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मधुर स्वेरा Good mornnig कनिका ने धीरे से ट्रंक खोला और सामान लगाने लगी। वह अब यहाँ नहीं रहना चाहती थी क्योंकि बहू के साथ उसके विचार नहीं मिलते थे। बात -बात पर वह घर से बाहर निकालने की धमकी देकर कनिका को चुप करा देती थी पर अब बस बहुत हुआ। उसने सोच लिया था कि वह वृद्धाश्रम में रहेगी। यह रोज़ रोज़ का अपमान उसके लिए असह्य था। एक कांच का ग्लास ही तो टूटा था उससे और निहारिका ने बिना सोचे समझे कितना बुरा भला कह दिया था। वह भावुक हो उठी और भीगी पलकों में आँसू छुपाये करीने से ट्रंक में अपना सामान लगाने लगी। उसने काँपते हाथों से कुणाल और अपनी तस्वीर हाथ में उठाई तो पलकों पर रुके अश्रु टपक गए। अपनी धोती के पल्लू से तस्वीर को साफ़ करते हुए वह कुणाल को निहारने लगी। उसे अपनी और कुणाल की प्रथम मुलाक़ात स्मरण हो आई जब कुणाल अपने माता पिता के साथ उसे देखने आये थे। देखते ही उसकी सुंदरता पर रीझ कर शादी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। उनके आकर्षण से वह भी अछूती नहीं रह सकी थी। कुणाल का आयात निर्यात का कार्य था और घर में उसके कदम रखते ही व्यापार बुलंदियों को छूने लगा था। धीरे धीरे कुणाल की गिनती अव्वल दर्जे के व्यापारियों में होने लगी थी। कुणाल के भरपूर प्रेम ने कनिका के जीवन में खुशहाली भर दी थी। उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे परन्तु उसे क्या पता था कि ये खुशियाँ शीघ्र ही बिखर जाएँगी। सहसा व्यापार में घाटा होने के कारण कुणाल को दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसा। कनिका का जीवन वीरान हो गया। एक महीने तक तो उसे अपने जीवन की सुध ही नहीं थी। वह दिन रात रोती रहती थी ,स्वयं को असह्य समझती थी। छोटी छोटी बातों पर उसे कुणाल के न होने का आभास होता था। कुणाल की मृत्यु की कानूनी कार्यवाही शुरू हुई तो कदम कदम पर उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ी। इस कानूनी कार्यवाही में उसे कोर्ट के कई चक्कर लगाने पड़े। इस भाग दौड़ ने उसे पूर्ण रूप से सशक्त बना दिया था।यहाँ उसकी सद्बुद्धि और उच्च शिक्षा ने ही साथ दिया था। कई दिन का परिश्रम रंग लाया और कानूनी तौर तरीकों के सिलसिले से छुट्टी प्राप्त हुई। उस दिन वह थकी हारी घर पहुँची और हाथ मुँह धो कर चाय पीने की इच्छा से शक्कर का डब्बा खोला तो पाया कि शक्कर समाप्त हो गई थी। उसने बेटे समीर से पड़ोस के निरंजन बाबू के घर से शक्कर मंगवाने का सोचा परन्तु बेटे को स्कूल के कार्य में मग्न देख स्वयं ही जाने का निर्णय लिया। शक्कर से भरी कटोरी कनिका को पकड़ाते हुए निरंजन ने उसका हाथ धीरे से दबाते हुए कहा ,”कनिका जी कभी भी कोई आवश्यकता हो तो निःसंकोच मदद लीजियेगा ,मै आपकी मदद के लिए सदा तत्पर हूँ। “कनिका तभी समझ गई कि निरंजन की बातों में अपनत्व होते हुए भी इरादों में पवित्रता नहीं है। कनिका को निरंजन की आँखों में वासना नज़र आयी थी। उसका मन हुआ कि वह अभी निरंजन के मुँह पर झापड़ मार दे। कुणाल के होते हुए भी कई बार निरंजन ने उसका रास्ता रोकने का प्रयत्न किया था पर उस वक्त उसने ध्यान नहीं दिया था। उसे लगता था कि भ्रम है उसका परन्तु अब जब कुणाल नहीं है तब निरंजन का इस तरह पेश आना उसे अच्छा नहीं लगा था। वह जानती थी कि समाज में निरंजन जैसे लोग उपस्थित हैं और उसे ऐसे लोगों से सतर्क रहना चाहिए।उसने मन ही मन फैसला लिया कि चाहे जो हो जाए आज के बाद वह कभी निरंजन से मदद नहीं लेगी। संभवतः निरंजन बाबू के गलत व्यवहार ने ही उसे बाध्य किया था जो वह नागपुर से सब कुछ समेट कर सपनों की नगरी मुंबई पलायन कर गयी थी। कहने के लिए वह इस दुनिया में अकेली रह गई थी परन्तु उसके साथ कुणाल की हसीन यादें थीं। जानी मानी कंपनियों में काम करते हुए ,धीरे धीरे उसकी ज़िन्दगी पटरी पर आ गई थी। उसने वर्षों तक स्वयं को पूर्ण रूप से काम में डुबो दिया था और इस दौरान समीर भी विद्यार्थी जीवन से निकल कर अफसर बन गया था। एक दिन खाने की छुट्टी में वह अपने कुछ सहकर्मियों के साथ बैठी खाना खा रही थी कि सबने मिलकर उसके सामने पुनर्विवाह का प्रस्ताव रख दिया। उनका कहना था कि जीवन में एक साथी की आवश्यकता हर किसी को पड़ती है और खासतौर पर वृद्धावस्था में दोनों एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। जहाँ तक समीर का सवाल है भविष्य में उसकी अपनी ज़िन्दगी होगी ,ऐसे में अकेलेपन से बचने के लिए पुनर्विवाह श्रेष्ठ है। फिर कनिका की ऐसी कोई उम्र नहीं हुई थी कि पुनर्विवाह करने में संकोच हो। अचानक मिले इस प्रस्ताव से वह सकपका गई परन्तु फिर संभलते हुए बोली ,”कुणाल की यादों के सहारे ही इस जीवन को मैं व्यतीत करना चाहती हूँ ,यह अधिकार मैं किसी और को नहीं देना चाहती ,आशा है भविष्य में आप लोग ऐसी बातें मेरे सामने नहीं करेंगे। उसने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए खाना समाप्त किया और पलकों पर रुके अश्रुओं के गिरने से पहले ही वहाँ से उठ कर चली गई। शाम को गरम चाय की चुस्की लेते हुए दिन में घटी घटना के बारे में वह सोचने लगी। उसने दर्पण में स्वयं को देखा तो उसे लगा कि इन वर्षों में वह काफी बदल गई है। उसने अपने चेहरे को गौर से देखा। चेहरे पर किसी प्रकार का कोई श्रृंगार नहीं था ,फिर भी माथे पर एक छोटी सी बिंदी और होठों की लाली ने एक अनोखा आकर्षण उत्पन्न कर रखा था ,काले बालों पर हलकी सफेदी थी। गाल पर आई लट को उसने करीने से कानों के पीछे किया तो सुनी कलाई और खाली मांग पर उसका ध्यान चला गया। पति से जुड़े इस श्रृंगार का उसके जीवन में कोई महत्त्व नहीं है ,यह आँखों में उभर आई नमी ने उसे एहसास करा दिया था। सहसा उसका हृदय पूछ बैठा ,”क्या समीर को अपने पिता की कमी महसूस नहीं होती होगी। क्या उसे पुनर्विवाह करना चाहिए ?परन्तु अगले ही पल कनिका को लगा जैसे कुणाल उसके पीछे ही खड़ा है और कह रहा है ,”तुम सिर्फ मेरी हो। “कनिका ने आँखे मूंदी तो दो मोती टपक गए। उसने अटल निर्णय लिया ,”वह कुणाल की थी और सदा उसकी ही रहेगी। कनिका अक्सर घर के पास वाले बगीचे में शाम के वक्त जा बैठती थी। बगीचे के पुष्पों की सुगंध उसे सुकून देती थी। रोज़ की तरह उस दिन भी वह बगीचे में बैठी थी। बगीचे के बीचों बीच बने पार्क में छोटे बच्चे खेल रहे थे। वह उन बच्चों का खेल देख रही थी कि अचानक उसकी निगाह दूर बेंच पर बैठे दंपत्ति पर चली गई। वह एक नवविवाहिता जोड़ा था जो दुनिया से बेखबर एक दूसरे से सिमट कर बैठा हुआ था। उसे याद आया कि शादी के बाद कुणाल और वह भी इसी तरह बैठे हुए थे। कनिका को फूलों का शौक था यह जान कर कुणाल ने उसके बालों में गजरा लगा दिया था। वह शर्मा कर बोली थी ,”कुणाल ,क्या तुम ऐसे ही सदा मेरे बालों में गजरा लगाओगे। “कुणाल की स्वीकृति पा कर वह मन ही मन प्रसन्न हुई थी। फिर तो जब भी वह बाहर जाते कनिका के बालों में गजरा ज़रूर महकता था। इन्हीं यादों में वह खोई हुई घर की ओर चल दी। घर आकर उसने कुणाल की तस्वीर निकाली और उसे बहुत देर तक निहारती रही।कनिका को अब समीर के विवाह की चिंता होने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अकेली इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभाएगी ?परन्तु समीर ने निहारिका से प्रेम विवाह करने का प्रस्ताव रखा तो कनिका फूली न समाई। उसे लगा जैसे उसकी ज़िन्दगी भर का श्रम सफल हो गया। बेटे का विवाह हुआ तो निहारिका जैसी सुन्दर बहू को पाकर वह निहाल हो गई। उसे तो निहारिका के रूप में जैसे हीरा ही मिल गया था। निहारिका का उसके प्रति सदव्यवहार उसे सुकून पहुँचाता था। परन्तु जैसे जैसे समीर तरक्की की सीढ़ी चढ़ता गया वैसे वैसे निहारिका का बर्ताव कनिका के प्रति बदलता गया। वह अभिमान में इतनी चूर हो गई थी कि छोटे बड़े का फर्क भी भूल गई थी। ऐसे में कनिका ने समीर की टोह लेनी चाही थी। उसे आशा थी कि समीर निहारिका को समझायेगा परन्तु उसकी तरफ से कनिका को इस मामले में कोई सकारात्मकता नज़र नहीं आई। उल्टा वह कनिका को ही जवाब दे कर चुप करा देता था। आखिरकार जब सिर से ऊपर पानी होने लगा तो कनिका ने ही वृद्धाश्रम जाने का निर्णय लिया था। कनिका ने जब अटैची बंद की तो उसका क्रोध शांत हो चुका था। वह जल्दबाज़ी तो नहीं कर रही ?क्या अपना घर छोड़ कर सब कुछ ठीक हो जाएगा ? जिस स्नेह व आदर की वह हकदार है उसे प्राप्त हो जाएगा ?क्या वृद्धाश्रम जाना ही इस समस्या का एकमात्र हल है ?अपने ही अंदर अनेक प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए वह बेचैन हो गई। उसकी अंतरात्मा बोल उठी ,नहीं नहीं वह अपने बच्चों से अलग नहीं रह सकती। वह बड़े होने के नाते उन्हें समझाएगी ,स्वयं को इस घर को सुधारने का एक अवसर ज़रूर देगी । अपने रक्त से सींच कर उसने अपने कुणाल के घर को बनाया था यों एक हलके से झोंके से बिखरने नहीं देगी। वह अपने ही ख्यालों में गुम थी कि सहसा निहारिका का स्वर सुन कर चौंक गई।”मुझे माफ़ कर दो ,आगे से ऐसा नहीं होगा ,एक मौका और दे दो। “परन्तु समीर की आवाज़ में क्रोध था ,”मुझे कुछ नहीं सुनना,तुम भी घर से जा सकती हो ,तुम मेरी माँ का सम्मान नहीं कर सकतीं तो मुझे भी तुम्हारी आवश्यकता नहीं है ,तुम्हे क्या पता माँ ने कितने कष्टों से पाला है मुझे। “उधर समीर न जाने क्या क्या कहे जा रहा था और इधर कनिका का दिल रो रहा था। उसने समीर के कमरे में प्रवेश किया तो निहारिका बहू उसके क़दमों में गिर पड़ी ,”मुझे माफ़ कर दीजिये मम्मीजी घर छोड़ कर मत जाइये। “कनिका का दिल पूर्ण रूप से पिघल गया था और उसने निहारिका को अपने गले से लगा लिया।

मधुर स्वेरा

Good mornnig

कनिका ने धीरे से ट्रंक खोला और सामान लगाने लगी। वह अब यहाँ नहीं रहना चाहती थी क्योंकि बहू के साथ उसके विचार नहीं मिलते थे। बात -बात पर वह घर से बाहर निकालने की धमकी देकर कनिका को चुप करा देती थी पर अब बस बहुत  हुआ। उसने सोच लिया था कि वह वृद्धाश्रम में रहेगी। यह रोज़ रोज़ का अपमान उसके लिए असह्य था। एक कांच का ग्लास ही तो टूटा था उससे और निहारिका ने बिना सोचे समझे कितना बुरा भला कह दिया था। वह भावुक  हो उठी और भीगी पलकों में आँसू छुपाये करीने से ट्रंक में अपना सामान लगाने लगी। उसने काँपते हाथों से कुणाल और अपनी तस्वीर हाथ में उठाई तो पलकों पर रुके अश्रु टपक गए। अपनी धोती के पल्लू से तस्वीर को साफ़ करते हुए वह कुणाल को निहारने लगी। उसे अपनी और कुणाल की प्रथम मुलाक़ात स्मरण हो आई जब कुणाल अपने माता पिता के साथ उसे देखने आये थे। देखते ही उसकी सुंदरता पर रीझ कर शादी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। उनके आकर्षण से वह भी अछूती नहीं रह सकी थी। कुणाल का आयात निर्यात का कार्य था और घर में उसके कदम रखते ही व्यापार बुलंदियों को छूने लगा था। धीरे धीरे कुणाल की गिनती अव्वल दर्जे के व्यापारियों में  होने लगी थी। कुणाल के भरपूर प्रेम ने कनिका के जीवन में खुशहाली भर दी थी। उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे परन्तु उसे क्या पता था कि ये खुशियाँ शीघ्र ही बिखर जाएँगी। सहसा व्यापार में घाटा होने के कारण कुणाल  को दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसा। कनिका  का जीवन वीरान हो गया। एक महीने तक तो  उसे  अपने जीवन की सुध ही नहीं थी। वह दिन रात रोती रहती थी ,स्वयं को असह्य समझती थी। छोटी छोटी बातों पर उसे कुणाल के न होने का आभास होता था। कुणाल की मृत्यु की कानूनी कार्यवाही शुरू हुई तो कदम कदम पर उसे मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ी। इस कानूनी कार्यवाही में उसे कोर्ट के कई चक्कर लगाने पड़े। इस भाग दौड़ ने उसे पूर्ण रूप से सशक्त बना दिया था।यहाँ उसकी सद्बुद्धि और उच्च शिक्षा ने ही साथ दिया था। कई दिन का परिश्रम रंग लाया  और कानूनी तौर तरीकों के सिलसिले से छुट्टी प्राप्त हुई। उस दिन वह थकी हारी घर  पहुँची और हाथ मुँह धो कर चाय पीने की इच्छा से शक्कर का डब्बा खोला तो पाया कि शक्कर समाप्त हो गई थी। उसने बेटे समीर से पड़ोस के निरंजन बाबू के घर से शक्कर मंगवाने का सोचा परन्तु बेटे को स्कूल के कार्य में मग्न देख स्वयं ही जाने का निर्णय लिया। शक्कर से भरी कटोरी कनिका को पकड़ाते हुए निरंजन ने उसका हाथ धीरे से दबाते हुए कहा ,”कनिका जी कभी भी कोई आवश्यकता हो तो निःसंकोच मदद लीजियेगा ,मै आपकी मदद के लिए सदा तत्पर हूँ। “कनिका तभी समझ गई कि निरंजन की बातों में अपनत्व होते हुए भी इरादों में पवित्रता नहीं है। कनिका को निरंजन की आँखों में वासना नज़र आयी थी। उसका मन हुआ कि वह अभी निरंजन के मुँह पर झापड़ मार दे। कुणाल के होते हुए भी कई बार निरंजन ने उसका रास्ता रोकने का प्रयत्न किया था पर उस वक्त उसने ध्यान नहीं दिया था। उसे लगता था कि भ्रम है उसका परन्तु अब जब कुणाल नहीं है तब निरंजन का इस तरह पेश आना उसे अच्छा नहीं लगा था। वह जानती थी कि समाज में निरंजन जैसे लोग उपस्थित हैं और उसे ऐसे लोगों से सतर्क रहना चाहिए।उसने मन ही मन फैसला लिया कि चाहे जो हो जाए आज के बाद वह कभी निरंजन से मदद नहीं लेगी। संभवतः निरंजन बाबू के गलत व्यवहार ने ही उसे बाध्य किया था जो वह नागपुर   से सब कुछ समेट कर सपनों की नगरी मुंबई पलायन कर गयी थी। कहने के लिए वह इस दुनिया में अकेली रह गई  थी परन्तु उसके साथ कुणाल की हसीन यादें थीं। जानी मानी कंपनियों में काम करते हुए ,धीरे धीरे उसकी ज़िन्दगी पटरी  पर आ गई थी। उसने वर्षों तक स्वयं को पूर्ण रूप से काम में डुबो दिया था और इस दौरान समीर भी विद्यार्थी जीवन से निकल कर अफसर बन गया था।

 एक दिन खाने की छुट्टी में वह अपने कुछ सहकर्मियों के साथ बैठी खाना खा रही थी कि सबने मिलकर उसके सामने पुनर्विवाह का प्रस्ताव रख दिया। उनका कहना था कि जीवन में एक साथी की आवश्यकता हर किसी को पड़ती है और खासतौर पर वृद्धावस्था में दोनों एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। जहाँ तक समीर का सवाल है भविष्य में उसकी अपनी ज़िन्दगी होगी ,ऐसे में अकेलेपन से बचने के लिए पुनर्विवाह श्रेष्ठ है। फिर कनिका की ऐसी कोई उम्र नहीं  हुई थी  कि पुनर्विवाह करने में संकोच हो। अचानक मिले इस प्रस्ताव से वह सकपका गई परन्तु फिर संभलते हुए बोली ,”कुणाल की यादों के सहारे ही इस जीवन को मैं व्यतीत करना चाहती हूँ ,यह अधिकार मैं किसी और को नहीं देना चाहती ,आशा है भविष्य में आप लोग ऐसी बातें मेरे सामने नहीं करेंगे। उसने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए खाना समाप्त किया और पलकों पर रुके अश्रुओं के गिरने से पहले ही वहाँ से उठ कर चली  गई। शाम को गरम चाय  की चुस्की लेते हुए दिन में घटी घटना के बारे में वह सोचने लगी।  उसने दर्पण में स्वयं को देखा तो उसे लगा कि इन वर्षों में वह काफी बदल गई है। उसने अपने चेहरे को गौर से देखा। चेहरे पर किसी प्रकार का कोई श्रृंगार नहीं था ,फिर भी माथे पर एक छोटी सी बिंदी और होठों की लाली ने एक अनोखा आकर्षण उत्पन्न कर रखा था ,काले बालों पर हलकी सफेदी थी। गाल पर आई लट को उसने करीने से कानों के पीछे किया तो सुनी कलाई और खाली मांग पर उसका ध्यान चला गया। पति  से जुड़े इस श्रृंगार का उसके जीवन में कोई महत्त्व नहीं है  ,यह आँखों में उभर आई नमी ने उसे   एहसास करा दिया था। सहसा उसका हृदय पूछ बैठा ,”क्या समीर को अपने पिता की कमी महसूस नहीं होती होगी। क्या उसे पुनर्विवाह करना चाहिए ?परन्तु अगले ही पल कनिका को लगा जैसे कुणाल उसके पीछे  ही   खड़ा है  और कह रहा है ,”तुम सिर्फ मेरी हो। “कनिका ने आँखे मूंदी तो दो मोती टपक गए। उसने अटल निर्णय लिया ,”वह कुणाल की थी और सदा उसकी ही रहेगी।

 कनिका अक्सर घर के पास वाले बगीचे में शाम के वक्त जा बैठती थी। बगीचे के पुष्पों की सुगंध उसे सुकून देती थी। रोज़ की तरह उस दिन भी वह बगीचे में बैठी थी। बगीचे के बीचों बीच बने पार्क   में छोटे बच्चे खेल रहे थे। वह उन बच्चों का खेल देख रही थी कि अचानक उसकी निगाह दूर बेंच पर बैठे दंपत्ति पर चली गई। वह एक नवविवाहिता जोड़ा था जो दुनिया से बेखबर एक दूसरे से सिमट कर बैठा हुआ था। उसे याद आया कि शादी के बाद कुणाल और वह भी इसी तरह बैठे हुए थे। कनिका को फूलों का शौक था यह जान कर कुणाल ने उसके बालों में गजरा लगा दिया था। वह शर्मा कर बोली थी  ,”कुणाल ,क्या तुम ऐसे ही सदा मेरे बालों में गजरा लगाओगे। “कुणाल की स्वीकृति पा कर वह मन ही मन प्रसन्न हुई   थी। फिर तो जब भी वह बाहर  जाते कनिका के बालों में गजरा ज़रूर महकता था। इन्हीं यादों में वह खोई हुई घर की ओर चल दी। घर आकर उसने कुणाल की तस्वीर निकाली और उसे बहुत देर तक निहारती रही।

कनिका को अब समीर के विवाह की चिंता होने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अकेली इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभाएगी ?परन्तु समीर ने निहारिका से प्रेम विवाह करने का प्रस्ताव रखा  तो कनिका फूली न समाई। उसे लगा जैसे उसकी ज़िन्दगी भर का श्रम सफल हो गया। बेटे का विवाह हुआ तो निहारिका जैसी सुन्दर बहू को पाकर वह निहाल हो गई। उसे तो निहारिका के रूप में जैसे हीरा ही मिल गया था। निहारिका का उसके प्रति सदव्यवहार उसे सुकून पहुँचाता था। परन्तु जैसे जैसे समीर तरक्की की सीढ़ी चढ़ता गया वैसे वैसे निहारिका का बर्ताव कनिका के प्रति बदलता गया। वह अभिमान में इतनी चूर हो गई थी कि छोटे बड़े का फर्क भी भूल गई थी। ऐसे में कनिका ने समीर की टोह लेनी चाही थी। उसे आशा थी कि समीर निहारिका को समझायेगा परन्तु उसकी तरफ से कनिका को इस मामले में  कोई सकारात्मकता नज़र नहीं आई। उल्टा वह कनिका को ही जवाब दे कर चुप करा देता था। आखिरकार जब सिर से ऊपर पानी होने लगा तो कनिका ने ही वृद्धाश्रम जाने का निर्णय लिया था। कनिका ने जब अटैची बंद की तो उसका क्रोध शांत हो चुका था। वह जल्दबाज़ी तो नहीं कर रही ?क्या अपना घर छोड़ कर सब कुछ ठीक हो जाएगा ? जिस स्नेह व आदर की वह हकदार है उसे प्राप्त हो जाएगा ?क्या वृद्धाश्रम जाना ही इस समस्या का एकमात्र हल है ?अपने ही अंदर अनेक प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए वह बेचैन हो गई। उसकी अंतरात्मा बोल उठी ,नहीं नहीं वह अपने बच्चों से अलग नहीं रह सकती। वह बड़े होने के नाते उन्हें समझाएगी ,स्वयं को इस घर को सुधारने का एक अवसर ज़रूर देगी । अपने रक्त से सींच  कर उसने अपने कुणाल के घर को बनाया था यों एक हलके से झोंके से बिखरने नहीं देगी। वह अपने ही ख्यालों में गुम थी कि सहसा निहारिका  का स्वर सुन कर चौंक गई।”मुझे माफ़ कर दो ,आगे से ऐसा नहीं होगा ,एक मौका और दे दो। “परन्तु समीर की आवाज़ में क्रोध था ,”मुझे कुछ नहीं सुनना,तुम भी घर से जा सकती हो ,तुम मेरी माँ का सम्मान नहीं कर सकतीं तो मुझे भी तुम्हारी आवश्यकता नहीं है ,तुम्हे क्या पता माँ ने कितने कष्टों से पाला है मुझे। “उधर समीर न  जाने क्या क्या कहे जा रहा था  और इधर कनिका का दिल रो रहा था। उसने समीर के कमरे में प्रवेश किया तो निहारिका बहू उसके क़दमों में गिर पड़ी ,”मुझे माफ़ कर दीजिये मम्मीजी घर छोड़ कर मत जाइये। “कनिका का दिल पूर्ण रूप से पिघल गया था और उसने निहारिका को अपने गले से लगा लिया।

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गलत मार्ग का परिणाम.किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया।उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा,“देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।”वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।”“ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।”इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई।उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। और फिर इसको खोजता हुआ कोई इसके पीछे आ गया तो वैसे भी संकट ही है। अतः किसी प्रकार इससे सारा धन हथियाकर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए। यह विचार कर उसने कहा,“नदी बड़ी गहरी है। पहले मैं गठरी को उस पार रख आता हूं, फिर तुमको अपनी पीठ पर लादकर उस पार ले चलूंगा। दोनों को एक साथ ले चलना कठिन है।”“ठीक है, ऐसा ही करो।” किसान की स्त्री ने अपनी गठरी उसे पकड़ाई तो ठग बोला,“अपने पहने हुए गहने-कपड़े भी दे दो, जिससे नदी में चलने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। और कपड़े भीगेंगे भी नहीं।”उसने वैसा ही किया। उन्हें लेकर ठग नदी के उस पार गया तो फिर लौटकर आया ही नहीं।वह औरत अपने कुकृत्यों के कारण कहीं की नहीं रही।By वनिता कासनियां पंजाबइसलिए कहते हैं कि अपने हित के लिए गलत कर्मों का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।fickleness destroys intelligence,fickleness destroys intelligenceThere lived a tortoise named Kambugriva in a pond. He had a close friendship with a swan named Sankat and Vikat, who lived on the banks of the pond. On the banks of the pond all three

गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप By बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रममसिक धर्म मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है ।इंद्र के द्वारा किया गया पापइंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों में से एक है इंद्र के द्वारा की गयी ब्रम्हहत्या ।एक बार की बात है देवताओं के गुरु वृहस्पति उनपर नाराज हो गए । इस मौके का फायदा उठाकर असुरों ने स्वर्ग पर हमला कर दिया । गुरु का संरक्षण ना होने के कारण सारे देवता कमजोर पड़ गए और युद्ध हार गए । असुरों ने स्वर्ग छीन लिया और देवता बेघर होकर यहाँ वहां भटकने लगे । स्वर्ग के राजा जब बेघर होकर भाग रहे थे तो उनकी मदद किसी ने नहीं की । ब्रम्हा जी ने उन्हें सलाह दी कि देवराज का यह हाल एक महात्मा का तिरस्कार करने की वजह से हुआ है । अगर देवताओं पर बृहस्पति की कृपा होती हो ये नौबत कभी ना आती । ।ब्रम्हा जी ने कहा की देवराज इंद्र को गुरु कृपा से ही स्वर्ग वापस मिल सकता है इसलिए उन्हें किसी महात्मा की शरण में जाना चाहिए । इंद्र ने वैसा ही किया और एक ज्ञानी महात्मा को प्रसन्न करने के लिए रोज उनकी सेवा करने लगे । महात्मा के लिए यज्ञ की सामग्री लेकर आते, हाथ पैर दबाते और विनम्र भाव से आज्ञा पालन करते । सब कुछ ठीक चल रहा था जब तक इंद्र ने उन महात्मा की ह्त्या नहीं कर डाली । दरअसल इंद्र को पता चला कि वो महात्मा एक असुर के पुत्र थे और यज्ञ में दी गयी सारी आहूतियां असुरों तक पंहुचा रहे थे ।इंद्र ने अपने पाप का फल स्त्रियों को दे दियापहले से ही मुसीबत में पड़े इंद्र पर अब एक और मुसीबत आ गयी क्यूंकि ब्रम्हत्या का पाप भी अब उनपर लगने वाला था । भागवान विष्णु ने इंद्र को इस पाप से बचने की सलाह दी । भागवान के कहे अनुसार इंद्र ने अपने पाप का एक चौताई हिस्सा पेड़ों को, एक चौथाई हिस्सा भूमि को, एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को और एक चौथाई हिस्सा जल को दे दिया । इस तरह इंद्र को पाप से मुक्ति मिल गयी लेकिन पाप के एवज में इंद्र ने चारों पात्रों को एक-एक वरदान भी दिया ।इंद्र ने पेड़ों को वरदान दिया कि पेड़ एक बार कटने के बाद अपने आप को पुनः जीवित कर सकेंगे बदले में पेड़ में से गोंद निकलना शुरू हो गया । इसी तरह स्त्री को इंद्र ने वरदान दिया कि पुरुषों के मुकाबले वे चार गुना ज्यादा काम का आनंद ले सकेंगी । इसी तरह जल को इंद्र ने वरदान दिया कि आज से जल में पवित्र करने की शक्ति पायी जाएगी । भूमि को वरदान दिया कि भूमि के गड्ढे अपने आप भर जायेमसिक धर्म का वैज्ञानिक कारणवैज्ञानिकों के मत अनुसार मासिक धर्म एक साधारण प्रक्रिया है । यह स्त्री के सरीर में बने अत्यधिक मासपेशियों से उन्हें निजात दिलाता है । दरअसल स्त्री का शरीर हार्मोन में हुए बदलाव की वजह से नयी मासपेशियों को बनाता है । जब इनका इस्तेमाल नहीं होता तो शरीर इनसे छुटकारा पा लेता है और दोबारा से नयी मासपेशियां बनाना शुरू कर देता है । इतना ही साधारण है मासिक धर्म वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से ।पुरुषों को मसिक धर्म क्यों नहीं होता?पुरुषों को इंद्र ने अपने पाप का हिस्सा नहीं दिया था इसलिए उन्हें मासिक धर्म नहीं होता । वैज्ञानिक द्रष्टिकोण से पुरुषों का प्रजनन तंत्र महिलाओं के प्रजनन तंत्र से अलग काम करता है । अब क्यूंकि पुरुष बच्चों को जन्म नहीं देते इसलिए उनका शरीर उसके लिए उतनी मासपेशियां नहीं बनाता ।मासिक धर्म के दौरान मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों?मंदिर में प्रवेश पवित्र व्यक्ति ही कर सकता है । पवित्र मतलब जो शरीर से पवित्र हो । प्राचीन काल में इस नियम का दुरूपयोग किया जाता रहा और छोटी जाती के लोगों को मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता रहा । मासिक धर्म के दौरान महिलाएं शरीर से अपवित्र होती हैं इसलिए उस वक्त उनका मंदिर में प्रवेश निषेध है ।माहवारी से हुयी बीमारियों से बचने के उपायमाहवारी यानि मासिक धर्म के वक्त गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने से बचें । इस द्वारान अत्यधिक मेहनती काम करने से बचे ।असामान्य मासिक धर्म से कैसे बचें?मानसिक तनाव से बचें । ऐसा होने पर कुछ दिन के लिए व्ययायाम सम्बन्धी गतिविधियों पर रोक लगाएं । प्राणायाम कर सकते हैं इससे तनाव जायेगा ।क्या जानवरों को मासिक धर्म होता है?वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों को मासिक धर्म नहीं होता, जानवरों में यह काफी काम मात्रा में होता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में estrous cycle कहते हैं ।क्या मासिक धर्म को रोका जा सकता है?इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता क्यूंकि यह बिलकुल नैसर्गिक है । महिलाओं का शरीर हर महीने बच्चा पैदा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है । शरीर को यह पता नहीं होता कि किस महीने स्त्री गर्भवती होगी इसलिए स्त्री का शरीर अपने आप को इस काम के लिए हर महीने तैयार करता रहता है ।दोस्तों कहानी किसी लगी व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन करके जरूर बताएं । ग्रुप ज्वाइन करने के लिए यहाँ क्लिक करें – Join Whatsapp । अंत तक बने रखने के लिए आपका शुक्रिया

🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹 मासिक धर्म का कारण है इंद्र के द्वारा किया गया यह पाप   By  बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम मसिक धर्म  मासिक धर्म को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं । जहाँ वैज्ञानिक इसे एक जैविक प्रक्रिया बताते हैं वहीँ इसे हमारी प्रचलित मान्यताओं में अपवित्र कहा गया है । इस दौरान महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश निषेध है । पवित्र कामों को करने के लिए महिलाओं को मासिक धर्म के वक्त मनाही रहती है । यह विषय हमेसा से ही चर्चा का विषय रहा है और जमाने भर के लेखकों नेऔर दार्शनिकों ने इस पर बहुत कुछ कहा है । हमारा आज का विषय मासिक धर्म से जुड़ी मान्यताओं को सही या गलत ठहरना नहीं है । हम आज आपको बताएँगे कि इस विषय से जुड़ी हमारे धर्म शास्त्रों में कौन सी कहानी बताई गयी है । इंद्र के द्वारा किया गया पाप इंद्र के द्वारा किये गए पाप की सजा सभी महिलाओं को मिली और तब से उन्हें मासिक धर्म की पीड़ा को सहना पड़ता है । हमारे धर्म शास्त्रों में कई तरह के पाप कर्मों की बात की गयी है जिनकी सजा करने वाले को नहीं वल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाया करती थी । अतीत में किये गए इसी तरह के पापों...

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!!अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी।अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी।युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी।राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा।रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी। यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा।वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे।कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया। प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी। रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया।जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये। यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की।राजा दशरथ के पास गया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी। बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी। इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए।तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता। कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे।ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और खूबसूरत सी कहानीया से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !!!!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ ...