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नशा

नशा

1

ईश्‍वरी एक बडे जमींदार का लड़का था और मैं गरीब क्‍लर्क था, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्‍पर बहसें होती रहती थीं। मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्‍हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों का पक्ष लेता, पर स्‍वभावत: उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्‍योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। वह कहता कि सभी मनुष्‍य बराबर नहीं हाते, छोटे-बडे हमेशा होते रहेंगे। लचर दलील थी। किसी मानुषीय या नैतिक नियम से इस व्‍यवस्‍था का औचित्‍य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद की गर्मी-गर्मी में अक्‍सर तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता, लेकिन ईश्‍वरी हारकर भी मुस्‍कराता रहता था मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा। शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमजोरी समझता था।

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नौकरों से वह सीधे मुंह बात नहीं करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्ता होती है, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्‍तर लगाने में जरा भी देर की, दूध जरूरत से ज्‍यादा गर्म या ठंडा हुआ, साइकिल अच्‍छी तरह साफ नहीं हुई, तो वह आपे से बाहर हो जाता। सुस्‍ती या बदतमीजी उसे जरा भी बरदाश्‍त न थी, पर दोस्‍तों से और विशेषकर मुझसे उसका व्‍यवहार सौहार्द और नम्रता से भरा हुआ होता था। शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझसे भी वहीं कठोरताएं पैदा हो जातीं, जो उसमें थीं, क्‍योंकि मेरा लोकप्रेम सिद्धांतों पर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था, लेकिन वह मेरी जगह होकर भी शायद अमीर ही रहता, क्‍योंकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्‍वर्य-प्रिय था।

अबकी दशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्‍चय किया कि घर न जाऊंगा। मेरे पास किराए के लिए रूपये न थे और न घरवालों को तकलीफ देना चाहता था। मैं जानता हूं, वे मुझे जो कुछ देते हैं, वह उनकी हैसियत से बहुत ज्‍यादा है, उसके साथ ही परीक्षा का ख्‍याल था। अभी बहुत कुछ पढना है, बोर्डिग हाउस में भूत की तरह अकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्‍वरी ने मुझे अपने घर का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया। ईश्‍वरी के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जाएगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और जहीन है।

उसने उसके साथ ही कहा-लेकिन भाई, एक बात का ख्‍याल रखना। वहॉं अगर जमींदारों की निंदा की, तो मुआमिला बिगड. जाएगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तो आसामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्‍वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है। असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारों का कहीं पता न लगे।

मैंने कहा-तो क्‍या तुम समझते हो कि मैं वहां जाकर कुछ और हो जाऊंगा?

‘हॉं, मैं तो यही समझता हूं।

‘तुम गलत समझते हो।‘

ईश्‍वरी ने इसका कोई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मुआमले को मरे विवेक पर छोड़ दिया। और बहुत अच्‍छा किया। अगर वह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी जिद पकड़ लेता।


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सेकंड क्‍लास तो क्‍या, मैंनें कभी इंटर क्‍लास में भी सफर न किया था। अब की सेकंड क्‍लास में सफर का सौभाग्‍य प्राइज़ हुआ। गाडी तो नौ बजे रात को आती थी, पर यात्रा के हर्ष में हम शाम को स्‍टेशन जा पहुंचे। कुछ देर इधर-उधर सैर करने के बाद रिफ्रेशमेंट-रूम में जाकर हम लोगों ने भेजन किया। मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्‍गू कौन; लेकिन न जाने क्‍यों मुझे उनकी गुस्‍ताखी बुरी लग रही थी। पैसे ईश्‍वरी की जेब से गए। शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्‍यादा इन खानसामों को इनाम- इकराम में मिल जाता हो। एक अठन्‍नी तो चलते समय ईश्‍वरी ही ने दी। ‍फिर भी मैं उन सभों से उसी तत्‍परता और विनय की अपेक्षा करता था, जिससे वे ईश्‍वरी की सेवा कर रहे थे। क्‍यों ईश्‍वरी के हुक्‍म पर सब-के-सब दौडते हैं, लेकिन मैं कोई चीज मांगता हूं, तो उतना उत्‍साह नहीं दिखाते! मुझे भोजन में कुछ स्‍वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्‍यान को सम्‍पूर्ण रूप से अपनी ओर खींचे हुए था।

गाडी आयी, हम दोनो सवार हुए। खानसामों ने ईश्‍वरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं।

ईश्‍वरी ने कहा—कितने तमीजदार हैं ये सब? एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढंग नहीं।

मैंने खट्टे मन से कहा—इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज इनाम दिया करो, तो शायद इनसे ज्‍यादा तमीजदार हो जाएं।

‘तो क्‍या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं।’

‘जी नहीं, कदापित नहीं! तमीज और अदब तो इनके रक्‍त में मिल गया है।’

गाड़ी चली। डाक थी। प्रयास से चली तो प्रतापगढ जाकर रूकी। एक आदमी ने हमारा कमरा खोला। मैं तुरंत चिल्‍ला उठा, दूसरा दरजा है-सेकंड क्‍लास है।

उस मुसाफिर ने डिब्‍बे के अन्‍दर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा—जी हां, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थडे पर बैठ गया। मुझे कितनी लज्‍जा आई, कह नहीं सकता।

भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुंचे। स्‍टेशन पर कई आदमी हमारा स्‍वागत करने के लिए खड़े थे। पांच बेगार। बेगारों ने हमारा लगेज उठाया। दोनों भद्र पुरूष पीछे-पीछे चले। एक मुसलमान था रियासत अली, दूसरा ब्राह्मण था रामहरख। दोनों ने मेरी ओर परिचित नेत्रों से देखा, मानो कह रहे हैं, तुम कौवे होकर हंस के साथ कैसे?

रियासत अली ने ईश्‍वरी से पूछा—यह बाबू साहब क्‍या आपके साथ पढ़ते हैं?

ईश्‍वरी ने जवाब दिया—हॉँ, साथ पढ़ते भी हैं और साथ रहते भी हैं। यों कहिए कि आप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूं, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता। अब की मैं इन्‍हें घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ चुके थे, मगर मैंने इनकारी-जवाब दिलवा दिए। आखिरी तार तो अर्जेंट था, जिसकी फीस चार आने प्रति शब्‍द है, पर यहां से उनका भी जवाब इनकारी ही था।

दोनों सज्‍जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा। आतंकित हो जाने की चेष्‍टा करते जान पड़े।

रियासत अली ने अर्द्धशंका के स्‍वर में कहा—लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।

ईश्‍वरी ने शंका निवारण की—महात्‍मा गांधी के भक्‍त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछ पहने ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहा कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं।

रामहरख बोले—अमीरों का ऐसा स्‍वभाव बहुत कम देखने में आता है। कोई भॉंप ही नहीं सकता।

रियासत अली ने समर्थन किया—आपने महाराजा चॉँगली को देखा होता तो दॉंतों तले उंगली दबाते। एक गाढ़े की मिर्जई और चमरौंधे जूते पहने बाजारों में घूमा करते थे। सुनते हैं, एक बार बेगार में पकड़े गए थे और उन्‍हीं ने दस लाख से कालेज खोल दिया।

मैं मन में कटा जा रहा था; पर न जाने क्‍या बात थी कि यह सफेद झूठ उस वक्‍त मुझे हास्‍यास्‍पद न जान पड़ा। उसके प्रत्‍येक वाक्‍य के साथ मानों मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।

मैं शहसवार नहीं हूं। हॉँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूं। यहां देखा तो दो कलॉं-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई। सवार तो हुआ, पर बोटियॉं कॉंप रहीं थीं। मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया। घोड़े को ईश्‍वरी के पीछे डाल दिया। खैरियत यह हुई कि ईश्‍वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पॉँर तुड़वाकर लौटता। संभव है, ईश्‍वरी ने समझ लिया हो कि यह कितने पानी में है।
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ईश्‍वरी का घर क्‍या था, किला था। इमामबाड़े का—सा फाटक, द्वार पर पहरेदार टहलता हुआ, नौकरों का कोई सिसाब नहीं, एक हाथी बॅंधा हुआ। ईश्‍वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊ आदि सबसे मेरा परिचय कराया और उसी अतिश्‍योक्ति के साथ। ऐसी हवा बॉंधी ‍िक कुछ न पूछिए। नौकर- चाकर ही नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्‍मान करने लगे। देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कान्‍सटेबिल को अफसर समझने वाले। कई महाशय तो मुझे हुजूर-हुजूर कहने लगे!

जब जरा एकान्‍त हुआ, तौ मैंने ईश्‍वरी से कहा—तुम बड़े शैतान हो यार, मेरी मिट्टी क्‍यों पलीद कर रहे हो?

ईश्‍वरी ने दृढ़ मुस्‍कान के साथ कहा—इन गधों के सामने यही चाल जरूरी थी, वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।

जरा देर के बाद नाई हमारे पांव दबाने आया। कुंवर लोग स्‍टेशन से आये हैं, थक गए होंगे। ईश्‍वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा—पहले कुंवर साहब के पांव दबा।

मैं चारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने मेरे पांव दबाए हों। मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्‍या-क्‍या कहकर ईश्‍वरी का परिहास किया करता और आज मैं पोतड़ों का रईस बनने का स्‍वांग भर रहा था।

इतने में दस बज गए। पुरानी सभ्‍यता के लोग थे। नयी रोशनी अभी केवल पहाड़ की चोटी तक पहुंच पायी थी। अंदर से भोजन का बुलावा आया। हम स्‍नान करने चले। मैं हमेंशा अपनी धोती खुद छांट लिया करता हूँ; मगर यहॉँ मैंने ईश्‍वरी की ही भांति अपनी धोती भी छोड़ दी। अपने हाथों अपनी धोती छांटते शर्म आ रही थी। अंदर भोजन करने चले। होस्‍टल में जूते पहले मेज पर जा डटते थे। यहॉं पॉंव धोना आवश्‍यक था। कहार पानी लिये खड़ा था। ईश्‍वरी ने पॉंव बढ़ा दिए। कहार ने उसके पॉंव धोए। मैंने भी पॉंव बढ़ा दिए। कहार ने मेरे पॉंव भी धोए। मेरा वह विचार न जाने कहॉं चला गया था।
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सोचा था, वहॉँ देहात में एकाग्र होकर खूब पढ़ेंगे, पर यहॉं सारा दिन सैर-सपाटे में कट जाता था। कहीं नदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं, कहीं मछ‍लियों या चिडियों का शिकार खेल रहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्‍ती देख रहे हैं, कहीं शतरंज पर जमें हैं। ईश्‍वरी खूब अंडे मँगवाता और कमरे में ‘स्‍टोव’ पर आमलेट बनते। नौकरों का एक जत्‍था हमेशा घेरे रहता। अपने हॉँथ-पॉँव हिलाने की कोई जरूरत नहीं। केवल जबान हिला देना काफी है। नहाने बैठो तो आदमी नहलाने को हाजिर, लेटो तो आदमी पंखा झलने को खड़े।

महात्‍मा गांधी का कुंवर चेला मशहूर था। भीतर से बाहर तक मेरी धाक थी। नाश्‍ते में जरा भी देर न होने पाए, कहीं कुंवर साहब नाराज न हो जाऍं; बिछावन ठीक समय पर लग जाए, कुंवर साहब के सोने का समय आ गया। मैं ईश्‍वरी से भी ज्‍यादा नाजुक दिमाग बन गया था या बनने पर मजबूर किया गया था। ईश्‍वरी अपने हाथ से बिस्‍तर बिछाले लेकिन कुंवर मेहमान अपने हाथों कैसेट अपना बिछावन बिछा सकते हैं! उनकी महानता में बट्टा लग जाएगा।

एक दिन सचमुच यही बात हो गई। ईश्‍वरी घर में था। शायद अपनी माता से कुछ बातचीत करने में देर हो गई। यहॉं दस बज गए। मेरी ऑंखें नींद से झपक रही थीं, मगर बिस्‍तर कैसेट लगाऊं? कुंवर जो ठहरा। कोई साढ़े ग्‍यारह बजे महरा आया। बड़ा मुंह लगा नौकर था। घर के धंधों में मेरा बिस्‍तर लगाने की उसे सुधि ही न रही। अब जो याद आई, तो भागा हुआ आया। मैंने ऐसी डॉँट बताई कि उसने भी याद किया होगा।

ईश्‍वरी मेरी डॉँट सुनकर बाहर निकल आया और बोला—तुमने बहुत अच्‍छा किया। यह सब हरामखोर इसी व्‍यवहार के योग्‍य हैं।

इसी तरह ईश्‍वरी एक दिन एक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गई, मगर लैम्‍प मेज पर रखा हुआ था। दियासलाई भी थी, लेकिन ईश्‍वरी खुद कभी लैम्‍प नहीं जलाता था। ‍‍फिर कुंवर साहब कैसे जलाऍं? मैं झुंझला रहा था। समाचार-पत्र आया रखा हुआ था। जी उधर लगा हुआ था, पर लैम्‍प नदारद। दैवयोग से उसी वक्‍त मुंशी रियासत अली आ निकले। मैं उन्‍हीं पर उबल पड़ा, ऐसी फटकार बताई कि बेचारा उल्‍लू हो गया— तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लैम्‍प तो जलवा दो! मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहॉं कैसे गुजर होता है। मेरे यहॉं घंटे-भर निर्वाह न हो। रियासत अली ने कॉँपते हुए हाथों से लैम्‍प जला दिया।

वहाँ एक ठाकुर अक्‍सर आया करता था। कुछ मनचला आदमी था, महात्‍मा गांधी का परम भक्‍त। मुझे महात्‍माजी का चेला समझकर मेरा बड़ा लिहाज करता था; पर मुझसे कुछ पूछते संकोच करता था। एक दिन मुझे अकेला देखकर आया और हाथ बांधकर बोला—सरकार तो गांधी बाबा के चेले हैं न? लोग कहते हैं कि यह सुराज हो जाएगा तो जमींदार न रहेंगे।

मैंने शान जमाई—जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्‍या है? यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्‍या करते है?

ठाकुर ने ‍पिर पूछा—तो क्‍यों, सरकार, सब जमींदारों की जमीन छीन ली जाएगी। मैंनें कहा- बहुत-से लोग तो खुशी से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी जमीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं। ज्‍यों ही स्‍वराज्‍य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिबा कर देंगे।

मैं कुरसी पर पॉँव लटकाए बैठा था। ठाकुर मेरे पॉँव दबाने लगा। फिर बोला—आजकल जमींदार लोग बड़ा जुलुम करते हैं सरकार! हमें भी हुजूर, अपने इलाके में थोड़ी-सी जमीन दे दें, तो चलकर वहीं आपकी सेवा में रहें।

मैंने कहा—अभी तो मेरा कोई अख्तियार नहीं है भाई; लेकिन ज्‍यों ही अख्तियार मिला, मैं सबसे पहले तुम्‍हें बुलाऊंगा। तुम्‍हें मोटर-ड़्राइवरी सिखा कर अपना ड्राइवर बना लूंगा।

सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्‍त्री को खूब पीटा और गॉंव महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।


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छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गॉँव के बहुत-से लोग हम लोगों को पहुंचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्‍टेशन तक आया। मैनें भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और देवत्‍व की मुहर हरेक हृदय पर लगा दी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहॉँ थी? वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी गायी तो ठसाठस भरी हुई। दुर्गापूजा की छुट्टियॉं भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकंड क्‍लास में तिल रखने की जगह नहीं। इंटरव्यू क्‍लास की हालत उससे भी बदतर। यह आखिरी गाड़ी थी। किसी तरह रूक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिली। हमारे ऐश्‍वर्य ने वहॉं अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए। पहलू बदलने की भी जगह न थी।

कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे! वे आपस में अंगरेजी राज्‍य की तारीफ करते जा रहे थे। एक महाश्‍य बोले—ऐसा न्‍याय तो किसी राज्‍य में नहीं देखा। छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्‍याय करे, तो अदालत उसकी गर्दन दबा देती है।

दूसरे सज्‍जन ने समर्थन किया—अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं। अदालत में बादशाह पर डिग्री हो जाती है।

एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा गट्ठर बँधा था, कलकत्‍ते जा रहा था। कहीं गठरी रखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बॉँधे हुए था। इससे बेचैन होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता। मैं द्वार के पास ही बैठा हुआ था। उसका बार-बार आकर मेरे मुंह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक तो हवा यों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर मेरे मुंह पर खड़ा हो जाना, मानो मेरा गला दबाना था। मैं कुछ देर तक जब्‍त किए बैठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ठेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाए।

उसनें ऑंखें निकालकर कहा—क्‍यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया है!

मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिए।

गाड़ी में तूफान आ गया। चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी।

‘अगर इतने नाजुक मिजाज हो, तो अव्‍वल दर्जे में क्‍यों नहीं बैठे।‘

‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा। मुझे इस तरह मारते तो दिखा देता।’

‘क्‍या कसूर किया था बेचारे ने। गाड़ी में साँस लेने की जगह नहीं, खिड़की पर जरा सॉँस लेने खड़ा हो गया, तो उस पर इतना क्रोध! अमीर होकर क्‍या आदमी अपनी इन्‍सानियत बिल्‍कुल खो देता है।

’यह भी अंगरेजी राज है, जिसका आप बखान कर रहे थे।’

एक ग्रामीण बोला—दफ्तर मॉं घुस पावत नहीं, उस पै इत्‍ता मिजाज।

ईश्‍वरी ने अंगरेजी मे कहा- What an idiot you are, Bir! (बीर, तुम कितने मूर्ख हो !) और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।

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गलत मार्ग का परिणाम . किसी ग्राम में किसान दम्पती रहा करते थे। किसान तो वृद्ध था पर उसकी पत्नी युवती थी। अपने पति से संतुष्ट न रहने के कारण किसान की पत्नी सदा पर-पुरुष की टोह में रहती थी, इस कारण एक क्षण भी घर में नहीं ठहरती थी। एक दिन किसी ठग ने उसको घर से निकलते हुए देख लिया। उसने उसका पीछा किया और जब देखा कि वह एकान्त में पहुँच गई तो उसके सम्मुख जाकर उसने कहा, “देखो, मेरी पत्नी का देहान्त हो चुका है। मैं तुम पर अनुरक्त हूं। मेरे साथ चलो।” वह बोली, “यदि ऐसी ही बात है तो मेरे पति के पास बहुत-सा धन है, वृद्धावस्था के कारण वह हिलडुल नहीं सकता। मैं उसको लेकर आती हूं, जिससे कि हमारा भविष्य सुखमय बीते।” “ठीक है जाओ। कल प्रातःकाल इसी समय इसी स्थान पर मिल जाना।” इस प्रकार उस दिन वह किसान की स्त्री अपने घर लौट गई। रात होने पर जब उसका पति सो गया, तो उसने अपने पति का धन समेटा और उसे लेकर प्रातःकाल उस स्थान पर जा पहुंची। दोनों वहां से चल दिए। दोनों अपने ग्राम से बहुत दूर निकल आए थे कि तभी मार्ग में एक गहरी नदी आ गई। उस समय उस ठग के मन में विचार आया कि इस औरत को अपने साथ ले जाकर मैं क्या करूंगा। ...

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴By वनिता कासनियां पंजाब::-। बड़े भाई साहब1मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।2सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।3फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

🪴🌹मानसरोवर🌹🪴 By वनिता कासनियां पंजाब::- बड़े भाई साहब 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने। मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ। वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उन...

*👉 एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया ।*⭕मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ '⭕मैं आश्चर्य में पड़ गया ।अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था ।⭕मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची ।⭕मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- 'भले आदमी ये क्या मजाक है ?माँजी तो यह रही तेरे पास !⭕दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, ‍'भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ ।⭕मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है ।♻आगे उसने कहा, 'माँ को मिठाई,सफेद जामुन, आम आदि पसंद है ।मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ ।♻श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ ।⭕सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्यमाँ का चश्मा साफ करके मिलता है ।♻यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है ।⭕हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं ।पंडितों को खीर-पुरी खिलाते हैं ।♻रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता ।⭕अमेरिका या जापान में भी अभी तक स्वर्ग के लिए कोई टिफिन सेवा शुरू नही हुई है ।*🙏🏻🌺माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है ॥**🌺🙏🏻मन को छुये तो आगे भेज देना , वर्ना कचरे में पटक देना !**आपकी मर्जी ......😊🌺*ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और खूबसूरत सी कहानीया से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇वनिता कासनियां पंजाब::-

*👉 एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया ।* ⭕मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ ' ⭕मैं आश्चर्य में पड़ गया । अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था । ⭕मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची । ⭕मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- 'भले आदमी ये क्या मजाक है ? माँजी तो यह रही तेरे पास ! ⭕दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, ‍'भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ । ⭕मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है । ♻आगे उसने कहा, 'माँ को मिठाई, सफेद जामुन, आम आदि पसंद है । मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ । ♻श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ । ⭕सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो ...