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पांडवों का जन्म


By वनिता कासनियां पंजाब द्वारा !!


पिछले पोस्ट में हमने देखा किस तरह धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म हुआ, इस पोस्ट में हम बात करेंगे पांडवों के जन्म के बारे में । अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पड़ी तो यहां क्लिक करके पड़ सकते हैं – महाभारत की शुरुआत


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जब अंधे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ तब सत्यवती ने कहा कि यह तो गड़बड़ है क्योंकि अंधा पुत्र राजा नहीं बन सकता । सत्यवती ने अंबिका से दोबारा पुत्र पैदा करने को कहा । इस बार अंबिका डर गईं और उन्होंने कहा कि इतने डरावने व्यक्ति को में दोबारा नहीं देख सकती । इसलिए उन्होंने अपनी दासी को अपनी जगह पर भेज दिया । दासी बहुत ही धार्मिक थी और वेद व्यास जी का सम्मान करती थी इसलिए उनसे एक बड़े ही योग्य पुत्र प्राप्त हुए । ये पुत्र थे विदुर जो कि पहले धर्मराज थे लेकिन मांडव्य मुनि के श्राप के कारण इन्हें दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा ।


मांडव्य मुनि की कथा हमने पहले ही एक पोस्ट में बताई है, किस तरह मांडव्य मुनि ने धर्मराज को श्राप दिया , पूरा पड़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं – बच्चो को पाप क्यों नहीं लगता जानें एक कथा के माध्यम से


धृतराष्ट्र का विवाह

धृतराष्ट्र के विवाह के लिए कोई योग्य कन्या की तलाश जारी थी । तभी पता चला कि गांधार नरेश की पुत्री गांधारी बहुत ही सुंदर और गुणवान है । हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र के विवाह का प्रताव गांधार भेजा गया जिसने बताया गया था कि धृतराष्ट्र में बहुत सारे गुण है लेकिन सिर्फ एक ही दिक्कत है कि वो अंधे हैं ।


गांधार नरेश ने माना करने का सोचा लेकिन यह प्रताव कुरु वंश से आया हुआ था इसलिए धृतराष्ट्र के अंधे होने पर भी उन्होंने हां कर दी । गांधारी ने भी कुरु वंश का सम्मान करते हुए शादी की और अपने पति के प्रति व्रत धर्म को दिखाने के लिए अपनी आंखों पर हमेशा के लिए पट्टी बांध ली ।


गांधारी ने सोचा कि जब मेरे पति ही अंधे हैं तो मुझे भी अंधा बनकर रहना चाहिए लेकिन ऐसा करना उचित नहीं है क्योंकि ऐसा करने से वो न तो अपने पति की सेवा सही से कर सकती थीं और साथ ही न देखने के कारण अपने बच्चों को उचित संस्कार भी नहीं दे पायीं । गांधारी को आर्शीवाद मिला कि जब भी वे अपनी आंखों की पट्टी खोलकर किसी को देखेंगी तो उसका शरीर बज्र का हो जायेगा ।


पाण्डु का विवाह

भगवान श्री कृष्ण के पिता वसुदेव के बारे में तो आप जानते ही हैं । वासुदेव के पिता जी का नाम था सूरसेन और उनकी एक बहन थीं जिनका नाम था प्रथा । सूरसेन जी ने अपनी पुत्री को कुंतीभोज को दे दिया था क्योंकि उनके यहां कोई संतान नहीं हो रही थी जिस कारण सूरसेन जी की पुत्री का नाम पड़ा कुंती ।


एक दुर्वासा मुनि कुंती के यहां आए और कुंती ने उनकी बड़े ही अच्छे से सेवा की जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा मुनि ने उनको एक मंत्र दिया । मंत्र की मदद से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर सकतीं थी और उनसे एक पुत्र प्राप्त कर सकती थीं ।


कुंती ने इस मंत्र का परीक्षण करने के लिए सूर्य देवता का आवाहन किया जिनसे उन्हें अपना पहला पुत्र कर्ण प्राप्त हुआ । लेकिन अभी कुंती की शादी नहीं हुई थी इसलिए उन्होंने कर्ण को नदी में बहा दिया ।


आगे चलकर कुंतीभोज ने राजकुमारी कुंती के विवाह के लिए स्वयंवर की रचना की जिसमे कई महान राजा आए हुए थे लेकिन कुंती ने पाण्डु को चुना और दोनो का विवाह हो गया ।


इसी के साथ भीष्म पितामह की इच्छा थी कि पाण्डु इतने कुशल राजा बनने वाले हैं इसलिए उनकी एक और पत्नी भी होनी चाहिए इसलिए पाण्डु का दूसरा विवाह हुआ माद्री से । इसके बाद पाण्डु ने कुछ समय अपने राज्य में व्यतीत किया और फिर विश्व विजेता बनने के अपने अभियान पर निकल गए ।


पांडवों का जन्म

पाण्डु ने कई सारे राज्यों को जीता और एक बहुत ही महान राजा के रूप में शासन किया लेकिन एक समय जब वे जंगल में शिकार कर रहे थे तब उनका तीर एक ऋषि को लग गया । ऋषि एक हिरण के रूप में थे और तीर लगते ही इंसान के रूप में आ गए ।


ऋषि उसे समय एक हिरणी के साथ रमण कर रहे थे और तीर लगने पर उन्होंने पाण्डु श्राप दिया कि जिस तरह इस अवस्था में पाण्डु में उनको तीर मारा है उसी तरह जब पाण्डु अपनी पत्नी के साथ रमण करने का प्रयास करेंगे उनकी मृत्यु हो जायेगी ।


यह श्राप मिलने के बाद पाण्डु ने अपना राज्य छोड़ दिया और जंगल में चले गए । कुंती और माद्री भी उनके साथ जंगल चलीं गई । पाण्डु कई आश्रमों में जया करते थे, ऋषियों से हरी कथा सुना करते थे और ध्यान किया करते थे ।


एक दिन पाण्डु ने सोचा कि अब उनके बाद राजा कौन बनेगा क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे हैं और ऋषि के श्राप के कारण अब उनके पुत्र हो नहीं सकते । कुंती ने पाण्डु को बताया कि उनको दुर्वशा मुनि ने एक वरदान दिया था जिससे वे पुत्र प्राप्त कर सकती हैं ।


पाण्डु ने तुरंत ही इस मंत्र का इस्तेमाल करने को कहा और बताए कि सबसे पहले धर्मराज का आवाहन करें । कुंती ने धर्मराज का आवाहन किया और उनसे उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुए जिनका नाम युधिस्ठिर रखा गया । वायु देवता का आवाहन करने पर भीम और इंद्र का आवाहन करने पर अर्जुन प्राप्त हुए ।


इसके बाद माद्री ने उस मंत्र से अश्विनी कुमारों का आवाहन किया जिनसे उन्हे दो पुत्र प्राप्त हुए नकुल और सहदेव । एक दिन पाण्डु जंगल से जा रहे थे तभी उनके अंदर रमण की भावना जागी । वो अपने आप को रोक नहीं पाए और अपनी पत्नी माद्री का संग कर बैठे ।


इस तरह ऋषि का श्राप असर किया और उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई । कुंती ने सोचा कि वे भी सती हो जाएंगी लेकिन माद्री ने कहा कि यह सब उनकी वजह से हुआ है इसलिए उनको सती हो जाना चाहिए । इस प्रकार माद्री सती हो गईं और अग्नि में प्रवेश कर गईं ।


आगे की कहानी अगले पोस्ट में बताई गई है । अगला पोस्ट पड़ने के लिए यहां क्लिक करें – कौरवों का जन्म ।


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महाभारत कथा

भाग भाग का शीर्षक

भाग-1 महाभारत की शुरुआत

भाग-2 पांडवों का जन्म

भाग-3 कौरवों का जन्म

भाग-4 द्रोणाचार्य का गुरुकुल

भाग-5 दुर्योधन और कर्ण की मित्रता

भाग-6 पांडवों को जलाने का षड्यंत्र

भाग-7 पांडव दुर्योधन से छिपकर कहां गए

भाग-8 द्रोपदी का विवाह

भाग-9 इंद्रप्रस्थ का निर्माण किसने किया

भाग-10 जरासंध को किसने मारा

भाग-11 शिशुपाल वध, भगवान ने शिशुपाल के 100 पाप क्यों क्षमा किए

भाग-12 पांडव और कौरव के बीच चौसर का खेल

भाग-13 पांडवों का वनवास

जब शकुनी ने कपटपूर्वक चौसर खेला तब भगवान कृष्ण कहां थे

भाग-14 अर्जुन और शिव जी का युद्ध, किसकी हुयी जीत

भाग-15 अर्जुन की स्वर्ग यात्रा, उर्वशी द्वारा अर्जुन को श्राप

भाग-16 राजा नल की कहानी – नल और दमयंती का विवाह कैसे हुआ

भाग-17 राजा नल की गरीबी, कलयुग ने ईर्ष्यावश सारा राज्य छीन लिया

भाग-18 राजा नल की कथा, नल ने अपना राज्य वापिस केसे जीता

भाग-19 युधिस्ठिर गए तीर्थ, नारद जी ने बताया प्रयाग तीर्थ का महत्व

भाग-20 अगस्त्य मुनि की कहानी, अगस्त्य मुनि ने समुंद्र केसे सुखाया

भाग-21 श्रृंगी ऋषि कौन थे, श्रृंगी ऋषि एक हिरण से पैदा कैसे हुए?

भाग-22 युवनाश्व राजा की कहानी जिन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया

भाग-23 पांडवों की स्वर्ग यात्रा, अर्जुन से मिलने के लिए स्वर्ग गए


भाग-24 नहुष कौन थे? नहुष इंद्र थे लेकिन एक श्राप के कारण अजगर बन गए

भाग-25 पांडवों ने दुर्योधन को गंधर्वों से क्यों बचाया



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कलयुग में रामनाम की महिमा!!!!!*नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥कहते हैं कि कलियुग ने आने के लिए राजा परीक्षित से बहुत अनुनय-विनय की। कहा कि घबराइए नहीं महाराज, हम किसी को तंग नहीं करेंगे, बस 'स्वर्ण' में घर बसाएंगे। हमारे साथ दो-चार संगी, साथी होंगे- राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम-वासना आदि। अपने गुण बताते हुए कलियुग ने कहा- सुनो हमारी महिमा! हमारे राज में जो प्रभु का 'केवल' नाम ले लेगा, उसकी मुक्ति निश्चित है। और तो और, मन से सोचे गए पाप की हम सजा नहीं देंगे, पर मन से सोचे गए पुण्य का फल जरूर देंगे। राजा परीक्षित ने कलियुग को आने दिया तो सबसे पहले वह राजा के सोने के मुकुट में ही विराजमान हुआ और सबसे पहले उन्हें ही मृत्यु की ओर धकेल दिया।कलियुग को सभी कोसते हैं, सभी क्रोध, राग, द्वेष और वासना से ग्रस्त हैं। कोई कहता है काश, हम सतयुग में पैदा हुए होते। कोई त्रेता और द्वापर युग के गुण गाता है। तुलसीदास ने जन-मानस की हालत देखकर समझाया कि कलियुग में बेशक बहुत सी गड़बडि़याँ हैं, मगर उन सबसे बचने का उपाय जितनी सरलता से कलियुग में मिल सकता है, उतनी सरलता से किसी और काल में नहीं मिला। पहले प्रभु को पाने के लिए ध्यान करना पड़ता था। त्रेता में योग से प्रभु मिलते थे, द्वापर में कर्मकांड का मार्ग था। ये सभी मार्ग नितांत कठिन और घोर तपस्या के बाद ही फलीभूत होते हैं, पर कलियुग में ईश्वर को प्राप्त करना पहले के मुकाबले बड़ा ही सरल हो गया है।कैसे भाई? हर मत और संप्रदाय ने गुण गाया है 'नाम' का। यह वह मार्ग है जहाँ विविध संप्रदाय एकमत हो जाते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास ने कहा:कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।नाम जप में किसी विधिविधान, देश, काल, अवस्था की कोई बाधा नहीं है। किसी प्रकार से, कैसी भी अवस्था में, किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी, कैसे भी नाम जप किया जा सकता है। इस नाम जप से हर युग में भक्तों का भला हुआ। श्रीभद् भागवत में कथा आती है अजामिल ब्राह्माण की, जिसने सतयुग में घोर पाप किया। पत्नी के होते हुए वेश्या के पास रहा। वेश्या के पुत्र का नाम नारायण रख दिया। मरते समय पुत्र को पुकारा, 'नारायण!' तो स्वयं नारायण आ गए। ऐसी ही एक और कथा है गज ग्राह युद्ध की। गज ने अपनी सूंड तक अपने को डूबते पाया तो पुकारा 'रा!' इतनी भी शक्ति नहीं थी कि पूरा 'राम' कह दे। पर प्रभु ने भाव समझ लिया और गज के प्राण बचा लिए। त्रेता में वाल्मीकि ने नाम जप किया तो उल्टा। 'राम' कह न सके, डाकू थे, मांसाहारी थे, सो 'मरा' कहना सरल लगा, तोते की तरह रटते रहे तो स्वयं श्री राम पधारे कुटिया में। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्मा समाना।' द्वापर युग में दौपदी ने भरी सभा में रोते हुए हाथ खड़े कर दिए। सभी का सहारा छोड़ दिया तो कृष्ण की याद आई। श्रीकृष्ण चीर रूप में प्रकट हुए।कलियुग में तो नाम जप के भक्तों की भरमार है। कबीर, मीरा, रैदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान, नानक, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि आदि। राजा परीक्षित के वैद्य धन्वन्तरि तो कहते थे कि 'नाम जप' औषधि है, जिससे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। इस औषधि का लाभ गांधीजी ने भी तो उठाया। हर अवस्था में, चिंता में, रोग में उन्होंने 'राम नाम' का आश्रय लिया।लेकिन नाम जप का यह अर्थ नहीं कि पाप करने की छूट मिल गई। नाम से पापों का विनाश होता तो है, पर तभी जब व्यक्ति के हृदय में पिछले पापों के प्रति प्रायश्चित और उन्हें दोबारा न करने का संकल्प हो। नाम जप की औषधि के साथ परहेज भी आवश्यक है। नाम जपते रहो, क्रोध स्वत: दूर हो जाएगा। जप में बुरी प्रवृत्तियां पीछे हटती जाती हैं। उन्हें जबरन हटाने का प्रयास न करो, बस नाम जपो, प्रेम से।रामचरितमानस में भी बाबा तुलसी ने लिखा है,,,,सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥ द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥* कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥ वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते॥* कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥By वनिता कासनियां पंजाबभावार्थ:-यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है॥।। हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे।।जय हो!!!! जय सिया राम🚩🚩🚩🚩

कलयुग में रामनाम की महिमा!!!!! *नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥ कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्‌जी हैं॥ कहते हैं कि कलियुग ने आने के लिए राजा परीक्षित से बहुत अनुनय-विनय की। कहा कि घबराइए नहीं महाराज, हम किसी को तंग नहीं करेंगे, बस 'स्वर्ण' में घर बसाएंगे। हमारे साथ दो-चार संगी, साथी होंगे- राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम-वासना आदि। अपने गुण बताते हुए कलियुग ने कहा- सुनो हमारी महिमा! हमारे राज में जो प्रभु का 'केवल' नाम ले लेगा, उसकी मुक्ति निश्चित है।  और तो और, मन से सोचे गए पाप की हम सजा नहीं देंगे, पर मन से सोचे गए पुण्य का फल जरूर देंगे। राजा परीक्षित ने कलियुग को आने दिया तो सबसे पहले वह राजा के सोने के मुकुट में ही विराजमान हुआ और सबसे पहले उन्हें ही मृत्यु की ओर धकेल दिया। कलियुग को सभी कोसते हैं, सभी क्रोध, राग, द्वेष और वासना से ग्रस्त हैं। कोई कहता है काश, हम ...

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप By बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रममसिक धर्म मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है ।इंद्र के द्वारा किया गया पापइंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों में से एक है इंद्र के द्वारा की गयी ब्रम्हहत्या ।एक बार की बात है देवताओं के गुरु वृहस्पति उनपर नाराज हो गए । इस मौके का फायदा उठाकर असुरों ने स्वर्ग पर हमला कर दिया । गुरु का संरक्षण ना होने के कारण सारे देवता कमजोर पड़ गए और युद्ध हार गए । असुरों ने स्वर्ग छीन लिया और देवता बेघर होकर यहाँ वहां भटकने लगे । स्वर्ग के राजा जब बेघर होकर भाग रहे थे तो उनकी मदद किसी ने नहीं की । ब्रम्हा जी ने उन्हें सलाह दी कि देवराज का यह हाल एक महात्मा का तिरस्कार करने की वजह से हुआ है । अगर देवताओं पर बृहस्पति की कृपा होती हो ये नौबत कभी ना आती । ।ब्रम्हा जी ने कहा की देवराज इंद्र को गुरु कृपा से ही स्वर्ग वापस मिल सकता है इसलिए उन्हें किसी महात्मा की शरण में जाना चाहिए । इंद्र ने वैसा ही किया और एक ज्ञानी महात्मा को प्रसन्न करने के लिए रोज उनकी सेवा करने लगे । महात्मा के लिए यज्ञ की सामग्री लेकर आते, हाथ पैर दबाते और विनम्र भाव से आज्ञा पालन करते । सब कुछ ठीक चल रहा था जब तक इंद्र ने उन महात्मा की ह्त्या नहीं कर डाली । दरअसल इंद्र को पता चला कि वो महात्मा एक असुर के पुत्र थे और यज्ञ में दी गयी सारी आहूतियां असुरों तक पंहुचा रहे थे ।इंद्र ने अपने पाप का फल स्त्रियों को दे दियापहले से ही मुसीबत में पड़े इंद्र पर अब एक और मुसीबत आ गयी क्यूंकि ब्रम्हत्या का पाप भी अब उनपर लगने वाला था । भागवान विष्णु ने इंद्र को इस पाप से बचने की सलाह दी । भागवान के कहे अनुसार इंद्र ने अपने पाप का एक चौताई हिस्सा पेड़ों को, एक चौथाई हिस्सा भूमि को, एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को और एक चौथाई हिस्सा जल को दे दिया । इस तरह इंद्र को पाप से मुक्ति मिल गयी लेकिन पाप के एवज में इंद्र ने चारों पात्रों को एक-एक वरदान भी दिया ।इंद्र ने पेड़ों को वरदान दिया कि पेड़ एक बार कटने के बाद अपने आप को पुनः जीवित कर सकेंगे बदले में पेड़ में से गोंद निकलना शुरू हो गया । इसी तरह स्त्री को इंद्र ने वरदान दिया कि पुरुषों के मुकाबले वे चार गुना ज्यादा काम का आनंद ले सकेंगी । इसी तरह जल को इंद्र ने वरदान दिया कि आज से जल में पवित्र करने की शक्ति पायी जाएगी । भूमि को वरदान दिया कि भूमि के गड्ढे अपने आप भर जायेमसिक धर्म का वैज्ञानिक कारणवैज्ञानिकों के मत अनुसार मासिक धर्म एक साधारण प्रक्रिया है । यह स्त्री के सरीर में बने अत्यधिक मासपेशियों से उन्हें निजात दिलाता है । दरअसल स्त्री का शरीर हार्मोन में हुए बदलाव की वजह से नयी मासपेशियों को बनाता है । जब इनका इस्तेमाल नहीं होता तो शरीर इनसे छुटकारा पा लेता है और दोबारा से नयी मासपेशियां बनाना शुरू कर देता है । इतना ही साधारण है मासिक धर्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से ।पुरुषों को मसिक धर्म क्यों नहीं होता?पुरुषों को इंद्र ने अपने पाप का हिस्सा नहीं दिया था इसलिए उन्हें मासिक धर्म नहीं होता । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से पुरुषों का प्रजनन तंत्र महिलाओं के प्रजनन तंत्र से अलग काम करता है । अब क्यूंकि पुरुष बच्चों को जन्म नहीं देते इसलिए उनका शरीर उसके लिए उतनी मासपेशियां नहीं बनाता ।मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों?मंदिर में प्रवेश पवित्र व्यक्ति ही कर सकता है । पवित्र मतलब जो शरीर से पवित्र हो । प्राचीन काल में इस नियम का दुरूपयोग किया जाता रहा और छोटी जाती के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता रहा । मासिक धर्म के दौरान महिलाएं शरीर से अपवित्र होती हैं इसलिए उस वक्त उनका मंदिर में प्रवेश निषेध है ।माहवारी से हुयी बीमारियों से बचने के उपायमाहवारी यानि मासिक धर्म के वक्त गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने से बचें । इस द्वारान अत्यधिक मेहनती काम करने से बचे ।असामान्य मासिक धर्म से कैसे बचें?मानसिक तनाव से बचें । ऐसा होने पर कुछ दिन के लिए व्ययायाम सम्बन्धी गतिविधियों पर रोक लगाएं । प्राणायाम कर सकते हैं इससे तनाव जायेगा ।क्या जानवरों को मासिक धर्म होता है?वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों को मासिक धर्म नहीं होता, जानवरों में यह काफी काम मात्रा में होता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में estrous cycle कहते हैं ।क्या मासिक धर्म को रोका जा सकता है?इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता क्यूंकि यह बिलकुल नैसर्गिक है । महिलाओं का शरीर हर महीने बच्चा पैदा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है । शरीर को यह पता नहीं होता कि किस महीने स्त्री गर्भवती होगी इसलिए स्त्री का शरीर अपने आप को इस काम के लिए हर महीने तैयार करता रहता है ।दोस्तों कहानी किसी लगी व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करके जरूर बताएं । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Join Whatsapp । अंत तक बने रखने के लिए आपका शुक्रिया

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹 मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप   By  बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम मसिक धर्म  मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है । इंद्र के द्वारा किया गया पाप इंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों...