमार?”

एकाएक इस प्रश्न का उत्तर न दे सका। बीमार? हाँ, कुछ बीमार-सी जान पड़ती है। किन्तु नहीं, यह कुछ भी नहीं है। खयाल हुआ, मानो वह कितने ही देश-विदेश पैदल चलकर, तीर्थाटन करके, उसी समय लौट आई है- ऐसी मुरझाई-सी, ऐसी थकी-सी। अपना भार आप वहन करने की जैसे उसमें शक्ति ही नहीं है प्रवृत्ति भी नहीं है- इस समय वह केवल निश्चिन्त, निर्भय होकर ऑंखें मूँदकर सोने की जरा-सी जगह ढूँढ़ रही है। मुझे निरुत्तर देखकर बोली, “क्यों, कहते क्यों नहीं?”

मैंने कहा, “मत कहलवाओ।”

राजलक्ष्मी बच्चों की तरह जोर से सिर हिलाकर बोली, “नहीं, कहना ही होगा। लोग तो कहते हैं कि देखने में बिल्कु।ल बदसूरत हो गयी हूँ। यह सच है?”

मैंने गम्भीर होकर कहा, “हाँ सच है।”

राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, “तुम आदमी को इस कदर अप्रतिभ कर देते हो कि बस-अच्छा, इसमें बुरा क्या है? अच्छा ही तो है! सुन्दरता लेकर अब मैं करूँगी क्या? तुम्हारे साथ मेरा सुन्दर-असुन्दर का-अच्छी-बुरी दीख पड़ने का तो सम्बन्ध है नहीं, जो मैं इसकी चिन्ता में मर जाऊँ!”

मैंने कहा, “सो तो ठीक है, चिन्ता में मरने का कोई कारण नहीं है। एक तो लोग यह बात तुमसे कहते नहीं, इसके सिवाय, यदि वे कहें भी तो तुम विश्वास करनेवाली नहीं। मन ही मन समझती तो हो कि...”

राजलक्ष्मी गुस्से से बोल उठी, “तुम अन्तर्यामी जो हो कि सबके मन की बात जानते हो। मैं कभी यह बात नहीं सोचती। तुम खुद ही सच-सच कहो, जब वहाँ शिकार करने गये थे तब तुमने जैसा देखा था, अब भी क्या मैं वैसी रही हूँ? तब से तो कितनी बदसूरत हो गयी हूँ।”

मैंने कहा, “नहीं, बल्कि तबसे अच्छी दीख पड़ती हो।”

राजलक्ष्मी ने पल-भल में खिड़की के बाहर मुँह फेरकर अपना हँसता हुआ चेहरा शायद मेरी मुग्ध दृष्टि की ओर से हटा लिया और कोई उत्तर न देखकर चुप्पी साध ली। कुछ देर बाद परिहास के सब निशान अपने चेहरे पर से दूर करके उसने अपना चेहरा फिर इस ओर फेर लिया और पूछा, “तुम्हें क्या बुखार आ गया था? उस देश का हवा-पानी माफिक नहीं आता?”

मैंने कहा, “न आवे तो उपाय ही क्या है? जैसे बने वैसे माफिक ही कर लेना पड़ता है।” मैं मन ही मन निश्चिन्त रूप से जानता था कि राजलक्ष्मी इस बात का क्या उत्तर देगी। क्योंकि, जिस देश का जल-वायु आज तक अपना नहीं हो सका, किसी सुदूर भविष्य में भी उसे अपने अनुकूल कर लेने की आशा के भरोसे वह किसी तरह भी मेरे लौट जाने पर सम्मत नहीं होगी, बल्कि घोर आपत्ति उठाकर रुकावट डालेगी-यही मेरा खयाल था। किन्तु, ऐसा नहीं हुआ। वह क्षण-भर मौन रहकर कोमल-स्वर से बोली, “सो सच है। इसके सिवाय, वहाँ पर और भी तो बहुत-से बंगाली रहते हैं। उन्हें जब माफिक आता है तब तुम्हें ही क्यों न माफिक आवेगा? क्या कहते हो?”

मेरे स्वास्थ्य के सम्बन्ध में उसकी इस प्रकार की उद्वेगहीनता ने मुझे चोट पहुँचाई। इसीलिए, केवल एक इशारे-भर से 'हाँ' कहकर चुप हो गया। एक बात मैं बार-बार सोचता था कि अपनी प्लेग की कथा किस रूप में राजलक्ष्मी के कानों पर डालूँ। सुदूर प्रवास में जिस समय मेरे दिन जीवन-मृत्यु के सन्धि-स्थल में बीत रहे थे उस समय के हजारों तरह के दु:खों का वर्णन सुनते-सुनते उसके हृदय के भीतर कैसा तूफान उठेगा! दोनों नेत्रों को प्लावित करके कैसे ऑंसुओं की धारा बह निकलेगी। कह नहीं सकता कि इसे कितने रसों और कितने रंगों से भरकर मैं कल्पना के नेत्रों से दिन-प्रतिदिन देखता रहा हूँ। इस समय इसी कल्पना ने मुझे सबसे अधिक लज्जित किया; सोचा-छि:-छि: सौभाग्य से कोई किसी के मन की बात नहीं जानता। नहीं तो- परन्तु जाने दो उस बात को। मन ही मन कहा, और चाहे जो करूँ, अपनी उस मरने-जीने की कहानी इससे न कहूँगा।

बहूबाजार के डेरे पर आ पहुँचा। राजलक्ष्मी ने हाथ दिखाकर कहा, “यह जीना है, तुम्हारा कमरा तीसरे मंजिल पर है। जरा जाकर सो रहो, मैं जाती हूँ।” यह कहकर वह अपने रसोई-घर की ओर चल दी।

कमरे में घुसते ही देखा कि कमरा मेरे ही लिए सजाया गया है। प्यारी पटने के मकान से मेरी किताबें, और मेरा हुक्का तक लाना नहीं भूली है। सूर्यास्त का एक कीमती चित्र मुझे बहुत पसन्द था। वहाँ पर उसने उसे अपने कमरे में से निकालकर मेरे सोने के कमरे में टाँग दिया था। उस चित्र तक को वह कलकत्ते अपने साथ लाई है और ठीक उसी तरह उसी दीवाल पर टाँग दिया है। मेरे लिखने-पढ़ने का साज-सरंजाम, मेरे कपड़े, मेरी लाल मखमली चट्टियाँ, ठीक उसी तरह यत्नपूर्वक सजाकर रक्खी हुई हैं। वहाँ एक आराम-कुर्सी मैं सदा ही व्यवहार में लाता था। उसे शायद लाना सम्भव नहीं हुआ, इसीलिए, उसी तरह की एक नयी कुर्सी खिड़की के समीप रक्खी हुई है। धीरे-धीरे जाकर मैं उसी के ऊपर ऑंखें मूँदकर लेट गया। जान पड़ा, जैसे भाटे की नदी में ज्वार के जलोच्छ्वास का शब्द मुहाने के निकट फिर सुनाई दे रहा है।

नहा-खाकर थकावट के मारे दिन-दोपहर को ही सो गया। नींद टूटते ही देखा-पश्चिम की ओर की खिड़की से शाम की धूप मेरे पैरों के समीप आकर पड़ रही है और प्यारी एक हाथ के बल मेरे मुँह पर झुकी हुई दूसरे हाथ से ऑंचल के छोर से सिर, कन्धे और छाती पर का पसीना पोंछ रही है। बोली, “पसीने से तकिये और बिछौने भीग गये हैं। पश्चिम की ओर खुला होने से यह कमरा बड़ा गरम है। कल दूसरे मंजिल पर अपने पास के कमरे में ही तुम्हारे बिस्तर कर दूँगी।” यह कहकर मेरी छाती के बिल्कुहल निकट बैठकर पंखा उठाकर हवा करने लगी। रतन ने कमरे में आकर पूछा, “माँ, बाबू के लिए चाय ले आऊँ?”

“हाँ, ले आ। और बंकू यदि मकान में हो तो उसे जरा भेज देना।” मैंने फिर अपनी ऑंखें बन्द कर लीं। थोड़ी ही देर बाद बाहर से चट्टियों की आवाज सुन पड़ी। प्यारी ने पुकारकर कहा, “कौन, बंकू? “जरा इधर तो आ।”

उसके पैरों के शब्द से मालूम हुआ कि उसने अतिशय संकुचित भाव से अन्दर प्रवेश किया है। प्यारी उसी तरह पंखा झलते बोली, “जरा कागज-पेन्सिल लेकर बैठ जा। क्या-क्या लाना है, उसकी फेहरिस्त बनाकर दरबान के साथ जरा बाजार जा बेटा, घर में कुछ है नहीं।”

मैंने देखा, यह एक बिल्कु'ल नया वाकया है। बीमारी की बात अलहदा पर उसे छोड़कर इसके पहले किसी दिन मेरे बिछौने के इतने समीप बैठकर उसने हवा तक नहीं की थी। किन्तु यह भी, न हो तो, मैं एक दिन सम्भव मान सकता। किन्तु, यह जो उसने रंच-मात्र भी दुविधा नहीं की, सब नौकर-चाकरों के, यहाँ तक कि बंकू के सामने भी दर्प के साथ अपने आपको प्रकट कर दिया- इसके अपूर्व सौन्दर्य ने मुझे अभिभूत कर डाला। मुझे उस दिन की बात याद आ गयी जिस दिन पटने के मकान से मुझे इसलिए बिदा लेनी पड़ी थी कि यह बंकू ही कुछ और खयाल न करने लगे। उस दिन के साथ आज के आचरण में कितना अन्तर है।

चीज-बस्त की फेहरिस्त बनाकर बंकू चला गया। रतन भी चाय-तमाखू देकर नीचे चला गया। प्यारी कुछ देर चुपचाप मेरे मुँह की ओर निहारती रही; फिर एकाएक बोली, “तुमसे मैं एक बात पूछती हूँ- अच्छा, रोहिणी बाबू और अभया में से किसका प्यार अधिक है, बता सकते हो?”

मैंने हँसकर कहा, “जो तुम पर पूरी तरह हावी हो गयी है, निश्चय से उस अभया का ही प्यार अधिक है।”

राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी, बोली, “यह तुमने कैसे जाना कि वह मुझ पर हावी हो गयी है?”

मैंने कहा, “चाहे जैसे जाना हो, पर बात सच है या नहीं, यह बताओ?”

राजलक्ष्मी क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, “सो जैसे भी हो, किन्तु, अधिक प्यार तो रोहिणी बाबू ही करते हैं। दरअसल वे इतना प्यार करते थे, इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा दु:ख अपने सिर पर उठा लिया। अन्यथा यह उनका कोई अवश्य कर्त्तव्य तो था नहीं। उनकी अभया को कितना सा स्वार्थ-त्याग करना पड़ा?”

उसके सवाल को सुनकर मैं सचमुच ही विस्मित हो गया। मैं बोला, बल्कि मैं तो ठीक इससे उलटा देखता हूँ। और उस हिसाब से जो कुछ कठिन दु:ख-भोग और त्याग है, वह सब अभया को ही करना पड़ा है। तुम इस अभ्रान्त सत्य को क्यों भूली जाती हो कि रोहिणी बाबू चाहे जो करें, समाज की नजरों में आखिर वे मर्द हैं।

राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, “मैं कुछ भी नहीं भूलती। उन्हें मर्द बतलाकर सहज में बच निकलने के जिस मौके की ओर तुम इशारा कर रहे हो वह अत्यन्त क्षुद्र और अधम पुरुषों के लिए है- रोहिणी बाबू सरीखे मनुष्य के लिए नहीं। शौक पूरा हो गया, अथवा कुछ सार न रहा, तो छोड़-छाड़कर फेंककर भाग सकते हैं और घर लौटकर फिर गण्य-मान्य भद्र मनुष्यों की तरह जीवन-यात्रा कर सकते हैं- यही न कहते हो? कर सकते हैं-ठीक है; किन्तु, क्या सभी कर सकते हैं? तुम कर सकते हो? तब, जो नहीं कर सकता उसके बोझ के वजन को तो जरा सोच देखो। उसे अपना निन्दित जीवन मकान के निराले कोने में काट डालने का भी सुभीता नहीं। उसे तो संसार के बीच द्वन्द्व-युद्ध में उतर आना होगा, अविचार और अपयश का बोझा चुपचाप अकेले ही वहन करना पड़ेगा। अपने एकान्त-स्नेह की पात्री को- भावी सन्तान की जननी को समाज के सारे अपमानों और अकल्याणों से बचाकर रखना होगा। तुम क्या इसे मामूली कष्ट समझते हो? और, सबसे बढ़कर दु:ख यह है कि जो अनायास ही इस दु:ख के बोझे को उतारकर खिसक सकता है, सर्वनाशी विकट प्रलोभन से अपने आपको रात-दिन बचाकर चलने का गुरुभार भी उसको ही लिये घूमना पड़ता है। दु:ख के तराजू में इस आत्मोत्सर्ग के साथ समतौलता बनाए रखने के लिए जिस प्रेम की जरूरत है, उसे यदि पुरुष अपने भीतर से बाहर न प्रकट कर सके, तो किसी भी स्त्री के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह उसे पूरा कर सके।”

इस बात को इस पहलू से, इस तरह, कभी सोचकर नहीं देखा था। रोहिणी का वह सीधा-सादा गुमसुम भाव और उसके बाद, अभया जब अपने पति के घर चली गयी तब उसके उसी शान्त मुखमण्डल के ऊपर अपरिसीम वेदना को चुपचाप सहन करने का जो चित्र मैंने अपनी ऑंखों देखा था, वही पल-भर में ज्यों का त्यों, प्रत्येक रेखा सहित मेरे मन में खिंच गया। किन्तु, मुँह से मैंने कहा, “चिट्ठी में तो तुमने सिर्फ अभया के लिए ही पुष्पांजलि भेजी थी।”

राजलक्ष्मी बोली, “उनका जो प्राप्त है वह आज भी उन्हें ही देती हूँ। क्योंकि, मेरा विश्वास है कि जो भी पाप या अपराध था उसने उनके आन्तरिक तेज से जलकर उन्हें शुद्ध-निर्मल कर दिया है। यदि ऐसा न होता, तो आज वे बिल्कुकल साधारण स्त्रियों के समान ही तुच्छ-हीन हो जाती।”

“हीन क्यों?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “खूब! पति-परित्याग के पाप की भी कोई सीमा है? उस पाप को ध्वंहस करने योग्य आग उनमें न होती तो आज वे...”

मैंने कहा, “आग की बात जाने दो। किन्तु उनका पति कैसा नष्ट है, सो तो एक दफे सोच देखो।”

राजलक्ष्मी बोली, “पुरुष जाति चिरकाल से ही उच्छृंखल रही है- चिरकाल से ही कुछ-कुछ अत्याचारी भी रही है; किन्तु, इसीलिए तो स्त्री के पक्ष में भाग खड़े होने की युक्ति काम नहीं दे सकती। स्त्री-जाति को सहन करना ही होगा; नहीं तो संसार नहीं चल सकता।”

बात सुनकर मेरे सारे विचार गड़बड़ा गये। मन ही मन बोला, “यह स्त्रियों का वही सनातन दासत्व का संस्कार है! कुछ असहिष्णु होकर पूछा, “तो फिर अभी तक तुम 'आग आग, क्या बक रही थीं?”

राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “क्या बक रही थी, सुनोगे? आज ही दो घण्टे पहले पटने के ठिकाने पर लिखी हुई अभया की चिट्ठी मिली है। आग क्या है, जानते हो? उस दिन 'प्लेग' कहकर जब तुम उनकी तुरंत की जमाई गिरस्ती के द्वार पर जा खड़े हुए तब जिस वस्तु ने तुम्हें निर्भयता से बिना किसी सोच-विचार के भीतर बुला लिया, मैं उसी को कहती हूँ उनकी 'आग'। उस समय उन्हें अपने सुख का खयाल नहीं था। जो तेज मनुष्य को कर्त्तव्य समझकर सामने की ओर ही ढकेलता है, दुविधा से पीछे नहीं हटने देता, अब तक मैं उसी को 'आग-आग' कह रही थी। आग का एक नाम 'सर्वभुक्' है, सो क्या तुम नहीं जानते? वह सुख और दु:ख- दोनों को खींच लेती है, उसे किसी तरह का भेद-विचार नहीं होता। उन्होंने एक और बात क्या लिखी है, जानते हो? वे रोहिणी बाबू को सार्थक कर देना चाहती हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि केवल अपने जीवन की सार्थकता के भीतर से ही संसार में दूसरे के जीवन में सार्थकता पहुँचाई जा सकती है; और व्यर्थता से सिर्फ अकेला ही जीवन व्यर्थ नहीं होता- वह अपने साथ और भी अनेक जीवनों को जुदा-जुदा दिशाओं से व्यर्थ करके व्यर्थ हो जाता है। बिल्कुनल सच है न?” इतना कहकर वह एकाएक श्वास छोड़कर चुप हो रही। इसके बाद हम दोनों ही बहुत देर तक मौन रहे। जान पड़ता है, कहने को कुछ न होने के कारण ही अब वह मेरे सिर के रूखे बालों को अपनी अंगुलियों से व्यर्थ ही इधर-उधर विपर्यस्त करने लगी। उसका यह आचरण भी बिल्कु'ल नया था। सहसा बोली, “वे खूब शिक्षिता हैं न? नहीं तो, इतनी तेजस्विता नहीं होती।”

मैंने कहा, “हाँ, दरअसल वे एक शिक्षिता रमणी हैं।”

राजलक्ष्मी बोली, “किन्तु, एक बात उन्होंने मुझसे छिपाई है। माँ होने के लोभ को वे चिट्ठी के अन्दर बार-बार दबा गयी हैं।”

मैंने कहा, “क्या उन्हें यह लोभ है? कहाँ, मैं तो नहीं सुना?”

राजलक्ष्मी बोल उठी, “जाओ,- यह लोभ भला किस स्त्री को नहीं है? किन्तु क्या इसलिए उसे मर्दों से कहते फिरना चाहिए? तुम तो खूब हो!” मैंने कहा, “तो फिर तुम्हें भी है, क्या?”

“जाओ!” कहकर वह अकस्मात् लज्जा से लाल हो गयी और दूसरे ही क्षण अपने आरक्त मुख को छिपाने के लिए बिछौने पर झुक गयी। उसी समय अस्तोन्मुख सूर्य की किरणों ने पश्चिम की खुली हुई खिड़की से प्रवेश किया था। वह आरक्त आभा उसके मेघ के समान काले केशों पर विचित्र शोभा के साथ बिखर गयी। और, कानों के हीरे के दोनों लटकनों में नाना वर्णों की द्युति झिलमिल करती हुई खेलने लगी। क्षण-भर बाद ही अपने आपको सँभालकर और सीधे बैठकर उसने कहा, “क्यों, क्या मेरे लड़के-बच्चे नहीं हैं जो लोभ होगा, लड़कियों का ब्याह कर चुकी हूँ, लड़के को ब्याहने आई हूँ,- एक-दो नाती-पोते हो जाँयगे, उनको लेकर सुख-स्वच्छता से रहूँगी,- मुझे अभाव किस बात का है?”

मैं चुप हो रहा। इस बात को लेकर बहस करने की प्रवृत्ति नहीं हुई।

रात को राजलक्ष्मी ने कहा, “बंकू के ब्याह के लिए तो अब भी दस-बारह दिन की देर है; चलो न काशी चलें, तुम्हें अपने गुरुजी को दिखा लाऊँ।”

मैंने हँसकर कहा, “मैं क्या कोई नुमाइशी चीज हूँ?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “यह सोचने का भार जो लोग देखते उन पर है, तुम पर नहीं।”

मैंने कहा, “ऐसे ही सही, परन्तु, इससे मुझे ही क्या लाभ और तुम्हारे गुरुदेव को भी क्या लाभ होगा?”

राजलक्ष्मी ने गम्भीर होकर कहा, “लाभ तुम लोगों को नहीं है, किन्तु मुझे है न हो, तो केवल मेरे लिए ही चले चलो।”

इसलिए मैं राजी हो गया। आगे बहुत समय तक लग्न न थी, इसीलिए उस समय जैसे चारों ओर से विवाहों की बाढ़ आ गयी थी। जब तक बैण्ड का कार्नेट और बैग-पाइप की बाँसुरी विविध तरह के वाद्य-भाडों के सहयोग से मनुष्य को पागल बना डालने की तजवीज कर रही थी। हम लोगों की स्टेशन-यात्रा के समय भी इस तरह की कुछ उत्तम आवाजों की झड़ प्रचण्ड वेग से बह गयी। वेग के कुछ कम हो जाने पर राजलक्ष्मी ने सहसा प्रश्न किया, अच्छा, तुम्हारे मत से यदि सभी लोग चलने लगें, तो फिर गरीबों का विवाह ही न हो और घर-गिरस्ती भी न बने। तब फिर सृष्टि कैसे रहे?”

उसकी असाधारण गम्भीरता देखकर मैं हँस पड़ा। बोला, “सृष्टि-रक्षा के लिए चिन्ता करने की तुम्हें जरा भी जरूरत नहीं। क्योंकि हमारी तरह चलने वाले लोग दुनिया में अधिक नहीं हैं। कम से कम अपने इस देश में तो नहीं है; यह कहा जा सकता है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “न रहना ही भला है। केवल बड़े आदमी ही मनुष्य हैं? और क्या गरीब बेचारे संसार में कहीं से बह आए हैं? बाल-बच्चों को लेकर घर-गिरस्ती करने की साध क्या उन्हें नहीं होती?” मैंने कहा, “पर इसका क्या यह अर्थ है कि साध होती है इसलिए उसे प्रश्रय देना ही चाहिए?”

राजलक्ष्मी ने पूछा “क्या नहीं मुझे समझा दो।”

कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “सभी दरिद्रों के सम्बन्ध में मेरा यह मत नहीं है। मेरा मत केवल दरिद्र भले आदमियों के सम्बन्ध में है और मेरा विश्वास है कि तुम उसका कारण भी जानती हो।”

राजलक्ष्मी ने जिद के स्वर में कहा, “तुम्हारा यह मत गलत है।”

मुझ पर भी मानो जिद सवार हो गयी, मैंने कह डाला, “हजार गलत होने पर भी कम से कम तुम्हारे मुँह से तो यह बात शोभा नहीं देती। बंकू के बाप ने सिर्फ बहत्तर रुपयों के लोभ से दोनों बहिनों को व्याह लिया था,- वह दिन अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि भूल गयी होओ। खैर मनाओ कि उस आदमी का पेशा ही यही था। नहीं तो, कल्पना करो, यदि वह तुम्हें अपने घर ले जाता, तुम्हारे दो-चार बाल-बच्चे हो जाते-तब एक दफे सोच देखो कि तुम्हारी क्या दशा होती?”

राजलक्ष्मी की ऑंखों में जैसे झगड़ने का भाव घना हो उठा; बोली, “भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी देख-भाल भी कर करते हैं। तुम नास्तिक हो, इसीलिए विश्वास नहीं करते।”

मैंने भी जवाब दिया, “मैं नास्तिक होऊँ चाहे जो होऊँ परन्तु आस्तिक लोगों को भगवान की जरूरत क्या केवल इसीलिए है?- इन सब बच्चों को आदमी बनाने के लिए?”

राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध कण्ठ से कहा, “भले ही वे न बनावें। किन्तु मैं तुम्हारी तरह डरपोक नहीं हूँ। मैं द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर भी उन्हें आदमी बनाती। और जो भी हो, नाचने-गाने वाली बनने की अपेक्षा वह मेरे हक में बहुत अच्छा होता?”

मैंने फिर और तर्क नहीं किया। आलोचना बिल्कुेल ही व्यक्तिगत और अप्रिय ढंग पर उतर आई थी, इसलिए, मैं खिड़की के बाहर रास्ते की ओर देखता हुआ बैठा रहा।

हमारी गाड़ी धीरे-धीरे सरकारी और गैर सरकारी ऑफिस क्वार्टर्स छोड़कर बहुत दूर आ पड़ी। शनिवार का दिन है, दो बजे के बाद अधिकांश दफ्तरों के क्लर्क छुट्टी पाकर ढाई की ट्रेन पकड़ने के लिए तेजी से चले आ रहे हैं। प्राय: सभी के हाथों में कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री है। किसी के हाथ में एक-दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ, किसी के रूमाल में बकरे का मांस, किसी के हाथ में गँवई-गाँव में नहीं मिलने वाली हरी तरकारियाँ और फल। सात दिनों के बाद घर पहुँचकर उत्सुक बाल-बच्चों के मुँह पर जरा-सी आनन्द की हँसी देखने के लिए करीब-करीब सभी अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार थोड़ी-बहुत मिठाई चादर के छोर में बाँधकर भागे जा रहे हैं। प्रत्येक के मुँह पर आनन्द और ट्रेन पकड़ने की उत्कण्ठा एक साथ इस तरह परिस्फुटित हो उठी है कि राजलक्ष्मी ने मेरा हाथ खींचकर अत्यन्त कुतूहल के साथ पूछा, “हाँ जी, ये सब लोग इस तरह स्टेशन की ओर क्यों भाग रहे हैं? आज क्या है?”

मैंने घूमकर कहा, “आज शनिवार है। ये सब दफ्तरों के क्लर्क हैं, रविवार की छुट्टी में घर जा रहे हैं।”

राजलक्ष्मी ने गर्दन हिलाकर कहा, “हाँ यही मालूम होता है। और देखो सब एक न एक खाने की चीज लिये जाते हैं। गँवई-गाँव में तो यह सब मिलता नहीं, इसलिए मालूम होता है, बाल-बच्चों को हाथ में देने के लिये खरीदे लिए जाते हैं, क्यों न?”

मैंने कहा, “हाँ।”

उसकी कल्पना तेजी से दौड़ने लगी। इसीलिए, उसने उसी क्षण कहा “आ:, लड़के-लड़कियों में आज कितना उत्साह होगा। कोलाहल मचाएँगे, गले से लिपटकर बाप की गोद में चढ़ने की चेष्टा करेंगे, माँ को खबर देने रसोईघर में दौड़ जाँयगे, घर-घर में आज मानो एक काण्ड-सा मच जायेगा। क्यों न?” कहते-कहते उसका सारा मुँह उज्ज्वल हो उठा।

मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “खूब सम्भव है।”

राजलक्ष्मी ने गाड़ी की खिड़की में से और भी कुछ देर उनकी तरफ निहारते रहकर एकाएक एक गहरी नि:श्वास छोड़ दी और कहा, “हाँ जी, उनकी तनखा कितना होगी?”

मैंने कहा, “क्लर्कों की तनख्वाह और कितनी होती है,- यही बीस-पच्चीस तीस रुपये।

राजलक्ष्मी ने कहा- “किन्तु, घर तो इनके माँ है, भाई-बहिन हैं, स्त्री हैं, लड़के-बच्चे हैं।”

मैंने इतना और जोड़ दिया, “दो-एक विधवा बहिनें हैं: शादी-ब्याह, क्रिया-कर्म, लोक-व्यवहार, भलमंसी है; कलकत्ते का भोजन-खर्च है, लगातार रोगों का खर्चं है,-बंगाली क्लर्क-जीवन का सब कुछ इन्हीं तीस रुपयों पर निर्भर रहता है।”

राजलक्ष्मी की मानो साँस ही अटकने लगी। वह बहुत व्याकुल होकर बोल उठी,

“तुम नहीं जानते। इन लोगों के घर जमीन-जायदाद भी है, निश्चय से है।”

उसका मुँह देखकर निराश करते हुए मुझे वेदना हुई, फिर भी, मैंने कहा, “मैं इन लोगों की घर-गिरस्ती का इतिहास खूब घनिष्ठता से जानता हूँ। मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि इनमें से चौदह आने लोगों के पास कुछ भी नहीं है। यदि नौकरी चली जाय तो या तो इन्हें भिक्षावृत्ति करनी होगी या फिर पूरे परिवार के साथ उपवास करना होगा। इन लोगों के लड़के-लड़कियों की कहानी सुनोगी?”

राजलक्ष्मी अकस्मात् दोनों हाथ उठाकर चिल्ला उठी, “नहीं-नहीं, नहीं सुनूँगी,- मैं नहीं सुनना चाहती।”

यह बात मैं उसकी ऑंखों की ओर निहारते ही जान गया कि उसने प्राणपण से ऑंसुओं को रोक रक्खा है। इसीलिए मैंने और कुछ न कहकर फिर रास्ते की ओर मुँह मोड़ लिया। बहुत देर तक उसकी कोई आहट नहीं मिली। इतनी देर, शायद, अपने आपसे वकालत करके और अन्त में अपने कुतूहल के निकट ही पराजय मानकर उसने मेरे कोट का खूँट पकड़कर खींचा और पलटकर देखते ही करुण कण्ठ से कहा, “अच्छा तो, कहो उनके लड़के-लड़कियों की कहानी। किन्तु तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, झूठ-मूठ बढ़ाकर मत कहना। दुहाई है तुम्हारी!”

उसकी मिन्नत करने की भाव-भंगीमा देखकर हँसी तो छूटी, किन्तु, हँसा नहीं। बल्कि कुछ अतिरिक्त गम्भीरता से बोला, “बढ़ाकर कहना तो दूर, तुम्हारे पूछने पर भी मैं नहीं सुनाता, यदि तुमने अभी कुछ ही पहले अपने सम्बन्ध में भीख माँगकर बच्चों को आदमी बनाने की बात न कही होती। भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी सुव्यवस्था का भार भी वे लेते हैं, यह बात अवश्य है। इसे अस्वीकार करूँ तो शायद नास्तिक कहकर फिर भला-बुरा कहोगी; किन्तु सन्तान की जवाबदारी बाप के ऊपर कितनी है और भगवान के ऊपर कितनी है, इन दो समस्याओं की मीमांसा तुम खुद ही करो। मैं जो जानता हूँ केवल वही कहूँगा,- है न ठीक?”

यह देखकर कि वह चुपचाप मेरी ओर जिज्ञासु-मुख से निहार रही है, मैंने कहा, “बच्चा पैदा होने पर उसे कुछ दिन छाती का दूध पिलाकर जिलाए रखने का भार, मैं समझता हूँ, उसकी माँ के ऊपर है। भगवान के ऊपर अचल भक्ति है, उनकी दया पर भी मुझे अन्धविश्वास है, किन्तु फिर भी, माँ के बदले इस भार को खुद अपने ऊपर लेने का उपाय उनके पास है कि नहीं,...”

राजलक्ष्मी नाराज होकर हँस पड़ी और बोली, “देखो चतुराई रहने दो- यह मैं भी जानती हूँ।”

“जानती हो? तब जाने दो, एक जटिल समस्या की मीमांसा हो गयी। किन्तु, तीस रुपये के घर की जननी के दूध का स्रोत सूख जाने में देर क्यों नहीं लगती, यह जानना हो तो किसी तीस रुपये मासिक के घर की जच्चा के आहार के समय उपस्थित रहना आवश्यक होगा। किन्तु, तुमसे जब यह नहीं हो सकता तब इस विषय में न हो तो मेरी बात मान लो।”

राजलक्ष्मी मलीन मुख किये चुपचाप मेरी ओर ताकती रही।

मैं बोला, “देहात में गो-दुग्ध का बिल्कुसल अभाव है, यह बात भी तुम्हें मान लेनी होगी।”

राजलक्ष्मी ने चट से कहा, “सो तो मैं खुद भी जानती हूँ। घर में गाय हो तब तो ठीक, नहीं तो, आजकल सिर पटककर मर जाने पर भी किसी गाँव में एक बूँद दूध पाना कठिन है ढोर ही नहीं हैं, दूध कहाँ से हो?”

मैंने कहा, “खैर और भी एक समस्या का समाधान हो गया। तब फिर बच्चों के भाग में रहा खालिस स्वदेशी ताल-तलैयों का जल और विदेशी डब्बों का खालिस बार्ली (जौ) का चूरा। अभागियों के भाग्य में अक्सर उनका स्वाभाविक खाद्य,- थोड़ा- बहुत माता का दूध भी, जुटा सकता है, किन्तु वह सौभाग्य भी इन सब घरों में अधिक दिनों तक टिकने का नियम नहीं। क्योंकि चारेक महीने के भीतर ही और एक नूतन आगन्तुक अपने आविर्भाव का नोटिस देकर अपने भाई के दूध का हक एकदम बन्द कर देता है। यह शायद तुम...”

राजलक्ष्मी लज्जा के मारे लाल होकर बोल उठी, “हाँ हाँ, जानती हूँ, जानती हूँ। मुझे व्याख्या करके समझाने की जरूरत नहीं। तुम इसके बाद की बात कहो।”

मैंने कहा, “इसके बाद धर दबाता है बच्चे को पेट का दर्द और स्वदेशी मलेरिया बुखार। तब बाप का कर्तव्य होता है विदेशी कुनैन और बार्ली का चूरा जुटाना। और माँ के सिर पर पड़ता है, जैसा कि मैंने पहले कहा, प्रसूतिगृह में पुन: भर्ती होने के बीच के समय की फुरसत में इन सबको खालिस देशी जल में घोलकर पिलाने का काम! इसके बाद यथासमय सूतिका-गृह का झगड़ा मिटने पर नवजात शिशु को गोद में लेकर बाहर आना और पहले बच्चे के लिए कुछ दिन तक रोना।”

राजलक्ष्मी नीली पड़कर बोली, “रोना क्यों?”

मैंने कहा, “अरे, यह तो माता का स्वभाव है! और ऐसा स्वभाव जो क्लर्क के घर में भी अन्यथा नहीं हो सकता जब कि भगवान दायित्व से मुक्त करने के लिए उस पहले बच्चे को अपने श्रीचरणों में बुला लेते हैं।”

इतनी देर बाहर की ओर ताकते रहकर ही बातें कर रहा था। अकस्मात् नजर घुमाकर देखा कि उसकी बड़ी-बड़ी ऑंखें अश्रु-जल में तैर रही हैं। मुझे अत्यन्त दु:ख मालूम हुआ। सोचा, इस बेचारी को व्यर्थ दु:ख देने से क्या लाभ? अधिकांश धनियों के समान जगत के इस विराट दु:ख की बाजू यदि इसके लिए भी अगोचर बनी रहती तो क्या हर्ज था! भयंकर दरिद्रता से पीड़ित बंगाल के क्षुद्र नौकरपेशा गृहस्थ-परिवार केवल अन्न के अभाव से ही, मलेरिया हैजा आदि के बहाने, दिन पर दिन शून्य होते जा रहे हैं,- यह बात अन्य बहुत-से बड़े आदमियों की तरह, न होता, यह भी न जानती। इससे क्या ऐसी कोई बड़ी भारी हानि हो जाती!

ठीक ऐसे ही समय राजलक्ष्मी ऑंखें पोंछते-पोंछते अवरुद्ध कण्ठ से बोल उठी, “भले ही क्लर्क हों, फिर भी वे तुमसे कई दर्जे अच्छे हैं। तुम तो पत्थर हो! तुम्हें स्वयं कोई दु:ख नहीं है, इसीलिए इन लोगों के दु:ख कष्ट इस तरह आह्लाद के साथ वर्णन कर रहे हो। किन्तु मेरा तो हृदय फटा जाता है।”

यह कहकर वह ऑंचल से बार-बार ऑंखें पोंछने लगी। इसका मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि, इससे कोई लाभ न होता। बल्कि नम्रता के साथ कहा, “इन लोगों के सुख का हिस्सा भी तो मेरे भाग्य में नहीं है। घर पहुँचने की उनकी उत्सुकता भी तो एक सोचने-देखने की चीज है।”

राजलक्ष्मी का मुँह हँसी और ऑंसुओं से एक साथ दीप्त हो उठा। वह बोली, “मैं भी तो यही कहती हूँ। आज पिता आ रहे हैं, इसलिए सारे बाल-बच्चे रास्ता देख रहे हैं। उन्हें कष्ट किस बात का है? उन लोगों की तनखा शायद कम हो, किन्तु वैसी बाबूगिरी भी तो नहीं है। किन्तु फिर भी क्या पचीस-तीस ही रुपया?-इतना कम? कभी नहीं। कम से कम सौ-डेढ़ सौ रुपये तो होंगे, मैं निश्चय से कहता हूँ।”

मैंने कहा, “हो भी सकता है। मैं शायद ठीक-ठीक नहीं जानता।”

उत्साह पाकर राजलक्ष्मी का लोभ बढ़ गया। अतिशय क्षुद्र क्लर्क के लिए भी डेढ़ सौ रुपया महीना उसे नहीं जँचा। बोली, “क्या तुम समझते हो कि केवल उसी मासिक पर ही उनका सारा दारोमदार है? ऊपर से भी तो कितना ही पा जाते हैं।”

मैंने कहा, “ऊपर से? प्याला?”

अब उसने कुछ नहीं कहा। वह मुँह भारी करके रास्ते की ओर ताकती हुई बैठी रही। कुछ देर बाद बाहर की ओर दृष्टि रक्खे हुए ही उसने कहा, “तुम्हें जितना ही देखती हूँ तुम्हारे ऊपर से मेरा मन उतना ही हटता जाता है। तुम जानते हो कि तुम्हें छोड़कर मेरी ओर कोई गति नहीं है, इसीलिए तुम मुझे इस कदर छेदते हो!

इतने दिनों बाद, आज शायद पहले ही पहल मैंने उसके दोनों हाथ जोर से अपनी ओर खींच लिये और उसके मुँह की ओर देखकर मानो कुछ कहना भी चाहा; किन्तु इतने में ही गाड़ी स्टेशन के समीप आकर खड़ी हो गयी। एक स्वतन्त्र डिब्बा रिजर्व कर लिया गया था, फिर भी, बंकू कुछ सामान लेकर दोपहर के पहले ही आ गया था। कोचबाक्स पर रतन को देखते ही वह दौड़ आया। मैं हाथ छोड़कर सीधा बैठ गया। जो बात मुँह पर आ गयी थी। वह चुपचाप अन्दर में जाकर छिप गयीं।

ढाई बजे की लोकल ट्रेन छूटने ही को थी। हमारी ट्रेन उसके बाद जाती थी। इसी समय एक प्रौढ़ अवस्था का दरिद्र भला आदमी एक हाथ में तरह-तरह की हरी तरकारियों की पोटली और दूसरे हाथ में डण्डी पर बैठा हुआ एक मिट्टी का पक्षी लिये, केवल प्लेटफार्म पर लक्ष्य रक्खे और सब दिशाओं के ज्ञान से शून्य होकर दौड़ता हुआ राजलक्ष्मी के ऊपर आ पड़ा। मिट्टी का खिलौना नीचे गिरकर चूर हो गया। वह हाय-हाय करके शायद उसे बटोरने जा रहा था कि पाण्डेजी ने हुँकार मारकर एक छलाँग में उसकी गर्दन धर दबाई और बंकू छड़ी उठाकर 'अन्धे' आदि कहकर मारने को तैयार हो गया। मैं कुछ दूरी पर अन्यमनस्क-सा खड़ा था,-घबड़ाकर रंगभूमि पर आ गया। वह बेचारा भय और शर्म के मारे बार-बार कहने लगा, “देख नहीं पाया माँ, मुझसे बड़ा कसूर हो गया...”

मैंने उसे चटपट छुड़ा दिया और कहा, “जो होना था सो हो गया, आप शीघ्र जाइए, आपकी गाड़ी छूट रही है।”

उस बेचारे ने फिर भी अपने खिलौने के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए कुछ देर इधर-उधर किया और अन्त में दौड़ लगा दी। किन्तु अधिक दूर नहीं जाना पड़ा, गाड़ी चल दी। तब लौटकर फिर उसने एक दफा क्षमा माँगी और वह उन टूटे टुकड़ों को बटोरने में प्रवृत्त हो गया। यह देखकर मैंने जरा हँसकर कहा, “इससे अब क्या होगा?”

उसने कहा, “कुछ नहीं महाशय, लड़की बीमार है। पिछले सोमवार को घर से आते समय उसने कह दिया था- “मेरे लिए एक खिलौना खरीद लाना।” खरीदने गया तो बच्चू ने गरज समझकर दाम हाँके, “दो आने-एक पैसा भी कम नहीं। खैर वही सही। रामराम करके किसी तरह पूरे आठ पैसे फेंककर ले आया। किन्तु देखिए दुर्भाग्य की बात कि ऐन मौके पर फूट गया, रोगी लड़की के हाथ में न दे सका। बिटिया रोकर कहेगी, “बाबा, लाए नहीं!” कुछ भी हो, टुकड़े ही ले जाऊँ, दिखाकर कहूँगा, बेटी, इस महीने की तनखा पाने पर पहले तेरा खिलौना खरीदूँगा, तब और काम करूँगा।”

इतना कहकर सारे टुकड़े बटोरकर और चादर के छोर में बाँधकर कहने लगा, “आपकी स्त्री को शायद बहुत चोट लग गयी है, मैंने देखा नहीं- नुकसान का नुकसान हुआ और गाड़ी भी नहीं मिली। मिल जाती तो रोगी बिटिया को आधा घण्टे पहले पहुँचकर देख लेता।” कहते-कहते वह फिर प्लेटफार्म की ओर चल दिया। बंग पाण्डेजी को लेकर किसी काम से कहीं अन्यत्र चला गया था। मैंने एकाएक पीछे की ओर घूमकर देखा, राजलक्ष्मी की ऑंखों से सावन की धारा की तरह ऑंसू बह रहे हैं। व्यस्त होकर निकट जाकर पूछा, “ज्यादा चोट आ गयी क्या? कहाँ लगी है?”

राजलक्ष्मी ने ऑंचल से ऑंख पोंछकर कहा, “हाँ, बहुत चोट लगी है- परन्तु लगी है ऐसी जगह कि तुम जैसे पत्थर न उसे देख उसे देख सकते हैं और न समझ सकते हैं!”
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श्रीमान् बंकू को बाध्ये होकर हमारे लिए स्वतन्त्र डब्बा क्यों रिज़र्व करना पड़ा उनसे जब मैं इस बात की पूछताछ कर रहा था तब राजलक्ष्मी कान लगाकर सुन रही थी। इस समय उनके जरा अन्यत्र जाते ही राजलक्ष्मी ने बिल्कुकल ही गले पड़कर मुझे सुना दिया कि अपने लिए फिजूल के खर्च करना वह जितना ही नापसन्द करती है उसके भाग्य से उतनी ही ये सब विडम्बनाएँ उपस्थित हो जाती हैं। वह बोली- “यदि उन लोगों की तृप्ति सेकण्ड क्लास या फर्स्ट क्लास में जाने से ही होती हो तो ठीक है; पर मेरे लिए तो औरतों का डब्बा था। रेलवे कम्पनी को फिजूल ही इतने अधिक रुपये क्यों दिये जाँय?”

बंकू की कैफियत के साथ उसकी माँ की इस मितव्यय-निष्ठा का कोई विशेष सामंजस्य मैं नहीं देख पाया। किन्तु, ऐसी बातें स्त्रियों से कहने से व्यर्थ का कलह होता है। अतएव, चुपचाप मैं केवल सुनता रहा। कुछ बोला नहीं।

प्लेटफार्म की एक बेंच पर बैठकर पूर्वोक्त सज्जन ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने से जाते हुए मैंने पूछा, “आप कहाँ जाँयगे?”

वे बोले, “बर्दवान।”

कुछ आगे जाते ही राजलक्ष्मी ने मुझसे धीरे से कहा, “तो फिर वे अनायास ही अपने डब्बे में चल सकते हैं, न? किराया तो देना न होगा- फिर क्यों नहीं उन्हें बुला लेते!”

मैंने कहा, “टिकट तो निश्चय से खरीद लिया गया है- किराए के पैसे नहीं बचेंगे।”

राजलक्ष्मी बोली- “भले ही खरीद लिया गया हो-भीड़ के कष्ट से तो बच जाँयगे।”

मैंने कहा, “उन्हें अभ्यास है, वे भीड़ की तकलीफ की परवाह नहीं करते।”

तब राजलक्ष्मी ने जिद करके कहा, “नहीं-नहीं, तुम उनसे कहो। हम लोग तीन आदमी बातचीत करते हुए जाँयगे, इतना रास्ता मजे से कट जायेगा।”

मैंने समझ लिया कि इस समय उसे अपनी भूल महसूस हो रही है। बंकू और अपने नौकर-चाकरों की नजर में मेरे साथ अकेली अलहदा डब्बे में बैठने की खटक को वह किसी तरह कुछ हलका कर लेना चाहती है। फिर भी मैंने इसको और भी अधिक ऑंखों में अंगुली डालकर दिखाने के अभिप्राय से लापरवाही के भाव से कहा, “जरूरत क्या है एक अनावश्यक आदमी को डब्बे में बुलाने की? तुम मेरे साथ जितनी चाहो उतनी बातें कर लेना- मजे से समय कट जायेगा।”

राजलक्ष्मी ने मुझ पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष निक्षेप करके कहा- “सो मैं जानती हूँ। मुझे छकाने का इतना बड़ा मौका क्या तुम छोड़ सकते हो?”

इतना कहकर वह चुप हो रही। किन्तु ट्रेन के स्टेशन पर आते ही मैंने जाकर कहा, “आप क्यों नहीं हमारे डब्बे में बैठ जाँय। हम दो को छोड़कर उसमें और कोई नहीं है। भीड़ की तकलीफ से आप बच जाँयगे।”

कहने की जरूरत नहीं, उन्हें राजी करने में कोई तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। अनुरोध करने-भर की देर थी कि वे अपनी पोटली लेकर हमारे डब्बे में आ बैठै।

ट्रेन दो-चार स्टेशन ही पार कर पाई थी कि राजलक्ष्मी ने उनके साथ खूब बातचीत करना शुरू कर दिया और कुछ ही स्टेशनों को पार करते-करते तो उनके घर की खबरें, मुहल्ले की खबरें यहाँ तक कि आस-पास के गाँवों तक की खबरें कुरेद-कुरेदकर जान लीं।

राजलक्ष्मी के गुरुदेव काशी में अपने नाती पातिनों के साथ रहते हैं, उनके लिए वह कलकत्ते से अनेक चीजें लिये जा रही थी। बर्दवान नजदीक आते ही ट्रंक खोलकर उनमें से चुनकर एक सब्ज रंग की रेशमी की साड़ी बाहर निकाली और कहा, “सरला को उसके खिलौने के बदले साड़ी दे देना।”

वे सज्जन पहले तो अवाक् हो रहे, बाद में सलज्ज भाव से जल्दी से बोले- “नहीं बेटी, सरला को मैं अबकी दफे खिलौना खरीद दूँगा- आप साड़ी रहने दें। इसके सिवाय, यह तो बहुत बेशकीमती कपड़ा है बेटी!”

राजलक्ष्मी ने कपड़े को उनके पास रखते हुए कहा, “बेशकीमती नहीं है और और कीमत कुछ भी हो, इसे उसके हाथ में देकर कहिएगा कि तुम्हारी मौसी ने अच्छे होने पर पहिरने के लिए दिया है!”

सज्जन की ऑंखें छलछला आईं। आधा घण्टे की बातचीत में ही एक अपरिचित आदमी की पीड़िता कन्या को एक मूल्यवान् वस्तु का उपहार देना, उन्होंने शायद अपने जीवन में और कभी नहीं देखा था। कहा, “आशीर्वाद दीजिए कि वह अच्छी हो जाय; किन्तु, गरीबी का घर है, इतने कीमती कपड़े का वह क्या करेगी बेटी? आप उसे उठाकर रख लीजिए।” इतना कहकर उन्हांने मेरी ओर भी एक दफे देखा। मैंने कहा, “जब उसकी मौसी पहिरने के लिए दे रही है तब आपका ले जाना ही उचित है।” फिर हँसकर कहा, “सरला का भाग्य अच्छा है, हम लोगों की भी कोई मौसी-औसी होती तो बड़ा सुभीता होता! अबकी बार महाशय, आपकी लड़की, आप देखेंगे कि, चटपट अच्छी हो जायगीं

उस समय उस पुरुष के समस्त चेहरे से कृतज्ञता मानो उछल पड़ने लगी। और आपत्ति न करके उन्होंने उस वस्त्र को ग्रहण कर लिया। अब दोनों जनों में फिर बातचीत होने लगी। गृहस्थाश्रम की बातें, समाज की बातें, सुख-दु:ख की बातें, और न जाने क्या-क्या। मैं सिर्फ खिड़की के बाहर ताकता हुआ स्तब्ध होकर बैठा रहा और जो प्रश्न अपने आपसे बहुत बार पूछ चुका था वही इस छोटी-सी घटना के सूत्र के सहारे फिर मेरे मन में उठ खड़ा हुआ कि इस यात्रा का अन्त कहाँ है?

एक दस-बारह रुपये का वस्त्र दान कर देना राज्यलक्ष्मी के लिए कठिन बात थी और नयी। उसके दास-दासी शायद इस बात का कभी खयाल भी नहीं करते। किन्तु मेरी चिन्ता दूसरी ही थी। यह दी हुई चीज दान के हिसाब से उसके लिए कुछ न थी। यह मैं जानता था। किन्तु, मैं सोच रहा था कि उसके हृदय की धारा जिस ओर लक्ष्य करके अपने आपको नि:शेष करने के लिए उद्दाम के लिए गति से दौड़ी चली जा रही है, उसका अवसान कहाँ होगा और किस तरह?

समस्त रमणियों के अन्तर में 'नारी' वास करती है या नहीं, यह जोर से कहना अत्यन्त दु:साहस का काम है। किन्तु नारी की चरम सार्थकता मातृत्व में है, यह बात शायद खूब गला फाड़ करके प्रचारित की जा सकती है।

राजलक्ष्मी को मैंने पहिचान लिया था। यह मैंने विशेष ध्या नपूर्वक देखा था कि उसमें की प्यारी बाई अपने अपरिणत यौवन के समस्त दुर्दम्य मनस्तापों के साथ प्रति-मुहूर्त मर रही है। आज उस नाम का उच्चारण करने से भी वह मानो लज्जा के मारे मिट्टी में मिल जाती है। मेरे लिए एक यह समस्या हो गयी।

सर्वस्व लगाकर संसार का उपभोग करने का वह उत्तम आवेग राजलक्ष्मी में अब नहीं है; आज वह शान्त, स्थिर हैं उसकी कामना वासना आज उसी के मध्यप में इस तरह गोता लगा गयी है कि बाहर से एकाएक सन्देह होता है कि वह है भी या नहीं। उसी ने इस सामान्य घटना को उपलक्ष्य करके मुझे फिर स्मरण दिला दिया कि आज उसके परिणत यौवन के सुगम्भीर तल-देश से जो मातृत्व सहसा जाग उठा है, तुरन्त ही जागे हुए कुम्भकर्ण के समान उसकी विराट क्षुधा के लिए आहार कहाँ मिलेगा? उसके सन्तान होने पर जो बात सहज और स्वाभाविक हो सकती, उसी के अभाव में समस्या इस तरह एकान्त जटिल हो उठी है।

उस दिन पटने में उसके जिस मातृरूप को देखकर मैं मुग्ध और अभिभूत हो गया था, आज उसी मूर्ति का स्मरण करके अत्यन्त व्यथा के साथ मैं केवल यही सोचने लगा कि इतनी बड़ी आग को केवल फूंक मारकर नहीं बुझाया जा सकता। इसीलिए, आज पराए लड़के को पुत्र कल्पित करने के खिलवाड़ से राजलक्ष्मी के हृदय की तृष्णा किसी तरह भी नहीं मिट रही है। इसलिए आज एक मात्र बंकू ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है, आज दुनिया में जहाँ जितने भी लड़के हैं उन सबका सुख-दु:ख भी उसके हृदय को आलोड़ित कर रहा है।

बर्दवान में वे महाशय उतर गये। राजलक्ष्मी बहुत देर चुपचाप बैठी रही। मैंने खिड़की की ओर से दृष्टि हटाकर पूछा, “यह रोना किसके लिए हुआ? सरला के लिए, या उसकी माँ के लिए?”

राजलक्ष्मी ने मुँह उठाकर कहा, “मालूम होता है, तुम इतनी देर तक हम लोगों की बात चीत सुन रहे थे।”

मैंने कहा, “यों ही अनायास। स्वयं बात न करने पर भी बाहर से बहुत-सी बातें मनुष्य के कानों में आ घुसती हैं। संसार में भगवान ने कम बोलने वालों के लिए इस दण्ड की सृष्टि कर रक्खी है। इससे बचने की कोई युक्ति नहीं। खैर जाने दो, किन्तु यह ऑंखों का पानी किसके लिए झरा, सो नहीं बताया?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “मेरी ऑंखों का पानी किसके लिए झरता है, यह जानने से तुम्हें कोई लाभ नहीं।”

मैंने कहा, “लाभ की आशा नहीं करता- केवल नुकसान बचाकर ही चला जा सके तो काफी है। सरला अथवा उसकी माँ के लिए जितनी इच्छा हो ऑंसू बहाओ, मुझे कोई आपत्ति नहीं-किन्तु, उसके बाप के लिए बहाना मैं पसन्द नहीं करता।”

राजलक्ष्मी केवल एक 'हूँ' करके खिड़की के बाहर झाँकने लगी।

सोचा था कि यह दिल्लगी निष्फल नहीं जायेगी, अनेक रुँधे हुए झरनों के द्वार खोल देगी। किन्तु, सो तो हुआ नहीं; हुआ यह कि अब तक वह इस ओर देख रही थी सो दिल्लगी सुनकर उस ओर को मुँह फेरकर बैठ गयी।

किन्तु बहुत देर से मौन था- बातचीत करने के लिए भीतर ही भीतर एक आवेग उपस्थित हो गया था। इसलिए अधिक देर तक चुप न रह सका और बोला, “बर्दवान से कुछ खाने को मोल ले लिया होता!”

राजलक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, वह उसी तरह चुप बनी रही।

मैं बोला, “दूसरे के दु:ख में रो-रोकर नद बहा दिया, और घर के दु:ख पर कान ही नहीं देतीं! तुमने यह विलायत से लौटे हुओं की विद्या कहाँ से सीख ली?”

राजलक्ष्मी ने इस दफे धीरे से कहा, “देखती हूँ कि विलायत से लौटे हुओं पर तुम्हारी भारी भक्ति है!”

मैंने कहा, “हाँ, वे लोग भक्ति के पात्र जो हैं!”

“क्यों, उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

“अभी तक तो कुछ नहीं बिगाड़ा किन्तु, बाद में कहीं कुछ बिगाड़ न दें, इस डर से पहले ही भक्ति करता हूँ।”

राजलक्ष्मी ने क्षण-भर चुप रहकर कहा, “यह तुम लोगों का अन्याय है। तुम लोगों ने उन्हें अपने दल से, जाति से, समाज से-सब ओर से बहिष्कृत कर दिया है। फिर भी, यदि वे लोग तुम्हारे लिए थोड़ा-सा भी कुछ करते हैं, तो उतने ही के लिए तुम्हें उनका कृतज्ञ होना चाहिए।”

मैंने कहा, “हम लोग बहुत ज्यादा कृतज्ञ होते, यदि वे उस क्रोध के कारण पूरे-पूरे मुसलमान या क्रिस्तान हो जाते! उन लोगों में जो अपने को 'ब्राह्म' कहते हैं वे ब्राह्म-समाज को नष्ट करते हैं, जो 'हिन्दू' कहते हैं वे हिन्दू समाज को हैरान करते हैं। यदि वे पहले यह ठीक करके कि स्वयं कौन हैं दूसरों के लिए रोने बैठते तो उससे उनका खुद का कल्याण होता और जिनके लिए रोते हैं उनका भी शायद कुछ उपकार हो जाता।”

राज्यलक्ष्मी बोली, “किन्तु, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता।”

मैंने कहा, “नहीं जान पड़ता तो कोई विशेष हानि नहीं। किन्तु, जिसके लिए इस समय अटका हुआ हूँ वह अन्य बात है। कहाँ, उसका तो कोई जवाब ही नहीं दिया?”

इस दफे राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “अजी, उसके लिए अटकना नहीं पड़ेगा। पहले तुम्हारी भूख तो पक जाय, उसके बाद विचार किया जायेगा।”

मैंने कहा, “तब विचार क्या होगा, जिस-किसी स्टेशन से जो कुछ मिलेगा वही निगलने को दे दोगी!-किन्तु, सो नहीं होगा, मैं कहे रखता हूँ।”

मेरा उत्तर सुनकर वह मेरे मुँह की ओर कुछ देर चुपचाप देखती रही और फिर कुछ हँसकर बोली, “सो मैं कर सकती हूँ- तुम्हें विश्वास होता है?”

“मैंने कहा- “खूब! इतना-सा भी विश्वास तुम पर नहीं होगा?”

“तो ठीक है!” कहकर वह फिर अपनी खिड़की से बाहर झाँकती हुई चुपचाप बैठी रही।

अगले स्टेशन पर राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर खाने के लिए जगह करा दी और उसे हुक्का लाने का हुक्म देकर थाली में समस्त खाद्य-सामग्री सजाकर सामने रख दी। देखा, इस विषय में कहीं बिन्दु-भर भी भूल-चूक नहीं हुई है- मुझे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब चुन-चुन कर संग्रह करके लाया गया है।

बेंच पर रतन ने बिस्तर कर दिये। इतमीनान के साथ भोजन समाप्त करके गुड़गुड़ी की नली मुँह में डालकर आराम से ऑंखें मूँदने की तैयारी कर रहा था कि राजलक्ष्मी बोली, “खाने की चीजें उठा ले जा रतन, इनमें से जो भावे सो खा लेना- और तेरे डिब्बे में और भी कोई खावे तो दे देना।”

किन्तु, रतन को अत्यन्त लज्जित और संकुचित लक्ष्य करके मैंने कुछ, अचरज के साथ पूछा, “कहाँ, तुमने तो कुछ खाया नहीं?”

राजलक्ष्मी बोली, “नहीं, मुझे भूख नहीं है। जा न रतन, खड़ा क्यों है? गाड़ी चल देगी जो!”

रतन लज्जा के मारे मानो गड़ गया। “मुझसे बड़ी भूल हो गयी बाबू मुसलमान कुली से खाना छू गया है! कितना ही कहता हूँ- माँ, स्टेशन से कुछ खरीद लाने दो, किन्तु किसी तरह मानती ही नहीं।” इतना कहकर उसने मेरे मुँह पर अपनी कातर-दृष्टि डाली जैसे मेरी ही अनुमति चाह रहा हो।

किन्तु मैं कुछ कहूँ, इसके पहले ही राजलक्ष्मी ने उसे धमकाकर कहा, तूँ जायेगा नहीं, खड़ा-खड़ा तर्क करेगा?”

रतन फिर कुछ न बोला और भोजन के बर्तन हाथ में लेकर बाहर चला गया। ट्रेन के चलते ही राजलक्ष्मी मेरे सिरहाने आ बैठी और सिर के बालों में धीरे-धीरे अंगुलियाँ चलाते-चलाते बोली, “अच्छा देखो...”

बीच में ही टोककर बोला, “देखूँगा फिर कभी। किन्तु...”

उसने भी मुझे उसी घड़ी टोककर कहा, “तुम्हें 'किन्तु' से शुरू करके लेक्चर न देना होगा, मैं सब समझ गयी। मैं मुसलमान से घृणा नहीं करती; उसके छू लेने से भोजन नष्ट हो जाता है, सो भी नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो तुम्हें अपने हाथों से वह भोजन न परोसती।”

“किन्तु, तुमने खुद क्यों नहीं खाया?”

“स्त्रियों को नहीं खाना चाहिए।”

“क्यों?”

“क्यों और क्या? स्त्रियों को खाने की मनाई है।”

“और पुरुषों के लिए मनाई नहीं है?”

राजलक्ष्मी ने मेरा सिर हिलाकर कहा- नहीं, मर्दों के लिए ये बँधे हुए आईन-कानून किसलिए? वे जो इच्छा हो खावें, जो इच्छा हो पहिनें, जैसे भी हो सुख से रहें- हम लोग आचार का पालन करती जावें, बस यही बहुत है। हम तो सैकड़ों कष्ट सह सकती हैं, किन्तु क्या तुम लोग सह सकते हो? यही देखो न शाम होते न होते ही भूल के मोर ऑंखों के आगे अंधेरा देखने लगे थे!”

मैंने कहा, “हो सकता है, किन्तु, हम कष्ट नहीं सहन कर सकते, इसमें हम लोगों के लिए भी तो कोई गौरव की बात नहीं है।”

राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा- “नहीं, इसमें तुम्हारा जरा भी अगौरव नहीं है। तुम लोग हम लोगों की तरह दासी की जाति नहीं हो जो कष्ट सहन करके जाओ। लज्जा की बात तो हमारे लिए है, यदि हम कष्ट न सहन कर सकें।”

मैंने कहा, “यह न्याय-शास्त्र तुम्हें सिखाया किसने? काशी के गुरुजी ने?”

राजलक्ष्मी मेरे मुँह के अत्यन्त निकट झुककर क्षण-भर स्थिर हो रही, फिर मुस्कराकर बोली, “मुझे जो कुछ शिक्षा मिली है सब तुम्हारे ही समीप- तुमसे बढ़कर गुरु मेरा और कोई नहीं।”

मैंने कहा, “तब तो फिर, गुरु से तुमने ठीक उलटी बात सीख रक्खी है। मैंने किसी दिन नहीं कहा कि तुम लोग दासी की जाति हो। बल्कि, मैं तो यही बात चिरकाल से मानता हूँ कि तुम दासी नहीं हो। तुम किसी तरह भी हम लोगों की अपेक्षा तिल-भर छोटी नहीं हो।”

राजलक्ष्मी की ऑंखें छलछला आईं, बोली, “सो मैं जानती हूँ। और जानती हूँ इसीलिए तो यह बात तुम्हारे समीप सीख पाई हूँ। तुम्हारी तरह यदि सभी पुरुष यही बात सोच सकते, तो फिर पृथ्वी-भर की समस्त स्त्रियों के मुँह से यही बात सुन पड़ती। कान बड़ा है और कान छोटा, यह समस्या ही कभी न उठती।”

“अर्थात्, यह सत्य बिना किसी विचार के सभी मान लेते?”

राजलक्ष्मी बोली, “हाँ।”

तब मैंने हँसकर कहा, “सौभाग्य से पृथ्वी-भर की स्त्रियाँ, तुम्हारे साथ सहमत नहीं हैं, यही खैरियत है। किन्तु, अपनी जाति को इतना हीन समझते तुम्हें लाज नहीं आती?”

मेरे उपहास पर राजलक्ष्मी ने ध्याकन दिया या नहीं, इसमें सन्देह है। यह बहुत ही सहज भाव से बोली, “किन्तु, इसमें तो हीनता की कोई बात नहीं है।”

मैंने कहा, “सो ठीक है, हम लोग मालिक हैं और तुम दासी, यह संस्कार इस देश की स्त्रियों के मन में इस तरह बद्धमूल हो गया है कि इसकी हीनता भी तुम्हारी नजर में नहीं आती। जान पड़ता है कि इसी पाप से पृथ्वी के सारे देशों की स्त्रियों की अपेक्षा तुम सचमुच ही आज छोटी हो गयी हो।”

राजलक्ष्मी एकाएक सख्त होकर बैठ गयी और दोनों नेत्रों को प्रदीप्त करके बोली, “नहीं, इस कारण नहीं। तुम्हारे देश की स्त्रियाँ अपने आपको छोटा समझने के कारण छोटी नहीं हो गयीं। सच यह है कि तुम्हीं लोगों ने उन्हें छोटा समझकर छोटा बना दिया है, और तुम खुद भी छोटे हो गये हो।”

यह बात मुझे अकस्मात् कुछ नयी-सी मालूम हुई। इसमें जो कुछ गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह धीरे-धीरे सुस्पष्ट-सा होने लगा। सचमुच ही इसमें बहुत-सा सत्य छिपा हुआ है जो अब तक मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुआ था।

राजलक्ष्मी बोली, “तुमने तो उस भद्र पुरुष के सम्बन्ध में मजाक किया था किन्तु उसकी बात सुनकर मेरी ऑंखें कितनी खुल गयी हैं, सो तुम नहीं जानते।”

'नहीं जानता', यह स्वीकार करते ही वह कहने लगी, “नहीं जानते इसके कारण हैं। किसी भी वस्तु को जानने के लिए जब तक मनुष्य के हृदय के भीतर एक तरह की व्याकुलता नहीं उठती तब तक सब कुछ उसकी नजर में धुँधला ही बना रहता है। इतने दिन तुम्हारे मुँह से सुनकर सोचा करती थी कि सचमुच कि सचमुच ही यदि हमारे देश के लोगों का दु:ख इतना अधिक है, सचमुच ही यदि हमारा समाज इतना अधिक अन्धा है, तो उसमें मनुष्य जीता ही क्योंकर है, और उसको मानकर ही क्यों चलता है?”

मैं चुपचाप सुन रहा हूँ, यह देखकर वह आहिस्ते-आहिस्ते कहने लगी, “और तुम भी क्या समझोगे? कभी इन लोगों के बीच रहे नहीं, कभी इन लोगों के सुख-दु:ख भोगे नहीं; इसीलिए बाहर ही बाहर बाहर के समाज के साथ तुलना करके समझते हो कि इन लोगों के कष्टों की शायद कोई सीमा ही नहीं। धनी जमींदार पुलाव खाया करता है। वह अपनी किसी दरिद्र प्रजा को बासी भात खाते देखकर सोचता है कि 'इसके दु:ख की कोई सीमा नहीं है'- जिस तरह वह भूलता है उसी तरह तुम भूलते हो।”

मैंने कहा, “तुम्हारा तर्क यद्यपि न्याय-शास्त्र के नियमानुसार नहीं चल रहा है, फिर भी पूछता हूँ कि तुमने कैसे जाना कि मुझे देश के सम्बन्ध में इससे अधिक ज्ञान नहीं है?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “हो ही कैसे सकता है? दुनिया में तुम्हारे जैसा स्वार्थी कोई भी है क्या? जो केवल अपने ही आराम के लिए भागता फिरता है, वह घर की खबर जानेगा ही कहाँ से? तुम जैसे लोग ही तो समाज की अधिक निन्दा करते फिरते हैं जो समाज से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखते, बल्कि उसकी ओर से सर्वथा उपेक्षित रहते हैं। तुम लोग न तो अच्छी तरह पराए समाज को जानते हो और न अच्छी तरह अपने ही समाज को।”

मैंने कहा, “इसके बाद?”

राजलक्ष्मी बोली, “इसके बाद बाहर रहकर बाहरी सामाजिक व्यवस्था देखकर तुम लोग सोच में मरे जाते हो कि हमारी स्त्रियाँ मकान में कैद रहकर दिन-रात काम किया करती हैं, इसलिए उनके समान दु:खी, उनके समान पीड़ित, उनके समान हीन, शायद और किसी देश की स्त्रियाँ नहीं हैं। किन्तु कुछ दिन हमारी चिन्ता छोड़कर केवल अपनी ही चिन्ता कर देखो, अपने को कुछ ऊँचा उठाने की चेष्टा करो!- यदि कहीं कुछ सचमुच का दोष होगा तो वह केवल उसी समय नजर आयेगा- उससे पहले नहीं।”

“इसके बाद?”

राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध होकर कहा, “तुम मुझसे मजाक कर रहे हो, यह मैं जानती हूँ। किन्तु, मैं मजाक की बात नहीं कर रही हूँ। घर की मालकिन सब लोगों से खराब खाती-पीती है, कभी-कभी तो नौकरों की अपेक्षा भी। बहुधा उसे नौकरों से भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किन्तु, तुम इस दु:ख से व्याकुल होकर रोते हुए मत फिरो; हम लोगों को दासी के समान ही बनी रहने दो, दूसरे देशों जैसी रानी बना डालने की चेष्टा मत करो;- मैं यही बात तुमसे कहती हूँ।”

मैंने, कहा, यद्यपि तुम तर्क-शास्त्र के गाथे पर पैर देकर उसे डुबा देने की तजबीज कर रही हो, किन्तु, फिर भी यह स्वीकार करता हूँ कि शास्त्रानुसार तर्क करने का रास्ता मुझे भी नहीं मिल रहा है।”

उसने कहा, “इसमें तर्क करने- जैसा कुछ भी नहीं है।”

मैंने कहा, “हो भी, तो वह शक्ति मुझमें नहीं है-बड़ी नींद आ रही है। किन्तु, “तुम्हारी बात एक तरह से समझ रहा हूँ।”

राजलक्ष्मी जरा चुप रहकर बोली, “हमारे देश में चाहे जिस कारण हो, छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, सभी लोगों में रुपयों का लोभ बहुत ही बढ़ गया है। कोई भी थोड़े में सन्तुष्ट होना नहीं जानता, चाहता भी नहीं। इससे कितना अनिष्ट हुआ है, इसका पता मैंने पा लिया है।”

“बात सच है, किन्तु तुमने पता किस तरह पाया?”

राजलक्ष्मी बोली, “रुपयों के लोभ से ही तो मेरी यह दशा हुई है! किन्तु पूर्व काल में शायद इतना लोभ नहीं था।”

मैंने कहा, “इस इतिहास को मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।”

वह कहने लगी, “इतना कभी नहीं था। उस समय माता रुपये के लोभ से अपनी बेटी को कभी इस रास्ते पर नहीं ढकेलती, उस समय धर्म का डर था। आज तो मेरे पास रुपयों की कमी नहीं है किन्तु मेरे समान दु:खी भी क्या कोई है? रास्ते का भिखारी भी, मैं समझती हूँ, मुझसे बहुत अधिक सुखी है।”

उसका हाथ अपने हाथ में मैं रखकर पूछा, “तुम्हें सचमुच ही इतना कष्ट है!”

राजलक्ष्मी ने क्षण-भर मौन रहकर और एक बार ऑंचल से ऑंख-मुँह पोंछकर कहा, “मेरी बात मेरे अन्तर्यामी ही जानते हैं।”

इसके बाद दोनों ही गुमसुम हो रहे। गाड़ी की रफ्तार कम होकर वह एक छोटे स्टेशन पर आकर खड़ी हो गयी। कुछ देर बाद उसने फिर चलना शुरू किया। मैंने कहा, “क्या करने से तुम्हारा शेष जीवन सुख से कट सकता है, यह मुझे बतला सकती हो?”

राजलक्ष्मी बोली, “यह मैंने सोच रक्खा है मेरा सारा धन यदि किसी तरह चला जाय, कुछ न बच रहे-एकबारगी निराश्रय हो जाऊं, तो...”

अब फिर बिल्कु'ल गुमसुम हो रहे। उसकी बात इतनी स्पष्ट थी कि सभी समझ सकते हैं, मुझे भी मसझने में देर न लगी। कुछ देर चुप रहकर पूछा, “यह खयाल कब से आया तुम्हारे मन में?”

राजलक्ष्मी बोली, “जिस दिन अभया की बात सुनी उसी दिन से।”

“मैने कहा, “किन्तु, उन लोगों की जीवन-यात्रा तो बीच में ही खत्म हुई नहीं जाती। भविष्य में वे कितना दु:ख पा सकते हैं, सो तो तुम जानती नहीं।”

वह सिर हिलाकर बोली, “नहीं, जानती नहीं, यह सत्य है; किन्तु वे चाहे कितना ही दु:ख क्यों न पावें, मेरे समान दु:ख किसी दिन न पावेंगे, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकती हूँ।”

और भी कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारे लिए मैं अपना सर्वस्व त्याग कर सकता हूँ; किन्तु इज्जत का त्याग कैसे करूँ?”

राजलक्ष्मी बोली, “मैं क्या तुमसे कुछ त्यागने को कहती हूँ? इज्जत ही तो मनुष्य की असली चीज है। उसका यदि त्याग नहीं कर सकते तो त्याग की बात ही क्यों मुँह पर लाते हो? तुमसे तो मैंने कुछ भी त्याग करने के लिए नहीं कहा।”

मैंने कहा, “कहा नहीं, सो ठीक है; किन्तु, कर सकता हूँ। इज्जत जाने के बाद पुरुष का जीता रहना एक विडम्बना है। केवल इस इज्जत को छोड़कर तुम्हारे लिए मैं सभी कुछ विसर्जित कर सकता हूँ।”

राजलक्ष्मी ने सहसा हाथ खींच लिया और कहा, “मेरे लिए तुम्हें कुछ भी विसर्जित करना पड़ेगा। किन्तु तुम क्या यह समझते हो कि केवल तुम लोगों के ही इज्जत है, हम लोगों की कोई इज्जत नहीं? हम लोगों के लिए उसका त्याग देना क्या इतना अधिक सहज है? फिर भी, तुम लोगों के लिए ही सैकड़ों-हजारों स्त्रियों ने इसे धूल की तरह फेंक दिया है, यह अवश्य ही तुम नहीं जानते, पर मैं जानती हूँ।”

मेरे कुछ बोलने की चेष्टा करते ही उसने रोकर कहा, “रहने दो, अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। तुम्हें इतने दिन मैंने जो समझा था वह गलत था। तुम सो जाओ- अब इस सम्बन्ध में मैं भी कभी कोई ऐसी बात न कहूँगी, तुम भी न कहना।” इतना कहकर वह उठी और अपनी बेंच पर जा बैठी।

दूसरे दिन ठीक समय पर काशी आ पहुँचा और प्यारी के मकान में ही ठहरा। ऊपर के दो कमरों को छोड़कर करीब सारा का सारा मकान जुदा-जुदा उम्र की विधवा स्त्रियों से भरा हुआ था।

प्यारी बोली, “ये सब मेरी किराएदार हैं।” इतना कहकर वह मुँह फिराकर कुछ हँस दी।

मैंने कहा, “हँसी क्यों? शायद किराया अदा नहीं होता?”

प्यारी बोली, “नहीं, बल्कि कुछ न कुछ और देना पड़ता है।”

“इसके मानी?”

प्यारी इस दफे हँस पड़ी और बोली, “इसके मानी है, भविष्य की आशा पर मुझको ही इन्हें खाना-कपड़ा देकर जिलाए रखना है। जीती रहेंगी तभी तो बाद में देंगी, यह भी क्या नहीं समझ सकते?”

मैंने भी हँसकर कहा, “समझता नहीं तो! इस तरह भविष्य की आशा पर कितने लोगों को तुम्हें गुपचुप अन्न-वस्त्र जुटाना-पटाना पड़ता होगा- मैं केवल वही सोच रहा हूँ!”

इनके सिवाय मेरी दो-एक रिश्तेदार भी हैं।”

“सो भी है क्या? किन्तु, मालूम कैसे हुआ तुम्हें कि रिश्तेदार हैं?”

प्यारी जरा सूखी हँसी हँसकर बोली, “माँ के साथ आने पर इस काशी में ही तो मेरी 'मौत' हुई थी, शायद तुम्हें यह याद नहीं रहा। तब असमय में ही जिन्होंने मेरी 'सद्गति' की थी, उन लोगों का वह उपकार क्या प्राण रहते कभी भूला जा सकता है?”

मैं चुप हो रहा। प्यारी कहने लगी- “इन लोगों का वह शरीर बड़ा ही दयापूर्ण है। इसीलिए, पास रखकर इन पर जरा कड़ी नजर रखती हूँ, जिससे इन्हें और अधिक उपकार करने का सुयोग न मिले।”

उसके चेहरे की ओर निहारते ही एकाएक मेरे मुँह से बाहर निकल गया, “तुम्हारे हृदय के भीतर क्या है-बीच-बीच में उसे ही चीरकर देखने की इच्छा होती है राजलक्ष्मी!”

“मरने पर देखना। अच्छा, कमरे में जाकर सो जाओ। रसोई बन जाने पर उठा दूँगी।” इतना कहकर और हाथ के इशारे से कमरा दिखाकर वह जीने से नीचे उतर गयी।

मैं वहीं पर कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। यह नहीं कि आज मैंने उसके हृदय का कोई नया परिचय प्राप्त किया हो, किन्तु, मेरे खुद के हृदय में यह सामान्य कहानी एक नये चक्कर की सृष्टि कर गयी।

रात को प्यारी बोली, “तुम्हें फिजूल कष्ट देकर इतनी दूर ले आई। गुरुदेव तीर्थाटन करने निकल गये हैं, उनसे नहीं मिला सकी।”

मैंने कहा, “इसके लिए मैं जरा भी दु:खित नहीं हूँ। अब तो कलकत्ते लौट चलना होगा न?”

प्यारी ने गर्दन हिलाकर बताया, “हाँ।”

मैंने कहा, “क्या मेरा साथ चलना आवश्यक है? न हो तो मैं जरा और पश्चिम की ओर घूम आना चाहता हूँ।”

प्यारी ने कहा, “बंकू के ब्याह में तो अब भी कुछ देर है। चलो न, मैं भी प्रयाग चलकर स्नान कर आऊँ।”

मैं जरा मुश्किल में पड़ गया। मेरे दूर के रिश्ते के एक चचा वहाँ नौकरी करते हैं। सोचा था कि वहीं जाकर ठहरूँगा। सिवाय इसके और भी कई परिचित मित्र दोस्त वहाँ रहते हैं।

प्यारी ने निमेष-मात्र में मेरे मन का भाव ताड़कर कहा, “मैं साथ रहूँगी तो शायद कोई देख लेगा, यही न?'

अप्रतिभ होकर कहा, “वास्तव में कलंक चीज ही ऐसी है कि लोग झूठे कलंक का भी भय किये बगैर नहीं रह सकते।”

प्यारी ने जबर्दस्ती हँसते हुए कहा, “सो ठीक है। गत साल आरे में तो तुम्हें एक तरह से गोद में लिये ही लिये मेरे दिन-रात कटे हैं। सौभाग्य से उस दशा में किसी ने तुम्हें नहीं देखा। उस जगह शायद तुम्हारी जान-पहिचान का कोई बन्धु-बान्धव नहीं था।”

मैंने अतिशय लज्जित होकर कहा, “मुझे ताना मारना वृथा है। मनुष्यता के लिहाज से मैं तुम्हारी अपेक्षा बहुत हीन हूँ, इस बात को मैं अस्वीकार करता नहीं।”

प्यारी तीक्ष्ण स्वर से बोल उठी, “ताना! तुम्हें ताना मार सकूँगी, यही सोचकर शायद मैं वहाँ गयी थी, क्यों? देखो, मनुष्य के पीड़ा पहुँचाने की भी एक हद होती है- उसे मत लाँघ जाना।”

कुछ देर चुप रहकर फिर बोली, “ठीक, कलंक ही तो है! यदि मैं होती तो इस कलंक को सिर पर लेकर लोगों को बुलाकर दिखाती फिरती, पर ऐसी बात मुँह से बाहर न निकाल सकती।”

मैंने कहा, “तुमने मुझे प्राण-दान जरूर दिया है-किन्तु, मैं अत्यन्त छोटा आदमी हूँ राज्यलक्ष्मी, तुम्हारे साथ तुलना ही नहीं हो सकती।” राजलक्ष्मी दर्पयुक्त स्वर में बोली, “प्राण-दान यदि दिया है तो अपनी ही गरज से दिया है, तुम्हारी गरज से नहीं। उसके लिए तुम्हें रत्ती-भर भी अहसान मानने की जरूरत नहीं। किन्तु मैं तुम्हें छोटा-छोटी तबीयत का आदमी नहीं खयाल कर सकती। ऐसा होता तो आफत कटती, गले में फाँसी लगाकर सारी ज्वाला को जुड़ा सकती।” इतना कहकर वह मेरे जवाब की राह देखे बगैर ही कमरे से बाहर चली गयी।

दूसरे दिन सुबह राजलक्ष्मी चाय देकर चुपचाप चली जा रही थी कि मैंने बुलाकर कहा, “बात-चीत बन्द है क्या?”

वह पलटकर खड़ी हो गयी, बोली, “नहीं तो, कुछ कहोगे?”

मैंने कहा, “चलो, एक दफे प्रयाग घूम आवें?”

“ठीक तो है, जाइए।”

“तुम भी चलो।”

“अनुग्रह करते हो क्या?”

“नहीं चाहतीं?”

“नहीं। जरूरत होगी तब माँग लूँगी, इस समय नहीं।” इतना कहकर वह अपने काम से चली गयी।

मेरे मुँह से केवल एक लम्बी साँस बाहर निकल गयी, किन्तु कोई बात नहीं निकली।

दोपहर को भोजन के समय मैंने हँसकर कहा, “अच्छा लक्ष्मी, मुझसे बोलना बन्द करके क्या तुमसे रहा जायेगा जो इस असाध्यह-साधन की कोशिश कर रही हो?”

राजलक्ष्मी ने शान्त-गम्भीर मुद्रा से कहा- “सामने होने पर किसी से नहीं रहा जाता- मुझसे भी नहीं रहा जायेगा। इसके सिवाय, यह मेरी इच्छा भी नहीं है।”

“तब फिर इच्छा क्या है?”

राजलक्ष्मी बोली, “मैं कल से ही सोच रही हूँ कि इस खींच-तान को बन्द किये वगैर नहीं चल सकता। तुमने भी एक तरह से साफ-साफ जता दिया है और मैं भी एक तरह से खूब जान गयी हूँ। गलती मेरी ही हुई, यह मैं स्वीकार करती हूँ, किन्तु...”

उसे सहसा रुकते देख मैंने पूछा, “किन्तु, क्या?”

राजलक्ष्मी बोली, “किन्तु, कुछ भी नहीं। यह जो एक निर्लज्ज वाचाल की तरह याचना करती तुम्हारे पीछे-पीछे घूमती फिरती हूँ,” इतना कहकर उसने एकाएक अपना मुँह मानो घृणा से सिकोड़ लिया और कहा, “लड़का ही क्या सोचता होगा, नौकर-चाकर ही मन ही मन क्या कहते होंगे! राम, राम, मानो मैंने इसे एक हँसी का व्यापार बना डाला है।”

कुछ देर ठहर कर फिर कहने लगी, “बुढ़ापे में यह क्या मुझे सोहता है? तुम इलाहाबाद जाना चाहते थे, जाओ। फिर भी यदि हो सके तो बर्मा रवाना होने के पहिले एक दफे भेंट कर जाना।” इतना कहकर वह चली गयी।

साथ ही साथ मेरी भूख भी गायब हो गयी। उसका मुँह देखकर आज मुझे पहले ही पहल ज्ञात हुआ कि यह सब मान-मनौवल का मामला नहीं है, सचमुच ही उसने कुछ न कुछ सोचकर स्थिर कर लिया है।

संध्याष के समय आज एक हिन्दुस्तानी दासी जल-पान आदि सामग्री लेकर आई तो उससे कुछ अचरज के साथ प्यारी का हाल पूछा। जवाब सुनकर मैंने और भी अचरज के साथ जाना कि प्यारी मकान में नहीं है, वह साज-सिंगार करके फिटन पर कहीं गयी है। फिटन कहाँ से आई, उसे साज-सिंगार करके कहाँ जाने की जरूरत पड़ गयी- सो कुछ भी न समझा। तब स्वयं उसी के मुँह की वह बात याद आ गयी कि वह काशी में ही एक दिन 'मरी' थी।

यह सच है कि कुछ भी समझ में न आया, फिर भी, इस खबर से सारा मन बेस्वाद हो गया।

शाम हुई, घर-घर में दीए जले, किन्तु राजलक्ष्मी नहीं लौटी।

चादर कन्धों पर डालकर जरा घूम आने के लिए बाहर निकल पड़ा। रास्ते-रास्ते चक्कर काटता, बहुत देखता-सुनता, रात के दस बजे के बाद मकान पर लौटा, तो सुना कि प्यारी तब भी लौटकर नहीं आई है। मामला क्या है? कुछ डर-सा मालूम होने लगा। सोच ही रहा था कि रतन को बुलाकर सारा संकोच दूर करके इस सम्बन्ध का पता लगाऊँ या नहीं कि एक भारी जोड़ी के घोड़ों की टापों का शब्द सुनाई दिया। खिड़की में से झाँका तो देखता हूँ एक बड़ी भारी फिटन मकान के सामने आकर खड़ी है।

प्यारी उतरकर आई। ज्योत्स्ना के आलोक में उसके सर्वांग के जेवर झलमला उठे। जो दो भले आदमी फिटन में बैठे थे वे धीमे स्वर से जान पड़ा, प्यारी को सम्बोधन कर कुछ कह रहे हैं जिसे मैं सुन न सका। वे बंगाली हैं या बिहारी, सो भी न जान सका। चाबुक खाकर घोड़े पलक मारते न मारते ऑंखों के ओझल हो गये।
♦♦ • ♦♦

राजलक्ष्मी ने मेरी खबर लेने के लिए उसी साज-सिंगार के साथ मेरे कमरे में प्रवेश किया।

मैं उछलकर और उसकी ओर दाहिना हाथ पसारकर थिएटरी गले से बोला, “अरी पाखण्डिनी रोहिणी1! तू गोविन्द2 लाल को नहीं पहचानती? अहा! आज यदि मेरे पास एक पिस्तौल होती, या एक तलवार ही होती!”

राजलक्ष्मी ने सूखे कण्ठ-स्वर से कहा, “तो क्या करते?- खून?”

हँसकर बोला, “नहीं प्यारी, मुझे इतना बड़ा नवाबी शौक नहीं है। इसके सिवाय इस बीसवीं शताब्दि में ऐसा निष्ठुर राक्षस धाम कौन है जो संसार की इतनी

बड़ी आनन्द की खान को पत्थर से मूँद दे? बल्कि, आर्शीवाद देता हूँ कि हे बाई-कुल-शिरोमणि! तुम दीर्घजीवी होओ- तुम्हारा सुन्दर रूप त्रिलोक विजयी हो, तुम्हारा कण्ठ-स्वर वीणा-विनिन्दित हो, तुम्हारे इन दोनों चरण कमलों नृत्य उर्वशी-तिलोत्तमा का गर्व खर्व कर दे, और मैं दूर से तुम्हारा जय-गान करके धन्य होऊँ!”

प्यारी बोली, “इन सब बातों का अर्थ?”

मैंने कहा, “अर्थमनर्थम्-! उसे जाने दो। मैं इसी एक बजे की गाड़ी से बिदा होता हूँ। अभी तो प्रयाग जाता हूँ, इसके बाद जाऊँगा बंगालियों के परमतीर्थ चाकरिस्तान- अर्थात् बर्मा को। यदि समय और सुयोग होगा, तो मिलकर जाऊँगा।”

“मैं कहाँ गयी थी, यह सुनना भी आवश्यक नहीं समझते?”

“नहीं, बिल्कुतल नहीं।”

“यह बहाना पाकर क्या तुम एकदम चले जा रहे हो?”

मैंने कहा, “इस पापी मुँह से अब भी कुछ नहीं कह सकता। इस गोरख-धन्धे से यदि पार हो सकूँ तो...”

प्यारी कुछ देर चुपचाप खड़ी रही और बोली, “तुम क्या मुझ पर जो जी चाहे वही अत्याचार कर सकते हो?”

मैं बोला, “जो जी चाहे? बिल्कुनल नहीं। बल्कि, जान-अनजान में यदि बिन्दुमात्र अत्याचार किया हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”

“इसके माने, आज रात को ही तुम चले जाओगे?”

“हाँ।”

“मुझे बिना अपराध दण्ड देने का तुम्हें अधिकार है?”

1-2. बंकिमबाबू के 'विषवृक्ष' नामक उपन्यास के दो पात्र।

“नहीं, तिल-भर भी नहीं। किन्तु, यदि मेरे जाने को ही तुम 'दण्ड देना' समझती हो, तो वह अधिकार मुझे जरूर है।”

प्यारी ने हठात् कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मुँह की ओर कुछ क्षण चुपचाप देखते रहकर कहा, “मैं कहाँ गयी थी, क्यों गयी थी- नहीं सुनोगे?”

“नहीं, मेरी सम्मति लेकर तो तुम वहाँ गयी नहीं थी, जो लौट आकर उसका हाल सुनाओगी। सिवाय इसके; उसके लिए मेरे पास न समय है और न इच्छा।”

प्यारी चोट खाई हुई सर्पिणी की तरह एकाएक फुंकार उठी, “मेरी भी सुनाने की इच्छा नहीं है। मैं किसी की खरीदी हुई बाँदी नहीं हूँ जो कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ, इसकी अनुमति लेती फिरूँ! जाते हो, जाओ!” यों कहकर रूप और अलंकारों की एक हिलोर-सी उठाकर वह तेजी के साथ कमरे से बाहर हो गयी।

आदमी गाड़ी बुलाने गया। कोई घण्टे-भर बाद सदर दरवाजे पर एक गाड़ी के खड़े होने का शब्द सुनकर बैग हाथ में लेकर जा ही रहा था कि प्यारी आकर पीछे खड़ी हो गयी। बोली, “इसे क्या तुम बच्चों का खिलवाड़ समझते हो? मुझे अकेली छोड़कर चले जाओगे, तो नौकर-चाकर क्या सोचेंगे? तुम क्या इन लोगों के सामने भी मुझे मुँह दिखाने योग्य न रक्खोगे?”

पलटकर खड़े होकर कहा, “अपने नौकरों के साथ तुम निपटती रहना- मेरा उससे कोई ताल्लुक नहीं।”

“वह न हो न सही, किन्तु लौटकर मैं बंकू को ही क्या जवाब दूँगी?”

“यही जवाब दे देना कि वे पश्चिम को घूमने चले गये हैं।”,

“इस पर क्या कोई विश्वास करेगा?

“जिस पर विश्वास किया जा सके ऐसी ही कोई बात बनाकर कह देना।”

प्यारी क्षण-भर मौन रहकर बोली, “यदि कुछ अन्याय ही कर बैठी हूँ तो क्या वह माफ नहीं हो सकता? तुम क्षमा न करोगे तो और कौन करेगा?”

“मैं बोला, “प्यारी, यह तो एक बाँदी-दासी सरीखी बात हुई। तुम्हारे मुँह से तो नहीं सोहती।”

इस ताने का प्यारी सहसा कोई उत्तर न दे सकी। उसका मुँह लाल हो गया, वह चुपचाप खड़ी रही। यह साफ मालूम हो गया कि वह प्राणपण से अपने आपको सँम्हाालने की चेष्टा कर रही है। बाहर से गाड़ीवान ने चिल्लाकर देर का कारण पूछा। मेरे चुपचाप बैग हाथ में लेते ही प्यारी धप से पैरों के समीप बैठ गयी और रुद्ध स्वर में बोल उठी, “मैं सचमुच का अपराध कभी कर ही नहीं सकती, यह जानते हुए भी यदि तुम दण्ड देना चाहते हो तो अपने हाथ से दो, किन्तु, घर-भर के लोगों के समीप मेरा सिर नीचा मत करो। यदि आज तुम इस तरह चले जाओगे तो मैं अब किसी के समीप कभी अपना मुँह ऊँचा करके खड़ी न हो सकूँगी।”

हाथ का बैग नीचे रखकर एक चौकी पर बैठ गया और बोला- “अच्छा आज तुम्हारे-हमारे बीच अन्तिम फैसला हो जाय। तुम्हारा आज का आचरण मैंने माफ कर दिया। किन्तु, मैंने बहुत विचार करके देखा है कि हम दोनों का मिलना-जुलना अब नहीं को सकेगा।”

प्यारी ने अपना अत्यन्त उत्कण्ठित मुँह मेरे मुँह की ओर उठाकर डरते हुए पूछा, “क्यों?”

मैं बोला, “अप्रिय सत्य सह सकोगी?”

प्यारी गर्दन हिलाकर अस्फुट स्वर में कहा, “हाँ, सह सकूँगी।”

किन्तु, किसी आदमी के व्यथा सहने को तैयार हो जाने से ही कुछ व्यथा देने का कार्य सहज नहीं हो जाता। मुझे बहुत देर तक चुपचाप बैठकर सोचना पड़ा। फिर भी मैंने स्थिर कर लिया कि आज किसी तरह भी अपना इरादा नहीं बदलूँगा और इसीलिए अन्त में मैंने धीरे से कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारा आज का व्यवहार माफ करना कितना ही कठिन क्यों न हो, मैंने माफ कर दिया। किन्तु, तुम स्वयं इस लोभ को किसी तरह नहीं छोड़ सकोगी। तुम्हारे पास बहुत धन-दौलत है- बहुत-सा रूप-गुण है। बहुतों पर तुम्हारा असीम प्रभुत्व भी है। संसार में इससे बढ़कर लोभ की वस्तु और कोई नहीं है। तुम मुझे प्यार कर सकती हो, किन्तु इस मोह को किसी तरह भी नहीं काट सकोगी।”

राजलक्ष्मी ने मृदु कण्ठ से कहा, “अर्थात् इस तरह का काम मैं बीच-बीच में करूँगी ही?”

जवाब में मैं केवल मौन हो रहा। वह खुद भी कुछ देर चुप रहकर बोली, “उसके बाद?”

“उसके बाद एक दिन ताश के मकान की तरह सब गिर पड़ेगा। उस दिन की उस हीनता से तो यही भला है कि आज मुझे हमेशा के लिए रिहाई दे दो-तुम्हारे समीप मेरी यही प्रार्थना है।”

प्यारी बहुत देर तक मुँह नीचा किये चुपचाप बैठी रही। इसके बाद जब उसने मुँह उठाया तब देखा, उसकी ऑंखों से पानी गिर रहा है। उसे ऑंचल से पोंछकर पूछा, “क्या मैंने कभी तुम्हें कोई छोटा काम करने के लिए प्रवृत्त किया है?”

इस गिरती हुई अश्रु-धारा ने मेरे संयम की भीत पर चोट पहुँचाई; किन्तु, बाहर से मैंने उसे किसी तरह प्रकट नहीं होने दिया। शान्त दृढ़ता के साथ कहा, “नहीं, किसी दिन नहीं। तुम स्वयं छोटी नहीं हो। छोटा काम तुम स्वयं कभी कर नहीं सकती और दूसरों को भी नहीं करने दे सकतीं।”

फिर कुछ ठहरकर कहा, “किन्तु दुनिया तो मनसा पण्डित की पाठशाला की उस राजलक्ष्मी को पहिचानेगी नहीं। वह तो पहिचानेगी सिर्फ पटना की प्रसिद्ध प्यारी बाई को। तब दुनिया की नजरों में कितना छोटा हो जाऊँगा, सो तुम क्या नहीं देख सकती? बतलाओ, तुम उसे किस तरह रोकोगी?”

राजलक्ष्मी ने एक लम्बी साँस छोड़कर कहा, “किन्तु, उसे तो सचमुच में छोटा होना नहीं कहते?”

मैंने कहा, “भगवान की नजर में न हो, किन्तु, संसार की ऑंखें भी तो उपेक्षा करने की चीज नहीं है लक्ष्मी।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “किन्तु, उन्हीं की नजर को ही तो सबसे पहले मानना उचित है।”

मैंने कहा, एक तरह से यह बात सच है। किन्तु, उनकी नजर तो हमेशा दीख नहीं पड़ती और फिर जो दृष्टि संसार में दस आदमियों के भीतर से प्रकाश पाती है, वह भी भगवान की ही दृष्टि है राजलक्ष्मी, इसे भी अस्वीकार करना अन्याय है।”

“इसी डर से तुम मुझे जन्म-भर के लिए छोड़कर चले जाओगे?”

मैं बोला, “फिर मिलूँगा। तुम कहीं भी क्यों न होओ, बर्मा जाने के पहले मैं एक दफे और भी तुमसे मिल जाऊँगा।”

राजलक्ष्मी तेजी के साथ सिर हिलाकर रूँआसे स्वर से कह उठी, “जाते हो तो जाओ। किन्तु तुम मुझे चाहे जैसा क्यों न समझो, मुझसे बढ़कर अपना तुम्हारा और कोई नहीं। पर उसी से मुझको त्याग कर जाना दस आदमियों की निगाह में धर्म है, यह बात मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगी।” इतना कहकर वह तेजी से कमरा छोड़कर चली गयी।

घड़ी निकालकर देखा, अब भी समय है, अब भी शायद एक बजे की गाड़ी मिल जाय। चुपचाप बैग उठाकर धीरे से उतरकर मैं गाड़ी में जा बैठा।

इनाम के लोभ से गाड़ीवान ने प्राणपण से दौड़कर स्टेशन पहुँचा दिय। किन्तु उसी क्षण पश्चिम की ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया। पूछने से मालूम हुआ कि आधा घण्टे बाद ही एक ट्रेन कलकत्ते की ओर जायेगी। सोचा, चलो, यही अच्छा है; गाँव का मुँह बहुत दिन से नहीं देखा- उस जंगल में ही जाकर बाकी के कुछ दिन काट दूँ।

इसलिए, पश्चिम के बदले पूर्व का टिकट खरीद कर आधा घण्टे के बाद एक विपरीत-गामिनी भाफ की गाड़ी में बैठकर काशी से चल दिया।
♦♦ • ♦♦

बहुत दिनों बाद फिर एक दिन शाम को गाँव में आकर प्रवेश किया। मेरा मकान उस समय सगे-सम्बन्धी रिश्तेदारों तथा उनके भी रिश्तेदारों से भरा हुआ था। बड़े मजे से सारे घर को घेरकर उन्होंने अपनी घर-गिरस्ती फैला रक्खी थी, कहीं सुई रखने के लिए भी जगह नहीं थी।

मेरे एकाएक आ पहुँचने और वहाँ रहने के इरादे को सुनकर आनन्द के मारे उनका चेहरा स्याह हो गया। वे कहने लगे, “आहा, यह तो बड़े आनन्द की बात है। इस बार ब्याह करके संसारी बन जाओ श्रीकान्त, हम लोग देखकर अपनी ऑंखें ठण्डी करें।”

मैंने कहा, “इसीलिए तो आया हूँ। इस समय कम से कम मेरी माँ का कमरा खाली कर दो, मैं अपने हाथ-पाँव फैलाकर जरा लेट रहूँ।”

मेरे पिता की ममेरी बहिन अपने पति-पुत्र के साथ कुछ दिन से रह रही थी। वे आकर बोलीं, “ठीक तो कहते हो!”

मैंने कहा, “अच्छा, न हो तो मैं बाहर के कमरे में पड़ रहूँगा।”

जाकर देखा, कोने में सुर्खी, और एक कोने में चूने का ढेर लगा हुआ है। उसके भी 'मालिक' बोले, “ठीक तो है। देखता हूँ कि वे सब चीजें तो जरा देख-सुनकर हटानी पड़ेंगी। पर कमरा तो छोटा नहीं है, तब तक न हो तो इस किनारे एक तख्त-पोश बिछाकर- क्या कहते हो श्रीकान्त?”

मैंने कहा, “अच्छा रात-भर के लिए न हो तो यही सही।”

वास्तव में मैं इतना थक गया था कि मालूम होता था जहाँ भी हो जरा-सी सोने को जगह भर मिल जाय तो जान में जान आ जाय। बर्मा की उस बीमारी के बाद से अब तक शरीर पूरी तौर से स्वस्थ और सबल न हो पाया था। भीतर ही भीतर एक तरह का अवसाद प्राय: भी अनुभव होता था। इसी से शाम के बाद जब माथा दुखने लगा तब विशेष अचरज नहीं हुआ।

नयी बनी हुई बहिन ने आकर कहा- “अरे यह तो जरा गर्मी-सी चढ़ गयी है भात खाकर सोने से ही चली जायेगी।”

तथास्तु। वही हुआ। गुरुजन की आज्ञा शिरोधार्य करके गर्मी दूर करने के लिए भात खाकर शय्या ग्रहण कर ली। पर सुबह नींद टूटी खूब अच्छी तरह बुखार लिये हुए!

दीदी ने शरीर पर हाथ रखकर कहा, “कुछ नहीं, यह तो मलेरिया है, इसमें भोजन किया जाता है।”

किन्तु अब हाँ में हाँ न मिला सका। बोला, “नहीं जीजी, मैं अब तक तुम्हारे मलेरिया-राज की प्रजा नहीं बना हूँ। उनकी दुहाई देकर अत्याचार किया जाना शायद मैं सहन नहीं कर सकूँ। आज मेरी लंघन है।”

सारी रात गुजरी, दूसरा दिन गुजरा, उसके बाद का दिन भी कट गया, किन्तु बुखार ने पीछा नहीं छोड़ा। बल्कि, उसे अधिकाधिक चढ़ते देख मन ही मन व्याकुल हो उठा। गोविन्द डॉक्टर इस बेला उस बेला देखने आने लगे। नाड़ी, पकड़कर, जीभ देखकर, पेट ठोककर 'सुस्वादु' ओषधियों की योजना कर केवल 'लागत के दाम' भर लेने लगे, किन्तु एक-एक दिन करके सारा सप्ताह इसी तरह गुजर गया। मेरे पिता के मामा, मेरे बाबा आकर बोले, “इसीलिए तो भइया, मैं कहता हूँ कि वहाँ खबर पठा दो, तुम्हारी फुआ को आ जाने दो। बुखार तो जैसे...”

बात पूरी न होने पर भी मैं समझ गया कि बाबा कुछ मुश्किल में पड़ गये हैं। इस तरह और भी चार-पाँच दिन बीत गये, किन्तु, बुखार में कोई फर्क नहीं हुआ। उस दिन सुबह गोविन्द डॉक्टर ने आकर यथारीति दवाई देकर तीन दिन के बाकी 'लागत के दाम' माँगे। शय्या में पड़े-पड़े किसी तरह हाथ बढ़ाकर अपना बैग खोला- देखा तो मनी-बैग गायब है! अतिशय शंकित होकर मैं उठ बैठा। बैग को औंधा करके हर एक चीज अलग-अलग करके खोज की; किन्तु जो नहीं था सो नहीं मिला।

गोविन्द डॉक्टर मामला समझकर चिन्तित होकर बार-बार सवाल करने लगे, “कुछ चला गया है क्या?”

मैंने कहा, “नहीं, कुछ भी तो नहीं गया।”

किन्तु उनकी दवा का मूल्य जब मैं न दे सका तब वे समझ गये। स्तम्भित की तरह कुछ देर खड़े रहकर उन्होंने पूछा, “थे कितने?”

“कुछ थोड़े-से।”

“चाबी को जरा सावधानी से रखना चाहिए भइया। खैर, तुम पराए नहीं हो, रुपये की चिन्ता मत करना। अच्छे हो जाओ, उसके बाद जब सुभीता हो भेज देना। इलाज में कोई कसर न होगी।” इतना कहकर डॉक्टर साहब गैर होकर भी परम आत्मीय से भी अधिक सान्त्वना देकर चले गये। उनसे कह दिया कि “यह बात कोई सुन न पावे।”

डॉक्टर साहब बोले, “अच्छा, अच्छा, देखा जायेगा।”

देहात में विश्वास पर रुपये उधर देने की चाल नहीं है। रुपया ही क्यों, एक चवन्नी भी खाली हाथ उधार माँगने पर लोग समझते हैं कि यह आदमी खालिस दिल्लगी कर रहा है। क्योंकि, इस बात की देहात के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि संसार में इतना नासमझ भी कोई है जो खाली हाथ उधार चाहता है, अतएव, मैंने यह कोशिश भी नहीं की। पहले से ही स्थिर कर लिया था कि इसकी सूचना राजलक्ष्मी को नहीं दूँगा। जरा स्वस्थ हो जाऊँ तब जो हो सकेगा करूँगा। मन में सम्भवत: यह संकल्प था कि अभया को पत्र लिखकर रुपये मँगाऊँगा। किन्तु, इसके लिए समय नहीं मिला। सहसा सेवा-शुश्रूषा का सुर भी 'तारा' से 'उदारा' में उतर पड़ते ही समझ गया कि मेरी विपत्ति की बात मकान के भीतर छिपी नहीं रही है।

परिस्थिति को संक्षेप में जताकर राजलक्ष्मी को एक चिट्ठी लिखी अवश्य, किन्तु उसमें मैं अपने आपको इतना हीन, अपमानित, महसूस करने लगा कि किसी तरह भी उसे न भेज सका- फाड़कर फेंक दिया। दूसरा दिन इसी तरह कट गया। किन्तु, इसके बाद के दिन ने किसी तरह भी कटना न चाहा। उस दिन किसी ओर से कोई रास्ता न देख पाकर अन्त में एक तरह से जान पर खेलकर ही कुछ रुपयों के लिए राजलक्ष्मी को पत्र लिखकर पटना और कलकत्ते के ठिकाने पर भेज दिए।

वह रुपये भेजेगी, इसमें जरा भी सन्देह नहीं था, फिर भी, उस दिन सुबह से ही मानो एक प्रकार के उत्कण्ठित संशय से पोस्टमैन की आशा में सामने की खुली खिड़की में से रास्ते के ऊपर अपनी दृष्टि बिछाए हुए उन्मुख पड़ा रहा।

समय निकल गया। आज अब उसकी आशा नहीं है। ऐसा सोचकर करवट बदलने की तैयारी कर रहा था कि उस समय दूर पर एक गाड़ी के शब्द से चकित होकर तकिये पर भार देकर उठ बैठा। गाड़ी आकर ठीक सामने ही खड़ी हो गयी। देखता हूँ, कोचवान के बगल में रतन बैठा है। उसके नीचे उतरकर गाड़ी का दरवाजा खोलते ही जो दिखाई दिया उस पर सत्य मानकर विश्वास करना कठिन हो गया।

प्रकट रूप से दिन के समय इस गाँव के रास्ते पर राजलक्ष्मी आकर खड़ी हो सकती है, यह मेरी कल्पना के भी परे की बात थी।

रतन बोला- “ये हैं बाबूजी।”

राजलक्ष्मी ने केवल एक बार मेरे मुँह की ओर देखा। गाड़ीवान बोला- “माँ, देर लगेगी? घोड़ा खोल दूँ?”

“जरा ठहरो।” कहकर उसने अविचिलित धीर पद रखते हुए मेरे कमरे में प्रवेश किया। प्रणाम करके, पैरों की धूलि मस्तक पर लगाकर और हाथ से मस्तक और छाती का उत्ताप देखकर कहा, “इस समय तो अब बुखार नहीं है। उस जून सात बजे की गाड़ी से जाना हो सकेगा? घोड़े छोड़ देने को कह दूँ?”

मैं अभिभूत की तरह उसके मुँह की ओर निहार रहा था। बोला, “दो दिन से बुखार आना तो बन्द है, क्या मुझे आज ही ले चलना चाहती हो?”

राजलक्ष्मी बोली, “न हो तो आज रहने दो। रात में चलने की जरूरत नहीं, सर्दी लग सकती है, कल सुबह ही चलेंगे।”

इतनी देर में जैसे मैं होश में आ गया। बोला, “इस गाँव में इस मुहल्ले के बीच तुम आई किस साहस से? तुम क्या सोचती हो कि यहाँ तुम्हें कोई भी न पहिचान सकेगा?”

राजलक्ष्मी ने सहज में ही कहा, “भले ही पहिचान लें। यहीं तो पैदा हुई और बड़ी हुई और यहीं पर लोग मुझे पहिचान न सकेंगे? जो देखेगा वही पहिचान लेगा।”

“तब?”

“क्या करूँ बताओ? मेरा भाग्य! नहीं तो तुम यहाँ आकर बीमार ही क्यों पड़ते?”

“आई क्यों? रुपये मँगाए थे, रुपये भेज देने से ही तो चल जाता!”

“सो क्या कभी हो सकता है? ऐसी बीमारी की खबर सुनकर क्या केवल रुपये भेजकर ही स्थिर रह सकती हूँ?”

मैंने कहा, “तुम तो शायद स्थिर हो गयीं, किन्तु मुझे तो बहुत ही अस्थिर कर दिया। अभी ही यहाँ जब सब आ पड़ेंगे तब तुम अपना मुँह किस तरह दिखाओगी, और मैं ही क्या जवाब दूँगा?”

राजलक्ष्मी ने जवाब में केवल एक बार और अपने ललाट को छूकर कहा, “जवाब और क्या दोगे- मेरा भाग्य!”

उसकी बेपरवाही और उदासीनता से अत्यन्त असहिष्णु होकर बोला, “भाग्य तो ठीक है! किन्तु लाज-शर्म को एकबारगी ही चाट बैठी हो? यहाँ मुँह दिखाते भी तुम्हें हिचकिचाहट नहीं हुई?”

राजलक्ष्मी ने वैसे ही उदास कण्ठ से जवाब दिया, “मेरी लाज-शरम जो कुछ है सो इस समय बस तुम ही हो।”

इसके बाद अब मैं और कहूँ ही क्या! सुनूँ भी क्या? ऑंखें मूँदकर चुपचाप लेट रहा।

कुछ देर बाद पूछा, “बंकू का विवाह निर्विघ्न हो गया?”

राजलक्ष्मी बोली, “हाँ।”

“अभी कहाँ से आ रही हो?- कलकत्ते से?”

“नहीं पटने से। वहीं पर तुम्हारी चिट्ठी मिली थी।”

“मुझे कहाँ ले जाओगी?- पटने?”

राजलक्ष्मी ने कुछ सोचकर कहा, “एक बार तो वहाँ तुम्हें जाना ही पड़ेगा। पहले कलकत्ते चलें, वहाँ पर तुम्हें दिखा लूँ, उसके बाद तन्दुरुस्त होने पर...”

मैंने सवाल किया, “किन्तु, उसके बाद भी मुझे पटना क्यों जाना पड़ेगा?”

राजलक्ष्मी बोली, दान-पत्र की तो वहीं रजिस्टरी करानी पड़ेगी। लिखा-पढ़ी एक तरह से सब कर आई हूँ; किन्तु तुम्हारे हुक्म के बिना तो कुछ हो न सकेगा।”

अत्यन्त अचरज के साथ पूछा, “क्या बात का दान-पत्र? किसके नाम?”

राजलक्ष्मी बोली, “मकान तो दोनों बंकू को दिये हैं। केवल काशी का मकान गुरुदेव को देना विचारा है। और कम्पनी के कागज, गहने वगैरह का हिस्सा-बाँट भी अपनी समझ-बूझ के अनुसार एक तरह से कर आई हूँ। अब तुम्हारे कहने- भर की...”

मेरे अचरज की सीमा नहीं रही, बोला, “ऐसी अवस्था में अब तुम्हारा खुद का और क्या रह गया? बंकू यदि तुम्हारा भार न ले तो? अब उसकी खुद की गिरस्ती हो गयी, अन्त में यदि वह भी तुम्हें खाने को न दे तो?”

“क्या मैं वह चाहती हूँ? निज का सब कुछ दान करके क्या उसी के हाथ का दिया खाऊँगी? तुम भी खूब हो!”

धीरज को और न सँम्हाील सकने के कारण मैं उठकर क्रुद्ध कण्ठ से बोला, “हरिश्चन्द्र के समान यह दुर्बुद्धि तुम्हें दी किसने? खाओगी क्या? बुढ़ापे में किसकी गल-ग्रह बनने जाओगी!”

राजलक्ष्मी बोली, “तुम्हें गुस्सा करने की जरूरत नहीं है, तुम लौट जाओ। जिसने मुझे यह बुद्धि दी है वही मुझे खाने को देगा। मैं हजार बूढ़ी हो जाऊँगी वह मुझे कभी गल-ग्रह नहीं समझेगा! तुम फिजूल सिर गर्म मत करो- शान्ति से लेट रहो।”

मैं शान्त होकर लेट रहा। सामने की खुली खिड़की से डूबते हुए सूर्य की किरणों से रँगा हुआ विचित्र आकाश दीख पड़ा। स्वप्नाविष्ट की तरह निर्निमेष दृष्टि से उसी ओर निहारते-निहारते जान पड़ने लगा- मानो एक अद्भुत शोभा और सौन्दर्य में सारा विश्व-ब्रह्माण्ड बहा जा रहा है। तीनों लोकों के बीच रोग-शोक, अभाव-अभियोग, हिंसा-द्वेष, अब कहीं भी कुछ नहीं है।

इस निर्वाक् निस्तब्धता में मग्न रहकर दोनों ने कितना समय बिता दिया, समझता हूँ, इसका किसी ने हिसाब ही नहीं किया। सहसा दरवाजे के बाहर मनुष्य के गले की आवाज सुनकर हम दोनों ही चौंक पड़े और राजलक्ष्मी के शय्या छोड़ने के पहले ही डॉक्टर साहब ने प्रसन्न बाबा को साथ में लिये अन्दर प्रवेश किया। किन्तु, उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही रुककर खड़े हो गये। बाबा जब दिवा-निद्रा ले रहे थे तब यह खबर उनके कानों में अवश्य पड़ गयी थी कि कोई बन्धु कलकत्ते से गाड़ी लेकर मेरे पास आया है, किन्तु वह कोई स्त्री हो सकती है, यह शायद किसी की कल्पना में भी नहीं था। इसीलिए, शायद अब तक घर की स्त्रियाँ भी बाहर नहीं आईं थीं।

बाबाजी अत्यन्त विलक्षण आदमी थे। उन्होंने कुछ देर राजलक्ष्मी के नीचे झुके हुए मुख की ओर देखकर कहा, “यह लड़की कौन है श्रीकान्त? कुछ पहिचानी हुई-सी मालूम होती है।”

डॉक्टर साहब भी प्राय: साथ ही साथ कह उठे, “छोटे काका, मुझे भी ऐसा लगता है जैसे इन्हें कहीं देखा है।”

मैंने तिरछी नजर से देखा, राजलक्ष्मी का सारा मुख-मण्डल जैसे मुर्दे की तरह फक हो गया है उसी क्षण जैसे कोई मेरे हृदय के भीतर से बोल उठा-”श्रीकान्त, इस सर्वस्व-त्यागिनी स्त्री ने केवल तुम्हारे लिए ही स्वेच्छा से यह दु:ख अपने सिर पर उठा लिया है।”

एकबारगी सारी देह रोमांचित हो उठी, मन ही मन बोला, मुझे सत्य से मतलब नहीं, आज मैं मिथ्या को ही सर पर धारण करूँगा और दूसरे ही क्षण उसके हाथ को जरा दबाकर कह बैठा, “तुम अपने पति की सेवा करने आई हो। तुम्हें लाज किस बात की है राजलक्ष्मी? ये बाबा और डॉक्टर साहब हैं, इनको प्रणाम करो।”

पल-भर के लिए दोनों की चार ऑंखें हो गयीं; इसके बाद उसने उठकर जमीन पर सिर टेककर दोनों को प्रणाम किया।




वनिता कासनियां पंजाब द्वारा


️,Srikanth"❤️




Chapter 9


Saw the ship colliding on the pier of Calcutta, Banku is standing on top of the jetty. He quickly climbed up the ladder and bowed his head on the ground and said, "Mother, look in the car on the way. 

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

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रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...