सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

महाभारत🪴🌹 पांडवों का जन्म

 🌹🪴महाभारत🪴🌹


पांडवों का जन्म


By वनिता कासनियां पंजाब द्वारा !!


पिछले पोस्ट में हमने देखा किस तरह धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म हुआ, इस पोस्ट में हम बात करेंगे पांडवों के जन्म के बारे में । अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पड़ी तो यहां क्लिक करके पड़ सकते हैं – महाभारत की शुरुआत


इसी तरह की जानकारी पाते रहने के लिए हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करें, व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहां क्लिक करें – Whotsapp 


जब अंधे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ तब सत्यवती ने कहा कि यह तो गड़बड़ है क्योंकि अंधा पुत्र राजा नहीं बन सकता । सत्यवती ने अंबिका से दोबारा पुत्र पैदा करने को कहा । इस बार अंबिका डर गईं और उन्होंने कहा कि इतने डरावने व्यक्ति को में दोबारा नहीं देख सकती । इसलिए उन्होंने अपनी दासी को अपनी जगह पर भेज दिया । दासी बहुत ही धार्मिक थी और वेद व्यास जी का सम्मान करती थी इसलिए उनसे एक बड़े ही योग्य पुत्र प्राप्त हुए । ये पुत्र थे विदुर जो कि पहले धर्मराज थे लेकिन मांडव्य मुनि के श्राप के कारण इन्हें दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ा ।


मांडव्य मुनि की कथा हमने पहले ही एक पोस्ट में बताई है, किस तरह मांडव्य मुनि ने धर्मराज को श्राप दिया , पूरा पड़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं – बच्चो को पाप क्यों नहीं लगता जानें एक कथा के माध्यम से


धृतराष्ट्र का विवाह

धृतराष्ट्र के विवाह के लिए कोई योग्य कन्या की तलाश जारी थी । तभी पता चला कि गांधार नरेश की पुत्री गांधारी बहुत ही सुंदर और गुणवान है । हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र के विवाह का प्रताव गांधार भेजा गया जिसने बताया गया था कि धृतराष्ट्र में बहुत सारे गुण है लेकिन सिर्फ एक ही दिक्कत है कि वो अंधे हैं ।


गांधार नरेश ने माना करने का सोचा लेकिन यह प्रताव कुरु वंश से आया हुआ था इसलिए धृतराष्ट्र के अंधे होने पर भी उन्होंने हां कर दी । गांधारी ने भी कुरु वंश का सम्मान करते हुए शादी की और अपने पति के प्रति व्रत धर्म को दिखाने के लिए अपनी आंखों पर हमेशा के लिए पट्टी बांध ली ।


गांधारी ने सोचा कि जब मेरे पति ही अंधे हैं तो मुझे भी अंधा बनकर रहना चाहिए लेकिन ऐसा करना उचित नहीं है क्योंकि ऐसा करने से वो न तो अपने पति की सेवा सही से कर सकती थीं और साथ ही न देखने के कारण अपने बच्चों को उचित संस्कार भी नहीं दे पायीं । गांधारी को आर्शीवाद मिला कि जब भी वे अपनी आंखों की पट्टी खोलकर किसी को देखेंगी तो उसका शरीर बज्र का हो जायेगा ।


पाण्डु का विवाह

भगवान श्री कृष्ण के पिता वसुदेव के बारे में तो आप जानते ही हैं । वासुदेव के पिता जी का नाम था सूरसेन और उनकी एक बहन थीं जिनका नाम था प्रथा । सूरसेन जी ने अपनी पुत्री को कुंतीभोज को दे दिया था क्योंकि उनके यहां कोई संतान नहीं हो रही थी जिस कारण सूरसेन जी की पुत्री का नाम पड़ा कुंती ।


एक दुर्वासा मुनि कुंती के यहां आए और कुंती ने उनकी बड़े ही अच्छे से सेवा की जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा मुनि ने उनको एक मंत्र दिया । मंत्र की मदद से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर सकतीं थी और उनसे एक पुत्र प्राप्त कर सकती थीं ।


कुंती ने इस मंत्र का परीक्षण करने के लिए सूर्य देवता का आवाहन किया जिनसे उन्हें अपना पहला पुत्र कर्ण प्राप्त हुआ । लेकिन अभी कुंती की शादी नहीं हुई थी इसलिए उन्होंने कर्ण को नदी में बहा दिया ।


आगे चलकर कुंतीभोज ने राजकुमारी कुंती के विवाह के लिए स्वयंवर की रचना की जिसमे कई महान राजा आए हुए थे लेकिन कुंती ने पाण्डु को चुना और दोनो का विवाह हो गया ।


इसी के साथ भीष्म पितामह की इच्छा थी कि पाण्डु इतने कुशल राजा बनने वाले हैं इसलिए उनकी एक और पत्नी भी होनी चाहिए इसलिए पाण्डु का दूसरा विवाह हुआ माद्री से । इसके बाद पाण्डु ने कुछ समय अपने राज्य में व्यतीत किया और फिर विश्व विजेता बनने के अपने अभियान पर निकल गए ।


पांडवों का जन्म

पाण्डु ने कई सारे राज्यों को जीता और एक बहुत ही महान राजा के रूप में शासन किया लेकिन एक समय जब वे जंगल में शिकार कर रहे थे तब उनका तीर एक ऋषि को लग गया । ऋषि एक हिरण के रूप में थे और तीर लगते ही इंसान के रूप में आ गए ।


ऋषि उसे समय एक हिरणी के साथ रमण कर रहे थे और तीर लगने पर उन्होंने पाण्डु श्राप दिया कि जिस तरह इस अवस्था में पाण्डु में उनको तीर मारा है उसी तरह जब पाण्डु अपनी पत्नी के साथ रमण करने का प्रयास करेंगे उनकी मृत्यु हो जायेगी ।


यह श्राप मिलने के बाद पाण्डु ने अपना राज्य छोड़ दिया और जंगल में चले गए । कुंती और माद्री भी उनके साथ जंगल चलीं गई । पाण्डु कई आश्रमों में जया करते थे, ऋषियों से हरी कथा सुना करते थे और ध्यान किया करते थे ।


एक दिन पाण्डु ने सोचा कि अब उनके बाद राजा कौन बनेगा क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे हैं और ऋषि के श्राप के कारण अब उनके पुत्र हो नहीं सकते । कुंती ने पाण्डु को बताया कि उनको दुर्वशा मुनि ने एक वरदान दिया था जिससे वे पुत्र प्राप्त कर सकती हैं ।


पाण्डु ने तुरंत ही इस मंत्र का इस्तेमाल करने को कहा और बताए कि सबसे पहले धर्मराज का आवाहन करें । कुंती ने धर्मराज का आवाहन किया और उनसे उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुए जिनका नाम युधिस्ठिर रखा गया । वायु देवता का आवाहन करने पर भीम और इंद्र का आवाहन करने पर अर्जुन प्राप्त हुए ।


इसके बाद माद्री ने उस मंत्र से अश्विनी कुमारों का आवाहन किया जिनसे उन्हे दो पुत्र प्राप्त हुए नकुल और सहदेव । एक दिन पाण्डु जंगल से जा रहे थे तभी उनके अंदर रमण की भावना जागी । वो अपने आप को रोक नहीं पाए और अपनी पत्नी माद्री का संग कर बैठे ।


इस तरह ऋषि का श्राप असर किया और उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई । कुंती ने सोचा कि वे भी सती हो जाएंगी लेकिन माद्री ने कहा कि यह सब उनकी वजह से हुआ है इसलिए उनको सती हो जाना चाहिए । इस प्रकार माद्री सती हो गईं और अग्नि में प्रवेश कर गईं ।


आगे की कहानी अगले पोस्ट में बताई गई है । अगला पोस्ट पड़ने के लिए यहां क्लिक करें – कौरवों का जन्म ।


अगली पोस्ट की जानकारी पाने के लिए हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने केलिए यहां क्लिक करें –

  WhatsappGroup


← महाभारत की शुरुआतकौरवों का जन्म →

महाभारत कथा

भाग भाग का शीर्षक

भाग-1 महाभारत की शुरुआत

भाग-2 पांडवों का जन्म

भाग-3 कौरवों का जन्म

भाग-4 द्रोणाचार्य का गुरुकुल

भाग-5 दुर्योधन और कर्ण की मित्रता

भाग-6 पांडवों को जलाने का षड्यंत्र

भाग-7 पांडव दुर्योधन से छिपकर कहां गए

भाग-8 द्रोपदी का विवाह

भाग-9 इंद्रप्रस्थ का निर्माण किसने किया

भाग-10 जरासंध को किसने मारा

भाग-11 शिशुपाल वध, भगवान ने शिशुपाल के 100 पाप क्यों क्षमा किए

भाग-12 पांडव और कौरव के बीच चौसर का खेल

भाग-13 पांडवों का वनवास

जब शकुनी ने कपटपूर्वक चौसर खेला तब भगवान कृष्ण कहां थे

भाग-14 अर्जुन और शिव जी का युद्ध, किसकी हुयी जीत

भाग-15 अर्जुन की स्वर्ग यात्रा, उर्वशी द्वारा अर्जुन को श्राप

भाग-16 राजा नल की कहानी – नल और दमयंती का विवाह कैसे हुआ

भाग-17 राजा नल की गरीबी, कलयुग ने ईर्ष्यावश सारा राज्य छीन लिया

भाग-18 राजा नल की कथा, नल ने अपना राज्य वापिस केसे जीता

भाग-19 युधिस्ठिर गए तीर्थ, नारद जी ने बताया प्रयाग तीर्थ का महत्व

भाग-20 अगस्त्य मुनि की कहानी, अगस्त्य मुनि ने समुंद्र केसे सुखाया

भाग-21 श्रृंगी ऋषि कौन थे, श्रृंगी ऋषि एक हिरण से पैदा कैसे हुए?

भाग-22 युवनाश्व राजा की कहानी जिन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया

भाग-23 पांडवों की स्वर्ग यात्रा, अर्जुन से मिलने के लिए स्वर्ग गए


भाग-24 नहुष कौन थे? नहुष इंद्र थे लेकिन एक श्राप के कारण अजगर बन गए

भाग-25 पांडवों ने दुर्योधन को गंधर्वों से क्यों बचाया



लोकप्रिय लेख

Amazon forest mystery | जंगल का रहस्य

अच्छे लोगों की मृत्यु जल्दी क्यों हो जाती है ?

कलयुग का कड़वा सच – लड़कियों का अपने ही घर में शोषण होगा।

शकुनी का सबसे बड़ा रहस्य जो महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना

मृत्यु से बचने का है एक मात्र उपाय – मरने से पहले जरूर पड़ें !

कलयुग में श्राप क्यों नहीं लगता, श्राप देने की योग्यता

गणेश जी को सबसे पहले क्यों पूजा जाता है?

बेटी को घर की लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

ईश्वर को न मानने में कौन कौन सी हानियां हैं?

मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप

कटप्पा – महान भक्त, जिन्होंने अपनी दोनों आँखें भेंट दे दीं

हमें अपने पिछले जन्म का कुछ भी याद क्यों नहीं रहता?

गायत्री मंत्र का जाप करने की विधि और फायदे

बेटी की शादी किस घर में करना चाहिए ?

सूर्यपुत्र कर्ण ने एक दासी से क्यों की शादी?

ब्रह्मा का क्यों नहीं है 1 भी मंदिर ?

गंगा ने अपने 7 पुत्रों को क्यों मार डाला?

अर्जुन और बब्रुवाहन का युद्ध

धृतराष्ट्र के इन 5 पापों के कारण हुआ महाभारत का युद्ध

राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा महर्षि विश्वामित्र के द्वारा

स्नान करने के फायदे, अगर इस तरह करेंगे स्नान तो कभी नहीं होगी धन की कमी

दूसरों की निंदा करने से क्या होता है – एक कथा के माध्यम से जानें

मानव जीवन का लक्ष्य – जीवन में दुखों से मुक्ति कैसे मिलेगी

Navratri 2022 – नवरात्री में क्या करें और क्या नहीं

मनुष्य को कौन से दुःख भोगने पड़ते हैं?

बच्चो को पाप क्यों नहीं लगता जानें एक कथा के माध्यम से

गीता का ज्ञान जो है सफलता की चाबी

गीता ज्ञान के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र

कलयुग की शुरुआत, कैसे आया कलयुग इस धरती पर

महाराज युधिस्ठिर ने बताया जीवन का सबसे बड़ा क्या है

भगवान श्री राम ने किस तरह तोड़ा सुग्रीव का घमंड

भगवान श्री राम को क्यों कहा जाता है धीर प्रशांत

भगवान श्री राम से जुड़ी कुछ प्रचलित अफवाएँ

अर्जुन ने किस तरह किया कर्ण का वध

अर्जुन के विवाह

महाभारत के युद्ध में बर्बरीक ने क्या देखा

अश्वत्थामा ने सोते वक्त द्रोपदी के पुत्रों को क्यों मारा ?

महाभारत का विराट युद्ध

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप By बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रममसिक धर्म मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है ।इंद्र के द्वारा किया गया पापइंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों में से एक है इंद्र के द्वारा की गयी ब्रम्हहत्या ।एक बार की बात है देवताओं के गुरु वृहस्पति उनपर नाराज हो गए । इस मौके का फायदा उठाकर असुरों ने स्वर्ग पर हमला कर दिया । गुरु का संरक्षण ना होने के कारण सारे देवता कमजोर पड़ गए और युद्ध हार गए । असुरों ने स्वर्ग छीन लिया और देवता बेघर होकर यहाँ वहां भटकने लगे । स्वर्ग के राजा जब बेघर होकर भाग रहे थे तो उनकी मदद किसी ने नहीं की । ब्रम्हा जी ने उन्हें सलाह दी कि देवराज का यह हाल एक महात्मा का तिरस्कार करने की वजह से हुआ है । अगर देवताओं पर बृहस्पति की कृपा होती हो ये नौबत कभी ना आती । ।ब्रम्हा जी ने कहा की देवराज इंद्र को गुरु कृपा से ही स्वर्ग वापस मिल सकता है इसलिए उन्हें किसी महात्मा की शरण में जाना चाहिए । इंद्र ने वैसा ही किया और एक ज्ञानी महात्मा को प्रसन्न करने के लिए रोज उनकी सेवा करने लगे । महात्मा के लिए यज्ञ की सामग्री लेकर आते, हाथ पैर दबाते और विनम्र भाव से आज्ञा पालन करते । सब कुछ ठीक चल रहा था जब तक इंद्र ने उन महात्मा की ह्त्या नहीं कर डाली । दरअसल इंद्र को पता चला कि वो महात्मा एक असुर के पुत्र थे और यज्ञ में दी गयी सारी आहूतियां असुरों तक पंहुचा रहे थे ।इंद्र ने अपने पाप का फल स्त्रियों को दे दियापहले से ही मुसीबत में पड़े इंद्र पर अब एक और मुसीबत आ गयी क्यूंकि ब्रम्हत्या का पाप भी अब उनपर लगने वाला था । भागवान विष्णु ने इंद्र को इस पाप से बचने की सलाह दी । भागवान के कहे अनुसार इंद्र ने अपने पाप का एक चौताई हिस्सा पेड़ों को, एक चौथाई हिस्सा भूमि को, एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को और एक चौथाई हिस्सा जल को दे दिया । इस तरह इंद्र को पाप से मुक्ति मिल गयी लेकिन पाप के एवज में इंद्र ने चारों पात्रों को एक-एक वरदान भी दिया ।इंद्र ने पेड़ों को वरदान दिया कि पेड़ एक बार कटने के बाद अपने आप को पुनः जीवित कर सकेंगे बदले में पेड़ में से गोंद निकलना शुरू हो गया । इसी तरह स्त्री को इंद्र ने वरदान दिया कि पुरुषों के मुकाबले वे चार गुना ज्यादा काम का आनंद ले सकेंगी । इसी तरह जल को इंद्र ने वरदान दिया कि आज से जल में पवित्र करने की शक्ति पायी जाएगी । भूमि को वरदान दिया कि भूमि के गड्ढे अपने आप भर जायेमसिक धर्म का वैज्ञानिक कारणवैज्ञानिकों के मत अनुसार मासिक धर्म एक साधारण प्रक्रिया है । यह स्त्री के सरीर में बने अत्यधिक मासपेशियों से उन्हें निजात दिलाता है । दरअसल स्त्री का शरीर हार्मोन में हुए बदलाव की वजह से नयी मासपेशियों को बनाता है । जब इनका इस्तेमाल नहीं होता तो शरीर इनसे छुटकारा पा लेता है और दोबारा से नयी मासपेशियां बनाना शुरू कर देता है । इतना ही साधारण है मासिक धर्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से ।पुरुषों को मसिक धर्म क्यों नहीं होता?पुरुषों को इंद्र ने अपने पाप का हिस्सा नहीं दिया था इसलिए उन्हें मासिक धर्म नहीं होता । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से पुरुषों का प्रजनन तंत्र महिलाओं के प्रजनन तंत्र से अलग काम करता है । अब क्यूंकि पुरुष बच्चों को जन्म नहीं देते इसलिए उनका शरीर उसके लिए उतनी मासपेशियां नहीं बनाता ।मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों?मंदिर में प्रवेश पवित्र व्यक्ति ही कर सकता है । पवित्र मतलब जो शरीर से पवित्र हो । प्राचीन काल में इस नियम का दुरूपयोग किया जाता रहा और छोटी जाती के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता रहा । मासिक धर्म के दौरान महिलाएं शरीर से अपवित्र होती हैं इसलिए उस वक्त उनका मंदिर में प्रवेश निषेध है ।माहवारी से हुयी बीमारियों से बचने के उपायमाहवारी यानि मासिक धर्म के वक्त गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने से बचें । इस द्वारान अत्यधिक मेहनती काम करने से बचे ।असामान्य मासिक धर्म से कैसे बचें?मानसिक तनाव से बचें । ऐसा होने पर कुछ दिन के लिए व्ययायाम सम्बन्धी गतिविधियों पर रोक लगाएं । प्राणायाम कर सकते हैं इससे तनाव जायेगा ।क्या जानवरों को मासिक धर्म होता है?वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों को मासिक धर्म नहीं होता, जानवरों में यह काफी काम मात्रा में होता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में estrous cycle कहते हैं ।क्या मासिक धर्म को रोका जा सकता है?इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता क्यूंकि यह बिलकुल नैसर्गिक है । महिलाओं का शरीर हर महीने बच्चा पैदा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है । शरीर को यह पता नहीं होता कि किस महीने स्त्री गर्भवती होगी इसलिए स्त्री का शरीर अपने आप को इस काम के लिए हर महीने तैयार करता रहता है ।दोस्तों कहानी किसी लगी व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करके जरूर बताएं । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Join Whatsapp । अंत तक बने रखने के लिए आपका शुक्रिया

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹 मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप   By  बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम मसिक धर्म  मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है । इंद्र के द्वारा किया गया पाप इंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों...

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!!अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी।अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी।युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी।राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा।रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी। यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा।वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे।कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया। प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी। रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया।जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये। यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की।राजा दशरथ के पास गया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी। बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी। इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए।तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता। कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे।ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और खूबसूरत सी कहानीया से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ ...