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पांडव दुर्योधन से छिपकर कहां गए November 11, 2022 गीता ज्ञानअभी तक हमने देखा कि किस तरह पांडवों को मारने का षड्यंत्र दुर्योधन ने रचा लेकिन पांडव किसी तरह सुरंग से बचकर निकल गए । आपने पड़ा होगा कि एक भीलनी और उसके पांच बच्चे भी इस रात उस घर में जलकर मारे गए थे । अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पड़ी है तो आगे क्लिक करके पड़ सके हैं – पांडवों को जलने का षड्यंत्र ।इसी तरह की धार्मिक पोस्ट पड़ते रहने के लिए हमारा व्हाट्सएप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहां क्लिक करें – WhatsappGroupसबको भीलनी और उसके बच्चों के कंकाल देखकर यही लग रहा था कि वो माता कुंती और पांडवों के कंकाल हैं । सब जगह शोक की लहर थी, जनता जानती थी कि यह दुर्योधन ने ही करवाया है । दूसरी ओर पांडव सुरंग से निकलकर एक गंगा नदी के किनारे पहुंच गए । वहां विदुर द्वारा भेजे गए एक गुप्तचर ने उन्हें नदी पार करवाकर जंगल में भेज दिया । गुप्तचर ने बताया कि विदुर जी का आदेश है कि पांडव कुछ समय भेष बदलकर ही छुपे रहें ।भीम का पहला विवाहजंगल में चलते चलते भीम के अलावा सारे भाई थक गए और आराम करने लगे । तभी वहां एक राक्षसी हिडिंबा आई जो पांडवों को मारना चाहती थी लेकिन भीम को देखकर मोहित हो गई और भीम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखने लगी । इतने में ही हिडिंबा का भाई हिडिम्बासुर भी वहां आ गया और भीम पर उसने हमला कर दिया । भीम और हिडिम्बासुर का युद्ध बहुत लंबा चला और भीम ने उसे मार डाला ।भीम ने वापिस आकर हिडिंबा को वापिस लौट जाने को कहा लेकिन हिडम्बा ने माता कुंती से कहा कि अगर भीम उससे विवाह नहीं करते तो वह अपने प्राण त्याग देगी । तब माता कुंती ने भीम को हिडिंबा से विवाह करने का आदेश दिया । भीम ने एक शर्त पर विवाह किया कि जैसे ही हिडिंबा से उनका एक पुत्र हो जाएगा वे हिडिंबा को छोड़ देंगे । भीम और हिडिंबा का पुत्र घटोत्कच उत्पन्न हुआ जो भीम के समान बलशाली और हिडिंबा जैसा मायावी था । वह पांडवों के प्रति सम्मान की भावना रखता था और वे भी उससे बड़ा स्नेह किया करते थे ।पुत्र होने के बाद हिडिंबा भीम से दूर चली गई थी और अपने पुत्र को पांडवों के पास छोड़ गई थी । घटोत्कच का मन राक्षसों में ही लगता था इसलिए वह भी माता कुंती से आज्ञा लेकर वापिस चला गया था । उसने कहा था कि जब कभी भी पांडवों को उसकी सहायता की जरूरत होगी तब वह मात्र एक बार बुलाने पर हाजिर हो जायेगा ।पांडव कहां छिपेपांडवो को जंगल में वेदव्यास जी मिले जिन्हें उन्हें एक ब्राह्मण के घर पर भेष बदलकर रहने को कहा । पांडव ब्राम्हण के भेष में उस ब्राह्मण के घर रहने लगे थे । एक दिन उस ब्राह्मण के घर के सभी सदस्य रो रहे थे । माता कुंती ने पांडवों से कहा कि इस ब्राम्हण ने हमे छुपने की जगह दी है इसलिए इसका हमारे ऊपर एहसान है । हमे इसकी मदद करके इसका एहसान चुकाना चाहिए ।जब कुंती ने ब्राम्हण परिवार से रोने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि उनके गांव के बाहर एक राक्षस बकासुर रहता है ।गांव वाले बकासुर के लिए रोज एक गाड़ी अन्न और 2 भैंसे भेजते हैं लेकिन जो व्यक्ति गाड़ी और भैंसे लेकर जाता है बकासुर उसे भी खा जाता है । इस बार गाड़ी और भैंसे पहुंचाने की बारी उस ब्राह्मण के परिवार की है इसलिए सभी रो रहे हैं । माता कुंती ने कहा कि मैं अपने पुत्र भीम को इस काम के लिए भेज देती हूं । वह बड़ा ही बलवान और होशियार है जो राक्षस को भोजन भी पहुंचा देगा और जिंदा भी वापिस आ जायेगा ।भीम गाड़ी लेकर आगे आगे जा रहे थे और गाड़ी का भोजन स्वयं ही करते जा रहे थे । जब बकासुर ने भीम को आते देखा तो वह खुश हुआ लेकिन पास आने पर उसने देखा कि भीम उसका भोजन खाए जा रहे हैं तो उसने भीम पर हमला कर दिया । 10,000 हाथियों के बल से युक्त भीम ने बकासुर को मार डाला और गांव के चौराहे पर पटक दिया । गांव वालों ने जब बकासुर को मरा पाया तो वे बड़े ही प्रसन्न हुए और ब्राह्मण के घर पहुंचे । पांडव छुप कर रह रहे थे इसलिए उन्होंने ब्राह्मण को सच छिपाने के लिए कहा था और ब्राह्मण ने गांव वालों को एक झूठी कहानी बनाकर संतुष्ट कर दिया ।पांडवो को द्रोपदी के बारे में पता केसे चलाएक दिन उस ब्राह्मण के घर पर एक और ब्राह्मण आए हुए थे जो उनको काफी सारे राज्यों के बारे में विस्तार से बता रहे थे । जब ब्राह्मण ने द्रुपद का जिक्र किया तो पांडवों ने द्रुपद के बारे में विस्तार से सुनना चाहा क्योंकि उन्होंने ही उसका आधा राज्य जीता था और उसे बंधी बनाकर द्रोणाचार्य को दे दिया था ।ब्राह्मण ने बताया कि राजा द्रुपद द्रोणाचार्य के द्वारा अपने अपमान के कारण परेशान रहते हैं । अब वह पहले से कमजोर हो गए हैं और यहां वहां भटकते रहते हैं । वो आश्रम आश्रम जाते हैं ताकि कोई ब्राह्मण यज्ञ करके उन्हें ऐसा पुत्र दिलाए जो द्रोण को मार सके लेकिन उन्हें कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं मिलता । एक बार द्रुपद को एक ब्राह्मण उपयज मिले जिनकी उन्होंने बड़े ही अच्छे से सेवा की लेकिन उपयज ने द्रुपद का काम करने से मना कर दिया ।जब मना करने के बाद भी द्रुपद ने एक साल और उपयज की सेवा की तब उन्होंने उसे अपने बड़े भाई यज के बारे में बताया । उन्होंने कहा कि यज यह काम कर देंगे । ऐसा ही हुआ, यज ने द्रुपद का काम कर दिया और यज्ञ करके उसे ऐसा पुत्र दिलाया जो द्रोण का वध कर सके । यज्ञ से एक कन्या भी प्राप्त हुई और इसी के साथ भविस्यवाणी हुई कि वह कन्या देवताओं का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उत्पन्न हुई है । पुत्र का नाम धृष्टद्युम्न रखा गया और पुत्री का नाम द्रोपदी ।https://vnita38.blogspot.com/2022/10/by-physical-level-psychological-level.htmlपांडव द्रोपदी के बारे में सुनकर बैचेन हो रहे थे । ब्राह्मण ने द्रोपदी के स्वयंवर के बारे में सुना तो वे वहां जाने के लिए तत्पर हो गए लेकिन उन्हें व्यास देव जी बात याद आई कि वे उसी ब्राह्मण के घर में ही रहेंगे जब तक व्यास देव अगला आदेश उन्हें न दें । पांडवों व्याकुल हो रहे थे इसलिए उन्होंने व्यास देव का ध्यान किया और वे प्रकट गए । व्यास देव सबके मन की बात जानने वाले थे, उन्होंने पांडवों से बिना कुछ पूछे ही कहा कि उन्हें पांचाल जाना चाहिए ।पूछने पर व्यास देव ने द्रोपदी के पिछले जीवन का प्रसंग बताया । पिछले जन्म में द्रोपदी एक ब्राह्मण की कन्या थी जिसका विवाह नहीं हो रहा था । उसने शिव जी की तपस्या की और शिव जी प्रकट हो गए । शिव जी ने वरदान मांगने को कहा तो द्रोपदी ने पांच बार बोल दिया कि उन्हें एक बलशाली पति प्राप्त हो, एक धार्मिक पति प्राप्त हो, एक सहनशील पति प्राप्त हो इत्यादि ।तब शिव जी ने कहा था कि तुम्हे अगले जन्म में पांच पति प्राप्त होंगे क्योंकि तुमने पांच बार पति मांगा है । व्यास देव ने बताया कि शिव जी के वरदान अनुसार पांच पांडव ही द्रोपदी के पति के रूप नियुक्त हैं इसलिए उन्हें द्रोपदी के स्वयंवर में जाना चाहिए ।आगे की कहानी बताएंगे अगले पोस्ट में । अगली पोस्ट की जानकारी पाने केलिए व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहां क्लिक करें –https://chat.whatsapp.com/4ZNNZKzaDF2IrLZM2YvD2s

पांडव दुर्योधन से छिपकर कहां गए

अभी तक हमने देखा कि किस तरह पांडवों को मारने का षड्यंत्र दुर्योधन ने रचा लेकिन पांडव किसी तरह सुरंग से बचकर निकल गए । आपने पड़ा होगा कि एक भीलनी और उसके पांच बच्चे भी इस रात उस घर में जलकर मारे गए थे । अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पड़ी है तो आगे क्लिक करके पड़ सके हैं – पांडवों को जलने का षड्यंत्र 

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सबको भीलनी और उसके बच्चों के कंकाल देखकर यही लग रहा था कि वो माता कुंती और पांडवों के कंकाल हैं । सब जगह शोक की लहर थी, जनता जानती थी कि यह दुर्योधन ने ही करवाया है । दूसरी ओर पांडव सुरंग से निकलकर एक गंगा नदी के किनारे पहुंच गए । वहां विदुर द्वारा भेजे गए एक गुप्तचर ने उन्हें नदी पार करवाकर जंगल में भेज दिया । गुप्तचर ने बताया कि विदुर जी का आदेश है कि पांडव कुछ समय भेष बदलकर ही छुपे रहें ।

भीम का पहला विवाह

जंगल में चलते चलते भीम के अलावा सारे भाई थक गए और आराम करने लगे । तभी वहां एक राक्षसी हिडिंबा आई जो पांडवों को मारना चाहती थी लेकिन भीम को देखकर मोहित हो गई और भीम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखने लगी । इतने में ही हिडिंबा का भाई हिडिम्बासुर भी वहां आ गया और भीम पर उसने हमला कर दिया । भीम और हिडिम्बासुर का युद्ध बहुत लंबा चला और भीम ने उसे मार डाला ।

भीम ने वापिस आकर हिडिंबा को वापिस लौट जाने को कहा लेकिन हिडम्बा ने माता कुंती से कहा कि अगर भीम उससे विवाह नहीं करते तो वह अपने प्राण त्याग देगी । तब माता कुंती ने भीम को हिडिंबा से विवाह करने का आदेश दिया । भीम ने एक शर्त पर विवाह किया कि जैसे ही हिडिंबा से उनका एक पुत्र हो जाएगा वे हिडिंबा को छोड़ देंगे । भीम और हिडिंबा का पुत्र घटोत्कच उत्पन्न हुआ जो भीम के समान बलशाली और हिडिंबा जैसा मायावी था । वह पांडवों के प्रति सम्मान की भावना रखता था और वे भी उससे बड़ा स्नेह किया करते थे ।

पुत्र होने के बाद हिडिंबा भीम से दूर चली गई थी और अपने पुत्र को पांडवों के पास छोड़ गई थी । घटोत्कच का मन राक्षसों में ही लगता था इसलिए वह भी माता कुंती से आज्ञा लेकर वापिस चला गया था । उसने कहा था कि जब कभी भी पांडवों को उसकी सहायता की जरूरत होगी तब वह मात्र एक बार बुलाने पर हाजिर हो जायेगा ।

पांडव कहां छिपे

पांडवो को जंगल में वेदव्यास जी मिले जिन्हें उन्हें एक ब्राह्मण के घर पर भेष बदलकर रहने को कहा । पांडव ब्राम्हण के भेष में उस ब्राह्मण के घर रहने लगे थे । एक दिन उस ब्राह्मण के घर के सभी सदस्य रो रहे थे । माता कुंती ने पांडवों से कहा कि इस ब्राम्हण ने हमे छुपने की जगह दी है इसलिए इसका हमारे ऊपर एहसान है । हमे इसकी मदद करके इसका एहसान चुकाना चाहिए ।

जब कुंती ने ब्राम्हण परिवार से रोने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि उनके गांव के बाहर एक राक्षस बकासुर रहता है ।

गांव वाले बकासुर के लिए रोज एक गाड़ी अन्न और 2 भैंसे भेजते हैं लेकिन जो व्यक्ति गाड़ी और भैंसे लेकर जाता है बकासुर उसे भी खा जाता है । इस बार गाड़ी और भैंसे पहुंचाने की बारी उस ब्राह्मण के परिवार की है इसलिए सभी रो रहे हैं । माता कुंती ने कहा कि मैं अपने पुत्र भीम को इस काम के लिए भेज देती हूं । वह बड़ा ही बलवान और होशियार है जो राक्षस को भोजन भी पहुंचा देगा और जिंदा भी वापिस आ जायेगा ।

भीम गाड़ी लेकर आगे आगे जा रहे थे और गाड़ी का भोजन स्वयं ही करते जा रहे थे । जब बकासुर ने भीम को आते देखा तो वह खुश हुआ लेकिन पास आने पर उसने देखा कि भीम उसका भोजन खाए जा रहे हैं तो उसने भीम पर हमला कर दिया । 10,000 हाथियों के बल से युक्त भीम ने बकासुर को मार डाला और गांव के चौराहे पर पटक दिया । गांव वालों ने जब बकासुर को मरा पाया तो वे बड़े ही प्रसन्न हुए और ब्राह्मण के घर पहुंचे । पांडव छुप कर रह रहे थे इसलिए उन्होंने ब्राह्मण को सच छिपाने के लिए कहा था और ब्राह्मण ने गांव वालों को एक झूठी कहानी बनाकर संतुष्ट कर दिया ।

पांडवो को द्रोपदी के बारे में पता केसे चला

एक दिन उस ब्राह्मण के घर पर एक और ब्राह्मण आए हुए थे जो उनको काफी सारे राज्यों के बारे में विस्तार से बता रहे थे । जब ब्राह्मण ने द्रुपद का जिक्र किया तो पांडवों ने द्रुपद के बारे में विस्तार से सुनना चाहा क्योंकि उन्होंने ही उसका आधा राज्य जीता था और उसे बंधी बनाकर द्रोणाचार्य को दे दिया था ।

ब्राह्मण ने बताया कि राजा द्रुपद द्रोणाचार्य के द्वारा अपने अपमान के कारण परेशान रहते हैं । अब वह पहले से कमजोर हो गए हैं और यहां वहां भटकते रहते हैं । वो आश्रम आश्रम जाते हैं ताकि कोई ब्राह्मण यज्ञ करके उन्हें ऐसा पुत्र दिलाए जो द्रोण को मार सके लेकिन उन्हें कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं मिलता । एक बार द्रुपद को एक ब्राह्मण उपयज मिले जिनकी उन्होंने बड़े ही अच्छे से सेवा की लेकिन उपयज ने द्रुपद का काम करने से मना कर दिया ।

जब मना करने के बाद भी द्रुपद ने एक साल और उपयज की सेवा की तब उन्होंने उसे अपने बड़े भाई यज के बारे में बताया । उन्होंने कहा कि यज यह काम कर देंगे । ऐसा ही हुआ, यज ने द्रुपद का काम कर दिया और यज्ञ करके उसे ऐसा पुत्र दिलाया जो द्रोण का वध कर सके । यज्ञ से एक कन्या भी प्राप्त हुई और इसी के साथ भविस्यवाणी हुई कि वह कन्या देवताओं का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए उत्पन्न हुई है । पुत्र का नाम धृष्टद्युम्न रखा गया और पुत्री का नाम द्रोपदी ।

https://vnita38.blogspot.com/2022/10/by-physical-level-psychological-level.html

पांडव द्रोपदी के बारे में सुनकर बैचेन हो रहे थे । ब्राह्मण ने द्रोपदी के स्वयंवर के बारे में सुना तो वे वहां जाने के लिए तत्पर हो गए लेकिन उन्हें व्यास देव जी बात याद आई कि वे उसी ब्राह्मण के घर में ही रहेंगे जब तक व्यास देव अगला आदेश उन्हें न दें । पांडवों व्याकुल हो रहे थे इसलिए उन्होंने व्यास देव का ध्यान किया और वे प्रकट गए । व्यास देव सबके मन की बात जानने वाले थे, उन्होंने पांडवों से बिना कुछ पूछे ही कहा कि उन्हें पांचाल जाना चाहिए ।

पूछने पर व्यास देव ने द्रोपदी के पिछले जीवन का प्रसंग बताया । पिछले जन्म में द्रोपदी एक ब्राह्मण की कन्या थी जिसका विवाह नहीं हो रहा था । उसने शिव जी की तपस्या की और शिव जी प्रकट हो गए । शिव जी ने वरदान मांगने को कहा तो द्रोपदी ने पांच बार बोल दिया कि उन्हें एक बलशाली पति प्राप्त हो, एक धार्मिक पति प्राप्त हो, एक सहनशील पति प्राप्त हो इत्यादि ।

तब शिव जी ने कहा था कि तुम्हे अगले जन्म में पांच पति प्राप्त होंगे क्योंकि तुमने पांच बार पति मांगा है । व्यास देव ने बताया कि शिव जी के वरदान अनुसार पांच पांडव ही द्रोपदी के पति के रूप नियुक्त हैं इसलिए उन्हें द्रोपदी के स्वयंवर में जाना चाहिए ।


आगे की कहानी बताएंगे अगले पोस्ट में । अगली पोस्ट की जानकारी पाने केलिए व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करें । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहां क्लिक करें –

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप By बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रममसिक धर्म मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है ।इंद्र के द्वारा किया गया पापइंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों में से एक है इंद्र के द्वारा की गयी ब्रम्हहत्या ।एक बार की बात है देवताओं के गुरु वृहस्पति उनपर नाराज हो गए । इस मौके का फायदा उठाकर असुरों ने स्वर्ग पर हमला कर दिया । गुरु का संरक्षण ना होने के कारण सारे देवता कमजोर पड़ गए और युद्ध हार गए । असुरों ने स्वर्ग छीन लिया और देवता बेघर होकर यहाँ वहां भटकने लगे । स्वर्ग के राजा जब बेघर होकर भाग रहे थे तो उनकी मदद किसी ने नहीं की । ब्रम्हा जी ने उन्हें सलाह दी कि देवराज का यह हाल एक महात्मा का तिरस्कार करने की वजह से हुआ है । अगर देवताओं पर बृहस्पति की कृपा होती हो ये नौबत कभी ना आती । ।ब्रम्हा जी ने कहा की देवराज इंद्र को गुरु कृपा से ही स्वर्ग वापस मिल सकता है इसलिए उन्हें किसी महात्मा की शरण में जाना चाहिए । इंद्र ने वैसा ही किया और एक ज्ञानी महात्मा को प्रसन्न करने के लिए रोज उनकी सेवा करने लगे । महात्मा के लिए यज्ञ की सामग्री लेकर आते, हाथ पैर दबाते और विनम्र भाव से आज्ञा पालन करते । सब कुछ ठीक चल रहा था जब तक इंद्र ने उन महात्मा की ह्त्या नहीं कर डाली । दरअसल इंद्र को पता चला कि वो महात्मा एक असुर के पुत्र थे और यज्ञ में दी गयी सारी आहूतियां असुरों तक पंहुचा रहे थे ।इंद्र ने अपने पाप का फल स्त्रियों को दे दियापहले से ही मुसीबत में पड़े इंद्र पर अब एक और मुसीबत आ गयी क्यूंकि ब्रम्हत्या का पाप भी अब उनपर लगने वाला था । भागवान विष्णु ने इंद्र को इस पाप से बचने की सलाह दी । भागवान के कहे अनुसार इंद्र ने अपने पाप का एक चौताई हिस्सा पेड़ों को, एक चौथाई हिस्सा भूमि को, एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को और एक चौथाई हिस्सा जल को दे दिया । इस तरह इंद्र को पाप से मुक्ति मिल गयी लेकिन पाप के एवज में इंद्र ने चारों पात्रों को एक-एक वरदान भी दिया ।इंद्र ने पेड़ों को वरदान दिया कि पेड़ एक बार कटने के बाद अपने आप को पुनः जीवित कर सकेंगे बदले में पेड़ में से गोंद निकलना शुरू हो गया । इसी तरह स्त्री को इंद्र ने वरदान दिया कि पुरुषों के मुकाबले वे चार गुना ज्यादा काम का आनंद ले सकेंगी । इसी तरह जल को इंद्र ने वरदान दिया कि आज से जल में पवित्र करने की शक्ति पायी जाएगी । भूमि को वरदान दिया कि भूमि के गड्ढे अपने आप भर जायेमसिक धर्म का वैज्ञानिक कारणवैज्ञानिकों के मत अनुसार मासिक धर्म एक साधारण प्रक्रिया है । यह स्त्री के सरीर में बने अत्यधिक मासपेशियों से उन्हें निजात दिलाता है । दरअसल स्त्री का शरीर हार्मोन में हुए बदलाव की वजह से नयी मासपेशियों को बनाता है । जब इनका इस्तेमाल नहीं होता तो शरीर इनसे छुटकारा पा लेता है और दोबारा से नयी मासपेशियां बनाना शुरू कर देता है । इतना ही साधारण है मासिक धर्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से ।पुरुषों को मसिक धर्म क्यों नहीं होता?पुरुषों को इंद्र ने अपने पाप का हिस्सा नहीं दिया था इसलिए उन्हें मासिक धर्म नहीं होता । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से पुरुषों का प्रजनन तंत्र महिलाओं के प्रजनन तंत्र से अलग काम करता है । अब क्यूंकि पुरुष बच्चों को जन्म नहीं देते इसलिए उनका शरीर उसके लिए उतनी मासपेशियां नहीं बनाता ।मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों?मंदिर में प्रवेश पवित्र व्यक्ति ही कर सकता है । पवित्र मतलब जो शरीर से पवित्र हो । प्राचीन काल में इस नियम का दुरूपयोग किया जाता रहा और छोटी जाती के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता रहा । मासिक धर्म के दौरान महिलाएं शरीर से अपवित्र होती हैं इसलिए उस वक्त उनका मंदिर में प्रवेश निषेध है ।माहवारी से हुयी बीमारियों से बचने के उपायमाहवारी यानि मासिक धर्म के वक्त गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने से बचें । इस द्वारान अत्यधिक मेहनती काम करने से बचे ।असामान्य मासिक धर्म से कैसे बचें?मानसिक तनाव से बचें । ऐसा होने पर कुछ दिन के लिए व्ययायाम सम्बन्धी गतिविधियों पर रोक लगाएं । प्राणायाम कर सकते हैं इससे तनाव जायेगा ।क्या जानवरों को मासिक धर्म होता है?वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों को मासिक धर्म नहीं होता, जानवरों में यह काफी काम मात्रा में होता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में estrous cycle कहते हैं ।क्या मासिक धर्म को रोका जा सकता है?इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता क्यूंकि यह बिलकुल नैसर्गिक है । महिलाओं का शरीर हर महीने बच्चा पैदा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है । शरीर को यह पता नहीं होता कि किस महीने स्त्री गर्भवती होगी इसलिए स्त्री का शरीर अपने आप को इस काम के लिए हर महीने तैयार करता रहता है ।दोस्तों कहानी किसी लगी व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करके जरूर बताएं । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Join Whatsapp । अंत तक बने रखने के लिए आपका शुक्रिया

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹 मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप   By  बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम मसिक धर्म  मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है । इंद्र के द्वारा किया गया पाप इंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों...

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!!अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी।अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी।युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी।राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा।रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी। यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा।वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे।कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया। प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी। रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया।जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये। यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की।राजा दशरथ के पास गया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी। बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी। इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए।तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता। कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे।ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और खूबसूरत सी कहानीया से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ ...