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❤️,श्रीकांत"❤️ अध्याय 10एक दिन जिस भ्रमण-कहानी के बीच ही में अकस्मात् यवनिका डालकर बिदा ले चुका था, उसको फिर किसी दिन अपने ही हाथ से उद्धाटित करने की प्रवृत्ति मुझमें नहीं थी। मेरे गाँव के जो बाबा थे वे जब मेरे उस नाटकीय कथन के उत्तर में सिर्फ जरा-सा मुसकराकर रह गये, और राजलक्ष्मी के जमीन से लगाकर प्रणाम करने पर, जिस ढंग से हड़बड़ाकर, दो कदम पीछे हटकर बोले, “ऐसी बात है क्या? अहा, अच्छा हुआ, अच्छा हुआ,- जीते रहो, खुश रहो!” और फिर डॉक्टर को साथ लेकर बाहर चले गये, तब राजलक्ष्मी के चेहरे की जो तसवीर मैंने देखी वह भूलने की चीज नहीं, और न उसे कभी भूला ही। मैंने सोचा था कि वह मेरी है, बिल्कुसल मेरी अपनी- उसका प्रकाश बाहर की दुनिया में किसी दिन भी प्रकट न होगा; मगर, अब सोचता हूँ कि यह अच्छा ही हुआ जो बहुत दिनों से बन्द हुए उस दरवाजे क़ो मुझे ही आकर खोलना पड़ा। यह अच्छा ही हुआ कि जिस अज्ञात रहस्य के प्रति बाहर का क्रुद्ध संशय, अन्याय-अविचार का रूप धारण करके उस पर निरन्तर धक्के लगा रहा था, मुझे उसके बन्द दरवाजे को अपने ही हाथ से खोलने का मौका मिला।बाबा चले गये, राजलक्ष्मी क्षण-भर स्तब्ध भाव-से उनकी तरफ देखती रही, और उसके बाद मुँह उठाकर निष्फल हँसी हँसने की कोशिश करके बोली, “पैरों की धूल लेते समय मैं उन्हें छुए थोड़े ही लेती थी। मगर, तुम क्यों उस बात को कहने गये उनसे? उसकी तो कोई जरूरत न थी। यह तो सिर्फ-वास्तव में यह तो सिर्फ तुमने अपने आप ही अपनों का अपमान किया, जिसकी जरा भी जरूरत न थी। ये लोग विधवा-विवाह की पत्नी को बाज़ार की वेश्या की अपेक्षा ऊँचा आसन नहीं देते, लिहाजा इसमें मैं नीचे ही उतरी, किसी को जरा-सा भी ऊपर न उठा सकी...”इस बात को राजलक्ष्मी फिर पूरा न कर सकी।मैं सब कुछ समझ गया। इस अपमान के सामने बड़ी-बड़ी बातों की उछल-कूद मचाकर बात बढ़ाने की प्रवृत्ति न हुई। जिस तरह चुपचाप पड़ा था, उसी तरह मुँह बन्द किये पड़ा रहा।राजलक्ष्मी भी बहुत देर तक और कुछ नहीं बोली, ठीक मानो अपनी चिन्ता में मग्न होकर बैठी रही; उसके बाद सहसा बिल्कुरल पास ही कहीं से किसी की बुलाहट सुनकर मानो चौंककर उठ खड़ी हुई। रतन को बुलाकर बोली, “गाड़ी जल्दी तैयार करने को कह दे, रतन, नहीं तो फिर रात के ग्यारह बजे की उसी गाड़ी से जाना होगा। यदि ऐसा हुआ तो मुश्किल होगा- रास्ते में ठण्ड लग जायेगी।”दस ही मिनट के अन्दर रतन ने मेरा बैग ले जाकर गाड़ी पर रख दिया और मेरे बिस्तर बाँधने के लिए इशारा करता हुआ वह पास आ खड़ा हुआ। तबसे अब तक मैंने एक भी बात नहीं की थी और न अब भी कोई प्रश्न किया। कहाँ जाना होगा, क्या करना होगा, कुछ भी बिना पूछे मैं चुपचाप उठकर धीरे-से गाड़ी में जाकर बैठ गया।कुछ दिन पहले ऐसी ही एक शाम को अपने घर में प्रवेश किया था और आज फिर वैसी ही एक शाम को चुपचाप घर से निकल पड़ा। उस दिन भी किसी ने आदर के साथ ग्रहण नहीं किया था और आज भी कोई स्नेह के साथ बिदाई देने को आगे न आया! उस दिन भी, इसी समय, ऐसे ही घर-घर में शंख बजना शुरू हुआ था और इसी तरह वसु-मल्लिकों के गोपाल-मन्दिर से आरती के घण्टे-घड़ियाल का शब्द अस्पष्ट होकर हवा में बहा आ रहा था। फिर भी, उस दिन से आज के दिन का प्रभेद कितना ज़बर्दस्त है, इस बात को सिर्फ आकाश के देवताओं ने ही देखा।बंगाल के एक नगण्य गाँव के टूटे-फूटे जीर्ण घर के प्रति मेरी ममता कभी न थी- उससे वंचित होने को भी मैंने इससे पहले कभी हानिकर नहीं समझा, परन्तु आज अब अत्यन्त अनादर के साथ गाँव छोड़कर चल दिया, और किसी दिन किसी भी बहाने उसमें फिर कभी प्रवेश करने की कल्पना तक को जब मन में स्थान न दे सका, तब यह अस्वास्थ्यकर साधारण गाँव एक साथ सभी तरफ से मेरी ऑंखों के सामने असाधारण होकर दिखाई देने लगा और जिससे अभी तुरन्त ही निर्वासित होकर निकल पड़ा था, उसी अपने पुरखों के टूटे-फूटे मलिन घर के प्रति मेरे मोह की सीमा न रही।राजलक्ष्मी चुपके से आकर मेरे सामने के आसन पर बैठ गयी, और, शायद गाँव के परिचित राहगीरों के कुतूहल से अपने को पूरी तरह छिपाए रखने के लिए ही उसने एक कोने में अपना सिर रखकर ऑंखें मींच लीं।जब हम लोग रेलवे-स्टेशन के लिए रवाना हुए तब सूरज छिप चुका था। गाँव के टेढ़े-मेढ़े रास्ते के किनारे अपने आप बढ़े हुए करौंदे, झरबेरी और बेंत के जंगल ने संकीर्ण मार्ग को और भी संकीर्ण बना दिया था और दोनों तरफ पंक्तिवार खड़े हुए आम-कटहर के पेड़ों की शाखाएँ सिर से ऊपर कहीं-कहीं ऐसी सघन होकर मिल गयी थीं कि शाम का अंधेरा और भी दुर्भेद्य हो गया था। उसके भीतर से गाड़ी जब अत्यन्त सावधानी के साथ बहुत ही धीमी चाल से चलने लगी तब मैं ऑंखें मींचकर उस निविड़ अन्धकार के भीतर से न जाने क्या-क्या देखने लगा। मालूम हुआ, इसी रास्ते से किसी दिन बाबा मेरी दीदी को ब्याह कर लाए थे, तब यह रास्ता बारातियों के कोलाहल और पैरों की आहट से गूँज उठा होगा; और, फिर किसी दिन जब वे स्वर्ग सिधारे, तब इसी रास्ते से अड़ोसी-पड़ोसी उनकी अरथी नदी तक ले गये होंगे। इसी मार्ग से ही मेरी मां ने किसी दिन वधू-वेश में गृह-प्रवेश किया था, और एक दिन जब उनके इस जीवन की समाप्ति हुई तब, धूल-मिट्टी से भरे इसी संकीर्ण मार्ग से अपनी माँ को गंगा में विसर्जित करके हम लोग वापस लौटे थे। उस समय यह मार्ग ऐसा निर्जन और दुर्गम नहीं हुआ था। तब तक शायद इसकी हवा में इतना मलेरिया और तालाबों में इतना कीचड़ और जहर इकट्ठा नहीं हुआ था। उस समय तक देश में अन्न था, वस्त्र थे, धर्म था, तब तक देश का निरानन्द शायद ऐसी भयंकर शून्यता से आकाशव्यापी होकर भगवान के द्वार तक नहीं पहुँचता था। दोनों ऑंखों में ऑंसू भर आए, गाड़ी के पहिए से थोड़ी-सी धूल लेकर जल्दी-से माथे और मुँह पर लगाकर मैंने मन-ही-मन कहा, 'हे मेरे पितृ-पितामह के सुख-दु:ख, विपद-सम्पद, और हँसने-रोने से भरे हुए धूल-मिट्टी के पथ, मैं तुम्हें बार-बार नमस्कार करता हूँ।' फिर अन्धकार में जंगल की ओर देखकर कहा, 'माता जन्मभूमि, तुम्हारी करोड़ों अकृती सन्तानों के समान मैंने भी तुम्हें हृदय से नहीं चाहा- और नहीं जानता किसी दिन तुम्हारी सेवा में, तुम्हारे काम में, तुम्हारी गोद में फिर वापस आऊँगा या नहीं। परन्तु आज इस निर्वासन के मार्ग में अंधेरे के भीतर तुम्हारी जो दु:ख की मूर्ति मेरे ऑंसुओं के भीतर से अस्पष्ट होकर प्रस्फुटित हो उठी है, उसे मैं इस जीवन में कभी नहीं भूल सकूँगा।'ऑंख खोलकर देखा, राजलक्ष्मी उसी तरह स्थिर बैठी है। अंधेरे कोने में उसका चेहरा नहीं दिखाई दिया पर मैंने अनुभव किया कि ऑंखें मींचकर वह मानो चिन्ता में मग्न हो रही है और मन-ही-मन कहा, 'रहने दो ऐसे ही। आज से जब कि मैंने अपनी चिन्ता-तरणी की पतवार उसके हाथ सौंप दी है, तो इस अनजान नदी में कहाँ भँवरें हैं और कहाँ टापू, सो वही खोजती रहे।'इस जीवन में अपने मन को मैंने अनेक दिशाओं में, अनेक अवस्थाओं में आजमाकर देखा है। उसके भीतर की प्रकृति मैं पहिचानता हूँ। किसी विषय में 'अत्यन्त' को वह नहीं सह सकता। अत्यन्त सुख, अत्यन्त स्वास्थ्य, अत्यन्त अच्छा रहना, उसे हमेशा पीड़ा देता है। कोई अत्यन्त प्रेम करता है; इस बात को जानते ही मन भागूँ-भागूँ करने लगता है, उसे मन ने आज कितने दु:ख से अपने हाथ से पतवार छोड़ दी है, इस बात को इस मन के सृष्टिकर्त्ता के सिवा और कौन जान सकता है?बाहर के काले आकाश की ओर एक बार दृष्टि फैलाई- भीतर की अदृश्यप्राय निश्चल प्रतिमा की ओर भी एक बार दृष्टि डाली; उसके बाद हाथ जोड़कर फिर मैंने किसे नमस्कार किया, मैं खुद नहीं जानता। परन्तु, मन-ही-मन इतना जरूर कहा कि “इसके आकर्षण के दु:सह वेग से मेरा दम घुट रहा है, बहुत बार बहुत मार्गों से भागा हूँ, परन्तु फिर भी जब गोरखधन्धे की तरह सभी मार्गों ने मुझे बार-बार इसी के पास लौटा दिया है, तो अब मैं विद्रोह न करूँगा-अबकी बार मैंने अपने को सम्पूर्ण रूप से इसी के हाथ सौंप दिया। और अब तक अपने जीवन को अपनी पतवार से चलाकर ही क्या पाया? उसे कितना सार्थक बनाया? हाँ, आज अगर वह ऐसे ही हाथ जा पड़ा हो जो स्वयं अपने जीवन को आकण्ठ डूबे हुए दलदल में से खींचकर बाहर निकाल सका है, तो वह दूसरे के जीवन को हरगिज़ फिर उसी में नहीं डुबा सकता।”खैर, यह सब तो हुआ अपनी तरफ से। परन्तु, दूसरे पक्ष का आचरण फिर ठीक पहले की भाँति शुरू हुआ। रास्ते-भर में एक भी बात नहीं हुई यहाँ तक कि स्टेशन पहुँचकर भी किसी ने मुझसे कोई प्रश्न करना आवश्यक नहीं समझा। थोड़ी देर बाद ही कलकत्ते जानेवाली गाड़ी की घण्टी बजी, लेकिन रतन टिकट खरीदने का काम छोड़कर मुसाफिरखाने के एक कोने में मेरे लिए बिस्तर बिछाने में लग गया। अतएव समझ लिया, कि नहीं, हमें सवेरे की गाड़ी से पश्चिम की ओर रवाना होना होगा। मगर, उधर पटना जाना होगा या काशी या और कहीं, यह मालूम न होने पर भी इतना साफ समझ में आ गया कि इस विषय में मेरा मतामत बिल्कुकल ही अनावश्यक है।राजलक्ष्मी दूसरी ओर देखती हुई अन्यमनस्क की तरह खड़ी थी, रतन ने अपना काम पूरा करके उसके पास जाकर पूछा, “माँजी, पता लगा है कि जरा और आगे जाने से सभी तरह का अच्छा खाना मिल सकता है।”राजलक्ष्मी ने ऑंचल की गाँठ खोलकर कई रुपये उसके हाथ में देते हुए कहा, “अच्छी बात है, ले आ वहीं जाकर। पर दूध जरा देख-भालकर लेना, बासी-वासी न ले आना कहीं।”रतन ने कहा, “माँजी, तुम्हारे किये कुछ...”“नहीं, मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए।”यह 'नहीं' कैसा है, इस बात को सभी जानते हैं। और शायद सबसे ज्यादा जानता है रतन खुद। फिर भी उसने दो-चार बार पैर घिसकर धीरे से कहा, “कल ही से तो बिल्कुल...”राजलक्ष्मी ने उत्तर दिया, “तुझे क्या सुनाई नहीं देता रतन? बहरा हो गया है क्या?”आगे और कुछ न कहकर रतन चल दिया। कारण, इसके बाद भी बहस कर सकता हो, ऐसी ताब तो मैंने किसी की भी नहीं देखी। और जरूरत ही क्या थी? राजलक्ष्मी मुँह से स्वीकार न करे, फिर भी, मैं जानता हूँ कि रेलगाड़ी में रेल से सम्बन्धित किसी के भी हाथ की कोई चीज खाने की ओर उसकी प्रवृत्ति नहीं होती। अगर यह कहा जाय कि निरर्थक कठोर उपवास करने में इसकी जोड़ का दूसरा कोई नहीं देखा, तो शायद अत्युक्ति न होगी। मैंने अपनी ऑंखों से देखा है, कितनी बार कितनी चीजें इसके घर आते देखी हैं, पर उन्हें नौकर-नौकरानियों ने खाया है, गरीब पड़ोसियों को बाँट दिया है- सड़-गल जाने पर फेंक दिया गया है, परन्तु जिसके लिए वे सब चीजें आई हैं उसने मुँह से भी नहीं लगाया। पूछने पर, मजाक करने पर, हँसकर कह दिया है, “हाँ, मेरे तो बड़ा आचार है! मैं, और छुआ छूत का विचार! मैं तो सब कुछ खाती-पीती हूँ।”“अच्छा, तो मेरी ऑंखों के सामने परीक्षा दो?”“परीक्षा? अभी? अरे बाप रे! तब तो फिर जीने के लाले पड़ जाँयगे!”यह कहकर वह जीने का कोई कारण न दिखाकर घर के किसी बहुत ही जरूरी काम का बहाना करके अदृश्य हो गयी है। मुझे क्रमश: मालूम हुआ कि वह मांस-मछली दूध-घी कुछ नहीं खाती, परन्तु यह न खाना ही उसके लिए इतना अशोभन और इतनी लज्जा की बात है कि इसका उल्लेख करते ही मारे शरम के उसे भागने को राह नहीं मिलती। इसी से साधारणत: खाने के बारे में उससे अनुरोध करने की मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। जब रतन अपना मुरझाया-सा मुँह लेकर चला गया, तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद वह लोटे में गरम दूध और दोने में मिठाई वगैरह लेकर लौट आया, तब राजलक्ष्मी ने मेरे लिए दूध और कुछ खाने को रखकर बाकी का सब रतन के हाथ में दे दिया। तब भी मैंने कुछ न कहा और रतन की ऑंखों की नीरव प्रार्थना को स्पष्ट समझ जाने पर भी मैं उसी तरह चुप बना रहा।अब तो कारण-अकारण और बात-बात में उसका न खाना ही मेरे लिए अभ्यस्त हो गया है। परन्तु एक दिन ऐसा था जब यह बात न थी। तब हँसी-दिल्लगी से लेकर कठोर कटाक्ष तक भी मैंने कम नहीं किये हैं। परन्तु, जितने दिन बीतते गये हैं, मुझे इसके दूसरे पहलू पर भी सोचने-समझाने का काफी अवसर मिला है। रतन के चले जाने पर मुझे वे ही सब बातें फिर याद आने लगीं।कब और क्या सोचकर वह इस कृच्छ-साधना में प्रवृत्त हुई थी, मैं नहीं जानता। तब तक मैं इसके जीवन में नहीं आया था। परन्तु पहले-पहल जब वह जरूरत से ज्यादा भोजन-सामग्री के बीच में रहकर भी अपनी इच्छा से दिन पर दिन गुप्त रूप से चुपचाप अपने को वंचित करती हुई जी रही थी, तब वह कितना कठिन और कैसा दु:साध्यय कार्य था! कलुष और सब तरह की मलिनता के केन्द्र से अपने को इस तपस्या के मार्ग पर अग्रसर करते हुए उसने कितना न चुपचाप सहा होगा! आज यह बात उसके लिए इतनी सहज और इतनी स्वाभाविक है कि मेरी दृष्टि में भी उसकी कोई गुरुता, कोई विशेषता नहीं रह गयी है; इसका मूल्य क्या है, सो भी ठीक तौर से नहीं जानता, मगर फिर भी कभी-कभी मन में प्रश्न उठा है कि उसकी यह कठोर साधना क्या सबकी सब विफल हुई है, बिल्कुील ही व्यर्थ गयी है? अपने को वंचित रखने की यह जो शिक्षा है, यह जो अभ्यास है, यह जो पाकर त्याग देने की शक्ति है, अगर इस जीवन में उसके अलक्ष्य में न संचित हो पाती हो क्या आज वह ऐसी स्वच्छन्दता से, ऐसी सरलता के साथ अपने को सब प्रकार के भोगों से छुड़ाकर अलग कर सकती? कहीं से भी क्या कोई बन्धन उसे खींचता नहीं? उसने प्रेम किया है, ऐसे कितने ही आदमी प्रेम किया करते हैं, परन्तु सर्व-त्याग के द्वारा उसे प्रेम को ऐसा निष्पाप, ऐसा एकान्त बना लेना क्या संसार में इतना सुलभ है?मुसाफिरखाने में और आदमी न था, रतन भी शायद आड़ में कहीं जगह ढूँढ़कर लेट गया था। देखा, एक टिमटिमाती हुई बत्ती के नीचे राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी है। पास जाकर उसके माथे पर हाथ रखते ही उसने चौंककर मुँह उठाया, और पूछा, “तुम सोये नहीं अभी?”“नहीं, मगर तुम यहाँ धूल-मिट्टी में चुपचाप अकेली न बैठो, मेरे बिस्तर पर चलो।” यह कहकर, और विरोध करने का अवसर बिना दिये ही मैंने हाथ पकड़कर उसे उठा लिया परन्तु अपने पास बिठा लेने पर फिर कहने को कोई बात ही ढूँढे नहीं मिली, सिर्फ आहिस्ते-आहिस्ते उसके हाथ पर हाथ फेरने लगा। कुछ क्षण इसी तरह बीते। सहसा उसकी ऑंखों के कोनों पर हाथ पड़ते ही अनुभव किया कि मेरा सन्देह बेबुनियाद नहीं है। धीरे-धीरे ऑंसू पोंछकर मैंने ज्यों ही उसे अपने पास खींचने की कोशिश की त्यों ही वह मेरे फैले हुए पैरों पर औंधी पड़ गयी और जोर से उन्हें दबाये रही। किसी भी तरह मैं उसे अपने बिल्कुरल पास न ला सका।फिर उसी तरह सन्नाटे में समय बीतने लगा। सहसा मैं बोल उठा, “एक बात तुम्हें अब तक नहीं जताई लक्ष्मी।”उसने चुपके से कहा, “कौन-सी बात?”इतना ही कहने में संस्कारवश पहले तो जरा संकोच हुआ, मगर मैं रुका नहीं, बोला, “मैंने आज से अपने को बिल्कुरल तुम्हारे ही हाथ सौंप दिया है, अब भलाई-बुराई का सारा भार तुम्हीं पर है।”यह कहकर मैंने उसके मुख की ओर देखा कि उस टिमटिमाते हुए उजाले में वह मेरे मुँह की ओर चुपचाप एकटक देख रही है। उसके बाद जरा हँसकर बोली, “तुम्हें लेकर मैं क्या करूँगी? तुम न तो तबला ही बजा सकते हो, न सारंगी ही बजा सकोगे और...”मैंने कहा, “ 'और' क्या? पान-तम्बाकू हाज़िर करना? नहीं, यह काम तो मुझसे हरगिज़ नहीं हो सकता।”“लेकिन पहले के दो काम?”मैंने कहा, “आशा दो तो शायद कर भी सकूँ।” कहकर मैंने भी जरा हँस दिया।सहसा राजलक्ष्मी उत्साह से बैठी और बोली, “मज़ाक नहीं, सचमुच बजा सकते हो?”मैंने कहा, “आशा करने में दोष क्या है?”राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं बजा सकते।” उसके बाद नीरव विस्मय से कुछ देर तक वह मेरी ओर एकटक देखती रही, फिर धीरे-धीरे कहने लगी, “देखो, बीच-बीच में मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है; परन्तु, फिर सोचती हूँ कि जो आदमी निष्ठुरों की तरह बन्दूक लेकर सिर्फ जानवारों को मारते फिरना ही पसन्द करता है, वह इसकी क्या परवाह करनेवाला है? इसके भीतर की इतनी बड़ी वेदना का अनुभव करना क्या उसके लिए साध्य् हो सकता है? बल्कि शिकार करने के समान चोट पहुँचा सकने में ही मानो उस आनन्द मिलता है? तुम्हारा दिया हुआ बहुत-सा दु:ख मैं यही सोचकर तो सह सकी हूँ।”अब चुप रहने की मेरी पारी आई। उसके लगाये हुए अभियोग के मूल में युक्तियों द्वारा न्याय-विचार भी चल सकता था, सफाई देने के लिए नज़ीरों की भी शायद कमी नहीं पड़ती, परन्तु यह सब विडम्बना-सी मालूम हुई। उसकी सच्ची, अनुभूति के आगे मुझे मन-ही-मन हार माननी पड़ी। अपनी बात को वह ठीक तरह से कह भी नहीं सकी, परन्तु संगीत की जो अन्तरतम मूर्ति सिर्फ व्यथा के भीतर से ही कदाचित् आत्म-प्रकाश करती है, वह करुणा से अभिषिक्त सदा जाग्रत चेतना ही मानो राजलक्ष्मी के इन दो शब्दों के इंगित में रूप धारण करके सामने दिखाई दी। और उसके संयम ने, उसके त्याग ने, उसके हृदय की शुचिता ने फिर एक बार मानो मेरी ऑंखों में अंगुली देकर उसी का स्मरण करा दिया।फिर भी, एक बात उससे कह सकता था। कह सकता था कि मनुष्य की परस्पर सर्वथा-विरुद्ध प्रवृत्तियाँ किस तरह एक साथ पास-ही-पास बैठी रहती हैं, यह एक अचिन्तनीय रहस्य है। नहीं तो मैं अपने हाथ से जीव-हत्या कर सकता हूँ, इतना बड़ा परमाश्चर्य मेरे ही लिए और क्या हो सकता है? जो एक चींटी तक की मृत्यु को नहीं सह सकता, खून से लथ-पथ बलि के यूप-काष्ठ की सूरत ही कुछ दिनों के लिए जिसका खाना-पीना-सोना छुड़ा देती है, जिसने मुहल्ले के अनाथ आश्रयहीन कुत्ते-बिल्लियों के लिए भी बचपन में कितने ही दिन चुपचाप उपवास किये हैं उसका जंगल के पुश-पक्षियों पर कैसे निशाना ठीक बैठता है, यह तो खुद मेरी समझ में नहीं आता। और क्या ऐसा सिर्फ मैं ही अकेला हूँ? जिस राजलक्ष्मी का अन्तर-बाहर मेरे लिए आज प्रकाश की तरह स्वच्छ हो गया है वह भी इतने दिनों तक साल पर साल किस तरह 'प्यारी' का जीवन बिता सकी!मन में आने पर भी मैं यह बात मुँह से न निकाल सका। सिर्फ उसे बाधा न देने की गरज़ ही नहीं, बल्कि सोचा, “क्या होगा कहने से? देव और दानव दोनों कन्धे मिलाकर मनुष्य को कहाँ और किस जगह लगातार ढोये लिये जा रहे हैं, इसे कौन जानता है? किस तरह भोगी एक ही दिन में त्यागी होकर निकल पड़ता है, निर्मम निष्ठुर एक क्षण में करुणा से विगलित होकर अपने को नि:शेष कर डालता है, इस रहस्य का हमने कितना-सा संधान पाया है? किस निभृत कन्दरा में मानवात्मा की गुप्त साधना अकस्मात् एक दिन सिद्धि के रूप में प्रस्फुटित हो उठती है, उसकी हम क्या खबर रखते हैं? क्षीण प्रकाश में राजलक्ष्मी के मुँह की ओर देखकर उसी को लक्ष्य करके मैंने मन-ही-मन कहा, “यह अगर मेरी सिर्फ व्यथा पहुँचाने की शक्ति को ही देख सकी हो, व्यथा ग्रहण करने की अक्षमता को स्नेह के कारण अब तक क्षमा करती चली आई हो, तो इसमें मेरे रूठने की ऐसी कौन-सी बात है?”राजलक्ष्मी ने कहा, “चुप क्यों रह गये?”मैंने कहा, “फिर भी तो इस निष्ठुर के लिए ही तुमने सब कुछ त्याग दिया!”राजलक्ष्मी ने कहा, “सब कुछ क्या त्यागा! अपने को तो तुमने नि:सत्व होकर ही आज मुझे दे दिया, उसे तो मैं 'नहीं चाहिए' कहकर त्याग न सकी!”मैंने कहा, “हाँ, नि:सत्व होकर ही दिया है। मगर तुम तो अपने आपको देख नहीं सकोगी इसलिए, वह उल्लेख मैं न करूँगा!”♦♦ • ♦♦पश्चिम के शहर में प्रवेश करने के पहले ही समझ में आ गया कि बंगाल के मलेरिया ने मुझे खूब ही मज़बूती के साथ पकड़ लिया है। पटना स्टेशन से राजलक्ष्मी के घर तक मैं लगभग बेहोशी की हालत में लाया गया। इसके बाद के महिने में भी मुझे ज्वर, डॉक्टर और राजलक्ष्मी लगभग हर वक्त ही घेरे रहे।जब बुखार छूट गया तब डॉक्टर साहब ने घर-मालकिन को साफ तौर से समझा दिया कि यद्यपि यह शहर पश्चिम-प्रदेश में ही शामिल है और स्वास्थ्यप्रद स्थान के रूप में इसकी प्रसिद्धि है, फिर भी मेरी सलाह है कि रोगी को जल्दी ही स्थानान्तरित करना चाहिए।फिर बाँध-बूँधी शुरू हो गयी, मगर अबकी बार जरा धूम-धाम के साथ। रतन को अकेला पाकर मैंने पूछा, “अबकी बार कहाँ जाना होगा, रतन?”देखा कि वह इस नवीन यात्रा के बिल्कुलल ही खिलाफ है। उसने खुले दरवाजे की तरफ निगाह रखते हुए आभास और इशारे से फुस-फुस करके जो कुछ कहा, उससे मेरा भी जैसे कलेजा-सा बैठ गया। रतन ने कहा, “वीरभूम जिले में एक छोटा-सा गाँव है गंगामाटी। जब इस गाँव का पट्टा लिया था तब मैं सिर्फ एक मुख्तार साहब किसनलाल के साथ वहाँ गया था। माँ जी खुद वहाँ कभी नहीं गयीं। यदि कभी जाँयगी तो उन्हें भाग आने की राह भी ढूँढे न मिलेगी। समझ लीजिए कि गाँव में भले घर हैं ही नहीं-सिर्फ छोटी जातिवालों के ही घर हैं। उन्हें न तो छुआ ही जा सकता है और न वे किसी काम आ सकते हैं।”राजलक्ष्मी क्यों इन सब छोटी जातों में जाकर रहना चाहती है, इसका कारण मानो मेरी समझ में कुछ आ गया। मैंने पूछा, “गंगामाटी है कहाँ?”रतन ने जताया, “साँइथिया या ऐसी ही किसी स्टेशन से करीब दस-बारह कोस बैलगाड़ी में जाना पड़ता है। रास्ता जितना कठिन है उतना ही भयंकर। चारों तरफ मैदान ही मैदान है। उसमें न तो कहीं फसल ही होती है और न कहीं एक बूँद पानी है। कँकरीली मिट्टी है, कहीं गेरुआ और कहीं जली-हुई-सी स्याह काली।” यह कहकर वह जरा रुका, और खास तौर से मुझे ही लक्ष्य करके फिर कहने लगा, “बाबूजी, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता कि आदमी वहाँ किस सुख के लिए रहते हैं। और जो ऐसी सोने की सी जगह छोड़कर वहाँ जाते हैं, उनसे मैं और क्या कहूँ।”भीतर-ही-भीतर एक लम्बी साँस लेकर मैं मौन हो रहा। ऐसी सोने की-सी जगह छोड़कर क्यों उस मरु-भूमि के बीच निर्बान्धव नीच आदमियों के देश में राजलक्ष्मी मुझे लिये जा रही है, सो न तो उससे कहा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है।आखिर मैंने कहा, “शायद मेरी बीमारी की वजह से ही जाना पड़ रहा है, रतन। यहाँ रहने से आराम होने की कम आशा है, सभी डॉक्टर यही डर दिखा रहे हैं।”रतन ने कहा, “लेकिन बीमारी क्या यहाँ और किसी को होती ही नहीं बाबूजी? आराम होने के लिए क्या उन सबको उस गंगामाटी में ही जाना पड़ता है?”मन-ही-मन कहा, “मालूम नहीं, उन सबको किस माटी में जाना पड़ता है। हो सकता है कि उनकी बीमारी सीधी हो, हो सकता है कि उन्हें साधारण मिट्टी में ही आराम पड़ जाता हो। मगर हम लोगों की व्याधि सीधी भी नहीं है और साधारण भी नहीं; इसके लिए शायद उसी गंगामाटी की ही सख्त जरूरत है।”रतन कहने लगा, “माँजी के खर्च का हिसाब-किताब भी तो हमारी किसी की समझ में नहीं आता। वहाँ न तो घर-द्वार ही है, न और कुछ। एक गुमाश्ता है, उसके पास दो हज़ार रुपये भेजे गये हैं एक मिट्टी का मकान बनाने के लिए! देखिए तो सही बाबूजी, ये सब कैसे ऊँटपटाँग काम हैं! नौकर हैं, सो हम लोग जैसे कोई आदमी ही नहीं हैं!”उसके क्षोभ और नाराजगी को देखते हुए मैंने कहा, “तुम वहाँ न जाओ तो क्या है रतन? जबरदस्ती तो तुम्हें कोई कहीं ले नहीं जा सकता?”मेरी बात से रतन को कोई सान्त्वना नहीं मिली। बोला, “माँजी ले जा सकती हैं। क्या जाने क्या जादू-मन्त्र जानती हैं वे! अगर कहें कि तुम लोगों को यमराज के घर जाना होगा, तो इतने आदमियों में किसी की हिम्मत नहीं कि कह दे, 'ना!” यह कहकर वह मुँह भारी करके चला गया।बात तो रतन गुस्से से ही कह गया था, पर वह मुझे मानो अकस्मात् एक नये तथ्य का संवाद दे गया। सिर्फ मेरी ही नहीं सभी की यह एक ही दशा है। उस जादू-मंत्र की बात ही सोचने लगा। मन्त्र-तन्त्र पर सचमुच ही मेरा विश्वास है सो बात नहीं, परन्तु घर-भर के लोगों में किसी में भी जो इतनी-सी शक्ति नहीं कि यमराज के घर जाने की आज्ञा तक की उपेक्षा कर सके, सो वह आखिर है कौन चीज़!इसके समस्त सम्बन्धों से अपने को विच्छिन्न करने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया! लड़-झगड़कर चल दिया हूँ, सन्यासी होकर भी देख लिया, यहाँ तक कि देश छोड़कर बहुत दूर चला गया हूँ जिससे फिर कभी मुलाकात ही न हो, परन्तु मेरी समस्त चेष्टाएँ किसी गोल चीज पर सीधी लकीर खींचने के समान बारम्बार केवल व्यर्थ ही हुई हैं। अपने को हजार बार धिक्कारने पर भी अपनी कमजोरी के आगे आखिर मैं पराजित ही हुआ हूँ, और इसी बात का खयाल करके अन्त में जब मैंने आत्म-समर्पण कर दिया तब रतन ने आकर आज मुझे इस बात की खबर दी, “राजलक्ष्मी जादू-मन्त्र जानती है!”बात ठीक है। लेकिन इसी रतन से अगर जिरह करके पूछा जाय तो मालूम होगा कि वह खुद भी इस बात पर विश्वास नहीं करता।सहसा देखा कि राजलक्ष्मी एक पत्थर की प्याली में कुछ लिये हुए व्यस्त भाव से इधर ही से नीचे जा रही है। मैंने बुलाकर कहा, “सुनो तो, सभी कहते हैं कि तुम जादू-मन्त्र जानती हो!”वह चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, “क्या जानती हूँ?”मैंने कहा, “जादू-मन्त्र!”राजलक्ष्मी ने मुँह बिचकाकर जरा मुस्कराते हुए कहा, “हाँ, जानती हूँ।”यह कहकर वह चली जा रही थी, सहसा मेरे कुरते को गौर से देखकर उद्विग्न कण्ठ से पूछ उठी, “यह क्या? कल का वही बासी कुरता पहने हुए हो क्या?”अपनी तरफ देखकर मैंने कहा, “हाँ, वही है। मगर रहने दो, खूब उजला है।”राजलक्ष्मी ने कहा, “उजले की बात नहीं, मैं सफाई की बात कह रही हूँ।” इसके बाद फिर जरा मुस्कराकर कहा, “तुम बाहर के इस दिखावटी उजलेपन में ही हमेशा गर्क रहे! इसकी उपेक्षा करने को मैं नहीं कहती, मगर भीतर पसीने से गन्दगी बढ़ जाती है, इस बात पर गौर करना कब सीखोगे?” इतना कहकर उसने रतन को आवाज दी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कारण, मालकिन की इस तरह की ऊँची-मीठी आवाज का जवाब देना इस घर का नियम नहीं, बल्कि चार-छह मिनट के लिए मुँह छिपा जाना ही नियम है।आखिर राजलक्ष्मी ने हाथ की चीज नीचे रखकर बगल के कमरे में से एक धुला हुआ कुरता लाकर मेरे हाथ में दिया और कहा, “अपने मन्त्री रतन से कहना, जब तक उसने जादू-मन्त्र नहीं सीख लिया है, तब तक इन सब जरूरी कामों को वह अपने हाथों से ही किया करे।” यह कहकर वह प्याली उठाकर नीचे चली गयी।कुरता बदलते वक्त देखा कि उसका भीतरी हिस्सा सचमुच ही गन्दा हो गया है। होना ही चाहिए था, और मैंने भी इसके सिवा और कुछ उम्मीद की हो, सो भी नहीं। मगर मेरा मन तो था सोचने की तरफ, इसी से इस अतितुच्छ चोले के भीतर-बाहर के वैसे दृश्य ने ही फिर मुझे नयी चोट पहुँचाई।राजलक्ष्मी की यह शुचिता की सनक बहुधा हम लोगों को निरर्थक, दु:खदायक और यहाँ तक कि 'अत्याचार' भी मालूम हुई है; और अभी एक ही क्षण में उसका सब कुछ मन से धुल-पुछ गया हो, सो भी सत्य नहीं; परन्तु, इस अन्तिम श्लेष में जिस वस्तु को मैंने आज तक मन लगाकर नहीं देखा था, उसी को देखा। जहाँ से इस अद्भुत मानवीकी व्यक्त और व्यक्त जीवन की धाराएँ दो बिल्कुचल प्रतिकूल गतियों में बहती चली आ रही हैं, आज मेरी निगाह ठीक उसी स्थान पर जाकर पड़ी। एक दिन अत्यन्त आश्चर्य में डूबकर सोचा था कि बचपन में राजलक्ष्मी ने जिसे प्यार किया था उसी को प्यारी ने अपने उन्माद-यौवन की किसी अतृप्त लालसा के कीचड़ से इस तरह बहुत ही आसानी से सहस्र दल-विकसित कमल की भाँति पलक मारते ही बाहर निकाल दिया! आज मालूम हुआ कि वह प्यारी नहीं है, वह राजलक्ष्मी ही है। 'राजलक्ष्मी' और 'प्यारी' इन दो नामों के भीतर उसके नारी-जीवन का कितना बड़ा इंगित छिपा था, मैंने उसे देखकर भी नहीं देखा; इसी से कभी-कभी संशय में पड़कर सोचा है कि एक के अन्दर दूसरा आदमी अब तक कैसे जिन्दा था! परन्तु, मनुष्य तो ऐसा ही है! इसी से तो वह मनुष्य है!प्यारी का सारा इतिहास मुझे मालूम नहीं, मालूम करने की इच्छा भी नहीं। और राजलक्ष्मी का ही सारा इतिहास जानता होऊँ, सो भी नहीं; सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि इन दोनों के मर्म और कर्म में न कभी किसी दिन कोई मेल था और न सामंजस्य ही। हमेशा ही दोनों परस्पर उलटे स्रोत में बहती गयी हैं। इसी से एक की निभृत सरसी में जब शुद्ध सुन्दर प्रेम का कमल धीरे-धीरे लगातार दल पर दल फैलाता गया है तब दूसरी के दुर्दान्त जीवन का तूफान वहाँ व्याघात तो क्या करेगा, उसे प्रवेश का मार्ग तक नहीं मिला! इसी से तो उसकी एक पंखुड़ी तक नहीं झड़ी है, जरा-सी धूल तक उड़कर आज तक उसे स्पर्श नहीं कर सकी है।शीत-ऋतु की संध्यार जल्दी ही घनी हो आई, मगर मैं वहीं बैठा सोचता रहा। मन-ही-मन बोला, “मनुष्य सिर्फ उसकी देह ही तो नहीं है! प्यारी नहीं रही, वह मर गयी। परन्तु, किसी दिन अगर उसने अपनी उस देह पर कुछ स्याही लगा भी ली हो तो क्या सिर्फ उसी को बड़ा करके देखता रहूँ, और राजलक्ष्मी जो अपने सहस्र-कोटि दु:खों की अग्नि-परीक्षा पार करके आज अपनी अकलंक शुभ्रता में सामने आकर खड़ी हुई है उसे मुँह फेरकर बिदा कर दूँ? मनुष्य में जो पशु है, सिर्फ उसी के अन्याय से और उसी की भूल-भ्रान्ति से-मनुष्य का विचार करूँ? और जिस देवता ने समस्त दु:ख, सम्पूर्ण व्यथा और समस्त अपमानों को चुपचाप सहन और वहन करके भी आज सस्मित मुख से आत्म-प्रकाश किया है, उसे बिठाने के लिए कहीं आसन भी न बिछाऊँ? यह क्या मनुष्य के प्रति सच्चा न्याय होगा?' मेरा मन मानो आज अपनी सम्पूर्ण शक्ति से कहने लगा, “नहीं-नहीं, हरगिज नहीं, यह कदापि नहीं होगा, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।” वह कोई ज्यादा दिन की बात नहीं जब अपने को दुर्बल, श्रान्त और पराजित सोचकर राजलक्ष्मी के हाथ अपने को सौंप दिया था, किन्तु, उस दिन उस पराभूत के आत्म-त्याग में एक बड़ी जबरदस्त दीनता थी। तब मेरा वही मन मानो किसी भी तरह अनुमोदन नहीं कर रहा था; परन्तु आज मेरा मन मानो सहसा जोर के साथ इसी बात को बार-बार कहने लगा, “वह दान दान ही नहीं, वह धोखा है। जिस प्यारी को तुम जानते न थे उसे जानने के बाहर ही पड़ी रहने दो; परन्तु, जो राजलक्ष्मी एक दिन तुम्हारी ही थी, आज उसी को तुम सम्पूर्ण चित्त से ग्रहण करो। और जिनके हाथ से संसार की सम्पूर्ण सार्थकता निरन्तर झड़ रही है, इसकी भी अन्तिम सार्थकता उन्हीं के हाथ सौंपकर निश्चिन्त हो जाओ।”नया नौकर बत्ती ला रहा था, उसे बिदा करके मैं अंधेरे में ही बैठा रहा और मन-ही-मन बोला, “आज राजलक्ष्मी को सारी भलाइयों और सारी बुराइयों के साथ स्वीकार करता हूँ। इतना ही मैं कर सकता हूँ, सिर्फ इतना ही मेरे हाथ में है। मगर, इसके अतिरिक्त और भी जिनके हाथ में है, उन्हीं को उस अतिरिक्त के बोझे को सौंपता हूँ।” इतना कहकर मैं उसी अन्धकार में खाट के सिरहाने चुपचाप अपना सिर रखकर पड़ रहा।पहले दिन की तरह दूसरे दिन भी यथा-रीति तैयारियाँ होने लगीं, और उसके बाद तीसरे दिन भी दिन-भर उद्यम की सीमा न रही। उस दिन दोपहर को एक बड़े भारी सन्दूक में थाली, लोटे-गिलास, कटोरे-कटोरियाँ और दीवट आदि भरे जा रहे थे। मैं अपने कमरे में से ही सब देख रहा था। मौका पाकर मैंने राजलक्ष्मी को इशारे से अपने पास बुलाकर पूछा, “यह सब हो क्या रहा है? तुम क्या अब वहाँ से वापस नहीं आना चाहतीं, या क्या?”राजलक्ष्मी ने कहा, “वापस कहाँ आऊँगी?”मुझे याद आया, यह मकान उसने बंकू को दान कर दिया है। मैंने कहा, “मगर, मान लो कि वह जगह तुम्हें ज्यादा दिन अच्छी न लगे तो?”राजलक्ष्मी ने जरा मुस्कराते हुए कहा, “मेरे लिए मन खराब करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम चले आना, मैं बाधा न डालूँगी।”उसके कहने के ढंग से मुझे चोट पहुँची, मैं चुप हो रहा। यह मैंने बहुत बार देखा है कि वह मेरे इस ढंग के किसी भी प्रश्न को मानो सरल चित्त से ग्रहण नहीं कर सकती। मैं किसी को निष्कपट होकर प्यार कर सकता हूँ, या उसके साथ स्थिर होकर रह सकता हूँ, यह बात किसी भी तरह मानो उसके मन में समाकर एक होना नहीं चाहती। सन्देह के आलोड़न में अविश्वास एक क्षण में ही ऐसा उग्र होकर निकल पड़ता है कि उसकी ज्वाला दोनों ही के मन में बहुत देर तक लप-लप लपटें लिया करती है। अविश्वास की यह आग कब बुझेगी। सोचते-सोचते मुझे इसका कहीं ओर-छोर ही नहीं मिलता। वह भी इसी की खोज में निरन्तर घूम रही है। और, गंगामाटी भी इस बात का अन्तिम फैसला कर देगी या नहीं, यह तथ्य जिनके हाथ में है वे ऑंखों के ओझल चुप्पी साधे बैठे हैं।सब तरह की तैयारियाँ होते-होते और भी तीन-चार दिन बीत गये; उसके बाद और भी दो एक दिन गये शुभ साइत की प्रतीक्षा में। अन्त में, एक दिन सबेरे हम लोग अपरिचित गंगामाटी के लिए सचमुच ही घर से बाहर निकल पड़े। यात्रा में कुछ अच्छा नहीं लगा, मन में जरा भी खुशी नहीं थी। और, सबसे बुरी बीती शायद रतन पर। वह मुँह को अत्यन्त भारी बनाकर गाड़ी के एक कोने में चुपचाप बैठा ही रहा, स्टेशन पर स्टेशन गुजरते गये, पर उसने किसी भी काम में ज़रा भी सहायता नहीं की। मगर, मैं सोच रहा था, बिल्कु्ल ही दूसरी बात। जगह जानी हुई है या अनजानी, अच्छी है या बुरी, स्वास्थ्यकर है या मलेरिया से भरी, इन बातों की तरफ मेरा ध्याहन ही न था। मैं सोच रहा था; यद्यपि अब तक मेरा जीवन निरुपद्रव नहीं बीता; उसमें बहुत-सी गलतियाँ बहुत-सी भूलें-चूकें, बहुत-सा दु:ख-दैन्य रहा है, फिर भी, वे सब मेरे लिए अत्यन्त परिचित हैं। इस लम्बे अरसे में उनसे मेरा मुकाबिला तो हुआ ही है, साथ ही एक तरह का स्नेहा सा पैदा हो गया है। उनके लिए मैं किसी को भी दोष नहीं देता, और अब मुझे भी और कोई दोष देकर अपना समय नष्ट नहीं करता। परन्तु, यह जीवन क्या जाने कहाँ को किस नवीनता की ओर निश्चित रूप से चला जा रहा है और इस निश्चितता ने ही मुझे विकल कर दिया है। 'आज नहीं कल' कहकर और देर करने का भी रास्ता नहीं। और मज़ा यह कि न तो मैं इसकी भलाई को जानता हूँ और न बुराई को। इसी से इसकी भलाई-बुराई कुछ भी, किसी हालत में, अब मुझे अच्छी नहीं लगती। गाड़ी ज्यों-ज्यों तेजी के साथ गन्तव्य स्थान के निकट पहुँचती जाती है, त्यों-त्यों इस अज्ञात रहस्य का बोझ मेरी छाती पर पत्थर-सा भारी होकर मज़बूती से बैठता जाता है। कितनी-कितनी बातें मन में आने लगीं, उनकी कोई हद नहीं। मालूम हुआ, निकट भविष्य में ही शायद मुझको ही केन्द्र बनाकर एक भद्दा दल संगठित हो उठेगा। उसे न तो ग्रहण कर सकूँगा और न अलग फेंक सकूँगा। तब क्या होगा और क्या न होगा, इस बात को सोचने में भी मेरा मन मानो जमकर बरफ हो गया।मुँह उठाकर देखा, तो राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी खिड़की के बाहर देख रही है। सहसा मालूम हुआ कि मैंने कभी किसी दिन इससे प्रेम नहीं किया। फिर भी इसे ही मुझे प्रेम करना पडेग़ा। कहीं किसी तरफ से भी निकल भागने का रास्ता नहीं है। संसार में इतनी बड़ी विडम्बना क्या कभी किसी के भाग्य में घटित हुई है? और मज़ा यह कि एक ही दिन पहले इस दुविधा की चक्की से अपनी रक्षा करने के लिए अपने को सम्पूर्ण रूप से उसी के हाथ सौंप दिया था। तब मन-ही-मन जोर के साथ कहा था कि तुम्हारी सभी भलाई-बुराइयों के साथ ही तुम्हें अंगीकार करता हूँ लक्ष्मी! और आज, मेरा मन ऐसा विक्षिप्त और ऐसा विद्रोही हो उठा। उसी से सोचता हूँ, संसार में 'करूँगा' कहने में और सचमुच के करने में कितना बड़ा अन्तर है!♦♦ • ♦♦साँइथिया स्टेशन पर जब गाड़ी पहुँची तब दिन ढल रहा था। राजलक्ष्मी के गुमाश्ता काशीराम स्वयं स्टेशन पर नहीं आ सके, वे उधर के इन्तज़ाम में लगे हुए हैं। मगर दो आदमियों को उन्होंने चिट्ठी लिखकर भेज दिया है। उनके रुक्के से मालूम हुआ कि ईश्वर की इच्छा से 'अब', अर्थात् उनके घर में और उनकी गंगामाटी में सब तरह से कुशल है। आज्ञानुसार स्टेशन के बाहर चार बैलगाड़ियाँ तैयार खड़ी मिलेंगी जिनमें से दो तो खुली हुई हैं और दो छाई हुई। एक पर बहुत-सा सूखा घास और खजूर की पत्तियों की चटाई बिछा दी गयी है और वह स्वयं मालकिन साहबा के लिए है। दूसरी में मामूली थोड़ा-सा घास डाल दिया गया है, पर चटाई नहीं है वह नौकर-चाकर आदि अनुचरों के लिए है। खुली हुई दो गाड़ियों पर असबाब लादा जायेगा। और 'यद्यपि स्यात्' स्थानाभाव हो, तो पियादों को हुक्म देते ही वे बाजार से और भी एक गाड़ी लाकर हाज़िर कर देंगे। उन्होंने और भी लिखा है कि भोजनादि सम्पन्न करके संध्याब से पूर्व ही रवाना हो जाना वांछनीय है। अन्यथा मालकिन साहबा की सुनिद्रा में व्याघात हो सकता है। और इस विषय में विशेष लिखा है कि मार्ग में भयादि कुछ नहीं है, आनन्द से सोती हुई आ सकती हैं।मालकिन साहबा रुक्का पढ़कर कुछ मुसकराईं। जिसने उसे दिया उससे भयादि के विषय में कोई प्रश्न न करके उन्होंने पूछा, “क्यों भाई, आसपास में कोई तलाव-अलाव बता सकते हो? एक डुबकी लगा आती।”“है क्यों नहीं, माँ जी। वह रहा वहाँ...”“तो चलो भइया, दिखा दो” कहती हुई वह उस आदमी को और रतन को साथ लेकर न जाने कहाँ की एक अनजान तलैया में स्नानादि करने चली गयी। बीमारी आदि का भय दिखाना निरर्थक समझकर मैंने प्रतिवाद भी नहीं किया। ख़ासकर इसलिए कि अगर वह कुछ खा-पी लेना चाहती हो, तो इससे वह भी आज के लिए बन्द हो जायेगा।लेकिन, आज वह दसेक मिनट में ही लौट आई। बैलगाड़ी पर असबाब लद रहा है और मामूली-सा एक बिस्तर खोलकर सवारी वाली गाड़ी में बिछा दिया गया है। मुझसे उसने कहा, “तुम क्यों नहीं इसी वक्त कुछ खा-पी लेते? सभी कुछ तो आ गया है।”मैंने कहा, “दो!”पेड़ के नीचे आसन बिछाकर एक केले के पत्ते पर मेरे लिए वह खाना परोस रही थी और मैं निस्पृह दृष्टि से सिर्फ उसकी ओर देख रहा था। इतने में एक मूर्ति ने आकर और सामने खड़े होकर कहा, “नारायण!”राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर बायें हाथ से धोती का पल्ला खींचते हुए मुँह उठाकर ऊपर देखा और कहा, “आइए।”अकस्मात् यह नि:संकोच निमन्त्रण का शब्द सुनकर मुँह उठाकर देखा, तो, एक साधु खड़ा है। बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसकी उमर ज्यादा नहीं थी, वह शायद बीस-बाईस के भीतर ही होगा, मगर देखने में जैसा सुकुमार वैसा ही सुन्दर! चेहरा कृशता की ओर ही जा रहा है, शायद कुछ लम्बा होने के कारण ही ऐसा मालूम हुआ, मगर रंग तपे-सोने जैसा। ऑंखें, भौहें, चेहरा और ललाट की बनावट निर्दोष। वास्तव में, पुरुष का इतना रूप मैंने कभी देखा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ। उसका गेरुआ परिधान-वस्त्र जगह-जगह फटा हुआ है, गाँठें बँधी हुई हैं। बदन पर गेरुआ ढीला कुरता है, उसकी भी यही दशा है; पैरों में पंजाबी जूता है, उसकी हालत भी वैसी ही है। खो जाने पर उसके लिए अफसोस करने की जरूरत नहीं। राजलक्ष्मी ने ज़मीन से सिर टेककर प्रणाम करके आसन बिछा दिया। फिर मुँह उठाकर कहा, “मैं जब तक भोजन परोसने की तैयारी करूँ, तब तक आपको मुँह-हाथ धोने के लिए जल दिया जाय।”साधु ने कहा, “हाँ हाँ, लेकिन आपके पास मैं दूसरे ही काम के लिए आया था।”राजलक्ष्मी ने कहा, “अच्छी बात है, आप भोजन करने बैठिए, और बातें पीछे होंगी। पर लौटने के लिए टिकट ही चाहिए न? सो मैं खरीद दूँगी।” इतना कहकर उसने मुँह फेरकर अपनी हँसी छिपा ली।साधुजी ने गम्भीरता के साथ जवाब दिया, “नहीं, उसकी जरूरत नहीं। मुझे खबर मिली है कि आप लोग गंगामाटी जा रहे हैं। मेरे साथ एक भारी बॉक्स है, उसे अगर आप अपनी गाड़ी में ले चलें तो अच्छा हो। मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।”राजलक्ष्मी ने कहा, “इसमें कौन-सी बड़ी बात है; मगर आप खुद?”“मैं पैदल ही जा सकता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, छै-सात कोस ही तो होगा।”राजलक्ष्मी ने और कुछ न कहकर रतन को बुला के जल देने के लिए कहा और खुद ढंग के साथ अच्छी तरह साधुजी के लिए भोजन परोसने में लग गयी। यह राजलक्ष्मी की खास अपनी चीज है, इस काम में उसका सानी मिलना मुश्किल है।साधु महाराज खाने बैठे, मैं भी बैठ गया। राजलक्ष्मी मिठाई के बर्तन लिये पास ही बैठी रही। दो ही मिनट बाद राजलक्ष्मी ने धीरे-से पूछा, “साधुजी, आपका नाम?”साधु ने खाते खाते कहा, “वज्रानन्द।”राजलक्ष्मी ने कहा, “बाप रे बाप! और पुकारने का नाम?”उसके कहने के ढंग से मैंने उसकी तरफ देखा तो उसका सारा चेहरा दबी हुई मुस्कराहट से चमक उठा था, मगर वह हँसी नहीं। मैंने भोजन करने में मन लगाया। साधुजी ने कहा, “उस नाम के साथ तो अब कोई सम्बन्ध नहीं रहा। न अपना रहा और न दूसरों का।”राजलक्ष्मी ने सहज ही हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “हाँ, सो तो ठीक है।” परन्तु क्षण-भर बाद वह फिर पूछ बैठी, “अच्छा साधुजी, आपको घर से भागे कितने दिन हुए?”प्रश्न बहुत ही अभद्र था। मैंने निगाह उठाकर देखा, राजलक्ष्मी के चेहरे पर हँसी तो नहीं है, पर जिस प्यारी के चेहरे को मैं भूल गया था, इस समय राजलक्ष्मी की तरफ देखकर निमेष-मात्र में वही चेहरा मुझे याद आ गया। उन पुराने दिनों की सारी सरसता उसकी ऑंखों, मुँह और कण्ठ-स्वर में मानो सजीव होकर लौट आई है।साधु ने एक कौर नीचे उतारकर कहा, “आपका यह कुतूहल ही अनावश्यक है।”राजलक्ष्मी जरा भी क्षुण्ण नहीं हुई, भले मानसों की तरह सिर हिलाकर बोली, “सो तो सच है। लेकिन, एक बार मुझे बहुत भुगतना पड़ा था, इसी से...” कहते हुए उसने मेरी ओर लक्ष्य करके कहा, “हाँ जी, तुम अपना वह ऊँट और टट्टू का किस्सा तो सुनाना! साधुजी को जरा सुना तो दो, अरे रे, भगवान भरोसा! घर में शायद कोई याद कर रहा है।”साधुजी के गले में, शायद हँसी रोकने में ही, फन्दा लग गया। अब तक मेरे साथ उनकी एक भी बात नहीं हुई थी, मालकिन महोदय की ओट में मैं कुछ-कुछ अनुचर-सा ही बना बैठा था। अब साधुजी ने फन्दे को सँभालते हुए यथासाध्या गम्भीरता के साथ मुझसे पूछा, “तो आप भी शायद एक बार सन्यासी...”मेरे मुँह में पूड़ी थी, ज्यादा बात करने की गुंजाइश न थी, इसलिए दाहिने हाथ की चार उँगलियाँ उठाकर गरदन हिलाते हुए मैंने कहा, “उँहूँ...एक बार नहीं, एक बार नहीं...”अब तो साधुजी की गम्भीरता न टिक सकी, वे और राजलक्ष्मी दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े। हँसी थमने पर साधुजी ने कहा, “लौट क्यों आये?”मैं अब तक पूड़ी का कौर लील न सका था, सिर्फ इशारे से राजलक्ष्मी को दिखा दिया।राजलक्ष्मी ने मुझे डाँट-सा दिया, कहा, “हाँ, सो तो ठीक है! अच्छा, एक बार मान लिया मेरे लिए ही, सो भी ठीक सच नहीं है, असल में जबरदस्त बीमारी की वजह से ही।- मगर और तीन बार?”मैंने कहा, “वह भी लगभग ऐसे ही कारण से, मच्छड़ों के मारे। मच्छड़ों का काटना चमड़े से बरदाश्त नहीं हुआ। अच्छा...”साधु ने हँसकर कहा, “मुझे आप वज्रानन्द ही कहा कीजिएगा। आपका नाम...”मुझसे पहले राजलक्ष्मी ने ही जवाब दिया। बोली, “इनके नाम से क्या होगा। उमर में ये बहुत बड़े हैं, इन्हें आप भइया कहा कीजिएगा। और मुझे भी भाभी कहें तो मैं नाराज न हूँगी। मैं भी तो उमर में तुमसे चार-छै साल बड़ी ही हूँगी।”साधुजी का चेहरा सुर्ख हो उठा। मैंने भी इतनी आशा नहीं की थी। आश्चर्य के साथ मैंने देखा कि वही है। वही स्वच्छ, सरल, स्नेहातुर, आनन्दमयी। वही जिसने मुझे किसी भी तरह श्मशान में नहीं जाने दिया और किसी भी हालत में राजा के संसर्ग में नहीं टिकने दिया,- यह वही है। जो लड़का अपने कहीं के स्नेह-बन्धन को तोड़कर चला आया है, उसकी सम्पूर्ण अज्ञात वेदना ने राजलक्ष्मी के समस्त हृदय को मथ डाला है। किसी भी तरह इसे वह फिर से घर लौटा देना चाहती है।साधु बेचारे ने लज्जा के धक्के को सँम्हाजलते हुए कहा, “देखिए, भइया कहने में मुझे ऐसी कोई आपत्ति नहीं, मगर हम सन्यासी लोगों को किसी को इस तरह नहीं पुकारना चाहिए।”राजलक्ष्मी लेशमात्र भी अप्रतिभ ने हुई। बोली, “क्यों नहीं! भइया की बहू को सन्यासी लोग कोई मौसी कहकर तो पुकारते नहीं, और बुआ कहते हों सो भी नहीं, इसके सिवा मुझे तुम और क्या कहकर पुकार सकते हो?”लड़का निरुपाय होकर अन्त में सलज्ज हँसते हुए चेहरे से बोला, “अच्छी बात है। छै-सात घण्टे और भी हूँ आपके साथ, इस बीच में अगर जरूरत पड़ी तो वही कहूँगा।”राजलक्ष्मी ने कहा, “तो कहो न एक बार!”साधु हँस पड़े, बोले, “जरूरत पड़ेगी तो कहूँगा, झूठमूठ पुकारना ठीक नहीं।”राजलक्ष्मी ने उसकी पत्तल में और भी चार-पाँच 'सन्देश' और बरफी परोसकर कहा, “अच्छा, उसी से मेरा काम चल जायेगा। मगर जरूरत पड़ने पर मैं क्या कहकर तुम्हें बुलाऊँ, सो कुछ समझ में नहीं आता।” फिर मेरी तरफ इशारा करके कहा, “इन्हें तो बुलाया करती थी। 'सन्यासी महाराज' कह के। सो अब हो नहीं सकता, घुटाला हो जायेगा। अच्छा, तो मैं तुम्हें 'साधु देवर' कहा करूँ, क्या कहते हो?”साधुजी ने आगे तर्क नहीं किया, अत्यन्त गम्भीरता के साथ कहा, “अच्छा, सो ही सही।”वे और बातों में चाहे जैसे हों, पर देखा कि खाने-पीने के मामले में उन्हें काफी रसज्ञता है। पछाँह की उमदा मिठाइयों की वे कदर करते हैं, और यही वजह है कि किसी वस्तु का उन्होंने असम्मान नहीं किया। एक तो बड़े जतन और परम स्नेह के साथ एक के बाद एक चीज परोसती जाती थी, और दूसरे सज्जन चुपचाप बिना किसी संकोच के गले के नीचे उतारते जाते थे। मगर मैं उद्विग्न हो उठा। मन-ही-मन समझ गया कि साधुजी पहले चाहे कुछ भी करते रहे हों, परन्तु, फिलहाल इन्हें ऐसी उपादेय भोज्य सामग्री इतनी ज्यादा तादाद में सेवन करने का मौका नहीं मिला है। परन्तु, कोई अगर अपनी दीर्घकाल व्यापी त्रृटि को एक ही बार में एक साथ दूर करने का प्रयत्न करे, तो उसे देखकर दर्शकों के लिए धैर्य की रक्षा करना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है। लिहाजा राजलक्ष्मी के और भी कई पेड़े और बरफी साधुजी की पत्तल में रखते ही अनजान में मेरी नाक और मुँह से एक साथ इतना बड़ा दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ा कि राजलक्ष्मी और उसके नये कुटुम्बी दोनों ही चौंक पड़े। राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखकर झटपट कह उठी, “तुम कमजोर आदमी हो, चलो उठकर मुँह-हाथ धो लो। हम लोगों के साथ बैठे रहने की क्या जरूरत है?”साधुजी ने एक बार मेरी तरफ, और फिर राजलक्ष्मी की तरफ और उसके बाद मिठाई वाले बरतन की तरफ देखकर हँसते हुए कहा, “गहरी साँस लेने की तो बात ही है भाई, कुछ भी तो नहीं बचा!”“अभी बहुत है” कहकर राजलक्ष्मी मेरी ओर क्रुद्ध दृष्टि देखकर रह गयी।ठीक इसी समय रतन पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला, “चिउड़ा तो बहुत मिलता है, पर दूध या दही कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं मिला।”साधु बेचारे अत्यन्त लज्जित होकर बोले, “आप लोगों के आतिथ्य पर मैंने बड़ा अत्याचार किया है,” यह कहकर वे सहसा उठना ही चाहते थे कि राजलक्ष्मी व्याकुल होकर कहने लगी, “मेरे सर की कसम है लालाजी, अगर उठे। कसम खाती हूँ, मैं सब उठा के फेंक दूँगी।”साधु क्षण-भर तो विस्मय से शायद यही सोचते रहे कि यह कैसी स्त्री है जो दो घड़ी की जान-पहिचान में ही इतनी गहरी घनिष्ठ हो उठी। राजलक्ष्मी की प्यारी का इतिहास जो नहीं जानता उसके लिए तो यह आश्चर्य की बात है ही।इसके बाद वह जरा हँसकर बोले, “मैं सन्यासी आदमी ठहरा, खाने-पीने में मुझे कोई हिचक नहीं है; मगर आपको भी कुछ खाना चाहिए। मेरी कसम खाने से तो पेट भर नहीं जायेगा?”राजलक्ष्मी ने दाँतों-तले जीभ दबाकर गम्भीरता के साथ कहा, “छि छि, ऐसी बात औरतों से नहीं कहना चाहिए, लालाजी। मैं यह सब कुछ नहीं खाती, मुझसे बरदाश्त नहीं होता। नौकर, तो उनके लिए काफी है। आज रात-भर की ही बात है, जो कुछ मिल जाय, मुट्ठी-भर चिउड़ा-इउड़ा खाकर जरा पानी पी लेने से ही मेरा काम चल जायेगा। लेकिन, तुम अगर भूखे उठ गये, तो थोड़ा-बहुत जो कुछ मैं खाती हूँ सो भी न खाऊँगी। विश्वास न हो तो इनसे पूछ लो।” इतना कहकर उसने मुझसे अपील की। मैंने कहा, “यह बात सच है, इसे मैं हलफ उठाकर कहने को तैयार हूँ। साधुजी, झूठमूठ बहस करने से कोई लाभ नहीं। भाई साहब, बन सके तो बर्तन को औंधा करके उड़ेलवाने तक सेवन करते चले जाओ; नहीं तो, फिर यह किसी काम में ही नहीं आयेगा। यह सब सामान रेलगाड़ी में आया है। लिहाजा भूखों मर जाने पर भी कोई इन्हें तिल-भर भी नहीं खिला सकता। यह ठीक बात है।”साधु ने कहा, “मगर यह मिठाई तो गाड़ी की छुई हुई नहीं मानी जाती!”मैंने कहा, “इसकी मीमाँसा तो मैं इतने दिनों में भी खतम न कर सका भाई साहब, तब तुम क्या एक ही बैठक में फैसला कर डालोगे? इससे तो बल्कि हाथ का काम खतम करके उठ बैठना अच्छा, नहीं तो सूरज डूब जाने पर शायद चिउड़ा पानी भी गले से नीचे उतारने की नौबत न आयेगी। मेरा कहना है कि दो-चार घण्टे तो तुम साथ में हो ही, शास्त्र का विचार समझा सको तो रास्ते में समझा देना, उससे काज न होगा ता कम-से-कम अकाज न बढ़ेगा। इस वक्त जो हो रहा है, वही होने दो।”साधु ने पूछा, “तो क्या दिन-भर से इन्होंने कुछ खाया ही नहीं?”मैंने कहा, “नहीं। इसके सिवा कल भी क्या जाने क्या था, सुन रहा हूँ कि दो-चार फल-फूल के सिवा कल भी और कुछ मुँह में नहीं दिया है।”रतन पीछे ही खड़ा था, गरदन हिलाकर क्या जाने क्या कहते-कहते, शायद मालकिन की ऑंख के गुप्त इशारे से सहसा रुक गया।साधु ने राजलक्ष्मी की ओर देखकर कहा, “इससे आपको कष्ट नहीं होता?”उत्तर में राजलक्ष्मी सिर्फ जरा हँस दी, परन्तु मैंने कहा, “इस बात को आप प्रत्यक्ष और अनुमान किसी तरह भी नहीं जान सकते। हाँ, ऑंखों से जो कुछ देखा है उसमें, शायद, दो-एक दिन और भी जोड़े जा सकते हैं।”राजलक्ष्मी ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “तुमने देखा है ऑंखों से?- कभी नहीं।”मैंने इसका जवाब नहीं दिया, और साधुजी ने भी फिर कोई प्रश्न नहीं किया। समय की तरफ खयाल करके वे चुपचाप भोजन समाप्त करके उठ बैठे।रतन और उसके साथी दो जनों को खाते-पीते बहुत देर हो गयी। राजलक्ष्मी ने अपने लिए क्या व्यवस्था की, सो वही जाने। हम लोग गंगामाटी के लिए जब रवाना हुए तब शाम हो चुकी थी। एकादशी का चाँद अब तक उज्ज्वल न हुआ था, और अन्धकार भी कहीं कुछ न था। असबाब की दोनों गाड़ियाँ सबसे पीछे, राजलक्ष्मी की गाड़ी बीच में और हम लोगों की गाड़ी अच्छी होने के कारण सबसे आगे थी। साधुजी को पुकारकर मैंने कहा, “भाई साहब, पैदल तो चलते ही रहते हो, इसकी तुम्हें कोई कमी नहीं, आज-भर के लिए, न हो तो, मेरी ही गाड़ी पर आ जाओ।”साधु ने कहा, “साथ ही तो चल रहे हैं, न चल सकूँगा तो बैठ लूँगा, मगर अभी जरा पैदल ही चलूँ।”राजलक्ष्मी ने मुँह निकालकर कहा, “तो तुम मेरे बॉडी-गार्ड होकर चलो लालाजी, तुम्हारे साथ बातचीत करती हुई चलूँगी।” यह कहकर उसने साधुजी को अपनी गाड़ी के पास बुला लिया। सामने ही मैं था। बीच-बीच में गाड़ी, बैल और गाड़ीवानों के सम्मिलित उपद्रव से उनकी बातचीत के किसी-किसी अंश से वंचित होने पर भी अधिकांश सुनता हुआ चला।राजलक्ष्मी ने कहा, “घर तुम्हारा इधर नहीं है, हमारे ही देश की तरफ है, सो तो मैं तुम्हारी बात सुनकर ही समझ गयी थी, मगर आज कहाँ चले हो, सच्ची-सच्ची बताना भाई।”साधु ने कहा, “गोपालपुर।”राजलक्ष्मी ने पूछा, “हमारी गंगामाटी से वह कितनी दूर है?”साधु ने जवाब दिया, “आपकी गंगामाटी भी मुझे नहीं मालूम, और अपने गोपालपुर से भी वाकिफ नहीं; लेकिन हाँ, होंगे दोनों पास ही पास। कम-से-कम सुना तो ऐसा ही है।”“तो फिर इतनी रात में कैसे तो गाँव पहिचानोगे, और कैसे उनका घर ढूँढ़ निकालोगे जिनके यहाँ जा रहे हो?”साधुजी ने जरा हँसकर कहा, “गाँव पहिचानने में दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि रास्ते पर ही शायद एक सूखा तालाब है, उसके दक्खिन कोस-भर चलने से ही वह मिल जायेगा। और घर ढूँढ़ने की तो तकलीफ उठानी ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि सभी अनजान हैं। मगर हाँ, पेड़ के नीचे तो जगह मिल ही जायेगी, इसकी पूरी उम्मीद है।”राजलक्ष्मी ने व्याकुल होकर कहा, “ऐसे जाड़े की रात में पेड़ तले? इस जरा-से कम्बल पर भरोसा रखके? इसे मैं हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती, समझे लालाजी!”उसके उद्वेग ने मानो मुझ तक को चोट पहुँचाई। साधु कुछ देर चुप रहकर धीरे-से बोले, “मगर हम लोगों के तो घर-द्वार नहीं है, हम लोग तो पेड़ तले ही रहा करते हैं, जीजी।”अबकी बार राजलक्ष्मी भी क्षण-भर मौन रहकर बोली, “सो जीजी की ऑंखों के सामने नहीं। रात के वक्त भाई को मैं निराश्रय नहीं छोड़ सकती। आज मेरे साथ चलो, कल मैं खुद ही तैयारी करके भेज दूँगी।”साधु चुप रहे। राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर कह दिया कि बिना उनसे पूछे गाड़ी की कोई चीज स्थानान्तरित न की जाय। अर्थात् सन्यासी महाराज का बॉक्स आज रात-भर के लिए रोक रक्खा गया।मैंने कहा, “तो फिर क्यों झूठमूठ को ठण्ड में तकलीफ उठा रहे हो भाई साहब, आ जाओ न मेरी गाड़ी में।”साधु ने जरा कुछ सोचकर कहा, “अभी रहने दो। जीजी के साथ ज़रा बातचीत करता हुआ चल रहा हूँ।”मैंने भी सोचा कि ठीक है और ताड़ गया कि अभी साधु बाबा के मन में नये सम्बन्ध को अस्वीकार करने का द्वन्द्व चल रहा है। मगर फिर भी, अन्त तक बचाव न हो सका। सहसा, जबकि उन्होंने अंगीकार कर ही लिया, तब बार-बार मेरे मन में आने लगा कि जरा सावधान करके उनसे कह दूँ, 'महाराज, भाग जाते तो अच्छा होता। अन्त में कहीं मेरी-सी दशा न हो!'लेकिन, मैं चुप ही रहा।दोनों की बातचीत धड़ल्ले से होने लगी। बैलगाड़ी के झकझोरों और ऊँघाई के झोंकों में, बीच-बीच में उनकी बातचीत का सूत्र खोते रहने पर भी, कल्पना की सहायता से उसे पूरा करते हुए रास्ता तय करने में मेरा समय भी बुरा नहीं बीता।शायद मैं जरा तन्द्रा-मग्न हो गया, सहसा सुना, पूछा जा रहा है, “क्यों आनन्द, तुम्हारे उस बॉक्स में क्या-क्या है, भाई?”उत्तर मिला, “कुछ किताबें और दवा-दारू है जीजी।”“दवा-दारू क्यों? तुम क्या डॉक्टर हो?”“मैं तो सन्यासी हूँ। अच्छा, आपने क्या सुना नहीं जीजी, आपके उस तरफ हैजा फैल रहा है?”“नहीं तो। यह बात तो हमारे गुमाश्ते ने नहीं जताई। अच्छा, लालाजी, तुम हैजे को आराम कर सकते हो?”साधुजी ने जरा मौन रहकर कहा, “आराम करने के मालिक तो हम लोग नहीं दीदी, हम लोग तो सिर्फ दवा देकर कोशिश कर सकते हैं। मगर इसकी भी जरूरत है, यह भी उन्हीं का आदेश है।”राजलक्ष्मी ने कहा, “सन्यासी भी दवा दिया करते हैं, ठीक है, मगर सिर्फ दवा देने ही के लिए सन्यासी नहीं बना जाता। अच्छा आनन्द, तुम क्या सिर्फ इसीलिए सन्यासी हुए हो भइया?”साधु ने कहा, “सो मैं ठीक नहीं जानता जीजी, मगर हाँ, देश की सेवा करना भी हम लोगों का एक व्रत है।”“हम लोगों का? तो शायद तुम लोगों का एक दल होगा न, लालाजी?”साधु कुछ जवाब न देकर चुप बने रहे। राजलक्ष्मी ने फिर पूछा, “लेकिन सेवा करने के लिए सो सन्यासी होने की जरूरत नहीं होती, भाई। तुम्हें यह मति बुद्धि दी किसने, बताओ तो?”साधुजी ने इस प्रश्न का शायद उत्तर नहीं दिया, क्योंकि, कुछ देर तक किसी की कोई बात सुनने में नहीं आई। दसेक मिनट बाद कान में भनक पड़ी, साधुजी कह रहे हैं, 'जीजी, मैं बहुत ही क्षुद्र सन्यासी हूँ। मुझे यह नाम न भी दिया जाय तो ठीक है। मैंने तो सिर्फ अपना थोड़ा-सा भार फेंककर उसकी जगह दूसरों का बोझ लाद लिया है।”राजलक्ष्मी कुछ बोली नहीं, साधुजी कहने लगे, “मैं शुरू से ही देख रहा हूँ कि आप मुझे बराबर घर लौटाने की कोशिश कर रही हैं। मालूम नहीं क्यों, शायद जीजी होने की वजह से ही। परन्तु जिनका भार लेने के लिए हम घर छोड़कर निकल आये हैं वे कितने दुर्बल, कितने रुग्ण, कैसे निरुपाय और कितनी संख्या में हैं, यह अगर किसी तरह एक बार जान जातीं, तो उस बात को फिर मन में भी ला नहीं सकतीं।”इसका भी राजलक्ष्मी ने कुछ उत्तर नहीं दिया; परन्तु मैं समझ गया कि जो प्रसंग छिड़ा है, उसमें अब दोनों के मन और मत के भेद होने में देर नहीं होगी। साधुजी ने भी ठीक जगह पर ही चोट की है। देश की आभ्यन्तरिक अवस्था और उसके सुख, दु:ख, अभाव को मैं खुद भी कुछ कम नहीं जानता; मगर ये सन्यासी कोई भी क्यों न हों, इन्होंने अपनी इस थोड़ी-सी उमर में मुझसे बहुत ज्यादा और घनिष्ठ भाव से सब देखा-भाला है और बहुत विशाल हृदय से उसे अपनाया है। सुनते-सुनते ऑंखों की नींद ऑंसुओं में परिवर्तित हो गयी और सारा हृदय क्रोध, क्षोभ, दु:ख और व्यथा से मानो मथा जाने लगा। पीछे की गाड़ी के अंधेरे कोने में अकेली बैठी हुई राजलक्ष्मी ने एक प्रश्न तक नहीं किया, इतनी बात में से एक भी बात में उसने साथ नहीं दिया। उसकी नीरवता से साधु महाराज ने क्या सोचा होगा सो वे ही जानें; परन्तु, इस एकान्त स्तब्धता का सम्पूर्ण अर्थ मुझसे छिपा न रहा।'देश' के मानी हैं वे गाँव जहाँ देश के चौदह आने नर-नारी वास करते हैं। उन्हीं गाँवों की कहानी साधु कहने लगे। देश में पानी नहीं है, प्राण नहीं हैं, स्वास्थ्य नहीं है, जंगल की गन्दगी से जहाँ मुक्त प्रकाश और साफ हवा का मार्ग रुका हुआ है- जहाँ ज्ञान नहीं, जहाँ विद्या नहीं, धर्म भी विकृत और पथभ्रष्ट है : मृतकल्प जन्म-भूमि के इस दु:ख का विवरण छापे के अक्षरों में भी पढ़ा है और अपनी ऑंखों से भी देखा है, परन्तु यह न होना, कितना बड़ा 'न होना' है, इस बात को, मालूम हुआ कि, आज से पहले जानता ही न था। देश की यह दीनता कितनी भयंकर दीनता है, आज से पहले मानो उसकी धारणा भी मुझे न थी। सूखे सूने विस्तृत मैदान में से हम लोग गुजर रहे हैं। सड़क की धूल ओस से भीगकर भारी हो गयी है। उस पर गाड़ी के पहियों और बैलों के खुरों का शब्द कदाचित् ही सुनाई दे रहा है। आकाश की चाँदनी पाण्डुर होकर जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ तक फैल रही है। इसी के भीतर के शीतऋतु के इस निस्तब्ध निशीथ में हम लोग अज्ञात की ओर धीर मन्थर गति से लगातार चल रहे हैं; अनुचरों में से कौन जाग रहा है और कौन नहीं, सो भी नहीं मालूम होता, सभी कोई शीत-वस्त्रों से अपना सर्वाक्ष् ढके हुए चुपचाप पड़े हैं। सिर्फ अकेले सन्यासीजी ही हमारे साथ सजग चल रहे हैं और इस परिपूर्ण स्तब्धता में सिर्फ उन्हीं के मुँह से देश के अज्ञात भाई-बहनों की असह्य वेदना का इतिहास मानो लपटें ले-लेकर जल-जलकर निकल रहा है। यह सोने की भूमि किस तरह धीरे-धीरे ऐसी शुष्क, ऐसी रिक्त हो गयी, कैसे देश की समस्त सम्पदा विदेशियों के हाथ में पड़कर धीरे-धीरे विदेश में चली गयी, किस तरह मातृ-भूमि के समस्त मेद-मज्जा और रक्त को विदेशियों ने शोषण कर लिया, इसके ज्वलन्त इतिहास को मानो वह युवक ऑंखों के सामने एक-एक करके उद्धाटित करके दिखलाने लगा।सहसा साधु ने राजलक्ष्मी को सम्बोधन करके कहा, “मालूम होता है, तुम्हें मैं पहिचान सका हूँ जीजी। मन में आता है, तुम जैसी बहिनों को ले जाकर तुम्हारी अपनी ऑंखों के सामने तुम्हारे उन सब भाई-बहनों को दिखलाऊँ।”राजलक्ष्मी से पहले तो कुछ बोला न गया, बाद में रुँधे हुए गले से वह बोली, “मुझे क्या ऐसा मौका मिल सकता है, आनन्द? मैं जो औरत हूँ, इस बात को मैं कैसे भूलूँ, भइया?”साधु ने कहा, “क्यों नहीं मिल सकता बहन? और, तुम औरत हो, इस बात को ही यदि भूल जाओगी तो कष्ट उठाकर तुम्हें वह सब दिखाने से मुझे लाभ ही क्या होगा?”♦♦ • ♦♦साधु ने पूछा, “गंगामाटी क्या तुम्हीं लोगों की जमींदारी है, जीजी?” राजलक्ष्मी ने जरा मुसकराकर कहा, “देखते क्या हो भाई, हम एक बड़े भारी जमींदार हैं।”अबकी बार जवाब देने में साधु भी जरा हँस पड़ा। बोला, “बड़ी भारी जमींदारी, लेकिन, बड़ा भारी सौभाग्य नहीं है, जीजी।” उसकी बात से उसकी पार्थिव अवस्था के सम्बन्ध में मुझे एक तरह का सन्देह उत्पन्न हुआ, परन्तु राजलक्ष्मी उस दिशा की ओर नहीं गयी। उसने सरल भाव से तत्क्षण स्वीकार करते हुए कहा, “बात तो सच है आनन्द। यह सब जितनी ही दूर हो जाय, उतना अच्छा।”“अच्छा जीजी, वे अच्छे हो जाँयगे तो फिर तुम अपने शहर को लौट आओगी?”“लौट जाऊँगी? मगर वह तो बहुत दूर की बात है भाई!”साधु ने कहा, “बन सके तो अब मत लौटना, जीजी। इन सब गरीब अभागों को तुम लोग छोड़कर चली गयी हो, इसी से तो इनका दु:ख कष्ट चौगुना बढ़ गया है। जब पास थीं तब भी तुमने इन्हें कष्ट न दिया हो सो बात नहीं, मगर दूर रहकर इतना निर्मम दु:ख उन्हें न दे सकी होगी। तब जैसे दु:ख दिया है; वैसे दु:ख बँटाया भी है। जीजी, देश का राजा अगर देश ही में रहे तो देश का दु:ख-दैन्य शायद इस तरह गले तक न भर उठा करे। और, इस 'गले तक भरने' का मतलब क्या है और तुम लोगों को शहर-वास के लिए सर्व प्रकार आहार-विहार का सामान जुटाने का अभाव और अपव्यय क्या है, इस चीज को अगर एक बार ऑंखें पसारकर देख सकतीं जीजी...”“क्यों आनन्द, घर के लिए तुम्हारा मन चंचल नहीं होता?...”साधु ने संक्षेप में कहा, “नहीं।”वह बेचारा समझा नहीं, परन्तु मैं समझ गया कि राजलक्ष्मी ने उस प्रसंग को दबा दिया, महज इसलिए कि उससे सहा नहीं जाता था।कुछ देर मौन रहकर राजलक्ष्मी ने व्यथित कण्ठ से पूछा, “घर पर तुम्हारे कौन-कौन हैं?”साधु ने कहा, “मगर घर तो मेरा अब रहा नहीं।”राजलक्ष्मी फिर बहुत देर तक नीरव रहकर बोली, “अच्छा आनन्द, इस उमर में सन्यासी होकर क्या तुमने शान्ति पाई है?”साधु ने हँसकर कहा, “अरे बाप रे! सन्यासी को इतना लोभ! नहीं जीजी, मैंने तो दूसरों के दु:ख का थोड़ा-सा भार लेना चाहा है, और सिर्फ वही पाया है।”राजलक्ष्मी फिर चुप रही। साधु ने कहा, “वे शायद सो गये होंगे, लेकिन अब जरा उनकी गाड़ी में जाकर बैठूँ। अच्छा जीजी, कभी दो-चार दिन के लिए अगर तुम लोगों का अतिथि बनकर रहूँ तो क्या वे नाराज होंगे?”राजलक्ष्मी ने कहा, “वे कौन? तुम्हारे भाईसाहब?”साधुजी ने जरा हँसकर कहा, “अच्छा, यही सही।”राजलक्ष्मी ने कहा, “और मैं नाराज हूँगी या नहीं, सो तो पूछा ही नहीं। अच्छा, पहले चलो तो एक बार गंगामाटी, उसके बाद इस बात का विचार किया जायेगा।”साधुजी ने क्या कहा, सुन न सका, शायद कुछ कहा ही नहीं। थोड़ी देर बाद मेरी गाड़ी में आकर पुकारा, “भाई साहब, आप जाग रहे हैं?”मैं जाग ही रहा था, पर कुछ बोला नहीं! फिर वे मेरे पास ही थोड़ी-सी जगह निकालकर अपना फटा कम्बल ओढ़कर पड़ रहे। एक बार तबियत तो हुई कि जरा खिसककर बेचारे के लिए थोड़ी-सी जगह और छोड़ दूँ, परन्तु हिलने-डुलने से कहीं उन्हें शक न हो जाय कि मैं जाग रहा हूँ या मेरी नींद उचट गयी है और इस गम्भीर निशीथ में फिर एक बार देश की सुगम्भीर समस्या की आलोचना होने लगे, इस डर से मैंने करुणा प्रकट करने की चेष्टा तक न की।गाड़ी ने गंगामाटी में कब प्रवेश किया मुझे नहीं मालूम; मुझे तो तब मालूम हुआ जब गाड़ी नये मकान के दरवाजे पर जा खड़ी हुई। तब सबेरा हो चुका था। एक साथ चार बैलगाड़ियों के विविध और विचित्र कोलाहल से चारों तरफ भीड़ तो कम नहीं मालूम हुई। रतन की कृपा से पहले ही सुन चुका था कि गाँव में मुख्यत: छोटी जात ही बसती है। देखा कि नाराजगी में भी उसने बिल्कुचल झूठ नहीं कहा था। ऐसे जाड़े-पाले में तड़के ही पचास-साठ नाना उमर के लड़के-लड़कियाँ, नंग-धड़ंग और उघड़े बदन, शायद हाल ही सोते से उठकर तमाशा देखने के लिए जमा हो गये हैं। पीछे से बाप-महतारियों का झुण्ड भी यथा-योग्य स्थान से ताक-झाँक रहा है। उन सबकी आकृति और पहनावा देखकर उनकी कुलीनता के बारे में और किसी के मन में चाहे हुछ भी हो, मगर, रतन के मन में शायद संशय की भाप भी बाकी न रही। उसका सोते से उठा हुआ चेहरा निमेष-मात्र में विरक्ति और क्रोध से बर्रों के छत्ते के समान भीषण हो उठा। मालकिन के दर्शन करने की अतिव्यग्रता से कुछ लड़के-बाले कुछ आत्म-विस्तृत होकर सटते आ रहे थे। देखते ही रतन ने ऐसे बिकट-रूप से उन्हें धर-खदेड़ा कि सामने अगर दो गाड़ीवान न होते तो वहीं एक खून-खराबी हुई धरी थी। रतन को जरा भी लज्जा का अनुभव न हुआ। मेरी तरफ देखकर बोली, “दुनिया की छोटी जात सब यहीं आकर मरी है! देखी बाबूजी, छोटी जात की हिमाकत? जैसे रथ-यात्रा देखने आए हों! हमारे यहाँ के भले आदमी क्या यहाँ आकर रह सकते हैं बाबूजी? अभी सब छू-छा करके एकाकार कर देंगे।”'छू-छा' शब्द सबसे पहले पहुँचा राजलक्ष्मी के कानों में। उसका चेहरा अप्रसन्न-सा हो गया।साधुजी अपना बॉक्स उतारने में व्यस्त थे। अपना काम खतम करके वे एक लोटा निकालकर आगे बढ़ आये और पास ही जिस लड़के को पाया उसका हाथ पकड़कर बोले, “अरे लड़के, जा तो भइया, यहाँ कहीं अच्छा-सा तालाब-आलाब हो हो तो एक लोटा पानी तो ले आ, चाय बनानी है।” यह कहकर उन्होंने लोटा उसके हाथ में थमा दिया, फिर सामने खड़े हुए एक अधेड़ उमर के आदमी से कहा, “चौधरी, आसपास किसी के यहाँ गाय हो तो बता देना भइया, छटाक-भर दूध माँग लाऊँ। गाँव की ताजी खालिस चीज ठहरी, चाय का रंग ऐसा बढ़िया आयेगा जीजी...” फिर उन्होंने एक बार अपनी जीजी के चेहरे की तरफ देखा। मगर 'जीजी' ने इस उत्साह में जरा भी साथ नहीं दिया। अप्रसन्न मुख से जरा मुसकराकर कहा, “रतन, जा तो भइया, लोटा माँजकर जरा पानी तो ले आ।”रतन के मिजाज का संवाद पहले ही दे चुका हँ। उसके बाद जब उस पर ऐसे जाड़े-पाले में न जाने कौन एक अनजान साधु के लिए, मालूम नहीं कहाँ के तालाब से, पानी लाने का भार पड़ा, तब वह अपने को न रोक सका। एक ही क्षण में उसका सारा गुस्सा जाकर पड़ा, उससे भी जो छोटा था, उस अभागे लड़के पर। वह उसे एक जोर की धमकी देकर बोला, “पाजी बदमाश कहीं का, लोटा क्यों छुआ तूने? चल हरामजादे, लोटा माँजकर पानी में डुबो देना।” इतना कहकर मानो वह सिर्फ अपनी ऑंख-मुख की चेष्टा से ही लड़के को गरदनियाँ देता हुआ ले गया।उसकी करतूत देखकर साधु हँस पड़े, मैं भी हँस दिया। राजलक्ष्मी ने खुद भी जरा सलज्ज हँसी हँसकर कहा, “गाँव में तुमने तो उथल-पुथल मचा दी आनन्द, साधुओं को शायद रात बीतने के पहले ही चाय चाहिए?”साधु ने कहा, “गृहस्थों के लिए रात नहीं बीती तो क्या हम लोगों के लिए भी नहीं बीतेगी? खूब। लेकिन दूध की तजवीज तो होनी चाहिए। अच्छा, घर में घुसकर देखा तो जाय, लकड़ी-बकड़ी, चूल्हा-ऊल्हा कुछ है या नहीं। ओ चौधरी, चलो न भइया, किसके यहाँ गाय है, चलके जरा दिखा दो। जीजी, कल के उस बर्तन में बरफी-अरफी कुछ बची थी न? या गाड़ी ही में अंधेरे में उसे खतम कर दिया!राजलक्ष्मी को हँसी आ गयी। मुहल्ले की जो दो-चार औरतें दूर खड़ी देख रही थीं, उन्होंने मुँह फेर लिया।इतने में गुमाश्ता काशीराम कुशारी महाशय घबराये हुए आ पहुँचे। साथ में उनके तीन-चार आदमी थे; किसी के सिर पर भर-टोकनी शाक-सब्जी और तरकारी थी, किसी के हाथ में भर-लोटा दूध, किसी के हाथ में दही का बर्तन और किसी के हाथ में बड़ी-सी रोहू मछली। राजलक्ष्मी ने उन्हें नमस्कार किया। वे आशीर्वाद के साथ, अपने आने में जरा देर हो जाने के लिए, तरह-तरह की कैफियत देने लगे। आदमी तो मुझे अच्छा ही मालूम हुआ। उमर पचास से ज्यादा होगी। शरीर कुछ कृश, दाढ़ी-मूछें मुड़ी हुईं और रंग साफ। मैंने उन्हें नमस्कार किया, उन्होंने भी प्रति-नमस्कार किया। परन्तु, साधुजी इस सब प्रचलित शिष्टाचारों के पास से भी न फटके। उन्होंने तरकारी की टोकनी अपने हाथ से उतरवाकर उसमें से एक-एक का विश्लेषण करके विशेष प्रशंसा की। दूध खालिस है, इस विषय में अपना नि:संशय मत जाहिर किया और मछली के वजन का अनुमान करके उसके आस्वाद के विषय में उपस्थित सभी को आशान्वित कर दिया।साधु महाराज के शुभागमन के विषय में गुमाश्ता साहब को पहले के कुछ खबर नहीं मिली थी; इसलिए, उन्हें कुछ कुतूहल-सा हुआ। राजलक्ष्मी ने कहा, “सन्यासी को देखकर आप डरें नहीं कुशारी महाशय, ये मेरे भाई हैं।” फिर जरा हँसकर मृदु कण्ठ से कहा, “और बार-बार गेरुआ वसन छुड़वाना मानो मेरा काम ही हो गया है!”बात साधुजी के कानो में भी पड़ी। बोले, “पर यह काम उतना आसान न होगा, जीजी।” यों कहकर मेरी ओर कनखियों से देख के जरा हँसे। इसके मानी मैं भी समझ गया और राजलक्ष्मी भी। मगर प्रत्युत्तर में उसने सिर्फ जरा मुसकराकर कहा, “सो देखा जायेगा।”मकान के भीतर प्रवेश करके देखा गया कि कुशारी महाशय ने इन्तज़ाम कुछ बुरा नहीं किया है। बहुत ही जल्दी की वजह से उन्होंने खुद अन्यत्र जाकर पुराने कचहरी वाले मकान को थोड़ा-बहुत जीर्णोद्वार कराके खासा रहने- लायक बना दिया है। भीतर रसोई और भण्डार-घर के सिवा सोने के लिए दो कमरे भी हैं। कमरे हैं तो मिट्टी के ही और ऊपर है, मगर खूब ऊँचे और बड़े हैं। बाहर की बैठक भी बहुत अच्छी है। ऑंगन लम्बा-चौड़ा, साफ-सुथरा और मिट्टी की चहारदीवारी से घिरा हुआ है। एक तरफ छोटा-सा एक कुऑं है, और उसके पास ही दो-तीन तगर और शेफाली के पेड़ हैं। दूसरी तरफ बहुत-से छोटे-बड़े तुलसी के पौधों की पंक्ति है, और चार-पाँच जुही और मल्लिका के झाड़ हैं। कुल मिलाकर जगह बहुत अच्छी है, देखकर मन को तृप्ति हुई।सबसे बढ़कर उत्साह देखा गया सन्यासी महाशय में। जो कुछ उनकी निगाह में पड़ा उसी पर वह उच्च कण्ठ से आनन्द प्रकट करने लगे, जैसे ऐसा और कभी उन्होंने देखा ही न हो। मैं, शोरगुल न मचाने पर भी, मन-ही-मन खुश ही हुआ। राजलक्ष्मी अपने भइया के लिए रसोई में चाय बना रही थी, इसलिए उसके चेहरे का भाव ऑंखों से तो नहीं दिखाई दिया, परन्तु मन का भाव किसी से छिपा भी न रहा। सिर्फ साथ नहीं दिया तो एक रतन ने। वह मुँह को उसी तरह फुलाए हुए एक खम्भे के सहारे चुपचाप बैठा रहा।चाय बनी। साधुजी कल की बची हुई मिठाई के साथ चुपचाप दो प्याला चाय चढ़ाकर उठ बैठे और मुझसे बोले, “चलिए न, जरा घूम-फिर कर गाँव देख आवें। बाँध भी तो ज्यादा दूर नहीं, उधर के उधर ही नहा भी आयेंगे। जीजी, आइए न, जमींदारी देखभाल आवें। शायद शरीफ लोग तो कोई होंगे नहीं, शरम करने की भी विशेष कोई जरूरत नहीं। जायदाद है अच्छी, देख के लोभ होता है।”राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “सो तो मैं जानती हूँ। सन्यासियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।”हमारे साथ रसोइया ब्राह्मण तथा और भी एक नौकर आया था। वे दोनों रसोई की तैयारी कर रहे थे। राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं महाराज, तुम्हारे हाथ ऐसी ताजी मछली सौंपने का हियाव नहीं पड़ता, नहा के लौटने पर रसोई मैं ही चढ़ाऊँगी।” यह कहकर वह हमारे साथ चलने की तैयारी करने लगी।अब तक रतन ने किसी बातचीत या काम में साथ नहीं दिया था। हम लोग जाने लगे तो वह अत्यन्त धीर-गम्भीर स्वर में बोला, “माँ जी, उस बाँध या ताल, न जाने इस मुए देश के लोग क्या कहते हैं, उसमें आप मत नहाइएगा। बड़ी जबरदस्त जोंकें हैं उसमें, एक-एक, सुनते हैं, हाथ-हाथ भर की।”दूसरे ही क्षण राजलक्ष्मी का चेहरा मारे डर के फक पड़ गया, “कहता क्या है रतन, उसमें क्या बहुत जोंकें हैं?”रतन ने गरदन हिलाकर कहा, “जी हाँ, सुना तो ऐसा ही है।”साधु ने डपटकर कहा, “जी हाँ, सुन तो आया ही होगा! इस नाई ने सोच-सोचकर अच्छी तरकीब निकाली है!” रतन के मन का भाव और जाति का परिचय साधु ने पहले ही से प्राप्त कर लिया था; हँस के कहा, “जीजी, इसकी बात मत सुनो, चलो चलें। जोंकें हैं या नहीं, इस बात की परीक्षा न हो तो हम ही लोगों से करा लेना।”मगर उनकी जीजी एक कदम भी आगे न बढ़ीं। जोंक के नाम से एकदम अचल होकर बोलीं, “मैं कहती हूँ, आज न हो तो रहने दो, आनन्द, नयी जगह ठहरी, अच्छी तरह बिना जाने-समझे ऐसा दु:साहस करना, ठीक नहीं होगा। रतन, तू जा भइया, यहीं पर दो कलसे पानी कुऑं से ले आ।” मुझे आदेश मिला, “तुम कमजोर आदमी हो, सो कहीं किसी अनजान बाँध-ऑंध में नहा-नुहू मत आना। घर पर ही दो लोटा पानी डालकर आज का काम निकाल लेना।”साधुजी ने हँसकर कहा, “और मैं ही क्या इतना उपेक्षणीय हूँ जीजी, जो मुझे ही सिर्फ उस जोंकोंवाले तालाब में पठाए देती हो?”बात कोई बड़ी नहीं थी, मगर इतने ही से राजलक्ष्मी की ऑंखें मानो सहसा डबडबा आईं। उसने क्षण-भर नीरव रहकर, अपनी स्निग्ध दृष्टि से मानो उन्हें अभिषिक्त करते हुए कहा, “तुम तो भइया, आदमी के हाथ से बाहर हो। जिसने माँ-बाप का कहना नहीं माना, वह क्या कहीं की एक अनजान अपरिचित बहिन की बात रखेगा?”साधुजी जाने के लिए उद्यत होकर सहसा जरा ठहरकर बोले, “यह अनजान अपरिचित होने की बात मत कहो, बहिन। आप सब लोगों को पहिचानने के लिए ही तो घर छोड़कर निकला हूँ, नहीं तो मुझे इसकी क्या जरूरत थी, बताइए?” इतना कहकर वे जरा तेजी से बाहर चले गये, और मैं भी धीरे से उनके साथ हो लिया।हम दोनों ने मिलकर खूब घूम-फिर के गाँव देख-भाल लिया। गाँव छोटा है, और जिन्हें हम छोटी जात कहते हैं, उन्हीं का है। वास्तव में, दो घर तम्बोली और एक घर लुहार के सिवा गंगामाटी में ऐसा कोई घर नहीं जिसका पानी लिया जो सके। सभी घर डोम और बाउरियां के हैं। बाउरी लोग बेंत का काम और मजूरी करते हैं और डोम लोग टोकनी, सूप, डलिया वगैरह और पोड़ामाटी गाँव में बेचकर जीविका चलाते हैं। गाँव के उत्तर की तरफ पानी के निकास का जो बड़ा नाला है, उसी के उस पार पोड़ामाटी है। सुनने में आया कि वह गाँव बड़ा है, और उसमें ब्राह्मण, कायस्थ और अन्यान्य जातियों के भी बहुत-से घर हैं। अपने कुशारी महाशय का घर भी उसी पोड़ामाटी में है। मगर दूसरों की बात पीछे कहूँगा, फिलहाल अपने गाँव की जो हालत ऑंखों से देखी, उससे मेरी दृष्टि ऑंसुओं से धुँधली हो आई। बेचारों ने अपने-अपने घरों की जी-जान से छोटा बनाने की कोशिश करने में कुछ उठा नहीं रखा है, फिर भी इतने छोटे-छोटे घरों के छाने लायक सूखा घास भी इस सोने के देश में, उनके भाग्य से नहीं जुटता। बीता-भर जमीन तक किसी के पास नहीं, सिर्फ डलिया-टोकनी-सूप बनाकर और दूसरे गाँव में सद्गृहस्थों को पानी के मोल बेचकर किस तरह इन लोगों की गुजर होती है, मैं तो सोच ही न सका। फिर भी, इसी तरह इन अशुचि अस्पृश्यों के दिन कट रहे हैं और शायद इसी तरह हमेशा से कटे हैं, परन्तु किसी ने भी किसी दिन इसका जरा खयाल तक नहीं किया। सड़क के कुत्ते जैसे पैदा होकर कुछ वर्ष तक जैसे-तैसे जिन्दा रहकर न जाने कहाँ, कब कैसे मर जाते हैं-उनका जैसे कहीं कोई हिसाब नहीं रखता, इन अभागों का भी वही हाल है, मानो, देशवासियों से वे इससे ज्यादा और कुछ दावा ही नहीं कर सकते। इनका दु:ख इनकी दीनता, इनकी सब तरह की हीनता अपनी और पराई दृष्टि में इतनी सहज और स्वाभाविक हो गयी है कि मनुष्य के पास ही मनुष्य के इतने बड़े जबरदस्त अपमान से कहीं किसी के भी मन में लज्जा का रंच-मात्र भी संचार नहीं होता। मगर, साधुजी इधर जो मेरे चेहरे की तरफ देख रहे थे, सो मुझे मालूम ही नहीं हुआ। वे सहसा बोल उठे, “भाई साहब, यही है देश की सच्ची तसवीर। लेकिन, मन में मलाल लाने की जरूरत नहीं। आप सोच रहे होंगे कि ये बातें इन्हें दिन-रात सताया करती हैं, मगर यह बात कतई नहीं।”मैंने क्षुब्ध और अत्यन्त विस्मित होकर कहा, “यह बात क्या कही साधुजी?”साधुजी ने कहा, “मेरी तरह आप भी अगर सब जगह घूमा-फिरा करते भाई साहब, तो समझ जाते कि मैंने लगभग सच बात ही कही है। असल में दु:ख भोगता कौन है भइया? मन ही तो? मगर वह बला क्या हम लोगों ने बाकी छोड़ी है इनमें?- बहुत दिनों से लगातार सिकंजे में दबा-दबाकर बिल्कु'ल निचोड़ लिया है बेचारों का मन। इससे ज्यादा चाहने का अब ये खुद ही अनुचित स्पर्धा समझते हैं। वाह रे वाह! हमारे बाप-दादों ने भी सोच-विचार कर कैसी उमदा मशीन ईजाद की है, क्या कहने!” यह कहकर साधु अत्यन्त निष्ठुर की भाँति 'हा: हा:' करके हँसने लगे। मगर मैं न तो उनकी हँसी में ही शरीक हो सका, और न उनकी बात का ठीक-ठीक अर्थ ही ग्रहण कर सका, और इसलिए मन-ही-मन लज्जित हो उठा।इस साल फसल अच्छी नहीं हुई, और पानी की कमी से हेमन्त ऋतु के धान लगभग आधे सूख जाने से अभी से अभाव की हवा चलने लगी। साधुजी ने कहा, “भाई साहब, चाहे किसी बहाने ही सही, भगवान ने जब आपको अपनी प्रजा के बीच ढकेल-ढुकूलकर भेज ही दिया है, तब अचानक भाग न जाइएगा। कम-से-कम यह साल तो यहीं बिताकर जाइए। यह तो मैं नहीं सोचता कि आप विशेष कुछ कर सकेंगे, पर ऑंखों से देखकर प्रजा के दु:ख को बँटाना अच्छा है, इससे जमींदारी करने के पाप का बोझ कुछ हलका होता है।”मैंने मन-ही-मन गहरी साँस लेकर सोचा-जमींदारी और प्रजा जैसे मेरी ही हो, परन्तु जैसे पहले जवाब नहीं दिया, अबकी बार भी मैं उसी तरह चुप रह गया।छोटे से गाँव की प्रदक्षिणा करता हुआ नहा-धोकर जब वापस आया, तब बारह बज चुके थे। शाम की तरह आज भी हम दोनों को भोजन परोसकर राजलक्ष्मी एक तरफ बैठ गयी। सारी रसोई उसने खुद अपने हाथ से बनाई थी, लिहाजा मछली का मुँहड़ा और दही की मलाई साधु की पत्तल में ही पड़ी। साधुजी बैरागी आदमी ठहरे, किन्तु, सात्वि‍क, और असात्वि‍क, निरामिष और आमिष, किसी भी चीज में उनका रंचमात्र भी विराग देखने में नहीं आया, बल्कि इस विषय में उन्होंने ऐसे प्रबल अनुराग का परिचय दिया जो घोर सांसारिक में भी दुर्लभ है। चूँकि रसोई के भले-बुरे मर्म को समझने में मेरी ख्याति नहीं थी, इसलिए मुझे समझाने की तरह रसोईदारिन ने कोई आग्रह भी प्रकट नहीं किया।साधुजी को कोई जल्दी नहीं; वे बहुत ही धीरे-सुस्ते भोजन करने लगे। कौर चाबते हुए बोले, “जीजी, जगह सचमुच ही अच्छी है, छोड़कर जाने में ममता होती है।”राजलक्ष्मी ने कहा, “छोड़ जाने के लिए तो हम लोग तुमसे आरजू-बिनती नहीं कर रहे हैं, भइया!”साधुजी ने हँसकर कहा, “साधु-सन्यासी को कभी इतना प्रश्रय न देना चाहिए जीजी- ठगाई जाओगी। खैर, कुछ भी हो, गाँव अच्छा है, कहीं भी कोई ऐसा नहीं दिखाई दिया जिसके हाथ का पानी पिया जा सके। और ऐसा भी एक घर नहीं देखा जिसके छप्पर पर एक पूला सूखा घास भी दिखाई दिया हो- जैसे मुनियों के आश्रम हों।”आश्रम के साथ अस्पृश्य घरों का एक दृष्टि से जो उत्कृष्ट सादृश्य था, उसका खयाल करके राजलक्ष्मी ने जरा क्षीण हँसी हँसकर मुझसे कहा, “सुनते हैं कि सचमुच ही इस गाँव में सिर्फ छोटी जात ही बसती है-किसी के एक लोटे पानी का भी आसरा नहीं। देखती हूँ, यहाँ ज्यादा दिन रहना नहीं हो सकेगा।”साधु जरा हँसे, परन्तु मैं नीरव ही रहा। कारण राजलक्ष्मी जैसी करुणामयी भी किस संस्कार के वश इतनी बड़ी लज्जा की बात उच्चारण कर सकी, सो मैं जानता था। साधु की हँसी ने मुझे स्पर्श तो किया, किन्तु वह विद्ध न कर सकी। इसी से, मैं मुँह से तो कुछ नहीं बोला, मगर फिर भी मेरा मन राजलक्ष्मी को ही लक्ष्य करके भीतर कहने लगा, “राजलक्ष्मी, मनुष्य का कर्म ही केवल अस्पृश्य और अशुचि होता है, मनुष्य नहीं होता। नहीं तो 'प्यारी' किसी भी तरह आज फिर 'लक्ष्मी' के आसन पर वापस न आ सकती। और वह भी सिर्फ इसीलिए सम्भव हुआ है कि मनुष्य की देह को ही मनुष्य समझने की गलती मैंने कभी नहीं की। इस बात में बचपन से ही बहुत बार मेरी परीक्षा हो चुकी है। लेकिन, ये बस बातें मुँह खोलकर किसी से कही भी नहीं जा सकतीं और कहने की प्रवृत्ति नहीं होती।”दोनों भोजन समाप्त करके उठे। राजलक्ष्मी हम लोगों को पान देकर, शायद, खुद भी कुछ खाने चली गयी। परन्तु करीब घण्टे-भर बाद लौटकर जैसे वह खुद साधुजी को देखकर आसमान से गिरी-सी मालूम हुई, वैसे ही मैं भी विस्मित हो गया। देखा कि इसी बीच में न जाने कब वे बाहर से एक आदमी ले लाए हैं और दवाओं का भारी बॉक्स उसके सिर पर लादकर प्रस्थान के लिए तैयार खड़े हैं।कल यही बात तो हुई थी, मगर आज हम उस हम बात को बिल्कुदल ही भूल गये थे। इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इस प्रवास में राजलक्ष्मी के इतने आदर-जतन की उपेक्षा करके साधुजी अनिश्चित अन्यत्र के लिए इतनी जल्दी तैयार हो जाँयगे। स्नेह की जंजीर इतनी जल्दी नहीं टूटने की-राजलक्ष्मी के निभृत मन में शायद यही आशा थी। वह मारे डर के व्याकुल होकर कह उठी, “तुम क्या जा रहे हो आनन्द?”साधु ने कहा, “हाँ जीजी, जाता हूँ। अभी से रवाना न होने से पहुँचने में बहुत रात हो जायेगी।”“वहाँ कहाँ ठहरोगे, कहाँ सोओगे? अपना आदमी तो वहाँ कोई होगा नहीं।”“पहले पहुँचूँ तो सही।”“लौटोगे कब?”“सो तो अभी नहीं कहा जा सकता। काम की भीड़ में अगर आगे न बढ़कर गया, तो किसी दिन लौट भी सकता हूँ।”राजलक्ष्मी का मुँह पहले तो फक पड़ गया, फिर उसने जोर से अपना सिर झटककर रुँधे हुए कण्ठ से कहा, “किसी दिन लौट भी सकते हो? नहीं, यह हरगिज नहीं हो सकता।”क्या नहीं होगा सो समझ में आ गया, इसी से साधु ने प्रत्युत्तर में सिर्फ जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, “जाने का कारण तो आपको बता ही चुका हूँ।”“बता चुके हो? अच्छा, तो जाओ” इतना कहते-कहते राजलक्ष्मी प्राय: रो दी, और जल्दी से कमरे के भीतर चली गयी। क्षण-भर के लिए साधुजी स्तब्ध हो गये। उसके बाद मेरी तरफ देखकर लज्जित मुख से बोले, “मेरा जाना बहुत जरूरी है।”मैंने गर्दन हिलाकर सिर्फ इतना ही कहा, “मालूम है।” इससे ज्यादा और कुछ कहने को था भी नहीं। कारण, मैंने बहुत कुछ देखकर जान लिया है कि स्नेह की गहराई समय की स्वल्पता से हरगिज नहीं नापी जा सकती। और इस चीज की कवियों ने सिर्फ काव्यों के लिए ही शून्य कल्पना नहीं की- संसार में वास्तव में ऐसा हुआ करता है। इसीलिए, एक के जाने की आवश्यकता जितनी सत्य है, दूसरे का व्याकुल कण्ठ से मना करना भी ठीक उतना ही सत्य है या नहीं, इस विषय में मेरे मन में रंचमात्र भी संशय का उदय नहीं हुआ। मैं अत्यन्त सरलता से समझ गया कि इस बात को लेकर राजलक्ष्मी को शायद बहुत वेदना सहनी पड़ेगी।साधुजी ने कहा, “मैं चल दिया। उधर का काम अगर निबट गया, तो शायद, फिर आऊँगा; मगर अभी यह बात जताने की जरूरत नहीं।”मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “सो सही है।”साधुजी कुछ कहना ही चाहते थे कि घर की ओर देखकर सहसा एक गहरी उसाँस भरकर जरा मुसकराए; उसके बाद धीरे-से बोले, “अजीब देश है यह बंगाल! इसमें राह चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं, किसमें सामर्थ्य है कि इनसे बचकर निकल जाय?”इतना कहकर साधुजी धीरे-धीरे बाहर चले गये।उनकी बात सुनकर मैंने भी एक गहरी साँस ली। मालूम हुआ, बात असल में ठीक है। जिसे देश की समस्त माँ-बहिनों को वेदना ने खींचकर घर से बाहर निकाला है, उसे सिर्फ एक ही बहिन स्नेह, दही की मलाई और मछली का मूँड़ देकर कैसे पकड़े रख सकती है️,Srikanth"❤️Chapter 10One day, I did not have the tendency to unravel it again with my own hand, in the middle of the travel-story that I had suddenly left by putting Yavanika. from my village

❤️,श्रीकांत"❤️

     अध्याय 10

एक दिन जिस भ्रमण-कहानी के बीच ही में अकस्मात् यवनिका डालकर बिदा ले चुका था, उसको फिर किसी दिन अपने ही हाथ से उद्धाटित करने की प्रवृत्ति मुझमें नहीं थी। मेरे गाँव के जो बाबा थे वे जब मेरे उस नाटकीय कथन के उत्तर में सिर्फ जरा-सा मुसकराकर रह गये, और राजलक्ष्मी के जमीन से लगाकर प्रणाम करने पर, जिस ढंग से हड़बड़ाकर, दो कदम पीछे हटकर बोले, “ऐसी बात है क्या? अहा, अच्छा हुआ, अच्छा हुआ,- जीते रहो, खुश रहो!” और फिर डॉक्टर को साथ लेकर बाहर चले गये, तब राजलक्ष्मी के चेहरे की जो तसवीर मैंने देखी वह भूलने की चीज नहीं, और न उसे कभी भूला ही। मैंने सोचा था कि वह मेरी है, बिल्कुसल मेरी अपनी- उसका प्रकाश बाहर की दुनिया में किसी दिन भी प्रकट न होगा; मगर, अब सोचता हूँ कि यह अच्छा ही हुआ जो बहुत दिनों से बन्द हुए उस दरवाजे क़ो मुझे ही आकर खोलना पड़ा। यह अच्छा ही हुआ कि जिस अज्ञात रहस्य के प्रति बाहर का क्रुद्ध संशय, अन्याय-अविचार का रूप धारण करके उस पर निरन्तर धक्के लगा रहा था, मुझे उसके बन्द दरवाजे को अपने ही हाथ से खोलने का मौका मिला।

बाबा चले गये, राजलक्ष्मी क्षण-भर स्तब्ध भाव-से उनकी तरफ देखती रही, और उसके बाद मुँह उठाकर निष्फल हँसी हँसने की कोशिश करके बोली, “पैरों की धूल लेते समय मैं उन्हें छुए थोड़े ही लेती थी। मगर, तुम क्यों उस बात को कहने गये उनसे? उसकी तो कोई जरूरत न थी। यह तो सिर्फ-वास्तव में यह तो सिर्फ तुमने अपने आप ही अपनों का अपमान किया, जिसकी जरा भी जरूरत न थी। ये लोग विधवा-विवाह की पत्नी को बाज़ार की वेश्या की अपेक्षा ऊँचा आसन नहीं देते, लिहाजा इसमें मैं नीचे ही उतरी, किसी को जरा-सा भी ऊपर न उठा सकी...”

इस बात को राजलक्ष्मी फिर पूरा न कर सकी।

मैं सब कुछ समझ गया। इस अपमान के सामने बड़ी-बड़ी बातों की उछल-कूद मचाकर बात बढ़ाने की प्रवृत्ति न हुई। जिस तरह चुपचाप पड़ा था, उसी तरह मुँह बन्द किये पड़ा रहा।

राजलक्ष्मी भी बहुत देर तक और कुछ नहीं बोली, ठीक मानो अपनी चिन्ता में मग्न होकर बैठी रही; उसके बाद सहसा बिल्कुरल पास ही कहीं से किसी की बुलाहट सुनकर मानो चौंककर उठ खड़ी हुई। रतन को बुलाकर बोली, “गाड़ी जल्दी तैयार करने को कह दे, रतन, नहीं तो फिर रात के ग्यारह बजे की उसी गाड़ी से जाना होगा। यदि ऐसा हुआ तो मुश्किल होगा- रास्ते में ठण्ड लग जायेगी।”

दस ही मिनट के अन्दर रतन ने मेरा बैग ले जाकर गाड़ी पर रख दिया और मेरे बिस्तर बाँधने के लिए इशारा करता हुआ वह पास आ खड़ा हुआ। तबसे अब तक मैंने एक भी बात नहीं की थी और न अब भी कोई प्रश्न किया। कहाँ जाना होगा, क्या करना होगा, कुछ भी बिना पूछे मैं चुपचाप उठकर धीरे-से गाड़ी में जाकर बैठ गया।

कुछ दिन पहले ऐसी ही एक शाम को अपने घर में प्रवेश किया था और आज फिर वैसी ही एक शाम को चुपचाप घर से निकल पड़ा। उस दिन भी किसी ने आदर के साथ ग्रहण नहीं किया था और आज भी कोई स्नेह के साथ बिदाई देने को आगे न आया! उस दिन भी, इसी समय, ऐसे ही घर-घर में शंख बजना शुरू हुआ था और इसी तरह वसु-मल्लिकों के गोपाल-मन्दिर से आरती के घण्टे-घड़ियाल का शब्द अस्पष्ट होकर हवा में बहा आ रहा था। फिर भी, उस दिन से आज के दिन का प्रभेद कितना ज़बर्दस्त है, इस बात को सिर्फ आकाश के देवताओं ने ही देखा।

बंगाल के एक नगण्य गाँव के टूटे-फूटे जीर्ण घर के प्रति मेरी ममता कभी न थी- उससे वंचित होने को भी मैंने इससे पहले कभी हानिकर नहीं समझा, परन्तु आज अब अत्यन्त अनादर के साथ गाँव छोड़कर चल दिया, और किसी दिन किसी भी बहाने उसमें फिर कभी प्रवेश करने की कल्पना तक को जब मन में स्थान न दे सका, तब यह अस्वास्थ्यकर साधारण गाँव एक साथ सभी तरफ से मेरी ऑंखों के सामने असाधारण होकर दिखाई देने लगा और जिससे अभी तुरन्त ही निर्वासित होकर निकल पड़ा था, उसी अपने पुरखों के टूटे-फूटे मलिन घर के प्रति मेरे मोह की सीमा न रही।

राजलक्ष्मी चुपके से आकर मेरे सामने के आसन पर बैठ गयी, और, शायद गाँव के परिचित राहगीरों के कुतूहल से अपने को पूरी तरह छिपाए रखने के लिए ही उसने एक कोने में अपना सिर रखकर ऑंखें मींच लीं।

जब हम लोग रेलवे-स्टेशन के लिए रवाना हुए तब सूरज छिप चुका था। गाँव के टेढ़े-मेढ़े रास्ते के किनारे अपने आप बढ़े हुए करौंदे, झरबेरी और बेंत के जंगल ने संकीर्ण मार्ग को और भी संकीर्ण बना दिया था और दोनों तरफ पंक्तिवार खड़े हुए आम-कटहर के पेड़ों की शाखाएँ सिर से ऊपर कहीं-कहीं ऐसी सघन होकर मिल गयी थीं कि शाम का अंधेरा और भी दुर्भेद्य हो गया था। उसके भीतर से गाड़ी जब अत्यन्त सावधानी के साथ बहुत ही धीमी चाल से चलने लगी तब मैं ऑंखें मींचकर उस निविड़ अन्धकार के भीतर से न जाने क्या-क्या देखने लगा। मालूम हुआ, इसी रास्ते से किसी दिन बाबा मेरी दीदी को ब्याह कर लाए थे, तब यह रास्ता बारातियों के कोलाहल और पैरों की आहट से गूँज उठा होगा; और, फिर किसी दिन जब वे स्वर्ग सिधारे, तब इसी रास्ते से अड़ोसी-पड़ोसी उनकी अरथी नदी तक ले गये होंगे। इसी मार्ग से ही मेरी मां ने किसी दिन वधू-वेश में गृह-प्रवेश किया था, और एक दिन जब उनके इस जीवन की समाप्ति हुई तब, धूल-मिट्टी से भरे इसी संकीर्ण मार्ग से अपनी माँ को गंगा में विसर्जित करके हम लोग वापस लौटे थे। उस समय यह मार्ग ऐसा निर्जन और दुर्गम नहीं हुआ था। तब तक शायद इसकी हवा में इतना मलेरिया और तालाबों में इतना कीचड़ और जहर इकट्ठा नहीं हुआ था। उस समय तक देश में अन्न था, वस्त्र थे, धर्म था, तब तक देश का निरानन्द शायद ऐसी भयंकर शून्यता से आकाशव्यापी होकर भगवान के द्वार तक नहीं पहुँचता था। दोनों ऑंखों में ऑंसू भर आए, गाड़ी के पहिए से थोड़ी-सी धूल लेकर जल्दी-से माथे और मुँह पर लगाकर मैंने मन-ही-मन कहा, 'हे मेरे पितृ-पितामह के सुख-दु:ख, विपद-सम्पद, और हँसने-रोने से भरे हुए धूल-मिट्टी के पथ, मैं तुम्हें बार-बार नमस्कार करता हूँ।' फिर अन्धकार में जंगल की ओर देखकर कहा, 'माता जन्मभूमि, तुम्हारी करोड़ों अकृती सन्तानों के समान मैंने भी तुम्हें हृदय से नहीं चाहा- और नहीं जानता किसी दिन तुम्हारी सेवा में, तुम्हारे काम में, तुम्हारी गोद में फिर वापस आऊँगा या नहीं। परन्तु आज इस निर्वासन के मार्ग में अंधेरे के भीतर तुम्हारी जो दु:ख की मूर्ति मेरे ऑंसुओं के भीतर से अस्पष्ट होकर प्रस्फुटित हो उठी है, उसे मैं इस जीवन में कभी नहीं भूल सकूँगा।'

ऑंख खोलकर देखा, राजलक्ष्मी उसी तरह स्थिर बैठी है। अंधेरे कोने में उसका चेहरा नहीं दिखाई दिया पर मैंने अनुभव किया कि ऑंखें मींचकर वह मानो चिन्ता में मग्न हो रही है और मन-ही-मन कहा, 'रहने दो ऐसे ही। आज से जब कि मैंने अपनी चिन्ता-तरणी की पतवार उसके हाथ सौंप दी है, तो इस अनजान नदी में कहाँ भँवरें हैं और कहाँ टापू, सो वही खोजती रहे।'

इस जीवन में अपने मन को मैंने अनेक दिशाओं में, अनेक अवस्थाओं में आजमाकर देखा है। उसके भीतर की प्रकृति मैं पहिचानता हूँ। किसी विषय में 'अत्यन्त' को वह नहीं सह सकता। अत्यन्त सुख, अत्यन्त स्वास्थ्य, अत्यन्त अच्छा रहना, उसे हमेशा पीड़ा देता है। कोई अत्यन्त प्रेम करता है; इस बात को जानते ही मन भागूँ-भागूँ करने लगता है, उसे मन ने आज कितने दु:ख से अपने हाथ से पतवार छोड़ दी है, इस बात को इस मन के सृष्टिकर्त्ता के सिवा और कौन जान सकता है?

बाहर के काले आकाश की ओर एक बार दृष्टि फैलाई- भीतर की अदृश्यप्राय निश्चल प्रतिमा की ओर भी एक बार दृष्टि डाली; उसके बाद हाथ जोड़कर फिर मैंने किसे नमस्कार किया, मैं खुद नहीं जानता। परन्तु, मन-ही-मन इतना जरूर कहा कि “इसके आकर्षण के दु:सह वेग से मेरा दम घुट रहा है, बहुत बार बहुत मार्गों से भागा हूँ, परन्तु फिर भी जब गोरखधन्धे की तरह सभी मार्गों ने मुझे बार-बार इसी के पास लौटा दिया है, तो अब मैं विद्रोह न करूँगा-अबकी बार मैंने अपने को सम्पूर्ण रूप से इसी के हाथ सौंप दिया। और अब तक अपने जीवन को अपनी पतवार से चलाकर ही क्या पाया? उसे कितना सार्थक बनाया? हाँ, आज अगर वह ऐसे ही हाथ जा पड़ा हो जो स्वयं अपने जीवन को आकण्ठ डूबे हुए दलदल में से खींचकर बाहर निकाल सका है, तो वह दूसरे के जीवन को हरगिज़ फिर उसी में नहीं डुबा सकता।”

खैर, यह सब तो हुआ अपनी तरफ से। परन्तु, दूसरे पक्ष का आचरण फिर ठीक पहले की भाँति शुरू हुआ। रास्ते-भर में एक भी बात नहीं हुई यहाँ तक कि स्टेशन पहुँचकर भी किसी ने मुझसे कोई प्रश्न करना आवश्यक नहीं समझा। थोड़ी देर बाद ही कलकत्ते जानेवाली गाड़ी की घण्टी बजी, लेकिन रतन टिकट खरीदने का काम छोड़कर मुसाफिरखाने के एक कोने में मेरे लिए बिस्तर बिछाने में लग गया। अतएव समझ लिया, कि नहीं, हमें सवेरे की गाड़ी से पश्चिम की ओर रवाना होना होगा। मगर, उधर पटना जाना होगा या काशी या और कहीं, यह मालूम न होने पर भी इतना साफ समझ में आ गया कि इस विषय में मेरा मतामत बिल्कुकल ही अनावश्यक है।

राजलक्ष्मी दूसरी ओर देखती हुई अन्यमनस्क की तरह खड़ी थी, रतन ने अपना काम पूरा करके उसके पास जाकर पूछा, “माँजी, पता लगा है कि जरा और आगे जाने से सभी तरह का अच्छा खाना मिल सकता है।”

राजलक्ष्मी ने ऑंचल की गाँठ खोलकर कई रुपये उसके हाथ में देते हुए कहा, “अच्छी बात है, ले आ वहीं जाकर। पर दूध जरा देख-भालकर लेना, बासी-वासी न ले आना कहीं।”

रतन ने कहा, “माँजी, तुम्हारे किये कुछ...”

“नहीं, मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए।”

यह 'नहीं' कैसा है, इस बात को सभी जानते हैं। और शायद सबसे ज्यादा जानता है रतन खुद। फिर भी उसने दो-चार बार पैर घिसकर धीरे से कहा, “कल ही से तो बिल्कुल...”

राजलक्ष्मी ने उत्तर दिया, “तुझे क्या सुनाई नहीं देता रतन? बहरा हो गया है क्या?”

आगे और कुछ न कहकर रतन चल दिया। कारण, इसके बाद भी बहस कर सकता हो, ऐसी ताब तो मैंने किसी की भी नहीं देखी। और जरूरत ही क्या थी? राजलक्ष्मी मुँह से स्वीकार न करे, फिर भी, मैं जानता हूँ कि रेलगाड़ी में रेल से सम्बन्धित किसी के भी हाथ की कोई चीज खाने की ओर उसकी प्रवृत्ति नहीं होती। अगर यह कहा जाय कि निरर्थक कठोर उपवास करने में इसकी जोड़ का दूसरा कोई नहीं देखा, तो शायद अत्युक्ति न होगी। मैंने अपनी ऑंखों से देखा है, कितनी बार कितनी चीजें इसके घर आते देखी हैं, पर उन्हें नौकर-नौकरानियों ने खाया है, गरीब पड़ोसियों को बाँट दिया है- सड़-गल जाने पर फेंक दिया गया है, परन्तु जिसके लिए वे सब चीजें आई हैं उसने मुँह से भी नहीं लगाया। पूछने पर, मजाक करने पर, हँसकर कह दिया है, “हाँ, मेरे तो बड़ा आचार है! मैं, और छुआ छूत का विचार! मैं तो सब कुछ खाती-पीती हूँ।”

“अच्छा, तो मेरी ऑंखों के सामने परीक्षा दो?”

“परीक्षा? अभी? अरे बाप रे! तब तो फिर जीने के लाले पड़ जाँयगे!”

यह कहकर वह जीने का कोई कारण न दिखाकर घर के किसी बहुत ही जरूरी काम का बहाना करके अदृश्य हो गयी है। मुझे क्रमश: मालूम हुआ कि वह मांस-मछली दूध-घी कुछ नहीं खाती, परन्तु यह न खाना ही उसके लिए इतना अशोभन और इतनी लज्जा की बात है कि इसका उल्लेख करते ही मारे शरम के उसे भागने को राह नहीं मिलती। इसी से साधारणत: खाने के बारे में उससे अनुरोध करने की मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। जब रतन अपना मुरझाया-सा मुँह लेकर चला गया, तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद वह लोटे में गरम दूध और दोने में मिठाई वगैरह लेकर लौट आया, तब राजलक्ष्मी ने मेरे लिए दूध और कुछ खाने को रखकर बाकी का सब रतन के हाथ में दे दिया। तब भी मैंने कुछ न कहा और रतन की ऑंखों की नीरव प्रार्थना को स्पष्ट समझ जाने पर भी मैं उसी तरह चुप बना रहा।

अब तो कारण-अकारण और बात-बात में उसका न खाना ही मेरे लिए अभ्यस्त हो गया है। परन्तु एक दिन ऐसा था जब यह बात न थी। तब हँसी-दिल्लगी से लेकर कठोर कटाक्ष तक भी मैंने कम नहीं किये हैं। परन्तु, जितने दिन बीतते गये हैं, मुझे इसके दूसरे पहलू पर भी सोचने-समझाने का काफी अवसर मिला है। रतन के चले जाने पर मुझे वे ही सब बातें फिर याद आने लगीं।

कब और क्या सोचकर वह इस कृच्छ-साधना में प्रवृत्त हुई थी, मैं नहीं जानता। तब तक मैं इसके जीवन में नहीं आया था। परन्तु पहले-पहल जब वह जरूरत से ज्यादा भोजन-सामग्री के बीच में रहकर भी अपनी इच्छा से दिन पर दिन गुप्त रूप से चुपचाप अपने को वंचित करती हुई जी रही थी, तब वह कितना कठिन और कैसा दु:साध्यय कार्य था! कलुष और सब तरह की मलिनता के केन्द्र से अपने को इस तपस्या के मार्ग पर अग्रसर करते हुए उसने कितना न चुपचाप सहा होगा! आज यह बात उसके लिए इतनी सहज और इतनी स्वाभाविक है कि मेरी दृष्टि में भी उसकी कोई गुरुता, कोई विशेषता नहीं रह गयी है; इसका मूल्य क्या है, सो भी ठीक तौर से नहीं जानता, मगर फिर भी कभी-कभी मन में प्रश्न उठा है कि उसकी यह कठोर साधना क्या सबकी सब विफल हुई है, बिल्कुील ही व्यर्थ गयी है? अपने को वंचित रखने की यह जो शिक्षा है, यह जो अभ्यास है, यह जो पाकर त्याग देने की शक्ति है, अगर इस जीवन में उसके अलक्ष्य में न संचित हो पाती हो क्या आज वह ऐसी स्वच्छन्दता से, ऐसी सरलता के साथ अपने को सब प्रकार के भोगों से छुड़ाकर अलग कर सकती? कहीं से भी क्या कोई बन्धन उसे खींचता नहीं? उसने प्रेम किया है, ऐसे कितने ही आदमी प्रेम किया करते हैं, परन्तु सर्व-त्याग के द्वारा उसे प्रेम को ऐसा निष्पाप, ऐसा एकान्त बना लेना क्या संसार में इतना सुलभ है?

मुसाफिरखाने में और आदमी न था, रतन भी शायद आड़ में कहीं जगह ढूँढ़कर लेट गया था। देखा, एक टिमटिमाती हुई बत्ती के नीचे राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी है। पास जाकर उसके माथे पर हाथ रखते ही उसने चौंककर मुँह उठाया, और पूछा, “तुम सोये नहीं अभी?”

“नहीं, मगर तुम यहाँ धूल-मिट्टी में चुपचाप अकेली न बैठो, मेरे बिस्तर पर चलो।” यह कहकर, और विरोध करने का अवसर बिना दिये ही मैंने हाथ पकड़कर उसे उठा लिया परन्तु अपने पास बिठा लेने पर फिर कहने को कोई बात ही ढूँढे नहीं मिली, सिर्फ आहिस्ते-आहिस्ते उसके हाथ पर हाथ फेरने लगा। कुछ क्षण इसी तरह बीते। सहसा उसकी ऑंखों के कोनों पर हाथ पड़ते ही अनुभव किया कि मेरा सन्देह बेबुनियाद नहीं है। धीरे-धीरे ऑंसू पोंछकर मैंने ज्यों ही उसे अपने पास खींचने की कोशिश की त्यों ही वह मेरे फैले हुए पैरों पर औंधी पड़ गयी और जोर से उन्हें दबाये रही। किसी भी तरह मैं उसे अपने बिल्कुरल पास न ला सका।

फिर उसी तरह सन्नाटे में समय बीतने लगा। सहसा मैं बोल उठा, “एक बात तुम्हें अब तक नहीं जताई लक्ष्मी।”

उसने चुपके से कहा, “कौन-सी बात?”

इतना ही कहने में संस्कारवश पहले तो जरा संकोच हुआ, मगर मैं रुका नहीं, बोला, “मैंने आज से अपने को बिल्कुरल तुम्हारे ही हाथ सौंप दिया है, अब भलाई-बुराई का सारा भार तुम्हीं पर है।”

यह कहकर मैंने उसके मुख की ओर देखा कि उस टिमटिमाते हुए उजाले में वह मेरे मुँह की ओर चुपचाप एकटक देख रही है। उसके बाद जरा हँसकर बोली, “तुम्हें लेकर मैं क्या करूँगी? तुम न तो तबला ही बजा सकते हो, न सारंगी ही बजा सकोगे और...”

मैंने कहा, “ 'और' क्या? पान-तम्बाकू हाज़िर करना? नहीं, यह काम तो मुझसे हरगिज़ नहीं हो सकता।”

“लेकिन पहले के दो काम?”

मैंने कहा, “आशा दो तो शायद कर भी सकूँ।” कहकर मैंने भी जरा हँस दिया।

सहसा राजलक्ष्मी उत्साह से बैठी और बोली, “मज़ाक नहीं, सचमुच बजा सकते हो?”

मैंने कहा, “आशा करने में दोष क्या है?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं बजा सकते।” उसके बाद नीरव विस्मय से कुछ देर तक वह मेरी ओर एकटक देखती रही, फिर धीरे-धीरे कहने लगी, “देखो, बीच-बीच में मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है; परन्तु, फिर सोचती हूँ कि जो आदमी निष्ठुरों की तरह बन्दूक लेकर सिर्फ जानवारों को मारते फिरना ही पसन्द करता है, वह इसकी क्या परवाह करनेवाला है? इसके भीतर की इतनी बड़ी वेदना का अनुभव करना क्या उसके लिए साध्य् हो सकता है? बल्कि शिकार करने के समान चोट पहुँचा सकने में ही मानो उस आनन्द मिलता है? तुम्हारा दिया हुआ बहुत-सा दु:ख मैं यही सोचकर तो सह सकी हूँ।”

अब चुप रहने की मेरी पारी आई। उसके लगाये हुए अभियोग के मूल में युक्तियों द्वारा न्याय-विचार भी चल सकता था, सफाई देने के लिए नज़ीरों की भी शायद कमी नहीं पड़ती, परन्तु यह सब विडम्बना-सी मालूम हुई। उसकी सच्ची, अनुभूति के आगे मुझे मन-ही-मन हार माननी पड़ी। अपनी बात को वह ठीक तरह से कह भी नहीं सकी, परन्तु संगीत की जो अन्तरतम मूर्ति सिर्फ व्यथा के भीतर से ही कदाचित् आत्म-प्रकाश करती है, वह करुणा से अभिषिक्त सदा जाग्रत चेतना ही मानो राजलक्ष्मी के इन दो शब्दों के इंगित में रूप धारण करके सामने दिखाई दी। और उसके संयम ने, उसके त्याग ने, उसके हृदय की शुचिता ने फिर एक बार मानो मेरी ऑंखों में अंगुली देकर उसी का स्मरण करा दिया।

फिर भी, एक बात उससे कह सकता था। कह सकता था कि मनुष्य की परस्पर सर्वथा-विरुद्ध प्रवृत्तियाँ किस तरह एक साथ पास-ही-पास बैठी रहती हैं, यह एक अचिन्तनीय रहस्य है। नहीं तो मैं अपने हाथ से जीव-हत्या कर सकता हूँ, इतना बड़ा परमाश्चर्य मेरे ही लिए और क्या हो सकता है? जो एक चींटी तक की मृत्यु को नहीं सह सकता, खून से लथ-पथ बलि के यूप-काष्ठ की सूरत ही कुछ दिनों के लिए जिसका खाना-पीना-सोना छुड़ा देती है, जिसने मुहल्ले के अनाथ आश्रयहीन कुत्ते-बिल्लियों के लिए भी बचपन में कितने ही दिन चुपचाप उपवास किये हैं उसका जंगल के पुश-पक्षियों पर कैसे निशाना ठीक बैठता है, यह तो खुद मेरी समझ में नहीं आता। और क्या ऐसा सिर्फ मैं ही अकेला हूँ? जिस राजलक्ष्मी का अन्तर-बाहर मेरे लिए आज प्रकाश की तरह स्वच्छ हो गया है वह भी इतने दिनों तक साल पर साल किस तरह 'प्यारी' का जीवन बिता सकी!

मन में आने पर भी मैं यह बात मुँह से न निकाल सका। सिर्फ उसे बाधा न देने की गरज़ ही नहीं, बल्कि सोचा, “क्या होगा कहने से? देव और दानव दोनों कन्धे मिलाकर मनुष्य को कहाँ और किस जगह लगातार ढोये लिये जा रहे हैं, इसे कौन जानता है? किस तरह भोगी एक ही दिन में त्यागी होकर निकल पड़ता है, निर्मम निष्ठुर एक क्षण में करुणा से विगलित होकर अपने को नि:शेष कर डालता है, इस रहस्य का हमने कितना-सा संधान पाया है? किस निभृत कन्दरा में मानवात्मा की गुप्त साधना अकस्मात् एक दिन सिद्धि के रूप में प्रस्फुटित हो उठती है, उसकी हम क्या खबर रखते हैं? क्षीण प्रकाश में राजलक्ष्मी के मुँह की ओर देखकर उसी को लक्ष्य करके मैंने मन-ही-मन कहा, “यह अगर मेरी सिर्फ व्यथा पहुँचाने की शक्ति को ही देख सकी हो, व्यथा ग्रहण करने की अक्षमता को स्नेह के कारण अब तक क्षमा करती चली आई हो, तो इसमें मेरे रूठने की ऐसी कौन-सी बात है?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “चुप क्यों रह गये?”

मैंने कहा, “फिर भी तो इस निष्ठुर के लिए ही तुमने सब कुछ त्याग दिया!”

राजलक्ष्मी ने कहा, “सब कुछ क्या त्यागा! अपने को तो तुमने नि:सत्व होकर ही आज मुझे दे दिया, उसे तो मैं 'नहीं चाहिए' कहकर त्याग न सकी!”

मैंने कहा, “हाँ, नि:सत्व होकर ही दिया है। मगर तुम तो अपने आपको देख नहीं सकोगी इसलिए, वह उल्लेख मैं न करूँगा!”
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पश्चिम के शहर में प्रवेश करने के पहले ही समझ में आ गया कि बंगाल के मलेरिया ने मुझे खूब ही मज़बूती के साथ पकड़ लिया है। पटना स्टेशन से राजलक्ष्मी के घर तक मैं लगभग बेहोशी की हालत में लाया गया। इसके बाद के महिने में भी मुझे ज्वर, डॉक्टर और राजलक्ष्मी लगभग हर वक्त ही घेरे रहे।

जब बुखार छूट गया तब डॉक्टर साहब ने घर-मालकिन को साफ तौर से समझा दिया कि यद्यपि यह शहर पश्चिम-प्रदेश में ही शामिल है और स्वास्थ्यप्रद स्थान के रूप में इसकी प्रसिद्धि है, फिर भी मेरी सलाह है कि रोगी को जल्दी ही स्थानान्तरित करना चाहिए।

फिर बाँध-बूँधी शुरू हो गयी, मगर अबकी बार जरा धूम-धाम के साथ। रतन को अकेला पाकर मैंने पूछा, “अबकी बार कहाँ जाना होगा, रतन?”

देखा कि वह इस नवीन यात्रा के बिल्कुलल ही खिलाफ है। उसने खुले दरवाजे की तरफ निगाह रखते हुए आभास और इशारे से फुस-फुस करके जो कुछ कहा, उससे मेरा भी जैसे कलेजा-सा बैठ गया। रतन ने कहा, “वीरभूम जिले में एक छोटा-सा गाँव है गंगामाटी। जब इस गाँव का पट्टा लिया था तब मैं सिर्फ एक मुख्तार साहब किसनलाल के साथ वहाँ गया था। माँ जी खुद वहाँ कभी नहीं गयीं। यदि कभी जाँयगी तो उन्हें भाग आने की राह भी ढूँढे न मिलेगी। समझ लीजिए कि गाँव में भले घर हैं ही नहीं-सिर्फ छोटी जातिवालों के ही घर हैं। उन्हें न तो छुआ ही जा सकता है और न वे किसी काम आ सकते हैं।”

राजलक्ष्मी क्यों इन सब छोटी जातों में जाकर रहना चाहती है, इसका कारण मानो मेरी समझ में कुछ आ गया। मैंने पूछा, “गंगामाटी है कहाँ?”

रतन ने जताया, “साँइथिया या ऐसी ही किसी स्टेशन से करीब दस-बारह कोस बैलगाड़ी में जाना पड़ता है। रास्ता जितना कठिन है उतना ही भयंकर। चारों तरफ मैदान ही मैदान है। उसमें न तो कहीं फसल ही होती है और न कहीं एक बूँद पानी है। कँकरीली मिट्टी है, कहीं गेरुआ और कहीं जली-हुई-सी स्याह काली।” यह कहकर वह जरा रुका, और खास तौर से मुझे ही लक्ष्य करके फिर कहने लगा, “बाबूजी, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता कि आदमी वहाँ किस सुख के लिए रहते हैं। और जो ऐसी सोने की सी जगह छोड़कर वहाँ जाते हैं, उनसे मैं और क्या कहूँ।”

भीतर-ही-भीतर एक लम्बी साँस लेकर मैं मौन हो रहा। ऐसी सोने की-सी जगह छोड़कर क्यों उस मरु-भूमि के बीच निर्बान्धव नीच आदमियों के देश में राजलक्ष्मी मुझे लिये जा रही है, सो न तो उससे कहा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है।

आखिर मैंने कहा, “शायद मेरी बीमारी की वजह से ही जाना पड़ रहा है, रतन। यहाँ रहने से आराम होने की कम आशा है, सभी डॉक्टर यही डर दिखा रहे हैं।”

रतन ने कहा, “लेकिन बीमारी क्या यहाँ और किसी को होती ही नहीं बाबूजी? आराम होने के लिए क्या उन सबको उस गंगामाटी में ही जाना पड़ता है?”

मन-ही-मन कहा, “मालूम नहीं, उन सबको किस माटी में जाना पड़ता है। हो सकता है कि उनकी बीमारी सीधी हो, हो सकता है कि उन्हें साधारण मिट्टी में ही आराम पड़ जाता हो। मगर हम लोगों की व्याधि सीधी भी नहीं है और साधारण भी नहीं; इसके लिए शायद उसी गंगामाटी की ही सख्त जरूरत है।”

रतन कहने लगा, “माँजी के खर्च का हिसाब-किताब भी तो हमारी किसी की समझ में नहीं आता। वहाँ न तो घर-द्वार ही है, न और कुछ। एक गुमाश्ता है, उसके पास दो हज़ार रुपये भेजे गये हैं एक मिट्टी का मकान बनाने के लिए! देखिए तो सही बाबूजी, ये सब कैसे ऊँटपटाँग काम हैं! नौकर हैं, सो हम लोग जैसे कोई आदमी ही नहीं हैं!”

उसके क्षोभ और नाराजगी को देखते हुए मैंने कहा, “तुम वहाँ न जाओ तो क्या है रतन? जबरदस्ती तो तुम्हें कोई कहीं ले नहीं जा सकता?”

मेरी बात से रतन को कोई सान्त्वना नहीं मिली। बोला, “माँजी ले जा सकती हैं। क्या जाने क्या जादू-मन्त्र जानती हैं वे! अगर कहें कि तुम लोगों को यमराज के घर जाना होगा, तो इतने आदमियों में किसी की हिम्मत नहीं कि कह दे, 'ना!” यह कहकर वह मुँह भारी करके चला गया।

बात तो रतन गुस्से से ही कह गया था, पर वह मुझे मानो अकस्मात् एक नये तथ्य का संवाद दे गया। सिर्फ मेरी ही नहीं सभी की यह एक ही दशा है। उस जादू-मंत्र की बात ही सोचने लगा। मन्त्र-तन्त्र पर सचमुच ही मेरा विश्वास है सो बात नहीं, परन्तु घर-भर के लोगों में किसी में भी जो इतनी-सी शक्ति नहीं कि यमराज के घर जाने की आज्ञा तक की उपेक्षा कर सके, सो वह आखिर है कौन चीज़!

इसके समस्त सम्बन्धों से अपने को विच्छिन्न करने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया! लड़-झगड़कर चल दिया हूँ, सन्यासी होकर भी देख लिया, यहाँ तक कि देश छोड़कर बहुत दूर चला गया हूँ जिससे फिर कभी मुलाकात ही न हो, परन्तु मेरी समस्त चेष्टाएँ किसी गोल चीज पर सीधी लकीर खींचने के समान बारम्बार केवल व्यर्थ ही हुई हैं। अपने को हजार बार धिक्कारने पर भी अपनी कमजोरी के आगे आखिर मैं पराजित ही हुआ हूँ, और इसी बात का खयाल करके अन्त में जब मैंने आत्म-समर्पण कर दिया तब रतन ने आकर आज मुझे इस बात की खबर दी, “राजलक्ष्मी जादू-मन्त्र जानती है!”

बात ठीक है। लेकिन इसी रतन से अगर जिरह करके पूछा जाय तो मालूम होगा कि वह खुद भी इस बात पर विश्वास नहीं करता।

सहसा देखा कि राजलक्ष्मी एक पत्थर की प्याली में कुछ लिये हुए व्यस्त भाव से इधर ही से नीचे जा रही है। मैंने बुलाकर कहा, “सुनो तो, सभी कहते हैं कि तुम जादू-मन्त्र जानती हो!”

वह चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, “क्या जानती हूँ?”

मैंने कहा, “जादू-मन्त्र!”

राजलक्ष्मी ने मुँह बिचकाकर जरा मुस्कराते हुए कहा, “हाँ, जानती हूँ।”

यह कहकर वह चली जा रही थी, सहसा मेरे कुरते को गौर से देखकर उद्विग्न कण्ठ से पूछ उठी, “यह क्या? कल का वही बासी कुरता पहने हुए हो क्या?”

अपनी तरफ देखकर मैंने कहा, “हाँ, वही है। मगर रहने दो, खूब उजला है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “उजले की बात नहीं, मैं सफाई की बात कह रही हूँ।” इसके बाद फिर जरा मुस्कराकर कहा, “तुम बाहर के इस दिखावटी उजलेपन में ही हमेशा गर्क रहे! इसकी उपेक्षा करने को मैं नहीं कहती, मगर भीतर पसीने से गन्दगी बढ़ जाती है, इस बात पर गौर करना कब सीखोगे?” इतना कहकर उसने रतन को आवाज दी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कारण, मालकिन की इस तरह की ऊँची-मीठी आवाज का जवाब देना इस घर का नियम नहीं, बल्कि चार-छह मिनट के लिए मुँह छिपा जाना ही नियम है।

आखिर राजलक्ष्मी ने हाथ की चीज नीचे रखकर बगल के कमरे में से एक धुला हुआ कुरता लाकर मेरे हाथ में दिया और कहा, “अपने मन्त्री रतन से कहना, जब तक उसने जादू-मन्त्र नहीं सीख लिया है, तब तक इन सब जरूरी कामों को वह अपने हाथों से ही किया करे।” यह कहकर वह प्याली उठाकर नीचे चली गयी।

कुरता बदलते वक्त देखा कि उसका भीतरी हिस्सा सचमुच ही गन्दा हो गया है। होना ही चाहिए था, और मैंने भी इसके सिवा और कुछ उम्मीद की हो, सो भी नहीं। मगर मेरा मन तो था सोचने की तरफ, इसी से इस अतितुच्छ चोले के भीतर-बाहर के वैसे दृश्य ने ही फिर मुझे नयी चोट पहुँचाई।

राजलक्ष्मी की यह शुचिता की सनक बहुधा हम लोगों को निरर्थक, दु:खदायक और यहाँ तक कि 'अत्याचार' भी मालूम हुई है; और अभी एक ही क्षण में उसका सब कुछ मन से धुल-पुछ गया हो, सो भी सत्य नहीं; परन्तु, इस अन्तिम श्लेष में जिस वस्तु को मैंने आज तक मन लगाकर नहीं देखा था, उसी को देखा। जहाँ से इस अद्भुत मानवीकी व्यक्त और व्यक्त जीवन की धाराएँ दो बिल्कुचल प्रतिकूल गतियों में बहती चली आ रही हैं, आज मेरी निगाह ठीक उसी स्थान पर जाकर पड़ी। एक दिन अत्यन्त आश्चर्य में डूबकर सोचा था कि बचपन में राजलक्ष्मी ने जिसे प्यार किया था उसी को प्यारी ने अपने उन्माद-यौवन की किसी अतृप्त लालसा के कीचड़ से इस तरह बहुत ही आसानी से सहस्र दल-विकसित कमल की भाँति पलक मारते ही बाहर निकाल दिया! आज मालूम हुआ कि वह प्यारी नहीं है, वह राजलक्ष्मी ही है। 'राजलक्ष्मी' और 'प्यारी' इन दो नामों के भीतर उसके नारी-जीवन का कितना बड़ा इंगित छिपा था, मैंने उसे देखकर भी नहीं देखा; इसी से कभी-कभी संशय में पड़कर सोचा है कि एक के अन्दर दूसरा आदमी अब तक कैसे जिन्दा था! परन्तु, मनुष्य तो ऐसा ही है! इसी से तो वह मनुष्य है!

प्यारी का सारा इतिहास मुझे मालूम नहीं, मालूम करने की इच्छा भी नहीं। और राजलक्ष्मी का ही सारा इतिहास जानता होऊँ, सो भी नहीं; सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि इन दोनों के मर्म और कर्म में न कभी किसी दिन कोई मेल था और न सामंजस्य ही। हमेशा ही दोनों परस्पर उलटे स्रोत में बहती गयी हैं। इसी से एक की निभृत सरसी में जब शुद्ध सुन्दर प्रेम का कमल धीरे-धीरे लगातार दल पर दल फैलाता गया है तब दूसरी के दुर्दान्त जीवन का तूफान वहाँ व्याघात तो क्या करेगा, उसे प्रवेश का मार्ग तक नहीं मिला! इसी से तो उसकी एक पंखुड़ी तक नहीं झड़ी है, जरा-सी धूल तक उड़कर आज तक उसे स्पर्श नहीं कर सकी है।

शीत-ऋतु की संध्यार जल्दी ही घनी हो आई, मगर मैं वहीं बैठा सोचता रहा। मन-ही-मन बोला, “मनुष्य सिर्फ उसकी देह ही तो नहीं है! प्यारी नहीं रही, वह मर गयी। परन्तु, किसी दिन अगर उसने अपनी उस देह पर कुछ स्याही लगा भी ली हो तो क्या सिर्फ उसी को बड़ा करके देखता रहूँ, और राजलक्ष्मी जो अपने सहस्र-कोटि दु:खों की अग्नि-परीक्षा पार करके आज अपनी अकलंक शुभ्रता में सामने आकर खड़ी हुई है उसे मुँह फेरकर बिदा कर दूँ? मनुष्य में जो पशु है, सिर्फ उसी के अन्याय से और उसी की भूल-भ्रान्ति से-मनुष्य का विचार करूँ? और जिस देवता ने समस्त दु:ख, सम्पूर्ण व्यथा और समस्त अपमानों को चुपचाप सहन और वहन करके भी आज सस्मित मुख से आत्म-प्रकाश किया है, उसे बिठाने के लिए कहीं आसन भी न बिछाऊँ? यह क्या मनुष्य के प्रति सच्चा न्याय होगा?' मेरा मन मानो आज अपनी सम्पूर्ण शक्ति से कहने लगा, “नहीं-नहीं, हरगिज नहीं, यह कदापि नहीं होगा, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।” वह कोई ज्यादा दिन की बात नहीं जब अपने को दुर्बल, श्रान्त और पराजित सोचकर राजलक्ष्मी के हाथ अपने को सौंप दिया था, किन्तु, उस दिन उस पराभूत के आत्म-त्याग में एक बड़ी जबरदस्त दीनता थी। तब मेरा वही मन मानो किसी भी तरह अनुमोदन नहीं कर रहा था; परन्तु आज मेरा मन मानो सहसा जोर के साथ इसी बात को बार-बार कहने लगा, “वह दान दान ही नहीं, वह धोखा है। जिस प्यारी को तुम जानते न थे उसे जानने के बाहर ही पड़ी रहने दो; परन्तु, जो राजलक्ष्मी एक दिन तुम्हारी ही थी, आज उसी को तुम सम्पूर्ण चित्त से ग्रहण करो। और जिनके हाथ से संसार की सम्पूर्ण सार्थकता निरन्तर झड़ रही है, इसकी भी अन्तिम सार्थकता उन्हीं के हाथ सौंपकर निश्चिन्त हो जाओ।”

नया नौकर बत्ती ला रहा था, उसे बिदा करके मैं अंधेरे में ही बैठा रहा और मन-ही-मन बोला, “आज राजलक्ष्मी को सारी भलाइयों और सारी बुराइयों के साथ स्वीकार करता हूँ। इतना ही मैं कर सकता हूँ, सिर्फ इतना ही मेरे हाथ में है। मगर, इसके अतिरिक्त और भी जिनके हाथ में है, उन्हीं को उस अतिरिक्त के बोझे को सौंपता हूँ।” इतना कहकर मैं उसी अन्धकार में खाट के सिरहाने चुपचाप अपना सिर रखकर पड़ रहा।

पहले दिन की तरह दूसरे दिन भी यथा-रीति तैयारियाँ होने लगीं, और उसके बाद तीसरे दिन भी दिन-भर उद्यम की सीमा न रही। उस दिन दोपहर को एक बड़े भारी सन्दूक में थाली, लोटे-गिलास, कटोरे-कटोरियाँ और दीवट आदि भरे जा रहे थे। मैं अपने कमरे में से ही सब देख रहा था। मौका पाकर मैंने राजलक्ष्मी को इशारे से अपने पास बुलाकर पूछा, “यह सब हो क्या रहा है? तुम क्या अब वहाँ से वापस नहीं आना चाहतीं, या क्या?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “वापस कहाँ आऊँगी?”

मुझे याद आया, यह मकान उसने बंकू को दान कर दिया है। मैंने कहा, “मगर, मान लो कि वह जगह तुम्हें ज्यादा दिन अच्छी न लगे तो?”

राजलक्ष्मी ने जरा मुस्कराते हुए कहा, “मेरे लिए मन खराब करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम चले आना, मैं बाधा न डालूँगी।”

उसके कहने के ढंग से मुझे चोट पहुँची, मैं चुप हो रहा। यह मैंने बहुत बार देखा है कि वह मेरे इस ढंग के किसी भी प्रश्न को मानो सरल चित्त से ग्रहण नहीं कर सकती। मैं किसी को निष्कपट होकर प्यार कर सकता हूँ, या उसके साथ स्थिर होकर रह सकता हूँ, यह बात किसी भी तरह मानो उसके मन में समाकर एक होना नहीं चाहती। सन्देह के आलोड़न में अविश्वास एक क्षण में ही ऐसा उग्र होकर निकल पड़ता है कि उसकी ज्वाला दोनों ही के मन में बहुत देर तक लप-लप लपटें लिया करती है। अविश्वास की यह आग कब बुझेगी। सोचते-सोचते मुझे इसका कहीं ओर-छोर ही नहीं मिलता। वह भी इसी की खोज में निरन्तर घूम रही है। और, गंगामाटी भी इस बात का अन्तिम फैसला कर देगी या नहीं, यह तथ्य जिनके हाथ में है वे ऑंखों के ओझल चुप्पी साधे बैठे हैं।

सब तरह की तैयारियाँ होते-होते और भी तीन-चार दिन बीत गये; उसके बाद और भी दो एक दिन गये शुभ साइत की प्रतीक्षा में। अन्त में, एक दिन सबेरे हम लोग अपरिचित गंगामाटी के लिए सचमुच ही घर से बाहर निकल पड़े। यात्रा में कुछ अच्छा नहीं लगा, मन में जरा भी खुशी नहीं थी। और, सबसे बुरी बीती शायद रतन पर। वह मुँह को अत्यन्त भारी बनाकर गाड़ी के एक कोने में चुपचाप बैठा ही रहा, स्टेशन पर स्टेशन गुजरते गये, पर उसने किसी भी काम में ज़रा भी सहायता नहीं की। मगर, मैं सोच रहा था, बिल्कु्ल ही दूसरी बात। जगह जानी हुई है या अनजानी, अच्छी है या बुरी, स्वास्थ्यकर है या मलेरिया से भरी, इन बातों की तरफ मेरा ध्याहन ही न था। मैं सोच रहा था; यद्यपि अब तक मेरा जीवन निरुपद्रव नहीं बीता; उसमें बहुत-सी गलतियाँ बहुत-सी भूलें-चूकें, बहुत-सा दु:ख-दैन्य रहा है, फिर भी, वे सब मेरे लिए अत्यन्त परिचित हैं। इस लम्बे अरसे में उनसे मेरा मुकाबिला तो हुआ ही है, साथ ही एक तरह का स्नेहा सा पैदा हो गया है। उनके लिए मैं किसी को भी दोष नहीं देता, और अब मुझे भी और कोई दोष देकर अपना समय नष्ट नहीं करता। परन्तु, यह जीवन क्या जाने कहाँ को किस नवीनता की ओर निश्चित रूप से चला जा रहा है और इस निश्चितता ने ही मुझे विकल कर दिया है। 'आज नहीं कल' कहकर और देर करने का भी रास्ता नहीं। और मज़ा यह कि न तो मैं इसकी भलाई को जानता हूँ और न बुराई को। इसी से इसकी भलाई-बुराई कुछ भी, किसी हालत में, अब मुझे अच्छी नहीं लगती। गाड़ी ज्यों-ज्यों तेजी के साथ गन्तव्य स्थान के निकट पहुँचती जाती है, त्यों-त्यों इस अज्ञात रहस्य का बोझ मेरी छाती पर पत्थर-सा भारी होकर मज़बूती से बैठता जाता है। कितनी-कितनी बातें मन में आने लगीं, उनकी कोई हद नहीं। मालूम हुआ, निकट भविष्य में ही शायद मुझको ही केन्द्र बनाकर एक भद्दा दल संगठित हो उठेगा। उसे न तो ग्रहण कर सकूँगा और न अलग फेंक सकूँगा। तब क्या होगा और क्या न होगा, इस बात को सोचने में भी मेरा मन मानो जमकर बरफ हो गया।

मुँह उठाकर देखा, तो राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी खिड़की के बाहर देख रही है। सहसा मालूम हुआ कि मैंने कभी किसी दिन इससे प्रेम नहीं किया। फिर भी इसे ही मुझे प्रेम करना पडेग़ा। कहीं किसी तरफ से भी निकल भागने का रास्ता नहीं है। संसार में इतनी बड़ी विडम्बना क्या कभी किसी के भाग्य में घटित हुई है? और मज़ा यह कि एक ही दिन पहले इस दुविधा की चक्की से अपनी रक्षा करने के लिए अपने को सम्पूर्ण रूप से उसी के हाथ सौंप दिया था। तब मन-ही-मन जोर के साथ कहा था कि तुम्हारी सभी भलाई-बुराइयों के साथ ही तुम्हें अंगीकार करता हूँ लक्ष्मी! और आज, मेरा मन ऐसा विक्षिप्त और ऐसा विद्रोही हो उठा। उसी से सोचता हूँ, संसार में 'करूँगा' कहने में और सचमुच के करने में कितना बड़ा अन्तर है!
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साँइथिया स्टेशन पर जब गाड़ी पहुँची तब दिन ढल रहा था। राजलक्ष्मी के गुमाश्ता काशीराम स्वयं स्टेशन पर नहीं आ सके, वे उधर के इन्तज़ाम में लगे हुए हैं। मगर दो आदमियों को उन्होंने चिट्ठी लिखकर भेज दिया है। उनके रुक्के से मालूम हुआ कि ईश्वर की इच्छा से 'अब', अर्थात् उनके घर में और उनकी गंगामाटी में सब तरह से कुशल है। आज्ञानुसार स्टेशन के बाहर चार बैलगाड़ियाँ तैयार खड़ी मिलेंगी जिनमें से दो तो खुली हुई हैं और दो छाई हुई। एक पर बहुत-सा सूखा घास और खजूर की पत्तियों की चटाई बिछा दी गयी है और वह स्वयं मालकिन साहबा के लिए है। दूसरी में मामूली थोड़ा-सा घास डाल दिया गया है, पर चटाई नहीं है वह नौकर-चाकर आदि अनुचरों के लिए है। खुली हुई दो गाड़ियों पर असबाब लादा जायेगा। और 'यद्यपि स्यात्' स्थानाभाव हो, तो पियादों को हुक्म देते ही वे बाजार से और भी एक गाड़ी लाकर हाज़िर कर देंगे। उन्होंने और भी लिखा है कि भोजनादि सम्पन्न करके संध्याब से पूर्व ही रवाना हो जाना वांछनीय है। अन्यथा मालकिन साहबा की सुनिद्रा में व्याघात हो सकता है। और इस विषय में विशेष लिखा है कि मार्ग में भयादि कुछ नहीं है, आनन्द से सोती हुई आ सकती हैं।

मालकिन साहबा रुक्का पढ़कर कुछ मुसकराईं। जिसने उसे दिया उससे भयादि के विषय में कोई प्रश्न न करके उन्होंने पूछा, “क्यों भाई, आसपास में कोई तलाव-अलाव बता सकते हो? एक डुबकी लगा आती।”

“है क्यों नहीं, माँ जी। वह रहा वहाँ...”

“तो चलो भइया, दिखा दो” कहती हुई वह उस आदमी को और रतन को साथ लेकर न जाने कहाँ की एक अनजान तलैया में स्नानादि करने चली गयी। बीमारी आदि का भय दिखाना निरर्थक समझकर मैंने प्रतिवाद भी नहीं किया। ख़ासकर इसलिए कि अगर वह कुछ खा-पी लेना चाहती हो, तो इससे वह भी आज के लिए बन्द हो जायेगा।

लेकिन, आज वह दसेक मिनट में ही लौट आई। बैलगाड़ी पर असबाब लद रहा है और मामूली-सा एक बिस्तर खोलकर सवारी वाली गाड़ी में बिछा दिया गया है। मुझसे उसने कहा, “तुम क्यों नहीं इसी वक्त कुछ खा-पी लेते? सभी कुछ तो आ गया है।”

मैंने कहा, “दो!”

पेड़ के नीचे आसन बिछाकर एक केले के पत्ते पर मेरे लिए वह खाना परोस रही थी और मैं निस्पृह दृष्टि से सिर्फ उसकी ओर देख रहा था। इतने में एक मूर्ति ने आकर और सामने खड़े होकर कहा, “नारायण!”

राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर बायें हाथ से धोती का पल्ला खींचते हुए मुँह उठाकर ऊपर देखा और कहा, “आइए।”

अकस्मात् यह नि:संकोच निमन्त्रण का शब्द सुनकर मुँह उठाकर देखा, तो, एक साधु खड़ा है। बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसकी उमर ज्यादा नहीं थी, वह शायद बीस-बाईस के भीतर ही होगा, मगर देखने में जैसा सुकुमार वैसा ही सुन्दर! चेहरा कृशता की ओर ही जा रहा है, शायद कुछ लम्बा होने के कारण ही ऐसा मालूम हुआ, मगर रंग तपे-सोने जैसा। ऑंखें, भौहें, चेहरा और ललाट की बनावट निर्दोष। वास्तव में, पुरुष का इतना रूप मैंने कभी देखा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ। उसका गेरुआ परिधान-वस्त्र जगह-जगह फटा हुआ है, गाँठें बँधी हुई हैं। बदन पर गेरुआ ढीला कुरता है, उसकी भी यही दशा है; पैरों में पंजाबी जूता है, उसकी हालत भी वैसी ही है। खो जाने पर उसके लिए अफसोस करने की जरूरत नहीं। राजलक्ष्मी ने ज़मीन से सिर टेककर प्रणाम करके आसन बिछा दिया। फिर मुँह उठाकर कहा, “मैं जब तक भोजन परोसने की तैयारी करूँ, तब तक आपको मुँह-हाथ धोने के लिए जल दिया जाय।”

साधु ने कहा, “हाँ हाँ, लेकिन आपके पास मैं दूसरे ही काम के लिए आया था।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “अच्छी बात है, आप भोजन करने बैठिए, और बातें पीछे होंगी। पर लौटने के लिए टिकट ही चाहिए न? सो मैं खरीद दूँगी।” इतना कहकर उसने मुँह फेरकर अपनी हँसी छिपा ली।

साधुजी ने गम्भीरता के साथ जवाब दिया, “नहीं, उसकी जरूरत नहीं। मुझे खबर मिली है कि आप लोग गंगामाटी जा रहे हैं। मेरे साथ एक भारी बॉक्स है, उसे अगर आप अपनी गाड़ी में ले चलें तो अच्छा हो। मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “इसमें कौन-सी बड़ी बात है; मगर आप खुद?”

“मैं पैदल ही जा सकता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, छै-सात कोस ही तो होगा।”

राजलक्ष्मी ने और कुछ न कहकर रतन को बुला के जल देने के लिए कहा और खुद ढंग के साथ अच्छी तरह साधुजी के लिए भोजन परोसने में लग गयी। यह राजलक्ष्मी की खास अपनी चीज है, इस काम में उसका सानी मिलना मुश्किल है।

साधु महाराज खाने बैठे, मैं भी बैठ गया। राजलक्ष्मी मिठाई के बर्तन लिये पास ही बैठी रही। दो ही मिनट बाद राजलक्ष्मी ने धीरे-से पूछा, “साधुजी, आपका नाम?”

साधु ने खाते खाते कहा, “वज्रानन्द।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “बाप रे बाप! और पुकारने का नाम?”

उसके कहने के ढंग से मैंने उसकी तरफ देखा तो उसका सारा चेहरा दबी हुई मुस्कराहट से चमक उठा था, मगर वह हँसी नहीं। मैंने भोजन करने में मन लगाया। साधुजी ने कहा, “उस नाम के साथ तो अब कोई सम्बन्ध नहीं रहा। न अपना रहा और न दूसरों का।”

राजलक्ष्मी ने सहज ही हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “हाँ, सो तो ठीक है।” परन्तु क्षण-भर बाद वह फिर पूछ बैठी, “अच्छा साधुजी, आपको घर से भागे कितने दिन हुए?”

प्रश्न बहुत ही अभद्र था। मैंने निगाह उठाकर देखा, राजलक्ष्मी के चेहरे पर हँसी तो नहीं है, पर जिस प्यारी के चेहरे को मैं भूल गया था, इस समय राजलक्ष्मी की तरफ देखकर निमेष-मात्र में वही चेहरा मुझे याद आ गया। उन पुराने दिनों की सारी सरसता उसकी ऑंखों, मुँह और कण्ठ-स्वर में मानो सजीव होकर लौट आई है।

साधु ने एक कौर नीचे उतारकर कहा, “आपका यह कुतूहल ही अनावश्यक है।”

राजलक्ष्मी जरा भी क्षुण्ण नहीं हुई, भले मानसों की तरह सिर हिलाकर बोली, “सो तो सच है। लेकिन, एक बार मुझे बहुत भुगतना पड़ा था, इसी से...” कहते हुए उसने मेरी ओर लक्ष्य करके कहा, “हाँ जी, तुम अपना वह ऊँट और टट्टू का किस्सा तो सुनाना! साधुजी को जरा सुना तो दो, अरे रे, भगवान भरोसा! घर में शायद कोई याद कर रहा है।”

साधुजी के गले में, शायद हँसी रोकने में ही, फन्दा लग गया। अब तक मेरे साथ उनकी एक भी बात नहीं हुई थी, मालकिन महोदय की ओट में मैं कुछ-कुछ अनुचर-सा ही बना बैठा था। अब साधुजी ने फन्दे को सँभालते हुए यथासाध्या गम्भीरता के साथ मुझसे पूछा, “तो आप भी शायद एक बार सन्यासी...”

मेरे मुँह में पूड़ी थी, ज्यादा बात करने की गुंजाइश न थी, इसलिए दाहिने हाथ की चार उँगलियाँ उठाकर गरदन हिलाते हुए मैंने कहा, “उँहूँ...एक बार नहीं, एक बार नहीं...”

अब तो साधुजी की गम्भीरता न टिक सकी, वे और राजलक्ष्मी दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े। हँसी थमने पर साधुजी ने कहा, “लौट क्यों आये?”

मैं अब तक पूड़ी का कौर लील न सका था, सिर्फ इशारे से राजलक्ष्मी को दिखा दिया।

राजलक्ष्मी ने मुझे डाँट-सा दिया, कहा, “हाँ, सो तो ठीक है! अच्छा, एक बार मान लिया मेरे लिए ही, सो भी ठीक सच नहीं है, असल में जबरदस्त बीमारी की वजह से ही।- मगर और तीन बार?”

मैंने कहा, “वह भी लगभग ऐसे ही कारण से, मच्छड़ों के मारे। मच्छड़ों का काटना चमड़े से बरदाश्त नहीं हुआ। अच्छा...”

साधु ने हँसकर कहा, “मुझे आप वज्रानन्द ही कहा कीजिएगा। आपका नाम...”

मुझसे पहले राजलक्ष्मी ने ही जवाब दिया। बोली, “इनके नाम से क्या होगा। उमर में ये बहुत बड़े हैं, इन्हें आप भइया कहा कीजिएगा। और मुझे भी भाभी कहें तो मैं नाराज न हूँगी। मैं भी तो उमर में तुमसे चार-छै साल बड़ी ही हूँगी।”

साधुजी का चेहरा सुर्ख हो उठा। मैंने भी इतनी आशा नहीं की थी। आश्चर्य के साथ मैंने देखा कि वही है। वही स्वच्छ, सरल, स्नेहातुर, आनन्दमयी। वही जिसने मुझे किसी भी तरह श्मशान में नहीं जाने दिया और किसी भी हालत में राजा के संसर्ग में नहीं टिकने दिया,- यह वही है। जो लड़का अपने कहीं के स्नेह-बन्धन को तोड़कर चला आया है, उसकी सम्पूर्ण अज्ञात वेदना ने राजलक्ष्मी के समस्त हृदय को मथ डाला है। किसी भी तरह इसे वह फिर से घर लौटा देना चाहती है।

साधु बेचारे ने लज्जा के धक्के को सँम्हाजलते हुए कहा, “देखिए, भइया कहने में मुझे ऐसी कोई आपत्ति नहीं, मगर हम सन्यासी लोगों को किसी को इस तरह नहीं पुकारना चाहिए।”

राजलक्ष्मी लेशमात्र भी अप्रतिभ ने हुई। बोली, “क्यों नहीं! भइया की बहू को सन्यासी लोग कोई मौसी कहकर तो पुकारते नहीं, और बुआ कहते हों सो भी नहीं, इसके सिवा मुझे तुम और क्या कहकर पुकार सकते हो?”

लड़का निरुपाय होकर अन्त में सलज्ज हँसते हुए चेहरे से बोला, “अच्छी बात है। छै-सात घण्टे और भी हूँ आपके साथ, इस बीच में अगर जरूरत पड़ी तो वही कहूँगा।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “तो कहो न एक बार!”

साधु हँस पड़े, बोले, “जरूरत पड़ेगी तो कहूँगा, झूठमूठ पुकारना ठीक नहीं।”

राजलक्ष्मी ने उसकी पत्तल में और भी चार-पाँच 'सन्देश' और बरफी परोसकर कहा, “अच्छा, उसी से मेरा काम चल जायेगा। मगर जरूरत पड़ने पर मैं क्या कहकर तुम्हें बुलाऊँ, सो कुछ समझ में नहीं आता।” फिर मेरी तरफ इशारा करके कहा, “इन्हें तो बुलाया करती थी। 'सन्यासी महाराज' कह के। सो अब हो नहीं सकता, घुटाला हो जायेगा। अच्छा, तो मैं तुम्हें 'साधु देवर' कहा करूँ, क्या कहते हो?”

साधुजी ने आगे तर्क नहीं किया, अत्यन्त गम्भीरता के साथ कहा, “अच्छा, सो ही सही।”

वे और बातों में चाहे जैसे हों, पर देखा कि खाने-पीने के मामले में उन्हें काफी रसज्ञता है। पछाँह की उमदा मिठाइयों की वे कदर करते हैं, और यही वजह है कि किसी वस्तु का उन्होंने असम्मान नहीं किया। एक तो बड़े जतन और परम स्नेह के साथ एक के बाद एक चीज परोसती जाती थी, और दूसरे सज्जन चुपचाप बिना किसी संकोच के गले के नीचे उतारते जाते थे। मगर मैं उद्विग्न हो उठा। मन-ही-मन समझ गया कि साधुजी पहले चाहे कुछ भी करते रहे हों, परन्तु, फिलहाल इन्हें ऐसी उपादेय भोज्य सामग्री इतनी ज्यादा तादाद में सेवन करने का मौका नहीं मिला है। परन्तु, कोई अगर अपनी दीर्घकाल व्यापी त्रृटि को एक ही बार में एक साथ दूर करने का प्रयत्न करे, तो उसे देखकर दर्शकों के लिए धैर्य की रक्षा करना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है। लिहाजा राजलक्ष्मी के और भी कई पेड़े और बरफी साधुजी की पत्तल में रखते ही अनजान में मेरी नाक और मुँह से एक साथ इतना बड़ा दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ा कि राजलक्ष्मी और उसके नये कुटुम्बी दोनों ही चौंक पड़े। राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखकर झटपट कह उठी, “तुम कमजोर आदमी हो, चलो उठकर मुँह-हाथ धो लो। हम लोगों के साथ बैठे रहने की क्या जरूरत है?”

साधुजी ने एक बार मेरी तरफ, और फिर राजलक्ष्मी की तरफ और उसके बाद मिठाई वाले बरतन की तरफ देखकर हँसते हुए कहा, “गहरी साँस लेने की तो बात ही है भाई, कुछ भी तो नहीं बचा!”

“अभी बहुत है” कहकर राजलक्ष्मी मेरी ओर क्रुद्ध दृष्टि देखकर रह गयी।

ठीक इसी समय रतन पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला, “चिउड़ा तो बहुत मिलता है, पर दूध या दही कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं मिला।”

साधु बेचारे अत्यन्त लज्जित होकर बोले, “आप लोगों के आतिथ्य पर मैंने बड़ा अत्याचार किया है,” यह कहकर वे सहसा उठना ही चाहते थे कि राजलक्ष्मी व्याकुल होकर कहने लगी, “मेरे सर की कसम है लालाजी, अगर उठे। कसम खाती हूँ, मैं सब उठा के फेंक दूँगी।”

साधु क्षण-भर तो विस्मय से शायद यही सोचते रहे कि यह कैसी स्त्री है जो दो घड़ी की जान-पहिचान में ही इतनी गहरी घनिष्ठ हो उठी। राजलक्ष्मी की प्यारी का इतिहास जो नहीं जानता उसके लिए तो यह आश्चर्य की बात है ही।

इसके बाद वह जरा हँसकर बोले, “मैं सन्यासी आदमी ठहरा, खाने-पीने में मुझे कोई हिचक नहीं है; मगर आपको भी कुछ खाना चाहिए। मेरी कसम खाने से तो पेट भर नहीं जायेगा?”

राजलक्ष्मी ने दाँतों-तले जीभ दबाकर गम्भीरता के साथ कहा, “छि छि, ऐसी बात औरतों से नहीं कहना चाहिए, लालाजी। मैं यह सब कुछ नहीं खाती, मुझसे बरदाश्त नहीं होता। नौकर, तो उनके लिए काफी है। आज रात-भर की ही बात है, जो कुछ मिल जाय, मुट्ठी-भर चिउड़ा-इउड़ा खाकर जरा पानी पी लेने से ही मेरा काम चल जायेगा। लेकिन, तुम अगर भूखे उठ गये, तो थोड़ा-बहुत जो कुछ मैं खाती हूँ सो भी न खाऊँगी। विश्वास न हो तो इनसे पूछ लो।” इतना कहकर उसने मुझसे अपील की। मैंने कहा, “यह बात सच है, इसे मैं हलफ उठाकर कहने को तैयार हूँ। साधुजी, झूठमूठ बहस करने से कोई लाभ नहीं। भाई साहब, बन सके तो बर्तन को औंधा करके उड़ेलवाने तक सेवन करते चले जाओ; नहीं तो, फिर यह किसी काम में ही नहीं आयेगा। यह सब सामान रेलगाड़ी में आया है। लिहाजा भूखों मर जाने पर भी कोई इन्हें तिल-भर भी नहीं खिला सकता। यह ठीक बात है।”

साधु ने कहा, “मगर यह मिठाई तो गाड़ी की छुई हुई नहीं मानी जाती!”

मैंने कहा, “इसकी मीमाँसा तो मैं इतने दिनों में भी खतम न कर सका भाई साहब, तब तुम क्या एक ही बैठक में फैसला कर डालोगे? इससे तो बल्कि हाथ का काम खतम करके उठ बैठना अच्छा, नहीं तो सूरज डूब जाने पर शायद चिउड़ा पानी भी गले से नीचे उतारने की नौबत न आयेगी। मेरा कहना है कि दो-चार घण्टे तो तुम साथ में हो ही, शास्त्र का विचार समझा सको तो रास्ते में समझा देना, उससे काज न होगा ता कम-से-कम अकाज न बढ़ेगा। इस वक्त जो हो रहा है, वही होने दो।”

साधु ने पूछा, “तो क्या दिन-भर से इन्होंने कुछ खाया ही नहीं?”

मैंने कहा, “नहीं। इसके सिवा कल भी क्या जाने क्या था, सुन रहा हूँ कि दो-चार फल-फूल के सिवा कल भी और कुछ मुँह में नहीं दिया है।”

रतन पीछे ही खड़ा था, गरदन हिलाकर क्या जाने क्या कहते-कहते, शायद मालकिन की ऑंख के गुप्त इशारे से सहसा रुक गया।

साधु ने राजलक्ष्मी की ओर देखकर कहा, “इससे आपको कष्ट नहीं होता?”

उत्तर में राजलक्ष्मी सिर्फ जरा हँस दी, परन्तु मैंने कहा, “इस बात को आप प्रत्यक्ष और अनुमान किसी तरह भी नहीं जान सकते। हाँ, ऑंखों से जो कुछ देखा है उसमें, शायद, दो-एक दिन और भी जोड़े जा सकते हैं।”

राजलक्ष्मी ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “तुमने देखा है ऑंखों से?- कभी नहीं।”

मैंने इसका जवाब नहीं दिया, और साधुजी ने भी फिर कोई प्रश्न नहीं किया। समय की तरफ खयाल करके वे चुपचाप भोजन समाप्त करके उठ बैठे।

रतन और उसके साथी दो जनों को खाते-पीते बहुत देर हो गयी। राजलक्ष्मी ने अपने लिए क्या व्यवस्था की, सो वही जाने। हम लोग गंगामाटी के लिए जब रवाना हुए तब शाम हो चुकी थी। एकादशी का चाँद अब तक उज्ज्वल न हुआ था, और अन्धकार भी कहीं कुछ न था। असबाब की दोनों गाड़ियाँ सबसे पीछे, राजलक्ष्मी की गाड़ी बीच में और हम लोगों की गाड़ी अच्छी होने के कारण सबसे आगे थी। साधुजी को पुकारकर मैंने कहा, “भाई साहब, पैदल तो चलते ही रहते हो, इसकी तुम्हें कोई कमी नहीं, आज-भर के लिए, न हो तो, मेरी ही गाड़ी पर आ जाओ।”

साधु ने कहा, “साथ ही तो चल रहे हैं, न चल सकूँगा तो बैठ लूँगा, मगर अभी जरा पैदल ही चलूँ।”

राजलक्ष्मी ने मुँह निकालकर कहा, “तो तुम मेरे बॉडी-गार्ड होकर चलो लालाजी, तुम्हारे साथ बातचीत करती हुई चलूँगी।” यह कहकर उसने साधुजी को अपनी गाड़ी के पास बुला लिया। सामने ही मैं था। बीच-बीच में गाड़ी, बैल और गाड़ीवानों के सम्मिलित उपद्रव से उनकी बातचीत के किसी-किसी अंश से वंचित होने पर भी अधिकांश सुनता हुआ चला।

राजलक्ष्मी ने कहा, “घर तुम्हारा इधर नहीं है, हमारे ही देश की तरफ है, सो तो मैं तुम्हारी बात सुनकर ही समझ गयी थी, मगर आज कहाँ चले हो, सच्ची-सच्ची बताना भाई।”

साधु ने कहा, “गोपालपुर।”

राजलक्ष्मी ने पूछा, “हमारी गंगामाटी से वह कितनी दूर है?”

साधु ने जवाब दिया, “आपकी गंगामाटी भी मुझे नहीं मालूम, और अपने गोपालपुर से भी वाकिफ नहीं; लेकिन हाँ, होंगे दोनों पास ही पास। कम-से-कम सुना तो ऐसा ही है।”

“तो फिर इतनी रात में कैसे तो गाँव पहिचानोगे, और कैसे उनका घर ढूँढ़ निकालोगे जिनके यहाँ जा रहे हो?”

साधुजी ने जरा हँसकर कहा, “गाँव पहिचानने में दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि रास्ते पर ही शायद एक सूखा तालाब है, उसके दक्खिन कोस-भर चलने से ही वह मिल जायेगा। और घर ढूँढ़ने की तो तकलीफ उठानी ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि सभी अनजान हैं। मगर हाँ, पेड़ के नीचे तो जगह मिल ही जायेगी, इसकी पूरी उम्मीद है।”

राजलक्ष्मी ने व्याकुल होकर कहा, “ऐसे जाड़े की रात में पेड़ तले? इस जरा-से कम्बल पर भरोसा रखके? इसे मैं हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती, समझे लालाजी!”

उसके उद्वेग ने मानो मुझ तक को चोट पहुँचाई। साधु कुछ देर चुप रहकर धीरे-से बोले, “मगर हम लोगों के तो घर-द्वार नहीं है, हम लोग तो पेड़ तले ही रहा करते हैं, जीजी।”

अबकी बार राजलक्ष्मी भी क्षण-भर मौन रहकर बोली, “सो जीजी की ऑंखों के सामने नहीं। रात के वक्त भाई को मैं निराश्रय नहीं छोड़ सकती। आज मेरे साथ चलो, कल मैं खुद ही तैयारी करके भेज दूँगी।”

साधु चुप रहे। राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर कह दिया कि बिना उनसे पूछे गाड़ी की कोई चीज स्थानान्तरित न की जाय। अर्थात् सन्यासी महाराज का बॉक्स आज रात-भर के लिए रोक रक्खा गया।

मैंने कहा, “तो फिर क्यों झूठमूठ को ठण्ड में तकलीफ उठा रहे हो भाई साहब, आ जाओ न मेरी गाड़ी में।”

साधु ने जरा कुछ सोचकर कहा, “अभी रहने दो। जीजी के साथ ज़रा बातचीत करता हुआ चल रहा हूँ।”

मैंने भी सोचा कि ठीक है और ताड़ गया कि अभी साधु बाबा के मन में नये सम्बन्ध को अस्वीकार करने का द्वन्द्व चल रहा है। मगर फिर भी, अन्त तक बचाव न हो सका। सहसा, जबकि उन्होंने अंगीकार कर ही लिया, तब बार-बार मेरे मन में आने लगा कि जरा सावधान करके उनसे कह दूँ, 'महाराज, भाग जाते तो अच्छा होता। अन्त में कहीं मेरी-सी दशा न हो!'

लेकिन, मैं चुप ही रहा।

दोनों की बातचीत धड़ल्ले से होने लगी। बैलगाड़ी के झकझोरों और ऊँघाई के झोंकों में, बीच-बीच में उनकी बातचीत का सूत्र खोते रहने पर भी, कल्पना की सहायता से उसे पूरा करते हुए रास्ता तय करने में मेरा समय भी बुरा नहीं बीता।

शायद मैं जरा तन्द्रा-मग्न हो गया, सहसा सुना, पूछा जा रहा है, “क्यों आनन्द, तुम्हारे उस बॉक्स में क्या-क्या है, भाई?”

उत्तर मिला, “कुछ किताबें और दवा-दारू है जीजी।”

“दवा-दारू क्यों? तुम क्या डॉक्टर हो?”

“मैं तो सन्यासी हूँ। अच्छा, आपने क्या सुना नहीं जीजी, आपके उस तरफ हैजा फैल रहा है?”

“नहीं तो। यह बात तो हमारे गुमाश्ते ने नहीं जताई। अच्छा, लालाजी, तुम हैजे को आराम कर सकते हो?”

साधुजी ने जरा मौन रहकर कहा, “आराम करने के मालिक तो हम लोग नहीं दीदी, हम लोग तो सिर्फ दवा देकर कोशिश कर सकते हैं। मगर इसकी भी जरूरत है, यह भी उन्हीं का आदेश है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “सन्यासी भी दवा दिया करते हैं, ठीक है, मगर सिर्फ दवा देने ही के लिए सन्यासी नहीं बना जाता। अच्छा आनन्द, तुम क्या सिर्फ इसीलिए सन्यासी हुए हो भइया?”

साधु ने कहा, “सो मैं ठीक नहीं जानता जीजी, मगर हाँ, देश की सेवा करना भी हम लोगों का एक व्रत है।”

“हम लोगों का? तो शायद तुम लोगों का एक दल होगा न, लालाजी?”

साधु कुछ जवाब न देकर चुप बने रहे। राजलक्ष्मी ने फिर पूछा, “लेकिन सेवा करने के लिए सो सन्यासी होने की जरूरत नहीं होती, भाई। तुम्हें यह मति बुद्धि दी किसने, बताओ तो?”

साधुजी ने इस प्रश्न का शायद उत्तर नहीं दिया, क्योंकि, कुछ देर तक किसी की कोई बात सुनने में नहीं आई। दसेक मिनट बाद कान में भनक पड़ी, साधुजी कह रहे हैं, 'जीजी, मैं बहुत ही क्षुद्र सन्यासी हूँ। मुझे यह नाम न भी दिया जाय तो ठीक है। मैंने तो सिर्फ अपना थोड़ा-सा भार फेंककर उसकी जगह दूसरों का बोझ लाद लिया है।”

राजलक्ष्मी कुछ बोली नहीं, साधुजी कहने लगे, “मैं शुरू से ही देख रहा हूँ कि आप मुझे बराबर घर लौटाने की कोशिश कर रही हैं। मालूम नहीं क्यों, शायद जीजी होने की वजह से ही। परन्तु जिनका भार लेने के लिए हम घर छोड़कर निकल आये हैं वे कितने दुर्बल, कितने रुग्ण, कैसे निरुपाय और कितनी संख्या में हैं, यह अगर किसी तरह एक बार जान जातीं, तो उस बात को फिर मन में भी ला नहीं सकतीं।”

इसका भी राजलक्ष्मी ने कुछ उत्तर नहीं दिया; परन्तु मैं समझ गया कि जो प्रसंग छिड़ा है, उसमें अब दोनों के मन और मत के भेद होने में देर नहीं होगी। साधुजी ने भी ठीक जगह पर ही चोट की है। देश की आभ्यन्तरिक अवस्था और उसके सुख, दु:ख, अभाव को मैं खुद भी कुछ कम नहीं जानता; मगर ये सन्यासी कोई भी क्यों न हों, इन्होंने अपनी इस थोड़ी-सी उमर में मुझसे बहुत ज्यादा और घनिष्ठ भाव से सब देखा-भाला है और बहुत विशाल हृदय से उसे अपनाया है। सुनते-सुनते ऑंखों की नींद ऑंसुओं में परिवर्तित हो गयी और सारा हृदय क्रोध, क्षोभ, दु:ख और व्यथा से मानो मथा जाने लगा। पीछे की गाड़ी के अंधेरे कोने में अकेली बैठी हुई राजलक्ष्मी ने एक प्रश्न तक नहीं किया, इतनी बात में से एक भी बात में उसने साथ नहीं दिया। उसकी नीरवता से साधु महाराज ने क्या सोचा होगा सो वे ही जानें; परन्तु, इस एकान्त स्तब्धता का सम्पूर्ण अर्थ मुझसे छिपा न रहा।

'देश' के मानी हैं वे गाँव जहाँ देश के चौदह आने नर-नारी वास करते हैं। उन्हीं गाँवों की कहानी साधु कहने लगे। देश में पानी नहीं है, प्राण नहीं हैं, स्वास्थ्य नहीं है, जंगल की गन्दगी से जहाँ मुक्त प्रकाश और साफ हवा का मार्ग रुका हुआ है- जहाँ ज्ञान नहीं, जहाँ विद्या नहीं, धर्म भी विकृत और पथभ्रष्ट है : मृतकल्प जन्म-भूमि के इस दु:ख का विवरण छापे के अक्षरों में भी पढ़ा है और अपनी ऑंखों से भी देखा है, परन्तु यह न होना, कितना बड़ा 'न होना' है, इस बात को, मालूम हुआ कि, आज से पहले जानता ही न था। देश की यह दीनता कितनी भयंकर दीनता है, आज से पहले मानो उसकी धारणा भी मुझे न थी। सूखे सूने विस्तृत मैदान में से हम लोग गुजर रहे हैं। सड़क की धूल ओस से भीगकर भारी हो गयी है। उस पर गाड़ी के पहियों और बैलों के खुरों का शब्द कदाचित् ही सुनाई दे रहा है। आकाश की चाँदनी पाण्डुर होकर जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ तक फैल रही है। इसी के भीतर के शीतऋतु के इस निस्तब्ध निशीथ में हम लोग अज्ञात की ओर धीर मन्थर गति से लगातार चल रहे हैं; अनुचरों में से कौन जाग रहा है और कौन नहीं, सो भी नहीं मालूम होता, सभी कोई शीत-वस्त्रों से अपना सर्वाक्ष् ढके हुए चुपचाप पड़े हैं। सिर्फ अकेले सन्यासीजी ही हमारे साथ सजग चल रहे हैं और इस परिपूर्ण स्तब्धता में सिर्फ उन्हीं के मुँह से देश के अज्ञात भाई-बहनों की असह्य वेदना का इतिहास मानो लपटें ले-लेकर जल-जलकर निकल रहा है। यह सोने की भूमि किस तरह धीरे-धीरे ऐसी शुष्क, ऐसी रिक्त हो गयी, कैसे देश की समस्त सम्पदा विदेशियों के हाथ में पड़कर धीरे-धीरे विदेश में चली गयी, किस तरह मातृ-भूमि के समस्त मेद-मज्जा और रक्त को विदेशियों ने शोषण कर लिया, इसके ज्वलन्त इतिहास को मानो वह युवक ऑंखों के सामने एक-एक करके उद्धाटित करके दिखलाने लगा।

सहसा साधु ने राजलक्ष्मी को सम्बोधन करके कहा, “मालूम होता है, तुम्हें मैं पहिचान सका हूँ जीजी। मन में आता है, तुम जैसी बहिनों को ले जाकर तुम्हारी अपनी ऑंखों के सामने तुम्हारे उन सब भाई-बहनों को दिखलाऊँ।”

राजलक्ष्मी से पहले तो कुछ बोला न गया, बाद में रुँधे हुए गले से वह बोली, “मुझे क्या ऐसा मौका मिल सकता है, आनन्द? मैं जो औरत हूँ, इस बात को मैं कैसे भूलूँ, भइया?”

साधु ने कहा, “क्यों नहीं मिल सकता बहन? और, तुम औरत हो, इस बात को ही यदि भूल जाओगी तो कष्ट उठाकर तुम्हें वह सब दिखाने से मुझे लाभ ही क्या होगा?”
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साधु ने पूछा, “गंगामाटी क्या तुम्हीं लोगों की जमींदारी है, जीजी?” राजलक्ष्मी ने जरा मुसकराकर कहा, “देखते क्या हो भाई, हम एक बड़े भारी जमींदार हैं।”

अबकी बार जवाब देने में साधु भी जरा हँस पड़ा। बोला, “बड़ी भारी जमींदारी, लेकिन, बड़ा भारी सौभाग्य नहीं है, जीजी।” उसकी बात से उसकी पार्थिव अवस्था के सम्बन्ध में मुझे एक तरह का सन्देह उत्पन्न हुआ, परन्तु राजलक्ष्मी उस दिशा की ओर नहीं गयी। उसने सरल भाव से तत्क्षण स्वीकार करते हुए कहा, “बात तो सच है आनन्द। यह सब जितनी ही दूर हो जाय, उतना अच्छा।”

“अच्छा जीजी, वे अच्छे हो जाँयगे तो फिर तुम अपने शहर को लौट आओगी?”

“लौट जाऊँगी? मगर वह तो बहुत दूर की बात है भाई!”

साधु ने कहा, “बन सके तो अब मत लौटना, जीजी। इन सब गरीब अभागों को तुम लोग छोड़कर चली गयी हो, इसी से तो इनका दु:ख कष्ट चौगुना बढ़ गया है। जब पास थीं तब भी तुमने इन्हें कष्ट न दिया हो सो बात नहीं, मगर दूर रहकर इतना निर्मम दु:ख उन्हें न दे सकी होगी। तब जैसे दु:ख दिया है; वैसे दु:ख बँटाया भी है। जीजी, देश का राजा अगर देश ही में रहे तो देश का दु:ख-दैन्य शायद इस तरह गले तक न भर उठा करे। और, इस 'गले तक भरने' का मतलब क्या है और तुम लोगों को शहर-वास के लिए सर्व प्रकार आहार-विहार का सामान जुटाने का अभाव और अपव्यय क्या है, इस चीज को अगर एक बार ऑंखें पसारकर देख सकतीं जीजी...”

“क्यों आनन्द, घर के लिए तुम्हारा मन चंचल नहीं होता?...”

साधु ने संक्षेप में कहा, “नहीं।”

वह बेचारा समझा नहीं, परन्तु मैं समझ गया कि राजलक्ष्मी ने उस प्रसंग को दबा दिया, महज इसलिए कि उससे सहा नहीं जाता था।

कुछ देर मौन रहकर राजलक्ष्मी ने व्यथित कण्ठ से पूछा, “घर पर तुम्हारे कौन-कौन हैं?”

साधु ने कहा, “मगर घर तो मेरा अब रहा नहीं।”

राजलक्ष्मी फिर बहुत देर तक नीरव रहकर बोली, “अच्छा आनन्द, इस उमर में सन्यासी होकर क्या तुमने शान्ति पाई है?”

साधु ने हँसकर कहा, “अरे बाप रे! सन्यासी को इतना लोभ! नहीं जीजी, मैंने तो दूसरों के दु:ख का थोड़ा-सा भार लेना चाहा है, और सिर्फ वही पाया है।”

राजलक्ष्मी फिर चुप रही। साधु ने कहा, “वे शायद सो गये होंगे, लेकिन अब जरा उनकी गाड़ी में जाकर बैठूँ। अच्छा जीजी, कभी दो-चार दिन के लिए अगर तुम लोगों का अतिथि बनकर रहूँ तो क्या वे नाराज होंगे?”

राजलक्ष्मी ने कहा, “वे कौन? तुम्हारे भाईसाहब?”

साधुजी ने जरा हँसकर कहा, “अच्छा, यही सही।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “और मैं नाराज हूँगी या नहीं, सो तो पूछा ही नहीं। अच्छा, पहले चलो तो एक बार गंगामाटी, उसके बाद इस बात का विचार किया जायेगा।”

साधुजी ने क्या कहा, सुन न सका, शायद कुछ कहा ही नहीं। थोड़ी देर बाद मेरी गाड़ी में आकर पुकारा, “भाई साहब, आप जाग रहे हैं?”

मैं जाग ही रहा था, पर कुछ बोला नहीं! फिर वे मेरे पास ही थोड़ी-सी जगह निकालकर अपना फटा कम्बल ओढ़कर पड़ रहे। एक बार तबियत तो हुई कि जरा खिसककर बेचारे के लिए थोड़ी-सी जगह और छोड़ दूँ, परन्तु हिलने-डुलने से कहीं उन्हें शक न हो जाय कि मैं जाग रहा हूँ या मेरी नींद उचट गयी है और इस गम्भीर निशीथ में फिर एक बार देश की सुगम्भीर समस्या की आलोचना होने लगे, इस डर से मैंने करुणा प्रकट करने की चेष्टा तक न की।

गाड़ी ने गंगामाटी में कब प्रवेश किया मुझे नहीं मालूम; मुझे तो तब मालूम हुआ जब गाड़ी नये मकान के दरवाजे पर जा खड़ी हुई। तब सबेरा हो चुका था। एक साथ चार बैलगाड़ियों के विविध और विचित्र कोलाहल से चारों तरफ भीड़ तो कम नहीं मालूम हुई। रतन की कृपा से पहले ही सुन चुका था कि गाँव में मुख्यत: छोटी जात ही बसती है। देखा कि नाराजगी में भी उसने बिल्कुचल झूठ नहीं कहा था। ऐसे जाड़े-पाले में तड़के ही पचास-साठ नाना उमर के लड़के-लड़कियाँ, नंग-धड़ंग और उघड़े बदन, शायद हाल ही सोते से उठकर तमाशा देखने के लिए जमा हो गये हैं। पीछे से बाप-महतारियों का झुण्ड भी यथा-योग्य स्थान से ताक-झाँक रहा है। उन सबकी आकृति और पहनावा देखकर उनकी कुलीनता के बारे में और किसी के मन में चाहे हुछ भी हो, मगर, रतन के मन में शायद संशय की भाप भी बाकी न रही। उसका सोते से उठा हुआ चेहरा निमेष-मात्र में विरक्ति और क्रोध से बर्रों के छत्ते के समान भीषण हो उठा। मालकिन के दर्शन करने की अतिव्यग्रता से कुछ लड़के-बाले कुछ आत्म-विस्तृत होकर सटते आ रहे थे। देखते ही रतन ने ऐसे बिकट-रूप से उन्हें धर-खदेड़ा कि सामने अगर दो गाड़ीवान न होते तो वहीं एक खून-खराबी हुई धरी थी। रतन को जरा भी लज्जा का अनुभव न हुआ। मेरी तरफ देखकर बोली, “दुनिया की छोटी जात सब यहीं आकर मरी है! देखी बाबूजी, छोटी जात की हिमाकत? जैसे रथ-यात्रा देखने आए हों! हमारे यहाँ के भले आदमी क्या यहाँ आकर रह सकते हैं बाबूजी? अभी सब छू-छा करके एकाकार कर देंगे।”

'छू-छा' शब्द सबसे पहले पहुँचा राजलक्ष्मी के कानों में। उसका चेहरा अप्रसन्न-सा हो गया।

साधुजी अपना बॉक्स उतारने में व्यस्त थे। अपना काम खतम करके वे एक लोटा निकालकर आगे बढ़ आये और पास ही जिस लड़के को पाया उसका हाथ पकड़कर बोले, “अरे लड़के, जा तो भइया, यहाँ कहीं अच्छा-सा तालाब-आलाब हो हो तो एक लोटा पानी तो ले आ, चाय बनानी है।” यह कहकर उन्होंने लोटा उसके हाथ में थमा दिया, फिर सामने खड़े हुए एक अधेड़ उमर के आदमी से कहा, “चौधरी, आसपास किसी के यहाँ गाय हो तो बता देना भइया, छटाक-भर दूध माँग लाऊँ। गाँव की ताजी खालिस चीज ठहरी, चाय का रंग ऐसा बढ़िया आयेगा जीजी...” फिर उन्होंने एक बार अपनी जीजी के चेहरे की तरफ देखा। मगर 'जीजी' ने इस उत्साह में जरा भी साथ नहीं दिया। अप्रसन्न मुख से जरा मुसकराकर कहा, “रतन, जा तो भइया, लोटा माँजकर जरा पानी तो ले आ।”

रतन के मिजाज का संवाद पहले ही दे चुका हँ। उसके बाद जब उस पर ऐसे जाड़े-पाले में न जाने कौन एक अनजान साधु के लिए, मालूम नहीं कहाँ के तालाब से, पानी लाने का भार पड़ा, तब वह अपने को न रोक सका। एक ही क्षण में उसका सारा गुस्सा जाकर पड़ा, उससे भी जो छोटा था, उस अभागे लड़के पर। वह उसे एक जोर की धमकी देकर बोला, “पाजी बदमाश कहीं का, लोटा क्यों छुआ तूने? चल हरामजादे, लोटा माँजकर पानी में डुबो देना।” इतना कहकर मानो वह सिर्फ अपनी ऑंख-मुख की चेष्टा से ही लड़के को गरदनियाँ देता हुआ ले गया।

उसकी करतूत देखकर साधु हँस पड़े, मैं भी हँस दिया। राजलक्ष्मी ने खुद भी जरा सलज्ज हँसी हँसकर कहा, “गाँव में तुमने तो उथल-पुथल मचा दी आनन्द, साधुओं को शायद रात बीतने के पहले ही चाय चाहिए?”

साधु ने कहा, “गृहस्थों के लिए रात नहीं बीती तो क्या हम लोगों के लिए भी नहीं बीतेगी? खूब। लेकिन दूध की तजवीज तो होनी चाहिए। अच्छा, घर में घुसकर देखा तो जाय, लकड़ी-बकड़ी, चूल्हा-ऊल्हा कुछ है या नहीं। ओ चौधरी, चलो न भइया, किसके यहाँ गाय है, चलके जरा दिखा दो। जीजी, कल के उस बर्तन में बरफी-अरफी कुछ बची थी न? या गाड़ी ही में अंधेरे में उसे खतम कर दिया!

राजलक्ष्मी को हँसी आ गयी। मुहल्ले की जो दो-चार औरतें दूर खड़ी देख रही थीं, उन्होंने मुँह फेर लिया।

इतने में गुमाश्ता काशीराम कुशारी महाशय घबराये हुए आ पहुँचे। साथ में उनके तीन-चार आदमी थे; किसी के सिर पर भर-टोकनी शाक-सब्जी और तरकारी थी, किसी के हाथ में भर-लोटा दूध, किसी के हाथ में दही का बर्तन और किसी के हाथ में बड़ी-सी रोहू मछली। राजलक्ष्मी ने उन्हें नमस्कार किया। वे आशीर्वाद के साथ, अपने आने में जरा देर हो जाने के लिए, तरह-तरह की कैफियत देने लगे। आदमी तो मुझे अच्छा ही मालूम हुआ। उमर पचास से ज्यादा होगी। शरीर कुछ कृश, दाढ़ी-मूछें मुड़ी हुईं और रंग साफ। मैंने उन्हें नमस्कार किया, उन्होंने भी प्रति-नमस्कार किया। परन्तु, साधुजी इस सब प्रचलित शिष्टाचारों के पास से भी न फटके। उन्होंने तरकारी की टोकनी अपने हाथ से उतरवाकर उसमें से एक-एक का विश्लेषण करके विशेष प्रशंसा की। दूध खालिस है, इस विषय में अपना नि:संशय मत जाहिर किया और मछली के वजन का अनुमान करके उसके आस्वाद के विषय में उपस्थित सभी को आशान्वित कर दिया।

साधु महाराज के शुभागमन के विषय में गुमाश्ता साहब को पहले के कुछ खबर नहीं मिली थी; इसलिए, उन्हें कुछ कुतूहल-सा हुआ। राजलक्ष्मी ने कहा, “सन्यासी को देखकर आप डरें नहीं कुशारी महाशय, ये मेरे भाई हैं।” फिर जरा हँसकर मृदु कण्ठ से कहा, “और बार-बार गेरुआ वसन छुड़वाना मानो मेरा काम ही हो गया है!”

बात साधुजी के कानो में भी पड़ी। बोले, “पर यह काम उतना आसान न होगा, जीजी।” यों कहकर मेरी ओर कनखियों से देख के जरा हँसे। इसके मानी मैं भी समझ गया और राजलक्ष्मी भी। मगर प्रत्युत्तर में उसने सिर्फ जरा मुसकराकर कहा, “सो देखा जायेगा।”

मकान के भीतर प्रवेश करके देखा गया कि कुशारी महाशय ने इन्तज़ाम कुछ बुरा नहीं किया है। बहुत ही जल्दी की वजह से उन्होंने खुद अन्यत्र जाकर पुराने कचहरी वाले मकान को थोड़ा-बहुत जीर्णोद्वार कराके खासा रहने- लायक बना दिया है। भीतर रसोई और भण्डार-घर के सिवा सोने के लिए दो कमरे भी हैं। कमरे हैं तो मिट्टी के ही और ऊपर है, मगर खूब ऊँचे और बड़े हैं। बाहर की बैठक भी बहुत अच्छी है। ऑंगन लम्बा-चौड़ा, साफ-सुथरा और मिट्टी की चहारदीवारी से घिरा हुआ है। एक तरफ छोटा-सा एक कुऑं है, और उसके पास ही दो-तीन तगर और शेफाली के पेड़ हैं। दूसरी तरफ बहुत-से छोटे-बड़े तुलसी के पौधों की पंक्ति है, और चार-पाँच जुही और मल्लिका के झाड़ हैं। कुल मिलाकर जगह बहुत अच्छी है, देखकर मन को तृप्ति हुई।

सबसे बढ़कर उत्साह देखा गया सन्यासी महाशय में। जो कुछ उनकी निगाह में पड़ा उसी पर वह उच्च कण्ठ से आनन्द प्रकट करने लगे, जैसे ऐसा और कभी उन्होंने देखा ही न हो। मैं, शोरगुल न मचाने पर भी, मन-ही-मन खुश ही हुआ। राजलक्ष्मी अपने भइया के लिए रसोई में चाय बना रही थी, इसलिए उसके चेहरे का भाव ऑंखों से तो नहीं दिखाई दिया, परन्तु मन का भाव किसी से छिपा भी न रहा। सिर्फ साथ नहीं दिया तो एक रतन ने। वह मुँह को उसी तरह फुलाए हुए एक खम्भे के सहारे चुपचाप बैठा रहा।

चाय बनी। साधुजी कल की बची हुई मिठाई के साथ चुपचाप दो प्याला चाय चढ़ाकर उठ बैठे और मुझसे बोले, “चलिए न, जरा घूम-फिर कर गाँव देख आवें। बाँध भी तो ज्यादा दूर नहीं, उधर के उधर ही नहा भी आयेंगे। जीजी, आइए न, जमींदारी देखभाल आवें। शायद शरीफ लोग तो कोई होंगे नहीं, शरम करने की भी विशेष कोई जरूरत नहीं। जायदाद है अच्छी, देख के लोभ होता है।”

राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “सो तो मैं जानती हूँ। सन्यासियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।”

हमारे साथ रसोइया ब्राह्मण तथा और भी एक नौकर आया था। वे दोनों रसोई की तैयारी कर रहे थे। राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं महाराज, तुम्हारे हाथ ऐसी ताजी मछली सौंपने का हियाव नहीं पड़ता, नहा के लौटने पर रसोई मैं ही चढ़ाऊँगी।” यह कहकर वह हमारे साथ चलने की तैयारी करने लगी।

अब तक रतन ने किसी बातचीत या काम में साथ नहीं दिया था। हम लोग जाने लगे तो वह अत्यन्त धीर-गम्भीर स्वर में बोला, “माँ जी, उस बाँध या ताल, न जाने इस मुए देश के लोग क्या कहते हैं, उसमें आप मत नहाइएगा। बड़ी जबरदस्त जोंकें हैं उसमें, एक-एक, सुनते हैं, हाथ-हाथ भर की।”

दूसरे ही क्षण राजलक्ष्मी का चेहरा मारे डर के फक पड़ गया, “कहता क्या है रतन, उसमें क्या बहुत जोंकें हैं?”

रतन ने गरदन हिलाकर कहा, “जी हाँ, सुना तो ऐसा ही है।”

साधु ने डपटकर कहा, “जी हाँ, सुन तो आया ही होगा! इस नाई ने सोच-सोचकर अच्छी तरकीब निकाली है!” रतन के मन का भाव और जाति का परिचय साधु ने पहले ही से प्राप्त कर लिया था; हँस के कहा, “जीजी, इसकी बात मत सुनो, चलो चलें। जोंकें हैं या नहीं, इस बात की परीक्षा न हो तो हम ही लोगों से करा लेना।”

मगर उनकी जीजी एक कदम भी आगे न बढ़ीं। जोंक के नाम से एकदम अचल होकर बोलीं, “मैं कहती हूँ, आज न हो तो रहने दो, आनन्द, नयी जगह ठहरी, अच्छी तरह बिना जाने-समझे ऐसा दु:साहस करना, ठीक नहीं होगा। रतन, तू जा भइया, यहीं पर दो कलसे पानी कुऑं से ले आ।” मुझे आदेश मिला, “तुम कमजोर आदमी हो, सो कहीं किसी अनजान बाँध-ऑंध में नहा-नुहू मत आना। घर पर ही दो लोटा पानी डालकर आज का काम निकाल लेना।”

साधुजी ने हँसकर कहा, “और मैं ही क्या इतना उपेक्षणीय हूँ जीजी, जो मुझे ही सिर्फ उस जोंकोंवाले तालाब में पठाए देती हो?”

बात कोई बड़ी नहीं थी, मगर इतने ही से राजलक्ष्मी की ऑंखें मानो सहसा डबडबा आईं। उसने क्षण-भर नीरव रहकर, अपनी स्निग्ध दृष्टि से मानो उन्हें अभिषिक्त करते हुए कहा, “तुम तो भइया, आदमी के हाथ से बाहर हो। जिसने माँ-बाप का कहना नहीं माना, वह क्या कहीं की एक अनजान अपरिचित बहिन की बात रखेगा?”

साधुजी जाने के लिए उद्यत होकर सहसा जरा ठहरकर बोले, “यह अनजान अपरिचित होने की बात मत कहो, बहिन। आप सब लोगों को पहिचानने के लिए ही तो घर छोड़कर निकला हूँ, नहीं तो मुझे इसकी क्या जरूरत थी, बताइए?” इतना कहकर वे जरा तेजी से बाहर चले गये, और मैं भी धीरे से उनके साथ हो लिया।

हम दोनों ने मिलकर खूब घूम-फिर के गाँव देख-भाल लिया। गाँव छोटा है, और जिन्हें हम छोटी जात कहते हैं, उन्हीं का है। वास्तव में, दो घर तम्बोली और एक घर लुहार के सिवा गंगामाटी में ऐसा कोई घर नहीं जिसका पानी लिया जो सके। सभी घर डोम और बाउरियां के हैं। बाउरी लोग बेंत का काम और मजूरी करते हैं और डोम लोग टोकनी, सूप, डलिया वगैरह और पोड़ामाटी गाँव में बेचकर जीविका चलाते हैं। गाँव के उत्तर की तरफ पानी के निकास का जो बड़ा नाला है, उसी के उस पार पोड़ामाटी है। सुनने में आया कि वह गाँव बड़ा है, और उसमें ब्राह्मण, कायस्थ और अन्यान्य जातियों के भी बहुत-से घर हैं। अपने कुशारी महाशय का घर भी उसी पोड़ामाटी में है। मगर दूसरों की बात पीछे कहूँगा, फिलहाल अपने गाँव की जो हालत ऑंखों से देखी, उससे मेरी दृष्टि ऑंसुओं से धुँधली हो आई। बेचारों ने अपने-अपने घरों की जी-जान से छोटा बनाने की कोशिश करने में कुछ उठा नहीं रखा है, फिर भी इतने छोटे-छोटे घरों के छाने लायक सूखा घास भी इस सोने के देश में, उनके भाग्य से नहीं जुटता। बीता-भर जमीन तक किसी के पास नहीं, सिर्फ डलिया-टोकनी-सूप बनाकर और दूसरे गाँव में सद्गृहस्थों को पानी के मोल बेचकर किस तरह इन लोगों की गुजर होती है, मैं तो सोच ही न सका। फिर भी, इसी तरह इन अशुचि अस्पृश्यों के दिन कट रहे हैं और शायद इसी तरह हमेशा से कटे हैं, परन्तु किसी ने भी किसी दिन इसका जरा खयाल तक नहीं किया। सड़क के कुत्ते जैसे पैदा होकर कुछ वर्ष तक जैसे-तैसे जिन्दा रहकर न जाने कहाँ, कब कैसे मर जाते हैं-उनका जैसे कहीं कोई हिसाब नहीं रखता, इन अभागों का भी वही हाल है, मानो, देशवासियों से वे इससे ज्यादा और कुछ दावा ही नहीं कर सकते। इनका दु:ख इनकी दीनता, इनकी सब तरह की हीनता अपनी और पराई दृष्टि में इतनी सहज और स्वाभाविक हो गयी है कि मनुष्य के पास ही मनुष्य के इतने बड़े जबरदस्त अपमान से कहीं किसी के भी मन में लज्जा का रंच-मात्र भी संचार नहीं होता। मगर, साधुजी इधर जो मेरे चेहरे की तरफ देख रहे थे, सो मुझे मालूम ही नहीं हुआ। वे सहसा बोल उठे, “भाई साहब, यही है देश की सच्ची तसवीर। लेकिन, मन में मलाल लाने की जरूरत नहीं। आप सोच रहे होंगे कि ये बातें इन्हें दिन-रात सताया करती हैं, मगर यह बात कतई नहीं।”

मैंने क्षुब्ध और अत्यन्त विस्मित होकर कहा, “यह बात क्या कही साधुजी?”

साधुजी ने कहा, “मेरी तरह आप भी अगर सब जगह घूमा-फिरा करते भाई साहब, तो समझ जाते कि मैंने लगभग सच बात ही कही है। असल में दु:ख भोगता कौन है भइया? मन ही तो? मगर वह बला क्या हम लोगों ने बाकी छोड़ी है इनमें?- बहुत दिनों से लगातार सिकंजे में दबा-दबाकर बिल्कु'ल निचोड़ लिया है बेचारों का मन। इससे ज्यादा चाहने का अब ये खुद ही अनुचित स्पर्धा समझते हैं। वाह रे वाह! हमारे बाप-दादों ने भी सोच-विचार कर कैसी उमदा मशीन ईजाद की है, क्या कहने!” यह कहकर साधु अत्यन्त निष्ठुर की भाँति 'हा: हा:' करके हँसने लगे। मगर मैं न तो उनकी हँसी में ही शरीक हो सका, और न उनकी बात का ठीक-ठीक अर्थ ही ग्रहण कर सका, और इसलिए मन-ही-मन लज्जित हो उठा।

इस साल फसल अच्छी नहीं हुई, और पानी की कमी से हेमन्त ऋतु के धान लगभग आधे सूख जाने से अभी से अभाव की हवा चलने लगी। साधुजी ने कहा, “भाई साहब, चाहे किसी बहाने ही सही, भगवान ने जब आपको अपनी प्रजा के बीच ढकेल-ढुकूलकर भेज ही दिया है, तब अचानक भाग न जाइएगा। कम-से-कम यह साल तो यहीं बिताकर जाइए। यह तो मैं नहीं सोचता कि आप विशेष कुछ कर सकेंगे, पर ऑंखों से देखकर प्रजा के दु:ख को बँटाना अच्छा है, इससे जमींदारी करने के पाप का बोझ कुछ हलका होता है।”

मैंने मन-ही-मन गहरी साँस लेकर सोचा-जमींदारी और प्रजा जैसे मेरी ही हो, परन्तु जैसे पहले जवाब नहीं दिया, अबकी बार भी मैं उसी तरह चुप रह गया।

छोटे से गाँव की प्रदक्षिणा करता हुआ नहा-धोकर जब वापस आया, तब बारह बज चुके थे। शाम की तरह आज भी हम दोनों को भोजन परोसकर राजलक्ष्मी एक तरफ बैठ गयी। सारी रसोई उसने खुद अपने हाथ से बनाई थी, लिहाजा मछली का मुँहड़ा और दही की मलाई साधु की पत्तल में ही पड़ी। साधुजी बैरागी आदमी ठहरे, किन्तु, सात्वि‍क, और असात्वि‍क, निरामिष और आमिष, किसी भी चीज में उनका रंचमात्र भी विराग देखने में नहीं आया, बल्कि इस विषय में उन्होंने ऐसे प्रबल अनुराग का परिचय दिया जो घोर सांसारिक में भी दुर्लभ है। चूँकि रसोई के भले-बुरे मर्म को समझने में मेरी ख्याति नहीं थी, इसलिए मुझे समझाने की तरह रसोईदारिन ने कोई आग्रह भी प्रकट नहीं किया।

साधुजी को कोई जल्दी नहीं; वे बहुत ही धीरे-सुस्ते भोजन करने लगे। कौर चाबते हुए बोले, “जीजी, जगह सचमुच ही अच्छी है, छोड़कर जाने में ममता होती है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “छोड़ जाने के लिए तो हम लोग तुमसे आरजू-बिनती नहीं कर रहे हैं, भइया!”

साधुजी ने हँसकर कहा, “साधु-सन्यासी को कभी इतना प्रश्रय न देना चाहिए जीजी- ठगाई जाओगी। खैर, कुछ भी हो, गाँव अच्छा है, कहीं भी कोई ऐसा नहीं दिखाई दिया जिसके हाथ का पानी पिया जा सके। और ऐसा भी एक घर नहीं देखा जिसके छप्पर पर एक पूला सूखा घास भी दिखाई दिया हो- जैसे मुनियों के आश्रम हों।”

आश्रम के साथ अस्पृश्य घरों का एक दृष्टि से जो उत्कृष्ट सादृश्य था, उसका खयाल करके राजलक्ष्मी ने जरा क्षीण हँसी हँसकर मुझसे कहा, “सुनते हैं कि सचमुच ही इस गाँव में सिर्फ छोटी जात ही बसती है-किसी के एक लोटे पानी का भी आसरा नहीं। देखती हूँ, यहाँ ज्यादा दिन रहना नहीं हो सकेगा।”

साधु जरा हँसे, परन्तु मैं नीरव ही रहा। कारण राजलक्ष्मी जैसी करुणामयी भी किस संस्कार के वश इतनी बड़ी लज्जा की बात उच्चारण कर सकी, सो मैं जानता था। साधु की हँसी ने मुझे स्पर्श तो किया, किन्तु वह विद्ध न कर सकी। इसी से, मैं मुँह से तो कुछ नहीं बोला, मगर फिर भी मेरा मन राजलक्ष्मी को ही लक्ष्य करके भीतर कहने लगा, “राजलक्ष्मी, मनुष्य का कर्म ही केवल अस्पृश्य और अशुचि होता है, मनुष्य नहीं होता। नहीं तो 'प्यारी' किसी भी तरह आज फिर 'लक्ष्मी' के आसन पर वापस न आ सकती। और वह भी सिर्फ इसीलिए सम्भव हुआ है कि मनुष्य की देह को ही मनुष्य समझने की गलती मैंने कभी नहीं की। इस बात में बचपन से ही बहुत बार मेरी परीक्षा हो चुकी है। लेकिन, ये बस बातें मुँह खोलकर किसी से कही भी नहीं जा सकतीं और कहने की प्रवृत्ति नहीं होती।”

दोनों भोजन समाप्त करके उठे। राजलक्ष्मी हम लोगों को पान देकर, शायद, खुद भी कुछ खाने चली गयी। परन्तु करीब घण्टे-भर बाद लौटकर जैसे वह खुद साधुजी को देखकर आसमान से गिरी-सी मालूम हुई, वैसे ही मैं भी विस्मित हो गया। देखा कि इसी बीच में न जाने कब वे बाहर से एक आदमी ले लाए हैं और दवाओं का भारी बॉक्स उसके सिर पर लादकर प्रस्थान के लिए तैयार खड़े हैं।

कल यही बात तो हुई थी, मगर आज हम उस हम बात को बिल्कुदल ही भूल गये थे। इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इस प्रवास में राजलक्ष्मी के इतने आदर-जतन की उपेक्षा करके साधुजी अनिश्चित अन्यत्र के लिए इतनी जल्दी तैयार हो जाँयगे। स्नेह की जंजीर इतनी जल्दी नहीं टूटने की-राजलक्ष्मी के निभृत मन में शायद यही आशा थी। वह मारे डर के व्याकुल होकर कह उठी, “तुम क्या जा रहे हो आनन्द?”

साधु ने कहा, “हाँ जीजी, जाता हूँ। अभी से रवाना न होने से पहुँचने में बहुत रात हो जायेगी।”

“वहाँ कहाँ ठहरोगे, कहाँ सोओगे? अपना आदमी तो वहाँ कोई होगा नहीं।”

“पहले पहुँचूँ तो सही।”

“लौटोगे कब?”

“सो तो अभी नहीं कहा जा सकता। काम की भीड़ में अगर आगे न बढ़कर गया, तो किसी दिन लौट भी सकता हूँ।”

राजलक्ष्मी का मुँह पहले तो फक पड़ गया, फिर उसने जोर से अपना सिर झटककर रुँधे हुए कण्ठ से कहा, “किसी दिन लौट भी सकते हो? नहीं, यह हरगिज नहीं हो सकता।”

क्या नहीं होगा सो समझ में आ गया, इसी से साधु ने प्रत्युत्तर में सिर्फ जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, “जाने का कारण तो आपको बता ही चुका हूँ।”

“बता चुके हो? अच्छा, तो जाओ” इतना कहते-कहते राजलक्ष्मी प्राय: रो दी, और जल्दी से कमरे के भीतर चली गयी। क्षण-भर के लिए साधुजी स्तब्ध हो गये। उसके बाद मेरी तरफ देखकर लज्जित मुख से बोले, “मेरा जाना बहुत जरूरी है।”

मैंने गर्दन हिलाकर सिर्फ इतना ही कहा, “मालूम है।” इससे ज्यादा और कुछ कहने को था भी नहीं। कारण, मैंने बहुत कुछ देखकर जान लिया है कि स्नेह की गहराई समय की स्वल्पता से हरगिज नहीं नापी जा सकती। और इस चीज की कवियों ने सिर्फ काव्यों के लिए ही शून्य कल्पना नहीं की- संसार में वास्तव में ऐसा हुआ करता है। इसीलिए, एक के जाने की आवश्यकता जितनी सत्य है, दूसरे का व्याकुल कण्ठ से मना करना भी ठीक उतना ही सत्य है या नहीं, इस विषय में मेरे मन में रंचमात्र भी संशय का उदय नहीं हुआ। मैं अत्यन्त सरलता से समझ गया कि इस बात को लेकर राजलक्ष्मी को शायद बहुत वेदना सहनी पड़ेगी।

साधुजी ने कहा, “मैं चल दिया। उधर का काम अगर निबट गया, तो शायद, फिर आऊँगा; मगर अभी यह बात जताने की जरूरत नहीं।”


मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “सो सही है।”

साधुजी कुछ कहना ही चाहते थे कि घर की ओर देखकर सहसा एक गहरी उसाँस भरकर जरा मुसकराए; उसके बाद धीरे-से बोले, “अजीब देश है यह बंगाल! इसमें राह चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं, किसमें सामर्थ्य है कि इनसे बचकर निकल जाय?”

इतना कहकर साधुजी धीरे-धीरे बाहर चले गये।

उनकी बात सुनकर मैंने भी एक गहरी साँस ली। मालूम हुआ, बात असल में ठीक है। जिसे देश की समस्त माँ-बहिनों को वेदना ने खींचकर घर से बाहर निकाला है, उसे सिर्फ एक ही बहिन स्नेह, दही की मलाई और मछली का मूँड़ देकर कैसे पकड़े रख सकती है

️,Srikanth"❤️



Chapter 10


One day, I did not have the tendency to unravel it again with my own hand, in the middle of the travel-story that I had suddenly left by putting Yavanika. from my village

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴By वनिता कासनियां पंजाब अध्याय 1अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?”अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।”मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।”अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।”अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह्मणी से भी आगे बढ़े जा रहे हो।”अपूर्व हंसकर कहता, “आगे बढ़ जाना आसान नहीं है भाभी! माता जी के पास कोई बेटी नहीं है। उनकी उम्र भी काफी हो चुकी है। अगर बीमार पड़ जाएंगी तो पवित्र भोजन बनाकर तो खिला सकूंगा। रही चिमटा, कमंडल की बात, सो वह तो कहीं गया नहीं?”अपूर्व मां के पास जाकर कहता, “मां! यह तुम्हारा अन्याय है। भाई जो चाहें करें लेकिन भाभियां तो मुर्गा नहीं खातीं। क्या तुम हमेशा अपने हाथ से ही भोजन बनाकर खाओगी?”मां कहती, “एक जून एक मुट्ठी चावल उबाल लेने में मुझे कोई तकलीफ नहीं होती। और जब हाथ-पांव काम नहीं करेंगे तब तक मेरी बहू घर में आ जाएगी।”अपूर्व कहता, “तो फिर एक ब्राह्मण पंडित के घर से बहू, मंगवा क्यों नहीं देतीं? उसे खिलाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है-लेकिन तुम्हारा कष्ट देखकर सोचता हूं कि चलो भाइयों के सिर पर भार बनकर रह लूंगा।”मां कहती, “ऐसी बात मत कह रे अपूर्व, एक बहू क्या, तू चाहे तो घर भर को बिठाकर खिला सकता है।”“कहती क्या हो मां? तुम सोचती हो कि भारतवर्ष में तुम्हारे पुत्र जैसा और कोई है ही नहीं?”और यह कहकर वह तेजी से चला जाता।अपूर्व के विवाह के लिए लोग बड़े भाई विनोद को आकर परेशान करते। विनोद ने जाकर मां से कहा, “मां, कौन-सी निष्ठावान जप-तपवाली लड़की है, उसके साथ अपने बेटे का ब्याह करके किस्सा खत्म करो। नहीं तो मुझे घर छोड़कर भाग जाना पड़ेगा। बड़ा होने के कारण लोग समझते हैं कि घर का बड़ा-बूढ़ा मैं ही हूं।”पुत्र के इन वाक्यों से करुणामयी अधीर हो उठी। लेकिन बिना विचलित हुए मधुर स्वर में बोली, “लोग ठीक ही समझते हैं बेटा। उनके बाद तुम ही तो घर के मालिक हो। लेकिन अपूर्व के संबंध में किसी को वचन मत देना। मुझे रूप और धन की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं देख-सुनकर तय करूंगी।”“अच्छी बात है मां। लेकिन जो कुछ करो, दया करके जल्दी कर डालो,” कहकर विनोद रूठकर चला गया।स्नान घाट पर एक अत्यंत सुलक्षणा कन्या पर कई दिन से करुणामयी की नजर पड़ रही थी। वह अपनी मां के साथ गंगा-स्नान करने आती थी। उन्हीं की जाति की है, गुप्त रूप से वह पता लगा चुकी थीं। उनकी इच्छा थी कि अगर तय हो जाए तो आगामी बैसाख में ही विवाह कर डालें।तभी अपूर्व ने आकर एक अच्छी नौकरी की सूचना दी।मां प्रसन्न होकर बोली, “अभी उस दिन तो पास हुआ है। इसी बीच तुझे नौकरी किसने दे डाली?”अपूर्व हंसकर बोला, “जिसे जरूरत थी।” यह कहकर उसने सारी घटना विस्तार से बताई कि उसके प्रिंसिपल साहब ने ही उसके लिए यह नौकरी ठीक की है। वोथा कम्पनी ने बर्मा के रंगून शहर में एक नया कार्यालय खोला है। वह किसी सुशिक्षित और ईमानदार बंगाली युवक को उस कार्यालय का सारा उत्तरदायित्व देकर भेजना चाहती है। रहने के लिए मकान और चार-सौ रुपए माहवार वेतन मिलेगा और छ: महीने के बाद वेतन में दौ सौ रुपए की वृध्दि कर दी जाएगी।”बर्मा का नाम सुनते ही मां का मुंह सूख गया, बोली, “पागल तो नहीं हो गया? तुझे वहां भेजूंगी? मुझे ऐसे रुपए की जरूरत नहीं है।”अपूर्व भयभीत होकर बोला, “तुम्हें न सही, मुझे तो है। तुम्हारी आज्ञा से भीख मांगकर भी जिंदगी बिता सकता हूं लेकिन जीवन भर ऐसा सुयोग फिर नहीं मिलेगा। तुम्हारे बेटे के न जाने से वोथा कम्पनी का काम रुकेगा नहीं। लेकिन प्रिंसिपल साहब मेरी ओर से वचन दे चुके हैं। उनकी लज्जा की सीमा न रहेगी। फिर घर की हालत तो तुमसे छिपी नहीं है मां।”“लेकिन सुनती हूं वह म्लेच्छों का देश है।”अपूर्व ने कहा, “किसी ने झूठ-मूठ कह दिया है। तुम्हारा देश तो म्लेच्छों का देश नहीं है। फिर भी जो मनमानी करना चाहते हैं उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”“मैंने तो इसी बैसाख में तेरा विवाह करने का निश्चय किया है।”अपूर्व बोला, “एकदम निश्चय? अच्छी बात है। एक दो महीने बाद जब तुम बुलाओगी, मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करने आ जाऊंगा।”करुणामयी बाहर से देखने में पुराने विचारों की अवश्य थी लेकिन बहुत ही बुध्दिमती थी। कुछ देर मौन रहकर बोली, “जब जाना ही है तो अपने भाइयों की सहमति भी ले लेना।”यह कुल गोकुल दीधी के सुप्रसिध्द बंद्योपाध्याय घराने में से है। वंश-परम्परा से ही वह लोग अत्यंत आचार परायण कहलाते हैं। बचपन से जो संस्कार उनके मन में जग गए थे-पति, पुत्रों ने जहां तक लांछित और अपमानित करना था किया, लेकिन अपूर्व के कारण वह सब कुछ सहन करती हुई इस घर में रह रही थी। आज वह भी उनकी आंखों से दूर अनजाने देश जा रहा है। इस बात को सोच-सोचकर उनके भय की सीमा नहीं रही। बोली, “अपूर्व मैं जितने दिन जीवित रहूं, मुझे दु:ख मत देना बेटे,” कहते-कहते उनकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े।अपूर्व की आंखें भी गीली हो उठीं। बोला, “मां, आज तुम इस लोक में हो लेकिन एक दिन जब स्वर्गवास की पुकार आएगी, उस दिन तुम्हें अपने अपूर्व को छोड़कर वहां जाना होगा। मेरे जाने के बाद तुम यहां बैठकर मेरे लिए आंसू मत बहाती रहना”, इतना कहकर वह दूसरी ओर चला गया।उस दिन सांझ के समय, करुणामयी अपनी नियमित संध्या-पूजा आदि कार्यों में मन नहीं लगा सकीं। अपने बड़े बेटे के कमरे के दरवाजे पर चली गईं। विनोद कचहरी से लौटकर जलपान करने के बाद क्लब जाने की तैयारी कर रहा था। मां को देखकर एकदम चौंक पड़ा।करुणामयी ने कहा, “एक बात पूछने आई हूं, विनू!”“कौन-सी बात मां?”यहां आने से पहले मां अपनी आंखों के आंसू अच्छी तरह पोंछकर आई थी, लेकिन उनका रुंधा गला छिपा न रह सका। सारी घटना और अपूर्व के मासिक वेतन के बारे में बताने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में पूछा, “यही सोच रही हूं बेटा कि इन रुपयों के लोभ में उसे भेजूं या नहीं।”विनोद धीरज खो बैठा। शुष्क स्वर में बोला, “मां, तुम्हारे अपूर्व जैसा लड़का भारतवर्ष में और दूसरा नहीं है। इस बात को हम सभी मानते हैं। लेकिन इस धरती पर रहकर इस बात को माने बिना भी नहीं रह सकते कि पहले चार सौ रुपए, फिर छ: महीने में दो सौ रुपए और-वह इस लड़के से बहुत बड़ा है।”मां दु:खी होकर बोली, “लेकिन सुनती हूं कि वह तो एकदम म्लेच्छों का देश है।”विनोद ने कहा, “तुम्हारा जानना-सुनना ही तो सारे संसार का अन्तिम सत्य नहीं हो सकता।”पुत्र के अंतिम वाक्य से मां अत्यंत दु:खी होकर बोली, “बेटा! जब से समझदार हुई, इसी एक ही बात को सुन-सुनकर भी जब मुझे चेत नहीं हुआ तो इस उम्र में और शिक्षा मत दो। मैं यह जानने नहीं आई कि अपूर्व का मूल्य कितने रुपए है। मैं केवल यह जानने आई थी कि उसे इतनी दूर भेजना उचित होगा या नहीं।”विनोद ने दाएं हाथ से मां के चरणस्पर्श करके कहा, “मां, मैंने तुम्हें दु:खी करने के लिए यह नहीं कहा। यह सच है कि पिता जी के साथ ही हम लोगों का मेल बैठता था और उनसे हम लोगों ने सीखा है कि घर-गृहस्थी के लिए रुपया होना कितना आवश्यक है। इस हैट कोट को पहनकर विनू इतना बड़ा साहब नहीं बन गया कि छोटे भाई को खिलाने के डर से उचित-अनुचित का विचार न कर सके। लेकिन फिर भी कहता हूं कि उसे जाने दो। देश में जैसी हवा बह रही है इससे वह कुछ दिनों के लिए देश छोड़कर, कहीं दूसरी जगह जाकर काम में लग जाए तो इसमें उसका भी हित होगा और परिवार की रक्षा भी हो जाएगी। तुम तो जानती हो मां, उस स्वदेशी आंदोलन के समय कितना छोटा था। फिर भी उसी के प्रताप से पिता जी की नौकरी जाने की नौबत आ गई थी।”करुणामयी बोली, “नहीं, नहीं, अब अपूर्व वह सब नहीं कर सकता।”विनोद बोला, “मां, सभी देशों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी जाति ही अलग होती है। अपूर्व उसी जाति का है। देश की मिट्टी ही इसके शरीर का मांस है, देश का जल ही इनकी धमनियों का रक्त है। देश के विषय में इनका विश्वास कभी मत करना मां, नहीं तो धोखा खाओगी। बल्कि अपने इस म्लेच्छ विनू को, अपने उस चोटीधारी, गीता पढ़े एम. एस-सी. पास अपूर्व से अधिक ही अपना समझना।”पुत्र की इन बातों पर मां ने विश्वास तो नहीं किया लेकिन मन-ही-मन शंकित हो उठी। देश के पश्चिमी क्षितिज पर जो भयानक मेघ के लक्षण प्रकट हुए हैं, उसे वह जानती थी। याद आया कि उस समय तो अपूर्व के पिता जीवित थे, लेकिन अब नहीं हैं।विनोद ने मां के मन की बात जान ली। लेकिन क्लब जाने की जल्दी में बोला, “अच्छा मां, वह कल ही तो जा नहीं रहा। सब लोग बैठकर जो निश्चय करेंगे, कर लेंगे,” कहकर तेजी से बाहर निकल गया।अपने ब्र्राह्मणत्व की बड़ी सतर्कता से रक्षा करते हुए अपूर्व एक जलयान द्वारा रंगून के घाट पर पहुंच गया। वोथा कम्पनी के एक दरबान और एक मद्रासी कर्मचारी ने अपने इस नए मैनेजर का स्वागत किया। तीस रुपए महीने का एक कमरा ऑफिस के खर्चे से यथासम्भव सजा हुआ तैयार है, यह समाचार देने में उन लोगों ने देर नहीं की।समुद्र-यात्रा की झंझटों के बाद वह खूब हाथ-पैर फैलाकर सोना चाहता था। ब्राह्मण साथ था। घर में अत्यंत असुविधा होते हुए भी इस भरोसे के आदमी को साथ भेजकर मां को बहुत कुछ तसल्ली मिल गई थी। केवल ब्राह्मण रसोइया ही नहीं बल्कि भोजन बनाने के लिए कुछ चावल, दाल, घी, तेल पिसा हुआ मसाला यहां तक कि आलू, परवल तक वह साथ देना नहीं भूली थीं।गाड़ी आ जाने पर मद्रासी कर्मचारी तो चले गए लेकिन रास्ता दिखाने के लिए दरबान साथ चल दिया। दस मिनट में ही गाड़ी जब मकान के सामने पहुंचकर रुकी तो तीस रुपए किराए के मकान को देखकर अपूर्व हतबुध्दि-सा खड़ा रह गया।मकान बहुत ही भद्दा है। छत नहीं है। सदर दरवाजा नहीं है। आंगन समझो या जो कुछ, इस आने-जाने के रास्ते के अलावा और कहीं तनिक भी स्थान नहीं है। एक संकरी काठ की सीढ़ी, रास्ते के छोर से आरम्भ होकर सीधी तीसरी मंजिल पर चली गई है। इस पर चढ़ने-उतरने में कहीं अचानक पैर फिसल जाए तो पहले पत्थर के बने राजपथ पर फिर अस्पताल में और फिर तीसरी स्थिति को न सोचना अच्छा है। नया आदमी है इसलिए हर कदम बड़ी सावधानी से रखते हुए दरबान के पीछे-पीछे चलने लगा। दरबान ने ऊपर चढ़ने के बाद दाईं ओर में दो मंजिले के एक दरवाजे को खोलकर बताया।“साहब, यही आपके रहने का कमरा है।”दाईं ओर इशारा करके अपूर्व ने पूछा, “इसमें कौन रहता है?”दरबान बोला, “एक चीनी साहब हैं।”अपूर्व ने पूछा, “ऊपर तिमंजिले पर कौन रहता है?”दरबान ने कहा, “एक काले-काले साहब हैं।”कमरें में कदम रखते ही अपूर्व का मन बहुत ही खिन्न हो उठा। लकड़ी के तख्ते लगाकर एक-दूसरे की बगल में छोटी-बड़ी तीन कोठरियां बनी हुई हैं। इस मकान की सारी चीजें लकड़ी की हैं। दीवारें, फर्श, छत और सीढ़ी-सभी लकड़ी की हैं। आग की याद आते ही संदेह होता है कि इतना बड़ा और सर्वांग सुंदर लाक्षागृह तो सम्भव है दुर्योधन भी अपने पांडव भाइयों के लिए न बनवा सका होगा। इसी मकान में इष्ट-मित्र, आत्मीय-स्वजनों, मां और भाभियों आदि को छोड़कर रहना पड़ेगा। अपने को संभालकर, थोड़ी देर इधर-उधर घूमकर हर चीज को देखकर तसल्ली हुई कि नल में अभी तक पानी है। स्नान और भोजन दोनों ही हो सकते हैं। अपूर्व ने रसोइए से कहा, “महाराज, मां ने तो सभी चीजें साथ भेजी हैं। नहाकर कुछ बना लो। तब तक मैं दरबान के साथ सामान ठीक कर लूं।”रसोई में कोयला मौजूद था। लेकिन चूल्हे में कालिख लगी थी। पता नहीं इसमें पहले कौन रहता था और क्या पकाया था? यह सोचकर उसे बड़ी घृणा हुई। महाराज से बोला, “एक उठाने वाला दम चूल्हा होता तो बाहर वाले कमरे में बैठकर कुछ दाल-चावल बना लिया जाता, लेकिन कौन जाने, इस देश में मिलेगा या नहीं।”दरबान बोला, “पैसे दीजिए, अभी दस मिनट में ले आता हूं।”वह रुपया लेकर चला गया।तिवारी रसोई बनाने की व्यवस्था करने लगा और अपूर्व कमरा सजाने में लग गया। काठ के आले पर कपड़े सजाकर रख दिए। बिस्तर खोलकर चारपाई पर बिछा दिया। एक नया टेबल क्लाथ मेज पर बिछाकर उस पर लिखने का सामान और कुछ पुस्तकें रख दी। उत्तर की ओर खुली खिड़की के दोनों पल्लों को अच्छी तरह खोलकर उसके दोनों कोनों में कागज ठूंसकर सोने वाले कमरे को सुंदर बनाकर बिस्तर पर लेटकर सुख की सांस ली।दरबान ने लोहे का चूल्हा ला दिया। तभी याद आया, मां ने सिर की सौगंध देकर पहुंचते ही तार करने को कहा था। इसलिए दरबान को साथ लेकर चटपट बाहर निकल गया। महाराज से कहता गया कि एक घंटे पहले ही लौट आऊंगा।आज किसी ईसाई त्यौहार के उपलक्ष में छुट्टी थी। अपूर्व ने देखा, यह गली देशी-विदेशी साहब-मेमों का मुहल्ला है। यहां के प्रत्येक घर में विलायती उत्सव का कुछ-न-कुछ चिद्द अवश्य दिखाई दे रहा है। अपूर्व ने पूछा, “दरबान जी! सुना है, यहा बंगाली भी तो बहुत हैं। वह किस मुहल्ले में रहते हैं?”उसने बताया कि यहां मुहल्ले जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिसकी जहां इच्छा होती है, वहीं रहता है। लेकिन अफसर लोग इसी गली को पसंद करते हैं। अपूर्व भी अफसर था। कट्टर हिंदू होते हुए भी किसी धर्म के विरुध्द भावना नहीं थी। फिर भी स्वयं को ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, भीतर-बाहर, चारों ओर से ईसाई पड़ोसियों को करीब देख अत्यंत घृणा अनुभव करते हुए उसने पूछा, “क्या किसी दूसरे स्थान पर घर नहीं मिल सकेगा?”दरबान बोला, “खोजने से मिल सकता है। लेकिन इतने किराए में ऐसा मकान मिलना कठिन है।”अपूर्व जब तार घर पहुंचा तो तारबाबू खाना खाने चले गए थे। एक घंटे प्रतीक्षा करने के बाद जब आए तो घड़ी देखकर बोले, “आज छुट्टी है। दो बजे ऑफिस बंद हो गया।”अपूर्व ऊंची आवाज में बोला, “यह अपराध आपका है। मैं एक घंटे से बैठा हूं।”बाबू बोला, “लेकिन मैं तो सिर्फ दस मिनट हुए यहां से गया हूं।”अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया। झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी। लेकिन फिर बेकार समझकर चुप हो गया। भूख, प्यास और क्रोध से जलता हुआ बड़े तारघर पहुंचा। वहां से अपने निर्विघ्न पहुंचने का समाचार जब मां को भेज दिया तब उसे संतोष हुआ।दरबान ने विनय भरे स्वर में कहा, “साहब, हमको भी बहुत दूर जाना है।”अपूर्व ने उसे छुट्टी देने में कोई आपत्ति नहीं की। दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुंच गया।उसने देखा-तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं।साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, “क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, “यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हांडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहां तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या हुआ?”तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया-“अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा-देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी-पर-बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आंखों से देख लिया।कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, “साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”“शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दांत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।अपूर्व ने हंसने की कोशिश करके कहा, “तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुंह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हांडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, “बाबू, यहां तो रहना हो नहीं सकेगा।”अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, “हां, लगता तो ऐसा ही है।”तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर मां ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, “नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियां दी हैं।”अपूर्व ने कहा, “उसे गालियां न देकर मारना ठीक था।”तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुध्दि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, “ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”अपूर्व ने कहा, “अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, “अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”“अभी करता हूं बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का र्दुव्यवहार याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुंचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, “कौन है?”“मैं नीचे रहता हूं और उस आदमी को देखना चाहता हूं।”“क्यों?”“उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”“वह सो रहे हैं।”अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, “जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊंगा। लेकिन इस समय उसके मुंह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊंगा।”लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, “मैं उनकी लड़की हूं। पिताजी की ओर से क्षमा मांगती हूं। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, “उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उसे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूं। लेकिन आशा करता हूं कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”लड़की ने कहा, “अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, “आपकी तरह हम लोग भी यहां बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पांव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी-उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भांति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुंचा। वह कह रहा था, “नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, “कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, “क्या बात है तिवारी?”लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दांतों को कुछ ऊंचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।अपूर्व ने पूछा, “यह सब क्या है?”लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया - “आज हमारा त्यौहार है। मां ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”अपूर्व ने कहा, “अपनी मां को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, “हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, “इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”अपूर्व बोला, “नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”लड़की बोली, “हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, “नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, “ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, “रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और मां ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”मां ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, “यह हम सब नहीं छुएंगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूं।”लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, “न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”तिवारी बोला, “नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”“मूर्ख, गंवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा। लेकिन इस विषय में वह जितना ही सोचता था, लगता था कि शायद यह ठीक ही हुआ कि उसने स्पष्ट कहकर लौटा दिया। उसे अपने बड़े मामा की याद आ गई। उस निष्ठावान ब्राह्मण ने एक दिन भोजन करने से मना कर दिया था। करुणामयी ने पति से भाई का मन-मुटाव दूर करने के लिए एक चतुराई का सहारा लेना चाहा, लेकिन दरिद्र ब्राह्मण ने हंसकर कहा- “नहीं बहन, यह सब नहीं हो सकता। जीजा जी क्रोधी व्यक्ति हैं। इस अपमान को वह सह न पाएंगे। हो सकता है, तुम्हें भी इसमें भागीदार बनना पड़े। मेरे स्वर्गीय गुरुदेव कहा करते थे, 'मुरारी, सत्य-पालन में दु:ख है। वंचना और प्रताणना के मीठे पथ से वह कभी नहीं आता।' मैं बिना भोजन किए चला जाऊंगा। यही उचित है बहन।”इस घटना के कारण करुणामयी ने अनेक दु:ख सहे लेकिन भाई को कभी दोष नहीं दिया। इसी बात को याद कर अपूर्व के मन में बार-बार यह बात उठने लगी, “उचित ही हुआ। तिवारी ने ठीक ही किया।”अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भांति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, “बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”अपूर्व ने कहा, “दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, “तुम्हारा साहब कहां है?”उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, “बुलाओ जल्दी।”अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, “अंग्रेजी जानते हो?”“जानता हूं।”“मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”“जी हां।”“लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, “आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”साहब ने कहा, “मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उंगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हां-में-हां मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिध्द करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।साहब ने कहा, “मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुंह में एक भी दांत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूं। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “अच्छी बात है।”-लेकिन उसका मुंह उतर-सा गया।साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, “चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, “मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”अपूर्व ने कहा, “साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”तिवारी ने कहा, “यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”अपूर्व ने कहा, “जाने से क्या होता है?”तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, “बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”“क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ता ग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुंह में डालकर बोला, “तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? मां ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”तिवारी ने कहा, “हूं।”अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हंसते हुए कहा, “मुंह एकदम हांडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”तिवारी ने कहा, “मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”अपूर्व ने कहा, “उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”तिवारी मौन रहा।कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुंह ऊपर उठाया। कहा, “और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”तिवारी बोला, “ईसाई है न?”“जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएं।”तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, “देखकर जाते तो अच्छा होता।”“क्या देखकर जाता?”“उनके लौटने की राह....।”अपूर्व ने कहा, “यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”तिवारी चुप रह गया।अपूर्व ने कहा, “तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”तिवारी ने कहा, “अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, “पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”“अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।वोथा कम्पनी के भागीदार पूर्वीय क्षेत्र के मैनेजर रोजेन साहब उस समय बर्मा में ही थे। रंगून कार्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था। उन्होंने अपूर्व का बड़े आदर से स्वागत किया। उसके स्वरूप, बातचीत तथा यूनिवर्सिटी की डिग्री देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। सभी कर्मचारियों को बुलाकर परिचय कराया और दो-तीन महीने में व्यवसाय का सम्पूर्ण रहस्य सिखा देने का आश्वासन दिया। बातचीत, परिचय तथा नए उत्साह से उसकी मानसिक ग्लानि कुछ समय के लिए मिट गई। एक व्यक्ति ने उसे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था ऑफिस का एकाउन्टेन्ट। ब्राह्मण है। नाम है रामदास तलवलकर। आयु लगभग उसके जितनी ही या कुछ अधिक हो सकती है। दीर्घ आकृति, बलिष्ठ, गौरवर्ण है। पहनावे में पाजामा, लम्बा कोट, सिर पर पगड़ी, माथे पर लाल चंदन का टीका। बड़ी अच्छी अंग्रेजी में बातचीत करते हैं, लेकिन अपूर्व के साथ उन्होंने पहले से ही हिंदी में बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व हिंदी अच्छी तरह नहीं जानता। लेकिन जब देखा कि वह हिंदी छोड़कर और किसी में उत्तर नहीं देता तो उसने भी हिंदी बोलना आरम्भ कर दिया। अपूर्व ने कहा, “यह भाषा मैं नहीं जानता। बोलने में बहुत गलतियां होती हैं।”रामदास बोला, “गलतियां तो मुझसे भी होती हैं। क्योंकि यह मेरी भी मातृभाषा नहीं है।”अपूर्व बोला, “अगर पराई भाषा में ही बातचीत करनी है तो अंग्रेजी में क्या दोष है?”रामदास बोला, “अंग्रेजी में तो हम लोग और अधिक गलतियां करते हैं। आप अंग्रेजी में बोला करें। लेकिन अगर मैं हिंदी में उत्तर दूंगा, क्षमा कर दीजिएगा।”अपूर्व बोला, “मैं भी हिंदी में ही बोलने की चेष्टा करूंगा। लेकिन गलती होने पर आप भी मुझे क्षमा करोगे।”इस बातचीत के बीच रोजेन साहब स्वयं मैनेजर के कमरे में आ गए। उम्र पचास के लगभग होगी। हालैंड के निवासी हैं। साधारण ढंग के कपडे। चेहरे पर घनी दाढ़ी-मूंछें। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हैं। पक्के व्यवसायी हैं। अब तक बर्मा के अनेक स्थानों में घूमकर तरह-तरह के लोगों से मिलकर, तथ्य संग्रह करके, काम काज के कार्यक्रम का उन्होंने खाका तैयार कर लिया है। उस कार्यक्रम के कागज अपूर्व की टेबल पर रखते हुए बोले, “इसके विषय में आपकी क्या राय है?” फिर तलवलकर से बोले, “इसकी एक प्रति आपके कमरे में भी भेज दी है। लेकिन इसे अभी रहने दिया जाए। क्योंकि आज नए मैनेजर के सम्मान में ऑफिस बंद हो जाएगा। मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। तब आप दोनों पर ही सारा कार्यक्रम रहेगा। मैं अंग्रेज नहीं हूं। यद्यपि यह राज्य हम लोगों का हो सकता था। फिर भी उन लोगों की तरह हम भारतीयों को नीच नहीं समझते। अपने समान ही समझते हैं। केवल फर्म की ही नहीं, आप लोगों की उन्नति भी आप लोगों के कर्त्तव्य-ज्ञान पर निर्भर है। अच्छा गुड्ड। ऑफिस दो बजे के बाद बंद जो जाना चाहिए। कहते हुए जिस तरह आए थे उसी तरह चले गए।ठीक दो बजे दोनों साथ-साथ ऑफिस से निकले। तलवलकर शहर में नहीं रहता। लगभग दस मील पश्चिम में इनसिन नामक स्थान में डेरा है। डेरे में उसकी पत्नी तथा एक छोटी-सी बेटी रहती है वहां शहर का हो-हल्ला नहीं है। टे्रनों में आने-जाने से कोई असुविधा नहीं होती।“हाल्दर बाबू, कल ऑफिस के बाद मेरे यहां चाय का निमंत्रण रहा,” तलवलकर ने कहा।अपूर्व बोला, “मैं चाय नहीं पीता बाबू जी।”“नहीं पीते? पहले मैं भी नहीं पीता था। लेकिन मेरी पत्नी नाराज होती है। अच्छा, न हो तो फल-फूल, शर्बत... हम लोग भी ब्राह्मण हैं।”अपूर्व ने हंसते हुए कहा, “ब्राह्मण तो अवश्य हैं, लेकिन अगर आप लोग मेरे हाथ का खाएं तो मैं भी आपकी पत्नी के हाथ का खा सकता हूं।”रामदास ने कहा, “मैं तो खा सकता हूं। लेकिन मेरी पत्नी की बात...अच्छा, आपका डेरा तो पास ही है। चलिए न, आपको पहुंचा आऊं। मेरी ट्रेन तो पांच बजे छूटेगी।”अपूर्व घबरा गया। इस बीच वह सब कुछ भूल गया था। डेरे का नाम लेते ही क्षण भर में उसका सारा उपद्रव, सारा झगड़ा बिजली की रेखा की भांति चमककर उसके चेहरे को श्रीहीन कर गया। अब तक वहां क्या हुआ होगा, वह कुछ नहीं जानता। हो सकता है, बहुत कुछ हुआ तो। अकेले उसी को बीच में जाकर खड़ा होना पड़ेगा। एक परिचित व्यक्ति के साथ रहने से कितनी सुविधा और साहस रहता है। लेकिन परिचय के आरम्भ में ही....यह क्या सोचेगा?.... यह सोचकर अपूर्व को बड़ा संकोच हो उठा। बोला, “देखिए....?”अभी बात पूरी नहीं कर सका था कि उसके संकोच और लज्जा को अनुभव करके रामदास ने हंसते हुए कहा, “एक ही रात में पूरी सुव्यवस्था की मैं आशा नहीं करता बाबू जी! मुझे भी एक दिन नया डेरा ठीक करना पड़ा था। फिर मेरी तो पत्नी भी थी। आपके साथ तो वह भी नहीं है। आप आज लज्जा का अनुभव कर रहे हैं। लेकिन उन्हें न लाने पर एक वर्ष बाद भी आपकी लज्जा दूर नहीं होगी। यह मैं कहे देता हूं। चलिए देखूं क्या कर सकता हूं। अव्यवस्था के बीच ही तो मित्र की आवश्यकता होती है।”इस मित्रहीन देश में आज उसे मित्र की अत्यंत आवश्यकता है। दोनों टहलते-टहलते डेरे के सामने पहुंचे तो तलवलकर को घर में आमंत्रित किए बिना न रह सका। ऊपर चढ़ते समय देखा कि वही ईसाई लड़की नीचे उतर रही है। उसका पिता उसके साथ नहीं था। वह अकेली थी। दोनों एक ओर हटकर खड़े हो गए। लड़की धीरे-धीरे उतरकर सड़क पर चली गई।रामदास ने पूछा, “यह लोग तीसरी मंजिल पर रहते हैं क्या?”“हां।”“यह लोग भी बंगाली हैं?”अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, देसी ईसाई हैं। सम्भव है मद्रासी, गोआनीज या और कुछ होंगे, लेकिन बंगाली नहीं हैं।”रामदास ने कहा, “लेकिन साड़ी पहनने का ढंग तो ठीक आप लोगों जैसा ही है।”अपूर्व ने हैरानी से पूछा, “हम लोगों का ढंग आपको कैसे मालूम?”रामदास ने कहा, “मैंने बम्बई, पूना, शिमला में बहुत-सी बंगाली महिलाओं को देखा है। इतना सुंदर साड़ी पहनने का ढंग भारत की किसी जाति में नहीं है।”“हो सकता है,” कहकर अपूर्व डेरे के बंद दरवाजे को खटखटाने लगा।थोड़ी देर बाद अंदर से सतर्क कंठ का उत्तर आया, “कौन?”“मैं हूं, मैं। दरवाजा खोलो। भय की कोई बात नहीं है,” कहकर अपूर्व हंसने लगा। यह देखकर कि इस बीच कोई भयानक घटना नहीं हुई, तिवारी कमरे में सुरक्षित है। और यह अनुभव करके उसके ऊपर से जैसे एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।कमरा देखकर रामदास बोला, “आपका नौकर अच्छा है। सब कुछ अच्छी तरह सजाकर रखा है। यह सारा सामान मैंने ही खरीदा था। आपको और जिस चीज की जरूरत हो, बताइए, भेज दूंगा। रोजेन साहब की आज्ञा है।”तिवारी ने मधुर स्वर में कहा, “और सामान की जरूरत नहीं है बाबू जी, यहां से सकुशल हट जाएं तो प्राण बच जाएंगे।”उसकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन अपूर्व ने सुन लिया। उसने आड़ में ले जाकर पूछा, “और कुछ हुआ था क्या?”“नहीं।”“तब फिर ऐसी बात क्यों कहता है?”तिवारी ने कहा, “शौक से थोडे ही कहता हूं। दोपहर भर साहब जैसी घुड़दौड़ करता रहा है, वैसी क्या कोई मनुष्य कर सकता है?”अपूर्व मुस्कराकर बोला, “तो तू चाहता है कि वह अपने कमरे में चलने-फिरने भी न पाए? लकड़ी की छत है! अधिक आवाज होती है।”तिवारी ने रुष्ट होकर कहा, “एक स्थान पर खड़े होकर घोड़े की तरह पैर पटकने को चलना कहा जाता है?”अपूर्व बोला, “इससे पता चलता है कि वह शराबी है। उसने जरूर शराब पी रखी होगी।”तिवारी बोला, “हो सकता है। मैं उसका मुंह सूंघकर देखने नहीं गया था।” फिर अप्रसन्न भाव से रसोई घर में जाते हुए बोला, “चाहे जो भी हो, इस घर में रहना नहीं होगा।”ट्रेन का समय हो जाने पर रामदास ने विदा मांगी। पता नहीं तिवारी के अभियोग या उसके स्वामी के चेहरे से उसने कुछ अनुमान लगाया या नहीं, लेकिन जाते समय अचानक पूछ बैठा, “बाबू जी, क्या आपको इस डेरे में असुविधा है?”अपूर्व ने तनिक हंसकर कहा, “नहीं।” फिर रामदास को जिज्ञासु भाव से निहारते देखकर बोला, “ऊपर जो साहब रहते हैं वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहें।”रामदास ने विस्मित होकर पूछा, “वही लड़की तो नहीं?”“जी हां, उसी के पिता,” इतना कहकर अपूर्व ने कल सांझ और आज सवेरे की घटनाएं सुना दीं। रामदास कुछ देर मौन रहने के बाद बोला, “मैं होता तो इतिहास दूसरा ही होता। बिना क्षमा मांगे वह इस दरवाजे से एक कदम भी नीचे न उतर पाता।”अपूर्व ने कहा, “अगर वह क्षमा न मांगता तो आप क्या करते?”रामदास ने कहा, “तो उतरने न देता।”अपूर्व ने भले ही उसकी बातों पर विश्वास न किया हो, लेकिन साहस भरी बातों से उसे कुछ साहस अवश्य मिला। हंसते हुए बोला, “चलिए अब नीचे चलें। आपकी ट्रेन का समय हो गया है।” इतना कहकर मित्र का हाथ पकड़कर नीचे उतरने लगा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस तरह आते समय उस लड़की से भेंट हुई थी उसी तरह जाते समय भी हो गई। उसके हाथ में कागज का एक मुड़ा हुआ बंडल था। शायद कुछ खरीदकर लौट रही थी। उसे रास्ता देने के लिए अपूर्व एक ओर हटकर खड़ा हो गया। लेकिन सहसा घबराकर देखा-रामदास रास्ता न देकर उसे रोके खड़ा है। वह अंग्रेजी में बोला, “क्षमा करना, मैं बाबू जी का मित्र हूं। इनके साथ अकारण किए गए र्दुव्यवहार के लिए आप लोगों को लज्जित होना चाहिए।”लड़की ने आंख उठाकर क्रुध्द स्वर में कहा, “इच्छा हो तो यह बातें आप मेरे पिता जी से कह सकते हैं।”“आपके पिताजी घर पर हैं।”“नहीं।”“मेरे पास प्रतीक्षा करने के लिए समय नहीं है। मेरी ओर से उनसे कह दीजिएगा कि उनके उपद्रव से इनका रहना दूभर हो गया है।”लड़की ने पूर्ववत् कड़वे स्वर में कहा, “उनकी ओर से मैं ही उत्तर दिए देती हूं कि आप अगर चाहें तो किसी दूसरी जगह जा सकते हैं।”रामदास थोड़ा हंसकर बोला, “भारतीय ईसाईयों को मैं पहचानता हूं। उनके मुंह से इससे बड़े उत्तर की आशा मैं नहीं करता। लेकिन इससे उनको सुविधा नहीं होगी। क्योंकि इनके स्थान पर मैं आऊंगा, मेरा नाम रामदास तलवलकर है। मैं जात से ब्राह्मण हूं। तलवार शब्द का क्या अर्थ होता है अपने पिता को जान लेने के लिए कहिएगा। गुड इवनिंग। चलिए बाबू जी,” इतना कहकर वह अपूर्व का हाथ पकड़कर एकदम रास्ते में आ गया।लड़की के चेहरे को अपूर्व ने छिपी नजरों से देख लिया था। घटना के अंत में वह किस प्रकार कठोर हो उठी थी-यह सोचकर वह कुछ क्षण तक कोई बात ही नहीं कर सका। इसके बाद धीरे से बोला, “यह क्या हुआ तलवलकर?”तलवलकर ने उत्तर दिया, “यही हुआ कि आपके जाते ही मुझे यहां आना पड़ेगा। केवल खबर मिल जानी चाहिए।”अपूर्व ने कहा, “अर्थात दोपहर को आपकी पत्नी अकेली रहेंगी?”रामदास ने कहा, “अकेली नहीं। मेरी दो वर्ष की लड़की भी है।”“यानी आप मजाक कर रहे हैं।”“नहीं, मैं सच कह रहा हूं। हंसी-मजाक की मेरी आदत ही नहीं है।”अपूर्व ने एक बार अपने साथी की ओर देखा। फिर धीरे से कहा, “तो फिर मैं यह डेरा नहीं छोड़ सकूंगा....।”उसकी बात पूरी नहीं हो पाई थी कि रामदास ने सहसा उसके दोनों हाथों को अपने शक्तिशाली हाथों से पकड़कर जोर से झकझोरते हुए कहा, “मैं यही चाहता हूं बाबू जी! उत्पात के भय से हम लोग बहुत भाग चुके हैं, लेकिन अब नहीं।”सांझ होने में अभी देर थी। एक घंटे तक किसी ट्रेन का समय भी नहीं था। इसलिए स्टेशन के दूसरी ओर वाले प्लेटफार्म पर यात्रियों की भीड़ अधिक नहीं थी। अपूर्व टहलते हुए घूमने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि कल से आज तक इस एक ही दिन में जीवन न जाने कैसे सहसा कई वर्ष पुराना हो गया है। यहां पर मां नहीं है, भाई नहीं है। भाभियां नहीं हैं। स्नेह की छाया भी कहीं नहीं है। कर्मशाला के असंख्य चक्र दाएं-बाएं, सिर के ऊपर, पैरों के नीचे, चारों ओर वेग से घूमते हुए चल रहे हैं। तनिक भी असमर्थ होने पर रक्षा पाने का कहीं कोई उपाय नहीं है।उसकी आंखों की कोरें गीली हो उठीं। कुछ दूरी पर काठ की एक बेंच थी। उस पर बैठकर आंखें पोंछ रहा था कि सहसा पीछे से एक जोर का धक्का खाकर पेट के बल जमीन पर जा गिरा। किसी तरह उठकर खड़ा होते ही देखा पांच-छ: फिरंगी बदमाश लड़के हैं। किसी के मुंह में सिगरेट है तो किसी के मुंह में पाइप है और वह दांत निकालकर हंस रहे थे। शायद वही लड़का जिसने धक्का मारा था, बेंच के ऊपर लिखे अक्षरों को दिखाकर बोला, “साले! यह साहब लोगों के वास्ते है, तुम्हारे लिए नहीं।”लज्जा, क्रोध तथा अपमान से अपूर्व की गीली आंखें लाल हो उठीं, होंठ कांपने लगे।“साला, दूधवाला, आंखें दिखाता है?” सब एक साथ ऊंचे स्वर से हंस पड़े। एक ने उसके मुंह के सामने आकर अत्यंत अश्लील ढंग से सीटी बजाई।अपूर्व पल भर बाद ही शायद सबके ऊपर झपट पड़ता लेकिन कुछ हिंदुस्तानी कर्मचारियों ने, जो कुछ दूर बैठे चिमनी साफ कर रह थे, बीच में पड़कर उसे प्लेटफार्म से बाहर कर दिया। एक फिरंगी लड़का भागता हुआ आया और भीड़ में पैर बढ़ाकर अपूर्व के सफेद सिल्क के कुर्त्तों पर जूते का दाग लगा गया। हिंदुस्तानियों के इस दल से वह अपने को मुक्त करने के लिए खींचातानी कर रहा था। एक ने उसे झकझोरते हुए कहा, “अरे बंगाली बाबू! अगर साहब लोगों का शरीर छुएगा तो एक साल की जेल हो जाएगी। जाओ भागो।” एक ने कहा, “अरे बाबू है, धक्का मत दो।” जो लोग कुछ नहीं जानते थे वह कारण पूछने लगे। जो लोग जानते थे, तरह-तरह की सलाह देने लगे। अपूर्व ऑफिस का पहनावा छोड़कर सामान्य बंगाली की पोशाक में स्टेशन गया था। इसलिए फिरंगियों ने उसे दूधवाला समझकर मारा था।अपूर्व सीधा स्टेशन मास्टर के कमरे में गया। स्टेशन मास्टर अंग्रेज थे। मुंह उठाकर उन्होंने देखा। अपूर्व ने जूते का दाग दिखाकर घटना सुनाई, वह अवज्ञापूर्वक बोले, “योरोपियन की बेंच पर बैठे क्यों?”अपूर्व ने कहा, “मुझे मालूम नहीं था।”“मालूम कर लेना चाहिए था।”“क्या इसीलिए उन्होंने एक भले आदमी पर हाथ उठाया?”साहब ने दरवाजे की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “गो-गो-गो, चपरासी इसको बाहर कर दो।” कहकर वे अपने काम में लग गए।अपूर्व न जाने किस तरह घर लौटा। दो घंटे पहले रामदास के साथ इस रास्ते से जाते समय उसके हृदय में जो दुर्भावना सबसे अधिक खटक रही थी, वह अकारण मध्यस्थता ही थी। उत्पात और अशांति की मात्रा उससे घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी ही। इसके अतिरिक्त उस ईसाई लड़की का कितना ही अपराध क्यों न हो, वह नारी है। इसलिए पुरुष के मुंह से ऐसे कठोर वचन निकालना उचित नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त उस समय एकदम अकेली भी थी। जब उस लड़की की बात याद आई तो वह साहब की लड़की मालूम हुई, साधारण नारी-जाति की नहीं। जिन फिरंगी लड़कों ने कुछ पल पहले अकारण ही उसका अपमान किया, जिनकी कुशिक्षा, नीचता और बर्बरता की सीमा नहीं थी, उनकी ही बहन जान पड़ी। जिस साहब ने अत्यंत अविचार के साथ उसे कमरे से बाहर निकाल दिया था, मनुष्य का सामान्य अधिकार भी नहीं दिया था, उसकी परम आत्मीय ज्ञात हुई।तिवारी ने आकर कहा, “छोटे बाबू, भोजन ठंडा हो रहा है।”“चलो आता हूं,” अपूर्व ने कहा।दस-पंद्रह मिनट बाद उसने फिर कहा, “भोजन ठंडा हो रहा है।”अपूर्व ने क्रोधित होकर कहा, “क्यों बेकार तंग करता है तिवारी? मैं नहीं खाऊंगा। मुझे भूख नहीं है।”उसकी आंखों में नींद नहीं आई। रात जितनी ही बढ़ने लगी, सारा बिछौना मानो कांटे की सेज हो उठा। एक मर्मान्तक वेदना उसके सम्पूर्ण अंग में चुभने लगी और उसी के बीच-बीच स्टेशन के उन हिंदुस्तानियों की याद आने लगी जिन्होंने संख्या में अधिक होते हुए भी उसकी लांछना को कम करने में बिल्कुल ही भाग नहीं लिया। बल्कि उसके अपमान की मात्रा बढ़ाने में ही सहायता की। देशवासियों के विरुध्द देशवासियों की इतनी लज्जा, इतनी ग्लानि संसार के और किसी देश में है? ऐसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? इन्हीं बातों पर विचार करता रहा।दो-तीन दिन शांतिपूर्वक बीत गए। ऊपर की मंजिल से साहब का अत्याचार जब किसी नए रूप में प्रकट नहीं हुआ तो अपूर्व ने समझ लिया कि उस ईसाई लड़की ने उस दिन की बातें अपने पिता को नहीं बताई। लड़की से भी सीढ़ियों में दो-एक बार भेंट हुई। वह मुंह मोड़कर उतर जाती है। उस दिन सवेरे छोटे बाबू को भात परोसकर तिवारी ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा, “लगता है, साहब ने कोई नालिश-वालिश नहीं की।”अपूर्व ने कहा, “जो गरजता है बरसता नहीं है।”तिवारी बोला, “हम लोगों का डेरे में अधिक दिन रहना नहीं हो सकेगा। साले, सब कुछ खाते-पीते हैं। याद आते ही....।”“चुप रह तिवारी,” वह उस समय भोजन कर रहा था। बोला, “इसी महीने के बाद छोड़ देंगे। लेकिन अच्छा मकान तो मिले।”उसी दिन शाम को ऑफिस से लौटकर तिवारी की ओर देखकर अपूर्व स्तब्ध रह गया। इतनी ही देर में वह जैसे सूखकर आधा हो गया था। पूछा, “क्या हुआ तिवारी?”प्रत्युत्तर में उसने बादामी रंग के कुछ कागज अपूर्व को पकड़ा दिए। फौजदारी अदालत का सम्मन था। वादी जे. डी. जोसेफ थे और प्रतिवादी तीन नम्बर कमरे का अपूर्व नामक बंगाली और उसका नौकर था। दोपहर को कचहरी का चपरासी दे गया था।चपरासी के साथ वही साहब आया था। परसों हाजिर होने की तारीख है। अपूर्व ने कागज पढ़कर कहा, “कोर्ट में देखा जाएगा।”यह कहकर वह कपड़े बदलने कमरे में चला गया।तारीख वाले दिन तिवारी को साथ लेकर अपूर्व अदालत में हाजिर हुआ। इस विषय में रामदास से सहायता लेने में उसे लज्जा अनुभव हुई। केवल जरूरी काम का बहाना करके उसने एक दिन की छुट्टी ले ली थी।डिप्टी कमिश्नर की अदालत में मुकदमा था। वादी जोसेफ-सच, झूठ जो मन में आया, कह गया। अपूर्व ने न तो कोई बात छिपाया और न कोई बात बढ़ाकर ही कही। बाकी की गवाह उसकी लड़की थी। अदालत के सामने उस लड़की का नाम और बयान सुनकर अपूर्व खिन्न रह गया। आप किसी स्वर्गीय राजकुमार भट्टाचार्य महाशय की सुपुत्री हैं। पहले यह लोग पारीसाल में थे। लेकिन अब बंगलौर में हैं। आपका नाम मेरी भारती है। इनकी मां किसी मिशनरी के साथ बंगलौर चली आई थीं वहीं जोसेफ साहब के रूप पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। भारती ने पैतृक भट्टाचार्य नाम को निरर्थक समझकर उसे त्याग दिया और जोसेफ नाम को ग्रहण कर लिया। तभी से वह मिस मेरी जोसेफ के नाम से प्रसिध्द हैं। न्यायाधीश के प्रश्न करने पर वह फल-फूल उपहार देने की बात से इनकार कर गई। लेकिन उसके कंठ स्वर में असत्य बोलने की घबराहट इतनी स्पष्ट हो गई कि केवल न्यायाधीश ही नहीं उसके चपरासी तक को धोखा नहीं दे सकी। फैसला उसी दिन हो गया। तिवारी छूट गया, लेकिन अपूर्व पर बीस रुपया जुर्माना हो गया। निरपराध होते हुए दंडित होने पर उसका मुंह सूख गया। रुपए देकर घर आकर देखा- दरवाजे के सामने रामदास खड़ा है। अपूर्व के मुंह से निकल पड़ा-”बीस रुपए जुर्माना हुआ रामदास। अपील की जाए?”उत्तेजना से उसकी आवाज कांप उठी। रामदास ने उसके दाएं हाथ को थामकर हंसते हुए कहा, “बीस रुपए जुर्माने के बदले दो हजार की हानि उठाना चाहते हैं?”“होने दो। लेकिन यह तो जुर्माना है। दंड है। राजदंड है।”रामदास हंसते हुए बोला, 'किसका दंड? जिसने झूठी गवाही दिलाई। लेकिन इसके ऊपर भी एक अदालत है। उसका न्यायाधीश अन्याय नहीं करता। वहां आप निर्दोष हैं।”अपूर्व बोला, “लेकिन लोग तो ऐसा नहीं समझेंगे रामदास! उनके सामने तो यह बदनामी हमेशा के लिए बनी रहेगी।”रामदास ने कहा, “चलो नदी किनारे टहल आएं।” चलते हुए रास्ते में वह बोला, “अपूर्व बाबू, विद्या में आपसे छोटा होते हुए भी उम्र में आपसे बड़ा हूं मैं। अगर कुछ कहूं तो खयाल न करना।”अपूर्व मौन रहा।रामदास ने कहा, “वह इस मामले को जानता था। लोग जानते हैं कि 'हालदार' के साथ जोसेफ का मुकदमा चलने पर अंग्रेजी न्यायालय में क्या होता है। बीस रुपए की जुर्माने की बदनामी....।“लेकिन यह तो बिना अपराध का दंड हुआ रामदास?”“हां, बिना अपराध मैं भी दो वर्ष जेल में रह आया हूं।”“दो वर्ष जेल में?”“हां, दो वर्ष,” फिर हंसकर बोला, 'अगर अपने कुर्त्तों को उतार दूं तो देखोगे कि बेंतों के दागों से कोई स्थान बचा नहीं है।”“बेंत भी लग चुके हैं रामदास?”रामदास हंसकर बोला, “हां, ऐसा ही। बिना अपराध के भी मैं इतना निर्लज्ज हूं कि लोगों को मुंह दिखाता हूं और आप बीस रुपए जुर्माने की बदनामी नहीं सह सकते?”अपूर्व उसका मुंह देखकर चुप हो गया। रामदास बोला, “अच्छा, चलिए आपको पहुंचाकर घर जाऊं।”“अभी ही चले जाओगे? अभी तो बहुत-सी बातें जाननी हैं।”रामदास ने हंसकर कहा, “सब आज ही जान लोगे? यह नहीं होगा। मुझे सम्भवत: बहुत दिनों तक बताना पड़ेगा।”बहुत दिनों पर उसने इस तरह जोर दिया कि अपूर्व आश्चर्य से उसे देखता रह गया, लेकिन कुछ समझ नहीं पाया। रामदास गली के अंदर नहीं गया। बाहर से ही विदा लेकर स्टेशन चला गया।अपूर्व ने द्वार पर धक्का दिया। तिवारी ने आकर दरवाजा खोल दिया। वह घर के कामों में लगा हुआ था, उसका चेहरा उतर गया था। वह बोला, “उस समय जल्दबाजी में दो नोट फेंक गए थे आप?”अपूर्व ने आश्चर्य से पूछा, 'कहां फेंक गया था जी?”“यहीं तो....” कहते हुए उसने दरवाजे के पास रखी मेज की ओर इशारा किया, “आपके तकिए के नीचे रख दिए हैं। बाहर कहीं नहीं गिरे, यही सौभाग्य है।”वह नोट कैसे गिर पड़े? यही सोचते हुए अपूर्व अपने कमरे में चला गया।तिवारी ने रात को रोते हुए हाथ जोड़कर कहा, “इस बूढे क़ी बात मानिए बाबू! चलिए, कल सवेरे ही हम लोग जहां भी हो भाग चलें।”अपूर्व ने कहा, 'कल ही? सुनूं तो? क्या धर्मशाला में चले, चलें?”तिवारी बोला, “इससे तो वही अच्छा है। साहब मुकदमे में जीत गया है। अब किसी दिन हम दोनों को पीट भी जाएगा।”अपूर्व सहन न कर सका। क्रोधित होकर बोला, “मां ने क्या तुझे मेरे घाव पर नमक छिड़कने के लिए भेजा था? मुझे तेरी जरूरत नहीं, तू कल ही घर चला जा। मेरे भाग्य में जो बदा है वही होगा।”तिवारी फिर कुछ नहीं बोला। चुपचाप सोने चला गया। उसकी बात अपूर्व को अपमानजनक जान पड़ी। इसलिए उसने ऐसा उत्तर दिया था। अगले दिन नए मकान की खोज होने लगी। तलवलकर को छोड़कर ऑफिस के लगभग सभी लोगों से उसने कह दिया था। इसके बाद तिवारी ने फिर कोई शिकायत नहीं की।स्वाभाविक बात थी कि मुकदमा जीत जाने के बाद जोसेफ परिवार के विचित्र उपद्रव नए-नए रूप में प्रकट होंगे। लेकिन उपद्रव की बात कौन कहे, ऊपर कोई रहता नहीं, कभी-कभी यह संदेह होने लगा था।

🪴🌺पथ के दावेदार🌺🪴 By वनिता कासनियां पंजाब     अध्याय 1 अपूर्व के मित्र मजाक करते, “तुमने एम. एस-सी. पास कर लिया, लेकिन तुम्हारे सिर पर इतनी लम्बी चोटी है। क्या चोटी के द्वारा दिमाग में बिजली की तरंगें आती जाती रहती हैं?” अपूर्व उत्तर देता, “एम. एस-सी. की किताबों में चोटी के विरुध्द तो कुछ लिखा नहीं मिलता। फिर बिजली की तरंगों के संचार के इतिहास का तो अभी आरम्भ ही नहीं हुआ है। विश्वास न हो तो एम. एस-सी. पढ़ने वालों से पूछकर देख लो।” मित्र कहते, “तुम्हारे साथ तर्क करना बेकार है।” अपूर्व हंसकर कहता, “यह बात सच है, फिर भी तुम्हें अकल नहीं आती।” अपूर्व सिर पर चोटी रखे, कॉलेज में छात्रवृत्ति और मेडल प्राप्त करके परीक्षाएं भी पास करता रहा और घर में एकादशी आदि व्रत और संध्या-पूजा आदि नित्य-कर्म भी करता रहा। खेल के मैदानों में फुटबाल, किक्रेट, हॉकी आदि खेलने में उसको जितना उत्साह था प्रात:काल मां के साथ गंगा स्नान करने में भी उससे कुछ कम नहीं था। उसकी संध्या-पूजा देखकर भौजाइयां भी मजाक करतीं, बबुआ जी पढ़ाई-लिखाई तो समाप्त हुई, अब चिमटा, कमंडल लेकर संन्यासी हो जाओ। तुम तो विधवा ब्राह...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...